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24 March, 2026

छोटी गोल्ड फ्लेक, दिल पर नन्हे लेकिन मज़बूत टांके लगाने के लिए।

जल्दी ठीक हो जाने के लिए, हर बड़े ज़ख़्म को सिलना पड़ता है। छोटी गोल्ड फ्लेक चाक हुए कलेजे को सिलती है। अगर गहरा ज़ख़्म देख कर तुम्हारे हाथ थरथरायें न तो। ये मत कहो, कि छोटी गोल्ड-फ्लेक ही क्यूँ, कि फिर हम कहेंगे, ठीक होने की इतनी भी जल्दी किसको है, फिर तुम क्यूँ भेज देना चाहते हो ऐसे दुखते कलेजे वाली लड़की को ख़ुद से इतना ज़्यादा दूर…बकवास मत करो, कि एक फ्लाइट की दूरी को दूर थोड़े कहते हैं, पास ही कहते हैं…जब मन हुआ, उड़ कर आ जाना। 

ये चारागर है जिसके पास चुप्पी भी है, बातें भी…कहो, किससे ठीक होना है तुम्हें…या कि गोली देना हो तो वो भी है, गोली खानी हो, तो सो भी है…वन स्टॉप सॉल्यूशन। मर्ज़ अच्छा लगने लगे, इतना अच्छा चारागर।

इस सिगरेट की छोटी साइज पर नहीं जाओ, कि इस ऑपरेशन में ज़्यादा देर लगेगी…मेरे पास वक्त ही वक्त है। देर तक पियेंगे, ढेर सारी, छोटी छोटी गोल्ड-फ्लेक…जब तक कि तुम्हारा कलेजा इतना जलने लगे कि भूल जाओ, किस ज़ख़्म की सिलाई करने बैठे थे। कैसा गर्म मौसम था, तसल्लीबख़्श। स्कूल में जब गर्मी छुट्टी होती थी, करने को कुछ नहीं होता था। नानीघर में गलियों में धूल फाँकते रहते थे या अमरूद के पेड़ पर लटके कौन सा अमरूद कब पकेगा का हिसाब लगाते रहते। जरूरी काम होते थे कि माँझे का धागा बनाने के लिए बल्ब या ट्यूबलाइट मिल जाये, तो कचरे में भी ढूँढने जाते थे कभी कभी। ग़ज़ब डेयरिंग हुआ करते थे उन दिनों। ये गर्मी वैसी ही थी। ये दिल वैसा ही होना चाह रहा था, तुम लोगों के साथ।

हम जो कि मग्गे में कॉफ़ी पीते हैं। तुम्हें मालूम, कमसेकम 350ml तो होनी ही चाहिए। छोटी कप में पीने में मजा नहीं आता। कुल्हड़ वाली चाय भी पीने जाते हैं तो लार्ज या मीडियम। यहाँ ये इत्ता छोटा छोटा काग़ज़ के कप में चाय, जैसे टेस्टिंग कराते हैं, वैसा ही…लेकिन जाते साथ थोड़े समझ आ जाता, कि एक ही बार में मग्गे भर चाय क्यों नहीं पी रहे। ये इत्मीनान की जगह थी। दोहराव की…बचपन में लिखना सीखते हैं तो बार बार एक ही शब्द लिखते हैं। खूब जोर से पेंसिल गड़ा कर नोटबुक में। डेस्क की लकड़ी में डिवाइडर से खुरच खुरच कर…याद करने वाली चीज़ को दोहराव चाहिए होता है, हमेशा।

अपने। तुम मेरे अपने लोग थे। मेरे अपने।

मैंने तुम्हें for-granted लिया। मैंने तुम्हें परेशान होने दिया, अपने लिए। कि ठीक है, आओ तुम भी सुबह सुबह उठ के एयरपोर्ट। ऐसा एक इतवार हो सकता है कि नींद से चोरी करें घंटे-घंटे भर। कि बिना किसी मुद्दे के बात करेंगे हम। कि उलझ जाएँगे किसी एक ही बिंदु पर और तुम झेल लोगे, एक रोज़, थोड़ी देर को…इतना साधिकार कहेंगे, अनाधिकार हो, तो भी सही।

मेरे भीतर दो तरह की कहानियाँ रहती हैं। एक जो फर्स्ट पर्सन में लिखी जाए और दूसरी जो थर्ड पर्सन में लिखी जाए। दोनों कहानियाँ अलग अलग तरह की होती हैं। सच वाली कहानियाँ थर्ड पर्सन में लिखना आसान रहता है और पूरी काल्पनिक कहानी फर्स्ट पर्सन में…लेकिन आसान रहता है, इसलिए जरूरी नहीं हैं कि हम वही चुनें। मेरे भीतर लगातार बोलते रहने वाली कोई एक किस्सागो लड़की रहती है। पंखे के चलने की आवाज़, ट्रैफिक का शोर…जैसे ये वाइट नॉइज़ है, जिसपर हम ध्यान नहीं देते, मेंटली म्यूट कर के चलते हैं, मैं भी कहानी सुनाने वाली इस लड़की को अक्सर अनसुना कर के जी रही होती हूँ। लेकिन कभी कभी लेकिन उसका दिमाग़ एकदम ही ख़राब हो जाता है, it is chaotic…फिर वो मेरे भीतर भूचाल, सूनामी और ज्वालामुखी फटने जैसी प्राकृतिक आपदाएँ बुला लेती है…

उस रोज़ स्टारबक्स जाने का मन नहीं किया था। घर से एक घंटा दूर। बाहर बाहर की सड़कें, बिल्कुल भी शोर नहीं, ट्रैफिक नहीं…मौसम प्लीजेंट…मार्च है, बेहद सुंदर फूल खिले हुए हैं सब जगह। खास तौर से गुलाबी और बैगनी फूलों से ढके हुए पेड़…ताम झाम का क़िस्सा ये था कि कुर्ते की स्लीव थोड़ी सी बाँह पर अटकती थी और हमको लिखते हुए अक्सर हत्थे चढ़ाने की आदत है…कुर्ता पहन कर हम अक्सर लिखने तो नहीं ही जाते हैं…तो पहले fabindia में पिट-स्टॉप लिए…एक अच्छा सा कुर्ता खरीदा, मैचिंग झुमके ख़रीदे और फिर उस कैफ़े गई जहाँ कोई मुझे नहीं जानता।

आसमान में बादल की आउटलाइन सुनहली हो गई थी। शाम से वहाँ बैठ कर नॉवेल का पहला चैप्टर लिखे। सोचे, दोस्त ऐसे होने चाहिए जिनके घर बिना एडवांस नोटिस के जा सकें। जिन्हें बुलाने के लिए जिद मचायें तो वे मान जायें और आ जाएँ चुपचाप…तबीयत अच्छी-ख़राब, ऑफिस का काम, पति की किचकिच, सब छोड़छाड़ के…लेकिन ऐसा कोई है तो नहीं शहर में…फिर क्या ही करते। दिल को समझाने की कोशिश की, वही एक बात, जो इतने साल से समझा रहे हैं…कि वैराग्य भी अभ्यास से आता है। कि हम प्रैक्टिस कर के सीख जाएँगे, किसी की याद में तड़पने के बावजूद उसे बताये बिना जिया जा सकता है। कि कायनात के सामने भीख मांगने की जरूरत नहीं है। कि ये वक़्त गुज़र जाएगा और अभी जिसे एक नज़र देखने के लिए जान जा रही है, वो सामने होगा और तुम उस से दूर रह सकोगी। 

भर दोपहर और शाम कहानी लिखने के बाद किसी दोस्त की बहुत तलब लगती है। जिसे थोड़ी सी कहानी सुनायी जा सके। लेकिन बैंगलोर में मेरी कहानी किसी को समझ में तो आएगी नहीं। कि इतना इंटेंस जीना ही क्यों है…क्या समझायें, कि हमेशा ये ऑप्शन नहीं होता कि एसी के टेम्परेचर की तरह इंटेंसिटी कम ज़्यादा कर सकें…इसका कोई रिमोट नहीं होता.

साथ लाए बैग में सब कुछ था, आईपैड, मैकबुक, तीनों नोटबुक्स, सारी कलमों में फ्रेश इंक, बहुत सारे पोस्टकार्ड्स…और मन में एक गहरा दुःख। ख़त लिखने को दिल किया…वर्ड डॉक्यूमेंट खोल के पढ़ा…इस ख़त पर मेरा नाम नहीं है, सिर्फ़ डियर राइटर…कि मुझे जाने बगैर, सिर्फ़ मेरे शब्दों से मुझे जाने वाला कोई मुझे इतनी प्यारी चिट्ठी लिख सकता है। क़ायदे से तो ऐसे लोगों से कभी मिलना नहीं चाहिए…कि हम तो इतने उलझे हुए, बेसब्र, परेशान से हुए रहते हैं। हमसे मिलने का कोई फ़ायदा नहीं है। टाइमपास भी नहीं, टाइमवेस्ट। ख़त इतनी बार पढ़ चुकी थी, ये भी लगा कि कैसे लोग हैं ना दुनिया में…उन्हें तारीख़ें याद रहती हैं, उन्हें नंबर्स समझ आते हैं…उनका समय तक का हिसाब ठीक है।

एक हम हैं, जिससे कल बिछड़े हैं, लगता है पिछले जन्म में मिलेंगे और दुखता ऐसे है कि अगले जन्म उनसे मिले बिना जीवन लगभग सारा बीत जाएगा। इसी बेनामी ख़त में बहुत सुंदर शेर लिखा मिला था

दुख ऐसा चाहिए कि मुसलसल रहे मुझे
और उस के साथ साथ अनोखा भी चाहिए
इक ज़ख़्म मुझ को चाहिए मेरे मिज़ाज का
या'नी हरा भी चाहिए गहरा भी चाहिए
- जव्वाद शेख 


उसका हिसाब थोड़ा भी पक्का होता तो गिन लेती न, कितने दिन बीते…कितने साल, कितने मौसम, कितने लम्हे…सड़क के साथ चलती नदी में कितना पानी बह गया। बहुत साल पहले हम अजनबी थे, बिल्कुल झूठी बात लगती है हालाँकि। उससे पहली बार मिलने पर भी अजनबी जैसा नहीं लगा कभी। ऊँचे पेड़ों वाले एक छोटे से शहर के किनारे किनारे नदी चलती थी। नदी के किनारे किनारे सड़क। सड़क पर छोटे छोटे पत्थर थे। नदी दिखने से ज़्यादा महसूस होती थी। ऐसा लगता था, कोई नदी बह रही है कहीं।

उस दिन ज़िद पर उतर आई थी कहानियों वाली लड़की, कि इस दिल को एब्सेंस से ज़्यादा presence की लत लग रही है, ऐसे में लतखोर दिल को थूर-थकूच के समझाना जरूरी था कि किसी के होने की आदत मत डालो…किसी को आवाज़ न दो। कोई है नहीं, इस भागते शहर में जो तुम्हारे बुलाने पर आ सके। सुनोगी तो मजबूरियाँ सुनायेंगे लोग तुम्हें, बहाने नहीं। इतना आसान थोड़े होता है तुमसे मिलना। लौंग राइड पर जाने के पहले जैसे बाइकर्स राइडिंग गियर पहनते हैं, वैसे ही तो दिल को पूरी तरह सेफ्टीगियर पहना कर लाना पड़ता है तुमसे मिलने। बहुत ताम-झाम है तुमसे मिलना, ऐसे नहीं होता कि कहो, पाँच मिनट में आ जाओ घर के नीचे, चलो, चाय पीने चलेंगे। उसको काल्पनिक किरदारों से मिलने के पहले पूरा तैयार होना होता था, साड़ी झुमके, बिंदी, परफ्यूम…लेकिन ज़िद इतनी भी होती थी कि बाल न उलझें…उससे कौन मिलेगा बिना तैयारी के…कोई भी नहीं तो। जो तुमसे नहीं मिलते, उनसे मिलने को काहे परेशान होती रहती हो। जो मिलना चाहते हैं, वाक़ई, जाओ उनसे मिल आओ।

मुझे लिखने के पहले बहुत से शहर देखने होते हैं। अहमदाबाद में एक पुरानी, रानी की वाव है। स्टेप-वेल…पत्थर की सीढ़ियों वाला कुआँ। याद नहीं बाओलियों के लिए मुझे इतना प्यार कब से उमड़ा…IIMC के अपने दोस्तों के साथ जब पहली बार एक स्टेपवेल देखी थी, तब से उनका सम्मोहन मेरे भीतर रहता है। मन के भीतर गहरे, कहानियाँ ऐसे ही रहती हैं।

सुबह साढ़े छह की फ्लाइट की टिकट साढ़े चार बजे कटायी…पंद्रह बीस मिनट में बैग पैक किया…और चालीस मिनट की ड्राइव है एयरपोर्ट की, सो बीस मिनट में आए, उड़ते उड़ते…दौड़ते हुए एयरपोर्ट के गेट से अंदर पहुँचे…जब वाक़ई प्लेन बोर्ड कर गए…तो दोनों मित्रों को ह्वाट्सऐप कर दिया, कि हम बोर्ड कर रहे…आ रहे हैं तुम्हरे शहर, लेकिन तुम परेशान मत होना. आराम से लंच पर मिलते हैं. और हमको एकदम ही नहीं लगा था, वे पहुँच जाएँगे.

अराइवल्स में बाहर निकलते ही देखा उन्हें…धूप थी. भली. वे भी. भले.
हम ऐसे मिले जैसे जन्मों के बिछड़े दोस्त हों…जैसे न मिलने का हिसाब किताब हम में से किसी को समझ नहीं आता…गाड़ी में बैठे, हम अपना सामान किसी को उठाने नहीं देते, लेकिन पता नहीं कैसे ये कुछ लोग होते हैं, आई insist वाले…कि मैं जाऊँगा ही नहीं तुम ऐसे बैग उठा के चलोगी तो…दूसरी बार मिल रहे थे। तीन साल हो चुके थे। और ये दोनों मुझे सिर्फ़ मेरे लिखे के कारण जानते हैं, प्यार करते हैं।

नाम लिखने का मन है, लेकिन नाम लेने से दोस्ती को नज़र लग जाएगी, इसलिए लिख नहीं रहे।
मैं, तुम, हम…कितना मुश्किल हो जाता है कभी कभी इन तीनों के साथ किसी किस्से को ज़िंदा करना।

पुरानी सीढ़ियों से उतर कर गई तो बहुत साल बाद उस गंध को पाया जो बचपन में गाँव में कुएँ की मुंडेर पर हुआ करती थी। मेरे गांव के घर में दो कुएँ थे, एक भीतरी आँगन में…एक बाहर गोहाल में, खेत के पास…और एक बड़ा इनारा, अर्थात्, बड़ा कुआं…जहाँ से पीने का पानी लाया जाता था। भीतरी कुएँ पर नहाना, मुँह हाथ धोना, और बर्तन माँजने का काम होता था। उन दिनों बर्तन और हाथ, दोनों राख से माँजे जाते थे।

सीले हुए पानी की गंध…मिट्टी और पुरानेपन की…कहानियों की गंध। ये ख़ुशबू मेरे भीतर अंधड़ की तरह उड़ती है…

मुझे अब अकेले घूमने की आदत हो गई है। दोस्तों की आदत छूट गई है।
रानी की वाव में पाँच तल्ले नीचे उतर कर पानी है। हम तीनों आसपास देखते हुए उतर रहे हैं। नक्काशीदार बलुआ पत्थर ऊपर में देखने से भुरभुरा लगता है। स्पंज की तरह सुराख़दार भी। नीचे के तल उतरने पर पत्थर छूने में खुरदुरा, ठंढा और सीला हुआ है। हम बातें कर रहे हैं। मुझे सब कुछ मायावी लग रहा। surreal, जैसे किसी कहानी के भीतर ही हैं। ऐसी पानी वाली ठंढी जगहों पर अजीब सा हौल फील होता है, सीने में…प्राचीन किसी दुख का होना। आत्मा में कुछ गहरा दुखना। दिल डूबता है।
मैं उन्हें देखती हूँ। सोचती हूँ, कितना अच्छा होता है, शहर में एक दोस्त होना भी।
चामुंडा चलते हैं, तुम्हारे सारे दुखों का इलाज वही है। मैं सोचती हूँ, कैसी जगह होगी…लेकिन कोई इमेज नहीं बनती। हम गाड़ी में जाते हैं…खुली हुई जगह है…मैदान जैसी, कुछ पेड़ हैं…वहीं बीच में बसा हुआ है…यह छोटा सा, चामुंडा. नखलिस्तान ही है. इतवार की सुबह है, एकदम अलसायी सी…लोग टेबल पर बैठे गप्पें कर रहे हैं…कुछ कुर्सियाँ हैं, सतरंगी धागे से बने कुछ छोटे स्टूल हैं…हम तीन कुर्सियों पर बैठ गए हैं…जूते मोजे उतार दिए हैं. पैर स्टूल पर टिका दिए हैं. 

