13 August, 2026

गोलघर चलोगे? गंगा एकदम ललमटिया गई होगी


  
It will never be not strange. 

कि सपने में बौखते हुए तुम अचानक से न टकराओ। धुंध-भरी स्काईलाइन पर कई इमारतें हों। कुछ न्यू-यॉर्क, कुछ पेरिस…नदी बहती हो, दूर कहीं…कई नदियाँ मिली-जुलीं। पता नहीं तुम नदियों को उनके पानी से पहचानते हो या नहीं, पर मुझे सारी नदियाँ अलग-अलग याद रहती हैं। बहती हुई नदी का रंग ही नहीं, उसका गुनगुनाना भी अलग अलग होता है। उसके किनारे के पत्थर, उसके किनारे की मिट्टी। उसकी गंध।

नदी किनारे किन लोगों से मिलते हैं हम?
तुम्हारे साथ गंगा-घाट पर कभी नहीं बैठी हूँ, लेकिन फिर भी कहानी लिखते हुए तुम अक्सर दिखते हो। वहाँ बैठे, बतियाते। तुमसे कितने शहरों में मिली हूँ, लेकिन हमेशा लगता है हमारे पास पास बैठने से पैरों के नीचे गंगा बहने लगी हो। बहती नदी का फ्लो पैरों में मालूम चलता है। तुम हम बतियाते हैं तो पटना ही उगता है हमारे इर्द-गिर्द। दिल्ली में होते हुए भी लगता है, कोई रिक्शा आए तो उससे पूछ लें, गोलघर चलोगे? उसके न चलने पर तुमसे पूछें, अच्छा, पैदल चलोगे? आज गोलघर पर चढ़ के दूर दूर तक गंगा देखने का मन करता है।

आज सुबह आर्या पूछी कि मम्मी तुम किस शहर में सबसे पहले गई थी। हमको याद नहीं था ठीक ठीक, लेकिन जो याद में पहला था, वो हरिद्वार था। हम मम्मी के पोंचू में एक गर्माहट में बैठे थे। बर्फ गिर रही थी। हम केदारनाथ जा रहे थे। किसी पालकी में बैठ कर। मुझे मालूम नहीं, ये याद सच की है या नहीं। हम पापा से पूछ कर कन्फर्म कर सकते हैं, लेकिन नहीं करते। ट्रैवल की मेरी पहली याद वही है। हमको कभी कभी लगता है, शायद यह पिछले जन्म की याद हो। छोटे बच्चों को पिछला जन्म भी याद रहता है। हरिद्वार की फोटो में बाबा बैठे हुए हैं, चुक्कू-मुक्कू। शायद कुल्ला कर रहे हों। थोड़ा वाइट वाश जैसी फोटो है। जैसे एक्स्ट्रा ब्राइट फ़िल्टर लगा हो। मैं याद में ही घूम रही हूँ, कि वो पूछती है, were you happy? आर्या अक्सर पूछती है, कि मैं ख़ुश हूँ, या ख़ुश थी। उसके लिए ये जानना जरूरी है कि हम ज़िंदगी के किसी भी पड़ाव पर बहुत ख़ुश थे या उदास थे। 

तुमसे इतनी इत्मीनान से मिलते हैं। जैसे मालूम है। अभी कई जन्म मिलना है तुमसे। कोई हड़बड़ी नहीं है। कि हमारे पास इनफ़ाइनाइट टाइम है। हम थोड़ा थोड़ा कर के ही मिल पायेंगे। कई जन्मों में। लेकिन फिर भी कहना चाहती हूँ, हमेशा तुमसे। सुनो, अगले जन्म थोड़ा पहले मिलना हमसे। हमारे तुम्हारे बीच नदी बहती है, लेकिन सरस्वती। हम उसे देख नहीं पाते, उसके पानी से आचमन नहीं कर सकते। लेकिन स्याही बनाने के लिए गोल काली टिक्की घोलनी है, हम ऐसे हवा में चुल्लू बनाते हैं और उसमें सरस्वती नदी का पानी आ जाता है। मैं कहानी में तुम्हें देखती हूँ, काग़ज़ पर ख़त लिखते हुए। कहानी में जो तुम हो, वो कहता है मुझसे, कि उसके पास मेरे लिए कई सारी अधूरी चिट्ठियाँ हैं। कि वो जेब में पोस्टकार्ड लिए घूमता है कि मेरे पते पर भेज सके, लेकिन दुनिया में पोस्टऑफ़िस ही नहीं बचे हैं, तो मेरा ख़त कोई पहुँचा ही नहीं सकता। 

मैं पढ़ती हूँ चिट्ठी, तुमने लिखा है, तुम्हारे जाने के बाद शहर ठहर गया है। यहाँ का मौसम। आसमान के बादल। नदी की लहरें। हवा। ट्रैफिक। कुछ हिल तक नहीं रहा अपनी जगह से। तुम स्टेच्यू कर के चली गई हो मेरा शहर। वापस आओगी, रिलीज़ करने। कि तुम्हारे दिल में एक ठहरा हुआ दिन है। एक बहुत लंबी वाक है। पोलॉक की पेंटिंग साथ में नहीं देख पाने का अफ़सोस है।

मुझे रफ़्तार से डर लगता है। जिस रफ़्तार से मन उड़ता है। जितने सवाल करता है। आज एक फ़िल्म देखी, विकी क्रिस्टीना, बार्सिलोना। हम अलग अलग शहरों में बदले हुए लोग होते हैं। कुछ शहर एक धारदार खुखरी से चीरते हैं, बीचोंबीच और हमें दो फाँक खोल देते हैं। तुमने ख़ुद के दो टुकड़े हुए देखे हैं? जब कि दिल प्रेजेंट और पास्ट का इश्क़ एक साथ करता है…कि जिसके साथ हैं, उससे मुहब्बत है ही, लेकिन कोई अतीत से छूट नहीं रहा। कोई आत्मा में धँसा हुआ है। चुभता हुआ, रिसता हुआ। क्रिस्टीना को मुहब्बत में कोई फ़ाइनालिटी नहीं चाहिए, उसे इन फैक्ट, मालूम नहीं कि उसे क्या चाहिए। उसे बस ये मालूम है, कि जो है पास में, वो नहीं चाहिए।

क्या सबके भीतर कोई अधूरी मुहब्बत ज़िंदा रहती है?

क्राकोव के ओल्ड टाउन स्क्वायर के बीच में एक झरना था। वहाँ तक पहुँचती बहुत सी सड़कें और उन सारी सड़को पर बहती हुई धुनें। आँख बंद करो, हवा में सुनाई देती है, कहीं दूर से उड़ती हुई धुन। तुम कभी किसी एन्सिएंट एम्फीथियेटर में खड़े हुए हो, अकेले? आँख बंद करने पर हवा में बहुत पुरानी धुन बहती हुई आती है और एकदम से तुम्हें लपेट लेती है चारों तरफ़ से, जैसे कोई शॉल उड़ता हुआ आ गया हो हवा में और लिपट गया हो तुमसे। जैसे सर्द मौसम में जरा सी गर्माहट हो। कि दाँत किटकिटाने बंद हो जायें। जैसे गर्म वाइन का एक घूँट उतरा हो भीतर। जैसे सेंक दे, कोई अलाव में हाथ गर्म कर के, तुम्हारा चेहरा।

जिन शहरों में तुम्हारी याद न हो, मैं उन शहरों में करूँगी भी क्या? ख़ाली पोस्टकार्ड्स। बिना किसी पते के। कभी पेन रखना भूल जाऊँ, तो किसके पास से मिलेगी कलम? आजकल तो कोई भी पेन लेकर नहीं चलता साथ में। मेरी कहानी में मैं हमेशा तुम्हें चिट्ठियाँ लिख रही हूँ। 

फ़िल्म का मेरा पसंदीदा हिस्सा वो है जहाँ हुआन और मारिया एलिना, दोनों पेंट कर रहे हैं। उन्हें ऐब्सट्रैक्ट पेंटिंग बनाते हुए देखना मुझे पोलॉक की याद दिलाता है। पेंट करने में एक इंटेंसिटी है। मूवमेंट है। अनप्रेडिक्टेबिलिटी है। ऐबस्ट्रैक्ट पेंटिंग इस मूवमेंट को थिर करता है, कई रंगों में, बहते हुए पेंट में, केओस में। पेंट करते हुए हुआन सिगरेट पी रहा है, उसके कपड़ों पर पेंट के छींटे हैं। मारिया कैनवास के ऊपर चलते हुए बड़े से रोलर से कैनवास पेंट कर रही है। उसके इर्द गिर्द बहुत से पेंट के डिब्बे हैं, ब्रश है, फर्श पर गिरा हुआ पेंट है। पेंट करने की प्रोसेस भी पेंटिंग जितनी सम्मोहक है।

मारिया एलीना कहती है, हुआन ने उसके पेंटिंग के आईडिया चुरा लिए। हालांकि हुआन इस बात को नकारता है, अपने पूरेपन में नहीं, आधे अधूरे। लेकिन मैं जानती हूँ, वो सच कह रही है, वो जीनियस है, उसके पेंट में दिखता है। एक उलझी हुई क्रिएटिव soul है वो…जो हुआन से इतना प्यार करती है कि लौट लौट कर उस तक आती है, और उसकी जान ले लेने की हद तक पजेसिव है।

बहुत साल पहले, बैंगलोर में मेरा दोस्त रहता था, अभिषेक डेहरिया। मेरी किताब, इश्क़ तिलिस्म का कवर उसने ही पेंट किया है। मैं उसके पेंटिंग स्टूडियो जब भी जाती थी, उसकी अधूरी पेंटिंग देखना मुझे किसी तिलिस्म में जाने जैसा ही लगता था। कई सारे कैनवास इर्द गिर्द। उससे बात करते हुए सोचती थी, उसके भीतर कितने रंग रहते होंगे। वे रंग क्या भीतर से कैनवास पर आते हुए बदलते हैं?

फ़िल्म में बहुत जगह पर हुआन और मारिया स्पेनिश में बात करने लगते हैं, amazon प्राइम के इस एडिशन में उस बातचीत की कोई सबटाइटलिंग नहीं है। मुझे कोफ़्त होती है। लगभग वैसी ही, जैसे क्रिस्टीना को होती होगी, जब कि हुआन बार बार कह रहा होता है कि इस घर में इंग्लिश में बात करो। गुस्से में, प्रेम में, जिम में एक सेट की गिनती गिनते हुए, हम अपनी पहली भाषा तक आ जाते हैं। ये हमारा नेचुरल स्टेट होता है। 

फ़िल्म में हुआन विकी को पेंटिंग दिखा रहा है। ऐब्सट्रैक्ट पेंटिंग्स हैं। मैं सोच रही हूँ, तुम घर पर हो। अधूरे पोस्टकार्ड्स देख रहे हो। डायरीज पलट रहे हो। कोई किरदार है। तुम्हारे जैसा, तुम से इंस्पायर्ड। तुम्हारे शर्ट्स पहन के घूम रहा है मेरी कहानियों में। मैं उलझती हूँ तो सीधे पूछ लेती हूँ, लेकिन सीधे सवाल का सीधा जवाब कोई किरदार नहीं देता। ‘मुझसे मिलते तो हो तुम्हारा दिल नॉर्मल धड़कता है या थोड़ा ज़्यादा तेज़ रफ़्तार? मेरा दिल कभी तुमसे मिलने के पहले नॉर्मल नहीं रह पाता। मैं चाह कर भी गाड़ी धीरे नहीं चला पाती। मुझे लगता है उड़ते हुए आऊँगी तो समय बहुत मिलेगा…एक मिनट एक्स्ट्रा भी सही।’

प्लेन आसमान में है।
मैं कहाँ हूँ? और तुम्हें जो चिट्ठियाँ भेजनी थीं, वे कहाँ पर हैं? 

दिक़्क़त ये है कि विकी क्रिस्टीना बार्सिलोना रोमांटिक फ़िल्म नहीं है, मुहब्बत की परिभाषाएँ तलाशती, क्रिएटिव लोगों की ज़िंदगी में किसी किरदार की तरह खुलती उलझती फ़िल्म है। मैंने देख तो ली है, पर अब इसके बारे में बात किससे करूँ, सो नहीं समझ आ रहा। 

स्पैनिश अभिनेता जेवियर बारडेम मुझे बहुत पसंद है। टिपिकल मैस्कुलिन ब्यूटी के हिसाब से नहीं, लेकिन एक स्ट्रेंज rawness है, जिसके बारे में कहते हैं, कि हैंडसम नहीं, लेकिन कहीं न कहीं अटकने वाला किरदार। मिस्टीरियस। आप उसे खोलना चाहेंगे, समझना चाहेंगे। 

जिस दुनिया में हम जी रहे, वहाँ बहुत ज़्यादा इंटेंसिटी से जीने वाले लोग माइनॉरिटी में हैं। क्यों होना ज़्यादा इंटेंस जैसे सवालों का कोई अर्थ नहीं। इंटेंसिटी हमसे पूछ कर नहीं आती। कोई अच्छा लग जाता है तो चुभ जाता है उसका होना हमारी टाइमलाइन में। हम उसे कहाँ कहाँ नहीं भुलाना चाहते हैं। लेकिन वो लौट लौट आता है।

इस शहर की तन्हाई मुझे बेतरह तोड़ती है। ऐसा पिछले कई साल से हो रहा है। पता है, डिज़्नीलैंड में एक नियम है। कि डिज़्नी के किरदार, जैसे कि सिंड्रेला या बाक़ी राजकुमारियाँ भी, किसी बच्चे को हग करेंगी, तो तब तक हग किए रहेंगी जब तक वो बच्चा अपनी बाँहें न हटा ले। ये नियम पूरी दुनिया में लागू होना चाहिए। कि जिसने hug initiate किया है, ख़त्म भी वही करे। लेकिन ऐसा होता तो नहीं। Hugs are fleeting. Love is not. दोस्तों को भी समझ नहीं आता कि भीतर कोई ग्लेशियर है, उसे पिघलने में वक्त लगता है। Tight hugs. For as long as you want. बेशक़ीमत चीज़ है, किसी मॉल में नहीं मिलती।

एयरप्लेन में लिखा था शायद इस पोस्ट को, मोस्टली।
प्लेन हवा में है। लेकिन जाने क्यों, दिल डूब रहा है।

12 August, 2026

तुम कितनी उदास बातें करने लगी हो

लेकिन संगमरमर का दिल बनाना इतना आसान भी नहीं होता।

पता नहीं क्यों तुम्हें आसान लगता है! एक ज़िंदा धड़कते हुए दिल का संगमरमर का क्लोन बनाना इतना भी आसान नहीं होता। दिल की बाहरी दीवारों पर खुदे हुए नाम ही देख लो। असल के दिल में ये नाम एकदम ठीक ठीक दिखते नहीं, धुंधले होते हैं, आउट ऑफ़ फोकस। लेकिन जैसे ही तुम संगमरमर का दिल बनाओगे, सारे नाम एकदम साफ़ साफ़ दिखेंगे, लाल-हरे-नीले पत्थर में inlay वर्क में खुदे हुए। तुम्हें मालूम भी नहीं चलेगा, कब तुम कारीगरों को पूरी दुनिया में भेज दोगे, अलग अलग रंगों के पत्थर चुनने। कोई मूंगा ला रहा, कोई पन्ना, कोई नीलम की ठीक-ठीक पहचान करने में उम्र का इतना हिस्सा लगा चुका है कि उसे काली आँखों वाली महबूबा की आँखें भी नीली ही दिखती हैं।

रंग असल में एक भरम ही तो हैं। वैसे ही जैसे दिल के पत्थर पर बारीक खुदे ये नाम देख कर तुम्हें धोखा होगा कि ‘मुहब्बत’ और ‘हमेशा’ एक वाक्य में ठीक ठीक लगते हैं, होता है इसके ठीक उलट। मुहब्बत सिर्फ़ एक लम्हे को ज़िंदा रह सकती है। कहानियों में। असल जीवन में, ‘मुहब्बत’ और ‘मृत्यु’ एक वाक्य में ठीक लगते हैं। किसी से बहुत ज़्यादा प्यार करने लगोगे तो जान चली जाये, ये बेहतर है। जो नहीं हुआ, वहाँ कई सारे ऑप्शन होते हैं। किसी इमैजिनरी महबूब के साथ दुनिया के कई शहरों की तफ़सील से जाँच की जा सकती है। सच के लोग थक जाते हैं, बोर हो जाते हैं या फिर जाते ही नहीं साथ में।

‘देखो, कोई इमैजिनरी महबूब बनाना मुश्किल है, लेकिन शहर बनाना आसान। मेरे साथ एक इमैजिनरी शहर का नक्शा बनाओगे? Tell me, are you a sea person or a mountain person?’

‘दो ही ऑप्शन क्यों? इतना सा ही भूगोल पढ़ा है तुमने? मुझे न पहाड़ पसंद हैं, न समंदर। मुझे नदियाँ अच्छी लगती हैं और रेगिस्तान।’

‘इतना कंट्राडिक्शन! यार, रेगिस्तान से मुहब्बत करने वाले लड़के को किस तरह से नदियाँ पसंद आती हैं, मुझे समझ नहीं आता।’

‘कायदे से सोचो, तो रेगिस्तान के लड़कों को नदियों से इश्क़ होना लाज़िमी है।’

‘लाज़िमी थोड़ा भारी शब्द नहीं हो गया? इतने क़ायदे क़ानून से कौन चलता है?’

‘तुम चलती हो ना, क़ायदे क़ानून से…बिना अलार्म के सुबह उठ जाने वाली, कभी फ्लाइट-ट्रेन मिस न करने वाली, दोस्तों को मुलाक़ात का समय दे कर बिफ़ोर टाइम आने वाली लड़की हो तुम। तुम्हारे जीवन में तो सब कुछ सही चलना ही चाहिए ना? तो ग़लत क्या है अगर मैं कहूँ कि रेगिस्तान के बाशिंदों को नदियों से इश्क़ है।’

‘लेकिन ऐसा होना नहीं चाहिए ना?’

‘होना नहीं चाहिए क्या होता है यार! मुहब्बत में कौन से रूल्स लगने लगे। अच्छा बताओ, ये जो तुम चलता फिरता सन-डायल बनी घूमती हो, ऐसा कोई छोटा सा यंत्र नहीं हो सकता मेरे भीतर भी। कि भोर के पहले पहर मालूम चले कि दिन होने वाला है और उस तूफ़ान को देख कर समझ आए, इस लड़की से इश्क़ होने वाला है। एक तरह का इश्क़ का अर्ली वार्निंग सिस्टम।’

‘तुम्हें मुहब्बत का वार्निंग सिस्टम चाहिए। उसका फ़ायदा क्या होगा? नहीं गिरोगे मुहब्बत में तुम?’

‘यार, देखो, गिरना तो inevitable है, लेकिन उन दिनों बिना मेहराब वाली छतों पर नहीं जायेंगे, पहाड़ घूमने की प्लानिंग नहीं करेंगे, इन फैक्ट, कोई ऊँची जगह जायेंगे ही नहीं। तो मुहब्बत में गिरेंगे तो सही, लेकिन धीरे। हाथ पांव नहीं टूटेंगे, दिल ही टूटेगा, बस।’
‘बे पागल इंसान, मुहब्बत और लॉजिक एक वाक्य में अगल-बगल नहीं होते। दूर दूर होते हैं।’
‘पास कर दो थोड़ा। और तुम आओ थोड़ा पास और।’
‘कितने पास?’
‘आधे जन्म पास?’
‘ये तो ज़्यादा है। चित्रगुप्त नहीं मानेगा’
‘तुम्हारी रिक्वेस्ट से यमराज रुक जाते हैं, तुम क्या बात कर रही हो! चित्रगुप्त को तुम पॉकेट में लेकर चलती हो’
‘यार, चित्रगुप्त नहीं, कितनी बार समझाया है तुम्हें, वो सिर्फ़ एक चैटबॉट है। मैंने चित्रगुप्त का काम आसान हो इसलिए उसे LLM बना कर दिया था। मैं ट्रबलशूटिंग के लिए उसका एक डिजिटल ट्विन वर्शन अपने फ़ोन में डाल के रखती हूँ।’
‘अब ये ग़लत नहीं है? टेक्नोलॉजी से देवताओं की हेल्प करना, जिन्होंने लिटरली अपने एंटरटेनमेंट के लिए ये पूरी दुनिया बनाई है’
‘तो ये दुनिया उनकी ही तो रहती है। तेरा तुझ को अर्पण, क्या लागे मेरा!’
‘अच्छा, एक काम करो ना, चित्रगुप्त से बोल कर मेरा एक एकदम इंटेंस वाला इश्क़ करवा दो। एकदम इंटेंस। तुम्हारे टाइप एकदम। जान जाने लगी, इस तरह का कोई।’
‘मेरे टाइप इंटेंस? देखो, हम कह रहे थे तुमसे ये सस्ता नशा मत किया करो तुम। तुमको सूट नहीं करता। तुमको मेरे टाइप इंटेंस मुहब्बत हो गई तो एक हफ़्ते सर्वाइव नहीं कर पाओगे अपने ख़ुद की लव स्टोरी। उम्र अगर तुम्हारी मान लो, चालीस साल और बची है, तो अभी अगले हफ़्ते मर जाओगे। बहुत इंटेंस इश्क़ जीने के लिए सब्र चाहिए, कई जन्म तक बिछड़ बिछड़ के मिलने का सब्र और हर दूसरे जन्म में उससे ही फिर से मिल पाने लायक़ भरोसा। इतने भारी भारी शब्द सुन रहे हो। बाद में रोते आओगे मेरे पास ही। तब क्या करेंगे हम!’

