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24 March, 2026

छोटी गोल्ड फ्लेक, दिल पर नन्हे लेकिन मज़बूत टांके लगाने के लिए।

जल्दी ठीक हो जाने के लिए, हर बड़े ज़ख़्म को सिलना पड़ता है। छोटी गोल्ड फ्लेक चाक हुए कलेजे को सिलती है। अगर गहरा ज़ख़्म देख कर तुम्हारे हाथ थरथरायें न तो। ये मत कहो, कि छोटी गोल्ड-फ्लेक ही क्यूँ, कि फिर हम कहेंगे, ठीक होने की इतनी भी जल्दी किसको है, फिर तुम क्यूँ भेज देना चाहते हो ऐसे दुखते कलेजे वाली लड़की को ख़ुद से इतना ज़्यादा दूर…बकवास मत करो, कि एक फ्लाइट की दूरी को दूर थोड़े कहते हैं, पास ही कहते हैं…जब मन हुआ, उड़ कर आ जाना। 

ये चारागर है जिसके पास चुप्पी भी है, बातें भी…कहो, किससे ठीक होना है तुम्हें…या कि गोली देना हो तो वो भी है, गोली खानी हो, तो सो भी है…वन स्टॉप सॉल्यूशन। मर्ज़ अच्छा लगने लगे, इतना अच्छा चारागर।

इस सिगरेट की छोटी साइज पर नहीं जाओ, कि इस ऑपरेशन में ज़्यादा देर लगेगी…मेरे पास वक्त ही वक्त है। देर तक पियेंगे, ढेर सारी, छोटी छोटी गोल्ड-फ्लेक…जब तक कि तुम्हारा कलेजा इतना जलने लगे कि भूल जाओ, किस ज़ख़्म की सिलाई करने बैठे थे। कैसा गर्म मौसम था, तसल्लीबख़्श। स्कूल में जब गर्मी छुट्टी होती थी, करने को कुछ नहीं होता था। नानीघर में गलियों में धूल फाँकते रहते थे या अमरूद के पेड़ पर लटके कौन सा अमरूद कब पकेगा का हिसाब लगाते रहते। जरूरी काम होते थे कि माँझे का धागा बनाने के लिए बल्ब या ट्यूबलाइट मिल जाये, तो कचरे में भी ढूँढने जाते थे कभी कभी। ग़ज़ब डेयरिंग हुआ करते थे उन दिनों। ये गर्मी वैसी ही थी। ये दिल वैसा ही होना चाह रहा था, तुम लोगों के साथ।

हम जो कि मग्गे में कॉफ़ी पीते हैं। तुम्हें मालूम, कमसेकम 350ml तो होनी ही चाहिए। छोटी कप में पीने में मजा नहीं आता। कुल्हड़ वाली चाय भी पीने जाते हैं तो लार्ज या मीडियम। यहाँ ये इत्ता छोटा छोटा काग़ज़ के कप में चाय, जैसे टेस्टिंग कराते हैं, वैसा ही…लेकिन जाते साथ थोड़े समझ आ जाता, कि एक ही बार में मग्गे भर चाय क्यों नहीं पी रहे। ये इत्मीनान की जगह थी। दोहराव की…बचपन में लिखना सीखते हैं तो बार बार एक ही शब्द लिखते हैं। खूब जोर से पेंसिल गड़ा कर नोटबुक में। डेस्क की लकड़ी में डिवाइडर से खुरच खुरच कर…याद करने वाली चीज़ को दोहराव चाहिए होता है, हमेशा।

अपने। तुम मेरे अपने लोग थे। मेरे अपने।

मैंने तुम्हें for-granted लिया। मैंने तुम्हें परेशान होने दिया, अपने लिए। कि ठीक है, आओ तुम भी सुबह सुबह उठ के एयरपोर्ट। ऐसा एक इतवार हो सकता है कि नींद से चोरी करें घंटे-घंटे भर। कि बिना किसी मुद्दे के बात करेंगे हम। कि उलझ जाएँगे किसी एक ही बिंदु पर और तुम झेल लोगे, एक रोज़, थोड़ी देर को…इतना साधिकार कहेंगे, अनाधिकार हो, तो भी सही।

मेरे भीतर दो तरह की कहानियाँ रहती हैं। एक जो फर्स्ट पर्सन में लिखी जाए और दूसरी जो थर्ड पर्सन में लिखी जाए। दोनों कहानियाँ अलग अलग तरह की होती हैं। सच वाली कहानियाँ थर्ड पर्सन में लिखना आसान रहता है और पूरी काल्पनिक कहानी फर्स्ट पर्सन में…लेकिन आसान रहता है, इसलिए जरूरी नहीं हैं कि हम वही चुनें। मेरे भीतर लगातार बोलते रहने वाली कोई एक किस्सागो लड़की रहती है। पंखे के चलने की आवाज़, ट्रैफिक का शोर…जैसे ये वाइट नॉइज़ है, जिसपर हम ध्यान नहीं देते, मेंटली म्यूट कर के चलते हैं, मैं भी कहानी सुनाने वाली इस लड़की को अक्सर अनसुना कर के जी रही होती हूँ। लेकिन कभी कभी लेकिन उसका दिमाग़ एकदम ही ख़राब हो जाता है, it is chaotic…फिर वो मेरे भीतर भूचाल, सूनामी और ज्वालामुखी फटने जैसी प्राकृतिक आपदाएँ बुला लेती है…

