24 December, 2008

नव वर्ष मुबारक हो...मैं चली छुट्टी मनाने

सबको मेरी तरफ़ से merry christmas and a very happy new year

ऐसा है की हम छुट्टी पर जा रहे हैं। एक हफ्ता...लगभग। ७ जनवरी को वापस आयेंगे...तब तक नया साल आ चुका होगा।

तो ऐसे भी कह सकते हैं कि अब एक साल बाद मिलेंगे। ३१ दिसम्बर के बारे में कुछ मजेदार लाइनें
  1. हम कहते थे कि आज नहा लो, नहीं तो साल भर बिना नहाये रहना पड़ेगा।
  2. आज झगड़ा किया है तो मना लेना जरूरी है, वरना वो साल भर रूठा रहेगा...और जाहिर है साल भर बहुत लंबा अरसा होता है। तो हम अपने झगड़े आज सुलझा लेते थे। अगर मेरी किसी बात से कहीं किसी को कोई दुःख हुआ है तो इसी साल मान जाइए...मैं please भी कह रही हूँ
  3. रात को पढ़ाई नहीं करते थे, बड़ा मज़ा आता था, जैसे कि साल भर वाकई पढ़ाई से छुट्टी हो।

बाकी अभी कुछ याद नहीं आ रहा, फ़िर कभी लिखूंगी।

वैसे आज मेरे बारे में राजस्थान पत्रिका में एक article आई थी। सोचा आपको भी लिंक दे दूँ।

आप उसे यहाँ पढ़ सकते हैं। आशीष जी को हार्दिक धन्यवाद.

23 December, 2008

एहतेशाम...ईद...और वो चाँद

आज बस एक खूबसूरत शाम का जिक्र...

हमें IIMC छोड़े लगभग एक साल हो गया था, नई नई जॉब में सब बिजी थे...हफ्ते में एक भी दिन छुट्टी नहीं मिलती थी। ऐसे में दोस्त हैं, जेएनयू है या गंगा ढाबा नाम की किसी जगह को हम भूल चुके थे। और ये लगभग सबकी कहानी थी, मैं भी कभी कभी अगर PSR जा भी पाती थी तो अकेले डूबते सूरज को देख कर चली आती थी।

ऐसे में ईद आई और साथ में एहतेशाम का न्योता की तुम्हें आना है, और सबसे पहले आना है और सबसे देर से जाना है। वो मेरा बहुत प्यारा दोस्त है , न बोलने का कोई सवाल ही नहीं उठता था। उस दिन ऑफिस में बड़ी मिन्नत कर के मैं ७ बजे भागी थी वहां से। एहतेशाम के घर पहुँची तो एकदम कॉलेज के दिन याद आ गए, सारे लोग वहां थे, एक एक दोस्त।

वो ईद मेरी जिंदगी की सबसे खूबसूरत ईद थी, गई तो देखा एहतेशाम और राजेश ने मिल के बहुत ही बढ़िया सेवैयाँ बनाई थी, और साथ में कबाब और पनीर टिक्का। साथ में शायद रूह अफजा था, मुझे याद नहीं...याद है की कितने प्यार से जिद कर कर के हमने सब को खिलाया था। उस दिन मुझे एक प्रोजेक्ट पर भी काम करना था, पर शुक्र था की मेरा बॉस भी ईद मनाने गया हुआ था, उसने कॉल किया की पूजा काम की हो...मैंने डरते डरते कहा की मैं ईद मना रही हूँ, काम कैसे करुँगी। और उस दिन हमारे बिग बॉस यानि सीईओ का फ़ोन आने आला था मुझे, काम की प्रोग्रेस देखने के लिए मैंने पूछा की सर कॉल करेंगे तो क्या कहूँगी...और मुझे यकीं नहीं हुआ, उसने कहा की फ़ोन काट देना, पिक मत करना। और मैंने ऐसा ही किया।

देर रात तक किस्से चलते रहे, सबने अपने अपने ऑफिस की कहानी सुनाई जो की कमोबेश एक ही जैसी थी, फ्रेशेर होना शायद एक जैसा ही होता है। धीरे धीरे सब आपने अपने खेमे में बढ़ने लगे, पर मैंने वादा किया था की सबसे आख़िर में जाउंगी...तो निभाया।

मुझे आज भी ईद पर वो रात याद आती है...सड़क पर चलते हुए चाँद देखना। उस दिन एहतेशाम बहुत अच्छा लग रहा था, उसे कुरते में पहली बार देखा था। उस दिन जिंदगी थोडी अपनी सी लगी थी... लौटते हुए जान रही थी की शायद ऐसी ईद अब कभी नसीब नहीं होगी...पर फ़िर भी दिल ने यही दुआ मांगी चाँद को देख कर। खुदा ये दोस्ती सलामत रखना...ये ईद सलामत रखना। कहीं और नहीं तो मेरे दिल में वो रात आज भी जिन्दा है...साँसे लेती है, ख्वाब देखती है।

22 December, 2008

एक मुलाकात जिंदगी से...

"आई थिंक आई ऍम फालिंग...फालिंग इन...लव विथ यू", गुनगुना रही थी और बस हंस रही थी उसे देख कर...उसकी आँखें जैसे रूह तक झांक सकती थीं, ज्यादा देर तक उसे लगातार देख नहीं पा रही थी, जब कि ऐसा कुछ भी नहीं था जो छुपाना था उससे। या शायद छुपाना था...

उसने कहा कि मैं उससे पिछले एक महीने से बात कर रही हूँ, क्या वाको? मुझे यकीन नहीं हुआ, पता ही नहीं चला इतनी दिन हो गए। जैसे रूह पहचानती है उसको भले चेहरा याद नहीं, शायद हम मिलें हो पहले कभी, समय कि सीमाओं से परे....शायद अंतरिक्ष में साथ भटकें हों...अनगिनत सवाल, और इनके जवाब ढूँढने ki जरुरत नहीं लगती, जैसे कि हम दो लोग नहीं हैं, कुछ समझाने की जरुरत नहीं होती उसे.

कि मुझे सिगरेट से कोई दिक्कत थी, पर उसे नर्वस देख कर थोड़ा घबराने लगी थी मैं भी। पर फौजी ने जब उसे डांटना शुरू किया कि देखो सरे लोग तुम्हें सिगरेट पीने से मन करते हैं तो जाने क्यों मैं बिल्कुल उसके तरफ़ से झगड़ने लगी...मेरा बस चलता तो मैं ख़ुद उसे एक सिगरेट जला के दे देती. बड़े टेनसे से लम्हे थे वो, बड़ी मुश्किल से कटे. रेस्तौरांत से बहार आके बड़ा सुकून महसूस हुआ, मैं लगभग साँस रोके बैठी थी.

फौजी ने बाहर आके कुछ कहा नहीं पर उसकी मुस्कान बहुत सरे वाक्य कह गई, अब मैं चीख तो नहीं सकती न कि वो मेरा बॉयफ़्रेन्ड नहीं है...इन फैक्ट वो मेरा कुछ भी नहीं है। कार में बैठ कर भी टेंशन हो रही थी...मैंने सिगरेट के तीन चार काश लगाये. अच्छी लगी पर ये भी जान गई मैं कि जो लोग कहते हैं कि सिगरेट पीने से टेंशन कम होती है...फत्ते मरते हैं. उसने कहा मैंने उसकी सिगरेट गीली कर दी. बड़ा बेवकूफ की तरह महसूस किया मैंने ख़ुद को...जैसे सिगरेट पीने से बड़ी कला दुनिया में नहीं है.

उससे बहुत सी बातें करने का मन कर रहा था, या अगर सही कहूँ तो उसकी बहुत सारी बातें सुनने का मन कर रहा था। चाहती थी कि वो बोले और मैं चुप रहूँ, बस सुनूं कि वो क्या सोचता है, क्या चाहता है...कुछ भी. उसे अच्छी तरह जाने का मन कर रहा था, उतनी अच्छी तरह जैसे शायद वो मुझे जानता है. कैसे जानता है, मालूम नहीं

बालकोनी पे हलकी सी ठंढ बड़ी अच्छी लगी, कोहरे का झीना दुपट्टा गुडगाँव कि ऊँची इमारतों ने ओढा हुआ था, उसमें से कहीं कहीं गाँव की किसी अल्हड किशोरी की आँखों की तरह किसी की बालकनी में लाइट्स जल रही थी। मीठी मीठी ठंढ जब साँसों में उतर गई तो बालकोनी का मोह छोड़ना पड़ा.

उसे अपनी कवितायेँ पढ़ाई मैंने, अच्छा लगा। वो सारे वक्त आराम से नहीं बैठा था...एक हरारत दिख रही थी उसमें. मैं आधे वक्त बस हंसती रही थी, किसी तकल्लुफ के बगैर. कुछ कहना नहीं चाहती थी, बस देखना चाहती थी उन आंखों में क्योंकि पहली बार ऐसा हुआ था मैं किसी कि आँख से आँख मिला के बात नहीं कर पा रही थी, और मुझे बड़ा अजीब लग रहा था.

सिगरेट का धुआं मुझे अच्छा नहीं लगता...फ़िर आज क्यों लग रहा था। मुझे इतना तो पता था कि ये गंध मैं बस उससे जुड़े शख्स के कारण पसंद कर सकती हूँ. तो क्यों अच्छा लग रहा था अल्ट्रा माईल्ड का धुआं? उसके कारण? मेर दिल कर रहा था एक काश लेने का, मगर उस सिगरेट का जो वो पी रहा था, क्यों? पता नहीं. वैसे मेरा मन कभी नहीं करता कि मैं सुट्टा लागों, पर उस वक्त कर रहा था. मैंने मग भी पर उसने मना कर दिया. कि मैं फ़िर उसकी सिगरेट ख़राब कर दूंगी, थोड़ा दुःख हुआ. शायद आज तक जो चाहा लेने की आदत बन गई है, चाहे किसी कि उँगलियों में अटका अल्ट्रा माईल्ड क्यों न हो...

उसकी नज़रें बड़े गहरे कुछ तलाशती हैं, जैसे मेरा पूरा वजूद मेरी आंखों में दिख जायेगा। अहसास हुआ कि उससे कुछ भी छुपाना बड़ा नामुमकिन है और ख्वाहिश हुयी उसे वैसी ही नज़रों से देखूं...पर देख नहीं पायी.


डर लगा मुझे, कहीं उसने सुन तो नहीं लिया मेरी आंखों में, "आइ थिंक आई ऍम फालिंग फालिंग इन लव विथ यू।"




Janno Gibbs - Fall...

21 December, 2008

छुट्टियाँ

हमारे घर में शीशम के बहुत सारे पेड़ थे...गर्मियों में इनके कारण छाया मिलती थी और जाडों में लकड़ी। और घर में जब काम होता था तो लकड़ी की छीलन, जिसे हम कुन्नी कहते थे...बोरों में भर कर रख लेते थे। देवघर ऊँची जगह पर स्थित है तो वहां ठंढ भी थोडी ज्यादा पड़ती है। हर साल दिसम्बर आते ही कहीं से कोई पुराना धामा, या ताई (लोहे का बड़ी कटोरी जैसा पात्र जिसमें घर बनने वक्त सीमेंट या बालो उठाया जाता है) निकाल कर रख लेते थे। शाम होने के थोड़ा पहले बाहर आँगन के तरफ़ घूम घूम कर सूखी लकडियाँ चुन लेते थे, शीशम की डाली बहुत अच्छे से जलती थी।

गौरतलब है कि लगभग इसी समय आलू निकलने का भी वक्त होता है। हमारे यहाँ घर की बाकी जमीन, जिसे हम फिल्ड कहते थे में आलू की खेती होती थी। क्यारियों में आलू के पेड़ लगे होते हैं, मिट्टी हटा कर आराम से आलू निकाल लेते थे हम। लगभग सात बजे घर में अलाव जलता था, जिसे थोडी देर ताप कर मम्मी खाना बनाने चली जाती थी और हम दोनों भाई बहन पढने बैठ जाते थे, लैंप की रौशनी में। ९ बजे के लगभग पापा के आने का टाइम होता था और मम्मी अलाव सुलगा के रखती थी, पापा आते थे और खाना लग जाता था १० मिनट में। इतने देर में हमारा homework ख़त्म हो जाता था।

फ़िर पापा के sath खाना खाते थे, और पापा हर रोज हमें कहानी सुनते थे, हातिमताई की...हम बेसब्री के पापा के आने का इंतज़ार करते थे। और हर रोज़ सारी कहानी सुन लेने का मन करता था पर पापा रोज़ थोडी कहानी सुनाते थे, जैसे हर रात हातिमताई हुस्न्बनो के एक सवाल का जवाब dhoondhne कैसे गया और सवाल का जवाब क्या था। इस बीच हम अलाव में आलू घुसा देते थे, आलू पाक जाते थे और खाने में इतना सोन्हा स्वाद आता था कि क्या बताएं। हम झगड़ते रहते थे कि कौन सा आलू किसका है अक्सर बड़े wale आलू के लिए खूब झगडा होता था। और आप यकीं नहीं करेंगे कि हमने इसका क्या उपाय निकाला...कच्चे आलू पर ही हम अपने अपने नाम का पहला लैटर लिख देते थे, मेरा P और जिमी का J

ऐसे ही जाड़े कि छुट्टियाँ ख़त्म हो जाती थी, हम रोते पाँव पटकते स्कूल जाना शुरू कर देते थे।

19 December, 2008

दिल ढूंढता है...

घर
ये एक शब्द जाने कैसे
अजनबी, अछूता सा हो गया है
वो घर जहाँ शीशम के पेड़ थे
आसमान तक जाती झूले की पींगें थी
क्यारियों में लगी रजनीगंधा थी
कुएं में छप छप nahata चाँद था
पोखर में उछलते कूदते मेंढक थे
बारिशों में कागज़ की नाव थी
धूप में अमरुद का पेड़ था
छोटी सी चारदीवारी थी
जिसे सब फांद जाते थे
खूब सारे पीले फूलों से ढका पेड़ था
गुलमोहर के फलों की तलवारें थी
बालू के घरोंदे थे
गिट्टी के पहाड़ और किले
बुढ़िया कबड्डी थी
खाली खाली सड़क थी
हाफ पेडल साईकिल थी
११ सालों में बड़ा हुआ बचपन था
जो ६ सालों से खोया हुआ है...


जाने कैसी कैसी यादों ने आ घेरा, शब्द कबड्डी खेलने लगे, परेशान हो गई मैं। इस पोस्ट की पोटली में बाँध दिया, अब शायद इनकी शरारत थोडी कम हो।

आज से महेन के ब्लॉग चित्रपट पर भी लिख रही हूँ। फिल्मों को एक अलग नज़र से देखने का शौक़ वो भी रखते हैं उन्होंने अपने कारवां में साथ चलने का आमंत्रण दिया...और हम चल पड़े। अलग सी फिल्मों के बारे में बहुत अच्छी जानकारी है इस नवोदित ब्लॉग पर।

18 December, 2008

तुम

इक दुआ सी कैसी
कल शाम तेरी याद आई
कि जिंदगी फ़िर से...जिंदगी लगने लगी

एक लम्हे को छुआ जब
तेरे लबों की तपिश ने
बादलों में फ़िर से...आग सी लगने लगी

तनहाइयों के घर में
डाले थे कब से डेरा
तेरा नाम लिया जैसे...चहलकदमी होने लगी

टूटा हुआ था मन्दिर
रूठे थे देव सारे
जिस दिनसे तुझे माँगा...फ़िर बंदगी होने लगी

तुम सामने हो कब तक
यूँ होश सम्हालें हम
एक नज़र ही देखा...दीवानगी होने लगी

मर ही गए थे हम तो
यूँ तुमसे दूर रह कर
तुम आ गए हो फ़िर से...जिंदगी होने लगी

17 December, 2008

चवन्नी चैप और हम

अजय ब्रह्मात्मज एक वरिष्ठ लेखक हैं और हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री पर मेरे जानकारी में सबसे विस्तृत जानकारी वाला ब्लॉग लिखते हैं। फिल्मों से जुड़े होने के कारण मैं भी अक्सर उनके ब्लॉग पर जाती रही और प्रेरणा पाती रही हूँ।

इसलिए आज जब उन्होंने अपने ब्लॉग के स्तम्भ हिन्दी टाकिज के लिए लिखने को कहा तो मैं बेहद खुश हुयी। ऐसी जगह कुछ भी लिखना, मेरे लिए तो गर्व की बात है, और अजय जी ने जो मान दिया है उसकी मैं बेहद आभारी हूँ। आप मेरे लिखे को यहाँ पढ़ सकते हैं।

हिन्दी टाकिज एक ऐसी श्रृंखला है जिसमें अजय जी के शब्दों में "इच्छा है कि इस सीरिज़ के अंतर्गत हम सिनेमा से निजी संबंधों को समझें और उन अनुभवों को बांटे ,जिनसे हमें सिने संस्कार मिला।चवन्नी का आग्रह होगा कि आप भी अपने अनुभव भेजें।इसे फिलहाल हिन्दी टाकीज नाम दिया जा रहा है।"

तो ये ख़बर मेरे पेट में पची नहीं...तो पोस्ट कर दिया ।

तुम्हारे बिना

आज भी याद है
वो चूडियों की खनक
जब सिल्ली पर
बादाम की चटनी पीसती थी
एक लय थी उसमें...खन खन खन सी

या जब रात को चुपके से
देखने आती थी की मैं पढ़ रही हूँ
या सो गई
दबे पाँव आने पर भी
पायल थोडी सी बोल ही देती थी...

