13 August, 2026

गोलघर चलोगे? गंगा एकदम ललमटिया गई होगी


  
It will never be not strange. 

कि सपने में बौखते हुए तुम अचानक से न टकराओ। धुंध-भरी स्काईलाइन पर कई इमारतें हों। कुछ न्यू-यॉर्क, कुछ पेरिस…नदी बहती हो, दूर कहीं…कई नदियाँ मिली-जुलीं। पता नहीं तुम नदियों को उनके पानी से पहचानते हो या नहीं, पर मुझे सारी नदियाँ अलग-अलग याद रहती हैं। बहती हुई नदी का रंग ही नहीं, उसका गुनगुनाना भी अलग अलग होता है। उसके किनारे के पत्थर, उसके किनारे की मिट्टी। उसकी गंध।

नदी किनारे किन लोगों से मिलते हैं हम?
तुम्हारे साथ गंगा-घाट पर कभी नहीं बैठी हूँ, लेकिन फिर भी कहानी लिखते हुए तुम अक्सर दिखते हो। वहाँ बैठे, बतियाते। तुमसे कितने शहरों में मिली हूँ, लेकिन हमेशा लगता है हमारे पास पास बैठने से पैरों के नीचे गंगा बहने लगी हो। बहती नदी का फ्लो पैरों में मालूम चलता है। तुम हम बतियाते हैं तो पटना ही उगता है हमारे इर्द-गिर्द। दिल्ली में होते हुए भी लगता है, कोई रिक्शा आए तो उससे पूछ लें, गोलघर चलोगे? उसके न चलने पर तुमसे पूछें, अच्छा, पैदल चलोगे? आज गोलघर पर चढ़ के दूर दूर तक गंगा देखने का मन करता है।

आज सुबह आर्या पूछी कि मम्मी तुम किस शहर में सबसे पहले गई थी। हमको याद नहीं था ठीक ठीक, लेकिन जो याद में पहला था, वो हरिद्वार था। हम मम्मी के पोंचू में एक गर्माहट में बैठे थे। बर्फ गिर रही थी। हम केदारनाथ जा रहे थे। किसी पालकी में बैठ कर। मुझे मालूम नहीं, ये याद सच की है या नहीं। हम पापा से पूछ कर कन्फर्म कर सकते हैं, लेकिन नहीं करते। ट्रैवल की मेरी पहली याद वही है। हमको कभी कभी लगता है, शायद यह पिछले जन्म की याद हो। छोटे बच्चों को पिछला जन्म भी याद रहता है। हरिद्वार की फोटो में बाबा बैठे हुए हैं, चुक्कू-मुक्कू। शायद कुल्ला कर रहे हों। थोड़ा वाइट वाश जैसी फोटो है। जैसे एक्स्ट्रा ब्राइट फ़िल्टर लगा हो। मैं याद में ही घूम रही हूँ, कि वो पूछती है, were you happy? आर्या अक्सर पूछती है, कि मैं ख़ुश हूँ, या ख़ुश थी। उसके लिए ये जानना जरूरी है कि हम ज़िंदगी के किसी भी पड़ाव पर बहुत ख़ुश थे या उदास थे। 

तुमसे इतनी इत्मीनान से मिलते हैं। जैसे मालूम है। अभी कई जन्म मिलना है तुमसे। कोई हड़बड़ी नहीं है। कि हमारे पास इनफ़ाइनाइट टाइम है। हम थोड़ा थोड़ा कर के ही मिल पायेंगे। कई जन्मों में। लेकिन फिर भी कहना चाहती हूँ, हमेशा तुमसे। सुनो, अगले जन्म थोड़ा पहले मिलना हमसे। हमारे तुम्हारे बीच नदी बहती है, लेकिन सरस्वती। हम उसे देख नहीं पाते, उसके पानी से आचमन नहीं कर सकते। लेकिन स्याही बनाने के लिए गोल काली टिक्की घोलनी है, हम ऐसे हवा में चुल्लू बनाते हैं और उसमें सरस्वती नदी का पानी आ जाता है। मैं कहानी में तुम्हें देखती हूँ, काग़ज़ पर ख़त लिखते हुए। कहानी में जो तुम हो, वो कहता है मुझसे, कि उसके पास मेरे लिए कई सारी अधूरी चिट्ठियाँ हैं। कि वो जेब में पोस्टकार्ड लिए घूमता है कि मेरे पते पर भेज सके, लेकिन दुनिया में पोस्टऑफ़िस ही नहीं बचे हैं, तो मेरा ख़त कोई पहुँचा ही नहीं सकता। 

मैं पढ़ती हूँ चिट्ठी, तुमने लिखा है, तुम्हारे जाने के बाद शहर ठहर गया है। यहाँ का मौसम। आसमान के बादल। नदी की लहरें। हवा। ट्रैफिक। कुछ हिल तक नहीं रहा अपनी जगह से। तुम स्टेच्यू कर के चली गई हो मेरा शहर। वापस आओगी, रिलीज़ करने। कि तुम्हारे दिल में एक ठहरा हुआ दिन है। एक बहुत लंबी वाक है। पोलॉक की पेंटिंग साथ में नहीं देख पाने का अफ़सोस है।

मुझे रफ़्तार से डर लगता है। जिस रफ़्तार से मन उड़ता है। जितने सवाल करता है। आज एक फ़िल्म देखी, विकी क्रिस्टीना, बार्सिलोना। हम अलग अलग शहरों में बदले हुए लोग होते हैं। कुछ शहर एक धारदार खुखरी से चीरते हैं, बीचोंबीच और हमें दो फाँक खोल देते हैं। तुमने ख़ुद के दो टुकड़े हुए देखे हैं? जब कि दिल प्रेजेंट और पास्ट का इश्क़ एक साथ करता है…कि जिसके साथ हैं, उससे मुहब्बत है ही, लेकिन कोई अतीत से छूट नहीं रहा। कोई आत्मा में धँसा हुआ है। चुभता हुआ, रिसता हुआ। क्रिस्टीना को मुहब्बत में कोई फ़ाइनालिटी नहीं चाहिए, उसे इन फैक्ट, मालूम नहीं कि उसे क्या चाहिए। उसे बस ये मालूम है, कि जो है पास में, वो नहीं चाहिए।

क्या सबके भीतर कोई अधूरी मुहब्बत ज़िंदा रहती है?