छोटी छोटे काग़ज़ के कप में चाय…छोटी वाली गोल्ड फ्लेक…जेट फ्लेम लाइटर.
मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी ऐसी किसी दोपहर को नहीं जिया है…शायद इसलिए भी कि कॉलेज के दिनों में चाय पीते नहीं थे, न पॉलिटिक्स की ख़ास समझ थी। IIMC में पढ़ते हुए जब लोग चाय पीने टपरी पर निकलते थे, हम ऑलमोस्ट कभी नहीं जाते थे, ढाबा पर जाते थे तो खाने के लिए। चाय, सिगरेट, पॉलिटिक्स, ये तीनों मेरी ज़िंदगी में नहीं थे।
चाय हमको अब भी पसंद नहीं है। जैसे लोग सोशल ड्रिंकिंग करते हैं, वैसे ही हम चाय सिर्फ़ कुछ स्पेशल लोगों के साथ पीते हैं। ये स्पेशल लोग थे। ये स्पेशल सुबह थी।

इतनी बातें हम ख़ुद के लिए लिख रहे हैं, क्यूंकि बाद में सब कुछ भूल जाते हैं हम। दिन जल्दी शुरू करो तो वक्त धीरे बीतता है। ऐसा इतवार बचपन में ही मिलता था। पापा की छुट्टी रहती थी। सुबह रेडियो पर गाने चल रहे होते थे। मम्मी खाना बना रही होती थी। हम दोनों भाई बहन घास खोद रहे होते थे, कभी आलू उखाड़ रहे होते, कभी मटर छील रहे होते। फालतू के काम। झूला झूल रहे होते, दिन दिन भर। गर्मी छुट्टी के दिन।

कितना अच्छा होता है ना, जब किसी से कुछ नहीं चाहिये होता है। फिर जो भी मिलता है, सरप्लस ही होता है। भूख लगी थी ज़ोर से…दो प्लेट वेजिटेबल सैंडविच…खीरा टमाटर प्याज़, हरी चटनी और शायद चाट मसाला. गर्म. ताज़ा. इतना अच्छा स्वाद था. एक छोटू था, फ्लास्क और चाय के कप लिए घूम रहा था…हर कुछ देर में चाय पिला जाता था। 

कितने इत्मीनान से बैठे थे। कितनी सारी बातें थीं। बातें ही बस। लगातार चाय, सिगरेट, गप्प…लूप में. पानी की बोतलें. कहीं कोई शोर नहीं। कोई संगीत नहीं। कोई ackwardness नहीं…इतना सहज…जैसे कितने पुराने दोस्त हों. जैसे हम महीने की दो तीन इतवार तो वहीं पाये जाते हैं. ऐसी जगह, ऐसे लोग…कि अचानक से उस शहर में रहने को मन करने लगे। कितना कम चाहिए एक शहर से, लेकिन इतने पार्टिक्युअलर, कि बैंगलोर में सब कुछ मिलता…एक ऐसी दोपहर, एक ऐसी टपरी, दो ऐसे दोस्त और इतनी सारी बातें नहीं मिलतीं। इतना सा ही तो चाहिए, लेकिन। यही चाहिए। कोई और कॉम्बिनेशन नहीं।

कोई सिगरेट जला के पी हो, सो याद नहीं…जली हुई सिगरेट माँग माँग के पीते रहे…ये अलग था…ये अजब था…ये भीतर की किसी आग को बुझाता था…कोई दुख पे मरहम करता था। लोग क्यों पीते हैं सिगरेट, मालूम नहीं। हम हमेशा दोस्तों के साथ सिगरेट पीते हैं। सिगरेट अपने आप में एक किरदार है। किसी एक बार की सिगरेट, किसी दूसरे बार की सिगरेट जैसी नहीं होती। किसी एक दोस्त के साथ पी हुई सिगरेट, किसी दूसरे दोस्त के साथ पी हुई सिगरेट जैसी नहीं होती। हम अपने घर में बैठे, कभी सिगरेट पी भी रहे हैं तो ऐसे किसी रोज़ को याद करते हुए ही पी रहे। इत्ती इति सी गोल्ड फ्लेक…छोटी गोल्ड फ्लेक…कड़वी गोल्ड फ्लेक…दिल को जलाती, बुझाती…चारागर।

इम्पॉसिबल था यहाँ होना…ऐसे कैसे अचानक से खिंच के चले आए ना.
उसने ख़त में दिनों की गिनती लिखी थी…आख़िरी बार मिले हुए कितने दिन हुए.

मुझे रश्क हुआ उन दोनों से…कितना आसान था उनके लिए यहाँ होना…कितना मुश्किल और कितना rare है मेरे लिए, जो कितनों को सरलता से मिलता है।

जाना जितना आसान लग रहा था। लौटना उतना ही मुश्किल था।
गाड़ी से उतर कर गले लगे…गेट की ओर लौटे…दिल नहीं भरा…लौट लौट कर जाना चाहता था दिल. ये कौन से लोग हैं जो मुझ टूटे फूटे इंसान से इतना प्यार कर सकते हैं…तो क्या शहर की बात है? Bangalore finds me difficult to love. Impossible to love.
एक बार विदा करने के बाद, वो फिर से दौड़ कर साथ आई। गेट तक। हम दो बार गेट से लौटे। मैं वहाँ खड़ी उसे दूर जाते देखती रही। जब तक वो भीड़ में गुम नहीं गई।

मन नहीं भरा। मन कभी नहीं भरेगा।
फ़्लाइट में रोते सुबकते आई। मेरा कोई मायका है नहीं। बिन माँ की लड़कियों का मायका नहीं होता। लेकिन कभी कभी ज़िंदगी हमें ऐसे लोग दे देती है, जिनके पास हम लौट सकेंगे, ऐसा भरोसा होता है। कि वे हमारा इंतज़ार करेंगे। That they can love us in our worst form. That I can take them for-granted. हमेशा माँगते हुए ज़रूरत भर को हाथ फैलाने वाले हम, किफ़ायती लोग। ज़िंदगी उदार हो कर भेजती है, दोस्त, जान से प्यारे…जो बाँहें खोलते हैं और हमें समेट लेते हैं।

दिल दुखता है। लेकिन इसलिए कि भरा-भरा है।
और कुछ भी पूरी तरह ख़राब नहीं होता। सिगरेट भले बुरी चीज़ है, लेकिन हमारे लिए मरहम है।

ज़िंदगी के सबसे सुंदर मोमेंट्स की कभी तस्वीर नहीं होती। उससे बोला, चामुंडा की एक फोटो भेज दो…उसने जो भेजी है, उसमें एक कुर्सी पर बैग है, दो खाली कुर्सियाँ हैं…टेबल पर एक सिगरेट का पैकेट है…एक कप चाय.
मैंने अपनी ज़िंदगी में इससे उदास तस्वीर नहीं देखी।

दुनिया बदल रही है। हम जाने कब मिलेंगे फिर। लेकिन इस बदलती दुनिया में, मिल लिए। ये अच्छा है।
और अच्छे से ज़्यादा, ये काफ़ी है। 

03 December, 2018

Au revoir, Paris. फिर मिलेंगे!

 सोचो, जो पेरिस पूछे, कि पूजा, तुम हमसे प्यार क्यूँ नहीं करती, तो कुछ कह भी सकोगी?

उसकी बहुत पुरानी चिट्ठी मिली थी, घर में सारा सामान ठीक से रखने के दर्मयान। हमने बहुत साल बाद बात की। उसने कहा, नहीं हुआ इस बीच किसी से भी 'उस तरह' से प्यार। प्यार कभी ख़ुद को दोहराता नहीं है, लेकिन अलग अलग रंगों में लौट कर आता ज़रूर है।

मैं दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत शहर में हूँ। इमारतें, मौसम, लोग, संगीत, कला... सब अपनी परकाष्ठा पर हैं। कविता जैसा शहर है। लय में थिरकता हुआ। बारिश में भीगता है तो इतना ख़ूबसूरत लगता है कि कलेजे में दुखने लगे। छोड़ कर आते हुए हूक सी लगती है। लौट कर आना चाहते हैं हम, इस शहर में रहते हुए भी।

भाषा की अपनी याददाश्त होती है। दिन भर आसपास फ़्रेंच सुनते हुए उसकी याद ना आए, ये नामुमकिन था। मैंने पहली बार उसी को फ़्रेंच बोलते सुना था। वो लड़का जिसने पहली बार मुझे ‘je t’aime’ का मतलब बताया था, कि i love you और कि जिससे कभी फ़्रेंच में बात करने के लिए मैं फ़्रेंच सीखना चाहती थी। कि फ़्रान्स के इस नम्बर से उसे फ़ोन करने का मन कर रहा है। कहूँ इतना, vous me manques. फिर याद आता है कि उससे दूर होने के सालों में कितना कुछ सीख गयी हूँ मैं। कि उसे vous नहीं, tu कहूँगी… कि फ़्रेंच में भी हिंदी की तरह इज़्ज़त देने के लिए आप जैसी शब्दावली है। फिर ये भी तो, कि तुम्हारी याद आ रही है नहीं, फ़्रेंच में कहते हैं मेरी दुनिया में तुम्हारी कमी है। मैं सोचती हूँ। कितनी कमी रही है तुम्हारी। ज़रा सी, दोस्ती भर? एक्स फ़्रेंड्ज़ जैसा कुछ, अजनबी जैसा नहीं।

शाम में चर्च की घंटियाँ सुनायी देती हैं। बारिश के बाद की हवा में धुल कर। शहर के बीच बहती नदी पर पेड़ों की परछाइयाँ भीग रही हैं। सुनहला है सब कुछ...याद के जैसे रंग का पीलापन लिए हुए। मैं अब लगभग किसी को भी पोस्टकार्ड नहीं लिखती। बस एक दोस्त को आने के पहले ही दिन लिखे बिना रहा नहीं गया। ‘मोने के रंग हर शहर में साथ होते हैं, ख़ूबसूरती का अचरज भी’।

सामान बंध गया है। टेबल पर दो गुलाब के फूल हैं। थोड़े से मुरझाए। चार दिन पुराने। गहरे लाल रंग के फूल। हल्की ख़ुशबू, पुरानेपन की... अच्छे पुरानेपन की, अपनेपन वाली... जैसे पुराने चावल से आती है या वैसे रिश्तों से जो नए नहीं होते हैं। मैं इन्हें ले नहीं जा सकती। ये मेरे मन में रह जाएँगे, इसी तरह... अधखिले।


शाम से बारिश हो रही थी, लेकिन इतनी हल्की कि छतरी ना खोलें। एफ़िल टावर के पास पहुँचते पहुँचते हल्का भीग गयी थी। रास्ते में एक बड़े सूप जैसे बर्तन में कुछ खौलाया जा रहा था और उसकी ख़ुशबू आ रही थी। दालचीनी, लौंग और कुछ और मसालों की...देखा तो पता चला कि गरम वाइन है। तब तक हाथ ठंडे हो गए थे और आत्मा सर्द। खौलती वाइन चाय के जैसे काग़ज़ के कप में लेकर चले। हल्की फूँक मार मार के पिए और ज़िंदगी में पहली बार महसूस किए कि गर्म वाइन पीने से सर्द आत्मा पिघल जाती है। बहुत शहर देखे हैं, ऐबसिन्थ, ब्लू लेबल, वाइन, शैम्पेन, कोनियाक... बहुत तरह की मदिरा चखी है लेकिन वो सब शौक़िया था। पहली बार महसूस किया कि ठंड में कैसे किसी भी तरह की ऐल्कहाल काम करती है। वो अनुभव मैं ज़िंदगी में कभी नहीं भूलूँगी। वाइन ख़त्म होते ही ठंड का हमला फिर हुआ। एफ़िल टावर पर तस्वीर खींच रहे थे तो मैं इतना थरथरा रही थी कि मोबाइल ठीक से पकड़ नहीं पा रही थी।

यूँ, कि आज शाम ऐसी ठहरी थी कि लगता था कोई पेंटिंग हो। कि जैसे ये रंग कभी फीके नहीं पड़ेंगे। पानी पर परछाईं जो किसी तस्वीर में ठीक कैप्चर हो ही नहीं सकती... कि मोने होता तो शायद घंटों पेंट करता रहता, इक ज़रा सी शाम।

मैं लिख रही हूँ कि इस पल को रख सकूँ ज़िंदा, हमेशा के लिए। कि इस लम्हे का यही सच है। मैं कितने कहानियों में जीती हुयी, उन सब लोगों को याद कर रही हूँ जिन्हें मैंने चिट्ठियाँ लिखी हैं… जिन्हें मैं पोस्टकार्ड भेजना चाहती हूँ। कि बिना पोस्टकार्ड गिराए जैसे छुट्टी अधूरी रह जाती है।

अब जब कि लगभग छह घंटे में यह शहर छूट जाएगा, मैं सोचती हूँ एकदम ही सिंपल सी बात… ज़रूरी नहीं है कि जो सबसे ख़ूबसूरत, सबसे अच्छा, सबसे… सबसे... सबसे superlative वाला हो… हमें उसी से प्यार हो। हमें किसी की कमियों से प्यार होता है। किसी के थोड़े से टूटे-फूटे पन से, अधूरेपन से… कि वहाँ हमारी जगह होती है। पर्फ़ेक्शन को दूर से देखा जा सकता है, प्यार नहीं किया जा सकता। या कि हमें प्यार कब होता है, हम कह नहीं सकते। तो पेरिस शायद दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत शहर हो। मैं प्यार सिर्फ़ दिल्ली और न्यू यॉर्क से ही करती हूँ। मैं उनके ही मोह में हूँ। पाश में हूँ।

तो पेरिस, मुझे माफ़ करना, तुमसे प्यार न कर पाने के लिए। तुम दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत शहर हो, लेकिन मेरे नहीं हो। और कि तुम मेरे बहुत कुछ हो..., बस महबूब नहीं हो... कि मेरे दिल पर किसी और की हुकूमत चलती है।

फिर मिलेंगे। Au revoir! 