सुबह जब तक
पॉँच बार आवाज न लगाये
उठने का सवाल ही नहीं उठता था
बिना डांट खाए
रोटी गले से नहीं उतरती थी...

याद है अब भी मुझको
शादी वगैरह में जाने पर
कैसे हुलस के गीत गाती थी तुम
सब तुम्हारे आने का इंतज़ार किया करते थे...

सरस्वती पूजा, दशहरा और दिवाली की आरती
तुमसे ही तो सुर मिलाना सीखा था
शंख की ध्वनि...और वो घंटियाँ

आज बैठती हूँ
अचानक से मेरी चूडियाँ बोल उठती हैं
लगता है सामने दरवाजे से तुम आ जाओगी
लेकिन...बिखर जाता है सन्नाटा
तुम्हारे बिना घर चुप हो गया माँ...

16 December, 2008

फिल्में और ज्ञान :)

कुछ दिन पहले पीडी से बात कर रही थी, उसने फिल्मों के बारे में कुछ और जानने की इच्छा जाहिर की। अब वैसे तो हम इस तरह का ज्ञान बांटने में पहले से ही दो कदम आगे रहते हैं...पर इस बार समस्या थोडी जटिल थी। फ़िल्म बनाना आसान है, ऐसे बहुत director हैं जिन्होंने बिना कहीं से कुछ पढ़े अच्छी फिल्में बनाई हैं। यहाँ पढ़े से मेरा मतलब था की कोई प्रोफेशनल कोर्स किए बगैर।

किसी भी दिशा में बढ़ने से पहले उसके बारे में जानकारी इकठ्ठा करना जरूरी होता है, इन्टरनेट आ जाने से काफ़ी आसानी हो गई है। मैंने अपने कॉलेज के समय में काफ़ी खाक छानी थी, अच्छी किताबें ढूंढ़ना अपने आपमें एक महान कार्य होता है :) और उसपर भी जब आप पटना जैसे शहर में रह रहे हों। साल भर पुस्तक मेला का इंतज़ार रहता था की कोई अच्छी किताब मिलेगी...और वाकई ये इंतज़ार बेकार नहीं होता था।

दिल्ली आने के बाद काफ़ी आसान हो गई चीज़ें, एक तो IIMC की विशाल लाइब्रेरी जिसमें फ़िल्म के हर पक्ष को लेकर कई किताबें थी, चाहे वो नई तकनीक हो या पुराने जुगाड़। इसके अलावा अगर कभी मन होता तो CP जा के किताबें ले आते...यहाँ बंगलोर आई तो पहली बार नेट पर ढूँढने की जरूरत महसूस की...तो पाया की हिन्दी फिल्मो का रेफेरेंस कहीं भी नहीं मिलता है। और बाकी फिल्में ढूंढ़ना काफ़ी मुश्किल भी होता है, अगर किस्मत अच्छी हुयी तब तो मिलेगी वरना बस...आसमान देख कर बारिश की उम्मीद करने वाला हाल।

आग में घी का काम किया एक और व्यक्ति ने, जिसका मुझे नाम भी नहीं पता है। हुआ ये कि मैंने फ़िल्म पर जो वर्कशॉप की थी, उसमें एक उदहारण Blair Witch Project नाम कि फ़िल्म का था...यह फ़िल्म मुझे बिल्कुल ही बकवास लगी थी, कारण किसी और दिन बताउंगी...तो बन्दे ने कह दिया कि ये बहुत अच्छी फ़िल्म थी और तुम्हें फिल्मो की पकड़ नहीं है वगैरह वगैरह...intellectuals के लिए बनाई गई थी फ़िल्म। अब ऐसे अपने मुंह मिया मिठू को तो खैर क्या कहना...पर इस बात बाटी में उसने एक बात और कह दी...कि हम हिन्दुस्तानियों को फिल्मो कि समझ नहीं है, और हमें फ़िल्म बनने नहीं आती। खास तौर से इशारा हिन्दी फिल्मों की और था...उन्होंने कुछ कुछ होता है को छोड़ कर कोई भी हिन्दी फ़िल्म नहीं देखी थी। अब ऐसे बेवकूफ लोगो को क्या कहूँ मैं...बिना ये देखे और जाने कि हमारे यहाँ कैसे फिल्में बनी है चल दिए अमेरिका का गुणगान करने।

तो मैंने सोचा कि फिल्मों पर एक श्रृंखला शुरू करुँगी...भाषा हिन्दी और इंग्लिश जो भी सही लगेगा टोपिक के हिसाब से...पर उसमें मैं कुछ उन फिल्मो का जिक्र करुँगी जो हमारे यहाँ बनी हैं, और उनके कुछ उन पहलुओं पर रौशनी डालूंगी जिससे हम सब रिलेट कर सकते हों।

अब चूँकि इस ब्लॉग पर इंग्लिश में नहीं लिखती हूँ, तो दूसरे ब्लॉग पर लिखूंगी...और सिर्फ़ इसी बारे में लिखूंगी। I dream ब्लॉग फिल्मों के बारे में मेरे सपनो को लेकर है। सोच रही हूँ लिखना शुरू करूँ, पर चूँकि अभी तक ऐसा कुछ मिला नहीं है पढने को , ये भी लगता है कि ऐसे मटेरिअल कि जरूरत है भी कि नहीं, मैं बिन मतलब के वक्त तो नहीं बरबाद करुँगी?

आपकी क्या राय है?

15 December, 2008

किस्सा ऐ शूटिंग

एक पूरा हफ्ता...और करने को कुछ नहीं
एडिटिंग शनिवार को होनी है।

इस बार फ़िल्म बाने के मैंने बहुत कुछ सीखा...और सबसे जरूरी था एक टीम की तरह काम करते हुए एक दूसरे पर भरोसा करना। जब किसी को कोई बात समझ नहीं आ रही तो उसकी मदद करना, उसे समझाना की वो काम को कैसे बेहतर कर सकती है...न की ख़ुद ही करने लग जाना की तुमसे नहीं हो पायेगा।

ये पहली बार हुआ है कि मैंने कैमरा फेस किया है...मुझे बहुत मज़ा आया मगर फ़िर भी हर शॉट में लगता था कि पता नहीं कोम्पोसिशन कैसी है, लाइट angles सही हैं या नहीं। काफ़ी टेंशन होती रही की फ़िल्म actually स्क्रीन पर लगेगी कैसी??!!!

रात को शूट करना बहुत मुश्किल होता है, इसलिए अधिकतर फिल्में दिन में शूट होती हैं और फिल्टर लगाये जाते हैं कैमरा पर। मुझे थोड़ा बहुत अंदाजा तो था कि दिक्कत होगी मगर इतनी होगी नहीं सोच पायी थी। हर शॉट के लिए लाइट को हटाना पड़ता था, कैमरा अलग जगह रखना पड़ता था, और इस सब के साथ ये भी ध्यान रखना पड़ता था कि ऐसा तो नहीं हो रहा कि परछाई दूसरी तरफ़ आ रही है।

सबसे मुश्किल तो ये था कि कैमरा में अच्छी इमेज आए इसके लिए लाइट कैमरा के पीछे और हमारी बिल्कुल आंखों पर पड़ रही थी...पर उसमें भी बिल्कुल आराम से dialog बोलना...हँसना गप्पें करना। एक अलग तरह का अनुभव था।

खैर शूटिंग ख़त्म हुयी...अब रिजल्ट का इंतज़ार है.

13 December, 2008

दिल्ली तेरी गलियों का...

तारीखें वही रहती हैं

साल दर साल

वही हम और तुम भी...

बदल जाती है तो बस

जिंदगी की रफ़्तार...

खो जाती है वो फुर्सत वाली शामें

और वो अलसाई दिल्ली की सड़कें

सर्द रातों में हाथ पकड़ कर घूमना...

खो जाते हैं हम और तुम

अनजाने शहर में

अजनबी लोगों के बीच...

रह जाती है बस

एक याद वाली पगडण्डी

एक आधा बांटा हुआ चाँद

और अलाव के इर्द गिर्द

गाये हुए गीतों के कतरे...

छः मंजिल सीढियों पर रेस लगाना

रात के teen बजे पराठे खाना

और चिल्लड़ गिन कर झगड़ना

कॉफी या सिगरेट खरीदने के बारे में...

कोहरे से तुम्हें आते हुए देखना

और फ़िर गुम हो जाना उसी कोहरे में

हम दोनों का...

आज उन्ही तारीखों में

मैं हूँ, तुम भी हो...जिंदगी भी है

अगर कुछ खो गया है तो बस

वो शहर ...जहाँ हमें मुहब्बत हुयी थी

दिल्ली, तेरी गलियों का

वो इश्क याद आता है...

जिंदगी...यादें...और कोरे पन्ने

इतवार...वैसे तो बहुत से कारण होते हैं इंतज़ार करने के...पर ये इतवार थोड़ा अलग है।

मैंने डॉक्युमेंटरी पहले भी बनाई है, पर फिल्मों का पहला अनुभव है...भले ही अतिलघु फ़िल्म कह लें। पिछली पोस्ट पर जो कहानी थी, उसे ही शूट करने वाले हैं। और जैसा की छोटे प्रोजेक्ट्स में होता है...लीड रोल भी मुझे ही करना है...हालाँकि मुझे डायरेक्शन और लिखने में ज्यादा मज़ा आता है। पर सोचा एक बार भूत बन के भी देख लिया जाए। मज़ा तो आएगा ही।

अगले सन्डे एडिट करके तैयार हो जायेगी तो अपलोड भी कर दूंगी...आज बस सोच के अच्छा लगा रहा है और डर भी। उम्मीद है सब अच्छा ही होगा।

क्या जरूरी है

जिंदगी की किताब के

हर पन्ने पर कुछ लिखा हो

कुछ पन्ने तो कोरे रहने दो...

कभी यादों को अपने रंग में रंगने का मन किया तो?

12 December, 2008

वो सिगरेट

कल सुबह १० बजे के पहले मुझे अपने एडिटर को एक आर्टिकल मेल करनी है...रात के ९ बजे रहे हैं और दिमाग कोरा कागज बना हुआ है...सारे शब्द जाने कहाँ चले गए हैं, भला ये भी कोई तफरीह करने का वक्त है। रोज आफिस में डरावने मेल आते हैं, ५० लोगो की कटौती होने वाली है, प्रोफिट नहीं हो रहा कंपनी को, बोनस तो छोड़ो इस मुश्किल वक्त में नौकरी बच जाए यही गनीमत होगी। और इस नौकरी के लिए जरूरी था कि मैं एक तडकता भड़कता सा आर्टिकल लिख के मेल करूँ, कि एडिटर देखते ही खुश हो जाए कि भाई मैगजीन मेरे ही कारण बिकती है। पर क्या लिखूं...

इतने में दरवाजे पर दस्तक होती है, अब इतनी रात को कौन आ गया दिमाग खाने, मैं मन ही मन भुनभुनाता हुआ उठा। दरवाजा खोला तो सामने तन्वी खड़ी थी, मेरी स्कूल की दोस्त...मुझे लगा ज्यादा काम के कारण मेरे दिमाग में शोर्ट शर्किट हो गया है...८ साल बाद ये तन्वी कहाँ से टपक पड़ी। "अबे...मैं कोई दरबान नज़र आती हूँ जो तेरे घर के गेट पर पहरा दूंगी...रास्ता दे ढक्कन।" और वो मुझे लगभग धकेलती हुयी घर में चली आई...अगर कोई शक था भी तो उसकी आवाज और टोन से दूर हो गया। मुझे इस तरह से बिना किसी संबोधन के तन्वी के सिवा कोई बात नहीं कर सकता था।

"तन्वी, ये आसमान किधर से फटा और तू किधर से टपकी...मोटी!! मेरा पता कहाँ से मिला !!??", मैं चकित था, उसके ऐसे बिना बताये आने पर। "इंटरपोल, एफ्बीअई...हर जगह तो तू है न, मोस्ट वांटेड लिस्ट पर...तो बस ढूंढ लिया, यार तू भी हद्द करता है, इत्ते से बैंगलोर में तेरा पता ढूंढ़ना कोई मुश्किल बात है क्या। इतने सालों बाद आई हूँ तुझसे मिलने और तू खुश होने की बजाई जिरह कर रहा है, पुलिसवाला हो गया है क्या?" दन्न से गोली की तरह जवाब आया...बाप रे वो बचपन से ऐसे ही बोलती थी, बिना कौमा फुलस्टॉप के हमने तो उसका नाम ही टेप रिकॉर्डर रख दिया था। " नहीं, मेरी माँ मैं तो ऐसे ही पूछ रहा था, तेरे जैसी महान आत्मा के लिए कुछ भी पता करना बड़ी बात थोड़े है."

और अब पूछताछ करने की बारी उसकी थी, इसके पहले की मैं रोकता वो पूरे घर का मुआयना करने चल पड़ी थी..."यार ये इतना साफ़ सुथरा घर तेरा तो नहीं हो सकता, गर्लफ्रेंड है क्या?"।"हाँ, है...५० साल की अम्मा है, सारी सफाई उन्ही की देन है, खाना भी बना के खिलाती है...वैसे उम्र थोडी ज्यादा है पर तू कहेगी तो मैं शादी कर लूँगा उससे. तेरे लिए कुछ भी यार".वो जहाँ थी उसके हाथ में जो पकड़ आया खींच के मारा था उसने, वो तो गनीमत है कि रबड़ बॉल था, वरना तो मेरा सर गया था.

किचन में बियर कैन का अम्बार लगा हुआ था, " छि छि बुबाई तू दारू पीने लगा है, सोच आंटी को पता चला तो क्या होगा?". वो आफत की पुड़िया अब कमरे में आ चुकी थी वापस इंस्पेक्शन ख़त्म हो गया था. " ऐ तन्वी तुझे कितनी बार कहा मुझे ये बुबाई बाबी मत बुलाया कर , तू सुधरेगी नहीं...और मम्मी को बोलने कि सोचना मत..वरना..."
"ओहो धमकी...क्या कर लेगा रे, जा मैं बोल दूंगी...अभी फ़ोन लगाउँ क्या?"
"ना रे मेरे पिछले जनम की दुश्मन, मैंने तेरा क्या बिगाड़ा है. पूरे हफ्ते मेहनत करके थोड़े बहुत पैसे कमाता हूँ, अगर बियर में डाल के पी जाऊ तो तेरे पेट में क्यों दर्द हो रहा है. जिस दिन तेरे बैंक अकाउंट से पैसे गायब करूँ उस दिन मम्मी को बोल देना, मैं भी कुछ नहीं करूँगा.२५ साल का हो गया हूँ, मेरे देश का संविधान मुझे यह अधिकार देता है कि मैं जिस ब्रांड की अफोर्ड कर सकता हूँ, दारू पियूं, और तू क्या प्राइम मिनिस्टर है। मम्मी न हुयी विपक्ष की नेता हो गई. और तू मेरे साइड में है कि उसकी?"