उस रोज़ स्टारबक्स जाने का मन नहीं किया था। घर से एक घंटा दूर। बाहर बाहर की सड़कें, बिल्कुल भी शोर नहीं, ट्रैफिक नहीं…मौसम प्लीजेंट…मार्च है, बेहद सुंदर फूल खिले हुए हैं सब जगह। खास तौर से गुलाबी और बैगनी फूलों से ढके हुए पेड़…ताम झाम का क़िस्सा ये था कि कुर्ते की स्लीव थोड़ी सी बाँह पर अटकती थी और हमको लिखते हुए अक्सर हत्थे चढ़ाने की आदत है…कुर्ता पहन कर हम अक्सर लिखने तो नहीं ही जाते हैं…तो पहले fabindia में पिट-स्टॉप लिए…एक अच्छा सा कुर्ता खरीदा, मैचिंग झुमके ख़रीदे और फिर उस कैफ़े गई जहाँ कोई मुझे नहीं जानता।

आसमान में बादल की आउटलाइन सुनहली हो गई थी। शाम से वहाँ बैठ कर नॉवेल का पहला चैप्टर लिखे। सोचे, दोस्त ऐसे होने चाहिए जिनके घर बिना एडवांस नोटिस के जा सकें। जिन्हें बुलाने के लिए जिद मचायें तो वे मान जायें और आ जाएँ चुपचाप…तबीयत अच्छी-ख़राब, ऑफिस का काम, पति की किचकिच, सब छोड़छाड़ के…लेकिन ऐसा कोई है तो नहीं शहर में…फिर क्या ही करते। दिल को समझाने की कोशिश की, वही एक बात, जो इतने साल से समझा रहे हैं…कि वैराग्य भी अभ्यास से आता है। कि हम प्रैक्टिस कर के सीख जाएँगे, किसी की याद में तड़पने के बावजूद उसे बताये बिना जिया जा सकता है। कि कायनात के सामने भीख मांगने की जरूरत नहीं है। कि ये वक़्त गुज़र जाएगा और अभी जिसे एक नज़र देखने के लिए जान जा रही है, वो सामने होगा और तुम उस से दूर रह सकोगी। 

भर दोपहर और शाम कहानी लिखने के बाद किसी दोस्त की बहुत तलब लगती है। जिसे थोड़ी सी कहानी सुनायी जा सके। लेकिन बैंगलोर में मेरी कहानी किसी को समझ में तो आएगी नहीं। कि इतना इंटेंस जीना ही क्यों है…क्या समझायें, कि हमेशा ये ऑप्शन नहीं होता कि एसी के टेम्परेचर की तरह इंटेंसिटी कम ज़्यादा कर सकें…इसका कोई रिमोट नहीं होता.

साथ लाए बैग में सब कुछ था, आईपैड, मैकबुक, तीनों नोटबुक्स, सारी कलमों में फ्रेश इंक, बहुत सारे पोस्टकार्ड्स…और मन में एक गहरा दुःख। ख़त लिखने को दिल किया…वर्ड डॉक्यूमेंट खोल के पढ़ा…इस ख़त पर मेरा नाम नहीं है, सिर्फ़ डियर राइटर…कि मुझे जाने बगैर, सिर्फ़ मेरे शब्दों से मुझे जाने वाला कोई मुझे इतनी प्यारी चिट्ठी लिख सकता है। क़ायदे से तो ऐसे लोगों से कभी मिलना नहीं चाहिए…कि हम तो इतने उलझे हुए, बेसब्र, परेशान से हुए रहते हैं। हमसे मिलने का कोई फ़ायदा नहीं है। टाइमपास भी नहीं, टाइमवेस्ट। ख़त इतनी बार पढ़ चुकी थी, ये भी लगा कि कैसे लोग हैं ना दुनिया में…उन्हें तारीख़ें याद रहती हैं, उन्हें नंबर्स समझ आते हैं…उनका समय तक का हिसाब ठीक है।

एक हम हैं, जिससे कल बिछड़े हैं, लगता है पिछले जन्म में मिलेंगे और दुखता ऐसे है कि अगले जन्म उनसे मिले बिना जीवन लगभग सारा बीत जाएगा। इसी बेनामी ख़त में बहुत सुंदर शेर लिखा मिला था

दुख ऐसा चाहिए कि मुसलसल रहे मुझे
और उस के साथ साथ अनोखा भी चाहिए
इक ज़ख़्म मुझ को चाहिए मेरे मिज़ाज का
या'नी हरा भी चाहिए गहरा भी चाहिए
- जव्वाद शेख 


