मैंने उसे बहुत तलाशा। जैसे पति-पत्नी के बीच की तीसरी औरत। उसके होने का पूरा अंदेशा है, लेकिन…लेकिन वो मिलती ही नहीं। हर बार उसकी तलाश में जाती हूँ और उसकी जगह ख़ुद को वहाँ पाती हूँ। क्या मैं ही वो औरत हूँ जिसके साथ मेरे पति का विवाहेतर संबंध है? वो मुझे घर पर छोड़ कर, मुझसे ही मिलने घर से बाहर जाता है।
मुझे उस तीसरी के साथ जीना ही नहीं आता। मुझे ख़ुद के साथ ही जीना कौन सा आता है। सब कुछ बेतरतीब। अधूरी कहानियाँ। अधमरे किरदार। जंगल काट कर समतल बनाई गई ज़मीन जिसमें से आधी उगी इमारतें।
मैंने मुट्ठी में भींच रखा है प्लेटफार्म टिकट। यह इस जीवन से चला-चली की बेला है। प्लेटफार्म पर ट्रेन आने ही वाली है। यहाँ से सब लोग कहीं और चले जाएँगे और मुझे अपने ख़ाली शहर में लौट कर वापस आना पड़ेगा। प्लेटफार्म से बाहर निकलते वक्त टिकट चेक होता है। टिकट नहीं होने पर बहुत बड़ा जुर्माना भरना पड़ सकता है। मेरे पास इतने पैसे तो हैं नहीं। कोई जेब भी नहीं, पर्स नहीं, मोबाइल तक नहीं। मुझे बिछड़ने का मेनिया है, पागलपन एक किस्म का। अलविदा के समय बौरायी सी तुम्हें एक आख़िरी बार देखने चली आई। मेज़ से बस दस का नोट लेकर मुट्ठी में भींचा और रूम से दौड़ती हुई बाहर। कोई देखता तो सोचना, अपने प्रेमी के साथ भाग रही हूँ। लेकिन किसी ने देखा नहीं, सब अपने जीवन में व्यस्त थे।
हॉस्टल की लड़कियाँ मेरे भाग्य से जलती थीं। मेरे पास हॉस्टल का सबसे बड़ा कमरा था। गलियारे के आख़िर वाला। यहीं सीमेंट की जालीदार बालकनी में वह पत्थर पड़ा रहता था जिससे ताला तोड़ना आसान होता था। हॉस्टल की लड़कियाँ लड़कों को अपने कमरे में तो नहीं बुला सकती थीं, लेकिन जाने क्यों उन्हें कमरे की चाभी दे देने का बड़ा शौक़ होता था। उनमें से अधिकतर को भय था कि उनके घर वाले उन्हें जबरदस्ती ले जाएँगे और किसी अच्छे सॉफ्टवेर इंजीनियर से बियाह देंगे। वे किसी स्ट्रग्लिंग राइटर की कविता की प्रेरणा बनना चाहती थीं। किसी ग़रीब चित्रकार के कैनवास की मोनोक्रोम पेंटिंग क्यूंकि आख़िर को एक ही रंग के ट्यूब्स बच्चे होते थे। इस दुनिया में रंग बहुत महंगे मिलते भी तो थे। उन्हें लगता था, जब घरवाले जबरदस्ती उन्हें अपने साथ ले जाएँगे तो पैकिंग करने का मौका देंगे नहीं। वे शादी के बाद अपने पति के फ़ोन से चुपचाप मेसेज करेंगी, कि उनके कमरे से सामान निकलवा ले। ताले की चाभी नहीं होती तो कोई उन लड़कों को सामान नहीं देता। लेकिन लड़कियां ज़्यादा थीं, कमरे कम। जैसे ही घर वाले किसी लड़की को ले जाते, बाक़ी लड़कियां जल्द से जल्द वो कमरा अपने नाम करा लेना चाहतीं। कुछ कमरों के ताले तोड़े जाते, कुछ कमरों के ताले खोले जाते। चाभी वाले लड़कों की इज़्ज़त हुआ करती थी। मैंने यूँ तो तुम्हें ठीक-ठीक समझा दिया है कि कोई हॉस्टल से कितना भी ब्लैकमेल करे, वहाँ लौट कर मत जाना। लड़कियाँ जादू जानती हैं। वे उदास लड़कों को अपना प्रेमी बना कर रख लेती हैं।
***
मुझे हॉस्टल में कमरे के बाहर रखे पत्थर की याद आई।
हॉस्टल में मेरे कमरे के बाहर एक पत्थर रखा हुआ है। मेरा कमरा गलियारे का आख़िरी कमरा है। बहुत सी लड़कियां अपनी चाभी खो देती हैं, इसलिए वह पत्थर वहाँ परमानेंट रहता है। वापस लौटूँगी तो। दरवाज़े का ताला भी तोड़ना है।
तुम ट्रेन में चढ़ कर चले गए हो। मेरे हाथ खाली हैं। मेरा जन्मदिन है। मंदिर जाना था, साड़ी बांध ही रही थी कि हॉस्टल के लैंडलाइन पर फ़ोन आ गया, तुम्हारा। ‘सुनो, मैं तुम्हारे जीवन से जा रहा हूँ। ट्रेन से। लौटूँगा नहीं। लेकिन एक आख़िरी बार तुम्हें देखने की इच्छा अभी भी बची हुई है। स्टेशन एकदम पास है। ट्रेन आती ही होगी। तुम दौड़ती हुई आना। मैं इंतज़ार नहीं कर पाऊँगा।’