"नील, एक सीरियस प्रॉब्लम है"...मुझे लगता है उसने शायद जिंदगी में पहली बार मेरा नाम लिया था...उसके पहले तो मैं हमेशा ढक्कन और गधा और उल्लू और जाने क्या क्या था उसके लिए...नहीं तो मेरे घर ने नाम बुबाई से हमेशा चिढ़ाते रहती थी. थोड़ा परेशां हो गया...तन्वी ऐसे लड़की नहीं है जिसे कोई परेशानी हो और वो इस तरह गम होकर बोले."क्या प्रॉब्लम है यार, तू बोल, मैं हूँ ना""यार तू घिसे हुए डायलॉग बहुत मारता है, मेरी जिंदगी में तुझसे बड़ी प्रॉब्लम भी भला आई है कभी...बड़ा आया मैं हूँ न, हुंह. खैर, प्रॉब्लम ये है कि मुझे भूख लगी है."
"ओफ्फो भुक्खड़..रात के बारह बजे भूख लगी है, जब ९ बजे मेरे घर आ रही थी तो खा के नहीं आ सकती थी...किचन में मैगी है, ख़ुद बनाएगी कि मैं बनाऊं?"
"बाप रे कंजूस मक्खीचूस...मैं नहीं जा रही मैगी खाने...मुझे पिज्जा खाना है. और पैसे भी तू ही दे, आख़िर तू लड़का है और मैं तेरी बचपन की दोस्त हूँ, और उम्र से तुझसे तीन महीने छोटी भी हूँ...और हाँ मैं अपने हिस्से के पैसे भी नहीं दूंगी".
"नहीं मांगूंगा, अम्मा...मेरी मजाल मैं तेरे से पैसे मांगूं...बोल कौन सा पिज्जा खायेगी..."
और इसके बाद हम आराम से पिज्जा खा रहे थे। भला हो होम डिलिवरी वालों का, बेचारे २४ घंटे हम जैसे लोगो की जान बचाते फिरते हैं।
उसने पॉकेट से सिगरेट का एक पैकेट निकला...मार्लबोरो माइल्ड्स. "सुट्टा?"मैं जैसे आसमान से गिरा..."तन्वी, तू lung कैंसर से मारेगी, पागल हो गई है क्या, ये सिगरेट कब से शुरू कर दी, मुझे बताया तक नहीं...""लेक्चर मत झाड़...सुट्टा मरना है...नहीं मारना है? और तुझे कैसे पता मैं कैसे मरूंगी...तेरे सपने में आके यमराज ने भविष्यवाणी की है...मैं सुट्टा मारना छोड़ दूँ तो नहीं मरूंगी...साला फट्टू."
अब इसपर कोई क्या कह सकता है, तो मैंने भी कुछ नहीं कहा, चुप चाप हाथ बढ़ा के सिगरेट ली, और बेद के नीचे से ऐशट्रे निकाल के आगे कर दी.
उसने एक गहरा कश ले कर कहा "और तू क्या जानता है मरना क्या होता है...एक फ्लैश और ख़त्म, पता भी नहीं चलता कि मर गए हैं."
"हाँ हाँ मरने पर भी तुने Ph. D की है, भटकती आत्मा, यमराज का इंटरव्यू लिया है तुने, जानता नहीं हूँ तेरे को. फ़िर से कविता का भूत चढ़ने वाला है तुझपर, और मेरे पास भागने की कोई जगह भी नहीं है. मुझे बख्श दे मेरी माँ. एक राउंड नहीं हो पायेगा आज."
"तथास्तु...और कुछ मांग ले बच्चा, हम तेरी प्रार्थना से प्रसन्न हुए।" उसका अंदाज़ वाकई सबसे जुदा था।आज शायद इतने सालों में मैं उसे पहली बार ध्यान से देखा था, शायद इसलिए क्योंकि बहुत दिन हो भी गए थे। वो काफ़ी खूबसूरत लग रही थी।"क्या हुआ?""तू हमेशा से इतनी सुंदर थी क्या?""नहीं, मैंने फेस इम्प्लांट कराया है...ऐश्वर्या कि आँखें, प्रीती के डिम्पल...माधुरी की स्माइल...ओफ्फ्फो लाइन मार रहा है मुझपर, अभी एक कराटे चॉप पड़ेगा न, तीन जनम तक याद रहेगा""तू सीधी तरह से किसी बात का जवाब नहीं देती क्या...दो बात प्यार कि बोल लेगी तो क्या पैसे लगेंगे। मैं गुस्सा हो रहा था उसपर" और वो ठठा के हंस पड़ी..."सीधी बात, तुझसे...तू मुझे प्रभु चावला समझता है क्या...यार इतना नहीं हो पायेगा।"

"चल छोड़, क्या चल रहा है लाइफ में?""बस यार ताज में फैशन शो है, ब्राइड्स ऑफ़ इंडिया पर, तो थोड़ा बिजी हूँ. वरना तो वही..महीनों बस प्लान चलता रहता है. थोड़ा बहुत लिख लेती हूँ कभी कभी. बस, तू बता?""मेरा भी कुछ खास नहीं, रोज़ की एडिटर से खिच खिच, पिछले महीने एक लम्बा फीचर लिखा था, काफ़ी तारीफ़ आई थी...आजकल कोस्ट कटिंग में बोनस मार लिया सालों ने. अगले हफ्ते घर जा रहा हूँ. बहुत दिन हो गए."

थोडी देर की खामोशी...जिंदगी के बारे में बात करो तो अक्सर ऐसा हो जाता है. एक पर एक सिगरेट जलती रही बस आखिरी सिगरेट बची थी."जानता है आखिरी सिगरेट किसी से बाँट रहे हैं तो वो कोई बहुत करीबी होता है..."और बस जैसे आई थी एक झटके में उठ खड़ी हुयी...हम चलने लगे. एक खामोशी, जिसमें शब्द नहीं होते बस, बाकी बातें होती रहती हैं.

लिफ्ट का दरवाजा जैसे ही बंद हो रहा था, उसने रोका...और मेरी आंखों में कहीं गहरे देखते हुए कहा"जानते हो नील...जिंदगी भर मैं तुमसे एक बात नहीं कह पायी...i love you".

वापस आ के कमरे में बैठा ही था कि फ़ोन बज गया, उधर से मम्मी बोल रही थी..."बुबाई, तन्वी...तन्वी नहीं रही बेटा। अभी अभी उसकी मम्मी का फ़ोन आया था. आज शाम मुंबई में उसका सीरियस एक्सीडेंट हो गया ...स्पौट डेथ। तुम जल्दी फ्लाईट का टिकट कटा के वहां पहुँचो."

ऐशट्रे में अभी भी सिगरेट जल रही थी...जिसपर लिपस्टिक के निशान थे.

10 December, 2008

तीन मिनट की एक कहानी

वो बड़ी मुस्तैदी से तैयार हो रहा है, शरीर के हर अंग पर एक एक करके पिस्तौल बंधे जा रहा है। नौजवान है, यही कोई २० साल का होगा। चेहरे पर एक सख्ती...भावशून्यता...पर अगर आप करीब से देखेंगे तो उसकी आंखों में एक चमक है। एक जिजीविषा जो किसी भी २० साल के लड़के में होनी चाहिए, एक आग...उसकी आंखों में भी नज़र आती है।
पर वो मशीन की तरह तैयार होते जाता है, अपने बैग में एक एक करके ग्रेनेड रख रहा है...साधारण सा दिखने वाला ये बैग, मौत का फरमान बन सकता है किसी भी वक्त। ऐसे ही बैग में हमारे देश के लाखों २० साल के लड़के किताबें और उन किताबों में जाने किसके किसके सपने लेकर घूमते हैं। खिड़की से तिरछी धूप आ रही है कमरे में, गुनगुनी , नर्म जाड़े की धूप।

वो कोई गीत गुनगुना रहा है, बहुत दर्द है उसकी आवाज में, शायद कोई विरह का गीत है। किससे इतनी दूर चला आया है ये लड़का जो इससे इतनी दूर होकर भी इसकी रूह से गीत बन कर उभर रहा है। क्या माँ बाप, क्या कोई सांवली, बड़ी बड़ी आंखों वाली लड़की है...मालूम नहीं। बालों में जेल लगता है, और बड़ी अदा से कंघी करता है, चेहरे पर फेयर एंड हैन्ड्सम लगता है। एक्स का deodrant, बिल्कुल जैसे दूल्हा बनने जा रहा हो।

फ़ोन बजता है...माँ दा लाडला बिगड़ गया...रिन्गटोन जैसे एक पल के लिए खामोशी को छिन्न भिन्न कर देता है। "तैयार हो?" उधर से पुछा जाता है, "हाँ", एक छोटा सा जवाब।

अपने पॉकेट से एक बटुआ निकलता है...उसमें एक पुराणी तस्वीर है, जर्द और पीली पड़ी हुयी। माँ, पिता और छोटी बहन के साथ वो। उसकी आंखों के आगे एक दहकता मंज़र आ जाता है, चरों तरफ़ आग कि लपटें...चीख पुकार। और फ़िर एक सन्नाटा...जिस सन्नाटे से उसे असद चाचा उठा कर ले आए थे। उस दिन से वही उसके रहनुमा है, माँ पिता से ज्यादा प्यार दिया उन्होंने, उसे तालीम दिलाई, अपने साथ के लोगों से मिलवाया। और आज वो उनके बेटे से भी बढ़कर है। इसलिए तो आज उसे ये शहादत का मौका मिला है, काफिरों पर कहर ढाएगा वो आज। वही काफिर जिन्होंने उसे उसके परिवार से अलग किया। आज उसके बदले का दिन है।

मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर अंधाधुंध गोलियां चलता है वो...और तेज़ी से ग्रेनेड फेकते हुए वहां से भागता है...पर पुलिस की गाड़ी पीछा करने लगती है...सायरन कि आवाज बड़ी तेज़ी से उसका पीछा कर रही है...वह भागता है, इतनी तेज़ जितना कि कभी नहीं bhaaga था। संकरी गलियों में, घरों के सारे दरवाजे बंद हैं, सारे दरवाजे खटखटाता है...कोई सुनवाई नहीं।

एक दरवाजे पर जैसे ही हाथ लगता है कि खुल जाता है, सांझ के गहराते अंधेरे में वो हर दिशा में गोली चलता है...बिना देखे हुए...बिना सोचे हुए...एक ही क्षण में उसके चारों तरफ़ लाशें गिर जाती हैं। वो चैन की साँस लेता है, दरवाजा बंद करता है और गले में पड़े ताबीज को चूमता है। घर के अन्दर बढ़ता है कि तभी अजान की आवाज आती है। वजू करके वह कमरे में नमाज पढने बैठा है...

कमरे में एक ही दिया जल रहा है...वह जैसे ही अपने दायीं तरफ़ देखता है....एक चीख उसके गले में ही घुट जाती है ...
पूजाघर में बाकी देवताओं के साथ एक और तस्वीर लगी थी जिसमें उसके माता पिता और वो ख़ुद था...उसपर भी फूलों की एक माला टंगी हुयी थी, तस्वीर के नीचे कई राखियाँ सजी हुयी थी.

09 December, 2008

ख्वाब इक नया चाहता हूँ

ऐसे हालातों में भी क्या चाहता हूँ
जाने क्यों ख्वाब इक नया चाहता हूँ

खून फैला हुआ है सड़कों पर
और मैं रंग भरा आसमाँ चाहता हूँ

आजकल सड़कों पे मौत घूमती है
मैं अपने लिए भी एक दुआ चाहता हूँ

मन्दिर में है कि मस्जिद में, या कि कहीं और
सुकून लाये जमीं पर वो खुदा चाहता हूँ

बिखरे हुए जिस्मों में पहचान ढूंढता हूँ
कल से है गुमशुदा वो आशना चाहता हूँ

बस एक अमन का ही तो ख्वाब देखा मैंने
और वो खुदा कहता है मैं कितना चाहता हूँ

08 December, 2008

अँधेरी रात में दीपक जलाये कौन बैठा है

२०० पोस्ट हो गए। सोचा था कुछ अच्छा लिखूंगी...कुछ खूबसूरत, बिल्कुल अलग सा अहसास लिए हुए।

मगर अब लगता है शायद खूबसूरत अहसास ख़त्म हो गए हैं। मुझे नहीं मालूम कि मुंबई धमाकों से इतना ज्यादा परेशान क्यों हूँ, शायद तीन दिन तक एक हादसे के ख़त्म होने का इंतज़ार करना एक अलग तरह की दहशत को जन्म देता है। असुरक्षा की भावना इतने गहरे बैठ गई है कि जिंदगी पटरी पर आने का नाम ही नहीं लेती। एक मित्र से बात कर रही थी इसी मुद्दे को लेकर...आश्चर्य लगा जब उसने कहा कि तू इतनी परेशान हो रही है, for an event that has not even directly affected you। तो क्या अगर मेरा कोई अपना उस ब्लास्ट में मरता तो ही किसी घटना को मुझे अफ्फेक्ट करना चाहिए...शायद ऐसा होता है...शायद ऐसा हर बार हुआ हो। पर इस बार मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ है।

जब दिल्ली में थी तो जैसे आदत सी पड़ गई थी, यहाँ बंगलोर आई तो आने के एक हफ्ते बाद ही यहाँ भी ब्लास्ट हो गया। लगा कि अपने ही देश में हम निश्चिंत क्यों नहीं रह सकते। अब यहाँ ६ महीने के पहले वोटर id कार्ड तो बनेगा नहीं, तो इंतज़ार कर रही हूँ, जनवरी में नाम के लिए अप्लाय करुँगी। आज इलेक्शंस हुए और कहीं भाजपा तो कहीं कांग्रेस जीती, हालाँकि इससे ये नहीं कहा जा सकता कि आने वाले लोकसभा चुनावों का क्या हाल रहेगा...पर मुझे सच में आश्चर्य होता है कि लोगों ने अभी भी कांग्रेस को वोट कैसे दिया। यही तो तरीका है जताने का कि हम खुश नहीं हैं, अपने आसपास के हालातों से, हमारे जीने के तरीके से। एक बेसिक सुरक्षा का हक तो है हमें...जिन्दा रहने का हक।क्या ऐसा इसलिए हो रहा है कि वाकई परवाह नही है बन धमाकों कई, कि एक आम आदमी को चिंता नहीं है, और ये जो इतना हल्ला हो रहा है, थम जायेगा रुक जायेगा। पब्लिक की याद्दाश्त बहुत कमजोर होती है। वक़्त आने पर ये भी भूल जायेगी कि हमें वोट देने जाना है।

पिछले हफ्ते मैंने एक फ़िल्म डायरेक्शन पर वर्कशॉप में हिस्सा लिया था। अब हमें एक फ़िल्म बनानी है ३-५ मिनट की, मैं सोच रही हूँ कि कुछ ऐसा बनाउँ जिसे देखकर लोग घर से निकलने पर मजबूर हो जाएँ। देखें कैसी होती है कहानी और कितना असरदार होता है...जल्दी ही पोस्ट करुँगी।

"वो मुतमईन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता

मैं बेकरार हूँ आवाज़ में असर के लिए "

- दुष्यंत कुमार

२००वीं पोस्ट मेरे देश तुझको समर्पित

07 December, 2008

मैं तुम्हें कविता में मिलूंगी

देश में होने वाले अनगिन ब्लास्ट में

अगर मैं मर जाऊं

मुझे कविता में ढूंढ़ना...

गुलमोहर रो रहे होंगे

हर साल वसंत में

आक्रोश भी उभरेगा दहकते फूलों में

मैं नहीं रहूंगी लेकिन...

बारिशें भी, गाहे बगाहे

कभी जनवरी में भी

भिगा जायेंगी

दिल्ली की सड़कें

जहाँ खून गिरा होगा मेरा...

नाराज होकर घर से मत जाओ

एक दिन भी

जाने तुम्हारे लौट आने तक

जो surprise गिफ्ट खरीदने निकली थी

चिथड़े हो चुका हो...