उसका हिसाब थोड़ा भी पक्का होता तो गिन लेती न, कितने दिन बीते…कितने साल, कितने मौसम, कितने लम्हे…सड़क के साथ चलती नदी में कितना पानी बह गया। बहुत साल पहले हम अजनबी थे, बिल्कुल झूठी बात लगती है हालाँकि। उससे पहली बार मिलने पर भी अजनबी जैसा नहीं लगा कभी। ऊँचे पेड़ों वाले एक छोटे से शहर के किनारे किनारे नदी चलती थी। नदी के किनारे किनारे सड़क। सड़क पर छोटे छोटे पत्थर थे। नदी दिखने से ज़्यादा महसूस होती थी। ऐसा लगता था, कोई नदी बह रही है कहीं।

उस दिन ज़िद पर उतर आई थी कहानियों वाली लड़की, कि इस दिल को एब्सेंस से ज़्यादा presence की लत लग रही है, ऐसे में लतखोर दिल को थूर-थकूच के समझाना जरूरी था कि किसी के होने की आदत मत डालो…किसी को आवाज़ न दो। कोई है नहीं, इस भागते शहर में जो तुम्हारे बुलाने पर आ सके। सुनोगी तो मजबूरियाँ सुनायेंगे लोग तुम्हें, बहाने नहीं। इतना आसान थोड़े होता है तुमसे मिलना। लौंग राइड पर जाने के पहले जैसे बाइकर्स राइडिंग गियर पहनते हैं, वैसे ही तो दिल को पूरी तरह सेफ्टीगियर पहना कर लाना पड़ता है तुमसे मिलने। बहुत ताम-झाम है तुमसे मिलना, ऐसे नहीं होता कि कहो, पाँच मिनट में आ जाओ घर के नीचे, चलो, चाय पीने चलेंगे। उसको काल्पनिक किरदारों से मिलने के पहले पूरा तैयार होना होता था, साड़ी झुमके, बिंदी, परफ्यूम…लेकिन ज़िद इतनी भी होती थी कि बाल न उलझें…उससे कौन मिलेगा बिना तैयारी के…कोई भी नहीं तो। जो तुमसे नहीं मिलते, उनसे मिलने को काहे परेशान होती रहती हो। जो मिलना चाहते हैं, वाक़ई, जाओ उनसे मिल आओ।

मुझे लिखने के पहले बहुत से शहर देखने होते हैं। अहमदाबाद में एक पुरानी, रानी की वाव है। स्टेप-वेल…पत्थर की सीढ़ियों वाला कुआँ। याद नहीं बाओलियों के लिए मुझे इतना प्यार कब से उमड़ा…IIMC के अपने दोस्तों के साथ जब पहली बार एक स्टेपवेल देखी थी, तब से उनका सम्मोहन मेरे भीतर रहता है। मन के भीतर गहरे, कहानियाँ ऐसे ही रहती हैं।

सुबह साढ़े छह की फ्लाइट की टिकट साढ़े चार बजे कटायी…पंद्रह बीस मिनट में बैग पैक किया…और चालीस मिनट की ड्राइव है एयरपोर्ट की, सो बीस मिनट में आए, उड़ते उड़ते…दौड़ते हुए एयरपोर्ट के गेट से अंदर पहुँचे…जब वाक़ई प्लेन बोर्ड कर गए…तो दोनों मित्रों को ह्वाट्सऐप कर दिया, कि हम बोर्ड कर रहे…आ रहे हैं तुम्हरे शहर, लेकिन तुम परेशान मत होना. आराम से लंच पर मिलते हैं. और हमको एकदम ही नहीं लगा था, वे पहुँच जाएँगे.

अराइवल्स में बाहर निकलते ही देखा उन्हें…धूप थी. भली. वे भी. भले.
हम ऐसे मिले जैसे जन्मों के बिछड़े दोस्त हों…जैसे न मिलने का हिसाब किताब हम में से किसी को समझ नहीं आता…गाड़ी में बैठे, हम अपना सामान किसी को उठाने नहीं देते, लेकिन पता नहीं कैसे ये कुछ लोग होते हैं, आई insist वाले…कि मैं जाऊँगा ही नहीं तुम ऐसे बैग उठा के चलोगी तो…दूसरी बार मिल रहे थे। तीन साल हो चुके थे। और ये दोनों मुझे सिर्फ़ मेरे लिखे के कारण जानते हैं, प्यार करते हैं।

नाम लिखने का मन है, लेकिन नाम लेने से दोस्ती को नज़र लग जाएगी, इसलिए लिख नहीं रहे।
मैं, तुम, हम…कितना मुश्किल हो जाता है कभी कभी इन तीनों के साथ किसी किस्से को ज़िंदा करना।

पुरानी सीढ़ियों से उतर कर गई तो बहुत साल बाद उस गंध को पाया जो बचपन में गाँव में कुएँ की मुंडेर पर हुआ करती थी। मेरे गांव के घर में दो कुएँ थे, एक भीतरी आँगन में…एक बाहर गोहाल में, खेत के पास…और एक बड़ा इनारा, अर्थात्, बड़ा कुआं…जहाँ से पीने का पानी लाया जाता था। भीतरी कुएँ पर नहाना, मुँह हाथ धोना, और बर्तन माँजने का काम होता था। उन दिनों बर्तन और हाथ, दोनों राख से माँजे जाते थे।

सीले हुए पानी की गंध…मिट्टी और पुरानेपन की…कहानियों की गंध। ये ख़ुशबू मेरे भीतर अंधड़ की तरह उड़ती है…