31 October, 2016

बसना अफ़सोस की तरह। सीने में। ताउम्र।

अलग अलग शौक़ होते हैं लोगों के। मेरा एक दिल अज़ीज़ शौक़ है इन दिनों। अफ़सोस जमा करने का। बेइंतहा ख़ूबसूरत मौसम भी होते हैं। ऐसे कि जो शहर का रंग बदल दें। इस शहर में एक मौसम आया कि जिसे यहाँ के लोग कहते हैं, ऑटम। फ़ॉल। देख कर लगा कि फ़ॉल इन लव इसको कहते होंगे। वजूद का सुनहरा हो जाना। कि जैसे गोल्ड-प्लेटिंग हो गयी हो हर चीज़ की। गॉथेन्बर्ग। मेरी यादों में हमेशा सुनहरा।

यहाँ की सड़कें यूँ तो नोर्मल सी ही सड़कें होती होंगी। बैंगलोर जैसी। दिल्ली जैसी नहीं की दिल्ली की सड़कों से हमेशा महबूब जुड़े हैं। यारियाँ जुड़ी हैं। मगर इन दिनों इन सड़कों पर रंग बिखरता था। सड़कों पर दोनों ओर क़तार में सुनहले पेड़ लगे हुए थे। मैंने ऐसे पेड़ पहली और आख़िरी बार कश्मीर में देखे थे। तरकन्ना के पेड़। ज़मीन पर गिरे हुए पत्तों का पीला क़ालीन बिछा था। हवा इतनी तेज़ चलती थी कि सारे पत्ते कहीं भागते हुए से लगते थे। उस जादुई पाइप प्लेयर की याद आती थी जिसने चूहों को सम्मोहित कर लिया था और वे उसके पीछे पीछे चलते हुए नदी में जा के डूब गए थे। ये पत्ते वैसे ही सम्मोहित सड़कों पर दीवाने हुए भागते फिरते थे। इस बात से बेख़बर कि ट्रैफ़िक सिग्नल हरा है या लाल। उन्हें कौन महबूब पुकारता था। वे कहाँ खिंचे चले जाते थे? मुझे वो वक़्त याद आया जब याद यूँ बेतरह आती थी जब कोई ऐसा शहर पुकारता था जिसकी गलियों की गंध मुझे मालूम नहीं।

कई दिनों से मेरा ये आलम भी है कि सच्चाई और कहानियों में अंतर महसूस करने में मुश्किल हो रही है। दिन गुज़रता है तो यक़ीन नहीं होता कि कहीं से गुज़र कर आए हैं। लगता है काग़ज़ से उतर कर ज़िंदा हुआ कोई शहर होगा। कोई महबूब होगा सुनहली आँखों वाला।

हम जिनसे भी कभी मुहब्बत में होते हैं, हमें उनकी आँखों का रंग तब तक याद रहता है जब तक कि उस मुहब्बत की ख़ुशबू बाक़ी रहे। याने के उम्र भर।

शहर की सफ़ाई करने वाले कर्मचारियों ने पीले पत्ते बुहार कर सड़क के किनारे कर दिए थे। तेज़ हवा चलती और पत्ते कमबख़्त, बेमक़सद दौड़ पड़ते शहर को अपनी बाँहों में लिए बहती नदी में डूब जाने को। मैं किसी कहानी का किरदार थी। तनहा। लड़की कोई। उदास आँखों वाली। लड़की ने एक भागते पत्ते को उठाया और कहा तुम सूने अच्छे नहीं लगते और उसपर महबूब का नाम लिखा अपनी नीली स्याही से। पत्ते को बड़ी बेसब्री थी। हल्के से हवा के झोंके से दौड़ पड़ा और पुल से कूद गया नीचे बहते पानी में। जब तक पत्ता हवा में था लड़की देखती रही महबूब का नाम। नदी के पानी में स्याही घुल गयी और अब से सारे समंदरों को मालूम होगा उसके महबूब का नाम। मैंने देखा लड़की को। सोचा। मैं लिखूँ तुम्हारा नाम। मगर फिर लगा तुम्हारे शहर का पता बारिशों को नहीं मालूम।

लड़की भटक रही थी बेमक़सद मगर उसे मिलती हुयी चीज़ों की वजह हुआ करती थी। धूप निकली तो सब कुछ सुनहला हो गया। आसमान से धूप गिरती और सड़क के पत्तों से रेफ़्लेक्ट होती। इतना सुनहला था सब ओर कि लड़की को लगा उसकी आँखें सुनहली हो जाएँगी। उसे वो दोस्त याद आए जिनकी आँखों का रंग सुनहला था। वो महबूब भी। और वे लड़के भी जो इन दोनों से बचते हुए चलते थे। शहर के पुराने हिस्से में एक छोटे से टीले पर एक लाल रंग की बेंच थी जिसके पास से एक पगडंडी जाती थी। उसे लगा कि ये बेंच उन लड़कों के लिए हैं जिन्हें यहाँ बैठ कर कविताएँ पढ़नी हैं और प्रेम पत्र लिखने हैं। ये बेंच उन लोगों के लिए हैं जिनके पास प्रेम के लिए जगह नहीं है।

ये पूरा शहर एक अफ़सोस की तरह बसा है सीने में। ठीक मालूम नहीं कि क्यों। ठीक मालूम नहीं कि क्या होना था। ठीक मालूम नहीं कि इतना ख़ूबसूरत नहीं होना था तो क्या होना था। उदास ही होना था। हमेशा?

हाथों में इतना दर्द है कि चिट्ठियाँ नहीं लिखीं। पोस्टकार्ड नहीं डाले। ठंढे पानी से आराम होता था। सुबह उठती तो उँगलियाँ सूजी हयीं और हथेली भी। कुछ इस तरह कि रेखाओं में दिखते सारे नाम गड़बड़। डर भी लगता। कहीं तुम्हारा नाम मेरे हाथों से गुम ना जाए। जब हर दर्द बहुत ज़्यादा लगता तो दोनों हथेलियों से बनाती चूल्लु और घूँट घूँट पानी पीती। दर्द भी कमता और प्यास भी बुझती।

वो दिखता। किसी कहानी का महबूब। हँसता। कि इतना दुःख है। काश इतनी मुहब्बत भी होती। मैं मुस्कुराती तो आँख भर आती। हाथ उठाती दुआ में। कहती। सरकार। आमीन। 

18 February, 2016

डैलस डायरी: God is a postman.

परसों डैलस आई हूँ. ये डैलस में मेरा तीसरा ट्रिप है. डैलस न्यूयॉर्क की तरह नहीं है कि जिसमें रोज़ रोज़ कुछ नया होता रहे ऐसा कहते हैं लोग. कुछ को आश्चर्य भी होता है कि मैं बोर कैसे नहीं होती. मैं करती क्या हूँ दिन दिन भर. ये रोजनामचा उनके लिए लिख रही हूँ, और खुद के लिए भी. इसमें बहुत कुछ सच होगा और उससे ज्यादा झूठ. ये दिनों का सिलसिलेवार ब्यौरा नहीं है ये मेरे मन में खुलती एक खिड़की है...कि मैं अपने जिस घर में तकरीबन पिछले आठ सालों से रह रही हूँ उसको जाता हुआ एक स्ट्रीट लैम्प है...मैं कई बार उसके नीचे खड़ी होकर उस स्ट्रीट लैम्प को ऐसे देखती हूँ जैसे पहली बार देख रही हूँ. एक ही रास्ते पर कई बार गुज़रते हुए भी रास्ता वही नहीं होता. हम वो देखते हैं जैसी हमारी मनः स्थिति रहती है. कि मुझे चीज़ों को देख नहीं सकती...मैं अक्सर उनसे गुज़रती रहती हूँ. 

बैंगलोर से डैलास लगभग चौबीस घंटे का सफ़र हो जाता है. जेट लैग के कारण पहला दिन तो पूरा ही सोते हुए बीतता है. हम डैलस के टाइम के हिसाब से कोई २ बजे दोपहर को होटल में आये. खाना मंगवाया. वेज फ्राइड राइस में अंडा डाल दिए थे लोग. हर जगह वेज का अलग अलग डेफिनेशन होता है. थक गए थे. खाना नहीं खाए. सो गए. दोपहर के 3 बजे के सोये हुए पूरी शाम सोते रहे और अगली भोर 4 बजे भूख से नींद खुली. दो वक़्त का खाना मिस हो गया था. कुछ बिस्किट वगैरह खा के घर वालों के पास रोना रो रहे थे कि इस होटल के पास खाने वाने को कुछ नहीं है. भूख से मर रहे हैं वगैरह. उसपर पानी भी खरीद के नहीं लाये थे और कल यहाँ इन लोगों ने हॉट वाटर सिस्टम की सफाई वगैरह की थी...तो नल से काला पानी आ रहा था. तो प्यासे भी मर रहे थे.  
फिर कमरे की खिड़की से पर्दा हटा के झांके तो देखते है कि भगवान् ने पूरा पूरा पेंट का डिब्बा ही उलट दिया है आसमान पर. बाहर मौसम में ठंढक होगी लेकिन हम दीवानों की तरह बाहर भागे. मोबाइल फोन और कमरे की चाभी के साथ. उफ़. क्या ही सुबह ही. गहरे गुलाबी और फिरोजी रंग की. ठंढ थोड़ी से ज्यादा. मैं बाँहें फैलाए नाच रही थी गोल गोल गोल. कितना सुन्दर...ओह कितना सुन्दर...पूरा पूरा आसमान... ठंढी हवा अच्छी लग रही थी. ताजगी भरी. ओसभीगी. 

साढ़े छः बजे नाश्ता और पानी दोनों मिला. खाने का असल स्वाद भूख से आता है. थोड़े से फल. पैनकेक. एक स्लाइस ब्रेड और दो कप अच्छी कॉफ़ी. बगल वाली टेबल पर हिन्दुस्तानी लड़के हिंदी में बतिया रहे थे. 'गर्म कपड़े पहन लेना आज, मेरी कल लंका लग गयी थी'. मैं बैंगलोर में हिंदी के लिए तरसती रहती हूँ और हिंदी मुझे मिलती है यहाँ डैलस में आ के. मन किया उनसे बात करने का. मगर फिर लगा पता नहीं क्या सोचेंगे. तो रहने दिया. 

कुछ दोस्तों को फोन किया. पर मन किसी में लग नहीं रहा था. गुलाबी सुबह का जादू मन पर चढ़ रहा था. नोटबुक में कुछ कहानियां लिखी हुयी थीं. खुले आसमान के नीचे रेत पर बाल खोये सोयी हुयी एक लड़की. किसी के साथ सिर्फ तारे देखना चाहती थी. पूरी रात. बिना एक शब्द कुछ भी कहे हुए. उससे पूछा. ऐसी भी होती है क्या मुहब्बत? रूह का होना महसूस कैसे होता है. कभी हुआ है कि तुम्हारी आँखों का देखा हुआ कुछ किसी के शब्दों को छू जाए. क्लॉउडे मोने और कर्ट कोबेन और कभी कभी संगीत का कोई टुकड़ा ऐसा ही होता है. रूह की भाषा में बोलता हुआ. कुछ तो है बाबू. कौन कहता है? सिगरेट. धुआं भरता जाता है मेरे कमरे में कहीं. धूप जैसा. मैं सुनना चाहती हूँ. कहना चाहती हूँ. मैं होना चाहती हूँ एक मुकम्मल लम्हा. 

दोपहर को वालमार्ट जा के बहुत सा खाने और पीने का सामान लायी हूँ. कटे हुए आम की फांकें. खरबूजा. चेरी. स्ट्रॉबेरी. ब्लूबेरी. पीच(आडू). कुछ रेडी टू ईट जैसा भी कुछ. सलाद. चिप्स. बहुत सा कुछ. इस होटल में शटल सर्विस सिर्फ ग्यारह बजे तक है लेकिन जो मुझे ड्राप करने गया था, उसने कहा वो मुझे पिक भी कर लेगा. मैंने जब कॉल किया तो होटल में जिसने फोन उठाया वो बोली कि अभी पिक नहीं कर सकते, लेकिन पीछे से उसकी आवाज़ थी...उसे हाँ बोल दो...मुझे पिक करने जो लड़की आई उसका नाम शायला था. मैं उससे बातें करती आई पूरे रास्ते. मुझे अच्छा लगता है ऐसे गप्पें मारना. कमरे में आई तो धूप इतरा रही थी. कमरे पर कब्जा जमा के. मैंने अपने लिए माइक्रोवेव में पास्ता गर्म किया. मैं धूप के साथ कुछ भी खा सकती हूँ. फीका, बेस्वाद ब्रोकली वाला पास्ता भी.

डैलस में जहाँ रहती हूँ उसे रिचर्डसन कहते हैं. अमेरिका में डाउनटाउन का कांसेप्ट है. जैसे कि शहर है डैलस. उसके इर्द गिर्द बहुत सारे छोटे छोटे रिहाइशी इलाके बने हुए हैं जहाँ पर लोग रहते हैं जैसे रिचार्डसन, प्लानो. ऑफिस या बिजनेस के लिए लोग डाउनटाउन जाते हैं और फिर लौट के घर कि जो शहर के बाहर बसा होता है. मैं पिछले दो बार से जब भी आई थी हयात रीजेंसी में ठहरी थी जो कि एक होटल है. इस बार मैं एक स्टूडियो सेट-अप में ठहरी हूँ. यहाँ पर एक कमरा. एक छोटा सा लिविंग एरिया जिसमें टीवी, स्टडी टेबल और एक सोफा है. इसके अलावा एक छोटा सा किचेन है. 

होटल से पोस्ट ऑफिस सर्च किया तो देखा कि सबसे पास का पोस्ट ऑफिस लगभग ढाई किलोमीटर दूर था. यहाँ पर दूरी माइल में नापी जाती है. तो लगभग १.५ माइल. आना जाना मिला कर लगभग ५ किलोमीटर. रिसेप्शन पर बंदी थोड़ा चकित हुयी कि मैं इतनी दूर पैदल आना जाना चाहती हूँ. ये एरिया मेरे होटल से पीछे की तरफ से रास्ते में था. रिचार्डसन में भी इस इलाके में मैं कभी नहीं गयी थी. इस बार ख़ास मुश्किल ये थी कि आईफोन नहीं है तो विंडोज फोन का इस्तेमाल कर रही हूँ और मुझे गूगल मैप्स की आदत है. इस फोन में मैप्स हर बार स्क्रीन लॉक होते ही बंद हो जाता था और मुझे फिर से सर्च करना पड़ता था. 

यहाँ से रास्ता ढलवां था. मेरा अब तक डैलस का अनुमान था कि ये एकदम फ़्लैट सतह पर बना हुआ है और यहाँ बिलकुल ही चढ़ाई या उतार नहीं हैं. मगर यहाँ सामने पहाड़ी इलाका जैसा महसूस हो रहा था. दूर दूर तक पसरी हुयी ढलवां वादी...छोटे छोटे पहाड़ीनुमा टीले. सड़क पर तरतीब से कतार में बने हुए छोटे छोटे घर. घरों के सामने पुराने पेड़. कमोबेश हर पेड़ पर झूले. झूलों की संख्या से अंदाज़ा लग जाता था कि घर में कितने बच्चे हैं और किस ऊंचाई के हैं. हर घर के सामने बैठने का छोटा सा हिस्सा कि जिसमें कुर्सियां लगी हुयीं. अधिकतर घरों के आगे ज़मीन में खूबसूरत पौधे लगे थे. 

घरों के ख़त्म होने के बाद दोनों ओर पेड़ों का जंगल शुरू हो गया. पतझर के दिन हैं. कहीं एक भी हरा पत्ता भी नहीं दिख रहा था. सूखे पेड़ों के पीछे गहरा नीला आसमान दिखता था. एक पुल आया. पुल के नीचे एक छोटी सी पहाड़ी नदी बह रही थी. बिलकुल पतली सी धारा थी शांत पानी की मगर उसमें परिवर्तित होते पेड़ और गहरा नीला आसमान. सब इतना खूबसूरत था क्योंकि अप्रत्याशित था. मैंने सोचा भी नहीं था कि रास्ता ऐसा खूबसूरत पहाड़ी रास्ता होगा कि जिसमें शांत पेड़, चुप पानी और सांस की तरह साथ चलती हवा के झोंके होंगे. रेडियो पर जॉर्ज माइकल का केयरलेस व्हिस्पर बज रहा था. कुछ जैज़ भी बजता रहा था जो मैंने कभी सुना नहीं था. रेडियो जॉकी की खुशनुमा आवाज़ थी. धूप जैसी. मैं उस पुल पर खड़ी सोच रही थी कि जिंदगी कितनी खूबसूरत है. कि अनजाने रास्तों पर चलने में कितना सुकून है. 
पोस्ट ऑफिस पहुंची तो देखा कि वो सरकारी अमेरिकन पोस्ट ऑफिस नहीं है. उस इलाके की चिट्ठियां पहुँचाने के लिए एक प्राइवेट पोस्ट वाली सर्विस है. मगर वहां पर कुछ बेहतरीन कार्ड्स थे. चीनी मिट्टी की खूबसूरत कलाकृतियाँ थीं. कोई लोकल आर्टिस्ट थी जिसने बनाया था सब. फूलों वाले प्लेट. गोथिक स्टाइल की ऐशट्रे और ऐसी ही कुछ चीज़ें. वहाँ बहुत देर तक चीज़ों को देखती रही और सोचती रही कि मेरे दोस्तों में किसे कौन सी चीज़ पसंद आएगी. अगर मैं वाकई खरीद के ले जा सकती तो इनमें से कौन सी चीज़ें खरीदती. दोस्तों को हम वाकई अपने दिल में बसाए चलते हैं. चीज़ें इतनी दूर से लाने में टूट जातीं वरना कुछ तो इतनी खूबसूरत थीं कि छोड़ने का मन न करे. वहां हैण्डमेड साबुन थे. कमाल की खुशबू वाले. मैंने ऐसे साबुन कभी देखे ही नहीं थे. एक कार्ड ख़रीदा और एक साबुन कि जिससे लेमनग्रास जैसी कोई गंध आती थी. 

