26 March, 2026

हमारी सिगरेट से उसके एक कश मार लेने से हमारे भीतर की कोई पुरातन आग बुझ जाती है

अधूरी ख्वाहिशों का क्या करूँ? दफ़ना दूँ? काग़ज़ में लिख कर चिता जला दूँ? दिया जला, पत्ते के दोने में रख गंगा में बहा दूँ? गाँव में थोड़ी ज़मीन ख़रीद कर मंदिर बनवाऊँ और फिर पास में इन्हीं इच्छाओं की समाधि बनवा दूँ? कैसे मिलेगी शांति? ये मन इतना छटपटाता क्यों रहता है हमेशा? हमेशा? 
एक हूक उठी रहती है भीतर…हमेशा…हमेशा… 

Music is an ancient memory. Carried across lifetimes, like an almost soul-ache.
Almost.

एक पुरातन दुख है, हमारे भीतर। इस जन्म तो इतना मिलना हुआ नहीं है कि बिछोह इस तरह हमारे वजूद के टुकड़े करते जाये। कोई संगीत सुनें और जैसे कि आरी से काटा जा रहा हो बहुत पुराने जंगल में देवदार कोई, ऐसा दुखे…जंगल में पगडंडियों पर चलते जायें और सोचें कि ये चिकने पत्थर जहाँ तक हैं, गंगा यहाँ तक बहती थी…पहाड़ों को डुबाने इतनी गहरी…प्रेम ऐसे ही बहता था हृदय में, बहुत पहले…प्राचीन गंगा नदी की तरह…कई सौ फीट गहराई…कहीं चुपचाप, कहीं शोर करता हुआ।

तुमसे मिल कर लगा, सब कुछ मिला है, सिवाए वक़्त के…लेकिन इतने वक्त के बाद, कौन सा वक्त था कि घट गया। क्या वक़्त कभी पूरा नहीं पड़ेगा?

कोई यूनिट नहीं है न कि किसी के गले लगने पर कब हटा लेनी है बाँहें, है ना? आधा सेकंड और रुकना था…या एक मिनट और? कोई टाइमर, कोई स्टॉपवॉच क्यों नहीं होती जो बता दे…कि नहीं हुआ है वक्त पूरा…थोड़ी देर और रुको…हम क्यों नहीं रुक पाये?

डॉक्टर बताते हैं कि इस उम्र में बेहतर डाइजेशन के लिए ज़रूरी है कि खाना खाते हुए थोड़ी सी भूख बची रही, तब खाना बंद कर देना चाहिए। ऐसी आदत डिसिप्लिन से आती है। लेकिन हम यह डिसिप्लिन खाने पर ही नहीं, हर चीज़ में लागू करते हैं। जितना काफ़ी है, उसके पहले रुक जाना।

लेकिन जो थोड़ा सा और चाहिए, वो जो भीतर भीतर घुमड़ता रहता है, उसका क्या करें?
क्या हमेशा बचा ही रह जाएगा कुछ न कुछ? क्या अधूरी ख्वाहिशों के लिए कोई तर्पण, कोई मुक्ति नहीं?

कुछ लोगों को सिगरेट माँग के पीना अच्छा लगता है। अपनी नहीं जलायेंगे, अपनी ख़रीदेंगे भी नहीं। उनसे कहो कि अपनी नई जला लो, तो मानेंगे भी नहीं, कि पूरी सिगरेट नहीं पीनी है…एक दो कश मारना है, तुम दे दो। अब क्या कहें कि हमारी सिगरेट से जो दो कश मार लिए तुम, उसके कारण मन नहीं भरता…फिर चाहे पूरी सिगरेट की डिब्बी खत्म कर दें…वो जो दो कश था, वो बाक़ी रह गया। तुमने हमारे हिस्से की सिगरेट पी ली। 

क्या सिखाने से शेयरिंग आ जाती है? या फिर हम अनिच्छा से दे तो देते हैं, भीतर भीतर भुनभुनाते हुए…कि हमारे हिस्से का था…मत लो। कोई किस समय इतना अपना हो जाता है कि हमारी बॉटल से उसके एक घूँट पानी पी लेने से हमारे भीतर की कोई पुरातन प्यास बुझ जाती है…हमारी सिगरेट से उसके एक कश मार लेने से हमारे भीतर की कोई पुरातन आग बुझ जाती है…ये तो हिसाब की गलती है ना, जितना काफ़ी था, उससे कम में रुकना था ना? फिर हमने उसके लिए अपने बनाए नियम क्यों तोड़ दिए। 

हम कभी-कभी बहुत हाइपर होते हैं…एक क्षण नहीं ठहर पाता मन हमारा…पास्ट, प्रेजेंट, फ्यूचर में भागता रहता है। मन तुम्हें हर समय से अलगा कर देखना चाहता है…एक समय, सिर्फ़ अपने लिए…एक समय मन तुम्हें तुम्हारी दुनिया से उठा लाता है और एक कहानी में रख देता है। कि बाक़ी चीज़ें एक जगह, पहले जरा इत्मीनान से देखने दो तुम्हें…थोड़ा मेरा हाथ पकड़ के चुप बैठो…कोई दुखता हुआ म्यूजिक पीस चला दो…ऐसा कि जिससे रूह के दो फाँक हो जायें।

कितना अच्छा होता है ना, प्यार में न होना। हम कितने बहादुर होते हैं। हमें बिल्कुल भी डर नहीं लगता। किसी भी चीज़ से नहीं…काश कि हमारे बस में होता, किसी से प्यार करना, न करना…कम/ज़्यादा प्यार करना…काश कि समझ आता, कि चिंगारी कई सालों में भी नहीं बुझती है। तुम्हें डर नहीं लगता, क्यूंकि तुम्हें प्यार नहीं है। हम कितने बहादुर होते हैं, जब तक हमारे दिल में किसी का नाम थोड़ा सा दुखने नहीं लगे। कि हम कोई नाम सुन कर मुस्कुरा रहे होते हैं, पर आँख भर भर आती है।

औरत को आग बचा के रखने की सलाह दी गई थी…कि हर रोज़ खाना बनाने के पहले आग मांगने जाना न पड़े…उसने जलाये रखे कोयले, गोयठे के भीतर…लाल लाल आग सुलगती रही…उन दिनों माचिस भी मुश्किल से मिलती थी…और खाना चूल्हे पर बनता था। दुनिया बदल गई, खाना बनाने के तरीके बदल गए, लेकिन जो आग बचाये रखने की सलाह दी गई थी, वो लड़की ने भीतर बचा कर रख ली। वो अपने भीतर एक चिंगारी हमेशा बचाये रखती है। अन्तर इतना रहा, कि ये डायनामाइट के पलीते में लगी चिंगारी रही मेरे दोस्त…लड़की को आग-आग में अंतर करना नहीं आया। तुमसे मिली थी तो सूखे पत्ते बिखरे हुए थे जंगल के फर्श पर…जरा रगड़ने से चिंगारी सुलगने लगी…

सिगरेट जलाने की आग और होती है, दिल जलाने की आग और होती है…ये जो भीतर भीतर जलता है…इस आग को आँसुओं से बुझा देना चाहिए.

ये दिल जो हमारा इतना दुखता रहता है, सारा दुख, सारा बिछोह इसी जन्म का हो नहीं सकता। कुछ है जो कई जन्मों से थोड़ा थोड़ा कर ख़त्म हो रहा, लेकिन पूरी तरह ख़त्म नहीं होता। कुछ है जो वापस लौटने के लिए तड़पता रहता है। शायद हम में से कई लोग ईश्वर के पास आत्माओं के रूप में रहते हुए भी एक दूसरे से जुड़े हुए थे।

एक हूक उठती है भीतर, एक दुख तड़पता है। एक गीत में किसी की आवाज़ हमारे दुख से रिज़ोनेट करती है।
ईरान-इजराइल-अमरीका के इस युद्ध का असर हमारे प्रेजेंट और फ्यूचर पर पड़ रहा है। पता नहीं, सफ़र करना कितना आसान या कि मुश्किल होगा। हम तयशुदा तरीक़े से नहीं कह सकते कि अब हम कब मिलेंगे। गीत उसी दिन सुना था, इतवार को…

आज सुबह रहा नहीं गया तो खोज कर इसके पुराने वर्शन सुने…
हिंदी उर्दू के कुछ शब्द हमारे जाने पहचाने हुए हैं…समझ आता हैं उनका मतलब…एक दिल कहता है चले जाओ, एक दिल कहता है रुक जाओ…Soltane Ghalbhan नाम का यह गीत ईरान के लिए सिर्फ़ एक गीत न हो कर याद और लौटने के नामुमकिन सपने जैसा है। रुकने और चले जाने के ठीक पहले। Between memory and hope. 

Soltane Ghalbhan जो वर्शन एकदम कलेजा चाक कर रहा है वह डैनी ने गाया है। बहुत साल पहले Siboney सुना था। उसमें कौनी फ़्रांसिस की आवाज़ ऐसी ही थी, कि ऊँचा खींचती थी तो साथ ही रूह का जैसे तागा तागा खिंच जाता था। saudade को आवाज़ में ढालता Jab Harry met Sejal में एक गाना था, यादों में…ये गीत जैसे ज़ख़्म और मरहम एक साथ होते हैं। 

मैं लिख कर तुम्हें ज़िंदा कर देना चाहती हूँ किसी कहानी में…काग़ज़ पर इतना लिखूँ, इतना कि उँगलियाँ दुखने लगें। कि हथेली पसीने से तरबतर हो जाये और साड़ी के आँचल में हाथ को धीरे धीरे पोंछते हुए तुम्हारे हाथ याद आयें, दुखते हुए। कि जाने कैसा लगता है तुम्हारा हाथ पकड़ कर थोड़ी देर को बैठना, जब वसंत हो और अमलतास खिले हों पूरे शहर में।

पाँच तल्ले नीचे उतर कर पानी मिलता है।
दिल ऐसी ही गहरी बावली है।
***

मैं अब भी खूब सारा लिखती हूँ। भले कहीं फ़ेयर न लिखूँ। कोई कहानी न लिखूँ। लेकिन ज़िंदगी में जो जिया, जो गहरे महसूस किया, उसको दर्ज करना अच्छा लगता है। हर साल की एक नोटबुक तो होती है सो होती है, उसके अलावा ढेर सारी छोटी-बड़ी ट्रैवल नोटबुक्स, बहुत तरह के पिक्चर पोस्टकार्ड्स। अन्तर्देशी। चिट्ठी के काग़ज़। लिफ़ाफ़े। 

मेरी हर नोटबुक में अधूरी चिट्ठियाँ, दोस्तों के नाम के पोस्टकार्ड्स होते हैं। शायद हमारे शहरों से इस तरह चिट्ठी गिराने का लाल डिब्बा हटाया नहीं जाता तो मैं ख़त लिख कर गिराती भी। कुरियर बहुत औपचारिक होता है। चिट्ठी बहुत पर्सनल, इसलिए न चाहते हुए भी चिट्ठी कुरियर करने में एक बेईमानी लगती है। जिन्होंने सालों साल चिट्ठियाँ लिखी हैं और डाकघर जा कर रजिस्टर की हैं, वे शायद इस बात को समझ पायें कि पोस्टऑफ़िस के स्टाफ को आप कितनी अच्छी तरह पहचानते हैं…और वे आपको। किस्से में डाकिये के होने से मुहब्बत एक साझा साज़िश हो जाती है। वे आपके गुनाह में शामिल ही नहीं, उसके गवाह भी होते हैं। मुझे लगता है डाकिया के हाथ में लिफ़ाफ़ा हो या कि पोस्टकार्ड, वो ख़त को समझता है। 

डाकिया सिर्फ ख़त डिलीवर नहीं करता, वो दो प्रेमियों के बीच के काग़ज़ के रिश्ते का गवाह होता है। 

किसी रोज़ अदालत में उससे पूछो, कि क्या मैंने तुमसे प्रेम किया था कभी…तो कुरियर वाले को नहीं मालूम होगा, लेकिन डाकिया अपना चश्मा पोंछते बोलेगा…ज़िंदगी के आख़िरी पोस्टकार्ड इसी लड़की के डिलीवर किए। सिर्फ़ इन पोस्टकार्ड और चिट्ठियों के कारण तो रिटायरमेंट का अफ़सोस रहा। तुम्हें देखेगा और कहेगा, मैंने तो सारे ख़त पढ़े भी नहीं, फिर भी तुम्हारा नाम लिखा देख कर जान जाता था कि कोई तुमसे बहुत प्यार करता है। तुम भीतर के ख़त पढ़ कर भी नहीं जान पाये कि कितनी मुहब्बत है, ऐसा कैसे हुआ?