‘मरहम पट्टी। जो एक दोस्त का कर्म होता है’

‘कर्म नहीं होगा यहाँ, क्रिया कर्म हो जाएगा तुम्हारा। दिल में गोबर भरा है तुम्हारे। कोई लड़की गोयठा ठोक के चली जाएगी क़िस्मत के दीवार पर। तब से समझा रहे, तुम्हारी बेवक़ूफ़ियों से तुमको बचाने शंकर भगवान अवतार लेकर थोड़े ना आयेंगे। कभी कभी अपना गण-बन भी भेज देते हैं।’

‘यार हमको समझ नहीं आता। तुम्हें ख़ुद को हज़ार बार इश्क़ में गिरना पड़ना है, और हम कह रहे हैं, हमारी एक सेटिंग करवा दो तो तब से ज्ञान दे रही हो, ये नहीं कि अपनी दोस्त का फ़ोन नम्बर दे दो। कि दिल ही तुड़वाना है तो जाओ, इससे तुड़वा लो, हिसाब से तोड़ेगी।’

‘यार, दिल कैसे हिसाब से तोड़ते हैं? मतलब। दिल एक तरफ़, हिसाब एक तरफ़। ऐसे थोड़े ना होता है कि कैलकुलेट कर ली है कि थोड़ा सा दिल तोड़ेंगे, जैसे बहुत सारा दारू पी कर थोड़ा सा लीवर डैमेज होता है। उतना ही, जितना ख़ुद से रीजनरेट हो जाये…ये नहीं कि लिवर सिरोसिस से मर जाओ तुम।’

‘यार मुहब्बत में मौत आए जरूरी थोड़े है। एक्सीडेंट में भी तो मर सकते हैं हम। सोचो, हम जो बचा-बचा कर पूरा जीवन जीते आए कि किसी से इश्क़ में जान न चली जाये, सो हम गलती से किसी ड्रंक ड्राइवर का एक्सीडेंट हो जायें। कितना अफ़सोस होगा तब तुम्हें!’

‘हमको कोई अफ़सोस नहीं होगा। तुमसे ये मुहब्बत मुहब्बत वाला गेम नहीं हो पायेगा। तुम गिरोगे ज़ोर से। तुम्हारा लक्षण सारा वैसा का वैसा है।’

‘कैसा? शहादत वाला?’

‘देखो, इश्क़ में ऐसे प्लान करके नहीं गिरते हैं। कि इस बार हमको गहरा प्यार हो जाएगा, जो भी मिले, उसी से। मुहब्बत के बारे में सबसे मुश्किल बात ये है कि मुहब्बत एकदम से इंडिपेंडेंट एंटिटी है। जैसे तूफ़ान होता है, जैसे सूनामी आता है, जैसे भूकंप से फट जाती है ज़मीन और नदियाँ बदल लेती हैं अपना रास्ता, अचानक से एक रोज़…जैसे कोई पहाड़ से पुकारता है तुम्हारा नाम और तुम्हारी आत्मा शरीर छोड़ कर उड़ लेती है। ये जानते हुए भी कि इस तरह जाने में उसे एक बार हग तक नहीं कर सकोगे।’

‘तुम एंटी-मुहब्बत कैसे हो?’

‘हम रियलिस्ट हैं। मुहब्बत कोई बाँध थोड़े है कि पहाड़ी नदी देखी और सोच लिया, इस ऊर्जा से बिजली निकाली जा सकती है। तुमने कभी सोचा कि कितने गांव जमींदोज होंगे, बिना जाने हुए कि आधे डूबे हुए मंदिरों के ईश्वर उदास रहते हैं। पिछली बार जब डैम बनाया गया था तो गाँव में पानी धीरे धीरे आया। सब कुछ धीरे धीरे डूबा। शिवाले की सीढ़ियाँ। गोसाईघर के ताखे पर रखा हुआ जलता हुआ दीपक। हनुमान मंदिर की ध्वजा का बांस। और आख़िर को मेरा दिल।’

‘विस्थापित गांवों और जंगलों के लोग कहाँ जाते हैं?’

‘जहाँ भी जाते हैं, पर ये सोचो, उनके पास लौटने को कोई जगह नहीं होती। वे कभी अपने बच्चों को नहीं दिखा पाते अपने बचपन का शिवालय। अपने गाँव का कुआँ। दादी का रोपा हुआ आम का बगीचा।’

‘तुम कितनी उदास बातें करने लगी हो।’

‘यार, बताओ, सच में। मुहब्बत कब से ख़ुश होने की बात है?’

‘मुहब्बत हमारे दिल का भूगोल बदल देती है। फिजिक्स के नियम काम करने बंद कर देते हैं। दिल मुहब्बत में या तो डूबता है या जलता है। ऐसा कितना कम होता है कि दिल मुहब्बत में उड़ रहा हो…नाच रहा हो…गा रहा हो। और तुम्हें सब कुछ जानते हुए भी डर नहीं लगता…ये एडवेंचर नहीं है। यहाँ ऑप्शन नहीं रहते।’

‘ठीक है ठीक है। जाने दो। सुनाओ ना कोई कहानी, लेटेस्ट वाली। पिछले इश्क़ में सबसे स्पेशल क्या था?’

‘वो लड़का सिगरेट पीता हुआ भी क्यूट लगता था। हैंडसम नहीं, सेक्सी नहीं, क्यूट।’

‘अच्छा! तुम्हें लड़के क्यूट भी लगते हैं, हमको मालूम ही नहीं था। क्या स्पेशल था उस स्मोकिंग लड़के में?’

‘उस पर गुलाबी रंग अच्छा लगता था…उस रोज़ सिगरेट पीते हुए उसने पिंक कलर की शर्ट पहनी थी. स्पेशल मेरे लिए’

‘स्पेशल. मतलब रंग स्पेशल, सिगरेट स्पेशल और उसके भी ऊपर, तुम स्पेशल…ज़्यादा स्पेशल नहीं हो गया?’

‘हाँ हो गया। उस रोज़, I was god’s favorite girl…मेरा बर्थडे था ना।’

‘तुम तो रोज़ ही गॉड की फ़ेवरिट गर्ल होती हो।’

‘नहीं, मैं गॉड की नहीं, शैतान की फ़ेवरिट गर्ल हूँ। सारे गुनाह वही करवाना चाहता है मुझसे। भगवान जी तो हमको बचाने के लिए जब न तब तिकड़म भिड़ाते रहते हैं कि हम ज़िंदा रहें। जान न दे दें। वरना अगले जन्म में फिर से जीरो से शुरू करना पड़ेगा और बहुत सारा दुख झेलना पड़ेगा। फिर रोना-धोना उनके ही पास करेंगे।’

‘गुनाह की क्या डेफिनिशन है तुम्हारे पास?

‘यार, मुझे ना अफ़सोस करना बहुत बड़ा गुनाह लगता है। वो काम जो हम सच में करना चाहते थे, लेकिन कर नहीं पाये। इंडियन पीनल कोड में किसी धारा के अंतर्गत वो कोई अपराध नहीं है…लेकिन हमारा दिल इतना न दुखता है कि न जीते बनता है न मरते। लेकिन मेरा जाने दो…मेरी कहानियाँ सारी बहुत लंबी हैं। और हमारे पास, ऐज़ यूजअल, वक्त बहुत कम है।’

‘वक्त कम है नहीं, वक्त कम पड़ जाता है। तुम्हारे पास बैठता हूँ तो समय कभी पूरा नहीं पड़ता। हमेशा लगता है बहुत सी बातें बाक़ी रह गई हैं।’

‘है ना, जैसे कोई अच्छी किताब। पढ़ के हमेशा थोड़ा सा और पढ़ने का मन होता है। बुरी किताब ख़त्म करते करते दिमाग़ ख़राब हो जाता है कि काश इसे भी फ़िल्मों की तरह फ़ास्ट फॉरवर्ड करके पढ़ पाते.’

‘फिर कब मिलोगी?’

‘यार, टेलीपैथी से बुला लेना। जिस भी शहर में होंगे, चले आयेंगे, प्रॉमिस।’

‘थोड़ा ज़्यादा मिला करो मुझसे…ज़िंदगी फीकी लगने लगती है तुमसे मिले ज़्यादा दिन हो जाते हैं तो।’

‘बस?’

‘हाँ, सिर्फ़ इतना’

‘ओके’

‘ओके, लव यू, बाय, ज़िंदगी रही, तो फिर मिलोगे ना?’

‘और ना मिले तो?’

‘तो फिर उसको ज़िंदगी थोड़े कहेंगे?’

‘जाओ बे!’
‘आग मत लगाओ। एक सिगरेट से दुनिया जला देने वाले लोग। बारूद के गोदाम के बाहर खड़े होकर सिगरेट नहीं पीते हैं, जरा दूर हटो हमसे।’
रात के दो बजे उसने फ़ोन किया। बिछड़ने के ठीक बाद। दारू लड़के ने पी थी। लेकिन चढ़ी उसको थी, जो designated ड्राइवर रही। गा नहीं, चीख रही थी।
‘हद से ज़्यादा आती है, मुझको मेरी जान तेरी याद। एक तेरे आने के पहले, इक तेरे जाने के बाद!’ 

03 August, 2026

Random notes, a half story और शुरुआती अगस्त

वो, वो, वो…वो ही…वो ही तो नहीं मिलती।

मैंने उसे बहुत तलाशा। जैसे पति-पत्नी के बीच की तीसरी औरत। उसके होने का पूरा अंदेशा है, लेकिन…लेकिन वो मिलती ही नहीं। हर बार उसकी तलाश में जाती हूँ और उसकी जगह ख़ुद को वहाँ पाती हूँ। क्या मैं ही वो औरत हूँ जिसके साथ मेरे पति का विवाहेतर संबंध है? वो मुझे घर पर छोड़ कर, मुझसे ही मिलने घर से बाहर जाता है।

मुझे उस तीसरी के साथ जीना ही नहीं आता। मुझे ख़ुद के साथ ही जीना कौन सा आता है। सब कुछ बेतरतीब। अधूरी कहानियाँ। अधमरे किरदार। जंगल काट कर समतल बनाई गई ज़मीन जिसमें से आधी उगी इमारतें।

मैंने मुट्ठी में भींच रखा है प्लेटफार्म टिकट। यह इस जीवन से चला-चली की बेला है। प्लेटफार्म पर ट्रेन आने ही वाली है। यहाँ से सब लोग कहीं और चले जाएँगे और मुझे अपने ख़ाली शहर में लौट कर वापस आना पड़ेगा। प्लेटफार्म से बाहर निकलते वक्त टिकट चेक होता है। टिकट नहीं होने पर बहुत बड़ा जुर्माना भरना पड़ सकता है। मेरे पास इतने पैसे तो हैं नहीं। कोई जेब भी नहीं, पर्स नहीं, मोबाइल तक नहीं। मुझे बिछड़ने का मेनिया है, पागलपन एक किस्म का। अलविदा के समय बौरायी सी तुम्हें एक आख़िरी बार देखने चली आई। मेज़ से बस दस का नोट लेकर मुट्ठी में भींचा और रूम से दौड़ती हुई बाहर। कोई देखता तो सोचना, अपने प्रेमी के साथ भाग रही हूँ। लेकिन किसी ने देखा नहीं, सब अपने जीवन में व्यस्त थे।

हॉस्टल की लड़कियाँ मेरे भाग्य से जलती थीं। मेरे पास हॉस्टल का सबसे बड़ा कमरा था। गलियारे के आख़िर वाला। यहीं सीमेंट की जालीदार बालकनी में वह पत्थर पड़ा रहता था जिससे ताला तोड़ना आसान होता था। हॉस्टल की लड़कियाँ लड़कों को अपने कमरे में तो नहीं बुला सकती थीं, लेकिन जाने क्यों उन्हें कमरे की चाभी दे देने का बड़ा शौक़ होता था। उनमें से अधिकतर को भय था कि उनके घर वाले उन्हें जबरदस्ती ले जाएँगे और किसी अच्छे सॉफ्टवेर इंजीनियर से बियाह देंगे। वे किसी स्ट्रग्लिंग राइटर की कविता की प्रेरणा बनना चाहती थीं। किसी ग़रीब चित्रकार के कैनवास की मोनोक्रोम पेंटिंग क्यूंकि आख़िर को एक ही रंग के ट्यूब्स बच्चे होते थे। इस दुनिया में रंग बहुत महंगे मिलते भी तो थे। उन्हें लगता था, जब घरवाले जबरदस्ती उन्हें अपने साथ ले जाएँगे तो पैकिंग करने का मौका देंगे नहीं। वे शादी के बाद अपने पति के फ़ोन से चुपचाप मेसेज करेंगी, कि उनके कमरे से सामान निकलवा ले। ताले की चाभी नहीं होती तो कोई उन लड़कों को सामान नहीं देता। लेकिन लड़कियां ज़्यादा थीं, कमरे कम। जैसे ही घर वाले किसी लड़की को ले जाते, बाक़ी लड़कियां जल्द से जल्द वो कमरा अपने नाम करा लेना चाहतीं। कुछ कमरों के ताले तोड़े जाते, कुछ कमरों के ताले खोले जाते। चाभी वाले लड़कों की इज़्ज़त हुआ करती थी। मैंने यूँ तो तुम्हें ठीक-ठीक समझा दिया है कि कोई हॉस्टल से कितना भी ब्लैकमेल करे, वहाँ लौट कर मत जाना। लड़कियाँ जादू जानती हैं। वे उदास लड़कों को अपना प्रेमी बना कर रख लेती हैं।   
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मुझे हॉस्टल में कमरे के बाहर रखे पत्थर की याद आई।

हॉस्टल में मेरे कमरे के बाहर एक पत्थर रखा हुआ है। मेरा कमरा गलियारे का आख़िरी कमरा है। बहुत सी लड़कियां अपनी चाभी खो देती हैं, इसलिए वह पत्थर वहाँ परमानेंट रहता है। वापस लौटूँगी तो। दरवाज़े का ताला भी तोड़ना है।

तुम ट्रेन में चढ़ कर चले गए हो। मेरे हाथ खाली हैं। मेरा जन्मदिन है। मंदिर जाना था, साड़ी बांध ही रही थी कि हॉस्टल के लैंडलाइन पर फ़ोन आ गया, तुम्हारा। ‘सुनो, मैं तुम्हारे जीवन से जा रहा हूँ। ट्रेन से। लौटूँगा नहीं। लेकिन एक आख़िरी बार तुम्हें देखने की इच्छा अभी भी बची हुई है। स्टेशन एकदम पास है। ट्रेन आती ही होगी। तुम दौड़ती हुई आना। मैं इंतज़ार नहीं कर पाऊँगा।’

तुम कहाँ जा रहे हो? कौन से स्टेशन, कौन सा प्लेटफॉर्म…इतने बड़े शहर में कहाँ ढूँढें तुम्हारी आती हुई ट्रेन को? क्या किसी भी आती हुई ट्रेन के नीचे आ कर मर-कट जायें? तुमसे प्रेम हो जाने का अपराध अक्षम्य है, मृत्यु तो अनुकंपा से मिलती, या वरदान से…मेरे पास भीष्म की तरह संचित पुण्य तो था नहीं कि इच्छा-मृत्यु मिले। 

प्लेटफॉर्म पर बिल्कुल भीड़ नहीं है। सब लोग ट्रेन में चढ़ चुके हैं। तुम खिड़की से बाहर हाथ हिला रहे हो। मैं उस रूमाल को पहचानती हूँ जिसपर तुम्हारे नाम के अक्षर काढ़े थे। तुम कहते हो, मेरे पास तुम्हारी कोई निशानी नहीं है। कुछ भी दे दो तुम अपना। मेरे पास तुम्हें देने को कुछ भी नहीं है। साड़ी में एक आलपिन तक नहीं। बालों में रबर बैंड नहीं। हाथ में चूड़ी-कंगन, पैर में पायल, कान में झुमके, नाक में लौंग…ऐसा कुछ भी नहीं जो बदन से उतार कर दे सकूँ तुम्हें। चप्पल तक नहीं पहनी है। तुम्हारा हाथ भींचे खड़ी हूँ, थरथराती, पसीने से पूरी नहा गई हूँ…

सोचती हूँ, चप्पल पहनी होती तो खोल कर दे देती तुम्हें? राम जी ने जब अपनी खड़ाऊँ भरत जी को दे दी, फिर राम जी के लिए नई खड़ाऊँ कहाँ से आईं, इसका कोई ज़िक्र क्यों नहीं है? जंगल में उन्होंने किसकी खड़ाऊँ पहनी? क्या नंगे पांव घूमते रहे जंगल, कंकड़, पत्थर, काँटे, गर्मी-सर्दी सारे मौसमों में?

तुम्हारी कलाई रूमाल खोलती हूँ और उससे पूरा चेहरा पोंछती हूँ…गीला रूमाल बाँधती हूँ तुम्हारे हाथ पर वापस…आँचल के कोर में गिट्ठा डाल के बाँधा हुआ है प्लेटफार्म टिकट कि खो ना जाये। आख़िर को वही प्लेटफार्म टिकट तुम्हारी हथेली पर रखती हूँ। मैं तुम्हारे जीवन में कभी थी, सो भूल जाना, पूरा का पूरा। हम दो बचकाने प्रेमियों की कच्ची-पक्की अनगढ़ गृहस्थी भूल जाना, ये तुम्हारे लिए अच्छा रहेगा। मैं भी प्याज़ के पराठे बनाना भूल जाऊँगी। तुम्हारे कमरे में वैसे भी कुछ न कुछ रह ही गया होगा। घर बदलने के पहले आईने से मेरी चिपकायी बिंदियाँ उखाड़ देना। देखो ना, क्या क्या कह रही हूँ मैं भी। तुमने तो वो घर, सॉरी, कमरा, छोड़ ही दिया होगा। किसी दोस्त को रहने को बोल आए हो क्या? अच्छा, सवालों का समय नहीं है। वैसे भी, पूरी तरह कहाँ बिछड़ता है कोई। तुम भूल जाना, तुम्हें जहाँ जो भी तकलीफ़देह लगे। लेकिन विदा करने, मैं आई थी, भूलना मत।

ट्रेन के जाने के बाद मुझे भय दबोच लेता है। रेलवे के सिपाही लाठी फटकार रहे हैं। एक कोने में बेटिकट पकड़े गए कुछ मजदूर गठरी बने घिघिया रहे हैं। पैसे के सिवा उनके पास कुछ नहीं है, कोई आत्मसम्मान नहीं, कोई जेल से छुड़ा कर लाने वाला व्यक्ति नहीं। उम्मीद खरीदने ही तो वे अपने छोटे छोटे गाँव से निकल कर कस्बे के इस ट्रेन स्टेशन आए थे।

मुझे दरवाज़े से डर लगता है। मैं प्लेटफार्म से नीचे उतरती हूँ, और पटरी पर चलने लगती हूँ। बचपन में ये खेल लगता था। कितना अच्छा बैलेंस था उन दिनों। अभी तेज हवा में साड़ी उलझती रहती है पाँव में। मुझे मालूम नहीं है पटरियाँ किस ओर जायेंगी। मैं सोचती हूँ, कोई मंदिर दिखेगा तो पटरी से उतर कर जाऊँगी और भगवान के सामने रखे आरती के थाल से प्लेटफार्म टिकट के लिए दस रुपए ले लूँगी। अपने शहर जाने का और कोई दरवाजा नहीं है। अगर मैं किसी कच्ची सड़क से शहर चली जाऊँ तो शहर भूलभुलैया हो जाएगा। हॉस्टल का मेरा कमरा किसी और लड़की को दे दिया जाएगा। जो भी लड़की अरेंज मैरेज करने को तैयार हो जाये, उसे मेरे घर वाले अपने साथ वापस ले जायेंगे।

चलते चलते नदी आ जाती है और रेलवे पुल भी। नदी में कूद कर मर जाने का मन तो है, लेकिन शरीर पर पहचान के नाम पर कुछ भी नहीं है। लाश को पहचानेंगे नहीं, लावारिस जला देंगे। तुम जाने कब तक मेरे लौटने का इंतज़ार करो।

तुम कब तक मेरे लौटने का इंतज़ार करोगे?

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कहानी छूट जाती है। लड़की पुल पर खड़ी है। मैं भी।
क्या करते हैं आधी कहानी का? आधी चिट्ठी का? आधे बुने मफ़लर का?