दुनिया जितनी बाहर है उतनी ही अन्दर भी है. एक अल्टरनेट दुनिया. वापसी में मैं उन चीज़ों के बारे में सोचती रही. गहरे हरे-नीले-भूरे रंग की ऐश ट्रे. सिगरेट की तलब उट्ठी बहुत जोर की और याद का एक खुशबूदार हवा का झोंका साथ साथ चलने लगा. बालों को उलझाते हुए. मैं उसकी उँगलियाँ तलाशने लगीं कि बालों को सुलझा दे, हौले से. इक नन्ही सी पीली गोली जुबान पर रक्खी. उससे जादू का इक स्वाद घुलने लगा और मैं इस दुनिया में होती हुयी भी ख्वाबों में जीने लगी. यहाँ सेटिंग तो सारी डैलस की थी मगर लोग मेरी पसंद के थे. उसने सिगरेट के तीन कश लेकर मेरी ओर बढ़ाई तो आँख भर आई. फिर देखा कि कोई धुंआ नहीं है. शायद आँखों में धूल पड़ गयी थी. सोचा कि उसे बताऊँ कि ये शहर चिट्ठियां लिखने के लिए बहुत मुफीद है. इन खूबसूरत पेड़ों के नीचे बैठ कर पानी की गंध छूते हुए ख़त लिखेंगे तो उनसे तिलिस्म का दरवाजा खुल जाएगा. 

सूखे हुए पेड़ों की टहनियां कुछ यूं फैली हुयी थीं कि जैसे किसी ने बाँहें फैलाई हों. टहनियों पर धूप पड़ रही थी और उनके सिरे एकदम सुनहले लग रहे थे. आसमान में चाँद का आधा टुकड़ा भी था. साथ साथ चलता. एक जगह बैगनी फूल खिले हुए दिखे. उन्हें देख कर याद का कोई रंग टहका सीने में कहीं. मैं पूरे रास्ते तसवीरें खींचती आई थी. कमरे पर आई तो भूख लग गयी. चेरी धो कर बाउल में रखी. खिड़की से धूप अन्दर आ रही थी. मैं धूप में अपने लिए एक छोटा सा कुशन रख कर दीवार से टिक कर बैठी थी. किताब, कागज़ और अपनी कलमों के साथ. डूबते सूरज और चेरी का मीठा कत्थई स्वाद जुबां पर. 

आसमान में फिर से गहरे गुलाबी और फिरोजी रंग के बादल थे. मैंने इतनी खूबसूरत शाम बहुत दिनों बाद देखी थी. यहाँ सब खुला खुला भी था. मैं गोल गोल घूम कर शाम के रंग देखती जाती. ऐसा महसूस होता कि खुदा एक कासिद है. मेरे सारे ख़त पहुँच जाते हैं तुम तक. और कि ये दुनिया जिसने इतनी सुन्दर बनायी. उसने तुम्हारा मन बनाया होगा. मन. खुद को देखती हूँ इन रंगों में डूबी हुयी. इतनी खूबसूरती में भीगती. सुकून से भरा भरा महसूसती हूँ को. मुहब्बत से भरा भरा भी. 

25 November, 2015

द राइटर्स डायरी: आस्था की लौ...आत्मा को रौशन करती हुयी

इस साल मैं पहली बार अमेरिका गयी हूँ. पहला शहर जो मैंने देखा वो डैलस था. हयात वाले होटल के पाँच माइल के रेडियस में कार की सर्विस देते हैं...कहीं भी आने जाने के लिए. रिचर्डसन के जिस एरिया में मैं ठहरी थी वहाँ से दो तीन चर्च दिखते थे. मैं अपने पहले दिन इत्तिफाकन उनमें से दो के पास गुजरी, सोचा कि यहाँ के चर्च भी देख लेते हैं. इसके पहले यूरोप गयी हूँ या फिर थाईलैंड...दोनों जगह क्रमशः चर्च और मंदिर हमेशा खुले हुए ही देखे हैं. यूरोप का कोई छोटे से गाँव में छोटा सा चैपल भी होता है तो भी उसके दरवाज़े खुले होते हैं. अपने देश का तो कहना ही क्या...यहाँ भी लगभग सारे मंदिर सारे वक़्त खुले ही रहते हैं. तो मैं चर्च के मेन दरवाज़े पर पहुंची. वो बंद था. फिर मुझे लगा कि शायद कहीं कोई छोटा दरवाज़ा होगा तो वो भी बंद मिला. मैंने सोचा कि ये एक चर्च बंद है...चलो कोई बात नहीं, किसी दूसरे में चले जायेंगे. अगली बार शटल से जाते हुए जो ड्राईवर थी, कैरोलिन, उससे पूछे कि यहाँ कोई चर्च है जो खुला होगा...कल मैं इस बगल वाले में गयी तो बंद था. वो पहले तो इस बात पर बहुत चकित हुयी कि मैं हिन्दू हूँ तो मुझे चर्च क्यूँ जाना है. तो उसे पूरे रास्ते मैं ये समझाती आई कि हमारे यहाँ किसी भी धर्म के पूजा स्थल पर जा सकते हैं. हम घूमते हुए चर्च भी चले जाते हैं, मज़ार भी और बौद्ध या जैन मंदिर भी. (एक मन तो किया कि उसको DDLJ दिखा दें. काजोल को देख कर अपनेआप समझ में आ जाएगा उसको.

बात परवरिश और स्कूल/कॉलेज की भी है. मेरी पढ़ाई देवघर में कान्वेंट स्कूल में हुयी. जैसी कि मेरे जान पहचान के अधिकतर लोगों की हुयी है. घर परिवार में भी, लगभग सारे बच्चे ऐसे ही इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़े हैं. सेंट फ्रांसिस, डॉन बोस्को, लोयोला हाई स्कूल...मेरे स्कूल में अधिकतर टीचर्स केरल से आये थे. कुछ सिस्टर्स वगैरह थीं और कुछ लोकल टीचर्स भी. हम स्कूल असेम्बली में 'त्वमेव माता' भी गाते थे और 'देयर शैल बी शावर्स ऑफ़ ब्लेसिंग्स' भी गाते थे. 'इण्डिया इज माय कंट्री...आल इंडियंस आर माय ब्रदर्स एंड सिस्टर्स' वाला प्लेज भी लेते थे. इसके बाद अक्सर 'आवर फादर इन हेवेन होली बी योर नेम' पढ़ते थे...और फिर क्लास्सेस शुरू होती थीं. हमारी प्रिंसिपल पहले सिस्टर जोस्लेट और फिर सिस्टर कैरोलीन रही थीं. हमने उन्हें हमेशा सादगी से रहते और पढ़ाई के प्रति बहुत सिंसियर देखा था. हममें से अधिकतर की आइडियल हमारी प्रिंसिपल होती थीं. पटना में मेरी 12th के लिए मैं सेंट जोसफ कान्वेंट गयी. वहाँ स्कूल में एक छोटा सा चैपल था. मैं अक्सर सुबह स्कूल में क्लास आने के पहले वहां चली जाती थी. मन बहुत परेशान रहा या ऐसा कुछ. वहाँ जाते हुए एक चीज़ पर अक्सर मेरा ध्यान जाता था. हम जो हिन्दू स्टूडेंट होते थे, हमेशा अपने जूते बाहर खोल कर जाते थे...कि हमें मंदिर जैसी आदत थी...लेकिन जो क्रिश्चियन स्टूडेंट्स होती थीं, वे जूते पहन पर ही अन्दर चली जाती थीं क्यूंकि उन्हें ऐसा करने नहीं कहा गया था. हमारा क्लास शुरू होने के पहले वहां रोज़ 'आवर फादर इन हेवेन' कहना होता था. हमारी मोरल साइंस टीचर हमें मज़ाक में पूछती थी कि हम छुट्टियों में 'आवर फादर इन हेवेन' नहीं कहते, भगवान को भी छुट्टी दे देते हैं. इसपर हम सब लड़कियां खूब हँसती थीं. पटना विमेंस कॉलेज भी कैथोलिक सिस्टर्स का इंस्टिट्यूट है. पर यहाँ चूँकि हम बड़े हो गए थे तो कोई मोर्निंग असेम्बली वगैरह नहीं होती थी. यहाँ भी कोलेज के अन्दर एक छोटा सा चैपल था. वहां एक्जाम वगैरह के पहले मैं या मेरी कुछ दोस्त जाया करती थीं. कई बार हम किसी स्टेज परफॉरमेंस के पहले भी जाया करते थे. 

डैलस में मेरी कार ड्राईवर कैरोलीन ने बताया कि यहाँ चर्च हफ्ते में सिर्फ संडे को खुलते हैं. मुझे अपनी स्कूल की सिस्टर याद आ गयी, 'बहुत मजे हैं तुम्हारे भगवान के, हफ्ते में सिर्फ एक दिन काम करता है...हमारे यहाँ तो सारे भगवानों को पूरे हफ्ते काम करना होता है...त्योहारों में तो ओवरटाइम भी'. उसे मैं बहुत फनी लगी थी. जिसे आज सेकुलर कहते हैं...वो हमारे लिए हमेशा इतना साधारण रहा है कि कभी सोचने की जरूरत भी नहीं पड़ी. हमें बचपन से हर भगवान के सामने सर झुकाने की शिक्षा दी गयी थी. चूँकि हम बहुत घूमे हैं, तो देश में कई सारे मंदिर, बौद्ध स्तूप, मजार और मस्जिद भी गए हैं. पापा, मम्मी और भाई के साथ. बड़े होने के बाद पहली बार कश्मीर गए जब इन चीज़ों की थोड़ी बहुत समझ आने लगी थी...तो इस बात पर बहुत तकलीफ हुयी कि हज़रत बल में मस्जिद में अन्दर औरतों का जाना प्रतिबंधित है. मैं सोच रही थी कि उन्हें कितना खराब लगता होगा कि अन्दर जाने नहीं देते हैं. क्यूंकि दिल्ली में जामा मस्जिद में जाने दिया था. आगरा में भी. मुझे बचपन के और भी कई मस्जिद ऐसे ही याद थे जहाँ अन्दर जाने दिया जाता था.

घर में मम्मी कभी पूजा करने बोली नहीं...तो कभी पूजा करने मना भी नहीं की. व्रत वगैरह भी कभी कभार रख लेते थे. माँ और पापा दोनों रोज पूजा करते थे. घर के लोगों की यादों में सबसे क्लियर उनके पूजा करने का ढंग आता है. मम्मी का, दादी का, दिदिमा का, नानाजी का, पापा का...सबके अपने अपने चुने हुए मन्त्र और अपने अपने मंत्रोचार थे. देवघर चूँकि शंकर भगवान की नगरी है तो हम सब भोले बाबा के भक्त. अब उनका इम्प्रेशन ऐसा कि भूल वगैरह आराम से माफ़ कर देते हैं. तो पूजा पाठ में कोई गलती हो जाए तो ज्यादा परेशान नहीं होते थे. दिल्ली आने तक ऐसा ही बना रहा. जन्मदिन या पर्व त्यौहार में मंदिर जाना और कभी मूड हुआ तो पूजा कर लेना. भगवान में आस्था बहुत थी. मम्मी के जाने के बाद भगवान में विश्वास एकदम अचानक टूट गया. पूजा करनी बंद कर दी. घर की कुछ रस्में तो करनी पड़ती हैं...तो जहाँ जहाँ पूजा आवश्यक थी, वहां की, पर अपने मन से कभी मंदिर जाना या घर में भी पूजा करनी एकदम बंद है. शायद कभी वे दिन लौटें...मगर फ़िलहाल मन में श्रद्धा नहीं उभरती.
हमने हाल में नयी गाड़ी खरीदी है. स्कोडा ओक्टाविया. कल गाड़ी का रजिस्ट्रेशन था. उसके बाद मैं अपने एक दोस्त से मिलने गयी. अचानक ही मूड हो गया. बहुत दिन बाद गाड़ी हाथ में थी. बारिश का मौसम था. चल दिए. उसको कॉल किया कि मैं आ रही हूँ तेरे घर. वो ओडिसी और कुचिपुड़ी डांस करती है. इतना खूबसूरत कि बस. बड़ी बड़ी आँखें. उसे साधारण रूप से काम करते हुए देखती हूँ तो भी उसमें एक लय दिखती है. उसके चलने में, बोलने में, हंसने में. आंध्र की है...और बिहारी से शादी की है. iit का लड़का. उसका एक छोटा बेटा है. चार साल का लगभग. कल दरवाज़ा खोली तो देखे कि एकदम साड़ी में है, हम खुश होके बोलते हैं कि 'मेरे लिए' तो पट से जवाब आता है, 'औकात में रह'. कल कोई तो तुलसी पूजा थी, उसके लिए तैयार हुयी थी. हुयी तो पूजा के लिए ही तैयार न :) 

उनका अपना घर है. हाल में शिफ्ट हुए हैं. वहां पूजा के लिए अलग से कमरे का एक हिस्सा है. इसी में वो डांस प्रैक्टिस भी करती है. पूजा के हिस्से को अलग करने के लिए एक लकड़ी का नक्काशीदार जाली वाला पार्टीशन है. कल वहीं बैठी. वो मुझे बता रही थी कि आज दीवाली की तरह तुलसी के आसपास दिया जलाते हैं. उसका पूजाघर छोटा सा तीन स्टोरी रैक का बना हुआ था. एक ड्रावर जिसमें बहुत तरह के डिब्बे रखे थे. राम लक्ष्मण सीता की एक बड़ी तस्वीर. उसके ऊपर सुनहले रंग की छतरी. कांसे के राम, लक्ष्मण, सीता...हनुमान जी और गणेश जी. कई सारे अलग अलग साइज के दिए थे. कुछ कांसे के, कुछ चाँदी के. पंचमुखी दिया. सब अलग अलग साइज़ के दिए जोड़ों में थे. उसने दीयों को ऊंचाई के हिसाब से लाइन में रखा तो जैसे सीढ़ियाँ बन गयीं थीं. उसने मुझे बताया कि कैसे कांसे के वो राम लक्ष्मण सीता को लाने की कहानी है.

एक भजन है, नॉर्मली भजन में लिखने वाले का और जगह का नाम आता है. उसे एक भजन बहुत पसंद था और वो जानना चाहती थी कि वो कहाँ लिखा गया है. जब उसे उस ग्राम का नाम पता चला तो उसका मन था वहां जाने का. यहीं बैंगलोर के पास का एक गांव था. इत्तिफाक से वहीं पर उसका एक डांस प्रोग्राम आ गया. जब वह उस ग्राम में गयी और उस मंदिर में गयी जहाँ वो भजन लिखा गया था तो ऐसा हुआ कि पूजा के बाद पंडित और दर्शनार्थी सब चले गए और वो मंदिर में अकेली, सिर्फ भगवान के सामने थी. उस समय उसने वहाँ वो संगीत चलाया और उसपर उस छोटे से गाँव के उस छोटे से मंदिर में सिर्फ भगवान के लिए उसी भजन पर एक छोटा सा नृत्य किया. ये एक आत्मा को छूने वाली घटना थी. इसी के बाद उस शहर में एक दुकान में उसे ये भगवान की प्रतिमाएं मिली थीं. 

इधर बहुत दिन से मेरी पूजा बंद है. बाकी लोगों को भी मैं पूजा करते देखती हूँ तो वे एकाग्रचित्त नहीं होते. उनका मन कहीं और लगा होता है. पूजा एक रूटीन सी हो जाती है. मगर उसे देखना ऐसा नहीं था. उसे देखने पर मन में कोई पवित्र सी भावना जगती थी. जैसे कि वो सब कुछ प्रेम में, भक्ति में डूब कर कर रही है. उसके लिए सामने रखी मूर्तियों में प्राण थे और वो अपने इष्ट की ख़ुशी के लिए सब कर रही थी. पूजा. धूप. चन्दन. अगरबत्ती. पूजा करते हुये उसकी चूड़ियों की खनक भी सुन्दर लगती थी.

उसने कहा कि वो मुझे वो भजन सुनाएगी. एक ही पंक्ति सुन कर जैसे रोम रोम में अलग सा अहसास हुआ था. जैसे भगवान वाकई सुन रहे हो. बिना किसी वाद्ययंत्र के सिर्फ कोरी आवाज़. कुछ करने के लिए वो उठी. और जब वापस बैठ कर उसने भजन फिर गाना शुरू किया तो मुझे लगा कि ये मुझे रिकॉर्ड कर लेना चाहिए. शायद वो फिर से मेरे लिए गा दे...लेकिन अभी की उसकी आवाज़ सिर्फ राम तक पहुँचने के लिए है. मैंने चुपचाप मोबाइल से इसकी रिकॉर्डिंग कर ली. ये एक मुश्किल निर्णय था. मैं वहां डूबना चाहती थी उस आवाज़ में. मगर मैं उसे सहेजना भी चाहती थी. दिए की लौ में उसका चेहरा कितना सुन्दर दिख रहा था. मुझे बहुत साल पहले की गाँव की याद आई. तुलसी चौरा पर दिया दिखाती चाची, मम्मी, दीदी...सब एक ही जैसी लगती थी. दिव्य. 