मुझे अब अकेले घूमने की आदत हो गई है। दोस्तों की आदत छूट गई है।
रानी की वाव में पाँच तल्ले नीचे उतर कर पानी है। हम तीनों आसपास देखते हुए उतर रहे हैं। नक्काशीदार बलुआ पत्थर ऊपर में देखने से भुरभुरा लगता है। स्पंज की तरह सुराख़दार भी। नीचे के तल उतरने पर पत्थर छूने में खुरदुरा, ठंढा और सीला हुआ है। हम बातें कर रहे हैं। मुझे सब कुछ मायावी लग रहा। surreal, जैसे किसी कहानी के भीतर ही हैं। ऐसी पानी वाली ठंढी जगहों पर अजीब सा हौल फील होता है, सीने में…प्राचीन किसी दुख का होना। आत्मा में कुछ गहरा दुखना। दिल डूबता है।
मैं उन्हें देखती हूँ। सोचती हूँ, कितना अच्छा होता है, शहर में एक दोस्त होना भी।
चामुंडा चलते हैं, तुम्हारे सारे दुखों का इलाज वही है। मैं सोचती हूँ, कैसी जगह होगी…लेकिन कोई इमेज नहीं बनती। हम गाड़ी में जाते हैं…खुली हुई जगह है…मैदान जैसी, कुछ पेड़ हैं…वहीं बीच में बसा हुआ है…यह छोटा सा, चामुंडा. नखलिस्तान ही है. इतवार की सुबह है, एकदम अलसायी सी…लोग टेबल पर बैठे गप्पें कर रहे हैं…कुछ कुर्सियाँ हैं, सतरंगी धागे से बने कुछ छोटे स्टूल हैं…हम तीन कुर्सियों पर बैठ गए हैं…जूते मोजे उतार दिए हैं. पैर स्टूल पर टिका दिए हैं. 

छोटी छोटे काग़ज़ के कप में चाय…छोटी वाली गोल्ड फ्लेक…जेट फ्लेम लाइटर.
मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी ऐसी किसी दोपहर को नहीं जिया है…शायद इसलिए भी कि कॉलेज के दिनों में चाय पीते नहीं थे, न पॉलिटिक्स की ख़ास समझ थी। IIMC में पढ़ते हुए जब लोग चाय पीने टपरी पर निकलते थे, हम ऑलमोस्ट कभी नहीं जाते थे, ढाबा पर जाते थे तो खाने के लिए। चाय, सिगरेट, पॉलिटिक्स, ये तीनों मेरी ज़िंदगी में नहीं थे।
चाय हमको अब भी पसंद नहीं है। जैसे लोग सोशल ड्रिंकिंग करते हैं, वैसे ही हम चाय सिर्फ़ कुछ स्पेशल लोगों के साथ पीते हैं। ये स्पेशल लोग थे। ये स्पेशल सुबह थी।

इतनी बातें हम ख़ुद के लिए लिख रहे हैं, क्यूंकि बाद में सब कुछ भूल जाते हैं हम। दिन जल्दी शुरू करो तो वक्त धीरे बीतता है। ऐसा इतवार बचपन में ही मिलता था। पापा की छुट्टी रहती थी। सुबह रेडियो पर गाने चल रहे होते थे। मम्मी खाना बना रही होती थी। हम दोनों भाई बहन घास खोद रहे होते थे, कभी आलू उखाड़ रहे होते, कभी मटर छील रहे होते। फालतू के काम। झूला झूल रहे होते, दिन दिन भर। गर्मी छुट्टी के दिन।

कितना अच्छा होता है ना, जब किसी से कुछ नहीं चाहिये होता है। फिर जो भी मिलता है, सरप्लस ही होता है। भूख लगी थी ज़ोर से…दो प्लेट वेजिटेबल सैंडविच…खीरा टमाटर प्याज़, हरी चटनी और शायद चाट मसाला. गर्म. ताज़ा. इतना अच्छा स्वाद था. एक छोटू था, फ्लास्क और चाय के कप लिए घूम रहा था…हर कुछ देर में चाय पिला जाता था। 

कितने इत्मीनान से बैठे थे। कितनी सारी बातें थीं। बातें ही बस। लगातार चाय, सिगरेट, गप्प…लूप में. पानी की बोतलें. कहीं कोई शोर नहीं। कोई संगीत नहीं। कोई ackwardness नहीं…इतना सहज…जैसे कितने पुराने दोस्त हों. जैसे हम महीने की दो तीन इतवार तो वहीं पाये जाते हैं. ऐसी जगह, ऐसे लोग…कि अचानक से उस शहर में रहने को मन करने लगे। कितना कम चाहिए एक शहर से, लेकिन इतने पार्टिक्युअलर, कि बैंगलोर में सब कुछ मिलता…एक ऐसी दोपहर, एक ऐसी टपरी, दो ऐसे दोस्त और इतनी सारी बातें नहीं मिलतीं। इतना सा ही तो चाहिए, लेकिन। यही चाहिए। कोई और कॉम्बिनेशन नहीं।