किसी आतंकवादी को कहाँ मालूम होगा

मेरा जन्मदिन, या वर्षगांठ

उनके प्लान्स तो बहुत पहले से बनते हैं

३०० लोग में किसी न किसी का तो हो ही सकता है

तारीखों से क्या फर्क पड़ता है...

शब्दों में समेट देती हूँ

ढेर सारा प्यार

इन्हें खोल के देख लेना

मैं तुम्हें कविता में मिलूंगी...

PS: कृपया इसे कविता समझ कर न पढ़ें, आजकल बहुत परेशान हूँ, कुछ तारतम्य नहीं है शब्दों में। लिख रही हूँ क्योंकि लिखे बिना रह नहीं सकती। जी रही हूँ क्योंकि अभी तक माँ का हाथ है सर पर.

05 December, 2008

हमारे जवान: एक चित्रण

मेरे IIMC के एक मित्र अंकुर ओगरा ने कल एक मेल भेजी थी, उसके पिता ने लिखी थी, वो इंडियन एयरफोर्स में पायलट रह चुके हैं। मुंबई में हो रहे हमलों के दरमयान उन्होंने लिखा था। वो मूलतः कश्मीर के रहने वाले हैं पर अब दिल्ली में पूरा परिवार रह रहा है।

अनुवाद इसलिए नहीं किया है क्योंकि मेरा मानना है की अनुवाद में कई बार मूल भाव खो जाता है।

Half Man Half Boy
The average age of the army man is 23 years। He is a short haired, tight-muscled kid who, under normal circumstances is considered by society as half man, half boy. Not yet dry behind the ears, not old enough to buy a beer in the capital of his country, but old enough to die for his country.


He's a recent school or college graduate; he was probably an average student from one of the Kendriya Vidyalayas, pursued some form of sport activities, drives a rickety bicycle, and had a girlfriend that either broke up with him when he left, or swears to be waiting when he returns from half a world away। He listens to rock and roll or hip -hop or bhangra or gazals and a 155mm howitzer.


He is 5 or 7 kilos lighter now than when he was at home because he is working or fighting the insurgents or standing guard on the icy Himalayas from before dawn to well after dusk or he is at Mumbai engaging the terrorists। He has trouble spelling, thus letter writing is a pain for him, but he can field strip a rifle in 30 seconds and reassemble it in less time in the dark. He can recite to you the nomenclature of a machine gun or grenade launcher and use either one effectively if he must.


He digs foxholes and latrines and can apply first aid like a professional. He can march until he is told to stop, or stop until he is told to march. He obeys orders instantly and without hesitation, but he is not without spirit or individual dignity. His pride and self-respect, he does not lack. He is self-sufficient। He has two sets of combat dress: he washes one and wears the other. He keeps his water bottle full and his feet dry. He sometimes forgets to brush his teeth, but never to clean his rifle. He can cook his own meals, mend his own clothes, and fix his own wounds. If you're thirsty, he'll share his water with you; if you are hungry, his food. He'll even split his ammunition with you in the midst of battle when you run low.


He has learned to use his hands like weapons and weapons like they were his hands। He can save your life - or take it, because he's been trained for both.He will often do twice the work of a civilian, draw half the pay, and still find ironic humor in it all. He has seen more suffering and death than he should have in his short lifetime.


He has wept in public and in private, for friends who have fallen in combat and is unashamed to do so।


He feels every note of the Jana Gana Mana vibrate through his body while at rigid attention, while tempering the burning desire to 'square-away' those around him who haven't bothered to stand, remove their hands from their pockets, or even stop talking। In an odd twist, day in and day out, far from home, he defends their right to be disrespectful. Just as did his Father, Grandfather, and Great-grandfather, he is paying the price for our freedom. Beardless or not, he is not a boy. He is your nation's Fighting Man that has kept this country free and defended your right to Freedom. He has experienced deprivation and adversity, and has seen his buddies falling to bullets and maimed and blown. And he smiles at the irony of the IAS babu and politician reducing his status year after year and the unkindest cut of all, even reducing his salary and asking why he should get 24 eggs a week free! And when he silently whispers in protest, the same politician and babu aghast, suggest he's mutinying! Wake up citizens of India! Let's begin discriminating between the saviours of India and the traitors!


- Flt. Lt. Rajiv Tyagi

04 December, 2008

कल हो न हो...

मैं सोचती हूँ तुमसे कहूँ
हैदराबाद जाने का प्रोग्राम कैंसिल कर दो
बॉम्बे में जो ब्लास्ट हुआ है
आतंकवादियों ने डेकन मुजाहिदीन का नाम लिखा था
और इंडिया टीवी में तो ख़बर की थी
हैदराबाद को अलग कर दो

माँ कहती थी
अशुभ बातें कहने से सच हो जाती हैं
तुम चले जाते हो

मैं सोचती हूँ पूजा करूंगी आज
पर मन नहीं करता है...

कहीं भी जाने का मन नहीं करता
दिन भर टीवी नहीं खोलती हूँ
सुबह अखबार नहीं पढ़ती
और जब तक तुम वापस नहीं आ जाते

डरती रहती हूँ हर आहट पर
हर घंटे तुम्हें फ़ोन नहीं करती

पर सोचती हूँ कि कर लूँ
निश्चिंत तो हो जाउंगी

कपड़े खरीदने हैं

पर मॉल नहीं जा रही

रोज़ टाल देती हूँ
दिल में अजीब अजीब से ख्याल आते हैं

कुछ हो न जाए किसी दिन अचानक

एक गाना सुना था कभी

जाने क्यों याद आने लगता है

if tommorow never comes

will she ever know how much i loved her

did the love i give her in the past

would be enough to last

if tommorow never comes...







03 December, 2008

देखना है जोर कितना बाजू ऐ कातिल में है

आज कुछ नहीं कहूँगी...बस ये विडियो पोस्ट कर रही हूँ। जब भी देखती हूँ रोंगटे खड़े हो जाते हैं। रंग दे बसंती से ये दो क्लिप कुछ कुछ राहत देते हैं।
जब भी सुनती हूँ तो लगता है कहीं कोई हलचल होने लगी है दिल में, कुछ करने का जज्बा जोर मारने लगता है। मुझे लगता है कि आज ऐसे कुछ और शायरों की जरूरत है, वही हम सब को इस नींद से झकझोर कर उठा सकते हैं।
सरफरोशी कि तमन्ना अब हमारे दिल में है...



02 December, 2008

अक्सर एक व्यथा यात्रा बन जाती है

बहुत दिन बाद ये कविता पढ़ी, इसका शीर्षक जाने किस सन्दर्भ में मेरी जिंदगी में बहुत मायने रखता है। कितना भी याद करूँ, याद नहीं आ रहा कि कहाँ सुनी थी इसकी पहली पंक्ति। आज मेरे मित्र शशि के सौजन्य से ये कविता फ़िर से पढने को मिली।
आजकल जिस तरह के हालात हैं, और जैसी मेरी मनोस्थिति है, कुछ पंक्तियों ने मर्म को स्पर्श किया है। मुझे ये पंक्ति खास तौर से पसंद है.."अक्सर एक लीक दूर पार से बुलाती है ." सोचा आप सब से भी बाँट लूँ....सर्वेश्वर सयाल सक्सेना की ये कविता।

अक्सर एक गंध
मेरे पास से गुज़र जाती है,
अक्सर एक नदी
मेरे सामने भर जाती है,
अक्सर एक नाव
आकर तट से टकराती है,
अक्सर एक लीक
दूर पार से बुलाती है ।
मैं जहाँ होता हूँ
वहीँ पर बैठ जाता हूँ,
अक्सर एक प्रतिमा
धूल में बन जाती है ।
अक्सर चाँद जेब में
पड़ा हुआ मिलता है,
सूरज को गिलहरी
पेड़ पर बैठी खाती है,
अक्सर दुनिया
मटर का दाना हो जाती है,
एक हथेली पर
पूरी बस जाती है ।
मैं जहाँ होता हूँ
वहां से उठ जाता हूँ,
अक्सर रात चींटी-सी
रेंगती हुई आती है ।
अक्सर एक हँसी
ठंडी हवा-सी चलती है,
अक्सर एक दृष्टि
कनटोप-सा लगाती है,
अक्सर एक बात
पर्वत-सी खड़ी होती है,
अक्सर एक ख़ामोशी
मुझे कपड़े पहनाती है ।
मैं जहाँ होता हूँ
वहाँ से चल पड़ता हूँ,
अक्सर एक व्यथा
यात्रा बन जाती है ।

28 November, 2008

कर्मण्ये वाधिकारस्ते

आज मुंबई पर आतंकी हमला हुआ है, हम सभी स्तब्ध है, एक आक्रोश है जो कहीं कुछ करने की राहें ढूंढ रहा है। ब्लॉग पर कई जगह पढ़ा लोग वाकई कुछ करना चाहते हैं पर समझ नहीं आता है कि क्या किया जाए। आतंकवाद के इस छुपे दुश्मन से कैसे निपटा जाए। हमारे जो नाकारा राजनीतिज्ञ हैं उनसे तो खैर क्या उम्मीद है, कोई भी दूध का धुला नहीं है।

दो रातों से व्यथित हूँ, और ये कहना ग़लत है कि हम भूल जायेंगे, बाकियों का तो नहीं पता पर मैं तो नहीं भूलूंगी और न चुप बैठूंगी। सोचती हूँ कि हमारे एक अरब कि जनसँख्या वाले देश में क्यों ३०० लोग नहीं हैं जो इस देश को एक सही दिशा दे सकें। हर बार चुनाव के समय बड़े बड़े वाडे करने वाली पार्टियाँ और एक दूसरे को अलग अलग श्रेणी में विभक्त करने वाले नेता, गुंडे और अराजक तत्व ही क्यों नज़र आते हैं।

हमारे जैसे २५ साल के लोग जिनमें कुछ करने का जज्बा है, कहाँ हैं। क्यों नहीं हम एक साथ मिल कर इस देश को एक सही राह पर ले जाने कि कोशिश करते हैं। कल मेरी कई दोस्तों से बात हुयी, सारे गुस्सा थे हमारे नेताओ को कोस रहे थे। मैंने सब से पुछा, कि तुमने अपना वोटर्स आईडी कार्ड बनवाया है...सवाल पर सब चुप, वही बहने कि रेसिदेंस प्रूफ़ नहीं है, कहाँ जाएँ कैसे बनवाएं। सोचती हूँ कि कितनों ने कोशिश भी कि है कुछ सार्थक करने कि। हममें ये अकर्मण्यता क्यों भरी हुयी है, अगर हमारी जेनरेशन कुछ नहीं करेगी तो हमें क्या हक है बैठ कर नेताओं को कोसने का।

आज मैं IIMC के बारे में बात करना चाहूंगी, चूँकि पत्रकारिता वहां का मुख्य पाठ्यक्रम है तो हमारे मित्र अक्सर एक ideology रखते थे, चाहे वो राईट विंग हो या लेफ्ट विंग हो। राष्ट्रवादी हों, या कम्युनिस्ट पर अपनी सोच के हिसाब से देश को एक बेहतर भविष्य देना चाहते थे। श्रीजय के साथ मैंने पहली बार छात्र राजनीति का थोड़ा हिस्सा देखा था। मैंने पहली बार जेएनयू कि दीवारों पर लगे पर्चे देखे थे, जगह जगह वंदे मातरम और इन्किलाब जिंदाबाद लिखा देखा था। मैंने देखा था कि जब श्रीजय ABVP के बारे में बात करता है तो उसकी आंखों में एक चमक आ जाती है....एक जज्बा है जो महसूस होता है। उस वक्त रिज़र्वेशन का दूसरा चरण लागू होने वाला था। उस वक्त मैंने पहली बार जेएनयू में मशाल जुलूस देखा, मैंने देखा कि जनवरी कि सर्द रातों में लोग रात के दो दो बजे तक मिल्क काफी पीते हुए गंगा ढाबा पर देश के मुद्दों के बारे में बहस करते रहते हैं।

आज वो लोग तैयारी कर रहे हैं एक सशक्त और सार्थक कदम उठाने की, इस परिस्थिति से हमें निकालने की किसी कवायद में जुटे होंगे. कुछ अच्छा करने के लिए सिर्फ़ जज्बा ही काफ़ी नहीं होता, उसके साथ चाहिए होता है एक एक्शन प्लान, और ऐसा प्लान बनने के लिए अरसा तक सब भूलकर सिर्फ़ अपने लक्ष्य की पर बढ़ना होता है. आज की पोस्ट में मैं उन्हें और उन सबको नमन करती हूँ जो हमारे देश को एक बेहतर भविष्य की ओर ले जायेंगे.
दो दिन लगातार उन आतंवादियों की गोलियों और बमों ने सिर्फ़ ताज को क्षति नहीं पहुंचाई है बल्कि मेरे जैसे हर संवेदनशील इंसान को चुनौती दी है. और हम उन्हें मुँहतोड़ जवाब देंगे. न केवल उन आतंकियों को जो इस देश को निशाने पर रखते हैं बल्कि उन नाकारा उन निकम्मे नेताओं को जो इस देश को बेच कर खा जाना चाहते हैं.
ये शोक का नहीं आक्रोश का समय है...कर्मभूमि में आगे बढ़ना मायने रखता है.
तेरा वैभव अमर रहे माँ...हम दिन चार रहे न रहे

27 November, 2008

लेकिन आग जलनी चाहिए.

आजकल शब्दों ने मेरा साथ छोड़ दिया है। शायद कहीं न कहीं दिन भर टीवी पर मुंबई को यूँ लहूलुहान देखकर शब्दों में भी खून उतर आया है...घर की दीवारों पर टंगे नज़र आते हैं वो खौफनाक मंजर। दिन भर डरा सहमा ये दिल शायद कुछ सोचना बंद कर चुका है।
साथ ही साथ आक्रोश भी है, अपने कुछ न कर पाने का बेहद अफ़सोस भी, अपनी लाचारी पर बेहद दुःख भी। इसलिए आजकल कुछ लिखने से ज्यादा पढ़ रही हूँ, कुछ कवितायेँ कालजयी होती हैं। हर माहौल में उनकी जरूरत होती है।
आज दुष्यंत कुमार की मेरी सबसे पसंदीदा कविता पढ़ा रही हूँ। आप में से अधिकांश ने पढ़ी होगी, पर फ़िर से पढ़ना भी अच्छा लगता है।
शब्दों में ही पनाह है...थोड़ा सुकून जो तलाश करती हूँ फ़िर से यहीं आ कर मिलता है। जैसे किसी बुजुर्ग का हाथ हो सर पर...आशीर्वाद हैं ऐसी कवितायेँ

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।





-दुष्यंत कुमार

शोक, क्षोभ, क्रोध

वो आयें

अपनी योजना बनाएं

और जहाँ मन करे विस्फोट कर दें

लोगों को बंधक बना लें

मांग करें आतंकवादियों को रिहा करने की

घंटों फायरिंग करें, ग्रेनेड फेकें

हमारे एक एक करके जवान शहीद हों

और मीडिया फ़िर से चीख चीख कर कहे

ये भारत पर अटैक है

और हमारे जवानों की सारी स्ट्रैटेजी टीवी पर दिखा दे

ताकि उन्हें मालूम होता रहे की जवाबी हमला कैसे होने वाला है

कहें की मुंबई रूकती नहीं, डरती नहीं

मगर क्या उपाय है...घर में बंद हो जाएँ

चूल्हा कैसे जलेगा

मैं दिन भर बस परेशान रह सकती हूँ

प्रार्थना कर सकती हूँ

इश्वर सबकी रक्षा करे

क्योंकि अब अपने ही देश में हम सुरक्षित नहीं
मैं न आर्मी में हूँ, न पुलिस में

ऐसी परिस्थिति में मैं कुछ नहीं कर सकती

कोई उपाय नहीं समझ आता इनसे मुकाबला करने का

खून खौल उठता है

ऐसा कुछ नहीं है जो मैं कर सकूँ

तो मैं क्या बस कविता लिखूँ?