तुम क्या जवाब दोगे भरी अदालत में, कि मैंने तुम्हें कोरे काग़ज़ भेजे हैं उम्र भर। कि बहुत साल पहले कभी मैंने तुमसे पूछा था कि ख़त का जवाब क्यों नहीं देते तो तुमने मोमिन का शेर सुनाया था, “हाल-ए-दिल यार को लिखूँ क्यूँ कर, हाथ दिल से जुदा नहीं होता”

क्या ही पूछें तुमसे, तुम, जो ख़त के आख़िर में लिखते हो, तुम्हारा। 

*** 

तुम्हें गोल्ड फ्लेक कब से अच्छी लगने लगी?
तुम अच्छे लगने लगे हो। 

24 March, 2026

छोटी गोल्ड फ्लेक, दिल पर नन्हे लेकिन मज़बूत टांके लगाने के लिए।

जल्दी ठीक हो जाने के लिए, हर बड़े ज़ख़्म को सिलना पड़ता है। छोटी गोल्ड फ्लेक चाक हुए कलेजे को सिलती है। अगर गहरा ज़ख़्म देख कर तुम्हारे हाथ थरथरायें न तो। ये मत कहो, कि छोटी गोल्ड-फ्लेक ही क्यूँ, कि फिर हम कहेंगे, ठीक होने की इतनी भी जल्दी किसको है, फिर तुम क्यूँ भेज देना चाहते हो ऐसे दुखते कलेजे वाली लड़की को ख़ुद से इतना ज़्यादा दूर…बकवास मत करो, कि एक फ्लाइट की दूरी को दूर थोड़े कहते हैं, पास ही कहते हैं…जब मन हुआ, उड़ कर आ जाना। 

ये चारागर है जिसके पास चुप्पी भी है, बातें भी…कहो, किससे ठीक होना है तुम्हें…या कि गोली देना हो तो वो भी है, गोली खानी हो, तो सो भी है…वन स्टॉप सॉल्यूशन। मर्ज़ अच्छा लगने लगे, इतना अच्छा चारागर।

इस सिगरेट की छोटी साइज पर नहीं जाओ, कि इस ऑपरेशन में ज़्यादा देर लगेगी…मेरे पास वक्त ही वक्त है। देर तक पियेंगे, ढेर सारी, छोटी छोटी गोल्ड-फ्लेक…जब तक कि तुम्हारा कलेजा इतना जलने लगे कि भूल जाओ, किस ज़ख़्म की सिलाई करने बैठे थे। कैसा गर्म मौसम था, तसल्लीबख़्श। स्कूल में जब गर्मी छुट्टी होती थी, करने को कुछ नहीं होता था। नानीघर में गलियों में धूल फाँकते रहते थे या अमरूद के पेड़ पर लटके कौन सा अमरूद कब पकेगा का हिसाब लगाते रहते। जरूरी काम होते थे कि माँझे का धागा बनाने के लिए बल्ब या ट्यूबलाइट मिल जाये, तो कचरे में भी ढूँढने जाते थे कभी कभी। ग़ज़ब डेयरिंग हुआ करते थे उन दिनों। ये गर्मी वैसी ही थी। ये दिल वैसा ही होना चाह रहा था, तुम लोगों के साथ।

हम जो कि मग्गे में कॉफ़ी पीते हैं। तुम्हें मालूम, कमसेकम 350ml तो होनी ही चाहिए। छोटी कप में पीने में मजा नहीं आता। कुल्हड़ वाली चाय भी पीने जाते हैं तो लार्ज या मीडियम। यहाँ ये इत्ता छोटा छोटा काग़ज़ के कप में चाय, जैसे टेस्टिंग कराते हैं, वैसा ही…लेकिन जाते साथ थोड़े समझ आ जाता, कि एक ही बार में मग्गे भर चाय क्यों नहीं पी रहे। ये इत्मीनान की जगह थी। दोहराव की…बचपन में लिखना सीखते हैं तो बार बार एक ही शब्द लिखते हैं। खूब जोर से पेंसिल गड़ा कर नोटबुक में। डेस्क की लकड़ी में डिवाइडर से खुरच खुरच कर…याद करने वाली चीज़ को दोहराव चाहिए होता है, हमेशा।

अपने। तुम मेरे अपने लोग थे। मेरे अपने।

मैंने तुम्हें for-granted लिया। मैंने तुम्हें परेशान होने दिया, अपने लिए। कि ठीक है, आओ तुम भी सुबह सुबह उठ के एयरपोर्ट। ऐसा एक इतवार हो सकता है कि नींद से चोरी करें घंटे-घंटे भर। कि बिना किसी मुद्दे के बात करेंगे हम। कि उलझ जाएँगे किसी एक ही बिंदु पर और तुम झेल लोगे, एक रोज़, थोड़ी देर को…इतना साधिकार कहेंगे, अनाधिकार हो, तो भी सही।

मेरे भीतर दो तरह की कहानियाँ रहती हैं। एक जो फर्स्ट पर्सन में लिखी जाए और दूसरी जो थर्ड पर्सन में लिखी जाए। दोनों कहानियाँ अलग अलग तरह की होती हैं। सच वाली कहानियाँ थर्ड पर्सन में लिखना आसान रहता है और पूरी काल्पनिक कहानी फर्स्ट पर्सन में…लेकिन आसान रहता है, इसलिए जरूरी नहीं हैं कि हम वही चुनें। मेरे भीतर लगातार बोलते रहने वाली कोई एक किस्सागो लड़की रहती है। पंखे के चलने की आवाज़, ट्रैफिक का शोर…जैसे ये वाइट नॉइज़ है, जिसपर हम ध्यान नहीं देते, मेंटली म्यूट कर के चलते हैं, मैं भी कहानी सुनाने वाली इस लड़की को अक्सर अनसुना कर के जी रही होती हूँ। लेकिन कभी कभी लेकिन उसका दिमाग़ एकदम ही ख़राब हो जाता है, it is chaotic…फिर वो मेरे भीतर भूचाल, सूनामी और ज्वालामुखी फटने जैसी प्राकृतिक आपदाएँ बुला लेती है…

उस रोज़ स्टारबक्स जाने का मन नहीं किया था। घर से एक घंटा दूर। बाहर बाहर की सड़कें, बिल्कुल भी शोर नहीं, ट्रैफिक नहीं…मौसम प्लीजेंट…मार्च है, बेहद सुंदर फूल खिले हुए हैं सब जगह। खास तौर से गुलाबी और बैगनी फूलों से ढके हुए पेड़…ताम झाम का क़िस्सा ये था कि कुर्ते की स्लीव थोड़ी सी बाँह पर अटकती थी और हमको लिखते हुए अक्सर हत्थे चढ़ाने की आदत है…कुर्ता पहन कर हम अक्सर लिखने तो नहीं ही जाते हैं…तो पहले fabindia में पिट-स्टॉप लिए…एक अच्छा सा कुर्ता खरीदा, मैचिंग झुमके ख़रीदे और फिर उस कैफ़े गई जहाँ कोई मुझे नहीं जानता।

आसमान में बादल की आउटलाइन सुनहली हो गई थी। शाम से वहाँ बैठ कर नॉवेल का पहला चैप्टर लिखे। सोचे, दोस्त ऐसे होने चाहिए जिनके घर बिना एडवांस नोटिस के जा सकें। जिन्हें बुलाने के लिए जिद मचायें तो वे मान जायें और आ जाएँ चुपचाप…तबीयत अच्छी-ख़राब, ऑफिस का काम, पति की किचकिच, सब छोड़छाड़ के…लेकिन ऐसा कोई है तो नहीं शहर में…फिर क्या ही करते। दिल को समझाने की कोशिश की, वही एक बात, जो इतने साल से समझा रहे हैं…कि वैराग्य भी अभ्यास से आता है। कि हम प्रैक्टिस कर के सीख जाएँगे, किसी की याद में तड़पने के बावजूद उसे बताये बिना जिया जा सकता है। कि कायनात के सामने भीख मांगने की जरूरत नहीं है। कि ये वक़्त गुज़र जाएगा और अभी जिसे एक नज़र देखने के लिए जान जा रही है, वो सामने होगा और तुम उस से दूर रह सकोगी। 

भर दोपहर और शाम कहानी लिखने के बाद किसी दोस्त की बहुत तलब लगती है। जिसे थोड़ी सी कहानी सुनायी जा सके। लेकिन बैंगलोर में मेरी कहानी किसी को समझ में तो आएगी नहीं। कि इतना इंटेंस जीना ही क्यों है…क्या समझायें, कि हमेशा ये ऑप्शन नहीं होता कि एसी के टेम्परेचर की तरह इंटेंसिटी कम ज़्यादा कर सकें…इसका कोई रिमोट नहीं होता.

साथ लाए बैग में सब कुछ था, आईपैड, मैकबुक, तीनों नोटबुक्स, सारी कलमों में फ्रेश इंक, बहुत सारे पोस्टकार्ड्स…और मन में एक गहरा दुःख। ख़त लिखने को दिल किया…वर्ड डॉक्यूमेंट खोल के पढ़ा…इस ख़त पर मेरा नाम नहीं है, सिर्फ़ डियर राइटर…कि मुझे जाने बगैर, सिर्फ़ मेरे शब्दों से मुझे जाने वाला कोई मुझे इतनी प्यारी चिट्ठी लिख सकता है। क़ायदे से तो ऐसे लोगों से कभी मिलना नहीं चाहिए…कि हम तो इतने उलझे हुए, बेसब्र, परेशान से हुए रहते हैं। हमसे मिलने का कोई फ़ायदा नहीं है। टाइमपास भी नहीं, टाइमवेस्ट। ख़त इतनी बार पढ़ चुकी थी, ये भी लगा कि कैसे लोग हैं ना दुनिया में…उन्हें तारीख़ें याद रहती हैं, उन्हें नंबर्स समझ आते हैं…उनका समय तक का हिसाब ठीक है।

एक हम हैं, जिससे कल बिछड़े हैं, लगता है पिछले जन्म में मिलेंगे और दुखता ऐसे है कि अगले जन्म उनसे मिले बिना जीवन लगभग सारा बीत जाएगा। इसी बेनामी ख़त में बहुत सुंदर शेर लिखा मिला था

दुख ऐसा चाहिए कि मुसलसल रहे मुझे
और उस के साथ साथ अनोखा भी चाहिए
इक ज़ख़्म मुझ को चाहिए मेरे मिज़ाज का
या'नी हरा भी चाहिए गहरा भी चाहिए
- जव्वाद शेख 


उसका हिसाब थोड़ा भी पक्का होता तो गिन लेती न, कितने दिन बीते…कितने साल, कितने मौसम, कितने लम्हे…सड़क के साथ चलती नदी में कितना पानी बह गया। बहुत साल पहले हम अजनबी थे, बिल्कुल झूठी बात लगती है हालाँकि। उससे पहली बार मिलने पर भी अजनबी जैसा नहीं लगा कभी। ऊँचे पेड़ों वाले एक छोटे से शहर के किनारे किनारे नदी चलती थी। नदी के किनारे किनारे सड़क। सड़क पर छोटे छोटे पत्थर थे। नदी दिखने से ज़्यादा महसूस होती थी। ऐसा लगता था, कोई नदी बह रही है कहीं।

उस दिन ज़िद पर उतर आई थी कहानियों वाली लड़की, कि इस दिल को एब्सेंस से ज़्यादा presence की लत लग रही है, ऐसे में लतखोर दिल को थूर-थकूच के समझाना जरूरी था कि किसी के होने की आदत मत डालो…किसी को आवाज़ न दो। कोई है नहीं, इस भागते शहर में जो तुम्हारे बुलाने पर आ सके। सुनोगी तो मजबूरियाँ सुनायेंगे लोग तुम्हें, बहाने नहीं। इतना आसान थोड़े होता है तुमसे मिलना। लौंग राइड पर जाने के पहले जैसे बाइकर्स राइडिंग गियर पहनते हैं, वैसे ही तो दिल को पूरी तरह सेफ्टीगियर पहना कर लाना पड़ता है तुमसे मिलने। बहुत ताम-झाम है तुमसे मिलना, ऐसे नहीं होता कि कहो, पाँच मिनट में आ जाओ घर के नीचे, चलो, चाय पीने चलेंगे। उसको काल्पनिक किरदारों से मिलने के पहले पूरा तैयार होना होता था, साड़ी झुमके, बिंदी, परफ्यूम…लेकिन ज़िद इतनी भी होती थी कि बाल न उलझें…उससे कौन मिलेगा बिना तैयारी के…कोई भी नहीं तो। जो तुमसे नहीं मिलते, उनसे मिलने को काहे परेशान होती रहती हो। जो मिलना चाहते हैं, वाक़ई, जाओ उनसे मिल आओ।

मुझे लिखने के पहले बहुत से शहर देखने होते हैं। अहमदाबाद में एक पुरानी, रानी की वाव है। स्टेप-वेल…पत्थर की सीढ़ियों वाला कुआँ। याद नहीं बाओलियों के लिए मुझे इतना प्यार कब से उमड़ा…IIMC के अपने दोस्तों के साथ जब पहली बार एक स्टेपवेल देखी थी, तब से उनका सम्मोहन मेरे भीतर रहता है। मन के भीतर गहरे, कहानियाँ ऐसे ही रहती हैं।

सुबह साढ़े छह की फ्लाइट की टिकट साढ़े चार बजे कटायी…पंद्रह बीस मिनट में बैग पैक किया…और चालीस मिनट की ड्राइव है एयरपोर्ट की, सो बीस मिनट में आए, उड़ते उड़ते…दौड़ते हुए एयरपोर्ट के गेट से अंदर पहुँचे…जब वाक़ई प्लेन बोर्ड कर गए…तो दोनों मित्रों को ह्वाट्सऐप कर दिया, कि हम बोर्ड कर रहे…आ रहे हैं तुम्हरे शहर, लेकिन तुम परेशान मत होना. आराम से लंच पर मिलते हैं. और हमको एकदम ही नहीं लगा था, वे पहुँच जाएँगे.