क्राकोव के ओल्ड टाउन स्क्वायर के बीच में एक झरना था। वहाँ तक पहुँचती बहुत सी सड़कें और उन सारी सड़को पर बहती हुई धुनें। आँख बंद करो, हवा में सुनाई देती है, कहीं दूर से उड़ती हुई धुन। तुम कभी किसी एन्सिएंट एम्फीथियेटर में खड़े हुए हो, अकेले? आँख बंद करने पर हवा में बहुत पुरानी धुन बहती हुई आती है और एकदम से तुम्हें लपेट लेती है चारों तरफ़ से, जैसे कोई शॉल उड़ता हुआ आ गया हो हवा में और लिपट गया हो तुमसे। जैसे सर्द मौसम में जरा सी गर्माहट हो। कि दाँत किटकिटाने बंद हो जायें। जैसे गर्म वाइन का एक घूँट उतरा हो भीतर। जैसे सेंक दे, कोई अलाव में हाथ गर्म कर के, तुम्हारा चेहरा।

जिन शहरों में तुम्हारी याद न हो, मैं उन शहरों में करूँगी भी क्या? ख़ाली पोस्टकार्ड्स। बिना किसी पते के। कभी पेन रखना भूल जाऊँ, तो किसके पास से मिलेगी कलम? आजकल तो कोई भी पेन लेकर नहीं चलता साथ में। मेरी कहानी में मैं हमेशा तुम्हें चिट्ठियाँ लिख रही हूँ। 

फ़िल्म का मेरा पसंदीदा हिस्सा वो है जहाँ हुआन और मारिया एलिना, दोनों पेंट कर रहे हैं। उन्हें ऐब्सट्रैक्ट पेंटिंग बनाते हुए देखना मुझे पोलॉक की याद दिलाता है। पेंट करने में एक इंटेंसिटी है। मूवमेंट है। अनप्रेडिक्टेबिलिटी है। ऐबस्ट्रैक्ट पेंटिंग इस मूवमेंट को थिर करता है, कई रंगों में, बहते हुए पेंट में, केओस में। पेंट करते हुए हुआन सिगरेट पी रहा है, उसके कपड़ों पर पेंट के छींटे हैं। मारिया कैनवास के ऊपर चलते हुए बड़े से रोलर से कैनवास पेंट कर रही है। उसके इर्द गिर्द बहुत से पेंट के डिब्बे हैं, ब्रश है, फर्श पर गिरा हुआ पेंट है। पेंट करने की प्रोसेस भी पेंटिंग जितनी सम्मोहक है।

मारिया एलीना कहती है, हुआन ने उसके पेंटिंग के आईडिया चुरा लिए। हालांकि हुआन इस बात को नकारता है, अपने पूरेपन में नहीं, आधे अधूरे। लेकिन मैं जानती हूँ, वो सच कह रही है, वो जीनियस है, उसके पेंट में दिखता है। एक उलझी हुई क्रिएटिव soul है वो…जो हुआन से इतना प्यार करती है कि लौट लौट कर उस तक आती है, और उसकी जान ले लेने की हद तक पजेसिव है।

बहुत साल पहले, बैंगलोर में मेरा दोस्त रहता था, अभिषेक डेहरिया। मेरी किताब, इश्क़ तिलिस्म का कवर उसने ही पेंट किया है। मैं उसके पेंटिंग स्टूडियो जब भी जाती थी, उसकी अधूरी पेंटिंग देखना मुझे किसी तिलिस्म में जाने जैसा ही लगता था। कई सारे कैनवास इर्द गिर्द। उससे बात करते हुए सोचती थी, उसके भीतर कितने रंग रहते होंगे। वे रंग क्या भीतर से कैनवास पर आते हुए बदलते हैं?

फ़िल्म में बहुत जगह पर हुआन और मारिया स्पेनिश में बात करने लगते हैं, amazon प्राइम के इस एडिशन में उस बातचीत की कोई सबटाइटलिंग नहीं है। मुझे कोफ़्त होती है। लगभग वैसी ही, जैसे क्रिस्टीना को होती होगी, जब कि हुआन बार बार कह रहा होता है कि इस घर में इंग्लिश में बात करो। गुस्से में, प्रेम में, जिम में एक सेट की गिनती गिनते हुए, हम अपनी पहली भाषा तक आ जाते हैं। ये हमारा नेचुरल स्टेट होता है। 

फ़िल्म में हुआन विकी को पेंटिंग दिखा रहा है। ऐब्सट्रैक्ट पेंटिंग्स हैं। मैं सोच रही हूँ, तुम घर पर हो। अधूरे पोस्टकार्ड्स देख रहे हो। डायरीज पलट रहे हो। कोई किरदार है। तुम्हारे जैसा, तुम से इंस्पायर्ड। तुम्हारे शर्ट्स पहन के घूम रहा है मेरी कहानियों में। मैं उलझती हूँ तो सीधे पूछ लेती हूँ, लेकिन सीधे सवाल का सीधा जवाब कोई किरदार नहीं देता। ‘मुझसे मिलते तो हो तुम्हारा दिल नॉर्मल धड़कता है या थोड़ा ज़्यादा तेज़ रफ़्तार? मेरा दिल कभी तुमसे मिलने के पहले नॉर्मल नहीं रह पाता। मैं चाह कर भी गाड़ी धीरे नहीं चला पाती। मुझे लगता है उड़ते हुए आऊँगी तो समय बहुत मिलेगा…एक मिनट एक्स्ट्रा भी सही।’

प्लेन आसमान में है।
मैं कहाँ हूँ? और तुम्हें जो चिट्ठियाँ भेजनी थीं, वे कहाँ पर हैं? 

दिक़्क़त ये है कि विकी क्रिस्टीना बार्सिलोना रोमांटिक फ़िल्म नहीं है, मुहब्बत की परिभाषाएँ तलाशती, क्रिएटिव लोगों की ज़िंदगी में किसी किरदार की तरह खुलती उलझती फ़िल्म है। मैंने देख तो ली है, पर अब इसके बारे में बात किससे करूँ, सो नहीं समझ आ रहा। 

स्पैनिश अभिनेता जेवियर बारडेम मुझे बहुत पसंद है। टिपिकल मैस्कुलिन ब्यूटी के हिसाब से नहीं, लेकिन एक स्ट्रेंज rawness है, जिसके बारे में कहते हैं, कि हैंडसम नहीं, लेकिन कहीं न कहीं अटकने वाला किरदार। मिस्टीरियस। आप उसे खोलना चाहेंगे, समझना चाहेंगे। 

जिस दुनिया में हम जी रहे, वहाँ बहुत ज़्यादा इंटेंसिटी से जीने वाले लोग माइनॉरिटी में हैं। क्यों होना ज़्यादा इंटेंस जैसे सवालों का कोई अर्थ नहीं। इंटेंसिटी हमसे पूछ कर नहीं आती। कोई अच्छा लग जाता है तो चुभ जाता है उसका होना हमारी टाइमलाइन में। हम उसे कहाँ कहाँ नहीं भुलाना चाहते हैं। लेकिन वो लौट लौट आता है।

इस शहर की तन्हाई मुझे बेतरह तोड़ती है। ऐसा पिछले कई साल से हो रहा है। पता है, डिज़्नीलैंड में एक नियम है। कि डिज़्नी के किरदार, जैसे कि सिंड्रेला या बाक़ी राजकुमारियाँ भी, किसी बच्चे को हग करेंगी, तो तब तक हग किए रहेंगी जब तक वो बच्चा अपनी बाँहें न हटा ले। ये नियम पूरी दुनिया में लागू होना चाहिए। कि जिसने hug initiate किया है, ख़त्म भी वही करे। लेकिन ऐसा होता तो नहीं। Hugs are fleeting. Love is not. दोस्तों को भी समझ नहीं आता कि भीतर कोई ग्लेशियर है, उसे पिघलने में वक्त लगता है। Tight hugs. For as long as you want. बेशक़ीमत चीज़ है, किसी मॉल में नहीं मिलती।

