02 August, 2026

तुम्हें चिट्ठी में अफ़सोस के नीले हाइड्रेंजिया भेज दूँ?

यार, ये तुमको राइटर्स ब्लॉक टाइप का लफड़ा कब से होने लगा? तुमको मुहब्बत हो, तुम्हारा दिल टूटे, तुम्हें तन्हाई रुलाये…ये सब ठीक है तुमको। ये राइटर्स ब्लॉक जैसा टुच्चा चीज़ बाक़ी लोगों के लिए छोड़ दो। सब कुछ तुमको ख़ुद ही करना क्यों है? तुम लिखो ना, जो मन करे सो…जिससे डर लगे उसका कहानी में मर्डर कर दो…दिल टुटवा दो उसका…गुंडों से पिटवा दो…क्या चिंता है तुमको? तुम अपनी दुनिया की ईश्वर हो ही…तुमको किसी से क्या करना है?

तुम्हें मालूम है, सबके पास ऐसे दो तीन दस तरह की दुनिया नहीं होती है। उनकी ट्रेजेडी अपनी ही दुनिया में जीना, अपनी ही दुनिया में मर जाना होता है। तुम्हें मालूम, भीतर भीतर टूटता है बहुत कुछ लेकिन उसको बाहर निकालना नहीं आता लोगों को…तुम्हें मालूम, मेरी नसों में बारीक काँच के बुरादे जैसे दुख बहते हैं। कुछ नहीं कर सकते इनका। 

एक बार मैं बहुत छोटा था तो हाथ में लट्टू नचा रहा था। हथेली पर लट्टू नचाया है तुमने? वो धागे वाला लट्टू…लकड़ी का बना होता है और उसमें एक नुकीली कील होती है। अचानक से हथेली खून से भर गई…एक अंजुली भर ख़ून। आधे बच्चे तो घबराहट में चिल्लाने लगे…भर दिन लट्टू से खेलता रहता था मैं। पता नहीं उस दिन ऐसा कैसे हुआ…शायद हाथ गीले थे…कील हथेली के बीच ड्रिल हो गया जैसे…गोल-गोल घूमता हुआ…ख़ून बहना रोकने के लिए मैंने बड़ा वाला कंचा मुट्ठी में जोर से भींचा…घर जाने पर कुटाई पहले होती, फिर इलाज होता, तो हम सबने मिल कर तय किया कि गेंदा के पत्तों का रस डाल कर ऊपर से कंचा ढक्कन जैसा लगा दें…लेकिन हुआ ये कि पट्टी बाँधने के बाद मैं लड़खड़ा कर गिर गया। कंचा फूटा और काँच के टुकड़े हथेली में घुस गए। अब तो डॉक्टर के पास जाने के सिवा उपाय नहीं था। हम सदर हॉस्पिटल गए। ड्यूटी डॉक्टर ने बड़े काँच के टुकड़े निकाले…घाव की पूरी साफ़ सफ़ाई की…लेकिन उस रोज़ लगता रहा कि छोटे छोटे काँच के टुकड़े ख़ून में भीतर चले गए हैं। उस रोज़ के बाद से मैं हमेशा बेचैन रहा। काँच के महीन टुकड़े ख़ून में बह रहे थे और कहीं भी चुभने लगते थे। हमने कई डॉक्टर्स को दिखाया, उन्होंने हिसाब से साइंटिफ़िकली समझाया कि वहम हो रहा है, ऐसा कुछ फील करना नामुमकिन है। बदन में काँच के टुकड़े इस तरह रह भी नहीं सकते। घाव होगा, इन्फेक्शन होगा और मवाद के साथ टुकड़े बाहर आ जाएँगे। फिर, आर्टरी या वेन में नर्व रिसेप्टर्स नहीं होते हैं, इसलिए इस तरह का नुकीला दर्द जो बदन में टहलता रहता है, ये फाल्स पेन है। इमेजिनरी। मुझे डॉक्टर्स की बात पर पूरा भरोसा था, लेकिन दर्द तो सच की चीज़ है, यहाँ कोई कल्पना थी ही नहीं…मैं कई डॉक्टर्स को दिखाते दिखाते थक गया था। एक समय के बाद मुझे इस अचानक होने वाले दर्द की आदत पड़ गई। जैसे किसी की मृत्यु के बाद हम उनकी एब्सेंस के साथ जीना सीख लेते हैं।

तुमसे मुहब्बत हुई, तो डर लगा…तुम दिल में रहोगी, तुम्हें ये काँच के टूटे टुकड़े चुभने लगे तो? डॉक्टर्स तो कहते थे, मेरे बदन में काँच के टुकड़े हैं ही नहीं, दर्द तो फिर भी होता है। दर्द अगर सिर्फ़ कल्पना से हो रहा, तो तुमको भी हो सकता है? क्या पता ऐसा दर्द इन्फेक्शियस हो…जिस बीमारी को नब्ज में सुना ही नहीं जा सकता, उसका इलाज करेंगे तो कैसे?