अराइवल्स में बाहर निकलते ही देखा उन्हें…धूप थी. भली. वे भी. भले.
हम ऐसे मिले जैसे जन्मों के बिछड़े दोस्त हों…जैसे न मिलने का हिसाब किताब हम में से किसी को समझ नहीं आता…गाड़ी में बैठे, हम अपना सामान किसी को उठाने नहीं देते, लेकिन पता नहीं कैसे ये कुछ लोग होते हैं, आई insist वाले…कि मैं जाऊँगा ही नहीं तुम ऐसे बैग उठा के चलोगी तो…दूसरी बार मिल रहे थे। तीन साल हो चुके थे। और ये दोनों मुझे सिर्फ़ मेरे लिखे के कारण जानते हैं, प्यार करते हैं।

नाम लिखने का मन है, लेकिन नाम लेने से दोस्ती को नज़र लग जाएगी, इसलिए लिख नहीं रहे।
मैं, तुम, हम…कितना मुश्किल हो जाता है कभी कभी इन तीनों के साथ किसी किस्से को ज़िंदा करना।

पुरानी सीढ़ियों से उतर कर गई तो बहुत साल बाद उस गंध को पाया जो बचपन में गाँव में कुएँ की मुंडेर पर हुआ करती थी। मेरे गांव के घर में दो कुएँ थे, एक भीतरी आँगन में…एक बाहर गोहाल में, खेत के पास…और एक बड़ा इनारा, अर्थात्, बड़ा कुआं…जहाँ से पीने का पानी लाया जाता था। भीतरी कुएँ पर नहाना, मुँह हाथ धोना, और बर्तन माँजने का काम होता था। उन दिनों बर्तन और हाथ, दोनों राख से माँजे जाते थे।

सीले हुए पानी की गंध…मिट्टी और पुरानेपन की…कहानियों की गंध। ये ख़ुशबू मेरे भीतर अंधड़ की तरह उड़ती है…

मुझे अब अकेले घूमने की आदत हो गई है। दोस्तों की आदत छूट गई है।
रानी की वाव में पाँच तल्ले नीचे उतर कर पानी है। हम तीनों आसपास देखते हुए उतर रहे हैं। नक्काशीदार बलुआ पत्थर ऊपर में देखने से भुरभुरा लगता है। स्पंज की तरह सुराख़दार भी। नीचे के तल उतरने पर पत्थर छूने में खुरदुरा, ठंढा और सीला हुआ है। हम बातें कर रहे हैं। मुझे सब कुछ मायावी लग रहा। surreal, जैसे किसी कहानी के भीतर ही हैं। ऐसी पानी वाली ठंढी जगहों पर अजीब सा हौल फील होता है, सीने में…प्राचीन किसी दुख का होना। आत्मा में कुछ गहरा दुखना। दिल डूबता है।
मैं उन्हें देखती हूँ। सोचती हूँ, कितना अच्छा होता है, शहर में एक दोस्त होना भी।
चामुंडा चलते हैं, तुम्हारे सारे दुखों का इलाज वही है। मैं सोचती हूँ, कैसी जगह होगी…लेकिन कोई इमेज नहीं बनती। हम गाड़ी में जाते हैं…खुली हुई जगह है…मैदान जैसी, कुछ पेड़ हैं…वहीं बीच में बसा हुआ है…यह छोटा सा, चामुंडा. नखलिस्तान ही है. इतवार की सुबह है, एकदम अलसायी सी…लोग टेबल पर बैठे गप्पें कर रहे हैं…कुछ कुर्सियाँ हैं, सतरंगी धागे से बने कुछ छोटे स्टूल हैं…हम तीन कुर्सियों पर बैठ गए हैं…जूते मोजे उतार दिए हैं. पैर स्टूल पर टिका दिए हैं. 

छोटी छोटे काग़ज़ के कप में चाय…छोटी वाली गोल्ड फ्लेक…जेट फ्लेम लाइटर.
मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी ऐसी किसी दोपहर को नहीं जिया है…शायद इसलिए भी कि कॉलेज के दिनों में चाय पीते नहीं थे, न पॉलिटिक्स की ख़ास समझ थी। IIMC में पढ़ते हुए जब लोग चाय पीने टपरी पर निकलते थे, हम ऑलमोस्ट कभी नहीं जाते थे, ढाबा पर जाते थे तो खाने के लिए। चाय, सिगरेट, पॉलिटिक्स, ये तीनों मेरी ज़िंदगी में नहीं थे।
चाय हमको अब भी पसंद नहीं है। जैसे लोग सोशल ड्रिंकिंग करते हैं, वैसे ही हम चाय सिर्फ़ कुछ स्पेशल लोगों के साथ पीते हैं। ये स्पेशल लोग थे। ये स्पेशल सुबह थी।

इतनी बातें हम ख़ुद के लिए लिख रहे हैं, क्यूंकि बाद में सब कुछ भूल जाते हैं हम। दिन जल्दी शुरू करो तो वक्त धीरे बीतता है। ऐसा इतवार बचपन में ही मिलता था। पापा की छुट्टी रहती थी। सुबह रेडियो पर गाने चल रहे होते थे। मम्मी खाना बना रही होती थी। हम दोनों भाई बहन घास खोद रहे होते थे, कभी आलू उखाड़ रहे होते, कभी मटर छील रहे होते। फालतू के काम। झूला झूल रहे होते, दिन दिन भर। गर्मी छुट्टी के दिन।

कितना अच्छा होता है ना, जब किसी से कुछ नहीं चाहिये होता है। फिर जो भी मिलता है, सरप्लस ही होता है। भूख लगी थी ज़ोर से…दो प्लेट वेजिटेबल सैंडविच…खीरा टमाटर प्याज़, हरी चटनी और शायद चाट मसाला. गर्म. ताज़ा. इतना अच्छा स्वाद था. एक छोटू था, फ्लास्क और चाय के कप लिए घूम रहा था…हर कुछ देर में चाय पिला जाता था। 

कितने इत्मीनान से बैठे थे। कितनी सारी बातें थीं। बातें ही बस। लगातार चाय, सिगरेट, गप्प…लूप में. पानी की बोतलें. कहीं कोई शोर नहीं। कोई संगीत नहीं। कोई ackwardness नहीं…इतना सहज…जैसे कितने पुराने दोस्त हों. जैसे हम महीने की दो तीन इतवार तो वहीं पाये जाते हैं. ऐसी जगह, ऐसे लोग…कि अचानक से उस शहर में रहने को मन करने लगे। कितना कम चाहिए एक शहर से, लेकिन इतने पार्टिक्युअलर, कि बैंगलोर में सब कुछ मिलता…एक ऐसी दोपहर, एक ऐसी टपरी, दो ऐसे दोस्त और इतनी सारी बातें नहीं मिलतीं। इतना सा ही तो चाहिए, लेकिन। यही चाहिए। कोई और कॉम्बिनेशन नहीं।

कोई सिगरेट जला के पी हो, सो याद नहीं…जली हुई सिगरेट माँग माँग के पीते रहे…ये अलग था…ये अजब था…ये भीतर की किसी आग को बुझाता था…कोई दुख पे मरहम करता था। लोग क्यों पीते हैं सिगरेट, मालूम नहीं। हम हमेशा दोस्तों के साथ सिगरेट पीते हैं। सिगरेट अपने आप में एक किरदार है। किसी एक बार की सिगरेट, किसी दूसरे बार की सिगरेट जैसी नहीं होती। किसी एक दोस्त के साथ पी हुई सिगरेट, किसी दूसरे दोस्त के साथ पी हुई सिगरेट जैसी नहीं होती। हम अपने घर में बैठे, कभी सिगरेट पी भी रहे हैं तो ऐसे किसी रोज़ को याद करते हुए ही पी रहे। इत्ती इति सी गोल्ड फ्लेक…छोटी गोल्ड फ्लेक…कड़वी गोल्ड फ्लेक…दिल को जलाती, बुझाती…चारागर।

इम्पॉसिबल था यहाँ होना…ऐसे कैसे अचानक से खिंच के चले आए ना.
उसने ख़त में दिनों की गिनती लिखी थी…आख़िरी बार मिले हुए कितने दिन हुए.

मुझे रश्क हुआ उन दोनों से…कितना आसान था उनके लिए यहाँ होना…कितना मुश्किल और कितना rare है मेरे लिए, जो कितनों को सरलता से मिलता है।

जाना जितना आसान लग रहा था। लौटना उतना ही मुश्किल था।
गाड़ी से उतर कर गले लगे…गेट की ओर लौटे…दिल नहीं भरा…लौट लौट कर जाना चाहता था दिल. ये कौन से लोग हैं जो मुझ टूटे फूटे इंसान से इतना प्यार कर सकते हैं…तो क्या शहर की बात है? Bangalore finds me difficult to love. Impossible to love.
एक बार विदा करने के बाद, वो फिर से दौड़ कर साथ आई। गेट तक। हम दो बार गेट से लौटे। मैं वहाँ खड़ी उसे दूर जाते देखती रही। जब तक वो भीड़ में गुम नहीं गई।

मन नहीं भरा। मन कभी नहीं भरेगा।
फ़्लाइट में रोते सुबकते आई। मेरा कोई मायका है नहीं। बिन माँ की लड़कियों का मायका नहीं होता। लेकिन कभी कभी ज़िंदगी हमें ऐसे लोग दे देती है, जिनके पास हम लौट सकेंगे, ऐसा भरोसा होता है। कि वे हमारा इंतज़ार करेंगे। That they can love us in our worst form. That I can take them for-granted. हमेशा माँगते हुए ज़रूरत भर को हाथ फैलाने वाले हम, किफ़ायती लोग। ज़िंदगी उदार हो कर भेजती है, दोस्त, जान से प्यारे…जो बाँहें खोलते हैं और हमें समेट लेते हैं।

दिल दुखता है। लेकिन इसलिए कि भरा-भरा है।
और कुछ भी पूरी तरह ख़राब नहीं होता। सिगरेट भले बुरी चीज़ है, लेकिन हमारे लिए मरहम है।

ज़िंदगी के सबसे सुंदर मोमेंट्स की कभी तस्वीर नहीं होती। उससे बोला, चामुंडा की एक फोटो भेज दो…उसने जो भेजी है, उसमें एक कुर्सी पर बैग है, दो खाली कुर्सियाँ हैं…टेबल पर एक सिगरेट का पैकेट है…एक कप चाय.
मैंने अपनी ज़िंदगी में इससे उदास तस्वीर नहीं देखी।

दुनिया बदल रही है। हम जाने कब मिलेंगे फिर। लेकिन इस बदलती दुनिया में, मिल लिए। ये अच्छा है।
और अच्छे से ज़्यादा, ये काफ़ी है। 

19 March, 2026

कहो, कर सकोगे, अप्रेम में इतना, मेरे लिए?



मायावी लड़की, ख़ुद से डरती थी। जिसके इश्क़ में एक आँसू रो दे, उसकी आत्मा उसी एक कतरे में क़ैद हो जाती थी…फिर वो आँसू का कतरा जहाँ जज़्ब हो, प्रेमी की रूह का एक हिस्सा वहीं ग़ुम हो जाता था…फिर वे दुनिया में भटके भटके फिरते, कि जाने क्या छूट गया है…क्यों ज़रा खाली खाली सा लगता है, सीने के बीच ज़रा सा दुखता क्यूँ है। सिगरेट के कश में जो पुरसुकून सुख था, वो घट क्यों गया है। किसने मेरी ज़िंदगी का ज़रा सा सुकून ग़ायब किया है। सब कुछ हासिल कर के भी काफ़ी क्यों नहीं लगता…क्या छूट रहा है…क्या फिसल रहा है हाथ से…