तुम्हें मालूम, किसी एक समय तुम्हारे लिए एक पीले रंग का मफ़लर बुनने लगी थी मैं…मफ़लर इसलिए, कि मफ़लर के लिए किसी नाप की जरूरत नहीं पड़ती है। और ये भी तो, कि मुझे बहुत अच्छे से स्वेटर बनाना आता भी तो नहीं। बचपन में सीखा सब था, बुनाई में सीधे उल्टे टाँकों के अलावा बढ़ाना-घटाना होता है। इसी से जियोमेट्रिक तरीके से बुनाई होती जाती है। मोज़े, टोपी, जैकेट, दास्ताने… 

मैं कभी कभी हल्की धूप में बैठी होती हूँ। विंड-चाइम की आवाज़ आ रही होती है। पेड़ों पर सरसराती हवा, पक्षी, सड़क पर गाहे-बगाहे आती कोई गाड़ी…मैं सोचती हूँ, मुझे लिखने के सिवा और कोई काम आता नहीं ढंग का…चिट्ठी लिखना, कहानी लिखना वगैरह पुराने स्किल्स हो गए हैं। कई सारे एआई सिस्टम्स आ गए हैं, अच्छा लिखने वाले…

काम की कोई चीज़ आनी चाहिए ना?
काढ़े हुए रूमाल भी तो किसी काम के नहीं होते…कविता, कहानी जैसे ही तो…बिना नाम या बिना फूल वाले रूमाल से भी तो पोंछे जा सकते हैं आँसू…मैं खोजती नहीं हूँ अपने बेतरतीब घर में रेशमी धागों वाला डिब्बा…बहुत साल हो गए, फ्रेम में कोई रूमाल नहीं कसा, किसी के नाम का पहला अक्षर नहीं काढ़ा…

मेरी मम्मी बहुत सुंदर कढ़ाई करती थी। मैं भी बहुत सुंदर कढ़ाई करती थी। एकदम सलीके से किए गए स्टिचेज़…टाँके…देख कर लगे कि पेंटिंग है। मेरे हाथों में उन रिपीट स्टिच की याद है। मैं कभी कभी हवा में यूँ घूम रही होती हूँ, हाथों को नचाते हुए…मैं शहर की हवा में तुम्हारा नाम टांक रही हूँ। तुम्हारे जाने के बाद भी यह बचा रह जाएगा। मैं नहीं लिख सकती मेरी चाय की पसंदीदा दुकान की मेज़ पर तुम्हारे नाम का पहला अक्षर। पर चाहती हूँ, कहीं रहे मेरे तुम्हारे नाम के इनीशियल्स एक जगह।

कभी कभी मन करता है, टाँके उधेड़ती चली जाऊँ। आधा बुना हुआ मफ़लर उधेड़ दूँ। सियाही से लिखे ख़तों को पानी में डाल के धो दूँ। कभी कभी लगता है, तुमने जो शर्ट पहनी है, उसका एक बटन तोड़ कर वहाँ दूसरे रंग का बटन टांक दूँ। कभी कभी लगता है, बॉक्सिंग सीख लूँ। नकल्स से खून आ जाये, इतना लड़ लूँ किसी से…लिख न पाऊँ, इतना दर्द हो उँगलियों में…तुम आख़िर को बैठो हाथ अपने हाथ में लेकर…जला के दो सिगरेट…वापस लो अपने शब्द…कहो कि लिखना काफ़ी है मुहब्बत में…क्यूंकि और कुछ भी करूँ, तो भी कम पड़ जाता है आख़िर को सब कुछ ही…

अधूरी कहानी वाली लड़की से पूरा इश्क़ किया जा सकता है।
आधी-आधी बांट कर पी सकते हैं सिगरेट।
भूलना भी तो पूरा थोड़े होता है, आधा ही तो भूल पाते हैं किसी को भी। 

02 August, 2026

तुम्हें चिट्ठी में अफ़सोस के नीले हाइड्रेंजिया भेज दूँ?

यार, ये तुमको राइटर्स ब्लॉक टाइप का लफड़ा कब से होने लगा? तुमको मुहब्बत हो, तुम्हारा दिल टूटे, तुम्हें तन्हाई रुलाये…ये सब ठीक है तुमको। ये राइटर्स ब्लॉक जैसा टुच्चा चीज़ बाक़ी लोगों के लिए छोड़ दो। सब कुछ तुमको ख़ुद ही करना क्यों है? तुम लिखो ना, जो मन करे सो…जिससे डर लगे उसका कहानी में मर्डर कर दो…दिल टुटवा दो उसका…गुंडों से पिटवा दो…क्या चिंता है तुमको? तुम अपनी दुनिया की ईश्वर हो ही…तुमको किसी से क्या करना है?

तुम्हें मालूम है, सबके पास ऐसे दो तीन दस तरह की दुनिया नहीं होती है। उनकी ट्रेजेडी अपनी ही दुनिया में जीना, अपनी ही दुनिया में मर जाना होता है। तुम्हें मालूम, भीतर भीतर टूटता है बहुत कुछ लेकिन उसको बाहर निकालना नहीं आता लोगों को…तुम्हें मालूम, मेरी नसों में बारीक काँच के बुरादे जैसे दुख बहते हैं। कुछ नहीं कर सकते इनका। 

एक बार मैं बहुत छोटा था तो हाथ में लट्टू नचा रहा था। हथेली पर लट्टू नचाया है तुमने? वो धागे वाला लट्टू…लकड़ी का बना होता है और उसमें एक नुकीली कील होती है। अचानक से हथेली खून से भर गई…एक अंजुली भर ख़ून। आधे बच्चे तो घबराहट में चिल्लाने लगे…भर दिन लट्टू से खेलता रहता था मैं। पता नहीं उस दिन ऐसा कैसे हुआ…शायद हाथ गीले थे…कील हथेली के बीच ड्रिल हो गया जैसे…गोल-गोल घूमता हुआ…ख़ून बहना रोकने के लिए मैंने बड़ा वाला कंचा मुट्ठी में जोर से भींचा…घर जाने पर कुटाई पहले होती, फिर इलाज होता, तो हम सबने मिल कर तय किया कि गेंदा के पत्तों का रस डाल कर ऊपर से कंचा ढक्कन जैसा लगा दें…लेकिन हुआ ये कि पट्टी बाँधने के बाद मैं लड़खड़ा कर गिर गया। कंचा फूटा और काँच के टुकड़े हथेली में घुस गए। अब तो डॉक्टर के पास जाने के सिवा उपाय नहीं था। हम सदर हॉस्पिटल गए। ड्यूटी डॉक्टर ने बड़े काँच के टुकड़े निकाले…घाव की पूरी साफ़ सफ़ाई की…लेकिन उस रोज़ लगता रहा कि छोटे छोटे काँच के टुकड़े ख़ून में भीतर चले गए हैं। उस रोज़ के बाद से मैं हमेशा बेचैन रहा। काँच के महीन टुकड़े ख़ून में बह रहे थे और कहीं भी चुभने लगते थे। हमने कई डॉक्टर्स को दिखाया, उन्होंने हिसाब से साइंटिफ़िकली समझाया कि वहम हो रहा है, ऐसा कुछ फील करना नामुमकिन है। बदन में काँच के टुकड़े इस तरह रह भी नहीं सकते। घाव होगा, इन्फेक्शन होगा और मवाद के साथ टुकड़े बाहर आ जाएँगे। फिर, आर्टरी या वेन में नर्व रिसेप्टर्स नहीं होते हैं, इसलिए इस तरह का नुकीला दर्द जो बदन में टहलता रहता है, ये फाल्स पेन है। इमेजिनरी। मुझे डॉक्टर्स की बात पर पूरा भरोसा था, लेकिन दर्द तो सच की चीज़ है, यहाँ कोई कल्पना थी ही नहीं…मैं कई डॉक्टर्स को दिखाते दिखाते थक गया था। एक समय के बाद मुझे इस अचानक होने वाले दर्द की आदत पड़ गई। जैसे किसी की मृत्यु के बाद हम उनकी एब्सेंस के साथ जीना सीख लेते हैं।

तुमसे मुहब्बत हुई, तो डर लगा…तुम दिल में रहोगी, तुम्हें ये काँच के टूटे टुकड़े चुभने लगे तो? डॉक्टर्स तो कहते थे, मेरे बदन में काँच के टुकड़े हैं ही नहीं, दर्द तो फिर भी होता है। दर्द अगर सिर्फ़ कल्पना से हो रहा, तो तुमको भी हो सकता है? क्या पता ऐसा दर्द इन्फेक्शियस हो…जिस बीमारी को नब्ज में सुना ही नहीं जा सकता, उसका इलाज करेंगे तो कैसे?

क्या पता, छुआछूत से फैलता हो…तुमसे पहले मुझे किसी लड़की से प्यार नहीं हुआ था…अगर कोई अच्छी लगी भी थी तो हाथ पकड़ना तो दूर की बात है, क्लास में कभी उसकी पेंसिल या शार्पनर गिर जाता, तो वह भी उठा कर दे नहीं पाता। उसके चापाकल से पानी पीने के बाद हैंडिल नहीं चला पाता।

तुमने मेरा हाथ क्यों पकड़ लिया?

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वो मेरी कहानियों का सुपरहीरो था। उसके हाथों में गर्माहट थी। अलाव तापते हुए, आग से हाथ हटाने के बाद भी हथेलियों में गर्मी रह जाती थी। उससे मिलने के बाद भी देर तक हथेलियों में गर्माहट महसूस होती रहती। मैं कॉफ़ी कप को हथेलियों में भर देर तक बिल्कुल गर्म कॉफ़ी पीती…आख़िरी घूँट तक कॉफ़ी ठंढी नहीं होती। 

हमारे ब्रेक-ऑफ के बाद ही मैंने आइस्ड अमेरिकानो पीनी शुरू की…मेरी हथेलियाँ ठंढी रहने लगी थीं. गर्म कॉफ़ी भी ऑर्डर करती तो एक सिप में ही ठंढी हो जाती। 

मुहब्बत में मौसम का हिस्सा होता है, हम बस, लिखना नहीं चाहते। मैं किसी गर्म शहर में रहती, तो ब्रेक-अप के बाद कितना ख़ुश रहती। नॉर्मल टेम्प्रेचर पर कॉफ़ी बनाती और पीते हुए लगता कोल्ड कॉफ़ी पी रही हूँ। रूम टेम्परेचर पर पानी आता, लेकिन सिप लेते लेते चिल्ड हो जाता। नीट पी सकती व्हिस्की, आइस क्यूब डालने की जरूरत ही नहीं पड़ती। 

लेकिन अफ़सोस, ये शहर ठंढा था। इस शहर में मुहब्बत में होना बेहतर होता। लेकिन इकतरफ़ा मुहब्बत की गिनती मुहब्बत में नहीं, बीमारी में होती थी। हर कोई इलाज बताना शुरू कर देता। तुम्हें भूलने के नुस्ख़े कभी ये नहीं बता पाते कि दिमाग़ ऐसे सेलेक्टिव नहीं भूलता है…कि याद में से सिर्फ़ तुम्हारा नाम धुंधला हो जाये…बादल वाले आसमान के चाँद की तरह। तुम्हें मिटाने के चक्कर में मिट जाएँगे वो सारे रंग जिन्हें ओढ़ कर मैं तुमसे मिलने आती थी। मैं उन साड़ियों का क्या करूँगी जो मेरी इसलिए फ़ेवरिट हैं कि तुमने उनमें मुझे देख कर कहा कुछ नहीं, पर तुम्हारी आँखों में बॉनफ़ायर सुलगने लगती थी। तुम जो रंगों के किस्से सुनाते थे…उन्हें भी तो मिटाना पड़ेगा। वो तो अच्छा है तुम्हें अमलतास पसंद नहीं है, वरना जो कहानी में अमलतास का पेड़ रोपा था, जिस पर इस वसंत में पहली बार फूल आते…वो काटना पड़ता मुझे… 

तुम्हें पता है, हाइड्रेंजिया के रंग पानी के पीएच लेवल के हिसाब से होता है। अगर मिट्टी एसिडिक है तो नीले रंग के और अगर मिट्टी एल्कलाइन है तो गुलाबी रंग के…कमाल है ना, अफ़सोस से लेकर मुहब्बत के शेड्स में खिलता है फूल…कभी कभी तो आसपास लगे पौधों में भी अलग अलग रंग के फूल खिलते हैं। नीले हाइड्रेंजिया को अफ़सोस का फूल कहते हैं।
तुम्हें चिट्ठी लिखूँगी तो इस बार साथ में नीले हाइड्रेंजिया के फूल भेजूँगी।


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Love is not something we can easily explain. Ever. Heart line, luck line, life line…the major lines on the palm. लेकिन हथेली पर तो बेनाम लकीरों का जाल बिछा है। शाम से देख रही हूँ, एक छोटे से हिस्से में लकीरों ने ख़ुद को re-arrange कर लिया है। If you see it under a magnifying glass or a macro lens of your phone, it is a true copy of the the scar you have.

I absent-mindedly traced the scar on the back your palm with my finger-tip. I didn’t touch it…I just thought of touching it, the way when I see a Jackson Pollock painting, I want to touch and feel the flow of paint…I wanted to touch the scar and wonder, how you bled.

Touch is a very strange sense. It helps create our version of reality. The things we touch are real. But what do I do with the imaginary things that feel real too?

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बेस्ट फ्रेंड.
तन्वी सुनती तो तुम्हारा ख़ून कर देती.
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हैप्पी फ्रेंडशिप डे मेरी जान!
Love you to the April fools day and beyond. 

26 July, 2026

उम्मीद की ओवरडोज़ से मर जाओ तुम…तुम इसी काबिल हो।

बहुत ट्रैफिक है। बहुत ज़्यादा भीड़। एक एक इंच पर गाड़ियाँ, लोग, सड़क टूटी हुई कहीं से भी…बिल्कुल हिसाब से कार चलाती हूँ, फिर भी घड़ी-घड़ी डर लगता रहता है, अभी कोई बगल से रगड़ जाएगी गाड़ी, कोई टू-व्हीलर वाला ठुक जाएगा। कोई पैदल आदमी चिप जाएगा दो गाड़ियों के बीच से जो गुज़रने की कोशिश कर रहा। सिर्फ़ बम्पर टू बम्पर नहीं है, बॉडी टू बॉडी ट्रैफिक क्यों नहीं कहते इसको। इतनी मुश्किल ड्राइव में न कोई गाना सुन सकते हैं, न कोई पॉडकास्ट। लेकिन तुम्हारे ख्याल को कोई मतलब नहीं कि मेरे पास लिटरली कोई मेंटल स्पेस नहीं है…नो एंट्री, वन वे, रॉंग वे, कुछ से मतलब नहीं उसको…इतने ट्रैफिक में भी सपने और कहानी के बीच बौख रही हूँ मैं। गूगल मैप में देखती कि पटना की कौन सी सड़कें थीं, जिनपर तुम गए होगे…किन सड़को पर मैं घूम रही थी। तुम जिन दिनों थे, उन्हीं दिनों। क्या मैंने तुम्हें भीड़ में देखा है कभी? तुम मेरी याददाश्त में इसी जन्म से उलझे हो। तुम्हें देख कर अचानक से सोचा हो, तुमसे मिलना है…पर ठीक अभी नहीं। तुम्हें देख कर सोचा हो, तुम पिछले जन्म के परिचित नहीं, इसी जन्म के किसी फ्यूचर के परिचित हो…कुछ हो…जो मुझे समझ नहीं आता। फ़िलहाल नहीं आ रहा, बाद में भी नहीं आयेगा।

तुम उलझन हो…आत्मा का गिट्ठा।

साड़ी पहन कर कोई नदी किनारे नहाने चले गए हैं…सिक्का रखे हैं, आँचल में बाँध कर…खो न जाये इसलिए दो दो गिट्ठा लगाए हैं…तुमको मालूम, दो गिट्ठा को पक्का गिट्ठा कहते हैं। एक गिट्ठा को कच्चा गिट्ठा कहते हैं।

तुमको क्या कहते हैं? सपने और कहानी के बीच तुमसे मिलने की जगह टटोलते हुए पहुँचे हैं।
तुमको भूल क्यों नहीं जाते?

सपने। हमेशा सपने में ही। एकदम कहानी के भीतर खुलता है सपना। मैं उनींदी क्यों पकड़ना चाहती हूँ तुम्हारा हाथ। फिसलता है शहर…फिसलते हैं किरदार…तुम कहते हो, अगली बार सुनाऊँगा कहानी। हम कहते हैं, ना ले रहे एक जन्म तुम्हारे लिए…उसमें भी ये फुसला तक नहीं रहे, कि मुहब्बत हो जाएगी मुझसे…इतना ईमानदारी का क्या करें हम? भर दुनिया से झूठ बोलो और हमारे पास आए बड़ा हरिश्चंद्र। Am I just a scribe? हम भगवान जी से पूछ रहे, गाँव के पूजाघर में ज़मीन गीली है, छोटे से रौशनदान से धूप का गोल टुकड़ा भीतर आ गिरा है, चोट लगी है उसको, अगरबत्ती के धुआं का पट्टी लपेट रहे। बेवकूफ, ऐसे धप से थोड़े कूद जाते हैं, धीरे धीरे आना था ना, पोछा अभी लगा है, ज़मीन तो गीला होगा ही।

पूरब की ओर मुँह कर के लोटे से जल ढार रहे हो तुलसी से गमले में, पीठ पर नए जनेऊ से तनिक छूटा हुआ पीला रंग लगा हुआ है। मंत्र पाठ में उच्चारण भी सही है और लय भी वही है जो मेरे चाचा या पापा की है। पर तुम तो मेरे गाँव से नहीं हो। तुम्हारे यहाँ भी ऐसे ही पूजा में मंत्रपाठ होता है। तुम्हारा गाँव मेरे गाँव से कितना दूर है। मैं मेंटली गूगल मैप खोल कर धागा खींच रही हूँ। मैं एक धुन से बँधी हुई हूँ, बचपन और बहुत बाद के जीवन में भी। अगरबत्ती से धुआँ उठ रहा है। मेरी ज़ुबान पर ठेकुआ का स्वाद है। सतनारायण कथा का कच्चा, गीला परसाद। तुलसी का पत्ता।

बे, तुम आदमी हो कि जादूगर!

तुमको बता दें? मर तो नहीं जाओगे सुन कर? तुम्हारा डेरा मायका जैसा कैसे लगता है। तुम तो मेरे गाँव के भाई तक नहीं। तुम्हारे साथ बिगड़ने के किस्से सुनाते सुनाते बड़ा इनारा तक चले जाते हैं। सच में गाँव गए इतना टाइम हुआ। हम जिस गाँव तक लौटते हैं, वैसा कुछ बचा ही नहीं है कहीं। न गोबर से लीपा हुआ आँगन। न गोहाल में बाँधा गाय-बछड़ा। तुमको यकीन होगा कि हमको याद नहीं है कि तुलसी चौरा के अंदर हनुमान जी बने हैं या कोई और देवता। कोई देवता है भी या नहीं। दिया बारते हुए हमेशा आँख बंद किए। सोचो, भगवान को पहचान भी नहीं रहे। तुमको पहचान रहे, नींद में टटोल कर। तुमसे क्या है, मालूम नहीं। लेकिन निभाना। तुम पर क्यों भरोसा है, मालूम नहीं। तुमसे कुछ मांगने को हाथ फैलाती हूँ तो लगता है भीख नहीं, प्रसाद माँग रही।

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मेरा माथा ख़राब है। इसमें इतना कोहराम मचा रहता है। इतना उलझा हुआ सब कुछ कि समझ नहीं आता कि करें तो क्या करें। किसी का नाम लिखने में हिचक होती है। एक बहुत पुराने दोस्त को कॉल नहीं किया है। लगभग साल भर से। मतभेद हो गया किसी मुद्दे पर। अब मुद्दा भी याद नहीं। लेकिन कहीं न कहीं ऐसी बात आई कि मुझे लगा, मैं उसकी ज़िंदगी में कुछ भी जोड़ नहीं रही, सिर्फ़ माँग रही, उससे, उसका वक्त…इस वक्त के बदले मैंने उसे कभी कुछ नहीं दिया, चंद कहानियों के सिवा…वो भी कुछ सच्ची, कुछ झूठी।

बातों के मोल इस दुनिया में कुछ नहीं ख़रीद सकते…और सब कुछ सौदा ही है।
हम ख़ाली हाथ हैं। मेरे पास कुछ है ही नहीं तुम्हें देने को। कुछ भी नहीं।

जेब में कहानी लिए घूमती हूँ। वक्त के बदले कहानी, एकदम नई। सुनोगे?