ये एक अनुभव था. इसे मैं यहाँ इसलिए लिख रही हूँ कि बहुत साल बाद मैंने इस आवाज़ से अपने अन्दर रौशनी महसूस की है...उस भजन से जैसे भगवान खुश होकर जरा सा मेरे मन में भी बस गए हैं. ये इतनी खूबसूरत चीज़ है कि बिना बांटे रहा नहीं गया. शायद कभी मेरे मन में भी शंकर भगवान के प्रति आस्था वापस आएगी...तो मैं अपनी आवाज़ में कुछ वो भजन गा सकूंगी जो मैंने सीखे थे. धर्म ठीक ठीक मालूम नहीं क्या होता है, मेरे लिए जिस चौखट पर सर झुक जाए वहीं भगवान हैं...आस्था मन के अँधेरे को रौशन करती दिये की लौ है...जरा सी उम्मीद है...जरा सा सुकून.

मगर फिलहाल आप उसे सुनिए...

02 September, 2014

चेन्नई डायरीज: पन्नों में घुलता सीला सीला शहर

वो शहर से ऐसे गुजरती जैसे उसे मालूम हो कि उसकी आँखों से शहर को और कोई नहीं देख सकता. रातें, कितनी अलग होती हैं दिनों से...जैसे रातरानी की गंध बिखेरतीं...सम्मोहक रातें...पीले लैम्पोस्ट्स में घुलते शहर को चुप देखतीं...गज़ब घुन्नी होती हैं रातें.

अजीब शहरों से प्यार हुआ करता लड़की को. देर रात बस के सफ़र के बाद किसी ऑटो में बैठ कर अपने फाइव स्टार होटल जाते हुए लड़की बाहर देखती रहती थी जब सीला सीला शाहर उसके अन्दर बहने लगता था. वो सोचती, चेन्नई में ह्यूमिडिटी बहुत है. सुनसान पड़ी छोटी गलियों के शॉर्टकट से ले जाता था ऑटो. लड़की महसूसती, इस शहर से प्यार किया जा सकता है. शहर न जाने कैसे तो उसे अपने काँधे पर सर टिका कर ऊंघने देता. वहां के पुलिसवाले, ऑटोवाले, बिना हेलमेट के बाइक चलने वाले छोकरे...सब उसे अपनी ओर खींचते. लड़की अपने अन्दर जरा जरा सी जगह खाली करती और चेन्नई वहां आराम से पसरने लगता.

दिन की धूप में सड़क पर निकल पड़ती...बैंगलोर के ठंढे मौसम के बाद उसे किसी शहर की गर्मी बहुत राहत देती. किसी पुराने पुल के साइड साइड चलती, एग्मोर नाम के किसी मोहल्ले में. हवा में समंदर की आस बुलाती. आँखों से करती बातें. वो क्या तलाशने निकलती और क्या क्या खरीद कर जेबों में भरती रहती. व्रैप अराउंड स्कर्ट, पर्पल कलर की कंघी...डबल चोकलेट आइसक्रीम. जाने क्या क्या. नैशनल म्यूजियम जैसी किसी इमारत के सामने खड़ी होकर गिनती फ्लाइट छूटने के वक़्त को. वक्त हमेशा कम पड़ जाता. लौटते हुए जरा जरा उम्मीदों में इकठ्ठा करती कुछ गलियों में रहती दुकानों को...एक एम्बेसेडर के खाली हुए फ्रेम को, बिना पहिये, बिना सीट...एक पुराने से घर के आगे क्यूँ रखा था फ्रेम? वो क्या स्लो मोशन में चलती थी? फिर क्यूँ सारी चीज़ें दिखती थीं उसे जो इस शहर में गुमनाम घूंघट ओढ़े रहती थीं, जैसे कि उनका होना सिर्फ इसलिए है कि चेन्नई की यादों के ये पिन ऐसे ही याद आयें उसे. एक घर के सामने से गुज़रते हुए वहां के दरबान की जरा सी मुस्कराहट...वो वापस जा के पूछना चाहती थी कि आपकी इतनी मीठी मुस्कराहट के पीछे कौन सी ख़ुशी है. एक अनजान लड़की की यादों के एल्बम में ऐसे चमकीली चीज़ का तोहफा क्यूँ? आप किसी और जन्म से जानते हैं क्या उसको?

सड़क पर सफ़ेद वेश्ती पहने लोग दिखते...एक तरह की धोती...उसे याद आते गाँव में बाबा...उनकी याद आये कितने दिन हो गए. सड़क पर गुजरती औरत के बालों में लगे बेली के फूलों की महक, बगल के रेस्टोरेंट से उठती डोसा की महक...क्या क्या घुलता जाता...सुबह लम्बी कतार में लगे हुए किसी अजनबी से कोई घंटा भर बतियाना और आखिर में पूछना उसका नाम...चंद्रा...उसके कानों के पास के बाल जरा जरा सफ़ेद हो गए थे...बहुत रूड होता न पूछना कि आपकी उम्र क्या है? कितना सॉफ्ट स्पोकन होता है कोई. उससे मिल कर किसी और की बेहद याद आना. उसका कहना कि तुम्हें बे एरिया अच्छा लगेगा. विदेश. योरोप जैसा बिलकुल नहीं. मगर लड़की को शहर लोगों की तरह लगते हैं, हर एक की अपनी अदा होती है. वो सोचती उन सारे लोगों के बारे में जो अपना अपना टिकट लिए किसी दूर देश जाना चाहते हैं. मैं नहीं जाना चाहती...मुझे घबराहट होती है. मैं अपने देश में ही ठीक हूँ. वहां मेरी किताब कौन पढ़ेगा. एक तो ऐसे ही बैंगलोर में मुझे हिंदी बोलने वाले लोग मिलते नहीं. खुद में बातें करती.

लौट आती होटल के कमरे में. स्विमिंग पूल में करती फ्लोट करने की कोशिश. पहली बार ताज़े पानी में तैर लेती. आँख भींचे रहती पहले, जरा जरा पैर मारती. स्विमिंग पूल में अकेली लड़की. साढ़े चार फीट पानी डूबने के लिए बहुत होता है. वो लेकिन सीख लेती घबराहट से ऊपर उठना. क्लोरिन चुभता आँखों को. जैसे याद की टीस कोई. वो लेती गहरी सांस...और तैर कर जाती स्विमिंग पूल के एक छोर से दूसरे छोर तक. फ्लोट करते हुए चेहरे पर पड़ती धूप. बंद हो जाता सारा का सारा शोर. दिल की धड़कनों में चुप इको होता...इश्शश्श्श...क...

06 April, 2014

समंदर की बाँहों में - डे २- पटाया

रात थी भी क्या? सुबह उठी तो लगा कि कोई सपना देखा है। सपने में बहुत सारा पानी था। समंदर था। डूबता सूरज था। फिर बालकनी में गयी तो दूर तक फैला नीला-हरा समंदर दिखा। ख्वाब नहीं था। नेहा उठ गयी थी। बगल वाले बालकनी से भी आवाज आ रही थी। नेहा ने तब तक मार्क को कौल कर लिया था। जौर्ज और मार्क का रूम हमारे रूम के नीचे वाले फ्लोर पर था। फोन किया तो मार्क  तैयार होकर नाश्ता कर चुका था और कमबख्त ने जौर्ज को उठाया तक नहीं था। हम दोनों पहले बौस को उठाने का शुभ काम निपटाये, कौफी पी थी या नहीं अब याद नहीं। मेरी आवाज अच्छी खासी लाउड है, उस पर नेहा साथ हो तो बस। पूरी बिल्डिंग न उठ गयी गनीमत है।

सब लोग फटाफट रेडी हो कर खाने पहुंच गये। शेरटन का ब्रेकफास्ट बढ़िया था एकदम। आज का प्लान था कोरल आईलैंड जाने का। बस टाईम पर आ गयी थी। लोगों ने शौर्टस वगैरह खरीदीं, कुछ ने टोपी भी लीं। फिर हम स्पीडबोट पर बैठ कर आइलैंड की तरफ चल दिए. समंदर में स्पीडबोट ऐसे चलती है जैसे बैंगलोर की सड़कों पर मेरी बाइक, कसम से क्या स्पीडब्रेकर थे समंदर में. लहर लहर पर उछलती स्पीडबोट। बहुत सारा पानी उड़ता हुआ. नमक का खारा पानी। दूर तक दिखता खूबसूरत समंदर। कैमरा वैगेरह मैंने बैग में ही डाल दिया था. कभी कभी जीना रिकॉर्ड करने से ज्यादा जरूरी और खूबसूरत होता है. बीच समंदर में कहीं एक बड़ी सी बोट पार्क थी. वहाँ पर लोग पैरासेलिंग कर रहे थे. टीम में सबने पैरासेलिंग की. नेहा। जॉर्ज। बग्स। अनिशा। मैंने नहीं की :( वो जो पैराशूट को पानी में डुबाते हैं वो देख कर मेरी जान सूखती है.


वहाँ से आइलैंड के पास एक और बोट पार्क थी. वहाँ आप मछलियों को देखने पानी के अंदर जा सकते थे. मुझे क्लौस्ट्रफ़ोबिया है. बंद जगहों से डर लगता है. उस पर पानी से तो और भी डर लगता है. यहाँ पर दोनों का कॉम्बिनेशन था. एकदम किलर। एक हेलमेट पहनना होता है, जैसे स्पेस ट्रैवेलर पहनते हैं न, वैसा और फिर आप पानी में नीचे चल सकते हैं. कुल मिला कर बीस मिनट का प्रोग्राम था. पहले तो मैंने सोचा नहीं जाउंगी पर देखा कि सब जा रहे हैं. तो बस ज्यादा सोचे बिना भाग के गयी कि मैं भी जाउंगी। इंस्ट्रक्टर ने बताया कि नीचे पानी के दबाव के कारण कान में दर्द हो सकता है, ऐसे में हेलमेट के नीचे से हाथ डाल कर नाक बंद करनी होती है और तेजी से सांस बाहर निकालनी होती है ताकि कान से हवा निकले। ऐसा करने के बाद दर्द बंद हो जाएगा। किसी भी हाल में घबराने की जरूरत नहीं है. लोग आसपास ही रहेंगे। अगर सब ठीक है तो ओके का साइन नहीं तो तर्जनी से ऊपर की ओर इशारा करने पर ऊपर ले कर आ जायेंगे। फिर सबने समझाया कि घबराना मत, सारे मेरे साथ हैं. मेरा सफ़ेद हुआ चेहरा शायद दिख रहा होगा सबको। पानी में पैर डालते ही मेरे होश फाख्ता होने लगे. मगर मैंने खुद को कहा कि मैं कर सकती हूँ. मुझे बस गहरी सांस लेनी है, बाहर छोड़नी है. बस. हेलमेट पहनाया गया तभी लगने लगा कि बड़ी आफत  मोल ली है, मुझसे नहीं होगा। पानी के अंदर बोट की सीढ़ियां उतर कर गहरे पानी में जाना था. कोई बहुत सी सीढ़ियों के बाद इंस्ट्रक्टर ने पैर पकड़ कर नीचे गहराई में खींच लिया। जाने कितने फीट नीचे थे हम पानी में. कानों में बहुत तेज़ दर्द हुआ और बहुत डर लगा. जैसे कि दम घुट रहा है और जान चली जायेगी। इंस्ट्रक्टर बार बार ओके का साइन बना के पूछ रहा था कि सब ठीक है और मुझे कुछ ठीक लग ही नहीं रहा था. जॉर्ज भी सामने, कितनी बार उसने भी ओके का साइन बना के पूछा। मगर मुझे इतनी घबराहट हो रही थी कि लगा जान चली जायेगी। मुझे आज तक उतना डर कभी नहीं लगा था. ऊपर जाने कितना गहरा पानी था. हम पानी में जाने कितनी दूर और कितनी देर तक चलने वाले थे. सब कुछ स्लो मोशन में था। मुझे लगा मुझसे नहीं होगा। मैंने ऊपर जाने का सिग्नल दिया। इंस्ट्रक्टर मुझे लेकर ऊपर आ आया.

जैसे ही पानी से बाहर आयी जान में जान आयी. फिर मालूम चला कि नहीं जाने पर भी जो ढाई हज़ार रुपये लगाए हैं वो वापस नहीं मिलेंगे। फिर ये भी लगा कि डर गयी तो हमेशा डर लगता रहेगा। अपनी बहादुरी का झंडा जहाँ तहां गाड़ते आये हैं यहाँ कैसे हार मान जाएँ। एक बार ये भी लगा कि सब चिढ़ाएगा बहुत। उस वक्त ऑफिस की टीम का कोई भी नहीं था बोट पर, सब लोग नीचे थे पानी में. एक थाई लड़की थी, उसने समझाया कि पांच मिनट में सब नॉर्मल हो जाएगा, बस गहरी सांस लेते रखना...याद रखना कि पानी में सांस लेना भी एक काम होता है. हिम्मत करके चली जाओ. उस वक्त लग रहा था कि इश्क़ के बारे में भी तो ऐसे ही कुछ नेक ख्याल हैं मेरे। फिर जब इतना खतरा वाला तूफानी काम करने में कभी डर नहीं लगा कि तो ये अंडरवाटर वॉक क्या है. मैं कर लूंगी। मैंने कहा कि मैं फिर से अंदर जाना चाहती हूँ. बोट पर जितने क्रू मेंबर थे सबसे खूब तालियां बजा कर मेरा उत्साह बढ़ाया। मैं फिर पानी में उतरी। वापस बहुत सी सीढ़ियां और नीचे। नीचे बग्स और जॉर्ज थे सामने। उनके चेहरे पर 'यु हैव डन इट गर्ल' वाला भाव था. मैंने गहरी गहरी सांसें लीं और जैसा कि इंस्ट्रक्टर ने कहा था चुविंगम चबाती रही. सारा ध्यान सांस लेने पर. थोड़ी देर में सब नॉर्मल लगने लगा. सारे लोग एक दूसरे का हाथ पकड़े हुए थे. मेरे एक तरफ जॉर्ज और एक तरफ बग्स  था. एक आधी बार लगा कि कहीं बेचारों का हाथ फ्रैक्चर न हो जाए मैंने डर के मारे इतनी जोर से पकड़ रखा था. फिर सामने बहुत सारी मछलियां आयीं। ये किसी बड़े अक्वेरियम में होने जैसा था. सब कुछ एकदम साफ़ दिख रहा था. मछलियां जैसे स्लो मोशन में सामने तैरती थीं. चटक पीले रंग की मछलियां, गहरे नीले रंग की मछलियां, कोरल, सी स्पंज और बहुत सारा कुछ. इंस्ट्रक्टर हमें ब्रेड का एक टुकड़ा देता था हाथ में और मछलियां ठीक आँखों के सामने आकर उसे खाने लगती थीं. मुझे पिरान्हा याद आने लगी थी. हम जाने कितनी देर तक समंदर के अंदर चलते रहे. ये सब सपने जैसा था. सब कुछ एकदम ठहरा हुआ. कोई फ़ास्ट मोवमेंट नहीं। धीमे धीमे चलना। आसपास की खूबसूरती को देखना। महसूसना। जीना।

वक्त ख़त्म हुआ तो हम बोट पर वापस आ गए. सबने शब्बाशी दी कि मैंने डर पर काबू पा लिया। कि मैंने हिम्मत की. डर के आगे जीत है :) फिर हम स्पीडबोट से आइलैंड पर गए. बैग वैग धर कर सारे लोग समंदर की ओर दौड़े। मुझे तैरने का एक स्टेप आता है बस तो मैं बस पानी में चल रही थी. जॉर्ज और नेहा फ्लोट कर रहे थे. उन्हें देख कर मुझे बहुत रश्क हो रहा था कि काश और कुछ भी न आये स्विमिंग करने में बस फ्लोट करना आ जाए किसी तरह. जॉर्ज बहुत अच्छा टीचर है, सिखाने की बात पर एकदम एंथु में आ जाता है. उसने कहा खुद को पानी में छोड़ के देखो, नहीं डूबोगी और कमर भर पानी में कोई डूबता है भला और उसके भी आगे मैं हूँ बचने के लिए. मैंने एक आध बार कोशिश की और हर बार डूबने लगती थी. फिर मुझे लगा कि नहीं होगा मुझसे। सब लोग फिर पानी में नॉर्मल बदमाशी कर रहे थे. तैरना बहुत कम लोगों को आता था. मैं थोडा और गहरे पानी में गयी कि घुटने भर पानी में तो फ्लोट नहीं ही होगा। समंदर एकदम शांत है वहाँ। कोई लहरें नहीं। उसपर पानी गर्म। जैसे गीजर से आ रहा हो. चूँकि बहुत सारे लोग थे आसपास तो डूबने का डर नहीं लग रहा था।  मैंने गहरी सांस ली और रोक ली. खुद को पानी में छोड़ दिया। बाँहें खोल लीं और पैरों के बीच लगभग डेढ़ फुट का फासला बना लिया। मैं पानी में ऊपर थी. एकदम फ्लैट। कान पानी के नीचे थे. पानी का लेवल चेहरे के पास था. बस नाक ऊपर थी पानी में. मैंने आँखें भींच रखी थीं. यकीं नहीं हो रहा था लेकिन आई वाज फ्लोटिंग। मैंने आँखें बंद रखीं और जोर से चीखी 'जॉर्ज आई एम फ्लोटिंग'. इसके थोड़ी देर बाद मैं पानी में वापस खड़ी हो गयी. इतना अच्छा लग रहा था कि क्या बताएं। फिर मैंने देखा कि ऑफिस के सारे लोगों ने नोटिस किया कि मैं वाकई फ्लोट कर रही थी. बस फिर क्या था सारे लोग जॉर्ज के पीछे कि मुझे भी सिखाओ। जॉर्ज ने लगभग सबको फ्लोटिंग सिखायी। कुछ देर बाद तो इतना मजा आ रहा था जैसे फ्लोटिंग क्लास चल रही हो. मैंने अनिशा और प्रदीप को फ्लोटिंग सिखायी। अनिशा ने कर लिया मगर प्रदीप के लिए जॉर्ज की जरूरत पड़ी. वो डूबता तो उसे मैं बचा भी नहीं पाती ;) बेसिकली पानी में सबसे डर सर नीचे करने में लगता है. सब एक बार उस डर से उबर गए तो फ्लोटिंग बहुत आसान है.