एयरप्लेन में लिखा था शायद इस पोस्ट को, मोस्टली।
प्लेन हवा में है। लेकिन जाने क्यों, दिल डूब रहा है।

12 August, 2026

तुम कितनी उदास बातें करने लगी हो

लेकिन संगमरमर का दिल बनाना इतना आसान भी नहीं होता।

पता नहीं क्यों तुम्हें आसान लगता है! एक ज़िंदा धड़कते हुए दिल का संगमरमर का क्लोन बनाना इतना भी आसान नहीं होता। दिल की बाहरी दीवारों पर खुदे हुए नाम ही देख लो। असल के दिल में ये नाम एकदम ठीक ठीक दिखते नहीं, धुंधले होते हैं, आउट ऑफ़ फोकस। लेकिन जैसे ही तुम संगमरमर का दिल बनाओगे, सारे नाम एकदम साफ़ साफ़ दिखेंगे, लाल-हरे-नीले पत्थर में inlay वर्क में खुदे हुए। तुम्हें मालूम भी नहीं चलेगा, कब तुम कारीगरों को पूरी दुनिया में भेज दोगे, अलग अलग रंगों के पत्थर चुनने। कोई मूंगा ला रहा, कोई पन्ना, कोई नीलम की ठीक-ठीक पहचान करने में उम्र का इतना हिस्सा लगा चुका है कि उसे काली आँखों वाली महबूबा की आँखें भी नीली ही दिखती हैं।

रंग असल में एक भरम ही तो हैं। वैसे ही जैसे दिल के पत्थर पर बारीक खुदे ये नाम देख कर तुम्हें धोखा होगा कि ‘मुहब्बत’ और ‘हमेशा’ एक वाक्य में ठीक ठीक लगते हैं, होता है इसके ठीक उलट। मुहब्बत सिर्फ़ एक लम्हे को ज़िंदा रह सकती है। कहानियों में। असल जीवन में, ‘मुहब्बत’ और ‘मृत्यु’ एक वाक्य में ठीक लगते हैं। किसी से बहुत ज़्यादा प्यार करने लगोगे तो जान चली जाये, ये बेहतर है। जो नहीं हुआ, वहाँ कई सारे ऑप्शन होते हैं। किसी इमैजिनरी महबूब के साथ दुनिया के कई शहरों की तफ़सील से जाँच की जा सकती है। सच के लोग थक जाते हैं, बोर हो जाते हैं या फिर जाते ही नहीं साथ में।

‘देखो, कोई इमैजिनरी महबूब बनाना मुश्किल है, लेकिन शहर बनाना आसान। मेरे साथ एक इमैजिनरी शहर का नक्शा बनाओगे? Tell me, are you a sea person or a mountain person?’

‘दो ही ऑप्शन क्यों? इतना सा ही भूगोल पढ़ा है तुमने? मुझे न पहाड़ पसंद हैं, न समंदर। मुझे नदियाँ अच्छी लगती हैं और रेगिस्तान।’

‘इतना कंट्राडिक्शन! यार, रेगिस्तान से मुहब्बत करने वाले लड़के को किस तरह से नदियाँ पसंद आती हैं, मुझे समझ नहीं आता।’

‘कायदे से सोचो, तो रेगिस्तान के लड़कों को नदियों से इश्क़ होना लाज़िमी है।’

‘लाज़िमी थोड़ा भारी शब्द नहीं हो गया? इतने क़ायदे क़ानून से कौन चलता है?’

‘तुम चलती हो ना, क़ायदे क़ानून से…बिना अलार्म के सुबह उठ जाने वाली, कभी फ्लाइट-ट्रेन मिस न करने वाली, दोस्तों को मुलाक़ात का समय दे कर बिफ़ोर टाइम आने वाली लड़की हो तुम। तुम्हारे जीवन में तो सब कुछ सही चलना ही चाहिए ना? तो ग़लत क्या है अगर मैं कहूँ कि रेगिस्तान के बाशिंदों को नदियों से इश्क़ है।’

‘लेकिन ऐसा होना नहीं चाहिए ना?’

‘होना नहीं चाहिए क्या होता है यार! मुहब्बत में कौन से रूल्स लगने लगे। अच्छा बताओ, ये जो तुम चलता फिरता सन-डायल बनी घूमती हो, ऐसा कोई छोटा सा यंत्र नहीं हो सकता मेरे भीतर भी। कि भोर के पहले पहर मालूम चले कि दिन होने वाला है और उस तूफ़ान को देख कर समझ आए, इस लड़की से इश्क़ होने वाला है। एक तरह का इश्क़ का अर्ली वार्निंग सिस्टम।’

‘तुम्हें मुहब्बत का वार्निंग सिस्टम चाहिए। उसका फ़ायदा क्या होगा? नहीं गिरोगे मुहब्बत में तुम?’

‘यार, देखो, गिरना तो inevitable है, लेकिन उन दिनों बिना मेहराब वाली छतों पर नहीं जायेंगे, पहाड़ घूमने की प्लानिंग नहीं करेंगे, इन फैक्ट, कोई ऊँची जगह जायेंगे ही नहीं। तो मुहब्बत में गिरेंगे तो सही, लेकिन धीरे। हाथ पांव नहीं टूटेंगे, दिल ही टूटेगा, बस।’
‘बे पागल इंसान, मुहब्बत और लॉजिक एक वाक्य में अगल-बगल नहीं होते। दूर दूर होते हैं।’
‘पास कर दो थोड़ा। और तुम आओ थोड़ा पास और।’
‘कितने पास?’
‘आधे जन्म पास?’
‘ये तो ज़्यादा है। चित्रगुप्त नहीं मानेगा’
‘तुम्हारी रिक्वेस्ट से यमराज रुक जाते हैं, तुम क्या बात कर रही हो! चित्रगुप्त को तुम पॉकेट में लेकर चलती हो’
‘यार, चित्रगुप्त नहीं, कितनी बार समझाया है तुम्हें, वो सिर्फ़ एक चैटबॉट है। मैंने चित्रगुप्त का काम आसान हो इसलिए उसे LLM बना कर दिया था। मैं ट्रबलशूटिंग के लिए उसका एक डिजिटल ट्विन वर्शन अपने फ़ोन में डाल के रखती हूँ।’
‘अब ये ग़लत नहीं है? टेक्नोलॉजी से देवताओं की हेल्प करना, जिन्होंने लिटरली अपने एंटरटेनमेंट के लिए ये पूरी दुनिया बनाई है’
‘तो ये दुनिया उनकी ही तो रहती है। तेरा तुझ को अर्पण, क्या लागे मेरा!’
‘अच्छा, एक काम करो ना, चित्रगुप्त से बोल कर मेरा एक एकदम इंटेंस वाला इश्क़ करवा दो। एकदम इंटेंस। तुम्हारे टाइप एकदम। जान जाने लगी, इस तरह का कोई।’
‘मेरे टाइप इंटेंस? देखो, हम कह रहे थे तुमसे ये सस्ता नशा मत किया करो तुम। तुमको सूट नहीं करता। तुमको मेरे टाइप इंटेंस मुहब्बत हो गई तो एक हफ़्ते सर्वाइव नहीं कर पाओगे अपने ख़ुद की लव स्टोरी। उम्र अगर तुम्हारी मान लो, चालीस साल और बची है, तो अभी अगले हफ़्ते मर जाओगे। बहुत इंटेंस इश्क़ जीने के लिए सब्र चाहिए, कई जन्म तक बिछड़ बिछड़ के मिलने का सब्र और हर दूसरे जन्म में उससे ही फिर से मिल पाने लायक़ भरोसा। इतने भारी भारी शब्द सुन रहे हो। बाद में रोते आओगे मेरे पास ही। तब क्या करेंगे हम!’