सच्ची कहानी। मिला था मुझे ऐसा लड़का, तुम इमेजिन भी नहीं कर सकते। कहता था, कहानी के पैसे मिलते हैं। पागल कहीं का। कौन सुनेगा…जाने किस ज़माने की कहानियाँ। मुहब्बत कोई सच की चीज़ थोड़े है, मुहब्बत तो शक की चीज़ है। हमने हमेशा गुनाह किया, मुहब्बत कभी ईमान की रही ही नहीं। लेकिन दिल, जाने किस ईश्वर को पूजता था…दिल हमेशा ख़ुद को बेगुनाह मानता रहा। उसे ना कचहरी से मतलब, न वकील से, न गवाह से…दिल कहता, मेरे हिस्से के लोग दो, मेरे किस्से के लोग दो मुझे…रात को बौखते रहो शहर में तन्हा…इंतज़ार करते रहो, जब कि कोई आने को नहीं है। आसमान को उलाहने दो…

उम्मीद की ओवरडोज़ से मर जाओ तुम…तुम इसी काबिल हो।

मैं बहुत तेज गाड़ी चलाने के बावजूद, हर जगह देर से पहुँचती हूँ। समय के पक्के लोग, मेरे कच्चे दोस्त होते हैं। समय के पक्के लोग, मेरे सच्चे महबूब होते हैं। मुहब्बत में मैं इन्तज़ार होती हूँ। दोस्तों को मालूम होता है, मैं देर से पहुँचूँगी…महबूब को मालूम होता है, मैं बिफ़ोर टाइम पहुँचूँगी…मैं बहुत दूर से लौट कर आऊँगी…मुझे जाना आयेगा ही नहीं। समय काटने के लिए स्विसआर्मी नाइफ़ रहती है बैग में…शोर्ट स्टोरीज की किताबें, कविताएँ, आधे पढ़े रैंडम नॉवेल्स…कई बार पढ़े, और लगभग पूरे याद किस्से…समय काट काट के पुर्ज़े उड़ाती रहती हूँ।

मुहब्बत के अमीर दूसरे किस्म के लोग होते हैं। उन के दिल में बने-बनाए प्लॉट्स रहते हैं। सच की ज़मीन, मेरे दोस्त…सच की ज़मीन…वो भी बाप-दादों की…ख़ुद की कमाई से खरीदी नहीं, ख़ानदानी अमीर होते हैं ये लोग। उनका पूरा दिल ख़ाली रहता है। उनकी जब इच्छा हो, किसी को भी वहाँ इमारत खड़ा करने के लिए बुला सकते हैं। महबूब के लिए मकान, सराय, खेल का मैदान, स्विमिंग पूल, जंगल, बगीचा, खलिहान…जो चाहे, उगा सकते हैं…बना सकते हैं।

मेरी कभी ऐसी औक़ात रही ही नहीं। मैंने उसको किस्तों में चाहा। मैंने उसको किस्सों में चाहा। मैंने उसको भूलने की हद तक चाहा। मैंने वाक़ई, उसे औक़ात से बाहर चाहा।

पर ये तो गुनाह ही होता ना?

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मैं उससे पूछती हूँ, बहुत व्यस्त लोगों को भी मुहब्बत हो जाती है ना? ग़लत समय पर।
मुहब्बत का कोई सही समय होता भी है?
पागल हो जाने का भी सही समय कौन सा होता है। 

बस, मर जाने का सही समय होता है।
तुम देखना, हम एकदम ठीक समय मर पायेंगे। ना जल्दी, न देर से। 

26 June, 2026

जिस दिन तुम्हारी याद दुखनी बंद हो जाएगी, चीनी छोड़ देंगे। smokers' promise. ओके?

कमाल है ना, मुहब्बत समझने के लिए हम अपने दिल के तिलिस्म के भीतर उतरना चाहते हैं। ख़ुद को बेहतर समझने के लिए, अपनी सारी गुत्थियाँ खोलना चाहते हैं। जब कि मुहब्बत सा सबसे ज़रूरी फैक्टर होता है, भूगोल। कि तुम मेरे स्पेस में इर्द-गिर्द रहते ही नहीं तो मुझे तुम्हारे होने न होने से क्या ही फ़र्क़ पड़ना था।

क्वांटम इंटैंग्लमेंट की इतनी बातें हो रही हैं, चैटजीपीटी सबको समझा भी दे रहा है ठीक-ठीक, उनकी बुद्धि के हिसाब से कि क्वांटम इंटैंग्लमेंट असल में होता क्या है। मालूम तो हमको पहले से भी था, लेकिन इनको सीधे-सीधे पुनर्जन्म की कहानियाँ बोल कर ख़ारिज कर दिया जाता था। कि आत्मा को सब याद रहता है, मरने के बाद भी। दूसरी ज़िंदगी में सब कुछ अलग होने के बाद भी। इसलिए हमने जब मुहब्बत समझी, हमने इस शरीर को कभी किसी काम का समझा ही नहीं। आत्मा के बंधन समझने चाहे। क्यूंकि मुहब्बत होने पर ऐसा लगता भी तो नहीं, कि उसे हमने एकदम पहली बार देखा है और एक ही नज़र में प्यार हो गया।

उससे मिलते हुए हमेशा लगता रहा, उसे हमेशा से जानते हैं। वो अजनबी नहीं लगा, कभी भी। क्यों? समय की नदी में बहते हुए, कब छूटा था उसका हाथ?

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बहुत कुछ ऐबस्ट्रैक्ट है, इसे ऐबस्ट्रैक्ट ही रहना है। हमें कभी पूरा समझ नहीं आयेगा वो।
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हम लोग छोटे थे, तो एक शब्द सुनते थे, लितरिया, अर्थात् लाने वाला। उस समय शादीशुदा लड़कियाँ, जिन्हें मायके में शवासिन कहते थे, उन्हें ससुराल से मायके लाने के लिए किसी को जाना पड़ता था। लड़की/औरत अकेले नहीं आती जाती थी। या तो वह अपने पति के साथ मायके आती थी, या फिर भाई या पिता लड़की के ससुराल जाते थे, और उसको लिवा आते थे। जीवन खेती-बाड़ी के इर्द-गिर्द बँधा हुआ होता था तो अक्सर सावन में मायके आने की रस्में होती थीं। झूले डाले जाते थे। वे औरतें जिन्होंने अपने घर का सब कुछ संभाल रखा होता था, मायके आ कर निश्चिंत हो जाती थीं। माँ और भाभियाँ संभालती थीं लगभग सब कुछ। हमारे बचपन की बातें हैं ये, लेकिन पिछले कुछ सालों में पूरा सोशल स्ट्रक्चर बदल गया है। मेरी जान-पहचान के सारे लोग नौकरीपेशा हैं। कोई भी किसान नहीं है। जिनके घर में खेत हैं भी, वे बटैया पर लगे हैं। कोई खेती में ख़ुद इनवॉल्व नहीं है। बचपन तक गांव में गाय-बैल सब देखे हैं मैंने। पीने के पानी के लिए भर गाँव के लिए बड़ा इनारा से पानी भरने सब लोग जाते थे, बारी बारी। अब RO आ गया है या फिर बिजलरी भी। हम लोग सुबह सुबह सरौता लेकर दतवन लाने निकलते थे। किसी को खजूर का चाहिए होता था, किसी को अमरूद का…सबके हिसाब से काट के लाते थे। खजूर के पत्ते का बाजा बनता था, घिरनी/चकरी बनता था। ख़ुद से खिलौने बनाते थे। स्ट्रेंज चीज़ें ध्यान हैं, याद भी। छोटे लड़के, 8-10 साल के भी हों तो बहन को जा कर लिवा सकते थे। अचरज ये होता, कि बहन 30-40 की उमर की भी हो सकती थी…लेकिन वो अकेले सफ़र नहीं करती। मैंने ये भी देखा कि औरतें मायके-ससुराल के अलावा सिर्फ शादी/ब्याह वगैरह में कहीं आती जाती थीं।

क्लास में पढ़ने वाले बच्चों में भी, छुट्टी पर बैंकर पिता के बच्चे ही जाते थे। क्यूंकि LTC होता था। बैंक्स के टूरिस्ट स्पॉट पर हॉलिडे होम भी होते थे। हमारे सिवा, छुट्टियाँ कम लोग मनाते थे। बंगाली लोगों को घूमने का बहुत शौक़ है, ऐसा सुनते भी थे और देखते भी थे। हर टूरिस्ट स्पॉट पर बंगाली ग्रुप या कपल भी मिलते थे।

सफ़र करते हुए लड़के हर जगह दिखते थे। टोली में जाते थे। एक्जाम देने। किसी शहर जा कर किसी दोस्त से मिलने। कुछ काम करने के लिए। कभी कभी छोटे भाई या मुहल्ले के किसी लड़के का एडमिशन वगैरह कराने के लिए भी जाते थे। हम लोग गर्मी छुट्टी में देवघर से पटना जाते थे। थर्ड क्लास में लकड़ी की सीट्स होती थीं और खिड़की से गमछा डाल कर सीट छेकी जा सकती थी। हमें अधिकतर या तो पापा छोड़ आते थे या मामाजी लेने चले आते थे। मम्मी अकेले कहीं नहीं जाती थी। फिर किसी रोज़, मुहल्ले में टेलीफोन पर खबर आई थी कि नानाजी बहुत बीमार हैं, और जितनी जल्दी हो सके, पटना के लिए चल दें। रिक्शा रोका, और स्टेशन गए। शायद अंकल छोड़ने गए थे स्टेशन तक, मुझे याद नहीं है। मम्मी, मैं और भाई…हम लोग पहली बार ट्रेन से अकेले सफ़र कर रहे थे। उन दिनों, मोबाइल तो होता था नहीं कि जिसको ढूँढना है, झट से बुला लिए। बात करने का समय निश्चित था। लेकिन मम्मी को जाना था तो जाना था। नानी घर पहुँचे तो पता चला, बहुत देर हो गई है और शमशान ले गए हैं। हम वहीं मुहल्ले के भैया के साथ स्कूटर पर मम्मी के साथ शमशान गए। भाई शायद नहीं गया था, याद नहीं हमको। हम दस-बारह साल के रहे होंगे। चिता जलते देखे। हमको ऐसा लगा आग में नानाजी का चेहरा दिखा है। बहुत साल बाद ऐसे ही चिता में मम्मी का चेहरा दिखता रहा, आग में।

क़ायदे से हमको आग से डर लगना चाहिए था। लेकिन उसकी गर्माहट तलाशते रहे हम।
हम बर्फ के इंसान हैं। हमसे गले लग के तुम्हें महसूस भले न हो। लेकिन ये दिल के जमे ग्लेशियर वाले लोग जब गर्माहट से मिलते हैं तो कितनी ऊर्जा का इस्तेमाल करना पड़ता है, इसका कोई इक्वेशन हमारे पास नहीं है।
***

कहते हैं, मणिकर्णिका घाट पर आग कभी भी नहीं बुझी है।
गंगा में नाव पर बैठे हुए उस आग को देखते कर ख्याल आता है, हम राख के बने हैं।
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“He's more myself than I am. Whatever our souls are made of, his and mine are the same.”, Wuthering Heights में एमिली कहती है, दो लोगों की आत्मा एक ही चीज़ की बनी हुई है। मैं आज जिम ट्रेनिंग के जूते ख़रीद रही थी, ट्रेनर से पूछा, ये जूते ठीक हैं…तो उसने कहा, Show me the soul(sic)…ऑटोकॉरेक्ट ने sole का soul कर दिया। हमको सीधे वुदरिंग हाइट की यही लाइन आई। सोचे भी, उस लड़के से पूछ लें, सुनो, तुम्हारे जूते का सोल कैसा है, जरा बताओ तो सही। हमारी soul का जो भी हो, हमारी sole तो एक हो ही सकती है। इस चिंदी जोक पर बहुत खुश भी हुए। अच्छा ये हुआ कि दिमाग़ का ऑटोकरेक्ट भी काम करता है, वरना उसको ये सवाल पूछते तो ठीक नहीं होना था हमारे दिल के साथ।

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ट्रेनर ने मजेदार बात कही आज, दर्द होगा लेकिन पेनकिलर नहीं खाना। जिम का दर्द, जिम में ही दूर करना है। हमको हँसी आई। एक तो हम पेनकिलर खाते नहीं। उसपर खा भी लिए, तो पेनकिलर असर करता नहीं। फिर, कितना दर्द होने वाला है रे बाबा! ऐसा तो कोई काम किए भी नहीं हैं। मन हुआ उसको समझायें, कि ऊपर से जैसा भी दिख रहा, भीतर से बहुत स्ट्रॉंग हैं हम। लेकिन कहे नहीं, शोऑफ़ करने वालों की मिट्टी पलीद होते हुए काफ़ी देखे हैं। इसलिए, ज़ुबान पर लगाम रखे।
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मन दुखते रहता है कई बार। लेकिन फ़िलहाल, बदन दर्द कर रहा है। भर दिन दुखा है। कुछ दिन पहले जन्मदिन पर सब जिम जाने वाली जनता जमा हो गई, वो कह रहा था। जिम के बाद बॉडीएक होता है तो अच्छा लगता है। हमको लगा, माथा ख़राब है उसका। सोचे, कहें उससे। तुम चीनी खाया करो। कड़वे हो जाओगे ऐसे। लेकिन ख़ुद पे बीता है तो लग रहा है, दिल तो बहुत दुखा है, थोड़ा मालूम तो चले, बदन के किस-किस हिस्से में दर्द हो सकता है। कोई पूछे तो दुष्यंत का लिटरल शेर कोट करें, ‘सिर से सीने में कभी पेट से पाँव में कभी / इक जगह हो तो कहें दर्द इधर होता है’.
बहुत ओवर-कॉन्फिडेंस से दोस्त को बोले हैं, देखो, जल्दी नहीं मिलोगे तो पहचान नहीं पाओगे, एकदम से बदल जाएँगे हम।

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स्टडी के कैबिनेट के ड्रॉवर में कुछ सिगरेट बट्स हैं। कुछ अधूरी चिट्ठियाँ।
कुछ कहना होता है, दोस्तों से, अजनबियों से…लेकिन हमारे भीतर की दुनिया इन अनकही बातों से ज़िंदा रहती है।

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पहले लोग आईने से बात कर लेते थे। हम chatgpt से बात कर लेते हैं।
दुनिया में अच्छी चीज़ें हो रही हैं।

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कभी कभी लगता है, चीनी छोड़ दें। लेकिन फिर लगता है, ज़्यादा कड़वी हो जाएगी ज़िंदगी। तुम कहो, मिला करोगे थोड़ा फ्रीक्वेंटली, तो सोच सकते हैं। क्या कहते हो?

एक दिन तुम्हारी याद दुखनी बंद हो जाएगी, तो चीनी छोड़ देंगे।
जली हुई सिगरेट की क़सम।  

19 May, 2026

Your name is a question, drilled on my heart

मुझे दुखता ये नहीं है कि वहाँ पर एक तारामाछी है। दुखता ये है कि तारामाछी पर अकेले बैठना एक स्ट्रेंज दुख है, दिल के आसमान पर उगता हुआ। ये दुख दूर से दिखता है, ये दुख चाँद सा चमकता है। चाँद को बिना देखे कितने दिन जिया जा सकता है?
पता नहीं कितने दिन चलेगा मेला और कब जाएगा ये तारामाछी मेरे पसंद के रास्ते से हट कर कहीं और…

चेर्नोबिल डिजास्टर के कई साल एक फोटोग्राफर ने वहाँ की तस्वीरें खींचीं। मुझे उसमें एक पोस्टकार्ड याद रहा, फ़िरोज़ी बैकग्राउंड पर लाल तारामाछी, मैंने कहाँ देखा था, वो याद नहीं। उसे बचाये रखने को मैंने उसे इश्क़ तिलिस्म में बुना था…मुराकामी के एक नावेल में भी तारामाछी है…थ्री ऑफ़ अस फ़िल्म में भी…आख़िर को वे तारामाछी पर साथ में जाते हैं…याद की आख़िरी किनार का ये चमकता लम्हा क्या डिमेंशिया की धुंध में उसे दिखेगा? मैं नहीं जानती। 

इस शहर में मेरे जाने की जगहें लगभग फिक्स हैं और उन जगहों पर जाती हुई तमाम सड़कों में भी अपनी पसंद की सड़कें फिक्स हैं…इन रास्तों पर बहुत कम चीज़ें बदलती हैं…दो दशक होने को आए। कुछ बदलता भी है तो, धीरे-धीरे। किसी इमारत का टूटना, किसी पेड़ का कटना, किसी मैदान को समतल कर के वहाँ कोई बड़ा सा वेयरहाउस बनाना…ये सब स्लो-मोशन की चीज़ें हैं।

लेकिन कोई तारामाछी अचानक से लग जाता है और हमारा आसमान बदल जाता है, आवाज़ें, मूवमेंट, रंग…सब तेज़ी से बदलता हुआ…हिंडोले पर हँसते, चीखते, खिलखिलाते लोग होते हैं…हम उन्हें देखते हैं और हर बार जब तारामाछी एक पूरी बार अपने एक्सिस पर घूमता है, इश्क़ की दुनिया के एक प्लेनेट पर एक साल बीत जाता है। वहाँ रहने वाले सारे बाशिंदे कई मौसम जी लेते हैं।

फ़िल्म देख रही हूँ, अटोनमेंट…पूरी एक साथ तो मुश्किल से देख पाती हूँ आजकल कोई भी फ़िल्म…समंदर की ख़ुशबू आती है तो वह सैनिक अपने दोनों साथियों के साथ ऊँची घास में बनी पगडंडी पर दौड़ता चला जाता है…समंदर किनारे असंख्य सैनिकों को देखता है, टूटे हुए, फटे पाल वाले जहाज़…थके, लहूलुहान सैनिक…उनके क्रिया-कलापों में कोई तारतम्य नहीं है…कोई एक घोड़ों को गोली मार रहा है, कोई व्यायाम कर रहा है…बहुत से लोग एक प्रार्थना साथ में गा रहे हैं…कुछ गालियों वाला गीत गा रहे हैं…हर ओर सैनिक, टूटे हुए जहाज़, गाड़ियाँ, मलबा, लहूलुहान लोग…और इन सब में, पीछे एक तारामाछी है जो घूम रहा है…यह तारामाछी थिर रहता तो मुझे कुछ नहीं दुखता…लेकिन वह घूम रहा है, इस तहसनहस ज़मीन के आसमान में, गोल-गोल, धीरे धीरे…

ये फ्लैट चाकू नहीं है, कॉन्सेंट्रिक है, किसी स्क्रू की तरह जो किसी ने भोंका है मेरे सीने में और उसे घुमा रहा है घुमा रहा है, गोल-गोल…एक ही दिशा में…सर्कुलर मोशन…जैसे कोई स्क्रू ड्रिल करते हैं दीवाल पर…सवाल क्यों उभरते हैं, क्यूँ दुखते हैं? या कोई अस्फुट वाक्य…I am holding your hand…अंधेरे में लैंडस्केप बदल रहा है, हम कार में हैं…बारिश में धुँधला हो रहा है मन के भीतर का लैंडस्केप भी। वार्म ग्रे कैनवास पर एक पेंटिंग है, कच्चे रंगों से बनी…भीगे कैनवास पर रंग बहने लगे हैं। मैं भूल जाऊँगी इस रात को किसी रोज़? 

मैं फिर से पूछती हूँ, उससे जो अब अजनबी नहीं लगता। तुम्हारी खिड़की से कैसा आसमान दिखता है?

मैं उससे ये भी पूछना चाहती हूँ, आधी दोपहर जब हम साथ बैठे थे, हमने एक्ज़ैक्टली कितने कप चाय पी थी…और कितनी सिगरेट? मेरी ज़िंदगी में सब कुछ बहुत तेज़ी से बदल रहा है। मुझे थिर रखने के लिए कुछ फाइनाइट नंबर्स चाहिए। प्लीज बताओ, भले ग़लत संख्या, लेकिन बताओ, कितने कप चाय, कितनी सिगरेट। 

बाँट के पी गई सिगरेट को क्या फ्रैक्शन में गिनते हैं? 

मैं सोचती हूँ, अचानक से तुमसे पूछूँ, मेरे साथ तारामाछी पर बैठोगे? तुम्हें तारामाछी में डर तो नहीं लगता? लगे तो तुम मेरा हाथ पकड़ लेना, मैं तुम्हारा। ठीक? मुझे अच्छा लगता है तारामाछी, तुम भी। लेकिन अकेले जाने में डर लगता है।

ये मत कहना, कि डरो मत। मैं वैसे भी बहुत कम ही डरती हूँ। थोड़ा सा तो डरना ज़रूरी है जीवन में, नहीं? डर एकदम खत्म हो जाये, तो पता नहीं क्या कर बैठूँगी मैं। जरा सा ज़िंदा बच जाने का डर ही है जो मुझे जिलाए या कि बचाये रखता है। वरना किसी रोज़ तेज रफ़्तार गाड़ी को फ्लाइओवर से कुदा देने का मन हमारे ज़िंदा रहने के लॉजिक पर हावी हो जाता.