मुझे वो पहली बार फ्लोटिंग जिंदगी भर याद रहेगी। पहले बहुत सा शोर था. बहुत से लोग. फिर बाहें फैला कर पानी में पीठ की और हौले से गिरना होता है, ऐसा भरोसा कर के कि कोई है जो बाँहों में थाम लेगा, जैसे समंदर पानी का कोई मखमली गद्दा हो. साँस रोके हुए. फिर पहली सांस छोड़ते हुए महसूस होता है कि सब कुछ शांत हो गया है. कहीं कोई आवाज नहीं है. कहीं कुछ भी नहीं है. बहुत शांति का अनुभव होता है. इस शोर भरी दुनिया में जैसे अचानक से पॉज आ जाता है. पानी चारो तरफ होता है. जैसे समंदर चूम रहा हो. जिस्म का पोर पोर. Its like a giant hug by the sea. समंदर की बाँहों में जैसे बहुत सा सुकून है. जिंदगी भर का सुकून।

श्रीकांत -पैरासेलिंग के बाद
किसी का वापस जाने का मन ही ना करे. मगर लंच का टाइम हो रहा था. वापस तो जाना ही था. सब झख मार के वापस आये. कपड़े बदलने की जगह नहीं थी और वक्त भी नहीं। किसी जगह शायद ४० बाथ (लगभग ८० रुपये) देने थे तो सर्वसम्मति से निर्णय हुआ कि बोट पर चलते हैं. लंच करके होटल चले जायेंगे और वहीं कपड़े बदल लेंगे। मौसम गर्म था तो कपड़े सूख भी जाते। अब मेरी चप्पल ही न मिले। भारी दुखी हुयी मैं. अभी कुछ दिन पहले क्रॉक्स खरीदी थी, ढाई हज़ार की चप्पल का चूना लग गया. बहरहाल हम किनारे लौटे। हमारी बस नहीं आयी थी. धूप के कारण जमीन बहुत तप रही थी और पैर रखना पौसिबल नहीं था।  जॉर्ज ने कहा जब तक बस आती है चलो तुमको चप्पल दिलाता हूँ नहीं तो यहीं भंगड़ा करती रहोगी। हम भागे भागे आये चप्पल लेने। जब जो चाहिए होता है उसके अलावा सब कुछ मिलता है दुनिया में. समुद्र किनारे घड़ी घड़ी लोग चप्पल बेच रहे थे और हम खरीदने चले तो चप्पलचोर सारे नदारद। कुछ दूर जाके फाइनली चप्पल मिली तो हम खरीद के वापस आये. अब ऑफिस के सारे लोग गायब। फोन करो तो कोई फोन न उठाये। मैं, जॉर्ज, रवि और श्रीकांत थे. वहाँ एक मॉल था और सबका वहीं अंदर जाने का प्रोग्राम था. मैंने देखा कि ऊपर फूड कोर्ट है. अब चूँकि ऑफिस में सब तरह के लोग हैं तो मुझे लगा कि लोग फूड कोर्ट ही गए होंगे खाने के लिए कि सबको अपनी पसंद का खाना मिल जाए तो जॉर्ज और मैं ऊपर देखने बढ़े. ऊपर गए तब भी कोई नहीं दिखा और तब तक भूख के मारे जान जाने लगी. तैरने के बाद एक तो वैसे ही किलर भूख लगती है उसपर मुझे भूख बर्दाश्त नहीं होती। हमें एक इन्डियन जगह दिख गयी. वहाँ छोले भटोरे थे. बस हिंदी में आर्डर किया मजे से और एक ग्लास अमरुद का जूस. मेरा बैग चूँकि मेरे पास था तो पैसे, कपड़े सब थे पास में. जब तक खाना आया मैंने चेंज भी कर लिया वाशरूम में जा के. कसम से क्या कातिल छोले भटोरे थे, मैंने आज तक वैसे छोले भटोरे भारत में नहीं खाये कभी. खाना खा रहे थे तो रहमान का कॉल आया जॉर्ज को, वो लोग इसी मॉल में दूसरे फ्लोर के रेस्टोरेंट में खाना खा रहे थे. बस के आने में डेढ़ घंटे का टाइम था. खाना खाते, गप्पें मारते कब वक्त निकल गया मालूम ही नहीं चला. बाकी लोगों का खाना हो गया तो नेहा और बग्स भी ऊपर आ गए. कुछ देर हम सब समंदर निहारते रहे. फ़ोटो खींचते रहे और जाने क्या क्या बतियाते रहे. टीम में मेरे आलावा सिर्फ बाला वेजिटेरियन है. बस में उसको खूब चिढ़ाये कि हम तो छोला भटूरा खाये, तुम क्या खाये ;) ;)

रात को ऐलकजार शो था, बेहतरीन म्यूजिक, कॉस्चुम और सेट डिजाइन। मैंने उतना खूबसूरत शो नहीं देखा है आज तक. सब कुछ बेहतरीन था वहाँ।  फिर समंदर किनारे एक रेस्टोरेंट में खाना। ग्रीन सलाद। वेज आदमी को और क्या मिलेगा। बहुत सी कहानियां कहीं, कुछ सुनीं। थोड़ा भटकी। दिवाकर रास्ता खो गया था उसको उठाये और फिर होटल वापस। हम ऑफिस में जिनके साथ काम करते हैं और घूमने जिनके साथ जाते हैं उनमें कितना अंतर होता है. इतना अच्छा लगा सबको ऐसे जानना। हमेशा किसी नए से बात करना। कोई नया किस्सा सुनना। हिंदी में सवाल करना, तमिल में जवाब सुनना, मलयालम में लोगों का बतियाना। उफ्फ्फ्फ़ ही था बस.

पटाया में आखिरी दिन था. अगले दिन बैंगकॉक के लिए निकलना था. हम स्विमिंग पूल में पैर डाले बैठे रहे. बतियाते। हँसते। दिल भर सा आया था. मुझ सी को ऐसे पूरा का पूरा ऐक्सेप्ट करना थोड़ा मुश्किल है. मेरा शोर. मेरा पागलपन। सब कुछ. मगर सब ऐसे थे जैसे एक बड़ा सा परिवार, जिसमें शामिल होने की कोई शर्त नहीं होती। बहुत अच्छा सा लगा. सुकून सा.
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समंदर था कि आसमान था कि समंदर में पिघलता हुआ आसमान था. जमीन कहाँ ख़त्म होती है आसमान कहाँ शुरू। समंदर से पूछूं उसे मेरा नाम याद रहेगा? सितारे हैं या कि आँखों में यादों का जखीरा।

शुक्रिया जिंदगी। इन मेहरबान दो दिनों के लिए. 

03 April, 2014

अ मैड ट्रिप टु पटाया- डे १

याद से सब कितनी जल्दी फिसलता जाता है.
पिछले वीकेंड हमारा पूरा ऑफिस पटाया गया था, थाईलैंड में एक जगह है 'पटाया' नाम की :)
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याद कितनी जल्दी बिसरने लगती है. लोग. नाम. जगहें। सब.

यहाँ सिर्फ कुछ चीज़ों को सकेर रही हूँ क्यूंकि जिस तरह से भूल रही हूँ सब लगता है कुछ ही दिनों बाद यकीन भी नहीं होगा कि हम गये भी थे. घर से एयरपोर्ट के लिए अनु और अनिशा भी साथ थे. टीम से अधिकतर लोग पहली बार विदेश जा रहे थे. पूरा हंगामे का मूड था सबका। इतनी एनेर्जी थी  कि उससे पूरा एयरपोर्ट चार्ज हो जाता। पतिदेव और सासुमाँ को टाटा बोल कर तीन दिन की छुट्टियों पर निकल गए. मैं आज तक कभी ऐसे ऑफिस ट्रिप पर नहीं गयी थी. पिछले साल हम सबने वाकई जान धुन कर काम किया था उसका रिवार्ड था तो सेन्स ऑफ़ अचीवमेंट भी थी.

ट्रिप की मेरी सबसे फेवरिट फोटो- जॉर्ज
टिकट चूँकि सबकी ग्रुप में बुक थी इसलिए हम अपनी सीट खुद चुन नहीं सकते थे. चेक इन के वक्त सीट नंबर आये तो मेरी और नेहा की सीट साथ में थी. हमने बहुत ढूँढा कि बेचारा और कौन फंसा है हमारे साथ तो पता नहीं चला. प्लेन बोर्ड कर गए तो नेहा, जॉर्ज और हम साथ में सामान ऊपर के कम्पार्टमेंट में रख रहे थे. वो तीसरी सीट प्रियंका की थी. जॉर्ज ने पूछा, कि वो सीट जॉर्ज से बदलना चाहती है कि नहीं तो उसने कहा बिलकुल नहीं, फिर जॉर्ज ने उससे पूछा 'तुम्हें मालूम है तुम्हारी सीट किसके पास है, पूजा के' :) फिर तो हमारे नाम का टेरर कुछ ऐसा है कि उसने एक बार भी कुछ नहीं कहा और सीधे जॉर्ज की सीट पर शिफ्ट हो गयी. मैं और नेहा अकेले अकेले भी कम आफत नहीं हैं मगर एक साथ हम दोनों को झेलना बहुत हिम्मत का काम है. हम और नेहा दोनों साइड की सीट पकड़ के बैठ गए और जॉर्ज को बीच में सैंडविच कर दिया। हम सारे लोग पगलाये हुए थे. रात के एक बजे की फ्लाईट थी लेकिन हम न सोयेंगे न किसी और को सोने देंगे की फिलॉस्फी में यकीन करते हैं. तो पूरे टाइम खुराफात चलती रही कभी सामने वालों की सीट पर तकिया फेंकना, बाकि सोये हुए लोगों को मार पीट के उठाया इत्यादि कार्य हमने पूरी डेडिकेशन के साथ किये। मेरे आसपास की सीट पर किशोर, सतीश, श्रीकांत, प्रदीप और पीछे की सीट पर दिवाकर, अनु, अनिशा, प्रियंका थे. राहिल मेरे से ठीक कोने वाली सीट पर था. एक सतीश के आलावा सारे लोग खुराफाती थे. इन फैक्ट जब आस पास के लोगों को परेशान करके दिल भर जाता था तो हम सारे उठ के दूसरे आइल में चले जाते थे और कुछ और लोगों को जगा देते थे. कोई बेईमानी नहीं, सबको बराबर आफत लगनी चाहिए। We were all high...on life and we were gonna have the time of our lives.

 Tiger zoo- me, bugs, maryam, anu, maya, dhiva, ani
ऑफिस में रहते हुए काम ऐसा रहता है कि बात करने की फुर्सत नहीं मिलती। लगभग दो साल होने को आये लेकिन मैंने कभी जॉर्ज को अपनी लिखी कोई कहानी नहीं सुनायी थी. सोने टाइम कहानी सुनना अच्छा भी लगता है. मैंने उसे तीन कहानियां सुनायीं। मजे की बात ये थी कि मैं कहानी सुना रही हूँ और वो मुझे बताता जा रहा है कि इसे ऐसे शूट कर सकते हैं, ये वाली चीज़ बहुत अच्छी लगेगी और मैं हल्ला कर रही थी कि ध्यान से कहानी सुनो न आप अपनी ही पिक्चर बनाने लगते हो. उसने बोला कि मेरी कहानियां ऐसी होती हैं, सुन कर सब कुछ दिखने लगता है आँखों के सामने। फिर मैंने कहा कि काश आप हिंदी में मेरी कहानी पढ़ पाते क्यूंकि सुनाने में सिर्फ प्लाट रह पाता  है. मगर उसे मेरी कहानियां बहुत अच्छी लगीं। मुझे भी अच्छा लगा क्यूंकि उसकी राय इम्पोर्टेन्ट थी. बहुत कम लोगों की बात को ध्यान से सुनती हूँ. उसके साथ के इतने वक्त में इतना हुआ है कि उसकी बहुत रेस्पेक्ट करती हूँ. चीज़ों को लेकर उसकी समझ गहरी है ऐसा मैंने देखा है. उसे मेरी कहानियां अच्छी  लग रही थीं तो फिर एक के बाद दूसरी करते हुए चार घंटे बीत गए। मुझे सुनने वाला कोई मिल जाए तो मैं पूरी रात कहानी कह तो सकती ही हूँ :) फिर सामने वाली सीट से कोई तो बोली कि उसे सोना है अब। जॉर्ज ने बोला कि मैं उत्साह में बोलती हूँ तो मेरा वॉल्यूम अपनेआप ऊपर हो जाता है और मुझे मालूम भी नहीं चलता। उसपर प्लेन में कान बंद रहते हैं। एनीवे, आधा घंटा सो लिए इसी बहाने।
जाने क्या तूने कही

पटाया में जाने के लिए बस थी. मुझे सफ़र में भूख प्यास सब बहुत लगती है तो मैं सारा इंतेज़ाम करके रखती हूँ. ऑफिस में मेरी टीम मुझे फेज वैन कैंटीन बुलाती है. इस बार भी रसद का इंतेज़ाम मैंने बैंगलोर एयरपोर्ट पर ही कर लिया था. चिप्स, बिस्किट्स, आइस टी.… सब बेईमानी से बांटे गए जिसके हाथ जो लगा टाइप्स :) वहाँ से निकलते हुए कोई १० बज गए थे. हम कोई तो चिड़ियाघर में रुके और नाश्ता किया। वहाँ पर खाना खाते हुए आप शेर को देख सकते हैं. मुझे जानवरों के साथ ऐसा करना अच्छा नहीं लगता। आगे के प्रोग्राम में शेर और बाकी जानवरों का शो भी था मगर मैं वो देखने नहीं गयी. टीम के और भी बहुत से लोग नहीं गए. क्रिएटिव टीम पूरी की पूरी गप्पी टीम है. हमें कैमरा लेकर भटकना, कहानियां सुनाना और ऐसी ही चीज़ों में ज्यादा मज़ा आता है.