क्या पता, छुआछूत से फैलता हो…तुमसे पहले मुझे किसी लड़की से प्यार नहीं हुआ था…अगर कोई अच्छी लगी भी थी तो हाथ पकड़ना तो दूर की बात है, क्लास में कभी उसकी पेंसिल या शार्पनर गिर जाता, तो वह भी उठा कर दे नहीं पाता। उसके चापाकल से पानी पीने के बाद हैंडिल नहीं चला पाता।

तुमने मेरा हाथ क्यों पकड़ लिया?

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वो मेरी कहानियों का सुपरहीरो था। उसके हाथों में गर्माहट थी। अलाव तापते हुए, आग से हाथ हटाने के बाद भी हथेलियों में गर्मी रह जाती थी। उससे मिलने के बाद भी देर तक हथेलियों में गर्माहट महसूस होती रहती। मैं कॉफ़ी कप को हथेलियों में भर देर तक बिल्कुल गर्म कॉफ़ी पीती…आख़िरी घूँट तक कॉफ़ी ठंढी नहीं होती। 

हमारे ब्रेक-ऑफ के बाद ही मैंने आइस्ड अमेरिकानो पीनी शुरू की…मेरी हथेलियाँ ठंढी रहने लगी थीं. गर्म कॉफ़ी भी ऑर्डर करती तो एक सिप में ही ठंढी हो जाती। 

मुहब्बत में मौसम का हिस्सा होता है, हम बस, लिखना नहीं चाहते। मैं किसी गर्म शहर में रहती, तो ब्रेक-अप के बाद कितना ख़ुश रहती। नॉर्मल टेम्प्रेचर पर कॉफ़ी बनाती और पीते हुए लगता कोल्ड कॉफ़ी पी रही हूँ। रूम टेम्परेचर पर पानी आता, लेकिन सिप लेते लेते चिल्ड हो जाता। नीट पी सकती व्हिस्की, आइस क्यूब डालने की जरूरत ही नहीं पड़ती। 

लेकिन अफ़सोस, ये शहर ठंढा था। इस शहर में मुहब्बत में होना बेहतर होता। लेकिन इकतरफ़ा मुहब्बत की गिनती मुहब्बत में नहीं, बीमारी में होती थी। हर कोई इलाज बताना शुरू कर देता। तुम्हें भूलने के नुस्ख़े कभी ये नहीं बता पाते कि दिमाग़ ऐसे सेलेक्टिव नहीं भूलता है…कि याद में से सिर्फ़ तुम्हारा नाम धुंधला हो जाये…बादल वाले आसमान के चाँद की तरह। तुम्हें मिटाने के चक्कर में मिट जाएँगे वो सारे रंग जिन्हें ओढ़ कर मैं तुमसे मिलने आती थी। मैं उन साड़ियों का क्या करूँगी जो मेरी इसलिए फ़ेवरिट हैं कि तुमने उनमें मुझे देख कर कहा कुछ नहीं, पर तुम्हारी आँखों में बॉनफ़ायर सुलगने लगती थी। तुम जो रंगों के किस्से सुनाते थे…उन्हें भी तो मिटाना पड़ेगा। वो तो अच्छा है तुम्हें अमलतास पसंद नहीं है, वरना जो कहानी में अमलतास का पेड़ रोपा था, जिस पर इस वसंत में पहली बार फूल आते…वो काटना पड़ता मुझे… 

तुम्हें पता है, हाइड्रेंजिया के रंग पानी के पीएच लेवल के हिसाब से होता है। अगर मिट्टी एसिडिक है तो नीले रंग के और अगर मिट्टी एल्कलाइन है तो गुलाबी रंग के…कमाल है ना, अफ़सोस से लेकर मुहब्बत के शेड्स में खिलता है फूल…कभी कभी तो आसपास लगे पौधों में भी अलग अलग रंग के फूल खिलते हैं। नीले हाइड्रेंजिया को अफ़सोस का फूल कहते हैं।
तुम्हें चिट्ठी लिखूँगी तो इस बार साथ में नीले हाइड्रेंजिया के फूल भेजूँगी।


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Love is not something we can easily explain. Ever. Heart line, luck line, life line…the major lines on the palm. लेकिन हथेली पर तो बेनाम लकीरों का जाल बिछा है। शाम से देख रही हूँ, एक छोटे से हिस्से में लकीरों ने ख़ुद को re-arrange कर लिया है। If you see it under a magnifying glass or a macro lens of your phone, it is a true copy of the the scar you have.

I absent-mindedly traced the scar on the back your palm with my finger-tip. I didn’t touch it…I just thought of touching it, the way when I see a Jackson Pollock painting, I want to touch and feel the flow of paint…I wanted to touch the scar and wonder, how you bled.

Touch is a very strange sense. It helps create our version of reality. The things we touch are real. But what do I do with the imaginary things that feel real too?

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बेस्ट फ्रेंड.
तन्वी सुनती तो तुम्हारा ख़ून कर देती.
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हैप्पी फ्रेंडशिप डे मेरी जान!
Love you to the April fools day and beyond. 

1 comment:

  1. हाइड्रेंजिया मेरे घर के बगीचे में भी है पर नीला शुरू होकर कुछ दिनों में गुलाबी हो जाता है | ये लकीरें भी कहां कुछ बताती हैं हथेली में रहती हैं और बेवकूफ भी बना ले जाती हैं | बढ़िया लिखा है दौड़ रहा है |

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