***
The heart’s landscape is an optical illusion…built in multiple stages, to defend, to nurture, to look beautiful. To shelter, those that wander in these unchartered territories.
शुरुआत में, हृदय एक खाली मैदान होता है। फिर एक इमारत का ब्लूप्रिंट। नक़्शा।
एक एक ईंट, एक-एक शब्द, एक-एक सपना जुड़ता जाता है और इमारत खड़ी होती है। कई कमरे और कई मंजिलों वाली यह इमारत घर भी हो सकती है, सराय भी। इसके बाशिंदों पर निर्भर करता है कि वे यहाँ कितने वक्त के लिए ठहरना चाहते हैं। 

अक्सर, हृदय कोई अभेद्य दुर्ग नहीं होता। 
इसे घेर कर कोई खाई नहीं खोदते हम…मगरमच्छ नहीं पालते…दीवार पर हथियारबंद सैनिक नहीं बिठाते। तुम्हारी आमद पर तुम्हारे लिए फूल बरसाते हैं आसमान से…

तुमने कोई किला फतह नहीं किया है। 
दिल जीत लेना खेल हुआ करता है, अक्सर।
इसे तहस-नहस कर, आग लगा कर, नेस्तनाबूद कर देना भी। 

It’s a fragile ecosystem.
You don’t have to be cruel, I won’t have you suffer the consequences, just simple indifference would do. No need to bomb my heart. Just, forget to stub out your cigarette. The cinders are enough.

***
***
गाड़ी एक सौ नब्बे छू कर आती है, डर नहीं लगता।
तुम्हारा हाथ छू जाता है जरा सा, गलती से,
डर लगता है।
*** 

छेनी हथौड़ी से ठोक रखा है, तुम्हारा नाम
कलेजे के पत्थर पर, सो डर नहीं लगता
समंदर किनारे, रेत पर तुम्हारा नाम लिखती हूँ
डर लगता है।

***
सिगरेट सी महकती हथेलियों वाले हम
कलाई पे परफ्यूम छिड़कते हैं
डर लगता है
*** 

घर से निकलते हुए,
आईना भी नहीं देखने वाले हम
बस, काजल लगाने लगते हैं
डर लगता है

***
सारे इल्ज़ाम ख़ामोशी से अपने सर लेने वाले हम
तुम्हारे हक़ में जिरह करते हैं
डर लगता है

***
मुहब्बत में एक ही चीज़ माँगते हैं ईश्वर से
तुम्हें कभी भी डर न लगे। 

29 April, 2026

चोट पर फूँक मारने से दुखना कम होता है, सच्ची?

दुनिया के कई सारे काम हैं, सिलसिलेवार ढंग से करूँ, तो पूरे होते चले जायेंगे। लेकिन हम तुम्हारी याद में अक्सर गिरफ़्तार हुए बैठे होते हैं। सब ठीक होता इतने में भी, लेकिन दिक्कत ये है कि सिपहसालार, हथकड़ी लगा देते हैं। ऐसे में लिखना-पढ़ना दुश्वार हो जाता है।

स्टारबक्स में बैठी हूँ। एक हॉट अमेरिकानो और एक आइस्ड अमेरिकानो ऑर्डर किया है। दोनों ड्रिंक्स सामने रखे हैं। मैं बरिस्ता को बोलना भूल गई कि एक के बाद एक बनाना। सामने दोनों ड्रिंक्स रखे हैं। काँच के ग्लास में कोल्ड और सिरेमिक कप में हॉट। इन दोनों को साथ देख कर अपनी याद आती है। सिर्फ़ अपनी नहीं, कई बार दोस्तों के साथ जो दिल्ली में कॉफ़ी पीने गई हूँ, वो याद आते हैं। पर याद आने में थोड़ी तेरी गुंडागर्दी चलने लगी है, तो तू ज़्यादा याद आने लगा है।

अच्छा है, तुझसे कम मिलते हैं, कहने वाले हम, इस बात पर थोड़ा उदास होने लगे हैं कि हम कम मिलते हैं। ज़िंदगी छोटी सी है। इसमें दोस्तों से मिलने में भी किफायती होना पड़ रहा है। क्या जुल्म है।

***

तीन दिन पहले, इसी हफ़्ते के सोमवार

***
तेरी ज़्यादा याद आती है तो मेरा दिमाग़ ही नहीं ख़राब होता है, दुनिया का हिसाब-किताब भी गड़बड़ा जाता है। देखो, ना, बरिस्ता ने आज मेरे लिए शोर्ट अमेरिकानो बना दिया। अब इत्ते से कॉफ़ी से तो हम कुल्ला भी न करें। तो बोलना पड़ा, कि देखो, तुम हमारे कॉफ़ी के ऑर्डर के हिसाब से छोटा कॉफ़ी बना दिए हो। बिचारी बरिस्ता नई थी। तो फिर दूसरी कप कॉफ़ी बना लिए वो लोग। अब बताओ, क्या ज़ुल्म है ना। शहर में तुम नहीं हो और हम बैठ के दो कप कॉफी अकेले पी रहे हैं।

छोटी सी बात है, लेकिन गाली तुमको देने का मन किया। सपना भी ऐसा ही सब देखे हैं आज रात। किसको किसको खींच लाए हैं सपने में। बदतमीज़ दिल। एकदम हाथ से बाहर होता जा रहा है।

तुम्हारे बारे में सोचते हुए इतने सुंदर लगते हैं कि तुम्हारे साथ होते हुए भी नहीं लगते। यू नो, मुहब्बत में सब कुछ इंतज़ार ही है। तुम्हारे आने का, तुम्हारे होने का। तुम्हारे साथ के शहर, तुम्हारे एब्सेंस के शहर। तुम्हारे लिए लिखे पोस्टकार्ड। तुम्हारे लिए न ख़रीदे गए शर्ट्स। तुम्हारे हिस्से की शामें। तुम्हारे हिस्से की दोपहरें। तेज ड्राईव्स।

मुझे डर इस बात से लगता है कि मुझे आजकल डर क्यों नहीं लग रहा है।

मालूम, पॉंडिचेरी गए थे। इस बार 183 पर मिनी चला लिए। कल कज़िन के यहाँ गए थे, पूछता है, ‘डर नहीं लगता है दीदी?’, समझाये उसको, कि इसी बात का तो डर है कि डर नहीं लगता है। काहे नहीं लगता है, लगना चाहिए। क्यों अच्छा लगता है ऐसे मौत को इस तरह क़रीब से छू कर आना। गाड़ी तेज चलती है, तो सोचती हूँ। जरा सी भी गलती हुई तो बॉडी इस तरह से टैंगल्ड हो जाएगी कार में कि चुन चुन के जलाना पड़ेगा। ख़ून दिखता है। ख़ुद को मरते हुए देखती हूँ कई बार। क्या ही कहें किसी ड्रग एडिक्ट की तरह होता है शायद इस तरह का नशा भी। तेज उड़ती है गाड़ी। बहुत बहुत तेज। उतनी थोड़ी देर कुछ भी नहीं दुखता। न पास्ट न प्रेजेंट न फ्यूचर। एकदम से ठीक उसी मोमेंट में होते हैं। योगा हमसे नहीं होगा। हमको फ्रीवे पर गाड़ी चलाने दो। करने दो कुछ छोटे गुनाह।

गाड़ी में सिगरेट पीते हैं और सुनते हैं…मेहंदी हसन मीर को गा रहे, ‘देख तो दिल कि जाँ से उठता है, ये धुआँ सा कहाँ से उठता है’. पता नहीं, क्यों, ये गाना बजा कर बहुत अच्छा लगता है। इसमें एक शेर आता है। “गोर किस दिलजले की है ये फ़लक, शोला इक सुब्ह याँ से उठता है।” शाम ऑलमोस्ट हो चुकी है। बैंगलोर से पॉण्डिचेरी का रास्ता स्टेट हाईवे है काफ़ी दूर तक। वैसे तो इस रास्ते पर कई बार आए गए होंगे, लेकिन शायद इस मौसम में इस गाड़ी में कभी नहीं आए गए हैं। धान की कटाई का समय है। धान की गंध उड़ रही है। सड़क पर कई जगहों पर लोगों ने अपने घर के आगे धान पसार रखा है सुखाने के लिए। गंध उड़ रही है, हवा में इर्द गिर्द है। धान की गंध लिबास की तरह बदन से लिपटती है…साड़ी की तरह लपेट रही…उसमें धूप की गर्माहट है और बचपन के दिन हैं। गर्मी की आहट वाले दिन जब कि पेड़ों पर आम नीचे लटके दिखते थे। होली के आसपास ऐसी गंध होती थी गाँव में। कटे पुआल की…इस गंध के साथ पूरे देह का छिलना भी याद रहता है। पुआल की टाली में सब बच्चे कूदते थे। पुआल में धार होती है। धान भी नुकीला होता है। देह में यहाँ वहाँ खरोंच पर अक्सर गेंदा के पत्ते मसल कर लगा लेते थे। या पानी से धो लिए…तनी-मनी छिलता था, ठीक हो जाता था अपनेआप।

***

मेरे घर के आगे अमलतास के दो पेड़ हैं। वे बारी-बारी से फूले…पहले जिस पेड़ पर अमलतास आए, उसके पूरे फूल ख़त्म हो कर जब तक हरे पत्ते आए, उसके पास का अमलतास एकदम ठूँठ ही था। मुझे लगा, पेड़ में शायद कोई तरह की खाद डालनी चाहिए थी। कि हालांकि मैं इस साल जनवरी में इस घर में आई हूँ, फिर भी कहीं न कहीं इस छोटे से अमलतास के पेड़ का न फूलना मेरी ही गलती है।

***
मेरी आँखें थोड़ी ख़राब हो गई हैं। अब अक्सर हर कुछ ही देखने में दिक्कत होती है। कभी दूर का तो कभी पास का नहीं दिखता। अंधे लोग चीज़ों की छू कर शिनाख़्त करते हैं। शायद बहुत साल से मैं ऐसी तैयारी कर रही थी कि जब देखने में दिक्कत हो, आँख बंद कर गहरी साँस ले सकूँ और चीज़ें ठीक ठीक याद रह जायें…स्टारबक्स में कॉफ़ी का गर्म कप पकड़ूँ और तुम्हारे हाथ याद रहें। कोई खुरदरी दिवाल पर हाथ फिराते चलूँ और सांची के स्तूप देखते समय भिक्षुओं के कमरे की दीवार पर हाथ फिराना महसूस हो…धूप, हवा और तुम्हारा होना महसूस हो…तुम्हारी मौजूदगी से दिल को थोड़ा सा करार आता है, वो रहे.

हम बेचैन लोग हैं…शायद बहुवचन में लिखना सही न हो…मैं बेचैन रहती हूँ अक्सर…मेरे दिल को सलीके से धड़कना नहीं आता…बहुत कम सुबहें होती हैं कि palpitations न होते हों…अब तो याद भी नहीं आता कि कभी मैं ऐसे भी थी कि ये घबराहट रोज़मर्रा का हिस्सा नहीं थी। मालूम, मुझे कॉलेज में लोग पूछा करते थे, तुम हमेशा इतनी खुश क्यों रहती हो? क्या हासिल हुआ है तुम्हें? हासिल उन दिनों भी कुछ नहीं था…लेकिन छोटी छोटी चीज़ों को देखना और उनमें ख़ुश होना थोड़ा ज़्यादा होता था। चाहे वो पटना की सड़क पर चलना हो, जिसमें गुलमोहर और अमलतास अल्टरनेट लगे हुए थे। चाहे वो उस लड़के का इंतज़ार हो, जो कहता था कि मुझसे प्यार नहीं करता…शायद सिर्फ़ अच्छी लगती हूँ उसे…लेकिन इसको प्यार थोड़े न कहते हैं। मुझे इन दिनों भी छोटी छोटी चीज़ों से बहुत ख़ुशी मिलती है। धूप-छाँव वाला ज़मीन का कोई हिस्सा हो, कोई संगीत का टुकड़ा हो, गाड़ी चलाते हुए दिखता, एकदम नीला आसमान हो या कि सूर्यास्त या सूर्योदय। बच्चे भी मेरी तरह कोई फूलों से पूरा लदा हुआ पेड़ देख कर खुश होते हैं, उस पेड़ का नाम पूछते हैं। कभी-कभी होता है, मुझे मालूम नहीं होता, और कहती हूँ, मेरे पास सारे जवाब नहीं है, पर मैं खोजूँगी तुम्हारे लिए। 

शायद तुम समझो, तुम्हें बताने का मन करता है। हालाँकि, तुम्हें बचाने का मन भी तो करता है। मन के भीतर गहरा, गाढ़ा, चिपचिपा तारकोल है…गर्म, खौलता हुआ…इसकी गंध जलाती है, इसकी छुअन भी…इसी कोलतार से सड़कें बनाती हूँ, उन सड़कों पर फर्राटे से याद की गाड़ी चलती है…वरना पहले कच्ची सड़कें थीं…उनपर चलने से तुम्हारे जूते गंदे हो जाते। तुम्हें जूते उतार कर बैठना अच्छा नहीं लगता। शायद तुम भी मेरी तरह, बस, किसी भी समय उठ कर चले जाने का सोचते रहते हो। कभी-कभी। तुम्हें लगता है जूते उतार के बैठने से होटल का कमरा घर जैसा लगने लगेगा। कि घर के भीतर आने के पहले हम जूते उतार कर आते हैं। नहीं?

मुझे भूल जाने से बहुत डर लगता है…भुला दिए जाने से भी। दरअसल ज़िंदगी में कोई बड़ा हादसा होता है तो वो हमारी core identity हो जाता है। हम चाह कर भी अपनेआप को उस हादसे से इतर बना नहीं पाते।

एक मई को मम्मी का बर्थडे है। मैं कभी कभी चाहती हूँ कि ये तारीख़ भूल जाऊँ। लेकिन भूल नहीं पाती, वैसे उस दिन छुट्टी रहती है, तो चाह के भी भूलना मुमकिन नहीं है। घर पर रहने का मन नहीं करता एक मई को…अजनबियों के बीच रहना चाहती हूँ…उन्हें मम्मी की बहुत सी बातें बताना चाहती हूँ, कि शायद वे बिना जजमेंट के सुनेंगे…अटकती हुई कहना चाहती हूँ, कि मुझे भुला दिए जाने से इसलिए डर लगता है कि मैं जानती हूँ, बहुत कोशिश करने से हम सब कुछ भूल सकते हैं…

मैं अपना पूरा बचपन भूल गई हूँ…वो सब कुछ जो उसके इर्द-गिर्द था। उसकी साड़ियों के रंग…उसकी ख़ुशबू…उसके बनाए खाने का स्वाद…कभी कभी जब उन लोगों से मिलती हूँ जो उसे जानते थे, जो मुझे जानते थे और वो मुझे उसके बारे में बताते हैं, तो मुझे याद आता है…दुखता हुआ, कि ज़िंदगी में ये सुख भी था।

हम जिससे प्यार करते हैं, उससे मिलना हमेशा जादू होता है…

लेकिन कभी-कभी, कुछ ख़ुशक़िस्मत लोगों को नसीब होता है कि जिससे बहुत प्यार करते हैं, उससे बिछड़ते हुए, उनके सीने से लग कर, मन भर रो सकें। जैसा बिछोह लिखा है कभी कहानी-किताब में, वैसा कोई बिछोह जी सकें। कभी ऐसा भी हो ज़िन्दगी में, कि रोने पर कोई पोंछ सके आँसू, कि रोते हुए तमीज़ का ख़्याल न रखें…कि कोई बाँध टूटे आँसुओं का, तो टूट जाने दें। कि तुमसे बिछड़ने के दुख में मिल जायें, जीवन के सारे पुराने दुख, “चाँद के साथ कई दर्द पुराने निकले, कितने ग़म थे जो तेरे ग़म के बहाने निकले”। तुमसे बिछड़ना-मिलना तो कई जन्म का किस्सा है। बिछड़ते हुए, हर बार लगता है, इस जन्म, आख़िरी बार मिल रहे हैं। मिलते हुए, हर बार लगता है, बीच में कई जनम बीत गए।

हाथ से बुने कपास में जादू होता है। उसकी मेमोरी डिस्क होती है…तभी तो, वो हैंडलूम की नीली साड़ी जो तुमसे मिलने के दिन पहनी थी, तह कर के रखी है। उस दिन के बाद दुबारा पहन नहीं पायी हूँ। लगता है कोई फ्रैजिल तिलिस्म है उसमें, खोलने से टूट जाएगा। साड़ियाँ कम रिपीट होती हैं वैसे भी, इतनी सारी ख़रीदती रहती हूँ, कम ही मौक़े आते हैं पहनने के…

मिलने वाले दिन के विजुअल cues हैं, याद को खंगालती हूँ, तुम्हारी ब्लैक शर्ट, तुम्हारे बिना क्रीज वाले लिनेन पैंट्स…तुम्हारी चवन्नी हँसी…सब कुछ आपस में मिला जुला है…मोंटेज.

***
आज सुबह एक चिट्ठी मिली…स्त्रीलिंग पुल्लिंग, जेंडर डिफाइन करने में मुश्किल हो रही है…कभी लिखती हूँ, तुम्हारा ख़त मिला. कभी लिखती हूँ, चिट्ठी. सुबह उठी तो पैल्पिटेशंस थे, अक्सर जैसे होते हैं. चिट्ठी पढ़ी और इतना रोना आया…ख़ुशी वाले आँसू। कभी यकीन नहीं होता, कि किसी की ज़िंदगी में मेरी कोई ख़ाली जगह है. इक इतवार जैसी. 

कि कितना सादा वाक्य है, ‘तुम्हारी याद आती है’, कलेजे में राहत महसूस होती है, जैसे माँ चोट पर फूँक मार रही हो.

26 March, 2026

हमारी सिगरेट से उसके एक कश मार लेने से हमारे भीतर की कोई पुरातन आग बुझ जाती है

अधूरी ख्वाहिशों का क्या करूँ? दफ़ना दूँ? काग़ज़ में लिख कर चिता जला दूँ? दिया जला, पत्ते के दोने में रख गंगा में बहा दूँ? गाँव में थोड़ी ज़मीन ख़रीद कर मंदिर बनवाऊँ और फिर पास में इन्हीं इच्छाओं की समाधि बनवा दूँ? कैसे मिलेगी शांति? ये मन इतना छटपटाता क्यों रहता है हमेशा? हमेशा? 
एक हूक उठी रहती है भीतर…हमेशा…हमेशा… 

Music is an ancient memory. Carried across lifetimes, like an almost soul-ache.
Almost.

एक पुरातन दुख है, हमारे भीतर। इस जन्म तो इतना मिलना हुआ नहीं है कि बिछोह इस तरह हमारे वजूद के टुकड़े करते जाये। कोई संगीत सुनें और जैसे कि आरी से काटा जा रहा हो बहुत पुराने जंगल में देवदार कोई, ऐसा दुखे…जंगल में पगडंडियों पर चलते जायें और सोचें कि ये चिकने पत्थर जहाँ तक हैं, गंगा यहाँ तक बहती थी…पहाड़ों को डुबाने इतनी गहरी…प्रेम ऐसे ही बहता था हृदय में, बहुत पहले…प्राचीन गंगा नदी की तरह…कई सौ फीट गहराई…कहीं चुपचाप, कहीं शोर करता हुआ।

तुमसे मिल कर लगा, सब कुछ मिला है, सिवाए वक़्त के…लेकिन इतने वक्त के बाद, कौन सा वक्त था कि घट गया। क्या वक़्त कभी पूरा नहीं पड़ेगा?

कोई यूनिट नहीं है न कि किसी के गले लगने पर कब हटा लेनी है बाँहें, है ना? आधा सेकंड और रुकना था…या एक मिनट और? कोई टाइमर, कोई स्टॉपवॉच क्यों नहीं होती जो बता दे…कि नहीं हुआ है वक्त पूरा…थोड़ी देर और रुको…हम क्यों नहीं रुक पाये?

डॉक्टर बताते हैं कि इस उम्र में बेहतर डाइजेशन के लिए ज़रूरी है कि खाना खाते हुए थोड़ी सी भूख बची रही, तब खाना बंद कर देना चाहिए। ऐसी आदत डिसिप्लिन से आती है। लेकिन हम यह डिसिप्लिन खाने पर ही नहीं, हर चीज़ में लागू करते हैं। जितना काफ़ी है, उसके पहले रुक जाना।

लेकिन जो थोड़ा सा और चाहिए, वो जो भीतर भीतर घुमड़ता रहता है, उसका क्या करें?
क्या हमेशा बचा ही रह जाएगा कुछ न कुछ? क्या अधूरी ख्वाहिशों के लिए कोई तर्पण, कोई मुक्ति नहीं?