कोई सिगरेट जला के पी हो, सो याद नहीं…जली हुई सिगरेट माँग माँग के पीते रहे…ये अलग था…ये अजब था…ये भीतर की किसी आग को बुझाता था…कोई दुख पे मरहम करता था। लोग क्यों पीते हैं सिगरेट, मालूम नहीं। हम हमेशा दोस्तों के साथ सिगरेट पीते हैं। सिगरेट अपने आप में एक किरदार है। किसी एक बार की सिगरेट, किसी दूसरे बार की सिगरेट जैसी नहीं होती। किसी एक दोस्त के साथ पी हुई सिगरेट, किसी दूसरे दोस्त के साथ पी हुई सिगरेट जैसी नहीं होती। हम अपने घर में बैठे, कभी सिगरेट पी भी रहे हैं तो ऐसे किसी रोज़ को याद करते हुए ही पी रहे। इत्ती इति सी गोल्ड फ्लेक…छोटी गोल्ड फ्लेक…कड़वी गोल्ड फ्लेक…दिल को जलाती, बुझाती…चारागर।

इम्पॉसिबल था यहाँ होना…ऐसे कैसे अचानक से खिंच के चले आए ना.
उसने ख़त में दिनों की गिनती लिखी थी…आख़िरी बार मिले हुए कितने दिन हुए.

मुझे रश्क हुआ उन दोनों से…कितना आसान था उनके लिए यहाँ होना…कितना मुश्किल और कितना rare है मेरे लिए, जो कितनों को सरलता से मिलता है।

जाना जितना आसान लग रहा था। लौटना उतना ही मुश्किल था।
गाड़ी से उतर कर गले लगे…गेट की ओर लौटे…दिल नहीं भरा…लौट लौट कर जाना चाहता था दिल. ये कौन से लोग हैं जो मुझ टूटे फूटे इंसान से इतना प्यार कर सकते हैं…तो क्या शहर की बात है? Bangalore finds me difficult to love. Impossible to love.
एक बार विदा करने के बाद, वो फिर से दौड़ कर साथ आई। गेट तक। हम दो बार गेट से लौटे। मैं वहाँ खड़ी उसे दूर जाते देखती रही। जब तक वो भीड़ में गुम नहीं गई।

मन नहीं भरा। मन कभी नहीं भरेगा।
फ़्लाइट में रोते सुबकते आई। मेरा कोई मायका है नहीं। बिन माँ की लड़कियों का मायका नहीं होता। लेकिन कभी कभी ज़िंदगी हमें ऐसे लोग दे देती है, जिनके पास हम लौट सकेंगे, ऐसा भरोसा होता है। कि वे हमारा इंतज़ार करेंगे। That they can love us in our worst form. That I can take them for-granted. हमेशा माँगते हुए ज़रूरत भर को हाथ फैलाने वाले हम, किफ़ायती लोग। ज़िंदगी उदार हो कर भेजती है, दोस्त, जान से प्यारे…जो बाँहें खोलते हैं और हमें समेट लेते हैं।

दिल दुखता है। लेकिन इसलिए कि भरा-भरा है।
और कुछ भी पूरी तरह ख़राब नहीं होता। सिगरेट भले बुरी चीज़ है, लेकिन हमारे लिए मरहम है।

ज़िंदगी के सबसे सुंदर मोमेंट्स की कभी तस्वीर नहीं होती। उससे बोला, चामुंडा की एक फोटो भेज दो…उसने जो भेजी है, उसमें एक कुर्सी पर बैग है, दो खाली कुर्सियाँ हैं…टेबल पर एक सिगरेट का पैकेट है…एक कप चाय.
मैंने अपनी ज़िंदगी में इससे उदास तस्वीर नहीं देखी।

दुनिया बदल रही है। हम जाने कब मिलेंगे फिर। लेकिन इस बदलती दुनिया में, मिल लिए। ये अच्छा है।
और अच्छे से ज़्यादा, ये काफ़ी है। 

22 March, 2025

एक घूँट चाय


साल 2025 मेरी ज़िंदगी में थोड़ा जल्दी आ गया। Hongkong में थी और वहाँ इंडिया से डेढ़ घंटा पहले है समय। वो डेढ़ घंटा कवर करने के लिए यह साल बहुत तेज रफ़्तार भाग रहा है। कुछ दिन पहले देखा कि तीन महीने बीत गए और मैंने कोई भी पोस्ट नहीं लिखी। जब कि इतना कुछ चल रहा है जीवन में। आज बस यूँ ही लिख रहे हैं...लहरें जो मन में उठ रहीं, यहाँ बिखर जायें...  