काग़ज़ में जज़्ब होता आँसू का कतरा, तो कहानी बनता, उसे पढ़ते हुए हर अधूरे व्यक्ति को लगता, किसी ने उसकी रूह पर जरा सा मरहम लगा दिया है। कहानियों में कच्ची मिट्टी होती। इससे भरे जा सकते गहरे से गहरे ज़ख़्म। दो फाँक दिल पर लगा के जरा सी कहानी की मिट्टी, टांक देती लड़की अपनी हँसी के कच्चे धागे से ज़ख़्म। माचिस लिए घूमती। उसकी नज़र में इतनी तपिश थी, सियाह आँखें, कोयले जैसी। नज़र भर देखती तो आँच लगती, ज़ख़्म की मिट्टी पर खिलते अमलतास। बारिश में झूमते, नशे में…गुनगुनाते उसका नाम…मंत्र बाँधते, कि बिजली ना गिर जाये इस पेड़ पर।
रतजगों के बाद वे आँखें भट्ठी जैसी जलती थीं…कभी कभी आँसू भाप बन जाता। आसमान से बरसता। उसके ये अनजान प्रेमी फँस जाते बहुत तेज बारिश के बाद वाले किसी ट्रैफिक जाम में…सारी गाड़ियाँ खड़ी रहतीं अपनी जगह पर। वे एक ही सड़क के दो तरफ़ होते। एक दूसरे को नहीं देख पाते एक नज़र भी।
वे अजनबी थे, लेकिन जाते हुए एक बार लौट कर आते, हाथ मिलाने को…कि यकीन हो, छुआ हुआ सच है। लड़की हँसती, सिगरेट से जला देती उनकी उँगलियाँ। कहती, ज़ख़्म का निशान देखोगे तो पक्का याद रहेगा, कि मैं सच में थी।
सच तो कुछ भी नहीं था इस हर पल बदलती, युद्धरत दुनिया में…
इश्क़ और जंग में सब जायज़ है, कहती हुई लड़की किसी बहुत तेज बारिश की रात में पूरा भीगती लेकिन बारिश में गुम नहीं होता आँसू का वो कतरा जिसमें नाम घुला हो…वो कतरा चमकता…आसमान में… 
वो अजनबी हर बार जब बिजली कड़कते हुए देखता खिड़की से बाहर तो सोचता, ये उसके नाम का अक्षर हमेशा कैसे दिखता है सेकंड के क्षणांश में आसमान में लपकती रोशनी की लकीरों में…
तेज बारिश में गीली सिगरेट आसमान की ओर उठाती लड़की और आसमान को चैलेंज करती, उस लड़के को मुझसे जरा भी प्यार नहीं है, जो मैं झूठ बोलूँ तो इस सिगरेट को जला कर दिखा…भगवान हँसते, बेवकूफ लड़की, इतना सिंपल टेस्ट…आसमान से धरती की ओर बिजली लपकती और सिर्फ़ सिगरेट का सिरा जला कर ज़मींदोज़ हो जाती…
लड़की गहरा कश लेती, हँसती…यार भगवान, तुम भी ना, ये बिजली हमारे दिल पर गिरा कर क़िस्सा तमाम कर देते, इतना क्या सोचना है तुमको…एक मेरे मर जाने से कुछ भी तो हिसाब-किताब गड़बड़ नहीं होगा दुनिया पर…भगवान जी कहते, जरा-जरा मरो तुम इश्क़ में…पूरा मत मर जाना, जितनी बेवकूफ हो, उतनी ही प्यारी भी तो हो।

***
शहर दिल्ली से बेइंतहा मुहब्बत करने के कोई सुबूत नहीं हैं मेरे पास, सिवाए इसके कि किसी रैंडम से दिन बहुत मुश्किल से पायी हुई एक ख़ाली दोपहर में लिखने बैठी हूँ, कहानी मिजाज में घुली हुई है। मॉल का गेट सामने है। लोग इर्द-गिर्द हैं। मैं किसकी याद में हूँ, मालूम भी नहीं। मुहब्बत को तो उस शहर में भी याद करते हैं, जहाँ उसके होने का कोई ठिकाना नहीं होता। शहर दिल्ली में अभी पलाश और सेमल खिले होंगे। लोधी गार्डन में बोगनविला के उस पेड़ पर झूम कर गुलाबी रंग खिला होगा। हौज खास की इमारतों के पत्थर अभी पूरी तरह धीपते नहीं हैं। शाम को वहाँ बैठा जा सकता है। जिसे एक दिन ज़िद करके हौज खास ले गई थी, कि देखो, ज़िंदगी अभी कमरे से बाहर भी है। कि देखो, शाम के रंग सुंदर हैं। कि देखो, तुम्हरे अपने पर्सनल दुख के अलावा दुनिया कितनी बड़ी है। वो, जिसने उस रोज़ कहा था, तुम्हारे साथ यहाँ आ कर पता नहीं क्यों मन करता है कि फिर से पेंट ब्रश उठाऊँ और कुछ पेंटिंग्स बनाऊँ इस जगह की…वो, जिसने तड़प के कहा था, आज तुम्हारी बहुत याद आ रही है। आज आ जाओ बस, फिर किसी रोज़ नहीं आना। और मैं सिर्फ़ इसलिए नहीं गई थी, कि दो दिन ही लगते हैं दुखती हुई आदत के लिए। किसी से एक दिन मिलना हमेशा anomaly होता है, दिल कभी इस बात का यकीन नहीं करता कि उससे मिल कर जो महसूस हुआ था, वो सच का रूह में धँसा हुआ था। दिल कहता रहता है, एक्सेप्शन था वह, उतनी तेज धड़कना, वो ख़ुशी का फूल जो खिलता था, मुस्कुराता था, एक रोज़ का फूल था…उस पर भरोसा मत करो, वो गलती से बेमौसम खिला था। अभी वसंत आने में एक जन्म का फ़ासला है। वो लड़की नहीं थी, भरम थी। उससे दो बार मिल लोगे, लगातार, तो रूह में ज़ख़्म की तरह दर्ज हो जाएगी। फिर चुभेगी हर रोज़, एक तीसरी बार की मुलाकात की ज़िद लिए। कि स्पेस में भी ग्राफ प्लॉट करने के लिए दो वेल्यूज़ चाहिए होते हैं, एक्स एक्सिस के अलग, वाय एक्सिस के अलग। समय और स्थान। दो बार मिलने से यकीन हो जाता है कि किसी एक जगह पर, किसी एक वक्त में वो सचमुच थी। मरीचिका के पीछे क्यों भागना यायावर। सब कुछ भरम था उसका, किसी पुराने खंडहर में आती खुशबू हमेशा किसी प्रेत की होती है। किसी अधूरी इच्छा की…इन प्रेतों को इग्नोर करना ही सबसे अच्छा उपाय होता है। जैसे ही इनके होने का तुमपर असर पड़ने लगेगा, तुम्हें मालूम भी नहीं चलेगा और तुम्हारी घड़ी की सुइयाँ उलटी दिशा में घूमने लगेंगी। तुम गुज़रा हुआ सारा वक़्त लौटा लेना चाहोगे सिर्फ़ उस एक लड़की के साथ एक शाम, एक दोपहर, एक मौसम पहली बार जीने के लिए। तुम अपना जिया हुआ सब कुछ इरेज कर दोगे उसके लिए। वो जो है भी नहीं, जो कभी नहीं होगी तुम्हारे आसपास। उसने अनाधिकार अपनी साड़ी का आँचल तुम्हारी ओर बढ़ा दिया था कि इसमें धीपा हुआ, भीगा हुआ चेहरा पोंछ लो। वो अपनी साड़ी के आँचल में गाँठ बाँध लेती तुम्हारी ख़ुशबू…फिर तुम्हारी कलाइयों से कपास की गंध उठती और तुम सिगरेट पीते हुए अपनी कलाइयाँ जला लेते लेकिन उसके गीले बालों से उड़ती गंध तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ती। 

बरिस्ता ने कॉफ़ी टेबल पर ला कर रख दी, हम दिल्ली में थे, या ख़्वाब के किसी शहर में, अनायास ज़बान से शुक्रिया कहा, और आँख से आँसू उसी समय छलक गए। ऐसे कैफ़े में बैठ बिना मतलब एकदम अचानक आँसू से रो देने की वजह कोई माँग ले, तो क्या ही कह सकेंगे हम। कि लोधी गार्डन में सेमल के पेड़ों का वो छोटा सा जंगल क्या अब भी खिल के आसमान और ज़मीन दोनों को गहरा लाल रंगता है? कि शुक्रिया कहना दुखता है? कि कॉफ़ी कलेजा जलाती है? कि हम कुछ भी कर लें, इस तन्हाई के ख़िलाफ़ कोई मुकदमा जीत नहीं सकेंगे। कि इतने साल में भी आदत क्यों नहीं पड़ती। कहते तो हैं ना, कि “कफ़स भी हो तो बन जाता है घर, आहिस्ता आहिस्ता”, लेकिन किसी औरत ने क्यों नहीं लिखा कि घर हो जाता है कफ़स आहिस्ता आहिस्ता? कि भाग जाने के सपने में गाड़ी उलट जाती है, बस खाई में गिर जाती है। कि बारिश में भीगते हुए दोस्त की याद आती है तो इतना ही कह पाते हैं, वॉइस नोट भेज दिया कर, तेरी याद आती है। ग़ज़ब ज़िद में दुखती है तन्हाई।
***

मुझे कोई बहुत अच्छा लगता है तो उससे सिंपल सवाल पूछती हूँ, तुम्हारा सबसे पसंदीदा रंग कौन सा है…पता नहीं क्यों। शायद उस रंग को उसकी नज़र से देखना होता है। शायद उसकी नज़र से दुनिया देखनी होती है। मेरे पापा का सबसे फ़ेवरिट रंग हरा था। मैंने जब अपनी मर्जी की कलमें खरीदनी शुरू की थीं, तो मेरा सबसे पसंदीदा रंग हरा था। मेरे पास हमेशा एक हरे रंग का पायलट पेन जरूर रहता था। कुछ हादसे आपको कैसे बदल देते हैं ना, ज़िंदगी से कोई एक रंग चुरा लेते हैं। आप कह भी नहीं सकते, ऑलमोस्ट किसी से भी…कि आपको हरे रंग से डर लगता है।
धूसर रंग पसंद था उसे…मिट्टी के सारे रंग। मैंने कई बार ख़ुद को ऑफ वाइट या beige रंग की साड़ी में लपेटते हुए सोचा, वो मुझे देखता तो क्या कहता…क्या वो कहता कि मेरी पसंद के रंग की साड़ी में अच्छी लग रही हो। क्या उसे मालूम होता कि मैंने जो बस, ऐसे ही, लाइट कन्वर्सेशन जैसा सवाल किया है, उसके इर्द-गिर्द मेरी वार्ड-ड्रोब बन रही है? क्रीम पैंट और ब्लैक शर्ट का मेरा सबसे फ़ेवरिट कॉम्बिनेशन सिर्फ़ ब्लैक ऑन ब्लैक से हराया जा सकता है। यार, ब्लैक पहन कर मेरी जान लेने आते हो तो पहले वार्न कर दिया करो, हम दिल का जिरहबख़्तर पहन कर मिलेंगे तुमसे।

***

मेरे दिमाग़ में फालतू चीज़ें सेव्ड रहती हैं। शहर के स्पीडब्रेकर का नक्शा है। और मेरी ज़िंदगी की जिन चीज़ों को तुमने छुआ है, उनका भी…चाहे तुमने किसी कॉफ़ी कप से एक घूँट लिया हो, किसी ग्लास या बॉटल से मुँह लगा कर पानी पिया हो…किसी कॉफ़ी शॉप में लकड़ी के स्टिरर से चीनी मिलायी हो…मैं क्या करूँ कि तुम्हारी छुई हर चीज़ को उठा कर दिल के म्यूजियम में स्टोर करती गई हूँ।

***

तुम इक रोज़ भूल जाओ कि मैं कॉफ़ी में चीनी नहीं पीती, भगवान कसम, उसी रोज़ तुमको एकदम से भूल जाऊँगी। लेकिन इसके लिए किसी कॉफ़ी शॉप में मिलो तो सही…मेरे लिए अमेरिकानो ऑर्डर करो और उसमें अपनी कॉफ़ी की तरह, दो चम्मच चीनी डाल दो…
सिंपल है ना…कहो, कर सकोगे, अप्रेम में इतना, मेरे लिए?