कुछ लोगों को सिगरेट माँग के पीना अच्छा लगता है। अपनी नहीं जलायेंगे, अपनी ख़रीदेंगे भी नहीं। उनसे कहो कि अपनी नई जला लो, तो मानेंगे भी नहीं, कि पूरी सिगरेट नहीं पीनी है…एक दो कश मारना है, तुम दे दो। अब क्या कहें कि हमारी सिगरेट से जो दो कश मार लिए तुम, उसके कारण मन नहीं भरता…फिर चाहे पूरी सिगरेट की डिब्बी खत्म कर दें…वो जो दो कश था, वो बाक़ी रह गया। तुमने हमारे हिस्से की सिगरेट पी ली। 

क्या सिखाने से शेयरिंग आ जाती है? या फिर हम अनिच्छा से दे तो देते हैं, भीतर भीतर भुनभुनाते हुए…कि हमारे हिस्से का था…मत लो। कोई किस समय इतना अपना हो जाता है कि हमारी बॉटल से उसके एक घूँट पानी पी लेने से हमारे भीतर की कोई पुरातन प्यास बुझ जाती है…हमारी सिगरेट से उसके एक कश मार लेने से हमारे भीतर की कोई पुरातन आग बुझ जाती है…ये तो हिसाब की गलती है ना, जितना काफ़ी था, उससे कम में रुकना था ना? फिर हमने उसके लिए अपने बनाए नियम क्यों तोड़ दिए। 

हम कभी-कभी बहुत हाइपर होते हैं…एक क्षण नहीं ठहर पाता मन हमारा…पास्ट, प्रेजेंट, फ्यूचर में भागता रहता है। मन तुम्हें हर समय से अलगा कर देखना चाहता है…एक समय, सिर्फ़ अपने लिए…एक समय मन तुम्हें तुम्हारी दुनिया से उठा लाता है और एक कहानी में रख देता है। कि बाक़ी चीज़ें एक जगह, पहले जरा इत्मीनान से देखने दो तुम्हें…थोड़ा मेरा हाथ पकड़ के चुप बैठो…कोई दुखता हुआ म्यूजिक पीस चला दो…ऐसा कि जिससे रूह के दो फाँक हो जायें।

कितना अच्छा होता है ना, प्यार में न होना। हम कितने बहादुर होते हैं। हमें बिल्कुल भी डर नहीं लगता। किसी भी चीज़ से नहीं…काश कि हमारे बस में होता, किसी से प्यार करना, न करना…कम/ज़्यादा प्यार करना…काश कि समझ आता, कि चिंगारी कई सालों में भी नहीं बुझती है। तुम्हें डर नहीं लगता, क्यूंकि तुम्हें प्यार नहीं है। हम कितने बहादुर होते हैं, जब तक हमारे दिल में किसी का नाम थोड़ा सा दुखने नहीं लगे। कि हम कोई नाम सुन कर मुस्कुरा रहे होते हैं, पर आँख भर भर आती है।

औरत को आग बचा के रखने की सलाह दी गई थी…कि हर रोज़ खाना बनाने के पहले आग मांगने जाना न पड़े…उसने जलाये रखे कोयले, गोयठे के भीतर…लाल लाल आग सुलगती रही…उन दिनों माचिस भी मुश्किल से मिलती थी…और खाना चूल्हे पर बनता था। दुनिया बदल गई, खाना बनाने के तरीके बदल गए, लेकिन जो आग बचाये रखने की सलाह दी गई थी, वो लड़की ने भीतर बचा कर रख ली। वो अपने भीतर एक चिंगारी हमेशा बचाये रखती है। अन्तर इतना रहा, कि ये डायनामाइट के पलीते में लगी चिंगारी रही मेरे दोस्त…लड़की को आग-आग में अंतर करना नहीं आया। तुमसे मिली थी तो सूखे पत्ते बिखरे हुए थे जंगल के फर्श पर…जरा रगड़ने से चिंगारी सुलगने लगी…

सिगरेट जलाने की आग और होती है, दिल जलाने की आग और होती है…ये जो भीतर भीतर जलता है…इस आग को आँसुओं से बुझा देना चाहिए.

ये दिल जो हमारा इतना दुखता रहता है, सारा दुख, सारा बिछोह इसी जन्म का हो नहीं सकता। कुछ है जो कई जन्मों से थोड़ा थोड़ा कर ख़त्म हो रहा, लेकिन पूरी तरह ख़त्म नहीं होता। कुछ है जो वापस लौटने के लिए तड़पता रहता है। शायद हम में से कई लोग ईश्वर के पास आत्माओं के रूप में रहते हुए भी एक दूसरे से जुड़े हुए थे।

एक हूक उठती है भीतर, एक दुख तड़पता है। एक गीत में किसी की आवाज़ हमारे दुख से रिज़ोनेट करती है।
ईरान-इजराइल-अमरीका के इस युद्ध का असर हमारे प्रेजेंट और फ्यूचर पर पड़ रहा है। पता नहीं, सफ़र करना कितना आसान या कि मुश्किल होगा। हम तयशुदा तरीक़े से नहीं कह सकते कि अब हम कब मिलेंगे। गीत उसी दिन सुना था, इतवार को…

आज सुबह रहा नहीं गया तो खोज कर इसके पुराने वर्शन सुने…
हिंदी उर्दू के कुछ शब्द हमारे जाने पहचाने हुए हैं…समझ आता हैं उनका मतलब…एक दिल कहता है चले जाओ, एक दिल कहता है रुक जाओ…Soltane Ghalbhan नाम का यह गीत ईरान के लिए सिर्फ़ एक गीत न हो कर याद और लौटने के नामुमकिन सपने जैसा है। रुकने और चले जाने के ठीक पहले। Between memory and hope. 

Soltane Ghalbhan जो वर्शन एकदम कलेजा चाक कर रहा है वह डैनी ने गाया है। बहुत साल पहले Siboney सुना था। उसमें कौनी फ़्रांसिस की आवाज़ ऐसी ही थी, कि ऊँचा खींचती थी तो साथ ही रूह का जैसे तागा तागा खिंच जाता था। saudade को आवाज़ में ढालता Jab Harry met Sejal में एक गाना था, यादों में…ये गीत जैसे ज़ख़्म और मरहम एक साथ होते हैं। 

मैं लिख कर तुम्हें ज़िंदा कर देना चाहती हूँ किसी कहानी में…काग़ज़ पर इतना लिखूँ, इतना कि उँगलियाँ दुखने लगें। कि हथेली पसीने से तरबतर हो जाये और साड़ी के आँचल में हाथ को धीरे धीरे पोंछते हुए तुम्हारे हाथ याद आयें, दुखते हुए। कि जाने कैसा लगता है तुम्हारा हाथ पकड़ कर थोड़ी देर को बैठना, जब वसंत हो और अमलतास खिले हों पूरे शहर में।

पाँच तल्ले नीचे उतर कर पानी मिलता है।
दिल ऐसी ही गहरी बावली है।
***

मैं अब भी खूब सारा लिखती हूँ। भले कहीं फ़ेयर न लिखूँ। कोई कहानी न लिखूँ। लेकिन ज़िंदगी में जो जिया, जो गहरे महसूस किया, उसको दर्ज करना अच्छा लगता है। हर साल की एक नोटबुक तो होती है सो होती है, उसके अलावा ढेर सारी छोटी-बड़ी ट्रैवल नोटबुक्स, बहुत तरह के पिक्चर पोस्टकार्ड्स। अन्तर्देशी। चिट्ठी के काग़ज़। लिफ़ाफ़े। 

मेरी हर नोटबुक में अधूरी चिट्ठियाँ, दोस्तों के नाम के पोस्टकार्ड्स होते हैं। शायद हमारे शहरों से इस तरह चिट्ठी गिराने का लाल डिब्बा हटाया नहीं जाता तो मैं ख़त लिख कर गिराती भी। कुरियर बहुत औपचारिक होता है। चिट्ठी बहुत पर्सनल, इसलिए न चाहते हुए भी चिट्ठी कुरियर करने में एक बेईमानी लगती है। जिन्होंने सालों साल चिट्ठियाँ लिखी हैं और डाकघर जा कर रजिस्टर की हैं, वे शायद इस बात को समझ पायें कि पोस्टऑफ़िस के स्टाफ को आप कितनी अच्छी तरह पहचानते हैं…और वे आपको। किस्से में डाकिये के होने से मुहब्बत एक साझा साज़िश हो जाती है। वे आपके गुनाह में शामिल ही नहीं, उसके गवाह भी होते हैं। मुझे लगता है डाकिया के हाथ में लिफ़ाफ़ा हो या कि पोस्टकार्ड, वो ख़त को समझता है। 

डाकिया सिर्फ ख़त डिलीवर नहीं करता, वो दो प्रेमियों के बीच के काग़ज़ के रिश्ते का गवाह होता है। 

किसी रोज़ अदालत में उससे पूछो, कि क्या मैंने तुमसे प्रेम किया था कभी…तो कुरियर वाले को नहीं मालूम होगा, लेकिन डाकिया अपना चश्मा पोंछते बोलेगा…ज़िंदगी के आख़िरी पोस्टकार्ड इसी लड़की के डिलीवर किए। सिर्फ़ इन पोस्टकार्ड और चिट्ठियों के कारण तो रिटायरमेंट का अफ़सोस रहा। तुम्हें देखेगा और कहेगा, मैंने तो सारे ख़त पढ़े भी नहीं, फिर भी तुम्हारा नाम लिखा देख कर जान जाता था कि कोई तुमसे बहुत प्यार करता है। तुम भीतर के ख़त पढ़ कर भी नहीं जान पाये कि कितनी मुहब्बत है, ऐसा कैसे हुआ?

तुम क्या जवाब दोगे भरी अदालत में, कि मैंने तुम्हें कोरे काग़ज़ भेजे हैं उम्र भर। कि बहुत साल पहले कभी मैंने तुमसे पूछा था कि ख़त का जवाब क्यों नहीं देते तो तुमने मोमिन का शेर सुनाया था, “हाल-ए-दिल यार को लिखूँ क्यूँ कर, हाथ दिल से जुदा नहीं होता”

क्या ही पूछें तुमसे, तुम, जो ख़त के आख़िर में लिखते हो, तुम्हारा। 

*** 

तुम्हें गोल्ड फ्लेक कब से अच्छी लगने लगी?
तुम अच्छे लगने लगे हो। 

24 March, 2026

छोटी गोल्ड फ्लेक, दिल पर नन्हे लेकिन मज़बूत टांके लगाने के लिए।

जल्दी ठीक हो जाने के लिए, हर बड़े ज़ख़्म को सिलना पड़ता है। छोटी गोल्ड फ्लेक चाक हुए कलेजे को सिलती है। अगर गहरा ज़ख़्म देख कर तुम्हारे हाथ थरथरायें न तो। ये मत कहो, कि छोटी गोल्ड-फ्लेक ही क्यूँ, कि फिर हम कहेंगे, ठीक होने की इतनी भी जल्दी किसको है, फिर तुम क्यूँ भेज देना चाहते हो ऐसे दुखते कलेजे वाली लड़की को ख़ुद से इतना ज़्यादा दूर…बकवास मत करो, कि एक फ्लाइट की दूरी को दूर थोड़े कहते हैं, पास ही कहते हैं…जब मन हुआ, उड़ कर आ जाना। 

ये चारागर है जिसके पास चुप्पी भी है, बातें भी…कहो, किससे ठीक होना है तुम्हें…या कि गोली देना हो तो वो भी है, गोली खानी हो, तो सो भी है…वन स्टॉप सॉल्यूशन। मर्ज़ अच्छा लगने लगे, इतना अच्छा चारागर।

इस सिगरेट की छोटी साइज पर नहीं जाओ, कि इस ऑपरेशन में ज़्यादा देर लगेगी…मेरे पास वक्त ही वक्त है। देर तक पियेंगे, ढेर सारी, छोटी छोटी गोल्ड-फ्लेक…जब तक कि तुम्हारा कलेजा इतना जलने लगे कि भूल जाओ, किस ज़ख़्म की सिलाई करने बैठे थे। कैसा गर्म मौसम था, तसल्लीबख़्श। स्कूल में जब गर्मी छुट्टी होती थी, करने को कुछ नहीं होता था। नानीघर में गलियों में धूल फाँकते रहते थे या अमरूद के पेड़ पर लटके कौन सा अमरूद कब पकेगा का हिसाब लगाते रहते। जरूरी काम होते थे कि माँझे का धागा बनाने के लिए बल्ब या ट्यूबलाइट मिल जाये, तो कचरे में भी ढूँढने जाते थे कभी कभी। ग़ज़ब डेयरिंग हुआ करते थे उन दिनों। ये गर्मी वैसी ही थी। ये दिल वैसा ही होना चाह रहा था, तुम लोगों के साथ।

हम जो कि मग्गे में कॉफ़ी पीते हैं। तुम्हें मालूम, कमसेकम 350ml तो होनी ही चाहिए। छोटी कप में पीने में मजा नहीं आता। कुल्हड़ वाली चाय भी पीने जाते हैं तो लार्ज या मीडियम। यहाँ ये इत्ता छोटा छोटा काग़ज़ के कप में चाय, जैसे टेस्टिंग कराते हैं, वैसा ही…लेकिन जाते साथ थोड़े समझ आ जाता, कि एक ही बार में मग्गे भर चाय क्यों नहीं पी रहे। ये इत्मीनान की जगह थी। दोहराव की…बचपन में लिखना सीखते हैं तो बार बार एक ही शब्द लिखते हैं। खूब जोर से पेंसिल गड़ा कर नोटबुक में। डेस्क की लकड़ी में डिवाइडर से खुरच खुरच कर…याद करने वाली चीज़ को दोहराव चाहिए होता है, हमेशा।

अपने। तुम मेरे अपने लोग थे। मेरे अपने।

मैंने तुम्हें for-granted लिया। मैंने तुम्हें परेशान होने दिया, अपने लिए। कि ठीक है, आओ तुम भी सुबह सुबह उठ के एयरपोर्ट। ऐसा एक इतवार हो सकता है कि नींद से चोरी करें घंटे-घंटे भर। कि बिना किसी मुद्दे के बात करेंगे हम। कि उलझ जाएँगे किसी एक ही बिंदु पर और तुम झेल लोगे, एक रोज़, थोड़ी देर को…इतना साधिकार कहेंगे, अनाधिकार हो, तो भी सही।

मेरे भीतर दो तरह की कहानियाँ रहती हैं। एक जो फर्स्ट पर्सन में लिखी जाए और दूसरी जो थर्ड पर्सन में लिखी जाए। दोनों कहानियाँ अलग अलग तरह की होती हैं। सच वाली कहानियाँ थर्ड पर्सन में लिखना आसान रहता है और पूरी काल्पनिक कहानी फर्स्ट पर्सन में…लेकिन आसान रहता है, इसलिए जरूरी नहीं हैं कि हम वही चुनें। मेरे भीतर लगातार बोलते रहने वाली कोई एक किस्सागो लड़की रहती है। पंखे के चलने की आवाज़, ट्रैफिक का शोर…जैसे ये वाइट नॉइज़ है, जिसपर हम ध्यान नहीं देते, मेंटली म्यूट कर के चलते हैं, मैं भी कहानी सुनाने वाली इस लड़की को अक्सर अनसुना कर के जी रही होती हूँ। लेकिन कभी कभी लेकिन उसका दिमाग़ एकदम ही ख़राब हो जाता है, it is chaotic…फिर वो मेरे भीतर भूचाल, सूनामी और ज्वालामुखी फटने जैसी प्राकृतिक आपदाएँ बुला लेती है…

उस रोज़ स्टारबक्स जाने का मन नहीं किया था। घर से एक घंटा दूर। बाहर बाहर की सड़कें, बिल्कुल भी शोर नहीं, ट्रैफिक नहीं…मौसम प्लीजेंट…मार्च है, बेहद सुंदर फूल खिले हुए हैं सब जगह। खास तौर से गुलाबी और बैगनी फूलों से ढके हुए पेड़…ताम झाम का क़िस्सा ये था कि कुर्ते की स्लीव थोड़ी सी बाँह पर अटकती थी और हमको लिखते हुए अक्सर हत्थे चढ़ाने की आदत है…कुर्ता पहन कर हम अक्सर लिखने तो नहीं ही जाते हैं…तो पहले fabindia में पिट-स्टॉप लिए…एक अच्छा सा कुर्ता खरीदा, मैचिंग झुमके ख़रीदे और फिर उस कैफ़े गई जहाँ कोई मुझे नहीं जानता।

आसमान में बादल की आउटलाइन सुनहली हो गई थी। शाम से वहाँ बैठ कर नॉवेल का पहला चैप्टर लिखे। सोचे, दोस्त ऐसे होने चाहिए जिनके घर बिना एडवांस नोटिस के जा सकें। जिन्हें बुलाने के लिए जिद मचायें तो वे मान जायें और आ जाएँ चुपचाप…तबीयत अच्छी-ख़राब, ऑफिस का काम, पति की किचकिच, सब छोड़छाड़ के…लेकिन ऐसा कोई है तो नहीं शहर में…फिर क्या ही करते। दिल को समझाने की कोशिश की, वही एक बात, जो इतने साल से समझा रहे हैं…कि वैराग्य भी अभ्यास से आता है। कि हम प्रैक्टिस कर के सीख जाएँगे, किसी की याद में तड़पने के बावजूद उसे बताये बिना जिया जा सकता है। कि कायनात के सामने भीख मांगने की जरूरत नहीं है। कि ये वक़्त गुज़र जाएगा और अभी जिसे एक नज़र देखने के लिए जान जा रही है, वो सामने होगा और तुम उस से दूर रह सकोगी। 

भर दोपहर और शाम कहानी लिखने के बाद किसी दोस्त की बहुत तलब लगती है। जिसे थोड़ी सी कहानी सुनायी जा सके। लेकिन बैंगलोर में मेरी कहानी किसी को समझ में तो आएगी नहीं। कि इतना इंटेंस जीना ही क्यों है…क्या समझायें, कि हमेशा ये ऑप्शन नहीं होता कि एसी के टेम्परेचर की तरह इंटेंसिटी कम ज़्यादा कर सकें…इसका कोई रिमोट नहीं होता.

साथ लाए बैग में सब कुछ था, आईपैड, मैकबुक, तीनों नोटबुक्स, सारी कलमों में फ्रेश इंक, बहुत सारे पोस्टकार्ड्स…और मन में एक गहरा दुःख। ख़त लिखने को दिल किया…वर्ड डॉक्यूमेंट खोल के पढ़ा…इस ख़त पर मेरा नाम नहीं है, सिर्फ़ डियर राइटर…कि मुझे जाने बगैर, सिर्फ़ मेरे शब्दों से मुझे जाने वाला कोई मुझे इतनी प्यारी चिट्ठी लिख सकता है। क़ायदे से तो ऐसे लोगों से कभी मिलना नहीं चाहिए…कि हम तो इतने उलझे हुए, बेसब्र, परेशान से हुए रहते हैं। हमसे मिलने का कोई फ़ायदा नहीं है। टाइमपास भी नहीं, टाइमवेस्ट। ख़त इतनी बार पढ़ चुकी थी, ये भी लगा कि कैसे लोग हैं ना दुनिया में…उन्हें तारीख़ें याद रहती हैं, उन्हें नंबर्स समझ आते हैं…उनका समय तक का हिसाब ठीक है।

एक हम हैं, जिससे कल बिछड़े हैं, लगता है पिछले जन्म में मिलेंगे और दुखता ऐसे है कि अगले जन्म उनसे मिले बिना जीवन लगभग सारा बीत जाएगा। इसी बेनामी ख़त में बहुत सुंदर शेर लिखा मिला था

दुख ऐसा चाहिए कि मुसलसल रहे मुझे
और उस के साथ साथ अनोखा भी चाहिए
इक ज़ख़्म मुझ को चाहिए मेरे मिज़ाज का
या'नी हरा भी चाहिए गहरा भी चाहिए
- जव्वाद शेख 


उसका हिसाब थोड़ा भी पक्का होता तो गिन लेती न, कितने दिन बीते…कितने साल, कितने मौसम, कितने लम्हे…सड़क के साथ चलती नदी में कितना पानी बह गया। बहुत साल पहले हम अजनबी थे, बिल्कुल झूठी बात लगती है हालाँकि। उससे पहली बार मिलने पर भी अजनबी जैसा नहीं लगा कभी। ऊँचे पेड़ों वाले एक छोटे से शहर के किनारे किनारे नदी चलती थी। नदी के किनारे किनारे सड़क। सड़क पर छोटे छोटे पत्थर थे। नदी दिखने से ज़्यादा महसूस होती थी। ऐसा लगता था, कोई नदी बह रही है कहीं।

उस दिन ज़िद पर उतर आई थी कहानियों वाली लड़की, कि इस दिल को एब्सेंस से ज़्यादा presence की लत लग रही है, ऐसे में लतखोर दिल को थूर-थकूच के समझाना जरूरी था कि किसी के होने की आदत मत डालो…किसी को आवाज़ न दो। कोई है नहीं, इस भागते शहर में जो तुम्हारे बुलाने पर आ सके। सुनोगी तो मजबूरियाँ सुनायेंगे लोग तुम्हें, बहाने नहीं। इतना आसान थोड़े होता है तुमसे मिलना। लौंग राइड पर जाने के पहले जैसे बाइकर्स राइडिंग गियर पहनते हैं, वैसे ही तो दिल को पूरी तरह सेफ्टीगियर पहना कर लाना पड़ता है तुमसे मिलने। बहुत ताम-झाम है तुमसे मिलना, ऐसे नहीं होता कि कहो, पाँच मिनट में आ जाओ घर के नीचे, चलो, चाय पीने चलेंगे। उसको काल्पनिक किरदारों से मिलने के पहले पूरा तैयार होना होता था, साड़ी झुमके, बिंदी, परफ्यूम…लेकिन ज़िद इतनी भी होती थी कि बाल न उलझें…उससे कौन मिलेगा बिना तैयारी के…कोई भी नहीं तो। जो तुमसे नहीं मिलते, उनसे मिलने को काहे परेशान होती रहती हो। जो मिलना चाहते हैं, वाक़ई, जाओ उनसे मिल आओ।

मुझे लिखने के पहले बहुत से शहर देखने होते हैं। अहमदाबाद में एक पुरानी, रानी की वाव है। स्टेप-वेल…पत्थर की सीढ़ियों वाला कुआँ। याद नहीं बाओलियों के लिए मुझे इतना प्यार कब से उमड़ा…IIMC के अपने दोस्तों के साथ जब पहली बार एक स्टेपवेल देखी थी, तब से उनका सम्मोहन मेरे भीतर रहता है। मन के भीतर गहरे, कहानियाँ ऐसे ही रहती हैं।

सुबह साढ़े छह की फ्लाइट की टिकट साढ़े चार बजे कटायी…पंद्रह बीस मिनट में बैग पैक किया…और चालीस मिनट की ड्राइव है एयरपोर्ट की, सो बीस मिनट में आए, उड़ते उड़ते…दौड़ते हुए एयरपोर्ट के गेट से अंदर पहुँचे…जब वाक़ई प्लेन बोर्ड कर गए…तो दोनों मित्रों को ह्वाट्सऐप कर दिया, कि हम बोर्ड कर रहे…आ रहे हैं तुम्हरे शहर, लेकिन तुम परेशान मत होना. आराम से लंच पर मिलते हैं. और हमको एकदम ही नहीं लगा था, वे पहुँच जाएँगे.