‘मरहम पट्टी। जो एक दोस्त का कर्म होता है’

‘कर्म नहीं होगा यहाँ, क्रिया कर्म हो जाएगा तुम्हारा। दिल में गोबर भरा है तुम्हारे। कोई लड़की गोयठा ठोक के चली जाएगी क़िस्मत के दीवार पर। तब से समझा रहे, तुम्हारी बेवक़ूफ़ियों से तुमको बचाने शंकर भगवान अवतार लेकर थोड़े ना आयेंगे। कभी कभी अपना गण-बन भी भेज देते हैं।’

‘यार हमको समझ नहीं आता। तुम्हें ख़ुद को हज़ार बार इश्क़ में गिरना पड़ना है, और हम कह रहे हैं, हमारी एक सेटिंग करवा दो तो तब से ज्ञान दे रही हो, ये नहीं कि अपनी दोस्त का फ़ोन नम्बर दे दो। कि दिल ही तुड़वाना है तो जाओ, इससे तुड़वा लो, हिसाब से तोड़ेगी।’

‘यार, दिल कैसे हिसाब से तोड़ते हैं? मतलब। दिल एक तरफ़, हिसाब एक तरफ़। ऐसे थोड़े ना होता है कि कैलकुलेट कर ली है कि थोड़ा सा दिल तोड़ेंगे, जैसे बहुत सारा दारू पी कर थोड़ा सा लीवर डैमेज होता है। उतना ही, जितना ख़ुद से रीजनरेट हो जाये…ये नहीं कि लिवर सिरोसिस से मर जाओ तुम।’

‘यार मुहब्बत में मौत आए जरूरी थोड़े है। एक्सीडेंट में भी तो मर सकते हैं हम। सोचो, हम जो बचा-बचा कर पूरा जीवन जीते आए कि किसी से इश्क़ में जान न चली जाये, सो हम गलती से किसी ड्रंक ड्राइवर का एक्सीडेंट हो जायें। कितना अफ़सोस होगा तब तुम्हें!’

‘हमको कोई अफ़सोस नहीं होगा। तुमसे ये मुहब्बत मुहब्बत वाला गेम नहीं हो पायेगा। तुम गिरोगे ज़ोर से। तुम्हारा लक्षण सारा वैसा का वैसा है।’

‘कैसा? शहादत वाला?’

‘देखो, इश्क़ में ऐसे प्लान करके नहीं गिरते हैं। कि इस बार हमको गहरा प्यार हो जाएगा, जो भी मिले, उसी से। मुहब्बत के बारे में सबसे मुश्किल बात ये है कि मुहब्बत एकदम से इंडिपेंडेंट एंटिटी है। जैसे तूफ़ान होता है, जैसे सूनामी आता है, जैसे भूकंप से फट जाती है ज़मीन और नदियाँ बदल लेती हैं अपना रास्ता, अचानक से एक रोज़…जैसे कोई पहाड़ से पुकारता है तुम्हारा नाम और तुम्हारी आत्मा शरीर छोड़ कर उड़ लेती है। ये जानते हुए भी कि इस तरह जाने में उसे एक बार हग तक नहीं कर सकोगे।’

‘तुम एंटी-मुहब्बत कैसे हो?’

‘हम रियलिस्ट हैं। मुहब्बत कोई बाँध थोड़े है कि पहाड़ी नदी देखी और सोच लिया, इस ऊर्जा से बिजली निकाली जा सकती है। तुमने कभी सोचा कि कितने गांव जमींदोज होंगे, बिना जाने हुए कि आधे डूबे हुए मंदिरों के ईश्वर उदास रहते हैं। पिछली बार जब डैम बनाया गया था तो गाँव में पानी धीरे धीरे आया। सब कुछ धीरे धीरे डूबा। शिवाले की सीढ़ियाँ। गोसाईघर के ताखे पर रखा हुआ जलता हुआ दीपक। हनुमान मंदिर की ध्वजा का बांस। और आख़िर को मेरा दिल।’

‘विस्थापित गांवों और जंगलों के लोग कहाँ जाते हैं?’

‘जहाँ भी जाते हैं, पर ये सोचो, उनके पास लौटने को कोई जगह नहीं होती। वे कभी अपने बच्चों को नहीं दिखा पाते अपने बचपन का शिवालय। अपने गाँव का कुआँ। दादी का रोपा हुआ आम का बगीचा।’

‘तुम कितनी उदास बातें करने लगी हो।’

‘यार, बताओ, सच में। मुहब्बत कब से ख़ुश होने की बात है?’

‘मुहब्बत हमारे दिल का भूगोल बदल देती है। फिजिक्स के नियम काम करने बंद कर देते हैं। दिल मुहब्बत में या तो डूबता है या जलता है। ऐसा कितना कम होता है कि दिल मुहब्बत में उड़ रहा हो…नाच रहा हो…गा रहा हो। और तुम्हें सब कुछ जानते हुए भी डर नहीं लगता…ये एडवेंचर नहीं है। यहाँ ऑप्शन नहीं रहते।’

‘ठीक है ठीक है। जाने दो। सुनाओ ना कोई कहानी, लेटेस्ट वाली। पिछले इश्क़ में सबसे स्पेशल क्या था?’

‘वो लड़का सिगरेट पीता हुआ भी क्यूट लगता था। हैंडसम नहीं, सेक्सी नहीं, क्यूट।’

‘अच्छा! तुम्हें लड़के क्यूट भी लगते हैं, हमको मालूम ही नहीं था। क्या स्पेशल था उस स्मोकिंग लड़के में?’

‘उस पर गुलाबी रंग अच्छा लगता था…उस रोज़ सिगरेट पीते हुए उसने पिंक कलर की शर्ट पहनी थी. स्पेशल मेरे लिए’

‘स्पेशल. मतलब रंग स्पेशल, सिगरेट स्पेशल और उसके भी ऊपर, तुम स्पेशल…ज़्यादा स्पेशल नहीं हो गया?’