15 March, 2026

वो मेरी रूह में उलझ गया है…मैं जिस्म से रूह को अलगा कर मर जाना चाहती हूँ।

दिल दुख रहा है। फिजिकल। क्यूँ। ठीक-ठीक क्या। डॉक्टर को दिखायेंगे तो कुछ भी नहीं निकलेगा। शायद।
लेकिन दिल थक गया लगता है। मुहब्बत को गुनाह की कैटेगरी में डाल कर ख़ुद को इतना तड़पाया है कि मुस्कुराने से घबराता है दिल। सुख और सुकून के लम्हे को ऐसे बरतता है जैसे जमानत पर रिहा हुआ क़ैदी आसमान के चाँद को देखता है। कचकते, कसकते हुए। भगवान कभी आयें और पूछें कि क्या चाहिए, तो हम मुहब्बत भी नहीं माँगेंगे। कहेंगे, ये दिल का दुखना बंद हो जाये बस। मरने की दुआ माँग नहीं सकते, वरना माँग लेते। 
आज ग़ज़ब दिन बीता है, सुबह लगभग ग्यारह बजे घर से निकले, कोई डेढ़ घंटे दूर गो-कार्टिंग ट्रैक था, वहाँ पर मिनी वालों ने मिनी चलाने के लिए लगा रखी थी। आप तेज चला कर कॉर्नरिंग देख सकते थे…ऐसा कहने को ठीक लगता है, पर असल में मिनी इतनी ज़्यादा पावरफुल कार है कि इतने छोटे ट्रैक पर ठीक से न स्पीडिंग हो पायी, न कॉर्नरिंग। लेकिन वहाँ मिनी की टीम थी, उनसे बात कर के अच्छा लगा। हमने कार के बारे में बात की, रेसिंग के बारे में बात की…मैंने उन्हें बताया कि हाईवे पर गाड़ी चलाते हुए ये मालूम चला कि तेज बारिश में भी बहुत तेज गाड़ी चला रहे हैं तो हुड खोल कर चलाने के बावजूद भीगते नहीं हैं। ये देखने में ग़ज़ब लगता है और इसका फिजिक्स हमको नहीं मालूम, पर प्रैक्टिकली ऐसा ही देखे हैं।
दोपहर में खाने के लिए पेपर ऐंड पाई चले गए, पास में था। वहाँ का अवोकेडो टोस्ट बहुत अच्छा लगता है। साथ में कहवा और अमेरिकानो पिये…याद आया कि हमको वो जगहें कितनी अच्छी लगती हैं जो हमारे दोस्तों ने बतायी हैं। इंदिरानगर में एक जगह थी, घर के पास, Antz Cafe…जेन लेकर गई थी वहाँ पहली बार कितने साल हो गए उस बात को…जेन से बहुत बहुत साल पहले मिली थी, वो सिंगापुर शिफ्ट हो गई तो ज़िंदगी से एकदम ग़ायब ही हो गई है, लेकिन उसके साथ पहली बार उस छोटे से कैफ़े में जाना दिल को इतना सुकून देने वाला था कि वो मेरी अपनी जगह बन गया। मैं वहाँ कई बार कई दोस्तों के साथ गई। कोई जगह क्यों अच्छी लगती है, कह नहीं सकते। कभी-कभी वहाँ का स्टाफ बहुत kind होता है। आपसे इतने प्यार से बात करता है कि आप भूल जाते हैं कि आपने कई दिनों से मुस्कुरा कर किसी को देखा नहीं है। मुझे हमेशा सफेद इमारतें बहुत अच्छी लगती हैं। ऐंट्ज़ कैफ़े में एक सिनेमन कॉफ़ी मिलती थी। उन दिनों अमेरिकानो का चस्का नहीं चढ़ा था। वहीं पर bruchetta मिलता था…ब्रेड के छोटे टुकड़ों पर टमाटर कटे हुए और थोड़ा शायद ओलिव आयल ड्रिज़ल किया हुआ…हम ऐंट्ज़ कैफ़े कई बारिश वाली दोपहर और शाम गए होते थे। अक्सर क्रिसमस लाइट्स लगी होती थीं। हर बार किसी दोस्त के साथ किस टेबल-कुर्सी पर बैठे थे, सो तक याद रहता था। गुज़र गए दिनों के दोस्त, अक्स की तरह दिखते थे। इंदिरानगर छूटा तो वाक़ई जो दोस्त थे, सारे छूट गए।
कितना आसान था उन दिनों, दोस्तों को फ़ोन कर के कॉफ़ी के लिए बुलाना। स्टारबक्स में तो अक्सर ही ऑफिस के बाद मिलते थे। मैं उन दिनों अपने नॉवेल पर काम कर रही होती थी। रात के एक बजे अपने ग्रीन वाली फ्लाइट पर घर लौटती थी। सपनीले दिन और रातें। याद की सारी चीज़ें सच नहीं होती हैं। बहुत कुछ हम अपनी कल्पना से मिला देते हैं, कुछ किसी कहानी का छूटा हुआ जुड़ जाता है। इन दिनों याद में दिक्कत होती है।
इस जनरेशन के पास कितने सारे और कितने अच्छे शब्द हैं। जिन चीज़ों को समझने में हमें कई किताबें लग जाती थीं…उनके लिए इनके पास एक शब्द है, situationship, ये अच्छा भी है और बुरा भी। मुझे जैसे उलझे हुए किरदार अच्छे लगते हैं, उतना उलझा हुआ क्या हर कोई होता है?
मुझे पहले लगता था मुहब्बत पर उम्र का कब्जा है। एक उम्र के बाद मुहब्बत दस्तक दे कर, इजाज़त दे कर आएगी। ऐसे नहीं कि पतझड़ का पत्ता जिधर तेज हवा चली, उड़ गया। कि एक्सिडेंटली नहीं होगी मुहब्बत, कि क्रश नाम की शय पर टीनेजर्स का एकाधिकार है। ईगो पर लग जाता है किसी का इस तरह बदतमीजी से दिल के दरवाज़े एकदम से हिंदी फिल्मी हीरो की तरह तोड़ कर भीतर घुस आना…फ़िल्मों में भी आजकल नेगेटिव किरदार ऐसे लिख रहे हैं कि समझ नहीं आता किससे प्यार करना है, किससे नफ़रत और किसके लिए वफ़ा रखनी है। हम किस तरफ़ के हैं?
सब तरफ़ espionage चल रहा है। दिल अपनी ही जासूसी कर रहा और सारे राज उसे बता रहा है जिसे सिर्फ़ आपके क़त्ल से मतलब है, कोई भी करे।
कायनात, भगवान, शैतान…हमने हर दरवाजे मत्था टेक लिया। कि बस, ये दुखना बंद हो जाये। इक रोज़ तो इस बेतरह दुखा और टूटा कि लगा जान चली जायेगी। रात के जाने कितने बजे थे लेकिन दोस्त को फ़ोन करके फ़ोन पर चीखे, रोए, तड़पे…
वांग कार वाई की एक फ़िल्म है, डेज ऑफ़ बीइंग वाइल्ड। उसका जो सबसे ख़ूबसूरत सीन है, वही उसका सबसे ख़तरनाक सीन भी। कि इक लड़का है, जो एकदम अनजान लड़की को दीवार से टिका कर कहता है, मेरी घड़ी की ओर देखो, एक मिनट बीतता है और फिर वह कहता है, आज से हम एक मिनट के दोस्त हो गए…इसे अब कोई नहीं बदल सकता, क्यूंकि अतीत को बदला नहीं जा सकता…और कि इस एक मिनट के लिए मैं तुम्हें ज़िंदगी भर याद रखूँगा।
वे प्रेम में होते हैं, साथ होते हैं और आख़िर को वो लड़का, उसे छोड़ देता है। लड़की बावलों की तरह रातों को शहर भटकते रहती है। ऐसे में इक रोज़ उसे एक पुलिस वाला मिलता है। वह पुलिस वाले को कहानी बताती है, कहते हुए कि जब उस लड़के ने यह बात कहीं थी, तो सुनने में बहुत अच्छा लगा था, लेकिन जब से उसने मुझे छोड़ा है, मैं रोज़ सोचती हूँ, वो एक मिनट भूलना कितना मुश्किल है। इस सबके बाद वो लड़की कहती है, मैं अगर सिर्फ़ आज की रात काट लूँगी तो फिर चीज़ें ठीक हो जायेंगी। सिर्फ़ एक आज की रात।
मेरे पास भी सिर्फ़ ऐसी रातें हैं। लेकिन कई रातें। मुश्किल वे रिश्ते नहीं होते जो टूट गए। मुश्किल वे रिश्ते होते हैं, जो बने ही नहीं। उनके पास खाद-पानी नहीं रहा कभी कि ज़मीन से झाँक सकें बाहर, धूप चख सकें, चाय-कॉफ़ी का अंतर पता कर सकें। पता नहीं, शायद इस दुनिया में मेरी तन्हाई का कुछ काम होगा…वरना ऐसे थोड़े है कि इतने बड़े शहर में लोग नहीं हों।
शाम में मिलन की किताब के बारे में बातचीत थी, अट्टा-गलाटा में। Heartbreak Unfiltered. नॉन-फिक्शन किताब है। कई तरह के दिल टूटने के किस्से हैं इसमें। किताब कब से पास में है, लेकिन पढ़ नहीं रहे, मन होते हुए भी। एक शाइनी उनसे सवाल पूछती हैं, कि क्या दिल टूटने से लोग मर सकते हैं, तो मिलन बताती हैं, कि किताब लिखते हुए उन्होंने स्टडी की और उनको पता चला कि दिल टूटने से सच में मर जाते हैं लोग।
हमने मुहब्बत को हमेशा रोमांस के चश्मे से देखा है, स्त्री-पुरुष के अलावा भी ऐसे प्रगाढ़ संबंध हो सकते हैं, ऐसे उदाहरण हमने बहुत कम पढ़े हैं। ऐसे रिश्ते होते होंगे, लेकिन हमने आमतौर पर प्रेम में दिल टूटने के सारे किस्से मुहब्बत के ही सुने हैं। नॉन-रोमांटिक जो क़िस्सा मुझे सबसे ज़्यादा पसंद है, वो वैन गो और उसके भाई थियो का है। वैन गो के छोटे भाई, थियो ने हमेशा वैन गो का ख्याल रखा, पैसा भेजते रहे और वैन गो के लिए क्या करना अच्छा रहेगा इसके बारे में भी खतों में लिखते रहे। दोनों भाई आपस में बहुत गहरे जुड़े हुए रहे…वैन गो के मरने के छह महीने के अंदर थियो की भी मृत्यु हो जाती है।
मुझे वैन गो बहुत पसंद हैं। इसलिए भी कि मेंटल हेल्थ बहुत ख़राब होते हुए भी उन्होंने बहुत सी पेंटिंग्स बनाईं। ये वैसा ही है जैसे बहुत डिप्रेशन में भी कोई लेखक लिखना जारी रखे। जैसे स्वदेश दीपक ने ‘मैंने मांडू नहीं देखा’ लिखी होगी। हमेशा मुमकिन नहीं होता है कि कला हमें बचा ले, लेकिन कई बार होता है कि कुछ रचना हमें डिस्ट्रक्टिव होने नहीं देता। हमें थोड़ा सुकून होता है कि जैसे एनर्जी को ना क्रिएट कर सकते हैं न डिस्ट्रॉय कर सकते हैं, वैसे ही दुख है…इसे सिर्फ़ दिल से निकाल कर काग़ज़ पर रखा जा सकता है। दुख को नष्ट नहीं कर सकते। अगर करने की कोशिश करेंगे तो दुनिया वैसे ही तबाह हो जाएगी जैसे एक इलेक्ट्रान को तोड़ कर नाभिकीय ऊर्जा को जन्म दिया जाता है। नार्मल केस में तो यही होता है एक एक व्यक्ति का दुख थोड़ा थोड़ा बहुत लोगों में बंटे…तब जा कर उसके दिल का बोझ थोड़ा हल्का होता है।
13th march. Friday. डायरी में लिखने के बाद भी कुछ चीज़ें इंटरनेट पर सहेजने का मन करता है। खास तौर से शुक्रिया दर्ज करने को…कि हमने जिसके लिए कुछ लिखा है, उस तक तो कभी नहीं पहुँचेगा, लेकिन शायद बहुत लोगों में बँटे तो हमारे सीने में चुभती खुखरी थोड़ी कुंद हो जाये.
कुछ चीज़ें कभी नहीं बदलतीं। मुझे इस दुनिया को उन चीज़ों के लिए शुक्रिया कहना चाहिए।
पता नहीं कितने साल बाद बात कर रहे थे, लेकिन दूर से ट्रेन की सीटी की आवाज़ सुनायी पड़ी फ़ोन पर। इस ट्रेन के सिग्नल से हमेशा लैंडलाइन वाले फ़ोन की याद आती थी। याद ऐसे ही आती है, बेसिरपैर की…उसके आने का न कोई ठिकाना होता है, न कोई तयशुदा वक्त। ग़लत लोगों के साथ होने पर, सही लोगों की याद आती है।
हमारे बीच कितने साल थे, मुझे मालूम नहीं।
मालूम बस इतना था कि इस दुनिया में बदन के इतने हिस्से हो नहीं सकते कि हर बार प्रेम करने पर दिल का टुकड़ा छोड़ आयें उसके पास, इसलिए हमने रूह के हिस्से किए…हर बार जब हमें मुहब्बत हुई। लेकिन उससे मिलने के बाद अफ़सोस हुआ कि काश रूह साबुत सलामत रहती…कि काश उसके पास रहते हुए किसी और हिस्से के लिए दिल टहकता नहीं।
मैंने सबसे ज़्यादा यही पूछा है, कि मुझे इतना गहरा प्रेम क्यों होता है…मुझे कम में जीना क्यों नहीं आता? मुझे इतनी याद क्यों आती है…आती है तो इस बेतरह दुखती क्यों है…इन सवालों का कोई जवाब नहीं होता। इस दुख की कोई दवा नहीं होती।
मुझे वो संगमरमर का फर्श याद रहता है, जिसकी ठंढी, कठोर सतह पर गिरती चाँदनी से दिल पर फफोले पड़ते थे…उस चाँदभीगे फर्श पर तड़पते हुए इक रोज़ सोचा था, काश कभी ऐसा होता, उसे एक क्षण के लिए सही पर इस ताप, इस दाह का अंदाज़ होता…एकदम ठीक ठीक ऐसा नहीं और इतनी देर तक तो बिल्कुल नहीं…पर जैसे आँच को छू कर उँगली जल जाती है, उतना सा छू सके विरह उसको…लेकिन इस विरह में उसकी आँखें जलेंगी तो मेरे दिल के अमलतास और पलाश के जंगल झुलस जाएँगे ये कहाँ मालूम था मुझे।
नया नॉवेल लिख रही हूँ, यहाँ पर लोगों ने अपनी फीलिंग महसूस करनी बंद कर दी हैं। बस कुछ ही लोग हैं, जिनका दिल थोड़ी तेज धड़कता है…यहीं एक किरदार है, ब्लैक शर्ट में जानलेवा दिखता…मुस्कुराता तो उसकी धार से काट लेती कलाइयाँ। वो पास आता है, इतना कि जिसे क़रीब कहते हैं…उसकी आवाज़ बहुत दूर से आ रही है…लैंडलाइन फ़ोन के ज़माने में हैं हम दोनों…मैं खिड़की पर खड़ी चाँद के उगने का इंतज़ार कर रही हूँ, वो तड़प कर कहता है, ‘कोई एक पूरे जन्म मेरे पास रह जाना…जाना मत।’
मैं काग़ज़ पर जल्दी से डायलॉग को लिखती हूँ। कलम के पाउच से खोलती हूँ कई रंग की कलमें, स्याही कौन सी है उसके शर्ट के रंग की…और उसकी आँखों के रंग की?
मैं चीखना चाहती हूँ, लेकिन काग़ज़ कोरा रहता है…
वो मेरी रूह में उलझ गया है…मैं जिस्म से रूह को अलगा कर मर जाना चाहती हूँ।

18 February, 2026

क्या कहें, उस अजनबी से…तुम इतनी कड़वी सिगरेट न पिया करो, मेरा कलेजा जलता है!