मुराकामी का नावेलनॉर्वेजियन वुडमुझे बहुत पसंद है। खास तौर से, जहाँ वह शुरू होता है। प्लेन लैंड करते समय लड़का सोचता है कि उस लड़की के गुज़रे हुए लगभग एक साल हो गया है और अब उसे उसका चेहरा पूरा याद करने में एक मिनट लगता है। इतना भूल जाना काफ़ी है कि उसके बारे में अब लिखा जा सके। जब उसके गुज़रे हुए ज़्यादा वक़्त नहीं हुआ था तो वह उसके बारे में नहीं लिख सकता था क्यूंकि यह बहुत दुखता था। 

हम में से सारे लोग अपने दुख के बारे में नहीं लिख सकते। लेकिन किसी और के लिखे में अपने दुख का हिस्सा देख कर थोड़ी राहत ज़रूर पा लेते हैं। किताब पढ़ना तन्हाई और मिलने के बीच की जगह है। हमारे हाथ में फिजिकली एक किताब होती है, हम छू रहे होते हैं किसी का लिखा हुआ और मन से हम विषय पर लिखी हुई जगह और अपने जिए हुए जगह के बीच के एक क्रॉसफेड में होते हैं। गाँव और कीचड़ भरी पगडंडी हर किसी के मन में अलग खुलती है। जंगल भी। मृत्यु और उससे उपजा दुख भी। 


मुझे अपनी किताबों से बहुत प्यार है। मेरे जीवन में प्यारे ऐसे लोग हमेशा बने रहे जिन्हें किताबों से बहुत-बहुत प्यार रहा। प्रमोद सिंह की एक किताब है, अजाने मेलों मेंउसकी पहली कहानी एक व्यक्ति के बारे में है जो पूरी दुनिया में भटक कर एक ऐसी किताबों की आलमारी ढूँढ रहा है जो सबसे अच्छी होदेश-विदेश घूमने के बाद और कई अद्भुत लोगों से मिलने के बाद भी उसे उनकी अलमारियों में कोई ख़ास बात नहीं दिखी। लेकिन एक छोटे से गाँव में, एक छोटे से परिवार के पास एक अद्भुत किताबों की आलमारी थीवैसी ही जिसे देख कर उसकी आँखें फटी रह जाएँवैसी ही जैसा वह कई दिनों से तलाश रहा था। मुझे धुंधली सी यह कहानी एक बार पढ़ने के बाद हमेशा याद रही। जैसे प्रमोद जी के पॉडकास्ट रहे, ज़िंदगी की खामोशी में घुले हुए हमेशा। मैं बैंगलोर 2008 में आई थीघर परिवार दोस्तों को छोड़ कर। एक छोटे से दो कमरे के घर को घर बना रही थी। किचन में अक्सर कुछ गुनगुनाती खाना बनाती रहती थी। लूप में वे पॉडकास्ट चलते रहते थे, जिनमें बहुत सी बतकही थीकुछ बेहद सुंदर फिल्मी और ग़ैर-फिल्मी धुनों के साथ रचे बसेकोई भरे हुए घर में माचिस खोज रहा है और लड़के को सिगरेट और माचिस लाने भेज रहा हैकोई दीदी की गुलाबी चप्पल के बारे में कहता है कि कैसी बेढ़ब थी वो चप्पल, लेकिन तुम्हारे पैर में कितनी सुंदर लगती थीतो कहीं जरा सा जापान को जान लेने की बात है और पीछे में ला वियों रोज़ गा रही हबारी मिसोरा की आवाज़ हैउन दिनों Shazam तो था नहीं, तो कोई धुन पसंद आई तो महीनों बौराए उसे खोजते रहते थे। पिछले साल भोपाल में प्रमोद जी से मिले तो उन्हें बताया कि उनके पॉडकास्ट एक अकेली लड़की के लिए, जो शादी के बाद नया घर बसा रही थीपरिवार और दोस्तों को छोड़ कर एक अनजान और अजनबी भाषा के शहर में आई थीवे पॉडकास्ट मेरा मायका थे। मेरे गाँव का घर। दीदी, बड़ी माँ, दादावे सारे लोग जो मुझसे छूट गए थे मुझे वे उन रिकॉर्डिंग में मिलते थे। कि हम कभी अकेले नहीं पड़े, कभी भी नहीं। 


मैंने अक्सर देखा है कि जो लोग मुझे ब्लॉग पढ़ कर जानते हैं उनके सामने सहज होना आसान होता है। इसलिए कि वे मेरे भीतर की बेतरतीबी को जानते हैं। जिन्हें मैं ब्लॉग पढ़ कर जानती हूँ, उनसे कभी भी मिली हूँ ऐसा जगा है कि उन्हें हमेशा से जानती थी। ब्लॉग पर लिखा एकदम मन का होता था। उस समय सोशल मीडिया के फिल्टर अस्तिव में ही नहीं आए थे। हम एकदम ही सच्ची डायरी लिखते थे कई बार यह सोचते हुए कि कौन ही पढ़ेगा और क्या ही फ़र्क़ पड़ेगाइनमें से कौन ही बहस करेगा। 