26 November, 2008

एक शाम




आलसी चांद
आज बहुत दिनों बाद निकला
बादल की कुर्सी पे टेक लगा कर बैठ गया
बेशरम चाँद
पूरी शाम हमें घूरता रहा

लाज से लाल चेहरा...
संदली शाम में घुलता रहा
गुलाबी सितारे आँख मिचौली खेलने लगे

सारी शाम वो घास खोदता रहा
ग्लेशियर से जिस्म पिघलते रहे
मिट्टी में छोटी छोटी नदियाँ बहने लगीं

खिलखिलाती गुनगुनाती...
छोटी छोटी फ्राक पहने हुये लड़कियाँ
अंगूठा दिखाकर चिढ़ाती रही

मैं तितलियों के पीछे भागी बहुत
वो उंचे आसमानों में जाती रहीं
चाँद भी मुट्ठी से फिसलता रहा


अंजुरी में उठा कर तुम्हारा अहसास
मैं पलकों पे होंठों पे रखती रही
तुम जाने कहॉ खोये खोये रहे


पुरवा तुम्हारी बाहें बन कर
मेरी मुस्कुराहटें दुलराती रहीं
आँख भीगी भीगी रही

लबों पर धुआँ धुआँ सा रहा
मैं तरसती रही तुम तरसते रहे
एक शाम के धागे उलझते रहे

25 November, 2008

जहाँ न पहुंचे कवि, वहां पहुंचे ब्लोगर :D

"तुम्हारा और स्कॉच का कुछ रिलेशन समझ में नहीं आया" । वो मेरे ऑफिस में नई आई थी, उसके लैपटॉप पर कुछ सेटिंग करते हुए मैंने देखा कि उसने अपने आईपॉड का नाम "whiskey on the rocks" रखा था। जवाब देने के बजाये वह खिलखिला के हँस पड़ी, ये हँसी भी मेरी कुछ खास समझ में नहीं आई, लड़कियां जाने क्यों बिन वजह ही हँस देती हैं। जैसे कि उन्हें मालूम होता है कि हम उनकी हँसी से अपना सवाल भूल जायेंगे। पर मुझे मालूम करने की जिद पड़ गई। मैंने फ़िर पूछा, बताओगी नहीं, ये व्हिस्की ऑन द रॉक्स का क्या चक्कर है।


"क्योंकि मैं स्कॉच, ऑन द रॉक्स पीती हूँ ...बस इसलिए", अब इस जवाब के बाद चौंकने की बारी मेरी थी। "पर...पर, तुम तो...तुम तो ऐसी लड़की नहीं लगती", मैं हड़बड़ा के बोला था। "कैसी लड़की नहीं लगती...जिसे स्कॉच पसंद हो?", "हाँ...नहीं नहीं, मेरा वो मतलब नहीं था", मुझे कुछ सूझा नहीं। बाप रे, अब मैं किसी तरह अपना पीछा छुडाने की सोच रहा था...पड़ा एक और महिला मुक्ति वाले से मोर्चा, अब तो ये मैडम मेरी धज्जियाँ उड़ा देंगी, दिखने में कैसी सीधी सादी लगती है(और प्यारी भी...कहीं से आवाज़ आई)। और मैं सोच रहा था कि बेचारी नई आई है, किसी को जानती नहीं, थोड़ा बात कर लेता हूँ मन बहल जायेगा(किसका? उनका या तुम्हारा...फ़िर से आवाज आई)। इतनी सारी बातें एक मिनट के अन्दर दिमाग में घूम गयीं, और फ़िर दिमाग घूम गया...भागने के रास्ते ढूंढ़ना इतना आसान भी तो नहीं था, लंच टाइम था, अपना खाना मैं ले कर ही आया था उनकी सीट पर...और लैपटॉप कि सेटिंग भी अभी पूरी नहीं हुयी थी, कहाँ जाऊं हे भगवान अब तू ही बचा। इतनी कैल्कुलेशन जब चल रही थी तो मैंने देखा नहीं कि उनके चेहरे का हावभाव क्या है, इसलिये कहते हैं कि आदमी को अपने अलावा औरों के बारे में भी सोचना चाहिए।


खैर अब ओखली में सर दिया तो मूसल से क्या डरना...मैंने देखा, मोहतरमा की आँखें उसी तरह चमक रही थी जैसे शेर की अपने सामने शिकार देख कर चमकती होंगी(मैंने वैसे कभी देखा नहीं है, पर शायद जैसे टॉम एंड जेर्री में जब जेरी हाथ में आता है तो टॉम के चेहरे का भाव जैसा ही होगा)। वो किसी दूसरी दुनिया में जा चुकी थी, "जानते हो, कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जिन्हें पहली बार देख कर भी नहीं लगता कि पहली बार देखा है, किसी से पहली बार मिल कर भी लगता है हम पिछले जनम में मिल चुके हैं...वैसा ही था व्हिस्की का स्वाद, कभी लगा ही नहीं कि पहली बार पी है...जैसे पानी, वैसे ही याद नहीं कि पहली बार कब पी थी..."।


अब तो मुझे काटो तो खून नहीं, इस बार बुरे फंसे बच्चू, कवयित्री से पाला पड़ा है, अब तो भगवान भी नहीं बचा सकते, मुझे पूरा यकीं था कि वो मुझे अब कविता पढ़ाने लगेगी। मैं भला आदमी, इस पूरे प्रकरण में सिर्फ़ अपनी इंसानियत के कारण फंसा हूँ। इससे ये निष्कर्ष निकलता है, इंसान होना ग़लत है, पूरी एवोलुशन प्रक्रिया ग़लत थी, आख़िर इवोल्व होके क्या बना...कवि!!?? इससे तो अच्छे हम पाषाण युग में थे, शिकार करो, खाओ...कम से कम किसी कि कविता तो सुननी नहीं पड़ती थी। जैसे मछली कांटे में फंसती है तो घंटों बैठे मनुष्य के चेहरे पर जो भाव होता है उनके चेहरे पर वही भाव नज़र आ रहा था। मैं क्या कर सकता था, मन मार के तैयार हो गया।


पर उन्होंने जब इन्टरनेट एक्स्प्लोरर पर ब्लोगेर खोला तो हमारी सारी हिम्मत जवाब दे गई...ब्लॉगर!!!!! ये तो मनुष्य की सबसे खतरनाक श्रेणी होती है...मैंने किसके चंगुल में फंस गया, हे हनुमान जी बचाओ...अब ये अपना लिंक रट्वायेंगि, और कमेन्ट न देने पर रोज ख़बर लेंगी...अब मैं क्या करूँ, किसकी शरण में जाऊं। मैंने वादा किया कि मैं रोज़ उनका ब्लॉग पढूंगा और कमेन्ट भी दूंगा, और कोई उपाय भी क्या था।

जहाँ न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि, और जहाँ न पहुंचे कवि वहां पहुंचे ब्लोगेर. तो बचने का कोई उपाय ही नहीं था. आते साथ मैंने सारी नौकरी की साइट्स पर अपना resume डाला...मोंस्टर से लेकर शाइन तक। और आप सब से अनुरोध है कि अगर किसी के ऑफिस में कोई पोस्ट खाली हो तो मुझे बताएं। मानता हूँ आप ब्लोगेर हैं पर उससे पहले आप एक इंसान है, इसलिए कृपया मेरी मदद कीजिये। आज से मैं कान पकड़ता हूँ, व्हिस्की नहीं पियूँगा, कोई लड़की चाहे व्हिस्की पिए या किरासन तेल उससे कारण नहीं पूछूँगा, और किसी लड़की की मदद करने नहीं जाऊँगा।

नोट:इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं उनका किसी भी व्यक्ति जीवित या मृत से कोई लेना देना नहीं है :D.

21 November, 2008

तुम्हें प्यार है मुझसे

फ़िर से एक पुरानी नज़्म, फ़िर से पीले जर्द पन्ने...और लबों पर वो हँसी कि क्या लिखती थी मैं उस समय...ये लिखा है ३१/०८/०२ को। अब सोचती हूँ तो लगता है कितने साल बीत गए...

सोचती हूँ की जी लोगी मेरे बगैर

एक दिन के लिए कोशिश कर कर देखो

गूँज उठेगा तुम्हारी धडकनों में नाम मेरा

कभी खामोशी में मुझे याद कर देखो

मैं कोई ख्वाब नहीं की मुझे भूल जाओ कल सुबह तुम

मैं हकीकत हूँ न यकीं हो तो छू कर देखो

झूठ कहती हो कि हर नज़्म तुम्हारी अपनी है

मुझे सोचे बगैर एक लफ्ज़ भी लिख कर देखो

रात भर रोओगी मगर छुपाओगी मुझसे

कभी अपने गम मेरे साथ बाँट कर देखो

तुम्हारा हर अहसास जुड़ा हुआ है मुझसे

मेरी हँसी को अपने लबों से जुदा कर देखो

मेरा हर दर्द टीस उठता है तुम्हारे अन्दर

तुम्हारी आँखें नम हैं मेरे अश्कों से जा कर देखो

तुझे मालूम नहीं ए मेरी मासूम सी ख्वाहिश

तुम्हें प्यार है मुझसे मेरा यकीन कर देखो।

19 November, 2008

जागने का वक्त आ गया है.

हमें याद है की १०वीं में हमारा सिविक्स नाम का विषय होता है...उसी में हम संविधान के बारे में पढ़ते थे। हम जब fundamental rights के बारे में पढ़ते हैं तो उसी पैराग्राफ में हमारी duties के बारे में भी लिखा होता है। ऐसा क्यों होता है कि हम अपने अधिकारों को लेकर बहुत सचेत रहते हैं और हो हल्ला भी मचाते हैं पर अपनी जिम्मेदारियों का क्या? क्या अपनी जिम्मेदारियां ताक पर रखने के बाद हमें अपने अधिकारों के लिए लड़ने का हक है?
इस दौर में सब सब सवाल करते हैं कि आप क्या कर रहे हो...समाज के लिए...देश के लिए वगैरह वगैरह, ये सवाल करने के पहले वो ये बताएं कि उन्होंने क्या किया है, किस बदलाव कि दिशा में कदम उठाये हैं?
आज मैं भी ऐसे ही एक बदलाव के बारे में कहना चाहती हूँ जी बहुत जरूरी है। और ये है वोट देना, हममें से अधिकतर लोग सरकार को कोसते हैं उसकी हर नाकामी पर, मगर जब वोट देने का वक्त आता है हम अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट जाते हैं। हालाँकि मैं मानती हूँ कि इसका एक बहुत बड़ा कारन ये है कि कोई भी एलेक्टीओं में खड़ा होने वाला नेता इस काबिल नहीं होता कि उसे चुना जाए। सारे भ्रष्ट और अक्सर अपराधिक पृष्ठभूमि के होते हैं। पर वोट देना पहला कदम है हमारे देश के लिए कुछ सार्थक करने कि दिशा में।
हम कॉलेज में थे जो चुनाव और राजनीति को गंभीरता से लेते थे...जेएनयू में तो खास तौर से इस तरह कि हवा चलती है कि आप किसी न किसी विचारधारा से प्रेरित हो ही जाते हैं। मेरे कुछ दोस्त ऐसे भी हैं जिन्होंने राजनीति में उतरने का और चीज़ों को बदलने का प्रण लिया है। मुझे उन पर गर्व है, मैं सीधे इलेक्शन में उतर तो नहीं सकती पर मैंने वादा किया है कि उनका इलेक्शन कैम्पेन मैं सम्हालूंगी।
मैं और मेरे जैसे कई लोग इस लिए भी वोट नहीं दे सकते क्योंकि हमारा नाम हमारे घर कि वोटर लिस्ट में जुदा है, और हम रहते हैं दूसरे शहर में...अब वोट कैसे दें।मुझे ये मालूम नहीं था कि किसी भी शहर में ६ महीने तक रहने के बाद हम अपना नाम वहां की वोटर लिस्ट में शामिल करने के लिए आवेदन दे सकते हैं। और वोट करने के लिए बस लिस्ट में नाम होना जरूरी है, वोटर आइडी कार्ड नहीं है तो DL या PAN कार्ड भी चलता है।इस सारी प्रक्रिया को बिल्कुल आसान कर दिया है टाटा टी ने अपने नए वेबसाइट में
मेरा आपसे अनुरोध है कि आप www.jaagore.com पर जरूर जाएँ। वाकई वोट करना अब बिल्कुल आसान हो गया है। मैंने अपने सारे दोस्तों को इस बारे में बताया और उन्होंने भी सूचना को आगे forward किया।ummid है इन छोटे छोटे क़दमों से ही हमारा हमारे अपने भारत का सपना पूरा होगा।

वंदे मातरम्

18 November, 2008

मैं और तुम

मेरे तुम्हारे बीच

उग आया है

कंटीला मौन का जंगल

जाने कब खो गयीं

शब्दों की राहें

खिलखिलाहटों की पगडंडियाँ

ऊपर नज़र आता है

स्याह अँधेरा

नहीं दिखता है चाँद

नहीं दिखती तारों सी तुम्हारी आँखें

काँटों में

उलझ जाता है तुम्हारा स्पर्श

ग़लतफ़हमी की बेल

लिपट जाती है पैरों से

और मैं नहीं जा पाती तुम्हारे करीब

बहुत तेज़ होता जाता है

झींगुरों का शोर

मैं नहीं सुन पाती तुम्हारी धड़कन

पैरों में लोटते हैं

यादों के सर्प

काटने को तत्पर

शायद मेरी मृत्यु पर ही

निकले तुम्हारे गले से एक चीख

और तुम पा जाओ

शब्द और जीवन ...

16 November, 2008

फ़िर


इंतज़ार में
बिल्कुल कण कण में
टूट जाता है मेरा वजूद
और क्षण क्षण गिरता रहता है
रेत घड़ी के एक से दूसरे छोर पर

धीरे धीरे फ़िर से जुड़ जुड़ कर
पूरी होने लगती हूँ मैं
और एक तरफ़ से बिल्कुल खाली

पर स्थायित्व नहीं है मेरे जीवन में
जैसे ही गिरता है पूरा वजूद
वक्त मुझे फ़िर से पलट देता है
और शुरू हो जाता है
मेरा बिखरना
फ़िर से...

15 November, 2008

नया टेम्पलेट मुबारक हो :)

अब रात के दो बजे कोई भूत प्रेत ही मुबारक दे सकते हैं, तो मैंने सोचा उससे पहले मैं ख़ुद को ही बधाई दे लूँ। पिछले टेम्पलेट में ऐसी प्रॉब्लम आ गई थी की पोस्ट्स एडिट ही नहीं हो रहे थे, बहुत कोशिश की सुधारने की, कुछ नहीं हुआ। हमने सोचा मुसीबत को जड़ से ही समाप्त कर देते हैं। वैसे अभी बहुत काम बाकी है इसपर....एक तो ऊपर का टूलबार ही गायब है, समझ नहीं आ रहा लोगिन कहाँ से करें और न्यू पोस्ट्स कैसे लिखें। खैर ये सब करके इसे पूरी तरह अपने जैसा बनाने में टाइम लगेगा। उसपर वीकएंड भी आया है...मैं इस खूबसूरत टेम्पलेट के लिए उन सब लोगों को धन्यवाद करती हूँ जिन्होंने घंटों मेहनत करके इसे बनाया है।

कल मेरे ड्राइविंग लाइसेंस का प्रैक्टिकल टेस्ट है...भगवान बचाए। बाप रे ! बंगलोर में लाइसेंस ऐसे मिलता है की गाड़ी चलने से डर लगने लगे। रिटेन परीक्षा में १५ सवाल थे, जवाब देने में कम से कम १५०० बार भगवान् का नाम तो लिया ही होगा। उसपर कुणाल के साथ गई थी कि समझदार लड़का है, थोड़ा ताक झांक कर लेने से काम हो जायेगा, मगर हाय रे gender inequality, वहां लड़के और लड़कियों को अलग अलग बैठा दिया गया...अलग क्या बैठे हमारा तो दिल बैठ गया। हनुमान चालीसा तब से ही पढ़ना शुरू कर दिए थे। औए सवाल तो क्या हैं...हमें अपने PG में भी ऐसे सवाल नहीं रटने पड़े थे।
बानगी देखिये:
there is a cow standing across the road, what will you do?
a)cross the road from the cow's behind
b)cross the road from front of the cow
c)wait till the cow has crossed the road
अगर मैंने ख़ुद से सवाल नहीं देखा होता तो मुझे कभी यकीं नहीं होता कि ऐसे सवाल भी आ सकते हैं। खैर हमारी तो पूरी इच्छा थी कि हम तब ताख खड़े रहे तब जब गोमाता सड़क पार न कर लें, लेकिन पहले जो चित पढ़ी थी उसमें लिखा था कि गाय के पीछे से निकल जाएँ। अब भइया बताओ कि अगर गाय के सामने से जाने पर उसके सींग मारने का भय है तो पीछे से जाने पर भी तो गोबर और गोमूत्र पढ़ने का डर है...इससे क्या रुक जाना बेहतर नहीं होगा। पर शायद कुएस्शन सेट करने वालों को लगा होगा कि इससे शुद्धि होगी हमारी तो ऐसा नियम बनाया।
मैंने यह भी सोचा कि अगर गाय कि जगह भैंस खड़ी तो क्या करें...फ़िर लगा कि उनसे पूछने से बेहतर है कि मैं ताऊ से पूछ लूँ। खैर वो सवाल फ़िर कभी।

फिलहाल तो कल कि तैयारी ठेंगा हो रखी है...भगवान उस instructor को बचाए जो मेरा टेस्ट लेने वाला है। पटना में मैं साईकिल भी चलती थी तो खम्भे वगैरह रास्ता दे देते थे। :D aur कुणाल को जितनी अच्छी तरह से मैं जानती हूँ वो आराम से कह देने वाला है कि मैं उसके साथ नहीं हूँ...उफ़ ये बंगलोर। मुझे फ़िर से देवघर, पटना और दिल्ली की बहुत याद आ रही है.