‘हाँ हो गया। उस रोज़, I was god’s favorite girl…मेरा बर्थडे था ना।’

‘तुम तो रोज़ ही गॉड की फ़ेवरिट गर्ल होती हो।’

‘नहीं, मैं गॉड की नहीं, शैतान की फ़ेवरिट गर्ल हूँ। सारे गुनाह वही करवाना चाहता है मुझसे। भगवान जी तो हमको बचाने के लिए जब न तब तिकड़म भिड़ाते रहते हैं कि हम ज़िंदा रहें। जान न दे दें। वरना अगले जन्म में फिर से जीरो से शुरू करना पड़ेगा और बहुत सारा दुख झेलना पड़ेगा। फिर रोना-धोना उनके ही पास करेंगे।’

‘गुनाह की क्या डेफिनिशन है तुम्हारे पास?

‘यार, मुझे ना अफ़सोस करना बहुत बड़ा गुनाह लगता है। वो काम जो हम सच में करना चाहते थे, लेकिन कर नहीं पाये। इंडियन पीनल कोड में किसी धारा के अंतर्गत वो कोई अपराध नहीं है…लेकिन हमारा दिल इतना न दुखता है कि न जीते बनता है न मरते। लेकिन मेरा जाने दो…मेरी कहानियाँ सारी बहुत लंबी हैं। और हमारे पास, ऐज़ यूजअल, वक्त बहुत कम है।’

‘वक्त कम है नहीं, वक्त कम पड़ जाता है। तुम्हारे पास बैठता हूँ तो समय कभी पूरा नहीं पड़ता। हमेशा लगता है बहुत सी बातें बाक़ी रह गई हैं।’

‘है ना, जैसे कोई अच्छी किताब। पढ़ के हमेशा थोड़ा सा और पढ़ने का मन होता है। बुरी किताब ख़त्म करते करते दिमाग़ ख़राब हो जाता है कि काश इसे भी फ़िल्मों की तरह फ़ास्ट फॉरवर्ड करके पढ़ पाते.’

‘फिर कब मिलोगी?’

‘यार, टेलीपैथी से बुला लेना। जिस भी शहर में होंगे, चले आयेंगे, प्रॉमिस।’

‘थोड़ा ज़्यादा मिला करो मुझसे…ज़िंदगी फीकी लगने लगती है तुमसे मिले ज़्यादा दिन हो जाते हैं तो।’

‘बस?’

‘हाँ, सिर्फ़ इतना’

‘ओके’

‘ओके, लव यू, बाय, ज़िंदगी रही, तो फिर मिलोगे ना?’

‘और ना मिले तो?’

‘तो फिर उसको ज़िंदगी थोड़े कहेंगे?’

‘जाओ बे!’
‘आग मत लगाओ। एक सिगरेट से दुनिया जला देने वाले लोग। बारूद के गोदाम के बाहर खड़े होकर सिगरेट नहीं पीते हैं, जरा दूर हटो हमसे।’
रात के दो बजे उसने फ़ोन किया। बिछड़ने के ठीक बाद। दारू लड़के ने पी थी। लेकिन चढ़ी उसको थी, जो designated ड्राइवर रही। गा नहीं, चीख रही थी।
‘हद से ज़्यादा आती है, मुझको मेरी जान तेरी याद। एक तेरे आने के पहले, इक तेरे जाने के बाद!’ 

03 August, 2026

Random notes, a half story और शुरुआती अगस्त

वो, वो, वो…वो ही…वो ही तो नहीं मिलती।

मैंने उसे बहुत तलाशा। जैसे पति-पत्नी के बीच की तीसरी औरत। उसके होने का पूरा अंदेशा है, लेकिन…लेकिन वो मिलती ही नहीं। हर बार उसकी तलाश में जाती हूँ और उसकी जगह ख़ुद को वहाँ पाती हूँ। क्या मैं ही वो औरत हूँ जिसके साथ मेरे पति का विवाहेतर संबंध है? वो मुझे घर पर छोड़ कर, मुझसे ही मिलने घर से बाहर जाता है।

मुझे उस तीसरी के साथ जीना ही नहीं आता। मुझे ख़ुद के साथ ही जीना कौन सा आता है। सब कुछ बेतरतीब। अधूरी कहानियाँ। अधमरे किरदार। जंगल काट कर समतल बनाई गई ज़मीन जिसमें से आधी उगी इमारतें।

मैंने मुट्ठी में भींच रखा है प्लेटफार्म टिकट। यह इस जीवन से चला-चली की बेला है। प्लेटफार्म पर ट्रेन आने ही वाली है। यहाँ से सब लोग कहीं और चले जाएँगे और मुझे अपने ख़ाली शहर में लौट कर वापस आना पड़ेगा। प्लेटफार्म से बाहर निकलते वक्त टिकट चेक होता है। टिकट नहीं होने पर बहुत बड़ा जुर्माना भरना पड़ सकता है। मेरे पास इतने पैसे तो हैं नहीं। कोई जेब भी नहीं, पर्स नहीं, मोबाइल तक नहीं। मुझे बिछड़ने का मेनिया है, पागलपन एक किस्म का। अलविदा के समय बौरायी सी तुम्हें एक आख़िरी बार देखने चली आई। मेज़ से बस दस का नोट लेकर मुट्ठी में भींचा और रूम से दौड़ती हुई बाहर। कोई देखता तो सोचना, अपने प्रेमी के साथ भाग रही हूँ। लेकिन किसी ने देखा नहीं, सब अपने जीवन में व्यस्त थे।

हॉस्टल की लड़कियाँ मेरे भाग्य से जलती थीं। मेरे पास हॉस्टल का सबसे बड़ा कमरा था। गलियारे के आख़िर वाला। यहीं सीमेंट की जालीदार बालकनी में वह पत्थर पड़ा रहता था जिससे ताला तोड़ना आसान होता था। हॉस्टल की लड़कियाँ लड़कों को अपने कमरे में तो नहीं बुला सकती थीं, लेकिन जाने क्यों उन्हें कमरे की चाभी दे देने का बड़ा शौक़ होता था। उनमें से अधिकतर को भय था कि उनके घर वाले उन्हें जबरदस्ती ले जाएँगे और किसी अच्छे सॉफ्टवेर इंजीनियर से बियाह देंगे। वे किसी स्ट्रग्लिंग राइटर की कविता की प्रेरणा बनना चाहती थीं। किसी ग़रीब चित्रकार के कैनवास की मोनोक्रोम पेंटिंग क्यूंकि आख़िर को एक ही रंग के ट्यूब्स बच्चे होते थे। इस दुनिया में रंग बहुत महंगे मिलते भी तो थे। उन्हें लगता था, जब घरवाले जबरदस्ती उन्हें अपने साथ ले जाएँगे तो पैकिंग करने का मौका देंगे नहीं। वे शादी के बाद अपने पति के फ़ोन से चुपचाप मेसेज करेंगी, कि उनके कमरे से सामान निकलवा ले। ताले की चाभी नहीं होती तो कोई उन लड़कों को सामान नहीं देता। लेकिन लड़कियां ज़्यादा थीं, कमरे कम। जैसे ही घर वाले किसी लड़की को ले जाते, बाक़ी लड़कियां जल्द से जल्द वो कमरा अपने नाम करा लेना चाहतीं। कुछ कमरों के ताले तोड़े जाते, कुछ कमरों के ताले खोले जाते। चाभी वाले लड़कों की इज़्ज़त हुआ करती थी। मैंने यूँ तो तुम्हें ठीक-ठीक समझा दिया है कि कोई हॉस्टल से कितना भी ब्लैकमेल करे, वहाँ लौट कर मत जाना। लड़कियाँ जादू जानती हैं। वे उदास लड़कों को अपना प्रेमी बना कर रख लेती हैं।   
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मुझे हॉस्टल में कमरे के बाहर रखे पत्थर की याद आई।