तुम कहाँ जा रहे हो? कौन से स्टेशन, कौन सा प्लेटफॉर्म…इतने बड़े शहर में कहाँ ढूँढें तुम्हारी आती हुई ट्रेन को? क्या किसी भी आती हुई ट्रेन के नीचे आ कर मर-कट जायें? तुमसे प्रेम हो जाने का अपराध अक्षम्य है, मृत्यु तो अनुकंपा से मिलती, या वरदान से…मेरे पास भीष्म की तरह संचित पुण्य तो था नहीं कि इच्छा-मृत्यु मिले।
प्लेटफॉर्म पर बिल्कुल भीड़ नहीं है। सब लोग ट्रेन में चढ़ चुके हैं। तुम खिड़की से बाहर हाथ हिला रहे हो। मैं उस रूमाल को पहचानती हूँ जिसपर तुम्हारे नाम के अक्षर काढ़े थे। तुम कहते हो, मेरे पास तुम्हारी कोई निशानी नहीं है। कुछ भी दे दो तुम अपना। मेरे पास तुम्हें देने को कुछ भी नहीं है। साड़ी में एक आलपिन तक नहीं। बालों में रबर बैंड नहीं। हाथ में चूड़ी-कंगन, पैर में पायल, कान में झुमके, नाक में लौंग…ऐसा कुछ भी नहीं जो बदन से उतार कर दे सकूँ तुम्हें। चप्पल तक नहीं पहनी है। तुम्हारा हाथ भींचे खड़ी हूँ, थरथराती, पसीने से पूरी नहा गई हूँ…
सोचती हूँ, चप्पल पहनी होती तो खोल कर दे देती तुम्हें? राम जी ने जब अपनी खड़ाऊँ भरत जी को दे दी, फिर राम जी के लिए नई खड़ाऊँ कहाँ से आईं, इसका कोई ज़िक्र क्यों नहीं है? जंगल में उन्होंने किसकी खड़ाऊँ पहनी? क्या नंगे पांव घूमते रहे जंगल, कंकड़, पत्थर, काँटे, गर्मी-सर्दी सारे मौसमों में?
तुम्हारी कलाई रूमाल खोलती हूँ और उससे पूरा चेहरा पोंछती हूँ…गीला रूमाल बाँधती हूँ तुम्हारे हाथ पर वापस…आँचल के कोर में गिट्ठा डाल के बाँधा हुआ है प्लेटफार्म टिकट कि खो ना जाये। आख़िर को वही प्लेटफार्म टिकट तुम्हारी हथेली पर रखती हूँ। मैं तुम्हारे जीवन में कभी थी, सो भूल जाना, पूरा का पूरा। हम दो बचकाने प्रेमियों की कच्ची-पक्की अनगढ़ गृहस्थी भूल जाना, ये तुम्हारे लिए अच्छा रहेगा। मैं भी प्याज़ के पराठे बनाना भूल जाऊँगी। तुम्हारे कमरे में वैसे भी कुछ न कुछ रह ही गया होगा। घर बदलने के पहले आईने से मेरी चिपकायी बिंदियाँ उखाड़ देना। देखो ना, क्या क्या कह रही हूँ मैं भी। तुमने तो वो घर, सॉरी, कमरा, छोड़ ही दिया होगा। किसी दोस्त को रहने को बोल आए हो क्या? अच्छा, सवालों का समय नहीं है। वैसे भी, पूरी तरह कहाँ बिछड़ता है कोई। तुम भूल जाना, तुम्हें जहाँ जो भी तकलीफ़देह लगे। लेकिन विदा करने, मैं आई थी, भूलना मत।
ट्रेन के जाने के बाद मुझे भय दबोच लेता है। रेलवे के सिपाही लाठी फटकार रहे हैं। एक कोने में बेटिकट पकड़े गए कुछ मजदूर गठरी बने घिघिया रहे हैं। पैसे के सिवा उनके पास कुछ नहीं है, कोई आत्मसम्मान नहीं, कोई जेल से छुड़ा कर लाने वाला व्यक्ति नहीं। उम्मीद खरीदने ही तो वे अपने छोटे छोटे गाँव से निकल कर कस्बे के इस ट्रेन स्टेशन आए थे।
मुझे दरवाज़े से डर लगता है। मैं प्लेटफार्म से नीचे उतरती हूँ, और पटरी पर चलने लगती हूँ। बचपन में ये खेल लगता था। कितना अच्छा बैलेंस था उन दिनों। अभी तेज हवा में साड़ी उलझती रहती है पाँव में। मुझे मालूम नहीं है पटरियाँ किस ओर जायेंगी। मैं सोचती हूँ, कोई मंदिर दिखेगा तो पटरी से उतर कर जाऊँगी और भगवान के सामने रखे आरती के थाल से प्लेटफार्म टिकट के लिए दस रुपए ले लूँगी। अपने शहर जाने का और कोई दरवाजा नहीं है। अगर मैं किसी कच्ची सड़क से शहर चली जाऊँ तो शहर भूलभुलैया हो जाएगा। हॉस्टल का मेरा कमरा किसी और लड़की को दे दिया जाएगा। जो भी लड़की अरेंज मैरेज करने को तैयार हो जाये, उसे मेरे घर वाले अपने साथ वापस ले जायेंगे।
चलते चलते नदी आ जाती है और रेलवे पुल भी। नदी में कूद कर मर जाने का मन तो है, लेकिन शरीर पर पहचान के नाम पर कुछ भी नहीं है। लाश को पहचानेंगे नहीं, लावारिस जला देंगे। तुम जाने कब तक मेरे लौटने का इंतज़ार करो।
तुम कब तक मेरे लौटने का इंतज़ार करोगे?