अब सपने में बाकी प्रक्टिस करुँगी...

ये यादें कौन सी bike से चलती हैं
कहीं भी जाऊं मुझसे पहले पहुँच जाती हैं

क्या इन्हें पेट्रोल भी नहीं bharana होता...

12 November, 2008

असहमति

मैं कविता लिखती हूँ, प्रायः मुक्त छंद में ही लिखती हूँ, मुझे ऐसा लगता है कि भावनाएं किसी व्याकरण में बंधने लगती हैं तो उनका स्वरुप नियमों के अनुकूल होने लगता है। अभिव्यक्ति एक दिशा में मुड़ने लगती है...आजकल लिखने का तरीका भी ऐसा हो गया है कि अक्सर जो एक बार लिख देती हूँ, वापस उसमें संशोधन नहीं करती हूँ/नहीं कर पाती हूँ। कहने को ये भी कह सकती हूँ कि वक्त नहीं मिलता...पर उससे ज्यादा ये होता है कि कुछ भी लिखते वक्त जो ख्याल आते रहते हैं दिमाग में, वो कुछ समय बाद बदल जाते हैं। अब ऐसे में अगर मैं कुछ बदलाव करती हूँ तो लगता है उस ख्याल के प्रति अन्याय कर रही हूँ।
मेरा लिखना हमेशा कविता नहीं होता है...मैं बस जो शब्द उमड़ते घुमड़ते रहते हैं उन्हें लिख देती हूँ, उनमें एक प्रवाह होता है, एक अहसास होता है, बस...इससे ज्यादा कुछ होता नहीं है, इससे ज्यादा मुझे कुछ चाहिए भी नहीं होता है मेरी लेखनी से।
अभी तक से एक दो सालों में कुछ ही बार ऐसा हुआ है कि लोगों कि प्रतिक्रिया पढ़ कर मेरा वाकई मन किया है कि मैं उनसे इतनी बहस करूँ कि वो हार कर चुप हो जाएँ...उनके लिखे कि धज्जियाँ उड़ा दूँ।परसों एक कमेन्ट आया जिससे उस वक्त से मेरा दिमाग ख़राब हो रखा है, और मैं जानती हूँ कि जब तक मैं लिख न लूँ शान्ति नहीं मिलेगी।

तो ये रहा कमेन्ट

HEY PRABHU YEH TERA PATH said...कविता आज का जनप्रिय काव्य-कथ्य हो गया है।पुराने जमाने मे जो स्थान दोहा, सोरठा या मनोहर-छन्द का था उसे आज कविताओ ने छीन लिया है।आपकी बेतरतीब कविता मे अपेक्षाकृत सुगमता कि झलक थी,यघपि इसमे अनुभुति की प्रखरता तो अपेक्षित है, पर तुकबन्दी के कारण एक चमत्कार भी आ जाता है। "ओक" शब्द का भावार्थ क्या है ? "झेलें" शब्द कुछ मजा नही आया।"गुलाबी गुलाबी सा चाँद", अगर चाँद को निला या सफेद धुधीया रग का बताते तो कैसा रहता? आशा है, बेतरतीब अपने सवेदन सन्देश को अन्य लोगो तक पहुचाने की परम्परा को निभाने मे समर्थ हो सकेगा।

महावीर बी सेमलानी "भारती'

मुबई 09-11-२००८


मुझे इस कमेन्ट पर आपत्ति है...
पहली बात कविताओं ने कभी किसी का स्थान नहीं छीना, कवितायेँ कोई नेता नहीं हैं जो हमेशा कुर्सी छीनने के बारे में सोचती रहे।


दूसरी बात...मेरी कविता में तुकबंदी है ही नहीं, किन्ही पंक्तियों में नहीं, तो फ़िर ये कहना कि तुकबंदी के कारण चमत्कार आ जाता है", क्या मायने रखता है, सिवाए ये दिखने कि इन महाशय को या तो पता नहीं है कि तुकबंदी क्या होती है या फ़िर इन्होने कविता पढ़ी नहीं है।


तीसरी बात" ओक शब्द का भावार्थ क्या है" जनाब शब्द का शब्दार्थ होता है, भावार्थ नहीं...पंक्ति या कविता का भावार्थ होता है।


चौथी और सबसे IRRITATING बात..."गुलाबी गुलाबी सा चाँद", अगर चाँद को निला या सफेद धुधीया रग का बताते तो कैसा रहता? " मैं नहीं बताउंगी नीला या पीला, क्यों बताऊँ, मेरी कविता है मेरा जो मन करेगा लिखूंगी, आपको इतना ही शौक है कि चाँद नीला या सफ़ेद हो तो आप ख़ुद एक कविता लिखिए....आप कौन होते हैं मुझे मेरे चाँद के रंग पर सलाह देने वाले...इसको सरासर हस्तक्षेप कहते हैं, बिन मतलब और बेसिरपैर की सलाह देना भी कहते हैं।


और आखिरी पंक्ति "आशा है, बेतरतीब अपने सवेदन सन्देश को अन्य लोगो तक पहुचाने की परम्परा को निभाने मे समर्थ हो सकेगा।" जी नहीं, इसमें कोई संवेदन संदेश नहीं है...कृपया आसान सी चीज़ों में जबरदस्ती के गूढ़ भाव न खोजें। आपसे अगर पूछूँ की संवेदन संदेश का अर्थ क्या होता है तो शायद आप भी नहीं बता पायेंगे. क्या सिर्फ़ कुछ भी लिख देने के लिए कमेन्ट लिखने की जगह होती है...चाहे वो relevant हो या नहीं? ऐसा कुछ भी लिखने के लिए ब्लॉग होता है जहाँ पर आप उल्टा सीधा जो मन करे लिख सकते हैं, क्योंकि ब्लॉग लिखने का उद्देश्य अपनी बात कहना होता है। मैंने कई और बार भी देखा है कि कोई कुछ भी लिख जाता है।


कमेन्ट लिखते वक्त बेहद जरूरी है की आप पोस्ट को पढ़ लें ...फ़िर जो चाहें लिखें. और अगर पढने का मन नहीं है तो सिर्फ़ बढ़िया है, अच्छा लगा...जैसे कमेन्ट दें. खास तौर से बुरा लगा मुझे जब दिवाली के समय मैंने माँ की बरसी पर एक पोस्ट लिखी थी और उसमें भी कमेन्ट में लोग मुझे दिवाली की शुभकामनाएं दे गए थे. क्या क्षण भर ठहर के ये देखना जरूरी नहीं था की जिसे आप हैप्पी दिवाली कह रहे हैं वह इस दिवाली को किस तरह से मना रहा है...दिवाली है या मुहर्रम उसके घर में.
खैर चलता रहता है ये सब भी...

ब्लॉग्गिंग भी जिंदगी का हिस्सा ही तो है

08 November, 2008

बेतरतीब

आज मुझे शब्द न दो

बस थोडी खामोशी दे दो

ओक में भरकर पीने के लिए

जैसे डूबते सूरज की आखिरी रौशनी पकड़ती थी

उसी तरह से...

आज मुझे वैसे खामोशी दो

जो हम दोनों मिल कर बाँट सकें

अकेले अकेले झेलें नहीं...

वक्त हुआ करता था

जब साथ होना ही काफ़ी होता था

पर अब नहीं होता

क्यों मन मांगने लगता है

सिन्दूरी सी शामें

घर लौटते पंछियों की चहक

जंगल से आती शीतलहरी

गुलाबी गुलाबी सा चाँद

पीली रौशनी में नहाई सड़कें

एक टुकडा बादल की बारिश

रोशनदान से आती किरणों की डोर

क्यों प्यार मांगने लगता है

और देना भूल जाता है...

06 November, 2008

यादें जो दबे पाँव आती हैं

डायरी के पाने उलटती हूँ तो एक अजीब सा अहसास होता है, इतने साल हो गए...वो लम्हा आज भी जैसे उतना ही जीवंत है, जैसे पाटलिपुत्र में कतार से लगे गुलमोहर के पेड़। होली के वक्त उत्साह बरसाता अमलतास, गुनगुनाती हुयी मालती और चहकती हुयी मैं।
ये वो वक्त था जब मेरी हैन्डराईटिन्ग काफ़ी खूबसूरत मानी जाती थी, मेरी कविताओं से ज्यादा नहीं, पर फ़िर भी मेरी कुछ दोस्तों को मेरी कवितायेँ बड़ी पसंद आती थी। शायद वो उम्र ही ऐसी होती है, जब रूमानियत किसी भी फॉर्म में अच्छी लगती है, प्यार किसी भी लफ्ज़ में अच्छा लगता है। मुझे आज भी याद है मैंने कुछ कवितायेँ लिख कर दी थी...ताकि वो हमेशा उनके पास रहे। आज जाने कहाँ हैं वो लड़कियां...और जाने कहाँ होंगे वो पन्ने, जो शायद उस वक्त इसलिए सहेजे जाते थे की किसी और को चिट्ठी लिखते वक्त quote करने में काम आयेंगे। जाने वो ख़त लिखे गए की नहीं, और पता नहीं मेरे किसी शेर ने किसी को किसी और की मुहब्बत का यकीं दिलाया की नहीं। आज बहुत से सवाल जेहन में यूँ ही चहलकदमी करने लगे।
१६ साल का प्यार होता भी ऐसा ही है, जिसमें कुछ कहने की जरूरत नहीं रहती। किसी को बताने की भी नहीं, ये भी नहीं कि वो मुझे सोचता है की नहीं...बस इसमें खुश कि मैं किसी को चाहती हूँ। अब वो बचपना लगता है, पर सच में बचपन कितना मासूम होता है, और वो प्यार कितना निष्पाप। उस प्यार में ये चिंता नहीं रहती की आगे क्या होगा? वो वाकई प्यार होता है, रिश्ते के बिना बंधन के बिना...
आज यूँ ही पुरानी डायरी निकाल के पढ़ रही थी...बहुत कुछ घूमने लगा दिमाग में। कागज पर लिखे शब्दों की बात ही कुछ और होती है, handwriting से ही पता चल जाता कि किस मूड में लिखी गई है...हाशिये पर उकेरी लकीरों से समझ आ जाता है की किसकी मुस्कराहट को शब्दों में ढालने की कोशिश चल रही थी। इतना कुछ ब्लॉग की पोस्ट में थोड़े दीखता है।

शायद इसलिए डॉ anuraag कहते हैं "सुनो....इतनी ईमानदारी कागजो में मत उडेला करो ......"

पुरानी डायरी के पन्ने...

ख्वाब पुराने, तुम, और बीते लम्हों की बातें
कुछ भीगी सी और कुछ कुछ धुंधली सी रातें
कुछ उदास ही सुबहें, रूठी यादों के कतरे
कितना कुछ एक अधूरा रिश्ता दे गया...

जेहन में उतरती खुशबुयें आपस में घुलती थी
और तस्वीर बनाती थीं बीते हुए कल की
यूँ लगता था तुमने किसी और जनम में दी थीं
कितना कुछ जर्द पन्नों में दबा एक फूल सूखा दे गया...

कुछ दूर तुम्हारा हाथ थम कर चली थीं मैं कभी
तुम्हारे रूमाल में मेरे आंसू क्या आज भी रोते हैं
बादल अब बस तुम्हारी ही तस्वीर बनते हैं
कितना कुछ मेरी बाहों को आसमाँ तनहा दे गया...

खामोश खूबसूरत आंखों में खो जाने की ख्वाहिश
एक लम्हे में जिंदगी जी लेने का अहसास
जानते हुए भी की ख़त्म नहीं होगा, इंतज़ार तुम्हारा
कितना कुछ हमदम मेरे मुझे प्यार तेरा दे गया...

मुस्कुराहटें, सुनहले ख्वाब, जादे की बरं धुप
चाँद से की गई कितनी बातें और अनकहा कुछ
कुछ तस्वीरें और कुछ अधूरी सी कवितायेँ
कितना कुछ बीते कल का हर एक लम्हा दे गया...

१/७/०३

05 November, 2008

पहली मुलाकात...


हम इत्तिफाक से मिले थे...
हाँ उस वक्त हसीं नहीं लगा था कुछ भी

मुझे ऑफिस में देर हो गई थी
और गुडगाँव से दिल्ली काफ़ी दूर होता है
रात को...एक अकेली लड़की के लिए

मैंने यूँ ही तुम्हें बोल दिया था
मुझे आज हॉस्टल तक ड्राप कर दो
और तुम यूँ ही गाड़ी ले कर चले आए थे
टोयोटा इन्नोवा, व्हाइट कलर की

उस दिन पहली बार तुमको देखा था
झीने झीने अंधेरे में...
देखने से ज्यादा...महसूस किया था
हमारे होने को...इत्तिफाकन

तुम्हें सिगरेट पीने कि इजाजत भी दे दी थी
जो मैं अमूमन किसी को भी नहीं देती थी

और सारे रास्ते मैं बक बक करती आई थी
और पहली बार २२ किलोमीटर कम लगे थे
ट्राफिक के बावजूद

यूँ तो मुझे बहुत अच्छी तरह से याद रहती है
पहली मुलाकात...बस इस बार नहीं

क्योंकि पहली बार लगा था
कि ये पहली मुलाकात नहीं है...
कुछ रिश्ते अधूरे छूट जाते हैं
और उनसे फ़िर मिलना होता है...
इत्तिफाकन

30 October, 2008

आज के दौर में...

हमसे पूछो तन्हाई की कैसी संगत होती है
हमने अक्सर दीवारों को अपना हाल सुनाया है

गली गली सन्नाटे घूमें कैसी दिवाली कैसी ईद
संगीनों को कहाँ पता कौन अपना कौन पराया है

सहमा सहमा दिन होता है और दहशत में जाती रात
पुलिस ने उसके बेटे को कल घर में घुस के उठाया है

आपस में ही लड़ जाएँ तो रोकेगा आतंकी कौन
हममें से ही कुछ लोगो ने नफरत का बीज लगाया है

बचपन में तो पढ़ा अमन का पाठ सभी ने साथ साथ
क्यों आखिर इस उम्र मेंआकर सारा प्यार भुलाया है

आग लगी है अपने वतन में कैसी बुझे बतलाओ कोई
गाँधी जैसा कोई मसीहा कहाँ अभी तक आया है

बनकर एक आवाज उठाना होगा हमको नींद से अब
जब जब जागी है जनता तब ही इन्किलाब आया है

23 October, 2008

माँ की बरसी


एक साल हो गया आज
सुबह ब्राह्मण भोजन करा दिया
दान दक्षिणा भी दे दी
पर भगवान के सामने सर नहीं झुकाया
आज भी नाराज हूँ उनसे मैं

काश तुम होती मम्मी
तो देखती
की तुम्हारी बेटी बड़ी हो गई है
और खाना बहुत अच्छा बनाने लगी है

कहते हैं ब्राह्मण को जो खिलाओ
वो ऊपर वाले को मिलता है
पर संतोष नहीं हुआ
काश तुम्हें बिठा के खिला पाती

तुम देख पाती
तुमने जितना सिखाया
मैंने याद रखा है
सब कुछ
छौंक से ले कर
मसालों तक

काश तुम होती मम्मी
तो अभी कुछ दिन और मेरा बचपन रहता

काश तुम होती मम्मी
तुम्हारी बेटी को एक साल में
बड़ी नहीं होना पड़ता...