एक हैं हमारीप्रत्यक्षा…2005-08…याद नहीं कब इनका ब्लॉग पहली बार पढ़े, लेकिन उन दिनों जब सब लोग खूब खूब लिखते थे, हम खूब खूब पढ़ते थे। सोचते थे कैसा टटका स्वाद लगता है पढ़ने में। ऐसे मीठे-धूप सेकते लोग। ऐसा रंग-भीगा आसमान। प्रत्यक्षा इसलिए भी अच्छी लगती थीं कि वे संगीत के बारे में लिखती थीं, शास्त्रीय संगीत के बारे मेंअपनी माँ के गाने के बारे में और कभी कभी अपने गाने के बारे में भीपहर दोपहर ठुमरी में एक कहानी है, सजनवा तुम क्या जानो प्रीतहम अब भी कभी उस कहानी को पढ़ लेते हैं, लगता है उँगली के पोर में बाँस का एक महीन तिनका घुस गया हैअभी भी निकला नहीं है, दुखता हैउनके पानी वाले रंग देखते हैं। संगीतरंगऔर शब्दसबमें उनकी कहानी उतनी ही सुंदर है। एक बार उन्होंने पेरिस में The Shakespeare and Company के सामने की एक तस्वीर डाली थीबस ऐसे हीहम पेरिस गए तो लगभग दस किलोमीटर का चलना हो गया, लेकिन किताबों की उस पुरानी दुकान के आगे कुर्सी पर बैठ कर ख़ुशी हुईअपने प्यारे किसी के जिए हुए में किसी दूसरे समय में ठहर गए


फेसबुक पर देखते हैं कभी कभी धूप में भीगा उनका कमरा। सोचते हैं। ऐसे सुंदर लोग होते हैं। इसी दुनिया में। इतने सुंदर लोग। 


मेले में मिलते हैं तो बहुत हुलस कर बात करने का मन होता है। वे कहीं और जा रही थीं, दो और दोस्तों के साथहम बेख़याली में चलते रहे साथसामने चाय वाले स्टाल्स थेउनके दोस्त ने उनके हाथ में चाय का कुल्हड़ दे दियाहम टाटा कहने को आए, कि ठीक है, हम फिर मिलते हैंवे कहती हैं, ‘अरे, चाय का एक घूँट तो ले लो!’ हम अचरज में देखते हैं। वे बड़ी हैं हमसे उम्र में, अनुभव में, stature मेंहर तरह सेहम उनकी चाय कैसे जुठा देंलेकिन हम इस प्यार को जानते हैं, हाँ ये प्यार हमारे हिस्से आया बहुत कम। उस समय वे बस हमारे घर-परिवार की बड़ी दीदी हो गईंये मेरे लिए इतनी बड़ी बात थी कि ताउम्र याद रहेगीहमेशा हमेशाकि जैसे शायद हम रहे अपने से छोटों के लिए, कोई हमारे लिए भी हो सकता हैचाय का एक छोटा सा घूँटमन प्राण में ख़ुशी का बिरवा रोपता हुआइस दुनिया के सुंदर होने और बने रहने की उम्मीद का बिरवा। 


आज सुबह उठे तो मन खाली था। सोचा कुछ पढ़ लेते हैं। 


किताबों से भरे हुए घर में होना एक कमाल की चीज़ है। आपने सामने कई दुनियाएँ खुली हुई होती हैं। वे लोग जो पूछते हैं कि इतनी किताबें क्यों ख़रीदती हो। क्या तुमने सारी किताबें पढ़ ली हैं जो तुम्हारे घर में हैं? तो बात इतनी ही है कि हम समग्र में कुछ नहीं पढ़ पाते हैं। पूरा पढ़ लेने से ही कौन सा किताब जाती है समझ में पूरी पूरी। निर्मल कीवे दिनकितने बार पढ़ चुकी हूँ, अब भी हर बार ख़ुद से पूछती हूँ कि जब वो पूछती है, ‘तुम विश्वास करते होतो किस चीज़ पर विश्वास करने की बात कह रही है। मुझे नहीं आता समझ मेंमैं बस भटकती हूँ उन किरदारों के साथदूसरे शहरों में, दूसरे लोगों से मिलते हुए। 


पिछले कुछ सालों में हमारी ज़िंदगी बहुत विजुअल हो गई है। फ़ोन हमें कई दृश्य दिखाता है, कमोबेश ठीक-ठीक रंगों में। वीडियो भी। बिना देखे भी हमने बहुत कुछ देखा है। कई सारे रंग हमारी ज़िंदगी में घुले हैं। पहले ऐसा नहीं था, हमने सिर्फ़ पढ़ा था और पढ़ कर ही सोचते थे कि समंदर का फ़िरोज़ी रंग कैसा होता होगा। फ़िरोज़ी स्याही से लिखते थे और आँख बंद कर सोचते थे कोई ब्लैक शर्ट में कैसा दिखेगा। अब आप जो भी इमैजिन करते हैं, ऐसे AI ऐप्स गए हैं कि आपके सोचने के हिसाब से तस्वीर बना कर दिखा देंगे। अब सच में इमैजिन करना ही दुर्लभ होता जाएगा। सब कुछ दिख ही रहा है सामने तो आँख बंद कर के कुछ देखने की क्या ज़रूरत है।