Foot fetish
लंच करके शेरटन होटल पहुँचने में कोई चार बज गए थे. बस में थोड़ी नींद मारी मैंने भी. शेरटन क्या खूबसूरत होटल है, उफ्फफ्फ्फ़। होटल पहुँचते ही सारे लोग क्रैश कर गए अपने अपने कमरों में. अच्छा था कि मेरी रूममेट नेहा थी. हम एक सा सोचने वाले लोग हैं. ट्रिप पर भी कोई सोता है क्या। धाँय धाँय ब्रश किया, नहाये और तैयार। मैंने दो स्विमसूट रखे थे तो फटाफट चेंज करके रेडी हो गए. पूल में सिर्फ हम दोनों ही थे. पूल में पानी हल्का गर्म था, इनफिनिटी पूल, आसपास खूब सारी हरियाली और पास में ही समंदर। नेहा ने बहुत देर तक मुझे थोड़ी बहुत स्विमिंग सिखाने की कोशिश की. इतना अच्छा लग रहा था वहाँ। मुझे पानी बहुत पसंद है. समंदर। नदी. पूल. अब हल्का सा तैरना आता है तो डूबने का डर नहीं लगता। वहाँ फिर मेरी जिद कि समंदर चलो, सनसेट देखना है. नेहा को खींचते हुए ले गयी. तब तक जॉर्ज भी पहुँच गया था. ये मल्लू लोग पानी में मछली की तरह तैरते हैं. सबके घर के पीछे पोखर होता है. बचपन से सबको तैरना आता है. मुझे तैरते हुए लोगों को देख कर बहुत रश्क होता है कि काश मुझे आता. अब जल्दी ही सीख लूंगी। समंदर से वापस स्विमिंग पूल पहुँच गए. जॉर्ज बहुत अच्छा तैराक है और उससे भी अच्छा टीचर, उसने सिंपल टेक्निक्स सिखायीं और फिर नेहा और जॉर्ज दोनों मेरा बहुत उत्साह बढ़ा रहे थे कि मेरी स्पीड बेहतर हो गयी है और मैं बहुत दूर तक जा पाती हूँ. बाकी भी बहुत सारे लोगों को हमने जिद्दी मचा मचा के पूल में उतारा। पानी की लड़ाइयां। यहाँ भी जॉर्ज की टेक्निक थी कि जिससे विरोधी टीम पर अधिक से अधिक पानी उछाला जा सके.
  जानेमन रुममेट

रिश्ते अलग अलग किस्म के होते हैं. नेहा और जॉर्ज के साथ अजीब सा लगता है…पूरा पूरा सा.…जैसे फैमिली पूरी हो गयी हो. जैसे हम तीनों एक दूसरे को बिलोंग करते हैं. सेंटी हो रही हूँ. कुछ दिन में ही चले जाना है इसलिए।

शाम को अवार्ड्स नाइट थी. मेरी टीम को बेस्ट इवेंट का अवार्ड मिला टाइटन स्किन लांच के लिए. अच्छा लगा. मजे की बात ये थी कि पटाया आना का प्रोग्राम इतनी हड़बड़ी में बना था कि सारे अवार्ड्स रेडी नहीं हो पाये थे. तो एक ही अवार्ड था :) अपना अवार्ड ले कर फ़ोटो खिंचा कर वापस कर देना होता था :) फिर वही अवार्ड बाकी विनर को भी दिया जाता था.

वहाँ से निकल के हमारा वाकिंग स्ट्रीट जाने का प्लान बना. पूरा गैंग रेडी- मैं, जॉर्ज, नेहा, अनिशा, अनु, दिवाकर, भगवंत, बाला और साजन। हम होटल से बाहर निकले और टुकटुक पर बैठ गए. ऑफिस के अलावा सबको जानना एक अलग सा अनुभव था. टीम में चुप्पे रहने वाले लोग भी खूब सारी बातें करते हैं, भाषा के बैरियर के बावजूद। कुछ को हिंदी नहीं आती और मैं उनसे हिंदी में बकबक िकये जाती हूँ. वाकिंग स्ट्रीट रात भर जगी रहने वाली, नियोन लाइट्स वाली ऐसी जगह है कि लगता है हैलूसिनेशन हो रहे हों. माहौल ऐसा हो, लोग अच्छे हों तो मुझे पानी चढ़ जाता है ;) हमने घूम घूम कर बहुत सी चीज़ें देखीं जिनको यहाँ लिखना स्कैंडल्स हो जाएगा। हमारी छवि अच्छी है फिलहाल :) लिखने को इतना सारा कुछ मसाला मिला है कि नोवेल लिख सकती हूँ. चुपचाप जैसे पी रही थी अपने इर्दगिर्द का सारा जीवन। कितना अलग, कितना रंगीला और चमक के नीचे कैसे कैसे ज़ख्म छुपे होंगे। दिमाग पैरलेल ट्रैक पर था. कोई रात के एक बजे तक टीम में सब साथ घूमे। सभी रिस्पॉन्सिबल लोग थे. सबने तमीज से दारु पी. किसी को सम्हालने की जरूरत नहीं पड़ी. बाकी लोगों को और भी देर रुकने का मन था, मैं जॉर्ज और साजन वापस लौट आये. कुछ देर गप्पें मारीं और फिर टाटा बाय बाय.

फिर समंदर किनारे चली गयी. होटल की बेंच थी और पूरा खाली समंदर का किनारा। चश्मा नहीं पहना था तो सब धुंधला सा. समंदर का शोर. लहरें। बहुत देर बेंच पर बैठी जाने क्या क्या सोचती रही. जिंदगी। ठहरी हुयी सी. अच्छी सी।  सुकून सा बहुत सारा कुछ.
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बाकी दोनों दिन के किस्से कल। शायद। कभी।

14 September, 2012

क्राकोव डायरीज-७-ये खिड़की जिस आसमान में खुलती है, वहाँ कोई खुदा रहता है?

'I see dead people.'
-from the film-Sixth Sense
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आज ऑफिस से घर लौटते हुए एक मोड़ पर ऐसा लगा कि कोई बुढ़िया है, कमर तक झुकी हुयी. मैंने रिव्यू मिरर में देखा...वहाँ कोई नहीं था. मैं उस बारे में सोचना नहीं चाहती. जो वाक्य दिमाग में अटक गया वो सिक्स्थ सेन्स फिल्म का था...मुझे कोई अंदाजा नहीं कि क्यूँ. आज रात बैंगलोर में अचानक बारिश शुरू हो गयी. मुझे मालूम नहीं क्यूँ. जिंदगी में जब 'मालूम नहीं क्यूँ' की संख्या ज्यादा हो जाती है तो मैं चुप हो जाती हूँ और जवाब तलाशने लगती हूँ. 
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औस्वित्ज़-बिर्केनाऊ की आखिरी कड़ी लिखने बैठी हूँ...दिल की धड़कनें बेहद तेज रफ्तार हैं...जैसे मृत्यु के पहले के आखिरी क्षण से खींच कर लाया गया है मुझे. 
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बिर्केनाऊ एक श्रम शिविर था...इन शिविरों को यातना शिविर या मृत्यु शिविर कहने से शायद लोगों में शक पैदा हो जाता कि इन शिविरों का मूल उद्देश्य क्या है. होलोकास्ट इतने योजनाबद्ध तरीके से कार्यान्वित किया गया था कि सबसे नयी तकनीक...पंचिंग कार्ड का इस्तेमाल करके हर शिविर में आने, रहने और मरने वाले लोगों का पूरा बहीखाता तैयार किया गया था. उन्नत तकनीक के कारण हिटलर की फ़ौज के लिए ज्यु आबादी को ढूँढना भी आसान हुआ था. 

बिर्केनाऊ में काम करने के लिए आये कैदियों को पहले शावर कमरे में भेजा जाता था. उनके बाल उतारे जाते थे और उन्हें पहनने को कपड़े और जूते दिए जाते थे. बिना ऊनी मोजों के लकड़ी के जूते जो अक्सर सही फिटिंग के भी नहीं होते थे और उनमें चलना बेहद तकलीफदेह होता था. बिर्केनाऊ में हर कदम इतना सोचा समझा था कि व्यक्ति जल्द से जल्द मर जाए. 

तीन लेवल के बंक बैरक
बिर्केनाऊ में औरतों के बैरक अभी तक सही सलामत हैं क्यूंकि ये ईंटों के बने हैं. बैरक में लोगों के सोने की जगह होती थी. ईंटों और लकड़ियों से बाड़ जैसे बंक बेड्स बनाये गए थे. लगभग छः फीट बाय चार फीट का एक सेक्शन होता था. एक सेक्शन में पाँच से सात औरतों को सोना पड़ता था. बैरक में तीन लेवेल्स होते थे...और उनपर पुआल बिछी रहती थी. बेहद ठंढी जगह होने के बावजूद ईमारत को गर्म रखने का कोई इंतज़ाम नहीं था. अक्सर बारिशें होती रहती थीं और छत टपकती रहती थी. चूँकि फर्श भी कच्चा होता था इसलिए कीचड़ बन जाता था. निचले तले पर सोने वाली औरतों को चूहों का खौफ रहता था. बिर्केनाऊ के चूहे बेहद बड़े और माँसाहारी थे. वे सोती हुयी औरतों को कुतर खाते थे...कभी हाथ का मांस नुचा होता था कभी पैर का...कभी चेहरे का.

इन बैरकों के साथ कोई छेड़खानी नहीं की गयी है. वे अभी भी वैसे के वैसे हैं. ऊपर वाले लेवल पर एक खिड़की होती थी. मैं वहाँ खड़ी सोच रही थी...कि यहाँ जो औरतें सोती हैं वो रात को खिड़की से ऊपर देख कर क्या सोचती होंगी...क्या उनके मन में भगवान या किसी ऐसी शक्ति का ख्याल आता होगा. अपने बच्चों को कौन सी कहानियां सुनाती होंगी...क्या बच्चे परियों पर यकीन करते होंगे? क्या कोई माँ अपने बच्चे को झूठे ख्वाब दिखाती होगी कि ये सब कुछ दिनों की बात है फिर सब कुछ नोर्मल हो जाएगा. नोर्मल क्या होता है? बिर्क्नाऊ में पैदा हुए बच्चे और अन्य छोटे बच्चे जो इन कैम्पस में रहते थे उन्हें मालूम ही नहीं था कि लोगों का 'नाम' भी होता है. जन्म के समय से दागे गए ये बच्चे सिर्फ संख्या को पहचानते थे. 

बिर्केनाऊ के निर्माण के एक साल तक वहाँ किसी तरह के शौचालय या नहाने की व्यवस्था नहीं थी. बारिश होती थी तो लोग नहा लेते थे. एक आम दिन ३ बजे शुरू होता था. ठीक समय के बारे में लोग एकमत नहीं हैं. तीन बजे लोग उठते थे और नित्य कर्म निपटाते थे. हर कैदी को आधा घंटा निर्धारित किया गया था. इससे ज्यादा समय लगने पर वे सजा के हक़दार होते थे. तीन बजे से सात बजे तक रोल कॉल चलती थी. ये सबसे अमानवीय अत्याचारों का वक्त होता था. एसएस गार्ड्स कैदियों को अक्सर घंटों खड़े रहने बोल देते थे...तो कभी उकडूं बैठ कर दोनों हाथ ऊपर उठाये रखने का निर्देश जारी कर दिया जाता था. अगर किसी कैदी की मृत्यु हो गयी है तो भी उसे रोल कॉल में माजूद होना होता था. मृत कैदी बिना कपड़ों के होता था और उसे दो कैदी कन्धों पर उठाये रखते थे. अगर रोल कॉल में कोई एक कैदी भी नहीं मिल रहा होता था तो बाकी सारे कैदी तब तक खड़े रहते थे जब तक खोया हुआ कैदी मिल नहीं जाता. 

रोल कॉल के बाद खाना मिलता था और लोग काम पर लग जाते थे. खेतों में दिन भर काम किया करते थे. हर कैदी का अपना काम का कोटा होता था. शाम को सजाएं दी जाती थीं. अगर किसी ने अपने कोटे से कम काम किया है...या साथी कैदी की मदद करने की कोशिश की है...या दिन में एक बार और बाथरूम गया है तो कैदियों को सजा मिलती थी. सजा अक्सर मृत्युदंड ही होती थी. इसके अलावा कैदियों को भूखे मारना जैसी भी सजाएं थीं. लोगों को दिन में ७०० कैलोरी से अधिक का खाना  नहीं मिलता था. एक आम इंसान की खाने की कम से कम १००० कैलोरी की जरूरत होती है. जर्मन ज्यु आबादी को बिना ढंग का खाना दिए और दिन भर काम करवा कर थकान और भूख से मारना चाहते थे और उसमें वे बेहद सफल हुए थे. श्रम शिविर में आने के तीन से चार महीनों के अंदर लोग मर जाते थे. 

बहुत लोग आत्महत्या करने की कोशिश में बाड़ पर खुद को फ़ेंक देना चाहते थे पर अक्सर गार्ड अपने वाच टावर से पहले ही उन्हें गोली मार दिया करते थे. बिर्नेकाऊ के इन्सिनेरेटर में जब लोगों को जलाने की जगह नहीं बचती थी तो लोगों को खुले में जलाया जाता था. कैदियों और आसपास के कई गाँव वाले दुर्गन्ध से जान जाते थे कि इन शिविरों में क्या चल रहा है मगर किसी के पास कोई उपाय नहीं था. जब कुछ कैदियों ने बाहरी दुनिया को बताने की कोशिश की कि बिर्केनाऊ जैसे कैम्पस में हज़ारों की संख्या में यहूदियों की हत्या हो रही है तो बाहरी दुनिया ने इसे अतिशयोक्ति कह कर नकार दिया. 

बिर्केनाऊ और लगभग चालीस अन्य छोटे कैम्पस का उद्देश्य था कि कैदी वाकई जानवरों जैसे हो जाएँ, हर इंसानियत से परे. बिर्केनाऊ में जिन्दा रहने के सबसे बेसिक इंस्टिंक्ट्स की जरूरत थी. सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट. इन शिविरों में रहने वाले लोगों में किसी तरह की मानवीय भावना नहीं बचती थी. कुछ दिन बाद वे किसी भी तरह जिन्दा रहना चाहते थे...अपने साथी का सामान झपट लेना, लोगों का खाना छीन कर खा लेना, किसी की मदद नहीं करना. छः महीने तक जिन्दा रहते कैदियों में बेहद हताशा और फिर उदासीनता भर जाती थी. उनकी आँखों में जिंदगी की कोई चमक नहीं रहती थी. 

जब सोवियत सैनिकों ने बिर्केनाऊ में प्रवेश किया तो उन्हें लगा कि वे कैदियों को आजाद कर रहे हैं तो कैदी खुश होंगे...मगर वहाँ रहने वाले लोग किसी भी भावना को महसूस करने लायक बचे ही नहीं थे. उनमें कोई उम्मीद नहीं थी...न जीने का कोई उद्देश्य था. वे पूरी तरह हारे हुए लोग थे. 

बिर्केनाऊ कैम्प से छुड़ाए गए अधिकतर लोग कुछ महीनों के अंदर मर गए थे. मगर जो बाकी बचे सिर्फ और सिर्फ अपनी जिजीविषा के कारण. साहस...उम्मीद के खिलाफ जा कर भी जीने का साहस... जीवन की अदम्य लालसा...ये एक बीज की तरह होती है...शायद आत्मा के अंश में गुंथी हुयी...कि सब हार जाने के बाद भी खुद को जोड़ लेती है. अंग्रेजी में एक बड़ा खूबसूरत फ्रेज है...The indomitable human spirit.

शिविर के बैरक्स में घूमते हुए हालात वैसे ही थे जैसे उन दिनों रहे होंगे जब यहाँ अनगिन कैदी काम करते होंगे...आसमान काले बादलों से पूरा घिर गया था...दिन में अँधेरा था और उदासी थी. हम अपनी गाइड के पीछे चुप चाप चल रहे थे. बहुत तेज बारिशों के कारण अधिकतर लोग भीग गए थे...भीगने की शिकायत बेहद तुच्छ  लग रही थी...किसी ने एक शब्द भी नहीं कहा. जिस रास्ते हम अंदर गए थे...उसी रास्ते वापस आ रहे थे. वो एक लंबा रास्ता था जिसके आखिरी छोर पर मृत्यु द्वार था...डेथ गेट. आखिरी कहानियां कुछ उन लोगों की थी जिन्होंने इतने मुश्किल हालातों में अपना आत्म-सम्मान और इंसानियत नहीं खोयी...अपने छोटे छोटे तरीकों से लोगों ने मौत और बदतर जीने के हालातों में भी दुनिया को औस्वित्ज़ के बारे में बताने की कवायद जारी रखी. 