***
कहानी छूट जाती है। लड़की पुल पर खड़ी है। मैं भी।
क्या करते हैं आधी कहानी का? आधी चिट्ठी का? आधे बुने मफ़लर का?
तुम्हें मालूम, किसी एक समय तुम्हारे लिए एक पीले रंग का मफ़लर बुनने लगी थी मैं…मफ़लर इसलिए, कि मफ़लर के लिए किसी नाप की जरूरत नहीं पड़ती है। और ये भी तो, कि मुझे बहुत अच्छे से स्वेटर बनाना आता भी तो नहीं। बचपन में सीखा सब था, बुनाई में सीधे उल्टे टाँकों के अलावा बढ़ाना-घटाना होता है। इसी से जियोमेट्रिक तरीके से बुनाई होती जाती है। मोज़े, टोपी, जैकेट, दास्ताने…
मैं कभी कभी हल्की धूप में बैठी होती हूँ। विंड-चाइम की आवाज़ आ रही होती है। पेड़ों पर सरसराती हवा, पक्षी, सड़क पर गाहे-बगाहे आती कोई गाड़ी…मैं सोचती हूँ, मुझे लिखने के सिवा और कोई काम आता नहीं ढंग का…चिट्ठी लिखना, कहानी लिखना वगैरह पुराने स्किल्स हो गए हैं। कई सारे एआई सिस्टम्स आ गए हैं, अच्छा लिखने वाले…
काम की कोई चीज़ आनी चाहिए ना?
काढ़े हुए रूमाल भी तो किसी काम के नहीं होते…कविता, कहानी जैसे ही तो…बिना नाम या बिना फूल वाले रूमाल से भी तो पोंछे जा सकते हैं आँसू…मैं खोजती नहीं हूँ अपने बेतरतीब घर में रेशमी धागों वाला डिब्बा…बहुत साल हो गए, फ्रेम में कोई रूमाल नहीं कसा, किसी के नाम का पहला अक्षर नहीं काढ़ा…
मेरी मम्मी बहुत सुंदर कढ़ाई करती थी। मैं भी बहुत सुंदर कढ़ाई करती थी। एकदम सलीके से किए गए स्टिचेज़…टाँके…देख कर लगे कि पेंटिंग है। मेरे हाथों में उन रिपीट स्टिच की याद है। मैं कभी कभी हवा में यूँ घूम रही होती हूँ, हाथों को नचाते हुए…मैं शहर की हवा में तुम्हारा नाम टांक रही हूँ। तुम्हारे जाने के बाद भी यह बचा रह जाएगा। मैं नहीं लिख सकती मेरी चाय की पसंदीदा दुकान की मेज़ पर तुम्हारे नाम का पहला अक्षर। पर चाहती हूँ, कहीं रहे मेरे तुम्हारे नाम के इनीशियल्स एक जगह।
कभी कभी मन करता है, टाँके उधेड़ती चली जाऊँ। आधा बुना हुआ मफ़लर उधेड़ दूँ। सियाही से लिखे ख़तों को पानी में डाल के धो दूँ। कभी कभी लगता है, तुमने जो शर्ट पहनी है, उसका एक बटन तोड़ कर वहाँ दूसरे रंग का बटन टांक दूँ। कभी कभी लगता है, बॉक्सिंग सीख लूँ। नकल्स से खून आ जाये, इतना लड़ लूँ किसी से…लिख न पाऊँ, इतना दर्द हो उँगलियों में…तुम आख़िर को बैठो हाथ अपने हाथ में लेकर…जला के दो सिगरेट…वापस लो अपने शब्द…कहो कि लिखना काफ़ी है मुहब्बत में…क्यूंकि और कुछ भी करूँ, तो भी कम पड़ जाता है आख़िर को सब कुछ ही…
अधूरी कहानी वाली लड़की से पूरा इश्क़ किया जा सकता है।
आधी-आधी बांट कर पी सकते हैं सिगरेट।
भूलना भी तो पूरा थोड़े होता है, आधा ही तो भूल पाते हैं किसी को भी।