दुख की दुनिया भीतर है। छोटी सी किताब है। आज यही किताब उठायी। दृश्य खुलता जाता है। इसका गाँव, कीचड़ वाला रास्ता, घर तक पहुँचने की यात्रासब खुलता है आँख के आगे। कुछ पन्ने पढ़ के रख दी किताब। अभी यह पढ़ने का मन नहीं है। इसे पढ़ते हुए घर तक पहुँचने की वे यात्राएँ याद आयीं जहाँ अंतिम दर्शन के लिए परिवार के लोग सफ़र कर रहे हैं। मैं ऐसे दो बार गई हूँ। एक बार दादी के गुज़र जाने पर, और एक बार अपने बड़े मामाजी के गुज़र जाने पर। इस विषय पर पढ़ना मुश्किल हैआप एक ख़ास मनःस्थिति में इसे पढ़ सकते हैं। किताब पढ़ने का बहुत मन है, कई बार उलटाती पलटाती हूँ। बीच के कुछ वाक्य पढ़ती हूँ। बेहद सुंदर, सुगढ़ गद्य। जिससे प्यास मिट सकती हो लेकिन मन दुखता है। रख देती हूँ फिर से, कि आज नहीं। 


इसे पढ़ते हुए उस अच्छे एडिटर के बारे में सोचा, जिसका ज़िक्र किताब के आख़िरी पन्ने में आता है। अनुराग। जो कई सालों से दोस्त है। एक अच्छा संपादक रचना से कई बार गुज़रता है, एक पाठक की तरह और एक एडिटर की तरह भी। उसका काम यह देखना है कि किताब में कोई नुक्स रह जाये, कोई टाइपो की कील निकली हो, जो पढ़ते हुए माथे में ठुक जाये। किताब की सरसता अपनी जगह है, टेक्स्ट का अप्रतिम परफेक्शन अपनी जगह। मन हिलग जाता है। सोचती हूँ, दुख की इस भीतरी दुनिया को साथ में रचते/ठीक-करते/सँवारते हुए, उसे कितना कुछ दुखा होगा। किताब में font, काग़ज़, बाइंडिंग, छपाई के लिए प्रेस का चुनावसब कुछ से अक्सर, अकेले जूझते हुए। कितना मुश्किल होगा यहकई साल लगातार सुंदर किताबें रचने के ख्याल से भरे रहना। 


मैंने उसे बहुत साल पहले देखा था। स्काइप की खिड़की में। किताबों और शब्दों से उलझता हुआ लड़का। उसके अनुवाद की हुई कविताएँ पढ़ते हुए मेरी अपनी हो गईं। हिंदी में कविताओं को पढ़ने में अलग मिठास आती है। इतने साल में अब भी वैसा ही है। एक एक शब्द किसी जौहरी की तरह बारीकी से नाप-चुन कर रखता हुआ। उसके लिए शब्द सोने से ज़्यादा क़ीमती हैं। उसके हाथ से गुज़र कर कोई किताब आती है तो ये भी सोचती हूँ कि उसने इसे कैसे पढ़ा होगा। 


2008 से बैंगलोर में हूँ। यहाँ का स्टार्ट-अप कल्चर है। सबने कभी कभी अपना कुछ करने का सोचा ही होगा। स्टार्ट-अप करने वाले एक सपना जी रहे होते हैं। मैंने अपने घर में यह देखा है। कुणाल को कई साल लगातार। ख़ुद भी कब से सोच रहे हैं कि एक स्टार्ट-अप खोलेंगे, लेकिन ऐसा सोचना और सच में एक कंपनी खोलने में बहुत अंतर होता है। एक ज़िद होती है, दुनिया को बेहतर करने कीऔर ये काबिलियत कि अपना सपना सबकी आँखों में रोप सकें। इन दिनों कुणाल दो कमाल के आइडियाज़ पर काम कर रहा है। मैंने पिछली बार उसके स्टार्ट-अप का कम्यूनिकेशन पूरा हैंडल किया था। एक बहुत अच्छी कहानी को उतने ही अच्छे ढंग से सुनाना होता है। मैं उस कंपनी में इम्प्लॉयड नहीं थी, उसकी फाउंडर थी। टेक बनाने और डिप्लॉय करने वो कहानी मेरी भी कहानी थी। अब फिर से वैसी कहानियाँ बन रही हैं। 


मेरे भीतर अब कहानियाँ नहीं उगतीं, लेकिन कभी कभी पुरानी कहानियाँ सुनाने का मन करता है। मेरी ख़ुद की। धूप, समंदर, आसमान की कहानी। उन लड़कियों की जिन्हें प्यार होता था। जो चाय के एक घूँट पर मन में समंदर लिए चलती थीं। मुझे लगता है जैसे मेरे जैसे लोगों की दुनिया में कहीं जगह नहीं हैं। टू सेंसिटिव। ज़्यादा ही दुखता है, ज़्यादा ही ख़ुश हो लेते हैं। ज़्यादा मुहब्बत हो जाती है। ज़्यादा जलन होती है। कम में जीना आया ही नहीं। मेरे जैसी लड़कियों की कहीं जगह नहीं है दुनिया में, इसलिए कहानियों में अपने हिस्से की ज़मीन चाहते हैं हम। थोड़ी सी। 


लिखना भी आदत है। शायद तैरने या साइकिल चलाने की तरह। बहुत साल छोड़ दें तो थोड़ा स्लो हो जाता है। लेकिन बस डेस्क पर बैठ भी जायें तो काफ़ी कुछ लिखा जाता है। इसे पहले की तरह ही ब्लॉग पर पोस्ट कर रहे हैं। कि आज के लिए मन में इतना ही कुछ है। 


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