हम जब बिर्केनाऊ के दरवाजे से बाहर आ रहे थे तो बादल छंट गए थे और धूप निकल आई थी. जैसे वाकई सब कुछ अतीत था और पीछे छूट गया था. मुझे इतिहास कभी पसंद नहीं रहा...मुझे समझ ही नहीं आता था कि जो बीत गया उसमें लोगों को इतना इंटरेस्ट क्यूँ रहता है. अब मैं समझती हूँ कि इतिहास को पढ़ना इसलिए जरूरी है कि हम उन गलियों से सबक ले सकें और उसे दोहराने से बच सकें. 

मैं नहीं जानती कि वो लोग कैसे थे...हाँ उनका दर्द जरूर समझ आता था...और सिर्फ समझ नहीं आता...घुल आता है जिंदगी में. औस्वित्ज़ जाना मेरे लिए जिंदगी को बदल देने वाला अनुभव है. कुछ चीज़ें उपरी सतह पर नज़र आ रही हैं...कुछ बवंडर लहरों के नीचे कहीं फॉल्ट लाइन्स में उठ रहे हैं. मुझे लगता था कि मनुष्य की डिफाइनिंग क्वालिटी होती है उसकी प्यार करने की क्षमता मगर मैंने जितना कुछ नया देखा उससे ये सीखा कि प्यार से भी ऊपर और सबसे जरूरी भाव है 'करुणा'. आज के दौर में बेहद नज़र अंदाज़ कर देने वाला भाव है...लेकिन Kindness is the most important of all human values. 
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शब्द कभी पूरे नहीं पड़ते...भाषा का दोष है या भाव का...या शायद कोई भाषा बनी ही नहीं है जिसमें बयान किया जा सके...इसलिए...चुप. चुप. चुप. इस जगह की हवा में. मिट्टी में. पानी में. रूहें हैं. दर्द है. पोलैंड कहता है...यहाँ आओ...इतने कम लोग कैसे उठाएंगे दुःख का इतना बोझ. हम सब थोड़ा थोड़ा दर्द समेट लाते हैं उस मिट्टी से...फिर टुकड़ा टुकड़ा बांटते हैं उसे. दर्द की फितरत है. बांटने से घटता है.




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मैंने औस्वित्ज़-बिर्केनाऊ में ज्यादा तसवीरें नहीं खींची...ये एक आधे मिनट का विडीयो है...बिर्केनाऊ का विस्तार देखने के लिए.  
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09 August, 2012

क्राकोव डायरीज-६-अंतिम छलावे की ओर

You gotta hold on to something.
- from the film...Blue
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मुझे मालूम नहीं कि ऐसा सबके साथ होता है या सिर्फ मेरे साथ हो रहा है मगर ये सीरीज लिखना एक बेहद तकलीफदेह प्रक्रिया है...सर में भयानक दर्द शुरू हो जाता है और चक्कर आने लगते हैं. थकान होने लगती है...आँखें दर्द करने लगती हैं. मेरे लिए लिखना अधिकतर दर्द को कहीं दफना देने जैसा है मगर इस बार लिखना कुछ ऐसा है जैसे बदन में चुभी किसी कील को ओपरेट करके निकालना...उसे बाहर करना भी जरूरी है. थोड़ा इसलिए भी लिख रही हूँ कि मालूम नहीं कैसे पर बहुत से लोगों को होलोकास्ट के बारे में उतना मालूम नहीं है जितना मैं सोचती थी.
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औस्वित्ज़ म्यूजियम से निकल कर हम बिर्केनाऊ जा रहे थे. बिर्केनाऊ को औस्वित्ज़-२ के नाम से भी जाना जाता है. बिर्केनाऊ मृत्यु शिविर की शुरुआत अक्टूबर १९४१ में हुयी थी...औस्वित्ज़ में जब कैदियों की भीड़ बहुत बढ़ गयी तो बिर्केनाऊ में एक नया और बड़ा कैम्प बनाने का निर्णय लिया गया. हिटलर के निर्देशानुसार यहाँ 'फाइनल सोल्यूशन' यानि कि ज्यू आबादी का जड़ से खात्मा किया जाना था. बिर्केनाऊ कैम्प अधिक से अधिक संख्या में लोगों की एक साथ हत्या के लिए बनाया गया था.

एक्स्टर्मीनेशन/उन्मूलन के लिए औस्वित्ज़ का चुनाव दो मुख्य कारणों से किया गया था...दो तरफ से नदियों से घिरा होने के कारण इसे छुपाये रखना आसान था और यहाँ तक रेल लाइन आती थी जिसके कारण जर्मन अधिकृत क्षेत्रों से ज्यु अधिकाधिक संख्या में यहाँ लाये जा सकते थे. 'फाइनल सोल्यूशन टू द जुविश प्रोब्लम' के तहत हिटलर का उद्देश्य पूरी ज्यु रेस का खात्मा करना था. ज्यु को सबह्यूमन कहा गया यानि कि मनुष्य से कमतर...किसी जानवर सरीखे...इसलिए धरती से उनका उन्मूलन जरूरी था. सिलसिलेवार तरीके से पहले ज्यू आबादी को शहरों से निकाल कर घेट्टो में ठूंस दिया गया जहाँ से उन्हें औस्वित्ज़ और दूसरे कोंसेंट्रेशन कैम्प भेज दिया जाता था. अमानवीय स्थिति में घेट्टो में रहने वाली ज्यु आबादी को कहा जाता था कि उन्हें नौकरी और दूसरे कार्यों के लिए भेजा जा रहा है और वे वापस अपने घर आयेंगे या फिर वहीं बस सकते हैं.

बिर्केनाऊ तक ट्रेन लाइन आती थी. मालगाड़ी जैसे डब्बों में लगातार दस दिन तक सफ़र करके दूर देश जैसे फ़्रांस से ज्यु आबादी आती थी. इन डब्बों में जानवरों की तरह लोगों को डाल दिया जाता था...ट्रेनें कहीं भी रूकती नहीं थीं. डब्बे में सिर्फ एक छोटी सी रोशनदान नुमा खिड़की होती थी...इन स्थितियों में बहुत सी बीमारियाँ भी फ़ैल जाती थीं.

जब हम बिर्केनाऊ पहुंचे तो बारिश शुरू हो गयी थी. अधिकतर लोग इस मौसम के लिए तैयार नहीं थे...हम में से कुछ के पास छतरियां थीं...औस्वित्ज़ में चार मिलियन लोगों की हत्या की गयी थी...आंकड़े तस्वीर नहीं बनाते...लेकिन जब मैं बिर्केनाऊ के उस गेट से अंदर गयी तो जहाँ तक नज़र जाती थी काँटों की दोहरी बाड़ थी...जैसे कि मरना भी एक बार नहीं दो बार होता हो. इन बाड़ों में बिजली दौड़ती थी और इतना हाई वोल्ट हुआ करता था कि इनसे 'हूहू' की भयावह आवाज़ आती थी. बिर्केनाऊ एक फ़्लैट जगह है इसलिए दूर क्षितिज तक फैले शिविर के चिन्ह दिख रहे थे. हमारे दायें तरफ ईटों की बनी इमारतें थीं जिनमें औरतें काम करती थीं और दायें तरफ लकड़ी की इमारतों के अवशेष थे...जो साफ़ दिखता था वे चिमनियां था...ठंढ के दिनों में बैरक को गर्म रखने के लिए चिमनियां होती हैं मगर यहाँ ये सिर्फ बाहरी आडम्बर था लोगों को दिखने के लिए. इन चिमनियों का इस्तेमाल नहीं होता था. उस जमीन पर खड़े होकर पहली बार महसूस हुआ कि ये कितना बड़ा ऑपरेशन था और कितने सारे लोग यहाँ मारे गए थे. हमारी गाइड ने बताया कि अगर जरा सी भी बिजली चमकी तो हमें वापस लौटना होगा क्यूंकि इतनी सारी लोहे की बाड़ों के कारण ये जगह घातक हो जाती है.

Death-door at Birkenau
बिर्केनाऊ के प्रवेशद्वार से ट्रेन ट्रैक बिछे हुए हैं...इस आखिरी ट्रैक पर जर्मन कब्जे के अंतर्गत देशों से ज्यु आबादी ट्रेनों में भर कर लायी जाती थी. वहाँ एक रेल का डिब्बा अभी भी मौजूद था...हम चलते हुए मेन गेट से कोई तीन सौ मीटर दूर पहुंचे जहाँ पर 'सेलेक्शन' होते थे. ट्रेन से उतरे लोगों को अपना सारा सामान छोड़ कर एक कतार बनानी होती थी. सेलेक्शन अर्था
त जीवन या मृत्यु का चुनाव...जो कि एक डॉक्टर करता था. दस दिन के थके...अमानवीय स्थिति में आये लोगों को सिर्फ एक नज़र देख कर डॉक्टर निर्णय लेता था कि वे जीने के काबिल हैं या मरने के. लोगों को दायें या बांयें भेजा जाता था. दायें यानी श्रम शिविर...जहाँ लोगों को बंधुआ मजदूरी कराई जाती थी जहाँ अधिकतर लोग तीन से चार महीने में ही दम तोड़ देते थे. बायीं ओर भेजे गए लोग सीधे गैस चेंबर में मरने के लिए भेज दिए जाते थे.

कमजोर व्यक्ति, बच्चे, बूढ़े, माएं जिनके छोटे बच्चे थे और जो पुरुष बायीं ओर भेजे जाते थे उन्हें गैस चैंबर भेजा जाता था. बिर्केनाऊ में पहले दो गैस चेंबर थे...लिटिल रेड हाउस और लिटिल वाईट हाउस...मगर फिर बाद में सिलसिलेवार ढंग से और बेहतर तरीके से अधिक लोगों को मारने और जलाने के लिए और गैस चेम्बरों का निर्माण किया गया. गैस चेम्बर्स में ही मृत शरीरों को जलाने के लिए भट्टियां भी थीं...इन्सिनेरेटर. लोगों को कहा जाता था कि ये शावर लेने के कमरे हैं और धोखे की ये प्रक्रिया इतनी सम्पूर्ण थी कि गैस चेम्बरों में शावरहेड भी लगे हुए थे. जिस वक्त लोग गैस चेम्बर्स की ओर जाते थे एक बैंड संगीत बजाता रहता था.

लोगों को कहा जाता था कि अब आप नहाने के लिए शावरहाल में जायेंगे. अपने कपड़ों का स्थान और नंबर अच्छे से याद कर लें. कपड़े टांगने के लिए खूँटी या कहीं कहीं लोकर होते थे. दस दिन सफ़र करने के बाद जिस चीज़ की वाकई जरूरत महसूस होती थी वो था अच्छे से पानी से नहाना...लोगों को कहा जाता था कि शावर के बाद आपको गर्म कॉफी या सूप मिलेगा और फिर उनकी योग्यताओं के हिसाब से उन्हें काम दिया जाएगा. शावर के बाद उनके प्रियजन उनका इंतज़ार कर रहे हैं. किसी को अनुमान भी नहीं होता था कि वे दरअसल गैस चेंबर में जा रहे हैं. कहीं से कोई भी प्रतिरोध नहीं होता था और लोग खुद चलकर उस बड़े हॉल में चले जाते थे. जब हॉल पूरा भर जाता था तो बाहर से दरवाजा बंद कर कर कुंडियां लगा दी जातीं थीं और चिमनी में से ज़ैक्लोन बी के पेल्लेट्स अंदर डाल दिए जाते थे. इनसे जहरीली हायड्रोजेन सायनाइड गैस निकलती थी. गैस चेंबर की मोटी दीवारों के बाहर तक भी लोगों के चीखने चिल्लाने की आवाजें आती थीं...इन आवाजों को बाकियों तक पहुँचने से रोकने के लिए दो मोटरसाईकिल स्टार्ट कर के छोड़ दिए जाते थे कि इंजन के शोर में चीखों की आवाज़ दब जाए लेकिन चीखों का शोर दबता नहीं था.

गैस चेंबर के भग्नावशेष 
लगभग पन्द्रह से बीस मिनट में सब शांत हो जाता था. मृत लोगों के शरीर को जलाने के लिए भट्ठियां वहीं मौजूद होती थीं. सौंडरकमांडो जो कि कैदियों में से ही चुने जाते थे...उनका काम होता था मरे हुए लोगों के बाल उतारना और दांतों में मौजूद सोने की तलाश करना. इसके बाद मृत शरीर को भट्टियों में जलाया जाता था. मृत शरीर जलाने में कम वक्त लगे इसलिए रेलें बनी हुयी थीं जिनसे शरीर को भट्ठी में डालने में आसानी हो. भट्ठी से निकलने वाली राख को खाद की तरह इस्तेमाल किया जाता था. कई बार गैस चेंबर  में मरने वाले लोगों की तादाद इतनी हो जाती थी कि डेडबॉडी खुले में जलानी पड़ती थी. जलने की गंध दूर दूर तक फैलती जाती थी. सौंडरकमांडो में आत्महत्या की दर सबसे ज्यादा थी, उनके बाद बैंड मेम्बर्स सबसे ज्यादा आत्महत्या करते थे. हर कुछ महीनों में सौंडरकमांडो की पूरी फ़ोर्स को गैस चेंबर भेज दिया जाता था. हर नए बैच को पहला काम मिलता था अपने से पहले बैच के सौंडरकमांडो के मृत शरीरों को इनसिनेरेटर में डालना.

औस्वित्ज़ में पाँच गैस चैम्बर थे. एक बार में लगभग २ हज़ार लोग मारे जा सकते थे. गैस चेम्बरों की क्षमता बहुत ज्यादा थी लेकिन मृत शरीर को जलाने में बहुत वक्त लगता था इसलिए लोगों के मरने की दर कम थी. एक ट्रेन में आये लगभग तीन चौथाई लोग सीधे गैस चेंबर भेज दिए जाते थे. जब जर्मनी की हार होने लगी तो गैस चेम्बर्स की हकीकत को दुनिया से छुपाने के लिए गैस चेम्बर्स को बम से उड़ा दिया गया इसके बावजूद गिरी हुयी इमारत का हिस्सा मौजूद है...गैस चेंबर के बाहर राख का ढेर है. उस पूरे क्षेत्र को कब्रिस्तान का दर्जा दिया जाता है.
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लगातार बारिशें हो रहीं थीं...अँधेरा घिर आया था...लोग भीगते हुए गाइड के साथ चल रहे थे जो हमें सिलसिलेवार ढंग से वहाँ हुयी घटनाओं के बारे  में बताती जा रही थी. बहुत ही हौलनाक किस्से थे...जलती भट्ठियों में जिन्दा फेंके गए लोगों की...बाड़ों से सट कर आत्महत्या करते लोगों की...ठंढ में ठिठुरते हुए हम वक्त में बहुत पीछे चले गए थे. बिर्केनाऊ में किसी भी जगह पर खड़े होकर देखने से दूर दूर तक सिर्फ बाड़ों की दो कतार दिखती है...जमीन आसमान जब कटा हुआ.

औस्वित्ज़ बिर्केनाऊ में चलते हुए ऐसा बार बार लगता है कि वहाँ घटी हुयी घटनाएं आपकी आँखों के सामने दुबारा घट रही हैं. लोगों की चीखें...उनका धोखे से मारे जाना...जर्मन SS...सब दिखते हैं. वहाँ जाना किसी कैदखाने में जाने जैसा है. कितना भी चाह लेने पर वो तसवीरें कहीं नहीं जातीं. एक पुराने गिरे हुए काली ईटों के मलबे से दहशत होती है...राख का ढेर देखते हुए सोचती हूँ कि यहाँ जो खाना खा रही हूँ...जमीं में जाने किसके शरीर के अवशेष बाकी होंगे.

हम जिंदगी को कितना टेकेन फॉर ग्रांटेड लेते हैं...और प्यार को...दोस्ती को? एक एक सांस को तरसते लोगों की चीखें वहाँ की बारिश में घुल गयी हैं. मेरा मन शांत नहीं होता. अंदर इतना कुछ भरा हुआ है...जाने कितनी किस्तों में बाहर आएगा. ऐसा लिखना हर बार मुझे अंदर से तोड़ता है. मैं वहाँ भटकती अनेक आत्माओं की शांति के लिए प्रार्थना करती हूँ. 

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