हॉस्टल में मेरे कमरे के बाहर एक पत्थर रखा हुआ है। मेरा कमरा गलियारे का आख़िरी कमरा है। बहुत सी लड़कियां अपनी चाभी खो देती हैं, इसलिए वह पत्थर वहाँ परमानेंट रहता है। वापस लौटूँगी तो। दरवाज़े का ताला भी तोड़ना है।

तुम ट्रेन में चढ़ कर चले गए हो। मेरे हाथ खाली हैं। मेरा जन्मदिन है। मंदिर जाना था, साड़ी बांध ही रही थी कि हॉस्टल के लैंडलाइन पर फ़ोन आ गया, तुम्हारा। ‘सुनो, मैं तुम्हारे जीवन से जा रहा हूँ। ट्रेन से। लौटूँगा नहीं। लेकिन एक आख़िरी बार तुम्हें देखने की इच्छा अभी भी बची हुई है। स्टेशन एकदम पास है। ट्रेन आती ही होगी। तुम दौड़ती हुई आना। मैं इंतज़ार नहीं कर पाऊँगा।’

तुम कहाँ जा रहे हो? कौन से स्टेशन, कौन सा प्लेटफॉर्म…इतने बड़े शहर में कहाँ ढूँढें तुम्हारी आती हुई ट्रेन को? क्या किसी भी आती हुई ट्रेन के नीचे आ कर मर-कट जायें? तुमसे प्रेम हो जाने का अपराध अक्षम्य है, मृत्यु तो अनुकंपा से मिलती, या वरदान से…मेरे पास भीष्म की तरह संचित पुण्य तो था नहीं कि इच्छा-मृत्यु मिले। 

प्लेटफॉर्म पर बिल्कुल भीड़ नहीं है। सब लोग ट्रेन में चढ़ चुके हैं। तुम खिड़की से बाहर हाथ हिला रहे हो। मैं उस रूमाल को पहचानती हूँ जिसपर तुम्हारे नाम के अक्षर काढ़े थे। तुम कहते हो, मेरे पास तुम्हारी कोई निशानी नहीं है। कुछ भी दे दो तुम अपना। मेरे पास तुम्हें देने को कुछ भी नहीं है। साड़ी में एक आलपिन तक नहीं। बालों में रबर बैंड नहीं। हाथ में चूड़ी-कंगन, पैर में पायल, कान में झुमके, नाक में लौंग…ऐसा कुछ भी नहीं जो बदन से उतार कर दे सकूँ तुम्हें। चप्पल तक नहीं पहनी है। तुम्हारा हाथ भींचे खड़ी हूँ, थरथराती, पसीने से पूरी नहा गई हूँ…

सोचती हूँ, चप्पल पहनी होती तो खोल कर दे देती तुम्हें? राम जी ने जब अपनी खड़ाऊँ भरत जी को दे दी, फिर राम जी के लिए नई खड़ाऊँ कहाँ से आईं, इसका कोई ज़िक्र क्यों नहीं है? जंगल में उन्होंने किसकी खड़ाऊँ पहनी? क्या नंगे पांव घूमते रहे जंगल, कंकड़, पत्थर, काँटे, गर्मी-सर्दी सारे मौसमों में?

तुम्हारी कलाई रूमाल खोलती हूँ और उससे पूरा चेहरा पोंछती हूँ…गीला रूमाल बाँधती हूँ तुम्हारे हाथ पर वापस…आँचल के कोर में गिट्ठा डाल के बाँधा हुआ है प्लेटफार्म टिकट कि खो ना जाये। आख़िर को वही प्लेटफार्म टिकट तुम्हारी हथेली पर रखती हूँ। मैं तुम्हारे जीवन में कभी थी, सो भूल जाना, पूरा का पूरा। हम दो बचकाने प्रेमियों की कच्ची-पक्की अनगढ़ गृहस्थी भूल जाना, ये तुम्हारे लिए अच्छा रहेगा। मैं भी प्याज़ के पराठे बनाना भूल जाऊँगी। तुम्हारे कमरे में वैसे भी कुछ न कुछ रह ही गया होगा। घर बदलने के पहले आईने से मेरी चिपकायी बिंदियाँ उखाड़ देना। देखो ना, क्या क्या कह रही हूँ मैं भी। तुमने तो वो घर, सॉरी, कमरा, छोड़ ही दिया होगा। किसी दोस्त को रहने को बोल आए हो क्या? अच्छा, सवालों का समय नहीं है। वैसे भी, पूरी तरह कहाँ बिछड़ता है कोई। तुम भूल जाना, तुम्हें जहाँ जो भी तकलीफ़देह लगे। लेकिन विदा करने, मैं आई थी, भूलना मत।

ट्रेन के जाने के बाद मुझे भय दबोच लेता है। रेलवे के सिपाही लाठी फटकार रहे हैं। एक कोने में बेटिकट पकड़े गए कुछ मजदूर गठरी बने घिघिया रहे हैं। पैसे के सिवा उनके पास कुछ नहीं है, कोई आत्मसम्मान नहीं, कोई जेल से छुड़ा कर लाने वाला व्यक्ति नहीं। उम्मीद खरीदने ही तो वे अपने छोटे छोटे गाँव से निकल कर कस्बे के इस ट्रेन स्टेशन आए थे।

मुझे दरवाज़े से डर लगता है। मैं प्लेटफार्म से नीचे उतरती हूँ, और पटरी पर चलने लगती हूँ। बचपन में ये खेल लगता था। कितना अच्छा बैलेंस था उन दिनों। अभी तेज हवा में साड़ी उलझती रहती है पाँव में। मुझे मालूम नहीं है पटरियाँ किस ओर जायेंगी। मैं सोचती हूँ, कोई मंदिर दिखेगा तो पटरी से उतर कर जाऊँगी और भगवान के सामने रखे आरती के थाल से प्लेटफार्म टिकट के लिए दस रुपए ले लूँगी। अपने शहर जाने का और कोई दरवाजा नहीं है। अगर मैं किसी कच्ची सड़क से शहर चली जाऊँ तो शहर भूलभुलैया हो जाएगा। हॉस्टल का मेरा कमरा किसी और लड़की को दे दिया जाएगा। जो भी लड़की अरेंज मैरेज करने को तैयार हो जाये, उसे मेरे घर वाले अपने साथ वापस ले जायेंगे।

चलते चलते नदी आ जाती है और रेलवे पुल भी। नदी में कूद कर मर जाने का मन तो है, लेकिन शरीर पर पहचान के नाम पर कुछ भी नहीं है। लाश को पहचानेंगे नहीं, लावारिस जला देंगे। तुम जाने कब तक मेरे लौटने का इंतज़ार करो।

तुम कब तक मेरे लौटने का इंतज़ार करोगे?