अराइवल्स में बाहर निकलते ही देखा उन्हें…धूप थी. भली. वे भी. भले.
हम ऐसे मिले जैसे जन्मों के बिछड़े दोस्त हों…जैसे न मिलने का हिसाब किताब हम में से किसी को समझ नहीं आता…गाड़ी में बैठे, हम अपना सामान किसी को उठाने नहीं देते, लेकिन पता नहीं कैसे ये कुछ लोग होते हैं, आई insist वाले…कि मैं जाऊँगा ही नहीं तुम ऐसे बैग उठा के चलोगी तो…दूसरी बार मिल रहे थे। तीन साल हो चुके थे। और ये दोनों मुझे सिर्फ़ मेरे लिखे के कारण जानते हैं, प्यार करते हैं।

नाम लिखने का मन है, लेकिन नाम लेने से दोस्ती को नज़र लग जाएगी, इसलिए लिख नहीं रहे।
मैं, तुम, हम…कितना मुश्किल हो जाता है कभी कभी इन तीनों के साथ किसी किस्से को ज़िंदा करना।

पुरानी सीढ़ियों से उतर कर गई तो बहुत साल बाद उस गंध को पाया जो बचपन में गाँव में कुएँ की मुंडेर पर हुआ करती थी। मेरे गांव के घर में दो कुएँ थे, एक भीतरी आँगन में…एक बाहर गोहाल में, खेत के पास…और एक बड़ा इनारा, अर्थात्, बड़ा कुआं…जहाँ से पीने का पानी लाया जाता था। भीतरी कुएँ पर नहाना, मुँह हाथ धोना, और बर्तन माँजने का काम होता था। उन दिनों बर्तन और हाथ, दोनों राख से माँजे जाते थे।

सीले हुए पानी की गंध…मिट्टी और पुरानेपन की…कहानियों की गंध। ये ख़ुशबू मेरे भीतर अंधड़ की तरह उड़ती है…

मुझे अब अकेले घूमने की आदत हो गई है। दोस्तों की आदत छूट गई है।
रानी की वाव में पाँच तल्ले नीचे उतर कर पानी है। हम तीनों आसपास देखते हुए उतर रहे हैं। नक्काशीदार बलुआ पत्थर ऊपर में देखने से भुरभुरा लगता है। स्पंज की तरह सुराख़दार भी। नीचे के तल उतरने पर पत्थर छूने में खुरदुरा, ठंढा और सीला हुआ है। हम बातें कर रहे हैं। मुझे सब कुछ मायावी लग रहा। surreal, जैसे किसी कहानी के भीतर ही हैं। ऐसी पानी वाली ठंढी जगहों पर अजीब सा हौल फील होता है, सीने में…प्राचीन किसी दुख का होना। आत्मा में कुछ गहरा दुखना। दिल डूबता है।
मैं उन्हें देखती हूँ। सोचती हूँ, कितना अच्छा होता है, शहर में एक दोस्त होना भी।
चामुंडा चलते हैं, तुम्हारे सारे दुखों का इलाज वही है। मैं सोचती हूँ, कैसी जगह होगी…लेकिन कोई इमेज नहीं बनती। हम गाड़ी में जाते हैं…खुली हुई जगह है…मैदान जैसी, कुछ पेड़ हैं…वहीं बीच में बसा हुआ है…यह छोटा सा, चामुंडा. नखलिस्तान ही है. इतवार की सुबह है, एकदम अलसायी सी…लोग टेबल पर बैठे गप्पें कर रहे हैं…कुछ कुर्सियाँ हैं, सतरंगी धागे से बने कुछ छोटे स्टूल हैं…हम तीन कुर्सियों पर बैठ गए हैं…जूते मोजे उतार दिए हैं. पैर स्टूल पर टिका दिए हैं. 

छोटी छोटे काग़ज़ के कप में चाय…छोटी वाली गोल्ड फ्लेक…जेट फ्लेम लाइटर.
मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी ऐसी किसी दोपहर को नहीं जिया है…शायद इसलिए भी कि कॉलेज के दिनों में चाय पीते नहीं थे, न पॉलिटिक्स की ख़ास समझ थी। IIMC में पढ़ते हुए जब लोग चाय पीने टपरी पर निकलते थे, हम ऑलमोस्ट कभी नहीं जाते थे, ढाबा पर जाते थे तो खाने के लिए। चाय, सिगरेट, पॉलिटिक्स, ये तीनों मेरी ज़िंदगी में नहीं थे।
चाय हमको अब भी पसंद नहीं है। जैसे लोग सोशल ड्रिंकिंग करते हैं, वैसे ही हम चाय सिर्फ़ कुछ स्पेशल लोगों के साथ पीते हैं। ये स्पेशल लोग थे। ये स्पेशल सुबह थी।

इतनी बातें हम ख़ुद के लिए लिख रहे हैं, क्यूंकि बाद में सब कुछ भूल जाते हैं हम। दिन जल्दी शुरू करो तो वक्त धीरे बीतता है। ऐसा इतवार बचपन में ही मिलता था। पापा की छुट्टी रहती थी। सुबह रेडियो पर गाने चल रहे होते थे। मम्मी खाना बना रही होती थी। हम दोनों भाई बहन घास खोद रहे होते थे, कभी आलू उखाड़ रहे होते, कभी मटर छील रहे होते। फालतू के काम। झूला झूल रहे होते, दिन दिन भर। गर्मी छुट्टी के दिन।

कितना अच्छा होता है ना, जब किसी से कुछ नहीं चाहिये होता है। फिर जो भी मिलता है, सरप्लस ही होता है। भूख लगी थी ज़ोर से…दो प्लेट वेजिटेबल सैंडविच…खीरा टमाटर प्याज़, हरी चटनी और शायद चाट मसाला. गर्म. ताज़ा. इतना अच्छा स्वाद था. एक छोटू था, फ्लास्क और चाय के कप लिए घूम रहा था…हर कुछ देर में चाय पिला जाता था। 

कितने इत्मीनान से बैठे थे। कितनी सारी बातें थीं। बातें ही बस। लगातार चाय, सिगरेट, गप्प…लूप में. पानी की बोतलें. कहीं कोई शोर नहीं। कोई संगीत नहीं। कोई ackwardness नहीं…इतना सहज…जैसे कितने पुराने दोस्त हों. जैसे हम महीने की दो तीन इतवार तो वहीं पाये जाते हैं. ऐसी जगह, ऐसे लोग…कि अचानक से उस शहर में रहने को मन करने लगे। कितना कम चाहिए एक शहर से, लेकिन इतने पार्टिक्युअलर, कि बैंगलोर में सब कुछ मिलता…एक ऐसी दोपहर, एक ऐसी टपरी, दो ऐसे दोस्त और इतनी सारी बातें नहीं मिलतीं। इतना सा ही तो चाहिए, लेकिन। यही चाहिए। कोई और कॉम्बिनेशन नहीं।

कोई सिगरेट जला के पी हो, सो याद नहीं…जली हुई सिगरेट माँग माँग के पीते रहे…ये अलग था…ये अजब था…ये भीतर की किसी आग को बुझाता था…कोई दुख पे मरहम करता था। लोग क्यों पीते हैं सिगरेट, मालूम नहीं। हम हमेशा दोस्तों के साथ सिगरेट पीते हैं। सिगरेट अपने आप में एक किरदार है। किसी एक बार की सिगरेट, किसी दूसरे बार की सिगरेट जैसी नहीं होती। किसी एक दोस्त के साथ पी हुई सिगरेट, किसी दूसरे दोस्त के साथ पी हुई सिगरेट जैसी नहीं होती। हम अपने घर में बैठे, कभी सिगरेट पी भी रहे हैं तो ऐसे किसी रोज़ को याद करते हुए ही पी रहे। इत्ती इति सी गोल्ड फ्लेक…छोटी गोल्ड फ्लेक…कड़वी गोल्ड फ्लेक…दिल को जलाती, बुझाती…चारागर।

इम्पॉसिबल था यहाँ होना…ऐसे कैसे अचानक से खिंच के चले आए ना.
उसने ख़त में दिनों की गिनती लिखी थी…आख़िरी बार मिले हुए कितने दिन हुए.

मुझे रश्क हुआ उन दोनों से…कितना आसान था उनके लिए यहाँ होना…कितना मुश्किल और कितना rare है मेरे लिए, जो कितनों को सरलता से मिलता है।

जाना जितना आसान लग रहा था। लौटना उतना ही मुश्किल था।
गाड़ी से उतर कर गले लगे…गेट की ओर लौटे…दिल नहीं भरा…लौट लौट कर जाना चाहता था दिल. ये कौन से लोग हैं जो मुझ टूटे फूटे इंसान से इतना प्यार कर सकते हैं…तो क्या शहर की बात है? Bangalore finds me difficult to love. Impossible to love.
एक बार विदा करने के बाद, वो फिर से दौड़ कर साथ आई। गेट तक। हम दो बार गेट से लौटे। मैं वहाँ खड़ी उसे दूर जाते देखती रही। जब तक वो भीड़ में गुम नहीं गई।

मन नहीं भरा। मन कभी नहीं भरेगा।
फ़्लाइट में रोते सुबकते आई। मेरा कोई मायका है नहीं। बिन माँ की लड़कियों का मायका नहीं होता। लेकिन कभी कभी ज़िंदगी हमें ऐसे लोग दे देती है, जिनके पास हम लौट सकेंगे, ऐसा भरोसा होता है। कि वे हमारा इंतज़ार करेंगे। That they can love us in our worst form. That I can take them for-granted. हमेशा माँगते हुए ज़रूरत भर को हाथ फैलाने वाले हम, किफ़ायती लोग। ज़िंदगी उदार हो कर भेजती है, दोस्त, जान से प्यारे…जो बाँहें खोलते हैं और हमें समेट लेते हैं।

दिल दुखता है। लेकिन इसलिए कि भरा-भरा है।
और कुछ भी पूरी तरह ख़राब नहीं होता। सिगरेट भले बुरी चीज़ है, लेकिन हमारे लिए मरहम है।

ज़िंदगी के सबसे सुंदर मोमेंट्स की कभी तस्वीर नहीं होती। उससे बोला, चामुंडा की एक फोटो भेज दो…उसने जो भेजी है, उसमें एक कुर्सी पर बैग है, दो खाली कुर्सियाँ हैं…टेबल पर एक सिगरेट का पैकेट है…एक कप चाय.
मैंने अपनी ज़िंदगी में इससे उदास तस्वीर नहीं देखी।

दुनिया बदल रही है। हम जाने कब मिलेंगे फिर। लेकिन इस बदलती दुनिया में, मिल लिए। ये अच्छा है।
और अच्छे से ज़्यादा, ये काफ़ी है। 

19 March, 2026

कहो, कर सकोगे, अप्रेम में इतना, मेरे लिए?



मायावी लड़की, ख़ुद से डरती थी। जिसके इश्क़ में एक आँसू रो दे, उसकी आत्मा उसी एक कतरे में क़ैद हो जाती थी…फिर वो आँसू का कतरा जहाँ जज़्ब हो, प्रेमी की रूह का एक हिस्सा वहीं ग़ुम हो जाता था…फिर वे दुनिया में भटके भटके फिरते, कि जाने क्या छूट गया है…क्यों ज़रा खाली खाली सा लगता है, सीने के बीच ज़रा सा दुखता क्यूँ है। सिगरेट के कश में जो पुरसुकून सुख था, वो घट क्यों गया है। किसने मेरी ज़िंदगी का ज़रा सा सुकून ग़ायब किया है। सब कुछ हासिल कर के भी काफ़ी क्यों नहीं लगता…क्या छूट रहा है…क्या फिसल रहा है हाथ से…

काग़ज़ में जज़्ब होता आँसू का कतरा, तो कहानी बनता, उसे पढ़ते हुए हर अधूरे व्यक्ति को लगता, किसी ने उसकी रूह पर जरा सा मरहम लगा दिया है। कहानियों में कच्ची मिट्टी होती। इससे भरे जा सकते गहरे से गहरे ज़ख़्म। दो फाँक दिल पर लगा के जरा सी कहानी की मिट्टी, टांक देती लड़की अपनी हँसी के कच्चे धागे से ज़ख़्म। माचिस लिए घूमती। उसकी नज़र में इतनी तपिश थी, सियाह आँखें, कोयले जैसी। नज़र भर देखती तो आँच लगती, ज़ख़्म की मिट्टी पर खिलते अमलतास। बारिश में झूमते, नशे में…गुनगुनाते उसका नाम…मंत्र बाँधते, कि बिजली ना गिर जाये इस पेड़ पर।
रतजगों के बाद वे आँखें भट्ठी जैसी जलती थीं…कभी कभी आँसू भाप बन जाता। आसमान से बरसता। उसके ये अनजान प्रेमी फँस जाते बहुत तेज बारिश के बाद वाले किसी ट्रैफिक जाम में…सारी गाड़ियाँ खड़ी रहतीं अपनी जगह पर। वे एक ही सड़क के दो तरफ़ होते। एक दूसरे को नहीं देख पाते एक नज़र भी।
वे अजनबी थे, लेकिन जाते हुए एक बार लौट कर आते, हाथ मिलाने को…कि यकीन हो, छुआ हुआ सच है। लड़की हँसती, सिगरेट से जला देती उनकी उँगलियाँ। कहती, ज़ख़्म का निशान देखोगे तो पक्का याद रहेगा, कि मैं सच में थी।
सच तो कुछ भी नहीं था इस हर पल बदलती, युद्धरत दुनिया में…
इश्क़ और जंग में सब जायज़ है, कहती हुई लड़की किसी बहुत तेज बारिश की रात में पूरा भीगती लेकिन बारिश में गुम नहीं होता आँसू का वो कतरा जिसमें नाम घुला हो…वो कतरा चमकता…आसमान में… 
वो अजनबी हर बार जब बिजली कड़कते हुए देखता खिड़की से बाहर तो सोचता, ये उसके नाम का अक्षर हमेशा कैसे दिखता है सेकंड के क्षणांश में आसमान में लपकती रोशनी की लकीरों में…
तेज बारिश में गीली सिगरेट आसमान की ओर उठाती लड़की और आसमान को चैलेंज करती, उस लड़के को मुझसे जरा भी प्यार नहीं है, जो मैं झूठ बोलूँ तो इस सिगरेट को जला कर दिखा…भगवान हँसते, बेवकूफ लड़की, इतना सिंपल टेस्ट…आसमान से धरती की ओर बिजली लपकती और सिर्फ़ सिगरेट का सिरा जला कर ज़मींदोज़ हो जाती…
लड़की गहरा कश लेती, हँसती…यार भगवान, तुम भी ना, ये बिजली हमारे दिल पर गिरा कर क़िस्सा तमाम कर देते, इतना क्या सोचना है तुमको…एक मेरे मर जाने से कुछ भी तो हिसाब-किताब गड़बड़ नहीं होगा दुनिया पर…भगवान जी कहते, जरा-जरा मरो तुम इश्क़ में…पूरा मत मर जाना, जितनी बेवकूफ हो, उतनी ही प्यारी भी तो हो।

***
शहर दिल्ली से बेइंतहा मुहब्बत करने के कोई सुबूत नहीं हैं मेरे पास, सिवाए इसके कि किसी रैंडम से दिन बहुत मुश्किल से पायी हुई एक ख़ाली दोपहर में लिखने बैठी हूँ, कहानी मिजाज में घुली हुई है। मॉल का गेट सामने है। लोग इर्द-गिर्द हैं। मैं किसकी याद में हूँ, मालूम भी नहीं। मुहब्बत को तो उस शहर में भी याद करते हैं, जहाँ उसके होने का कोई ठिकाना नहीं होता। शहर दिल्ली में अभी पलाश और सेमल खिले होंगे। लोधी गार्डन में बोगनविला के उस पेड़ पर झूम कर गुलाबी रंग खिला होगा। हौज खास की इमारतों के पत्थर अभी पूरी तरह धीपते नहीं हैं। शाम को वहाँ बैठा जा सकता है। जिसे एक दिन ज़िद करके हौज खास ले गई थी, कि देखो, ज़िंदगी अभी कमरे से बाहर भी है। कि देखो, शाम के रंग सुंदर हैं। कि देखो, तुम्हरे अपने पर्सनल दुख के अलावा दुनिया कितनी बड़ी है। वो, जिसने उस रोज़ कहा था, तुम्हारे साथ यहाँ आ कर पता नहीं क्यों मन करता है कि फिर से पेंट ब्रश उठाऊँ और कुछ पेंटिंग्स बनाऊँ इस जगह की…वो, जिसने तड़प के कहा था, आज तुम्हारी बहुत याद आ रही है। आज आ जाओ बस, फिर किसी रोज़ नहीं आना। और मैं सिर्फ़ इसलिए नहीं गई थी, कि दो दिन ही लगते हैं दुखती हुई आदत के लिए। किसी से एक दिन मिलना हमेशा anomaly होता है, दिल कभी इस बात का यकीन नहीं करता कि उससे मिल कर जो महसूस हुआ था, वो सच का रूह में धँसा हुआ था। दिल कहता रहता है, एक्सेप्शन था वह, उतनी तेज धड़कना, वो ख़ुशी का फूल जो खिलता था, मुस्कुराता था, एक रोज़ का फूल था…उस पर भरोसा मत करो, वो गलती से बेमौसम खिला था। अभी वसंत आने में एक जन्म का फ़ासला है। वो लड़की नहीं थी, भरम थी। उससे दो बार मिल लोगे, लगातार, तो रूह में ज़ख़्म की तरह दर्ज हो जाएगी। फिर चुभेगी हर रोज़, एक तीसरी बार की मुलाकात की ज़िद लिए। कि स्पेस में भी ग्राफ प्लॉट करने के लिए दो वेल्यूज़ चाहिए होते हैं, एक्स एक्सिस के अलग, वाय एक्सिस के अलग। समय और स्थान। दो बार मिलने से यकीन हो जाता है कि किसी एक जगह पर, किसी एक वक्त में वो सचमुच थी। मरीचिका के पीछे क्यों भागना यायावर। सब कुछ भरम था उसका, किसी पुराने खंडहर में आती खुशबू हमेशा किसी प्रेत की होती है। किसी अधूरी इच्छा की…इन प्रेतों को इग्नोर करना ही सबसे अच्छा उपाय होता है। जैसे ही इनके होने का तुमपर असर पड़ने लगेगा, तुम्हें मालूम भी नहीं चलेगा और तुम्हारी घड़ी की सुइयाँ उलटी दिशा में घूमने लगेंगी। तुम गुज़रा हुआ सारा वक़्त लौटा लेना चाहोगे सिर्फ़ उस एक लड़की के साथ एक शाम, एक दोपहर, एक मौसम पहली बार जीने के लिए। तुम अपना जिया हुआ सब कुछ इरेज कर दोगे उसके लिए। वो जो है भी नहीं, जो कभी नहीं होगी तुम्हारे आसपास। उसने अनाधिकार अपनी साड़ी का आँचल तुम्हारी ओर बढ़ा दिया था कि इसमें धीपा हुआ, भीगा हुआ चेहरा पोंछ लो। वो अपनी साड़ी के आँचल में गाँठ बाँध लेती तुम्हारी ख़ुशबू…फिर तुम्हारी कलाइयों से कपास की गंध उठती और तुम सिगरेट पीते हुए अपनी कलाइयाँ जला लेते लेकिन उसके गीले बालों से उड़ती गंध तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ती। 