The small things. Always the small things. 
सिगरेट कैसे भी पी लेने वाली चीज़ नहीं है। इससे जुड़ी हर छोटी-छोटी चीज़ से फ़र्क़ पड़ता है। मुझे सबसे अच्छी लगती है माचिस। उसमें भी लकड़ी की तीली वाली माचिस, जो लगभग चार सेंटीमीटर लंबी हो। वो जो काग़ज़ के ऊपर मोम लगा कर बनायी हुई तीली होती है, वो हमको एकदम भी अच्छी नहीं लगती। एक तो वो इतनी छोटी होती है, कि जलाते हुए हमेशा लगता है हाथ जल जाएगा। लकड़ी की छुअन, उसकी तासीर जलने की होती है। लगता है, इसे जलाया जा सकता है, इसे जलाया जाना चाहिए।

जैसे मुर्दा होता है ना। उसे छोड़ नहीं देते। उसे सूरज डूबने के पहले फूँक देते हैं।

माचिस आजकल रखना बंद कर रहे लोग, अधिकतर लोगों के पास लाइटर होता है। मुझे लाइटर सबसे अच्छा लगता है जिप्पो। पहली बार अनुपम के पास देखे थे। जिप्पो को जलाने, बुझाने का एक रिदमिक तरीक़ा होता है। फ़िल्मों में अक्सर देखा है, असल ज़िंदगी में कभी कभी। लेकिन जो जलती फ्लेम के एक झटके में खट से लाइटर के ढक्कन के बंद होते ही बुझ जाने का मजा है, किसी और चीज़ में नहीं। प्रैक्टिस कर कर के, हम भी सीख लिए हैं। स्ट्रेंजली मेरे दो अच्छे बॉस रहे, दोनों को जिप्पो पसंद था, और उनके पास हमेशा रहता भी था।

क्लिपर का लाइटर अच्छा लगता है मुझे, उसका जो गोल सा आकार होता है और ढेर सारे प्रिंट्स होते हैं। बहुत सारे अच्छे रंग भी। ब्लिंक-इट पर आजकल स्टैश प्रो के लाइटर मिलते हैं, वो भी अच्छे होते हैं। ये दोनों अगर नहीं रहे, तो नॉर्मल पान दुकान पर जो ट्रांसपेरेंट सा लाइटर होता है, १०-३० रुपए में मिलता है, फिर वो लाइटर भी चलता है।

मिनी का हुड ओपन रहता है, इसलिए उस में सिगरेट पीने में बहुत मज़ा आता है। उसमें जो लाइटर है, वो एक तरह का कॉइल नुमा होता है, जैसे पुराने ज़माने का हीटर होता था ना, वैसा। उसमें फ्लेम नहीं होती। धीप के लाल हो जाता है। तो चलती गाड़ी भी थोड़ा स्पीड घटा कर उसी से जला लेते हैं। वैसे अब तो इतना प्रैक्टिस हो गया है कि चलती गाड़ी में नॉर्मल लाइटर से भी सिगरेट जला लेते हैं। बैंगलोर में गाड़ी तो धीरे ही चलती है रोड पर। एक तो इतना स्पीडब्रेकर, उसपर गड्ढा।

एक होता है, जेट फ्लेम लाइटर। जिसमें फ्लेम दिखती नहीं है लगभग, पर बहुत तेज जलती है। यह विंड-प्रूफ लाइटर होता है। इसमें लौ नहीं होती है, बहुत तेज़ी से और बहुत ज़्यादा तापमान पर आग निकल रही होती है। बच्चे इससे हाथ न जला लें, इसलिए हम ये वाला लाइटर कभी नहीं ख़रीदते। एक बार मजबूरी में ख़रीदे भी थे, चलती गाड़ी में आदतन लाइटर जलाये और एकदम बीच हथेली जला लिए। उसके बाद कभी दूसरा विंड-प्रूफ लाइटर हम नहीं ख़रीदे।
***

सिगरेट के कुछ अलिखित नियम क़ानून होते हैं या नहीं, मालूम नहीं। लेकिन किसी को लाइटर देते हैं, किसी के लिए लाइटर जला देते हैं…कि पास आ कर सिगरेट जला लो। लेकिन किसी के लिए सिगरेट जलाने को लाइटर जला देना, जला पाना, एक क़िस्म की क्लोज़नेस या इंटिमेसी होती है। ये मुझे तब पता चला जब हम ऐसे ही अपनी सिगरेट जलाये और लाइटर बढ़ाने की जगह जला दिए…ये प्रोसेस कितनी सुंदर होती है, हमको पूजा पाठ का ढेर मालूम नहीं, नियम क़ानून भी नहीं फॉलो करते, लेकिन सिगरेट comes closes to being spiritual, for me…लाइटर की फ्लेम को हथेली से ढके हुए, किसी की ओर बढ़ा देना, दिखने में जितना सरल लगता है…कभी कभी होता नहीं। इक रोज़ ऐसे ही एक दोस्त ने सिगरेट जलायी, फिर दूसरे की बारी आई तो हम लाइटर की फ्लेम बुझा कर उसके हाथ में सिगरेट दे दिए…कि तुम ख़ुद जला लो। हम इतने बदतमीज़ हो जाएँगे, कभी ऐसा सोचे नहीं थे। It was rude, uncharacteristically rude. I still think about it, sometimes.

सोशल जीवन में, कुछ चीज़ों के वास्ते हमें किसी के क़रीब होने की इजाज़त होती है। करीब यानी की किसी के पर्सनल स्पेस में प्रवेश करना…यानी एक फुट रेडियस का घेरा जो हम अपने दोस्तों के इर्द-गिर्द भी मेंटेंन करते हैं, उसके भीतर आना…जो हमारे सच में करीबी नहीं हैं, उनके भी…क्यूंकि प्रैक्टिकल वजह है।

फ्लेम वाला लाइटर जलाना होता था तो अक्सर उसकी लौ ना बुझे इसके लिए कुल जमा तीन हाथ चाहिए होते थे, एक हाथ लाइटर जलाने के लिए और दो हाथों से फ्लेम को ढका जाता था ताकि वो ना बुझे और कोई सिगरेट जला ले। अब इन हाथों के दो ही कॉम्बिनेशन होते थे। या तो आप किसी के लिए लाइटर जलाओ, वो अपने दोनों हाथों से लाइटर की लौ को ढके, और उससे सिगरेट जला ले…या, आप एक हाथ से लाइटर जलाओ, एक हथेली आपकी हो, दूसरी हथेली दोस्त की…आप दोनों की हथेलियों से लपट ढकी जाये और फिर कोई सिगरेट जलाये।

ये सब हम जितना ध्यान से देखते और स्लो मोशन में अपने दिमाग में रिवाइंड करके प्ले करते हैं, असल में इतना सोचना होता नहीं है सिगरेट जलाने में…सब कुछ जैसे ऑटो-पायलट पर होता है। वैसे ही जैसे दोस्तों के साथ जब साथ में खाना खाने जाते हैं तो फ़र्क़ नहीं पड़ता कि किसने मेनू में क्या आइटम मंगाया है, जिसका भी आइटम पहले आयेगा, सब लोग उसी पर टूट पड़ेंगे।

आपने सिगरेट जलायी, बारी बारी से सब या तो लाइटर से जलायेंगे, या आप लाइटर जला दीजिए, सब पास आ आ कर सिगरेट जला लेंगे…

फिर आता है विंडप्रूफ़ लाइटर। फ़र्क़ ही नहीं पड़ता उसको किसी हथेली से। उसे किसी हवा से बचाने की जरूरत नहीं होती। इन फैक्ट, क्यूंकि उसकी फ्लेम बहुत तेज होती है और धूप वग़ैरह में दिखती नहीं है, तो उस लाइटर को हाथ से ढकना खतरनाक भी है। कुछ लोगों को खतरों से खेलने में मजा भी आता है। ऑटोपायलट पर चल देते हैं…मज़े से, ये सोचे बगैर कि शायद किसी के दिल को आँच लग जाये।

भोर की धूप में सब कुछ अच्छा दिखता है। लेकिन मैंने उसे देखा नहीं था। न मैंने लाइटर की फ्लेम को देखा। मालूम था वो जेट लाइटर रखता है। धूप में उसके अँगूठे और तर्जनी का हिस्सा चमक रहा था…ये जेट फ्लेम को कप क्यों कर रहा है, यह बुझेगी थोड़े…क़ायदे से हमको यही सोचना था, लेकिन हमारे दिमाग़ में पहला ख्याल आया कि उसका हाथ कितना सुंदर है…ज़बान से फिसलने ही वाला था वाक्य, कि तेरा हाथ कितना सुंदर है…मगर फिर सिगरेट जला चुके थे और एक गहरा कश…ऊपर वाले से शिकायत…काहे चैनल बदल बदल कर हमारे दिल तक आते हो? तुमको एंटरटेनमेंट के लिए किसी और का दिल नहीं मिलता कभी?

बहुत बहुत साल पहले ऐसे ही देखा था, उसका हाथ…कत्थई पत्थर की अंगूठी…किताबें। वो छुप के सिगरेट पीता था। याद नहीं उसे देखे हुए कितने साल हो गए। क्या अब भी सुंदर होंगे उसके हाथ!

धुएँ के पार सब कुछ सुंदर दिखता है। हमको सिगरेट पीना छोड़ देना चाहिए अब। या कमसेकम, सिर्फ़ अकेले में पिया करें। जान की आफत होती है ये सिगरेट कमबख़्त। कलेजा जलता है।

सिगरेट जलाने के लिए के लिए उसने लाइटर ऑन किया और हथेली से ढका, जैसे मैं कॉफ़ी कप तक रखती हूँ हथेली…जब किसी दोस्त का हाथ पकड़ के बैठे रहने का मन करता है। दोस्त ही तो। वो तो अजनबी था। हमको क्यों अजनबियों के साथ सिगरेट पीनी थी। मैंने पता नहीं क्यों, गौर से उसका हाथ देखा। इतना सुंदर हाथ था उसका, खूबसूरत कहते हैं जिसे। मन हुआ कहने का, लेकिन नहीं कहे। नहीं कह पाये।

होता है न कभी कभी, दिल pronoun भूल जाता है। दिमाग़ वाक्य फॉर्म नहीं कर पाया। उसको तू बोलते हैं, तुम बोलें या कि इंग्लिश में, you कह दें…इतनी मुश्किल बात नहीं थी। फिर ज़ुबान पर अटकी क्यों?

दो सिगरेटें।

क्या हमने कोई बात की? याद नहीं। शायद नहीं। चुपचाप सिगरेट पी रहे होंगे। धूप कितनी सुंदर थी। मन कितना हल्का था। सूरजमुखी खिला हुआ। “थी वस्ल में भी फ़िक्र-ए-जुदाई तमाम शब, वो आए भी तो नींद न आई तमाम शब”। बहुत दिन बाद ऐसा हुआ कि किसी के पास खड़े हैं और उसका चला जाना दुख रहा है।

अचानक से उसके हाथ देखे। कहने वाली थी, कितने सुंदर हाथ हैं तुम्हारे। कहा नहीं।


The heart is bitter. And broken.
The heart is longing. And searching.

हम मशीनों को समझदार बना रहे हैं।
और अपना ख़ुद का दिल ही कुछ सोचने समझने के लायक नहीं रहता।
इतना बेवकूफ क्यों होता है दिल।

प्रेम, इश्क़, मुहब्बत…इन शब्दों से दिमाग़ में कोई इमेज नहीं बनती। एक ही सटीक शब्द होता था…बचपन में खूब सुना था…crush. 
क्या खतरनाक बला होती है ये कसम से! लगता है कोई ट्रक गुज़र गया है ख़ुद के ऊपर से…कभी लगता है धुर्मुस से कोई एकदम पूरे बदन को बराबर में कूट-कूट के मिट्टी बना गया है। लगता है कि मर के भी चैन नहीं आयेगा। और दुख तो इतना होता है, इतना होता है कि लगता है जान चली ही जाएगी इस बार।

लेकिन बच जाते हैं तो मन मेटाफर ढूँढता है।
कपूर की तरह होता है क्रश।
एक लौ लगती है और भभक के जलता है। जब तक आख़िरी कतरा हवा न हो जाये। कैसी ख़ुशबू होती है हथेली में। कैसा मोहक होता है उसका जलना। आरती लेते हैं, पानी से नीछते हैं। अर्घ्य ईश्वर तक पहुंचता है। हम कहते हैं, प्रभु…किसी और का दिल जला लो ना, इतने साल हो गए…और क्या बच्चे की जान लोगे! 