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कहानी छूट जाती है। लड़की पुल पर खड़ी है। मैं भी।
क्या करते हैं आधी कहानी का? आधी चिट्ठी का? आधे बुने मफ़लर का?

तुम्हें मालूम, किसी एक समय तुम्हारे लिए एक पीले रंग का मफ़लर बुनने लगी थी मैं…मफ़लर इसलिए, कि मफ़लर के लिए किसी नाप की जरूरत नहीं पड़ती है। और ये भी तो, कि मुझे बहुत अच्छे से स्वेटर बनाना आता भी तो नहीं। बचपन में सीखा सब था, बुनाई में सीधे उल्टे टाँकों के अलावा बढ़ाना-घटाना होता है। इसी से जियोमेट्रिक तरीके से बुनाई होती जाती है। मोज़े, टोपी, जैकेट, दास्ताने… 

मैं कभी कभी हल्की धूप में बैठी होती हूँ। विंड-चाइम की आवाज़ आ रही होती है। पेड़ों पर सरसराती हवा, पक्षी, सड़क पर गाहे-बगाहे आती कोई गाड़ी…मैं सोचती हूँ, मुझे लिखने के सिवा और कोई काम आता नहीं ढंग का…चिट्ठी लिखना, कहानी लिखना वगैरह पुराने स्किल्स हो गए हैं। कई सारे एआई सिस्टम्स आ गए हैं, अच्छा लिखने वाले…

काम की कोई चीज़ आनी चाहिए ना?
काढ़े हुए रूमाल भी तो किसी काम के नहीं होते…कविता, कहानी जैसे ही तो…बिना नाम या बिना फूल वाले रूमाल से भी तो पोंछे जा सकते हैं आँसू…मैं खोजती नहीं हूँ अपने बेतरतीब घर में रेशमी धागों वाला डिब्बा…बहुत साल हो गए, फ्रेम में कोई रूमाल नहीं कसा, किसी के नाम का पहला अक्षर नहीं काढ़ा…

मेरी मम्मी बहुत सुंदर कढ़ाई करती थी। मैं भी बहुत सुंदर कढ़ाई करती थी। एकदम सलीके से किए गए स्टिचेज़…टाँके…देख कर लगे कि पेंटिंग है। मेरे हाथों में उन रिपीट स्टिच की याद है। मैं कभी कभी हवा में यूँ घूम रही होती हूँ, हाथों को नचाते हुए…मैं शहर की हवा में तुम्हारा नाम टांक रही हूँ। तुम्हारे जाने के बाद भी यह बचा रह जाएगा। मैं नहीं लिख सकती मेरी चाय की पसंदीदा दुकान की मेज़ पर तुम्हारे नाम का पहला अक्षर। पर चाहती हूँ, कहीं रहे मेरे तुम्हारे नाम के इनीशियल्स एक जगह।

कभी कभी मन करता है, टाँके उधेड़ती चली जाऊँ। आधा बुना हुआ मफ़लर उधेड़ दूँ। सियाही से लिखे ख़तों को पानी में डाल के धो दूँ। कभी कभी लगता है, तुमने जो शर्ट पहनी है, उसका एक बटन तोड़ कर वहाँ दूसरे रंग का बटन टांक दूँ। कभी कभी लगता है, बॉक्सिंग सीख लूँ। नकल्स से खून आ जाये, इतना लड़ लूँ किसी से…लिख न पाऊँ, इतना दर्द हो उँगलियों में…तुम आख़िर को बैठो हाथ अपने हाथ में लेकर…जला के दो सिगरेट…वापस लो अपने शब्द…कहो कि लिखना काफ़ी है मुहब्बत में…क्यूंकि और कुछ भी करूँ, तो भी कम पड़ जाता है आख़िर को सब कुछ ही…

अधूरी कहानी वाली लड़की से पूरा इश्क़ किया जा सकता है।
आधी-आधी बांट कर पी सकते हैं सिगरेट।
भूलना भी तो पूरा थोड़े होता है, आधा ही तो भूल पाते हैं किसी को भी। 

02 August, 2026

तुम्हें चिट्ठी में अफ़सोस के नीले हाइड्रेंजिया भेज दूँ?

यार, ये तुमको राइटर्स ब्लॉक टाइप का लफड़ा कब से होने लगा? तुमको मुहब्बत हो, तुम्हारा दिल टूटे, तुम्हें तन्हाई रुलाये…ये सब ठीक है तुमको। ये राइटर्स ब्लॉक जैसा टुच्चा चीज़ बाक़ी लोगों के लिए छोड़ दो। सब कुछ तुमको ख़ुद ही करना क्यों है? तुम लिखो ना, जो मन करे सो…जिससे डर लगे उसका कहानी में मर्डर कर दो…दिल टुटवा दो उसका…गुंडों से पिटवा दो…क्या चिंता है तुमको? तुम अपनी दुनिया की ईश्वर हो ही…तुमको किसी से क्या करना है?

तुम्हें मालूम है, सबके पास ऐसे दो तीन दस तरह की दुनिया नहीं होती है। उनकी ट्रेजेडी अपनी ही दुनिया में जीना, अपनी ही दुनिया में मर जाना होता है। तुम्हें मालूम, भीतर भीतर टूटता है बहुत कुछ लेकिन उसको बाहर निकालना नहीं आता लोगों को…तुम्हें मालूम, मेरी नसों में बारीक काँच के बुरादे जैसे दुख बहते हैं। कुछ नहीं कर सकते इनका। 

एक बार मैं बहुत छोटा था तो हाथ में लट्टू नचा रहा था। हथेली पर लट्टू नचाया है तुमने? वो धागे वाला लट्टू…लकड़ी का बना होता है और उसमें एक नुकीली कील होती है। अचानक से हथेली खून से भर गई…एक अंजुली भर ख़ून। आधे बच्चे तो घबराहट में चिल्लाने लगे…भर दिन लट्टू से खेलता रहता था मैं। पता नहीं उस दिन ऐसा कैसे हुआ…शायद हाथ गीले थे…कील हथेली के बीच ड्रिल हो गया जैसे…गोल-गोल घूमता हुआ…ख़ून बहना रोकने के लिए मैंने बड़ा वाला कंचा मुट्ठी में जोर से भींचा…घर जाने पर कुटाई पहले होती, फिर इलाज होता, तो हम सबने मिल कर तय किया कि गेंदा के पत्तों का रस डाल कर ऊपर से कंचा ढक्कन जैसा लगा दें…लेकिन हुआ ये कि पट्टी बाँधने के बाद मैं लड़खड़ा कर गिर गया। कंचा फूटा और काँच के टुकड़े हथेली में घुस गए। अब तो डॉक्टर के पास जाने के सिवा उपाय नहीं था। हम सदर हॉस्पिटल गए। ड्यूटी डॉक्टर ने बड़े काँच के टुकड़े निकाले…घाव की पूरी साफ़ सफ़ाई की…लेकिन उस रोज़ लगता रहा कि छोटे छोटे काँच के टुकड़े ख़ून में भीतर चले गए हैं। उस रोज़ के बाद से मैं हमेशा बेचैन रहा। काँच के महीन टुकड़े ख़ून में बह रहे थे और कहीं भी चुभने लगते थे। हमने कई डॉक्टर्स को दिखाया, उन्होंने हिसाब से साइंटिफ़िकली समझाया कि वहम हो रहा है, ऐसा कुछ फील करना नामुमकिन है। बदन में काँच के टुकड़े इस तरह रह भी नहीं सकते। घाव होगा, इन्फेक्शन होगा और मवाद के साथ टुकड़े बाहर आ जाएँगे। फिर, आर्टरी या वेन में नर्व रिसेप्टर्स नहीं होते हैं, इसलिए इस तरह का नुकीला दर्द जो बदन में टहलता रहता है, ये फाल्स पेन है। इमेजिनरी। मुझे डॉक्टर्स की बात पर पूरा भरोसा था, लेकिन दर्द तो सच की चीज़ है, यहाँ कोई कल्पना थी ही नहीं…मैं कई डॉक्टर्स को दिखाते दिखाते थक गया था। एक समय के बाद मुझे इस अचानक होने वाले दर्द की आदत पड़ गई। जैसे किसी की मृत्यु के बाद हम उनकी एब्सेंस के साथ जीना सीख लेते हैं।