बरिस्ता ने कॉफ़ी टेबल पर ला कर रख दी, हम दिल्ली में थे, या ख़्वाब के किसी शहर में, अनायास ज़बान से शुक्रिया कहा, और आँख से आँसू उसी समय छलक गए। ऐसे कैफ़े में बैठ बिना मतलब एकदम अचानक आँसू से रो देने की वजह कोई माँग ले, तो क्या ही कह सकेंगे हम। कि लोधी गार्डन में सेमल के पेड़ों का वो छोटा सा जंगल क्या अब भी खिल के आसमान और ज़मीन दोनों को गहरा लाल रंगता है? कि शुक्रिया कहना दुखता है? कि कॉफ़ी कलेजा जलाती है? कि हम कुछ भी कर लें, इस तन्हाई के ख़िलाफ़ कोई मुकदमा जीत नहीं सकेंगे। कि इतने साल में भी आदत क्यों नहीं पड़ती। कहते तो हैं ना, कि “कफ़स भी हो तो बन जाता है घर, आहिस्ता आहिस्ता”, लेकिन किसी औरत ने क्यों नहीं लिखा कि घर हो जाता है कफ़स आहिस्ता आहिस्ता? कि भाग जाने के सपने में गाड़ी उलट जाती है, बस खाई में गिर जाती है। कि बारिश में भीगते हुए दोस्त की याद आती है तो इतना ही कह पाते हैं, वॉइस नोट भेज दिया कर, तेरी याद आती है। ग़ज़ब ज़िद में दुखती है तन्हाई।
***

मुझे कोई बहुत अच्छा लगता है तो उससे सिंपल सवाल पूछती हूँ, तुम्हारा सबसे पसंदीदा रंग कौन सा है…पता नहीं क्यों। शायद उस रंग को उसकी नज़र से देखना होता है। शायद उसकी नज़र से दुनिया देखनी होती है। मेरे पापा का सबसे फ़ेवरिट रंग हरा था। मैंने जब अपनी मर्जी की कलमें खरीदनी शुरू की थीं, तो मेरा सबसे पसंदीदा रंग हरा था। मेरे पास हमेशा एक हरे रंग का पायलट पेन जरूर रहता था। कुछ हादसे आपको कैसे बदल देते हैं ना, ज़िंदगी से कोई एक रंग चुरा लेते हैं। आप कह भी नहीं सकते, ऑलमोस्ट किसी से भी…कि आपको हरे रंग से डर लगता है।
धूसर रंग पसंद था उसे…मिट्टी के सारे रंग। मैंने कई बार ख़ुद को ऑफ वाइट या beige रंग की साड़ी में लपेटते हुए सोचा, वो मुझे देखता तो क्या कहता…क्या वो कहता कि मेरी पसंद के रंग की साड़ी में अच्छी लग रही हो। क्या उसे मालूम होता कि मैंने जो बस, ऐसे ही, लाइट कन्वर्सेशन जैसा सवाल किया है, उसके इर्द-गिर्द मेरी वार्ड-ड्रोब बन रही है? क्रीम पैंट और ब्लैक शर्ट का मेरा सबसे फ़ेवरिट कॉम्बिनेशन सिर्फ़ ब्लैक ऑन ब्लैक से हराया जा सकता है। यार, ब्लैक पहन कर मेरी जान लेने आते हो तो पहले वार्न कर दिया करो, हम दिल का जिरहबख़्तर पहन कर मिलेंगे तुमसे।

***

मेरे दिमाग़ में फालतू चीज़ें सेव्ड रहती हैं। शहर के स्पीडब्रेकर का नक्शा है। और मेरी ज़िंदगी की जिन चीज़ों को तुमने छुआ है, उनका भी…चाहे तुमने किसी कॉफ़ी कप से एक घूँट लिया हो, किसी ग्लास या बॉटल से मुँह लगा कर पानी पिया हो…किसी कॉफ़ी शॉप में लकड़ी के स्टिरर से चीनी मिलायी हो…मैं क्या करूँ कि तुम्हारी छुई हर चीज़ को उठा कर दिल के म्यूजियम में स्टोर करती गई हूँ।

***

तुम इक रोज़ भूल जाओ कि मैं कॉफ़ी में चीनी नहीं पीती, भगवान कसम, उसी रोज़ तुमको एकदम से भूल जाऊँगी। लेकिन इसके लिए किसी कॉफ़ी शॉप में मिलो तो सही…मेरे लिए अमेरिकानो ऑर्डर करो और उसमें अपनी कॉफ़ी की तरह, दो चम्मच चीनी डाल दो…
सिंपल है ना…कहो, कर सकोगे, अप्रेम में इतना, मेरे लिए?

15 March, 2026

वो मेरी रूह में उलझ गया है…मैं जिस्म से रूह को अलगा कर मर जाना चाहती हूँ।

दिल दुख रहा है। फिजिकल। क्यूँ। ठीक-ठीक क्या। डॉक्टर को दिखायेंगे तो कुछ भी नहीं निकलेगा। शायद।
लेकिन दिल थक गया लगता है। मुहब्बत को गुनाह की कैटेगरी में डाल कर ख़ुद को इतना तड़पाया है कि मुस्कुराने से घबराता है दिल। सुख और सुकून के लम्हे को ऐसे बरतता है जैसे जमानत पर रिहा हुआ क़ैदी आसमान के चाँद को देखता है। कचकते, कसकते हुए। भगवान कभी आयें और पूछें कि क्या चाहिए, तो हम मुहब्बत भी नहीं माँगेंगे। कहेंगे, ये दिल का दुखना बंद हो जाये बस। मरने की दुआ माँग नहीं सकते, वरना माँग लेते। 
आज ग़ज़ब दिन बीता है, सुबह लगभग ग्यारह बजे घर से निकले, कोई डेढ़ घंटे दूर गो-कार्टिंग ट्रैक था, वहाँ पर मिनी वालों ने मिनी चलाने के लिए लगा रखी थी। आप तेज चला कर कॉर्नरिंग देख सकते थे…ऐसा कहने को ठीक लगता है, पर असल में मिनी इतनी ज़्यादा पावरफुल कार है कि इतने छोटे ट्रैक पर ठीक से न स्पीडिंग हो पायी, न कॉर्नरिंग। लेकिन वहाँ मिनी की टीम थी, उनसे बात कर के अच्छा लगा। हमने कार के बारे में बात की, रेसिंग के बारे में बात की…मैंने उन्हें बताया कि हाईवे पर गाड़ी चलाते हुए ये मालूम चला कि तेज बारिश में भी बहुत तेज गाड़ी चला रहे हैं तो हुड खोल कर चलाने के बावजूद भीगते नहीं हैं। ये देखने में ग़ज़ब लगता है और इसका फिजिक्स हमको नहीं मालूम, पर प्रैक्टिकली ऐसा ही देखे हैं।
दोपहर में खाने के लिए पेपर ऐंड पाई चले गए, पास में था। वहाँ का अवोकेडो टोस्ट बहुत अच्छा लगता है। साथ में कहवा और अमेरिकानो पिये…याद आया कि हमको वो जगहें कितनी अच्छी लगती हैं जो हमारे दोस्तों ने बतायी हैं। इंदिरानगर में एक जगह थी, घर के पास, Antz Cafe…जेन लेकर गई थी वहाँ पहली बार कितने साल हो गए उस बात को…जेन से बहुत बहुत साल पहले मिली थी, वो सिंगापुर शिफ्ट हो गई तो ज़िंदगी से एकदम ग़ायब ही हो गई है, लेकिन उसके साथ पहली बार उस छोटे से कैफ़े में जाना दिल को इतना सुकून देने वाला था कि वो मेरी अपनी जगह बन गया। मैं वहाँ कई बार कई दोस्तों के साथ गई। कोई जगह क्यों अच्छी लगती है, कह नहीं सकते। कभी-कभी वहाँ का स्टाफ बहुत kind होता है। आपसे इतने प्यार से बात करता है कि आप भूल जाते हैं कि आपने कई दिनों से मुस्कुरा कर किसी को देखा नहीं है। मुझे हमेशा सफेद इमारतें बहुत अच्छी लगती हैं। ऐंट्ज़ कैफ़े में एक सिनेमन कॉफ़ी मिलती थी। उन दिनों अमेरिकानो का चस्का नहीं चढ़ा था। वहीं पर bruchetta मिलता था…ब्रेड के छोटे टुकड़ों पर टमाटर कटे हुए और थोड़ा शायद ओलिव आयल ड्रिज़ल किया हुआ…हम ऐंट्ज़ कैफ़े कई बारिश वाली दोपहर और शाम गए होते थे। अक्सर क्रिसमस लाइट्स लगी होती थीं। हर बार किसी दोस्त के साथ किस टेबल-कुर्सी पर बैठे थे, सो तक याद रहता था। गुज़र गए दिनों के दोस्त, अक्स की तरह दिखते थे। इंदिरानगर छूटा तो वाक़ई जो दोस्त थे, सारे छूट गए।
कितना आसान था उन दिनों, दोस्तों को फ़ोन कर के कॉफ़ी के लिए बुलाना। स्टारबक्स में तो अक्सर ही ऑफिस के बाद मिलते थे। मैं उन दिनों अपने नॉवेल पर काम कर रही होती थी। रात के एक बजे अपने ग्रीन वाली फ्लाइट पर घर लौटती थी। सपनीले दिन और रातें। याद की सारी चीज़ें सच नहीं होती हैं। बहुत कुछ हम अपनी कल्पना से मिला देते हैं, कुछ किसी कहानी का छूटा हुआ जुड़ जाता है। इन दिनों याद में दिक्कत होती है।
इस जनरेशन के पास कितने सारे और कितने अच्छे शब्द हैं। जिन चीज़ों को समझने में हमें कई किताबें लग जाती थीं…उनके लिए इनके पास एक शब्द है, situationship, ये अच्छा भी है और बुरा भी। मुझे जैसे उलझे हुए किरदार अच्छे लगते हैं, उतना उलझा हुआ क्या हर कोई होता है?
मुझे पहले लगता था मुहब्बत पर उम्र का कब्जा है। एक उम्र के बाद मुहब्बत दस्तक दे कर, इजाज़त दे कर आएगी। ऐसे नहीं कि पतझड़ का पत्ता जिधर तेज हवा चली, उड़ गया। कि एक्सिडेंटली नहीं होगी मुहब्बत, कि क्रश नाम की शय पर टीनेजर्स का एकाधिकार है। ईगो पर लग जाता है किसी का इस तरह बदतमीजी से दिल के दरवाज़े एकदम से हिंदी फिल्मी हीरो की तरह तोड़ कर भीतर घुस आना…फ़िल्मों में भी आजकल नेगेटिव किरदार ऐसे लिख रहे हैं कि समझ नहीं आता किससे प्यार करना है, किससे नफ़रत और किसके लिए वफ़ा रखनी है। हम किस तरफ़ के हैं?
सब तरफ़ espionage चल रहा है। दिल अपनी ही जासूसी कर रहा और सारे राज उसे बता रहा है जिसे सिर्फ़ आपके क़त्ल से मतलब है, कोई भी करे।
कायनात, भगवान, शैतान…हमने हर दरवाजे मत्था टेक लिया। कि बस, ये दुखना बंद हो जाये। इक रोज़ तो इस बेतरह दुखा और टूटा कि लगा जान चली जायेगी। रात के जाने कितने बजे थे लेकिन दोस्त को फ़ोन करके फ़ोन पर चीखे, रोए, तड़पे…
वांग कार वाई की एक फ़िल्म है, डेज ऑफ़ बीइंग वाइल्ड। उसका जो सबसे ख़ूबसूरत सीन है, वही उसका सबसे ख़तरनाक सीन भी। कि इक लड़का है, जो एकदम अनजान लड़की को दीवार से टिका कर कहता है, मेरी घड़ी की ओर देखो, एक मिनट बीतता है और फिर वह कहता है, आज से हम एक मिनट के दोस्त हो गए…इसे अब कोई नहीं बदल सकता, क्यूंकि अतीत को बदला नहीं जा सकता…और कि इस एक मिनट के लिए मैं तुम्हें ज़िंदगी भर याद रखूँगा।
वे प्रेम में होते हैं, साथ होते हैं और आख़िर को वो लड़का, उसे छोड़ देता है। लड़की बावलों की तरह रातों को शहर भटकते रहती है। ऐसे में इक रोज़ उसे एक पुलिस वाला मिलता है। वह पुलिस वाले को कहानी बताती है, कहते हुए कि जब उस लड़के ने यह बात कहीं थी, तो सुनने में बहुत अच्छा लगा था, लेकिन जब से उसने मुझे छोड़ा है, मैं रोज़ सोचती हूँ, वो एक मिनट भूलना कितना मुश्किल है। इस सबके बाद वो लड़की कहती है, मैं अगर सिर्फ़ आज की रात काट लूँगी तो फिर चीज़ें ठीक हो जायेंगी। सिर्फ़ एक आज की रात।
मेरे पास भी सिर्फ़ ऐसी रातें हैं। लेकिन कई रातें। मुश्किल वे रिश्ते नहीं होते जो टूट गए। मुश्किल वे रिश्ते होते हैं, जो बने ही नहीं। उनके पास खाद-पानी नहीं रहा कभी कि ज़मीन से झाँक सकें बाहर, धूप चख सकें, चाय-कॉफ़ी का अंतर पता कर सकें। पता नहीं, शायद इस दुनिया में मेरी तन्हाई का कुछ काम होगा…वरना ऐसे थोड़े है कि इतने बड़े शहर में लोग नहीं हों।
शाम में मिलन की किताब के बारे में बातचीत थी, अट्टा-गलाटा में। Heartbreak Unfiltered. नॉन-फिक्शन किताब है। कई तरह के दिल टूटने के किस्से हैं इसमें। किताब कब से पास में है, लेकिन पढ़ नहीं रहे, मन होते हुए भी। एक शाइनी उनसे सवाल पूछती हैं, कि क्या दिल टूटने से लोग मर सकते हैं, तो मिलन बताती हैं, कि किताब लिखते हुए उन्होंने स्टडी की और उनको पता चला कि दिल टूटने से सच में मर जाते हैं लोग।
हमने मुहब्बत को हमेशा रोमांस के चश्मे से देखा है, स्त्री-पुरुष के अलावा भी ऐसे प्रगाढ़ संबंध हो सकते हैं, ऐसे उदाहरण हमने बहुत कम पढ़े हैं। ऐसे रिश्ते होते होंगे, लेकिन हमने आमतौर पर प्रेम में दिल टूटने के सारे किस्से मुहब्बत के ही सुने हैं। नॉन-रोमांटिक जो क़िस्सा मुझे सबसे ज़्यादा पसंद है, वो वैन गो और उसके भाई थियो का है। वैन गो के छोटे भाई, थियो ने हमेशा वैन गो का ख्याल रखा, पैसा भेजते रहे और वैन गो के लिए क्या करना अच्छा रहेगा इसके बारे में भी खतों में लिखते रहे। दोनों भाई आपस में बहुत गहरे जुड़े हुए रहे…वैन गो के मरने के छह महीने के अंदर थियो की भी मृत्यु हो जाती है।
मुझे वैन गो बहुत पसंद हैं। इसलिए भी कि मेंटल हेल्थ बहुत ख़राब होते हुए भी उन्होंने बहुत सी पेंटिंग्स बनाईं। ये वैसा ही है जैसे बहुत डिप्रेशन में भी कोई लेखक लिखना जारी रखे। जैसे स्वदेश दीपक ने ‘मैंने मांडू नहीं देखा’ लिखी होगी। हमेशा मुमकिन नहीं होता है कि कला हमें बचा ले, लेकिन कई बार होता है कि कुछ रचना हमें डिस्ट्रक्टिव होने नहीं देता। हमें थोड़ा सुकून होता है कि जैसे एनर्जी को ना क्रिएट कर सकते हैं न डिस्ट्रॉय कर सकते हैं, वैसे ही दुख है…इसे सिर्फ़ दिल से निकाल कर काग़ज़ पर रखा जा सकता है। दुख को नष्ट नहीं कर सकते। अगर करने की कोशिश करेंगे तो दुनिया वैसे ही तबाह हो जाएगी जैसे एक इलेक्ट्रान को तोड़ कर नाभिकीय ऊर्जा को जन्म दिया जाता है। नार्मल केस में तो यही होता है एक एक व्यक्ति का दुख थोड़ा थोड़ा बहुत लोगों में बंटे…तब जा कर उसके दिल का बोझ थोड़ा हल्का होता है।
13th march. Friday. डायरी में लिखने के बाद भी कुछ चीज़ें इंटरनेट पर सहेजने का मन करता है। खास तौर से शुक्रिया दर्ज करने को…कि हमने जिसके लिए कुछ लिखा है, उस तक तो कभी नहीं पहुँचेगा, लेकिन शायद बहुत लोगों में बँटे तो हमारे सीने में चुभती खुखरी थोड़ी कुंद हो जाये.
कुछ चीज़ें कभी नहीं बदलतीं। मुझे इस दुनिया को उन चीज़ों के लिए शुक्रिया कहना चाहिए।
पता नहीं कितने साल बाद बात कर रहे थे, लेकिन दूर से ट्रेन की सीटी की आवाज़ सुनायी पड़ी फ़ोन पर। इस ट्रेन के सिग्नल से हमेशा लैंडलाइन वाले फ़ोन की याद आती थी। याद ऐसे ही आती है, बेसिरपैर की…उसके आने का न कोई ठिकाना होता है, न कोई तयशुदा वक्त। ग़लत लोगों के साथ होने पर, सही लोगों की याद आती है।
हमारे बीच कितने साल थे, मुझे मालूम नहीं।
मालूम बस इतना था कि इस दुनिया में बदन के इतने हिस्से हो नहीं सकते कि हर बार प्रेम करने पर दिल का टुकड़ा छोड़ आयें उसके पास, इसलिए हमने रूह के हिस्से किए…हर बार जब हमें मुहब्बत हुई। लेकिन उससे मिलने के बाद अफ़सोस हुआ कि काश रूह साबुत सलामत रहती…कि काश उसके पास रहते हुए किसी और हिस्से के लिए दिल टहकता नहीं।
मैंने सबसे ज़्यादा यही पूछा है, कि मुझे इतना गहरा प्रेम क्यों होता है…मुझे कम में जीना क्यों नहीं आता? मुझे इतनी याद क्यों आती है…आती है तो इस बेतरह दुखती क्यों है…इन सवालों का कोई जवाब नहीं होता। इस दुख की कोई दवा नहीं होती।
मुझे वो संगमरमर का फर्श याद रहता है, जिसकी ठंढी, कठोर सतह पर गिरती चाँदनी से दिल पर फफोले पड़ते थे…उस चाँदभीगे फर्श पर तड़पते हुए इक रोज़ सोचा था, काश कभी ऐसा होता, उसे एक क्षण के लिए सही पर इस ताप, इस दाह का अंदाज़ होता…एकदम ठीक ठीक ऐसा नहीं और इतनी देर तक तो बिल्कुल नहीं…पर जैसे आँच को छू कर उँगली जल जाती है, उतना सा छू सके विरह उसको…लेकिन इस विरह में उसकी आँखें जलेंगी तो मेरे दिल के अमलतास और पलाश के जंगल झुलस जाएँगे ये कहाँ मालूम था मुझे।
नया नॉवेल लिख रही हूँ, यहाँ पर लोगों ने अपनी फीलिंग महसूस करनी बंद कर दी हैं। बस कुछ ही लोग हैं, जिनका दिल थोड़ी तेज धड़कता है…यहीं एक किरदार है, ब्लैक शर्ट में जानलेवा दिखता…मुस्कुराता तो उसकी धार से काट लेती कलाइयाँ। वो पास आता है, इतना कि जिसे क़रीब कहते हैं…उसकी आवाज़ बहुत दूर से आ रही है…लैंडलाइन फ़ोन के ज़माने में हैं हम दोनों…मैं खिड़की पर खड़ी चाँद के उगने का इंतज़ार कर रही हूँ, वो तड़प कर कहता है, ‘कोई एक पूरे जन्म मेरे पास रह जाना…जाना मत।’
मैं काग़ज़ पर जल्दी से डायलॉग को लिखती हूँ। कलम के पाउच से खोलती हूँ कई रंग की कलमें, स्याही कौन सी है उसके शर्ट के रंग की…और उसकी आँखों के रंग की?
मैं चीखना चाहती हूँ, लेकिन काग़ज़ कोरा रहता है…
वो मेरी रूह में उलझ गया है…मैं जिस्म से रूह को अलगा कर मर जाना चाहती हूँ।

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