20 October, 2008

चेतना

जब कि मैं
पूरी की पूरी पिघल कर
ख्वाहिश बन गई थी
इश्वर ने
तुम्हारे सांचे में मुझे ढाल दिया

जब तक मैं तुझमें नहीं होती हूँ
तू खोखला होता है
और जब तक तेरी बाहें मुझसे जुदा
मैं असुरक्षित

नियति नहीं थी ये
एक सोच का सार्थक होना था
सृजन का उद्देश्य निर्धारण
इस सोच से हुआ था

अग्निशिखा बन गया अंतस
और उचक कर छू लिया
उस ज्योति को
जिसमें से आत्माएं निकलती हैं

प्रकाश, आँच, तप, तेज
सब मिल गए
ताकि तू बन सके मेरा सांचा
ताकि आकार ले सके प्रकृति

क्या तुझे याद नहीं
मैं प्रकृति हूँ तू पुरूष

रचना...


एक लम्हे को

खोला मैंने

उससे निकला

आधा चाँद

एक टुकड़ा बादल

थोड़ी सी बारिश

हवा का एक झोंका

माथे पर झूलती लटें

आंखों में चमकते सितारे

थोड़ा अँधेरा

मैंने एक आकाश बिछाया

उसमे ये सारा सामन रख दिया

बाँध दी पोटली

बस एक लम्हा

बन गई कविता


उस कविता से

निकली

एक छटांक हँसी

एक कतरा आँसू

चुटकी भर खुराफात

मुट्ठी भर ख्वाब


ये सब मिल गए

बन गई

मैं

17 October, 2008

हमसे रूठा न करो...

रूठ कर नहीं जाते हैं घर से

सुबह सुबह

तुम्हारे साथ चली जाती है

घर से हवा

दम घुटने लगता है

अपने ही घर में

खामोश हो जाती है

डाल पर बैठी गौरैया

मुरझा जाते हैं

रजनीगंधा के सारे फूल


गले में अटक जाता है

रोटी का पहला कौर

ख़त्म हो जाता है

घर का सारा राशन पानी

कीलें उग आती हैं

सारे फर्श पर

बारिश होने लगती है

कमरे के अन्दर

आरामकुर्सी पर पसर जाता है

कब्रिस्तान का वीराना

एक दिन ही होती है

इंतज़ार की उम्र

शाम होते होते

रूठ जाती हैं साँसे.

15 October, 2008

वो बारिशें...




सड़क पर हैलोज़ेन लैंप की पीली बारिश में भीगते हुए
कभी देखा है चाँद को गुलमोहर की पत्तियों पर फिसलते?
खास तौर से अगर वो पूर्णिमा का चाँद हो...

जानती हूँ तुमने देखा नहीं होगा
तुम सड़क पर सामने देख कर चलते हो
न की ऊपर झूलती गुलमोहर की टहनियां...

पत्तों में छिपी बारिश की बूँदें
हवा के झोंके से कैसे नन्ही बारिश ले आती हैं
मुझे तुम्हारी थोड़ी सी याद आ जाती है...

एक फुदक में सड़क के पार भागती है गिलहरी
मैं जोर से ब्रेक मारती हूँ
दिल्ली के पुराने किले में रूकती है गाड़ी...

झील में बोटिंग करते हुए खिलखिलाते हैं
कुछ अनजान चेहरे
धुंधले...वक्त और दूरी के कारण...

याद आती है वो पहली बारिश
जब पहली बार तुम्हारे साथ बाईक पर बैठी थी
और तुमने गिरा दिया था...

घर जा कर गाड़ी पार्क करती हूँ
और टहलने निकल जाती हूँ
आई पॉड पर गाना बज रहा है...

"मौसम है आशिकाना...
ऐ दिल कहीं से उनको
ऐसे में ढूंढ लाना, ऐसे में ढूंढ लाना...

13 October, 2008

सवाल...जवाब नहीं.

मेर मानना है की सही या ग़लत कुछ नहीं होता, बस देखने का नज़रिया अलग होता है। खास तौर से समाज के बदलते समीकरणों की बात करें तो।

जाने मेरे कॉलेज के टीचर्स के कारण या फ़िर मेरी मित्र मंडली ऐसी रही कि मुझे सवाल करने की बहुत बुरी आदत लग गई। और सवाल भी ऐसे वैसे नहीं, कुछ ऐसी बुनियादों चीज़ों पर कि सुनने वाले का अक्सर माथा ख़राब जो जाए, और मेरे केस में अक्सर सुनने वालियों का हाल बुरा होता था।

अब मैंने देखा कि एक दिन बात हो रही थी कि ये आजकल की लड़कियों को देखो, शादीशुदा होकर भी कुंवारियों जैसी दिखती हैं, सिन्दूर कहीं छुप के लगा है, न बिंदी न चूड़ी। अब मुझे हो गई कोफ्त बिन मतलब के तंग अदा दिए बहस में...
क्यों जरूरी है कि लड़की एक किलो सिन्दूर लगा के आधा मीटर लंबा मंगलसूत्र लटकाए...ताकि मीलों दूर से नज़र आ जाए कि वो शादीशुदा है। लड़कों पर ऐसा कुछ भी नियम लागू क्यों नहीं होता, उनके लिए शादी का एक भी चिन्हं क्यों नहीं है। और किसी लड़की के लिए ये नियम इतने जरूरी क्यों हैं। थोडी सी flexibility क्यों नहीं मिलती लड़कियों को। और जहाँ मिल रही है अगर वो अपने हिसाब से जी रही है तो सब के पेट में इतना दर्द क्यों होने लगता है।
इस समाज से मुझे जाने क्यों बड़ी खुन्नस रही है हमेशा से, देखती आई हूँ न कि इसके सारे नियमों का भर हम लड़कियों को ही उठाना पड़ता है। मेरे जेनरेशन कि किसी भी लड़की से पूछ लो अगर किसी वर्ड से सबसे ज्यादा चिढ है तो वो है "compromise" और यहाँ कहीं भी उससे पुछा तक नहीं जाता है। पता नहीं हम किस शताब्दी में जी रहे हैं कि अब भी माँओं को बेटियों को सिखाना पड़ता है कि सबसे हिसाब से एडजस्ट करना चाहिए। आख़िर बाकी लोग थोड़ा सा एडजस्ट क्यों नहीं करते।
और क्या करें हम जैसी लड़कियां जब शीला दीक्षित तक कहती है कि रात को निकलने कि जरूरत क्या है। अब कोई शीला दीक्षित को समझाए, हर इंटरव्यू में ये सवाल किया जाता है कि रात को देर तक काम होने में रुकने पर कोई दिक्कत तो नहीं है तुम्हें। अब कौन लड़की कहेगी कि दिक्कत है और मौका जाने देगी...कौन कह सकता है कि दिक्कत नहीं होगी अगर आप ओफ्फिस से घर तक मेर सुरक्षा का इन्तेजाम कीजिये या जिम्मेदारी लीजिये। घर से बाहर अपने दम पर निकलती है हम लड़कियां, हर कदम पर एक लडाई, कभी अपनों से कभी बेगानों से, कभी system से, कभी समाज से।
और जाने कितनी कितनी बार अपने आप से, सिर्फ़ ख़ुद को जिन्दा रखने कि खातिर। सिर्फ़ इसलिए कि माँ बेटी बहन प्रेमिका या पत्नी के अलावा भी हम कुछ हैं....मेरा ख़ुद का भी एक अस्तित्व है।
मेरे ड्राइविंग लाइसेंस, पैन कार्ड, पासपोर्ट पर मेरी माँ न नाम क्यों नहीं होता, कम से लिखने का आप्शन तक क्यों नहीं मिलता।
बुनियादी सवाल...विद्रोही तेवर...फ़िर भी ये समाज मेरा कुछ नहीं बिगड़ सकता...क्यों....क्योंकि मैं आत्मनिर्भर हूँ, आश्रिता नहीं।
काश मैं अपने तरफ़ कि हर लड़की को अपने पैरों पर खड़ा होने लायक बना सकती, अपनी जगह लेने के लिए तैयार कर सकती। हम जब कॉलेज में थे तब हामारे टीचर्स कहते थे, यहाँ लौट कर आना। तुम्हारे जैसे कितनी लड़कयों को तुम्हारी जरूरत होगी।
मेरे बिहार...मैं लौट कर आउंगी, एक दिन जरूर आउंगी.

10 October, 2008

आखिरी मुलाकात

कुछ गीत ऐसे होते हैं कि सुनकर जैसे दिल में कोई हूक सी उठने लगती रहती है। बरसों पुराने कुछ बिछडे लोग याद आने लगते हैं, कुछ जख्म फ़िर से हरे हो जाते हैं।
कुछ ऐसा ही है बाज़ार का ये गाना "देख लो आज हमको जी भर के"। हालात, वक्त और बिछड़ने का अंदाज़ जुदा होने के बावजूद सुनते ही कोई पहचानी गली याद आ जाती है, गीली आँखें याद आती हैं, और एक शहर जैसे जेहन में साँसे लेने लगता है फ़िर से।
इश्क होता ही ऐसा है, गुज़र कर भी नहीं गुज़रता, वहीँ खड़ा रहता है। जब कोई ऐसा गीत, कोई ग़ज़ल पढने को मिलती है तो जैसे एक पल में मन वहीँ पहुँच जाता है। जहाँ जाना तो था पर लौट कर आना नहीं था। वो आखिरी कुछ लम्हे जब वक्त को रोक लेने कि ख्वाहिश होती है, किसी को आखिरी लम्हे तक ख़ुद से दूर जाते देखना, अपनी मजबूरियां जानते हुए, ये जानते हुए कि वो हँसते खिलखिलाते पल अब कभी नहीं आयेंगे।
वो आखरी मुलाकात...कुछ ऐसी बातें जो कही नहीं जा सकीं, एक खामोशी, एक अचानक से आई हुयी दूरी...और वही कम्बक्त वक्त को रोक लेने कि ख्वाहिश।

07 October, 2008

उमड़ घुमड़ ख्याल

हमारे देश में समस्या की जड़ को समाप्त क्यों नहीं करते?

ख़बर आई की अब IIT faculty में भी रिज़र्वेशन लागू होने वाला है। इस मुद्दे पर अलग अलग लोगों ने अपनी राय दी। मुझे तकलीफ सिर्फ़ इस बात से है की ये सरकार के हिसाब से निम्न तबके .लोग, जो की बिना रिज़र्वेशन अपनी सामाजिक और आर्थिक स्थिति नहीं सुधर सकते...इनके लिए सबसे निचली इकाई पार काम क्यों नहीं होता। निचली इकाई यानि स्कूल...प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति को सुधरने की दिशा में कोई काम क्यों नहीं होता। अगर ये अल्पसंख्यक पढाना ही चाहते हैं तो क्यों नहीं स्कूलों में इनकी नौकरी लगायी जा रही रही है। iit जैसे संस्थान की हालत क्यों ख़राब की जा रही है।

मुझे गुस्सा इस बात का भी है की सरकार सही तरीके से कोई काम क्यों नहीं करती, इतनी सारी समितियां बनती हैं पर एक आम आदमी के पास ये तस्वीर क्यों नहीं है की रिज़र्वेशन से कितने प्रतिशत लोगो का फायदा हुआ है। कितने लोगों का नुक्सान हुआ है। क्या वाकई जिन लोगो को रिज़र्वेशन मिलता है वो इसके हक़दार हैं और उनका क्या जिन्हें इसकी कोई जरूरत नहीं है पर फ़िर भी फायदा उठा रहे हैं।

कोई सन्सुस क्यों नहीं हुआ है ताकि ये पता चले की अच्तुअल्ली भारत में SC, ST and OBC जनसँख्या के कितने प्रतिशत हैं। अगर थोडी पारदर्शिता बरती जाए तो इसके ख़िलाफ़ आने वाली कितनी ही कड़वाहटों से बचा जा सकेगा। मैं रिज़र्वेशन के सख्त ख़िलाफ़ हूँ, इसके पीछे कारन ये भी है कि मुझे इसका कोई अंदाजा नहीं है कि इससे कितने लोगों का फायदा हुआ है, अगर हुआ है तो। मैं देखती हूँ कि वो दोस्त जो साथ में पढ़ रहे हैं, कमोबेश एक ही जैसे घरों में पल बढ़ रहे हैं, सिफर इसलिए कि एक कि जाति अलग थी उसे अच्छी जगह admission मिल रहा है। और सिर्फ़ इसलिए कि दूसरा जनरल कातेगोरी का है उसे कहीं एड्मिशन नहीं मिला हालाँकि वह उससे पढने में बेहतर था। तब ये भेद भाव लगता है औरकहीं से न्यायोचित नहीं लगता।

क्या एक बेहतर स्कूल का स्य्स्तेम नहीं बनाया जा सकता जहाँ हर जाति के बच्चों को एक सी अच्छी पढ़ाई मिले, तक अगर ये बच्चे रिज़र्वेशन से भी जाते हैं तो भी पढने में अच्छे भी होंगे और किसी संस्थान का स्तर इनके आने से नहीं गिरेगा। तब कहीं जाके एक सामान समझ कि स्थापना हो पाएगी। ये ऊपर ऊपर रिज़र्वेशन देने से थोड़े कुछ होगा। बैसाखियों पर कब तक चल सकता है कोई भी समाज, चाहे अल्पसंख्यक हो या बहुसंख्यक।main

main kabhi एक स्कूल तो जरूर खोलूंगी। जहाँ पर अच्छी पढ़ाई होगी, चाहे किसी भी समाज, किसी जाति या धर्म या लिंग का हो, वहां हर बच्चे को एक सा पढने लिखने और जीने कि आजादी होगी। एक ऐसी जगह जहाँ हर बच्चे को ये सिखाया जाए कि वह खास है और समाज में उसके सार्थक योगदान की जरूरत है। फ़िर इन्हें किसी पर निर्भर नहों होना पड़ेगा, रिज़र्वेशन पर भी नहीं। ये समझ में अपना स्थान ख़ुद बनायेंगे अपनी लगन और आत्मविश्वास से। एक दिन ऐसा आएगा...मैं लाऊंगी।

अंत में दिनकर की कुछ पंक्तियाँ

मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,

आग में उसको गला लोहा बनाता हूँ,

और उस पर नींव रखता हूँ नये घर की,

इस तरह दीवार फौलादी उठाता हूँ।

मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी

कल्पना की जीभ में भी धार होती है,

वाण ही होते विचारों के नहीं केवल,

स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।

06 October, 2008

या देवी सर्वभूतेषु मातृरुपेन संस्थिता

दुर्गापूजा की आज सप्तमी है। पिछले साल इसी समय माँ के साथ पूरा पूरा दुर्गासप्सती पढ़े थे, शाम सुबह आरती किए थे।

इस बार...
पहली पूजा से ही दुर्गा माँ से नाराज़ हूँ, जो भगवान के सामने हाथ जोड़ दो अगरबत्ती दिखाती थी वो भी बंद कर रखा है। इतने दिन न पूजा की न सांझ दी, पूजाघर में जाना भी नहीं चाहती। शंख ला के रखा है, लिया तो यही सोच के था की दुर्गापूजा में बजाउंगी, पर छुआ तक नहीं है।

ये नाराजगी उनसे है या अपनेआप से मालूम नहीं। पर ऐसी अजीब घटनाओं के लिए तो मन इश्वर को ही जिम्मेदार मानता है, उन्ही से गुस्सा होता है। फ़िर लगता है की जाऊं तो जाऊं कहाँ, जब माँ नहीं है तो दुर्गा माँ ही से सारी बातें कह लूँ। त्यौहार के दिन कितना कुछ होता था, रोज पूजा, आरती और प्रसाद...कितनी तरह की सब्जी खास तौर से अष्टमी के दिन बनती थी। खाने का स्वाद अलोकिक होता था, माँ कहती थी त्यौहार के वक्त भगवान को भोग लगता है न, इसलिए खाने में इतना स्वाद आता है।

हर तरफ़ देखती हूँ, दोस्तों की मम्मी कभी उनके लिए कुछ बना के भेज रही है, कभी उनके बीमार पड़ जाने पर कितने नुस्खे बता रही है, कभी कपड़े भेज रही है। और हर त्यौहार पर सब घर जाने की बात कर रहे हैं। मैं कहाँ जाऊं, मेरा कोई घर नहीं, मुझे कोई नहीं बुलाता।
मुझे त्यौहार अच्छे नहीं लगते.