अपनी तासीर समझ आती है। हम प्यार मुहब्बत के लिए नहीं, यारी दोस्ती के लिए बने हैं। कितना ख़ुश रहते हैं दोस्तों के साथ। कितना कलपते हैं जब इश्क़ होता है। उसपर भी बिना किसी वार्निंग के। दिमाग़ इतने अल्टरनेट वर्ल्ड के इतने परम्यूटेशन कॉम्बिनेशन बनाता है कि core dump हो जाता है। समझ नहीं आता कि हम जो देख, सुन, समझ रहे हैं उसमें कितना सच का है और कितना हम ख़ुद मैन्युफैक्चर कर लिए हैं।

आग मेरी सबसे पसंदीदा चीज़ है और बर्फ शायद सबसे नापसंद। हम बहुत गर्मी में भी ठंढा पानी पी लें तो गला ख़राब हो जाता है। हम सिर्फ़ किसी परिचित के कहने पर बर्फ के टब में कूद जायें…ऐसे तो हैं हम…

बॉडी इतने शॉक में थी कि कुछ सोचने समझने तो रहने दो, महसूसने से भी परे थे। इसके लिए ही टर्म है, comfortably numb. दो घंटे की हाई इंटेंसिटी ट्रेनिंग की थी। बदन पूरा धीप रहा था। आसपास बर्फ के क्यूब्स थे। तो पानी तो ठंढा ही होगा। पर कुछ फील क्यों नहीं हो रहा! न बर्फ ठंढी लगी, ना उसका हाथ गर्म, जिसने हाथ थाम कर बर्फीले पानी से बाहर निकाला। दिल, दिमाग़, बदन…सब एक साथ काम करना बंद कर देते हैं कभी कभी।

क्या कहें, उस अजनबी से…तुम इतनी कड़वी सिगरेट न पिया करो, मेरा कलेजा जलता है! 
वो पलट के जो कह दे, लो बुझा दी तुम्हारे लिए...अब कभी नहीं पियेंगे। फिर? फिर क्या करेंगे हम!

हम Ice-Burst पीते हैं, क्या होता है उससे? दिल में जमे ग्लेशियर पिघलते हैं? नहीं ना...

हमेशा थोड़े कह सकते, तुम अच्छे लगते हो हमें...ये भी तो कह सकते हैं कभी कभी, पागल लगते हो!

फिर रहने ही दो ना...जान ही देनी है तो क्या फ़र्क़ पड़ता है कि क़ातिल का फ़ेवरिट क्या है...खुखरी, भाला, गोली...
या कि चुप्पी। 

06 January, 2026

Have you met the wild women that have mysteriously obscure windmills in their hair?

Have you met the wild women that have mysteriously obscure windmills in their hair? When they drive fast on open roads past midnight…the city air feels as free as they are…the windmills create electricity and they come back to their work-desk, charged by the mad, wild, wind…racing through their hair…

They feel indestructible then. The women that thrive on coffee. Prowling their house full of people like time-thieves. They need just a couple of moments, alone, in order to survive the next day.

Do you know women feel like a live time bomb, most of their life? Something is always ticking inside their heart. But it’s been such a long time living with the bomb that they have forgotten if they are a part of the bomb diffuser squad or the bomb detonating one.

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I’ve often raced like mad to catch a fleeting glimpse of one such woman. Sometimes, she does appear in the rear-view mirror of my Mini Cooper Convertible. They don’t write, “Objects in the mirror are closer that what they might appear”, on these mirrors anymore. Someone believes, all of us already know this fact. Though, we could all do with a reminder, some days, I guess. I might just cause an accident in order to touch her…one of these days. My palpitating heart calms down when it sees her. I should be scared though, the way most people are scared of ghosts. But I can’t ascertain the time to which she belongs…future or the past, definitely not the present…timeless in a way I can’t fully comprehend. We are born fearless and slowly learn to be afraid, a mix of causality and probability we pretend to understand.

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3:00 a.m., January the 6th, 2026.
मुझे मैकबुक पर लिखने के पहले काग़ज़ पर लिखना ज़रूरी होता है। जब तक इंक पेन से काग़ज़ पर न लिखूँ, सतरें नहीं लगतीं। साँस ज़्यादा रैंडम चलती है। लिखने के लिए साँस का एक लय में आना जरूरी होता है। इतनी देर रात सब कुछ एकदम शांत है। सिर्फ़ कीबोर्ड की आवाज़ आ रही है। निब का काग़ज़ पर चलना, टाइपिंग की आवाज़, सिगरेट का कश खींचते हुए जलते तंबाकू के पत्तों की मद्धम आवाज़…ये मेरी बेहद पसंद की आवाज़ें हैं। रात इसलिए भी अच्छी लगती है कि ये आवाज़ें दिन में इस रिदम के साथ सुनायी नहीं देती। जब से मुझे लिखने का होश रहा है, मेरे सोचने की भाषा हिंदी रही है। लेकिन मेरे बच्चे दिन भर अंग्रेजी में ही मुझसे भी बतियाते रहते हैं इसलिए मैं देखती हूँ कि आजकल पर्सनल भी कुछ लिखना होता है तो शुरुआत हमेशा अंग्रेजी से होती है। हाँ एक दो पैराग्राफ के बाद मन थक जाता है और अपनी आसान मातृभाषा की ओर लौटता है।

2025 कमाल का साल था, कुछ अर्थों में। जिसमें सबसे मजेदार चीज़ रही कि मैंने यह साल हांगकांग में शुरू किया। हम 31 January को हांगकांग पहुँचे थे। तो इस साल मुझे एक्स्ट्रा डेढ़ घंटे मिले। कि मेरा साल 2025, भारत के डेढ़ घंटा पहले आ गया था। साल की शुरुआत में एक बेहद सुंदर घर था, जिसमें बड़ा सा लॉन था। गहरी गुलाबी बोगनविला थी, गराज में झूलती हुई। जब भी मिनी कूपर बाहर निकालती, पहले गुलाबी झालर आती फिर नीला आसमान। गराज से गाड़ी निकालना अपने आप में बेहद सुंदर था। इस साल मैंने अपनेआप को ठहरने की इजाज़त दी। मेरे जुड़वाँ बच्चे हैं, मुझे अपने बच्चों का बचपन एक ही बार मिलना था। जैसे अधिकतर दो बच्चों की मम्मी को होता है, कि बचपन दो बार मिलता है…मेरे साथ नहीं था। लगभग पूरे समय घर पर रहने और एक भी सोलो ट्रिप नहीं करने के बाद भी मैंने महसूस किया, कि वक्त कभी पूरा नहीं पड़ता। हमेशा कम लगता है। बच्चों को भी लगता है कि मैं उनके साथ समय नहीं बिताती, मुझे भी लगता है, मैं उनके साथ ज़्यादा समय नहीं बिता पा रही। मैंने कुछ लिख नहीं रही, पढ़ नहीं रही…तो फिर ये समय जा कहाँ रहा था!

मैंने बच्चों को समझाया। आप किसी से प्यार करते हैं तो ये ज़रूरी नहीं है कि वो हर वैसी चीज़ करे, जिसमें आपको ख़ुशी मिले। Part of loving someone is letting them do things you don’t want them to do…this is called freedom…and this is a very important part of loving someone. वे धीरे-धीरे समझेंगे, मुझे मालूम है। बच्चे समझदार होते हैं। पर उसके पहले उन्हें बिल्कुल नासमझ होने का और बहुत सारा प्यार और समय मांगने का पूरा हक है। मुझसे जहाँ तक हो पाता है, मैं अपने हिस्से का वक्त उनके नाम करती हूँ। There are no rules of motherhood. We are doing the best we can. Really. The full time mothers, the part-time workers, the work from home mothers, the ones that are on a break. All of us. While being mothers, we are slowly being erased from everywhere…we do notice this…and yet choose silence and peace over protest on most days. I’ve realised, I have got my superpower back…making friends…and this time not over writing, because I hardly write anymore…but over motherhood. I’m friends with class-mates of my kids…as casually as I became friends with people who felt too deeply and wrote about the world with an urgency as if not noticing the mood would actually cause it to disappear. Theoretically, It will, but also, no one ever looking at the moon is actually impossible.

Diary by khwaab tanha collective
I have a traveling heartache. जब दिल दुखना बंद होता है, तो दर्द कहीं और शिफ्ट कर जाता है। Logically or medically समझ नहीं सकते, शायरों को समझ आता है, दुष्यंत कहते हैं ना, “सिर से सीने में कभी पेट से पाँव में कभी इक जगह हो तो कहें दर्द इधर होता है”। कुछ न कुछ दुखता रहता है। जयपुर गई थी, आख़िर नवंबर में तभी पैर में चोट लगी थी। हल्का दर्द था तो इलाज की जगह, इग्नोर कर दिया। इधर शिफ्टिंग में इतना ज़्यादा चलना फिरना हो गया कि पैर में दर्द उठ गया था बुरी तरह। हाथों में दर्द अलग। 

अभी चार तारीख को घर शिफ्ट किया है। कितने भी अच्छे पैकर्स एंड मूवर्स बुलवा लो। कितना भी कहो कि किताबें प्यार से, अच्छे से पैक करना…वे किताबों का सत्यानाश करने के लिए पूरी तरह सक्षम होते हैं। सामान सिर्फ़ लोड कर कर दूसरे घर पर रखने में रात के साढ़े नौ बज गए। बॉक्स को लेबल करने के बावजूद इन्होंने मेरी किताबों के बक्से उन कई सारे बक्सों में कहीं मिला कर रख दिया कि खोजते खोजते नहीं मिला। आख़िर को रात दस बजे के आसपास निकलने के ठीक पहले उन्होंने मेरी किताबों के बक्से ला कर रख दिए। बुकरैक अभी दीवार में फ़िक्स नहीं हुआ था इसलिए किताबें वहाँ रखना ख़तरनाक हो जाता, बच्चों का घर है। नौ बजे मैं बच्चों को सुलाने चली गई थी। दिन भर की भयंकर थकान थी। फिर भी रात के डेढ़ बजे नींद खुल गई। किताबों को कार्टन से निकाले बिना सो नहीं सकती थी। मालूम था नींद नहीं आएगी। मुझे पहले बार समझ में आया कि कैसे कुछ औरतें रात को किचन का काउंटर तब तक पूरी तरह साफ़ नहीं कर लेतीं, उन्हें नींद नहीं आती। रात को कम आवाज़ के साथ कार्टन पर लगा टेप निकालना अपनेआप में मुश्किल था। लेकिन धीरे-धीरे उसे काटा। चार कार्टन किताबें निकालीं। किसी तरह टेबल पर ऊँची ऊँची मीनारें बनाईं, ढेर सारी किताबें टीवी रैक पर रखीं। फिर चैन से जा कर सो गई।

फिर अगले दिन movers आ कर सामान अनपैक कर के गए। दिन भर उनके साथ लगी रही। दोपहर बच्चों को स्कूल से लाने के बाद थोड़ी देर आराम किया। फिर से कुछ-न-कुछ काम लगा रहा। इलेक्ट्रीशियन, इंटरनेट, प्लम्बर, कारपेंटर... नौ बजे सोने का टाइम, कि कल स्कूल भी जाना है। दस बजे तक तो जगी हुई थी, बच्चों के साथ, फिर नींद आ गई। कुणाल जब सोने आया तो उससे पूछे, टाइम कितना हो रहा है। वो बोला साढ़े बारह लगभग। हम पूछे, exactly कितना, तो बोला बारह अट्ठाइस। फिर पूछा, कि काहे। तो कहे कि चाय पीने का मन कर रहा है। उसको मालूम है, रात बारह बजे चाय पीने का मन कर रहा है मतलब किचन में चाय बना के पीने का नहीं, इसका मतलब गाड़ी लेकर बाहर जाने और चाय की दुकान चाय पीने का मन कर रहा है। तो बोला, इतनी रात में कहाँ जाएगी, थक गई है। सो जा, कल जाना। हमको मालूम था, दो मिनट में स्वेटर पहन कर, जूता पहन कर तैयार हो सकते हैं। जैकेट पहनने में एक मिनट और लगता, लेकिन देर हो जाती। तो कैलकुलेशन सही था। घर से स्टारबक्स वैसे तो आधा घंटा है, लेकिन रात को गाड़ी उड़ाते जायें तो बीस मिनट में पहुँच सकते हैं। जैसे ही कपड़ा पहनने उठे, बोलता है, इतनी रात को कुछ नहीं मिलेगा। और हम जो स्टारबक्स रेगुलर जाते हैं देर रात, जानते हैं कि भले बिल न हो, लेकिन कॉफ़ी तो मिल ही जाएगी चाहे ठीक एक बजे पहुँचें। तो इसी कॉन्फिडेंस से बोले, कि हमको मिल जाएगी। आँधी की तरह उड़ते हुए गाड़ी में बैठे और उड़ते उड़ते स्टारबक्स ठीक 12:55 में पहुँच गए। और ठीक, कॉफ़ी मिली, कि पेमेंट बाद में कर दीजिएगा। पता नहीं कैसे, लेकिन स्टारबक्स के सभी स्टोर्स में उन्होंने इतने अच्छे कस्टमर रिलेशन बना के रखें हैं, कि it feels like home. Always. अभी जब चीज़ें flux में हैं। पिछले घर से शिफ्ट कर गए हैं, नए घर में सेटल नहीं किए हैं। इस तरह देर रात गाड़ी में गाना बजाते, एक तरफ़ से थोड़े घिसे चाँद के नीचे कॉफ़ी की जादुई ख़ुशबू की तलाश में ड्राइव करते हुए लगता है…I’m home.