तुमसे मुहब्बत हुई, तो डर लगा…तुम दिल में रहोगी, तुम्हें ये काँच के टूटे टुकड़े चुभने लगे तो? डॉक्टर्स तो कहते थे, मेरे बदन में काँच के टुकड़े हैं ही नहीं, दर्द तो फिर भी होता है। दर्द अगर सिर्फ़ कल्पना से हो रहा, तो तुमको भी हो सकता है? क्या पता ऐसा दर्द इन्फेक्शियस हो…जिस बीमारी को नब्ज में सुना ही नहीं जा सकता, उसका इलाज करेंगे तो कैसे?

क्या पता, छुआछूत से फैलता हो…तुमसे पहले मुझे किसी लड़की से प्यार नहीं हुआ था…अगर कोई अच्छी लगी भी थी तो हाथ पकड़ना तो दूर की बात है, क्लास में कभी उसकी पेंसिल या शार्पनर गिर जाता, तो वह भी उठा कर दे नहीं पाता। उसके चापाकल से पानी पीने के बाद हैंडिल नहीं चला पाता।

तुमने मेरा हाथ क्यों पकड़ लिया?

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वो मेरी कहानियों का सुपरहीरो था। उसके हाथों में गर्माहट थी। अलाव तापते हुए, आग से हाथ हटाने के बाद भी हथेलियों में गर्मी रह जाती थी। उससे मिलने के बाद भी देर तक हथेलियों में गर्माहट महसूस होती रहती। मैं कॉफ़ी कप को हथेलियों में भर देर तक बिल्कुल गर्म कॉफ़ी पीती…आख़िरी घूँट तक कॉफ़ी ठंढी नहीं होती। 

हमारे ब्रेक-ऑफ के बाद ही मैंने आइस्ड अमेरिकानो पीनी शुरू की…मेरी हथेलियाँ ठंढी रहने लगी थीं. गर्म कॉफ़ी भी ऑर्डर करती तो एक सिप में ही ठंढी हो जाती। 

मुहब्बत में मौसम का हिस्सा होता है, हम बस, लिखना नहीं चाहते। मैं किसी गर्म शहर में रहती, तो ब्रेक-अप के बाद कितना ख़ुश रहती। नॉर्मल टेम्प्रेचर पर कॉफ़ी बनाती और पीते हुए लगता कोल्ड कॉफ़ी पी रही हूँ। रूम टेम्परेचर पर पानी आता, लेकिन सिप लेते लेते चिल्ड हो जाता। नीट पी सकती व्हिस्की, आइस क्यूब डालने की जरूरत ही नहीं पड़ती। 

लेकिन अफ़सोस, ये शहर ठंढा था। इस शहर में मुहब्बत में होना बेहतर होता। लेकिन इकतरफ़ा मुहब्बत की गिनती मुहब्बत में नहीं, बीमारी में होती थी। हर कोई इलाज बताना शुरू कर देता। तुम्हें भूलने के नुस्ख़े कभी ये नहीं बता पाते कि दिमाग़ ऐसे सेलेक्टिव नहीं भूलता है…कि याद में से सिर्फ़ तुम्हारा नाम धुंधला हो जाये…बादल वाले आसमान के चाँद की तरह। तुम्हें मिटाने के चक्कर में मिट जाएँगे वो सारे रंग जिन्हें ओढ़ कर मैं तुमसे मिलने आती थी। मैं उन साड़ियों का क्या करूँगी जो मेरी इसलिए फ़ेवरिट हैं कि तुमने उनमें मुझे देख कर कहा कुछ नहीं, पर तुम्हारी आँखों में बॉनफ़ायर सुलगने लगती थी। तुम जो रंगों के किस्से सुनाते थे…उन्हें भी तो मिटाना पड़ेगा। वो तो अच्छा है तुम्हें अमलतास पसंद नहीं है, वरना जो कहानी में अमलतास का पेड़ रोपा था, जिस पर इस वसंत में पहली बार फूल आते…वो काटना पड़ता मुझे… 

तुम्हें पता है, हाइड्रेंजिया के रंग पानी के पीएच लेवल के हिसाब से होता है। अगर मिट्टी एसिडिक है तो नीले रंग के और अगर मिट्टी एल्कलाइन है तो गुलाबी रंग के…कमाल है ना, अफ़सोस से लेकर मुहब्बत के शेड्स में खिलता है फूल…कभी कभी तो आसपास लगे पौधों में भी अलग अलग रंग के फूल खिलते हैं। नीले हाइड्रेंजिया को अफ़सोस का फूल कहते हैं।
तुम्हें चिट्ठी लिखूँगी तो इस बार साथ में नीले हाइड्रेंजिया के फूल भेजूँगी।


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Love is not something we can easily explain. Ever. Heart line, luck line, life line…the major lines on the palm. लेकिन हथेली पर तो बेनाम लकीरों का जाल बिछा है। शाम से देख रही हूँ, एक छोटे से हिस्से में लकीरों ने ख़ुद को re-arrange कर लिया है। If you see it under a magnifying glass or a macro lens of your phone, it is a true copy of the the scar you have.

I absent-mindedly traced the scar on the back your palm with my finger-tip. I didn’t touch it…I just thought of touching it, the way when I see a Jackson Pollock painting, I want to touch and feel the flow of paint…I wanted to touch the scar and wonder, how you bled.

Touch is a very strange sense. It helps create our version of reality. The things we touch are real. But what do I do with the imaginary things that feel real too?

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बेस्ट फ्रेंड.
तन्वी सुनती तो तुम्हारा ख़ून कर देती.
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हैप्पी फ्रेंडशिप डे मेरी जान!
Love you to the April fools day and beyond. 

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