03 October, 2008

आतंक में सुबहें

इधर कुछ दिनों से सुबहें कुछ अजीब सी होती हैं। बेड से उठ कर अखबार उठाने जाने तक सच में इश्वर से प्रार्थना करती हूँ, कि भगवान आज कहीं ब्लास्ट न हुआ हो। आज फ़िर से खून में रंगी तसवीरें न दिखें सुबह सुबह। मेरे जीजाजी दिल्ली पुलिस में हैं, तो मैं उनसे भी बात कर रही थी कि ये अचानक क्या हो हो गया है, हर रोज़ कहीं न कहीं क्यों ब्लास्ट कर रहे हैं। उनके पास भी कोई जवाब नहीं था।

मैं सोच रही थी कि मेरी तरह कितने लोग इस डर में सुबह उठते होंगे कि कहीं कोई बम न फटा हो, पर उनके डर की वजह कहीं और गहरे होती हैं। मैं एक खास धर्म को मानने वालों कि बात कर रही हूँ, जिनको हर ब्लास्ट के बाद लगता है की कुछ निगाहें बदल गई हैं, अचानक लोगों की बातें थोडी सर्द हो गई हैं। कितना मुश्किल होता होगा न ऐसे जीना, सब कुछ हमारे जैसा होते हुए भी सिर्फ़ इसलिए की कुछ आतंकवादी इस धर्म के हैं उन्हें कितना कुछ झेलना पड़ता है।

आतंकवादी का क्या सच में कोई इमां, कोई धर्म होता है...क्या ये सब सिफर राजनीति नहीं है, एक गहरी साजिश जिसमें पहले रूस अमेरिका और अब कई जगह छोटे देश भी समस्या से जूझ रहे हैं। कल रात एक फ़िल्म देख रही थी, नाम तो याद नहीं पर उसमें एक डायलोग था "one man's terrorist is another man's freedom fighter"। फ़िर लगा की क्रन्तिकारी और आतंकवादी में कितना अन्तर होता है। कौन सा क्रन्तिकारी अपने किसी भी मकसद के लिए निर्दोषों की जान लेना सही समझता है, अगर मासूम बच्चो को अनाथ करके किसी का कोई उद्देश्य पूरा होता भी है तो is it worth it.

बरहाल मैं मूल मुद्दे से भटक गई, काफ़ी दिनों से सोच रही हूँ...

क्या बात है कि मुस्लिम हमारे साथ घुल मिल नहीं पाये हैं अभी तक। मेरी दादी को कोई मुस्लिम छू लेता था तो वो सर से nahati थी। मुझे याद है पापा के एक बड़े अच्छे दोस्त थे मुकीम, एक बार वो और भट्टाचार्जी अंकल साथ में घर आए, तो जैसा होता है दोनों ने पैर छुए दादी के। जब दोनों चले गए तो दादी ने पुछा कि क्या नाम था, तो पापा ने कह दिया कि भट्टाचार्जी और उसका छोटा भाई था।

और ये आज से तकरीबन दस साल पुरानी बात है, मैं ऐसे कई घरों को जानती हूँ जहाँ उनके खाने का बर्तन अलग होता था। मैं उस वक्त बहुत छोटी थी और मुझे आश्चर्य होता था कि ये अछूत वाला व्यवहार क्यों होता है। उन्हें रहने के लिए मकान ढूँढने में दिक्कत होती होगी, मैं इसलिए कह रही हूँ क्योंकि मैं जानती हूँ कि उन्हें कोई किरायेदार नहीं banana चाहता है। और ये सब हाल कि बात है

तो लगता है की इनमें रोष क्यों नहीं होगा, क्यों नहीं ये थोड़ा बरगलाने पर तैयार हो जाते होंगे. इन्हें सच में दिखता है की परायों की तरह हैं ये अपने देश में. नेता भी सिर्फ़ वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करते हैं उनको. एक आम राय में उन्हें भरोसेमंद नहीं माना जाता है...ऐसा क्यों है.मैं एक ब्राह्मण परिवार से हूँ, भागलपुर तरफ़ से, मध्यमवर्गीय, देवघर और पटना में रही हूँ, मुझे नहीं पता की देश के अन्य हिस्सों में उनके साथ कैसा सलूक किया जाता है. पर जिस समाज में मैं रही हूँ उसमे बहुत जगह भेद भाव है. हालाँकि बहुत बदलाव आया है, जैसे की पापा के दोस्त मुस्लिम भी थे, और मुझे तो इससे कभी कोई फर्क ही नहीं पड़ा. ईद पर की सेवई मैं कभी नहीं छोड़ती थी. तो क्या आने वाली जेनरेशन ज्यादा आसानी से एक्सेप्ट करेगी उन्हें.
पर फ़िर मुझे लगता है...कहीं ऐसा तो नहीं की बहुत देर हो चुकी है. वो हमसे इतनी दूर जा चुके हैं की लौट आना सम्भव नहीं. की ये ब्लास्ट हर दिन होते रहेंगे छोटे छोटे शहरों में मौत बेमोल सडकों पर चीखती चिल्लाती रहेगी और घेत्तो में बस जायेंगे लोग. हर धर्म की अलग बस्ती, हर जाति का अलग मोहल्ला.
कभी कभी डर जाती हूँ...

मैंने इस पोस्ट में सिर्फ़ अपने ख्याल व्यक्त किए हैं, ये मेरा अनुभव है जिंदगी का. कईयों का अलग होगा मुझसे पर ये मेरी जिंदगी का हिस्सा है. मालूम नहीं पर नाज़ुक विषय है अगर मेरी बात से किसी को दुःख पहुँचता है तो अग्रिम क्षमाप्रार्थी हूँ.

27 September, 2008

गलतियों की आदत

जाने क्यों मुझे कभी बाल पेन से लिखना अच्छा नहीं लगा
हमेशा स्याही वाली कलम या पेंसिल...
अधिकतर पेंसिल ही, और रबर तो हमेशा पास रहता था

याद है मुझे,
ग्लास में पानी भी ले कर बैठती थी
अगर कोई गलती हो जाए
एक बूँद पानी डाल देती थी
और स्याही धुल जाती थी

मुझे याद है कभी कभी ऐसा भी हुआ है
की पूरा पन्ना ले कर बाल्टी में डाल दिया
पता नहीं क्यों...पन्ने फाड़ती नहीं थी कभी मैं
धुल जाता था तो सुकून होता था

पेंसिल की भी अपनी कहानी है
उसकी नोक का स्वाद
कितने केमिस्ट्री के फोर्मुले में घुलता रहता था
कितने फिजिक्स के रहस्य में घिसता रहता था

रबर अक्सर खुशबू वाला लेती थी मैं
फलों वाला, अधिकतर स्ट्राबेरी
और अलग अलग आकार के
और एक मिटने के लिए नटराज का सफ़ेद

शायद बहुत पहले से ही
मैं जानती हूँ कि मुझसे गलतियाँ होंगी
इसलिए उन्हें ठीक करने का इंतजाम पहले करती हूँ


बचपन से गलतियाँ करती आ रही हूँ
अन्तर बस इतना है कि
अब लुत्फ़ आने लगा है...

24 September, 2008

इसलिए आज मैंने एक सिगरेट सुलगा ली


आज मैंने एक सिगरेट सुलगा कर

होठों पे रख ली

याद आयी वो शाम

जब पहली बार तुम्हारा नाम लिया था...


धुआं धुआं सा कोहरा था उस वक्त

दिसम्बर की सर्द रात में सोयी दिल्ली पर

और हम सड़कों पर भागे जा रहे थे...

कितनी दूर चले आए हैं
उस शाम से भागते भागते

बारिशों वाले इस शहर में...

जहाँ सिगरेट जलते ही बुझ जाती है।


फ़िर भी मैंने एक सिगरेट सुलगाई

भीगी आंखों से धुएं के पार देखा

हम दोनों कुछ ज्यादा साफ़ नज़र आ रहे थे...



एन एच ८ की वो सड़क

दूर तक सीधी दौड़ती हुयी

रात भर जागती थी हमारे साथ



ये शहर बड़ी जल्दी सो जाता है

मासूम बच्चे की मानिंद

और हम ढूँढ़ते रहते हैं

कहाँ जा के खेलें...


वो हवाईजहाज़ किस देश से आए हैं

मैं तुम्हें एक दिन पेरिस घुमाऊंगा

तुम कहा करते थे

यहाँ हवाई अड्डा शहर से दूर बना है


बहुत कुछ नहीं है यहाँ दिल्ली के जैसा

हम और तुम भी नहीं है



इसलिए आज मैंने एक सिगरेट सुलगा ली

यूँ लगा की हम फ़िर से वही हो गए हैं

दिल्ली की सड़कों पर भटकते हुए

रात के यायावर...बेफ़िकर...हमसफ़र

18 September, 2008

काँच की यादें

मैं तो बस टुकडों को समेट के रख रही थी
कि ऊँगली में चुभ गया एक लम्हा...

और बहने लगे आंखों के कोरों से
पिछले कितने कहकहे...

कमरे में थिरकने लगे
आहटों के कितने साए...

खिड़की में आ के छुप गए
लुकाछिपी खेलते बच्चे...

जाने किस दिशा से बहने लगी
रजनीगंधा सी महकी पुरवाई...

और छत से बरसने लगे
हरसिंगार के फूल...

जाने क्यों लगा कि
कुछ कभी बीता नहीं था
बस...ठहर गया था।

16 September, 2008

ये मेरे ही साथ क्यों होता है?




अभी कुछ दिन पहले मैंने आईपॉड ख़रीदा, काले रंग का, क्योंकि सबसे अलग लग रहा था और वैसे भी काला मेरा फेवरेट रंग है। वैसे मुझे लाल बहुत पसंद था पर वो बस लिमिटेड एडिशन में आया था तो मिलने का कोई चांस नहीं था।


अभी १५ दिन भी नहीं हुए थे की एप्पल का मेल आ गया, ९ रंग में आईपॉड नानो, और कितने सारे फीचर्स के साथ। मैं उस दिन से उदास हूँ, दुखी हूँ, गुस्से में हूँ....ऐसा
mere साथ ही क्यों होता है :(


08 September, 2008

दास्तान ऐ दाँत दर्द

ऐसा है कि हमें बचपन से ही मीठा खास पसंद रहा है, मेरी पसंदीदा लाइन है "खाने कि किसी भी चीज़ में चीनी कभी ज्यादा नहीं हो सकती, मीठा जितना हो अच्छा है"।
दोस्तों के आँखें फाड़ फाड़ के देखने के बावजूद मैं काफ़ी में अक्सर दो तीन पैक चीनी तो डालती ही हूँ। डाईबीटीज़ से मरूंगी इसमे किसी को कोई शक नहीं है...खैर जब मरूंगी तब का तब देखेंगे फिलहाल तो मैं किसी और चीज़ से मरने वाली हूँ। हालांकि मेडिकल हिस्ट्री में कोई रिकॉर्ड नहीं होगा कि दाँत दर्द से किसी कि मौत हुयी हो, वैसे हाल में ये एक अजूबा केस होगा और मेरे बारे में माएँ कितने दिनों तक बच्चो को डरती रहेंगे, एक लड़की थी जो बहुत चॉकलेट खाती थी। किंवदंति बन जाउंगी मैं ...
खैर ये तो रही उटपटांग बातें...
मसला ये है कि कल मेरे हाथ में दाँत का एक टुकडा आ गया...अब मेरी उम्र दूध के दाँत वाली तो है नहीं कि खउष हो कर बगीचे में गाड़ने चल दूँ। तो घबरायी...मनिपाल हॉस्पिटल दौडी...
और आख़िर पता चला कि जिंदगी का सबसे भयावह सपना सच हो गया है...डॉक्टर ने कहा रूट कैनाल करना होगा। मैं ठहरी बहादुर लड़की, ऐसे थोड़े डर जाती...मैंने कहा दांत निकल दो पर लगता है इन लोगो ने अच्छे से पढ़ाई नहीं कि है, बोलने लगे क्यों उखाद्वाओगे, परमानेंट टूथ है, खाना कैसे खोज। आख़िर मैंने हथियार डाल दिए।
तो आज जाना है...हिम्मत जुटा रही हूँ।
भगवान करे मनिपाल के doctors बिना रिज़र्वेशन वाले हों, और उन्होंने बिना पर्ची पढ़े एक्साम पास किए हों।

05 September, 2008

to sir with love

Today i would like to say thank you to the teacher who has played the most important role in my evolution as a person who is sure of what she wants in life and dares to acheive it.
Frank sir this is for you.
You made us shed our inhibitions, you taught us to think free, you taught us to believe in ourselves.
I still remember looking up to you in awe coz you knew so many things, and those were the times when we didnt have internet with us, sir you were our search engine. I dont recall any instance when i asked you for information and you didnt give me a new insight on the subject alltogether.
I remember the radio production classes with you where we saw your amazing linguistic skills...and then all those times at Aasra when we saw movies listened to songs, played games and had so much fun.
Sir you have been like a very good freind whom i can confide and ask advice from...thank you so much sir for being what you are...
you played this song for us in aasra, and i still remember i got goosebumps...so sir today i dedicate this song to you...with love.


To Sir With Love.m...

lyrics

Those schoolgirl days

of telling tales and biting nails are gone

But in my mind I know they will still live on and on

But how do you thank someone

who has taken you from crayons to perfume?

It isn't easy, but I'll try

If you wanted the sky I would write across the sky in letters

That would soar a thousand feet high

'To Sir, With Love'

The time has come for closing books and long last looks must end

And as I leave I know that I am leaving my best friend

A friend who taught me right from wrong and weak from strong

That's a lot to learn, but what can I give you in return?

If you wanted the moon I would try to make a start

But I would rather you let me give my heart 'To Sir, With Love'

01 September, 2008

एक खूबसूरत गीत...

Chachi420-EkWohDin...

यहाँ की शामें यादों सी होती हैं...

खूबसूरत, और हर बार अलग ही रंग में बिखरी हुयी

वही चहचहाहट वही झुंड के झुंड लौटते पंछी

कभी कभी कमरे में बैठती हूँ तो लगता है वापस जेएनयू पहुँच गई हूँ...

अपने हॉस्टल के कमरे में...

जहाँ बालकनी से नर्म धूप कमरे तक आती थी

जाडों में आराम से बाल सुखाते हुए, जगजीत की कोई ग़ज़ल सुनते रहते थे

आँखें मूंदे हुए....आवारा ख्याल यूँ ही चहलकदमी करते रहते थे

वो भी क्या दिन थे..उफ्फ्फ

ख़ुद से मुहब्बत हुआ करती थी तब

और आइना कहता था...बा-अदब होशियार :)

तब मुझे काजल लगना बड़ा पसंद हुआ करता था

और कभी कभी शौक़ से बिंदी भी

अब तो जैसे वक्त भागता रहता है

जींस और टी शर्ट डाली और निकल गए

जाने आजकल आईने में कैसी दिखती हूँ

अब कहाँ हो पाती है गुफ्तगू

अब कहाँ वक्त मिलता है

की ढूंढ के एक मनपसंद गीत सुनूँ

फ़िर भी कभी कभी...

ये गीत सुनने का वक्त निकल लेती हूँ...मुझे बेहद पसंद है...

सोचा अकेले सुनने में क्या मज़ा आप भी सुनिए :)

एक शाम सा खुशनुमा और उदास गीत एक साथ।






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