घर सिर्फ़ लौटने की जगह ही तो है।

इस घर में पूरब को खुलने वाली खिड़की तो है, पर उसमें पल्ले नहीं हैं, तो खुलती नहीं है। लेकिन ठीक है। सब कुछ तो कहाँ मिलता है किसी को। धूप खा के सूरज देख के संतोष करेंगे और क्या। बड़े शहर में खुला आसमान ही बड़ी बात है। यहाँ तो पूरब की खिड़की भी है। और पश्चिम वाली खिड़की तो खुलती भी है। इस साल ज़्यादा सोचेंगे नहीं। जितना जर्नलिज्म में सीखा था, सो जितना देखा-जिया है। उसको लिखेंगे बस। घर आ कर टेबल पर सामान जमाये तो देखते हैं Utopia का I गिर गया है। सोचे ठीक ही तो है, मेरे बिना थोड़े ना हो जाएगा, सब कुछ...परफेक्ट और impossible to exist. 


आपका नया साल सुंदर हो। रंगभरा हो। आपकी जादूगरी आपके भीतर के दरवाज़े खोले। आप अपने तिलिस्म की दीवारों पर रंग-रोगन करें। नारे-वारे लिखें। 


शुभम अस्तु।

09 December, 2025

एक हिज्र का ठंढा सियाह पत्थर है। कलेजे पर रक्खा हुआ।

मुझे चीज़ों को महसूसने की अपनी इंटेंसिटी से डर लगता है। बहुत गहरा प्यार। बहुत ज़्यादा दुख। बहुत टीसता हुआ बिछोह। मैंने अपने जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा अपने इमोशंस को समझने और बहुत हद तक उन पर कंट्रोल करने में उलझाया है। ये ऐसे जंगली जानवर हैं कि जिन्हें पालतू नहीं बनाया जा सकता। इनके लिए गहरे, अंधेरे, ख़ामोश तहख़ाने बनाए जाते हैं और इन्हें क़ैद कर के रखा जाता है। इन्हें कहा जाता है कि बहुत दिन तक अच्छा व्यवहार करने वाले क़ैदियों को जिस तरह खिड़की वाली कोठरियों में डाला जाता है…उसी तरह मैं उन्हें भी खुले मैदान वाली जेल में भेज दूँगी। मैं कहती हूँ कि वहाँ से चाँद दिखता है।

दो बाय दो बाय छह फुट की कोठरी में जिस खतरनाक इश्क़ को रखा गया है उसने सूरज तो क्या चाँद भी कई सालों से नहीं देखा। जीने की उम्मीद छोड़ वो गहरी नींद में चला गया है…एक क़िस्म का सोया हुआ मासूम ज्वालामुखी। इनोसेंट स्लीपिंग वॉल्कैनो। कबसे किसी ने उसका नाम नहीं पुकारा। उसने फुसफुसाहट तक नहीं सुनी। उसके सपने में तुम्हारी आवाज़ का कतरा आता है…पहाड़ से लौटती हुई आवाज़ की तरह। लेकिन तुमने मेरा नाम नहीं पुकारा है…सड़क के इस छोर से मैं कहती हूँ…बाऽऽऽऽय और दूसरी ओर से तुम हाथ हिलाते हो…तुम्हारे होंठ हिले हैं…लेकिन इस बीच दमकल का सायरन बज गया है…तुम्हारे होंटों के हिलने से लगता है बाऽऽऽऽऽऽय ही कहा होगा तुमने…हो सकता है तुमने मेरा नाम पुकारा हो…क्या मालूम…ये दमकल मेरे दिल में लहक कर जलते हुए इश्क़ को बुझाने के लिए दुनिया वालों ने भेजा होगा…इतनी आग में तुम्हारा पूरा शहर जल कर राख हो जाता।

तुम्हें मालूम, तुम्हारी आवाज़ के एक कतरे से दिल के तहखाने का ताला खुल सकता है…तुम्हारा एक वॉइस नोट है, उसमें सबसे चहकते हुए तुम ‘बाय’ कहते हो। जैसे कि तुम्हें पूरा यकीन हो कि हम जल्द मिलेंगे।
***

ट्रॉमा। किसी से बात नहीं कर सकते इस बारे में। फ़िल्म देख कर आए। उसमें धनुष के किरदार का नाम शंकर है…बता रहा है उस बेवकूफ लड़की को, जो असल में इतनी बेवकूफ हो, इम्पॉसिबल है…लेकिन सच में, ऐसे लोग होते तो हैं...उन्हें अपने सिवा कुछ नज़र ही नहीं आता दुनिया में। पीएचडी करती हुई लड़की, मुक्ति...उसका सब्जेक्ट है कि वायलेंस अपेंडिक्स की तरह है, इसे पूरी तरह से शरीर से काट कर निकाला जा सकता है। मुश्किल विषय है, तो उसके प्रोफेसर बोलते हैं जब तक कोई प्रूफ नहीं दिखेगा, क्रेडिबल...यह एक्सेप्ट नहीं होगा। मुक्ति ने शंकर को अपना सब्जेक्ट बना लिया है। कि इस लड़के के अंदर बहुत गुस्सा है…उसने एक बार भी ठीक से जानने की कोशिश नहीं की है कि ट्रॉमा का सोर्स असल में क्या है, कितना गहरा है, कितना कॉम्प्लिकेटेड है…वायलेंस है तो क्यों है…नफ़रत है तो कितनी है…फ़िल्म ही सही, लेकिन हीरोइन है, मेन करैक्टर है...वो इतनी सेल्फिश और इतनी सेल्फ-सेंटर्ड कैसे हो सकती है। थीसिस पर साइन हो गया है। शंकर। आदमी है…ज़िंदा, धड़कता हुआ सामने…आँखें भर आई हैं…कहता है, “मेरी माँ का नाम कावेरी था…मैं दस साल का था, जब वो वो एक पाँच साल के बच्चे को बचाने में जल कर मर गई। कि ग़रीब आदमी हो तो उसकी माँ 20% बर्न्स में भी मर जाती है…कि मेरी खाल जलती है…सब जगह…यहाँ यहाँ यहाँ…लेकिन तुम साथ होती हो तो कम जलता हूँ…” उसकी आँखें भर आई हैं। शायद वह पहली बार किसी के सामने इस तरह वल्नरेबल हुआ है। इस मोमेंट मुक्ति सामने खड़ी है उसके...कोई उसे बुलाता है...वह मुड़ कर देखती है, और अबीर कहती हुई उस लड़के की और दौड़ती है और उसे हग कर लेती है। 

बारिश हो रही है…मुक्ति के दौड़ के जाने से वह चूड़ी टूट गई है, जिसे पकड़ कर शंकर उससे बात कर रहा है। मैं देखती हूँ, कि यहाँ भी उसने छुआ नहीं है उसे...उसका हाथ नहीं पकड़ा है...उसकी चूड़ी पकड़ी है...वह सही तो कहता है, वायलेंट होने के बावजूद 99% लड़कों से अच्छा है वो। 

मेरे भीतर एक बवंडर उठा हुआ है। यह डायलॉग डिलीवरी आत्मा में घबराहट की तरह बसती है। कहते हैं बर्न्स से हुई मृत्यु सबसे तकलीफ़देह मृत्यु होती है। मैं इस डायलॉग को सुनती हुई भीतर तक काँप जाती हूँ। लेकिन फ़िल्म देखते हुए नहीं कह सकती कुछ भी। किसको। क्या कहें। जिसने जिया है, उसके सिवा कोई नहीं जान-समझ सकता है। ट्रॉमा एक शब्द नहीं है…ज़िंदगी के कैनवास की सारी आउटलाइन बदल देता है। हम फिर इससे बाहर रंग भर ही नहीं सकते।

PTSD कहते हैं। Post Traumatic Stress Disorder.

एक बार एक दोस्त ने पूछा था, किसी ने तुमसे कहा नहीं, ये लो मेरा रूमाल…और ये रहा मेरा कंधा…तुम्हें जितना रोना है, रो सकती हो। हमारे यहाँ कंधे पर गमछा रखते हैं लोग। पापा के बेस्ट फ्रेंड थे, पत्रलेख अंकल। मेरी ज़िंदगी के पहले हीरो। पापा हॉस्टल लाइफ की अपनी कहानी सुनाते थे। कि कैसे वो प्याज़ लहसुन नहीं खाते थे…तो कुक को बोल कर सिर्फ़ दाल भात और भुजिया खा लेते थे। पत्रलेख अंकल को लगा बिना प्याज लहसुन खाने वाला लड़का ज़िंदगी में कैसे सर्वाइव करेगा तो कुक को बोल कर दाल में  लहसुन से तड़का लगवा दिए…क्या ही उमर थी उस समय…शायद 11th-12th या शायद कॉलेज फर्स्ट ईयर में आए होंगे…हमको याद नहीं, पर पापा भर आँख आँसू से रोने लगे…अंकल घबरा गए, अरे, रोता काहे है…और उस दिन जो अंकल पापा के लिए हुए…अपनी आख़िरी साँस तक रहे…उनके लिए और मेरे लिए भी। हमारे पैरों के नीचे की ज़मीन, हमारी आँखों के ऊपर का आसमान। हम किनसे कितना प्यार करते हैं, उनको हमेशा बता थोड़े पाते हैं। हम अपने किसी चाचा से भी कभी इतना प्यार नहीं किए जितना अंकल से करते रहे। ज़िंदगी भर।

मार्च में देवघर गए थे। वहाँ से लौटने की फ्लाइट रोज़ तीन बजे दोपहर को होती है। देवघर एयरपोर्ट से कुसुमाहा आधा घंटा-बीस मिनट की दूरी पर है। हम बोले थे कि फ्लाइट के पहले मिलने आयेंगे गाँव। लेकिन उस रोज़ फ्लाइट बारह बजे की थी। हफ़्ते में एक दिन फ्लाइट का समय दोपहर दिन नहीं, बारह बजे होता है। मुझे मालूम नहीं था। इतवार का दिन था। मैंने ठीक घर से निकलते टाइम देखा कि फ्लाइट के लिए लेट हो गए हैं। अंकल को फ़ोन किए कि आ नहीं पायेंगे। और ज़िंदगी हमारे हिस्से ऐसे अफ़सोस लिखती है। घर में खाना बनवा के रखे थे मेरे लिए। भात दाल बचका, बहुत अच्छा दही…बहुत कुछ और…लेकिन हम हड़बड़ में एयरपोर्ट चले गए मिले बिना। तुरंत ही लौटना था, एक अप्रैल को जाना था कुसुमाहा, पूजा में…लेकिन पापा का कैटरेक्ट का ऑपरेशन हुआ था और डॉक्टर डाँट के ट्रैवल मना कर दिया। हमको लगा, ठीक है। एक आध महीने में चले जाएँगे। एक अप्रैल को माँ कुसुमेश्वरी का पूजा हुआ…सब परिवार और गांव का लोग आया…सीने में दर्द से अंकल देर रात नींद से उठे, घर से निकले गाड़ी में, हॉस्पिटल के लिए…दोनों बेटे साथ में थे…लेकिन हॉस्पिटल पहुँचने के पहले उनका दिल जवाब दे गया था। उनके ज़िंदा रहते जो हम और पापा डॉक्टर की बात मान कर पूजा में नहीं गए…कि महीना भर का बात है, उसके बाद जाते रहेंगे देवघर। लेकिन ख़बर आते ही अगले दिन पापा के साथ देवघर निकल गए थे, जानते हुए कि अंतिम बार उनको देख भी नहीं पायेंगे। हमें वहाँ होना था बस। जबकि जाने वाला जा चुका था। 

हम ज़िंदगी के उस दौर में आ गए हैं, जहाँ से लोग जाना शुरू कर चुके हैं। दोस्तों के माता-पिता। अपने जीवन के बड़े भाई-बहन। चाचा-चाची। 

मार्च में छोटी सी गाड़ी ख़रीदे थे देवघर में। स्विफ्ट। बस घर से सोलह किलोमीटर दूर कुसुमाहा आने जाने के लिए। अंकल आंटी से मिलने जुलने के लिए। साल में कई बार दिल कलपते हुए सपने से जागता है। यूकलिप्टस के पेड़ों से ढका हुआ रास्ता…जहाँ अंकल से मिलने जाना था…खाली लगता है। सुलगता है। आँख में धुआँता है। विक्रम भैया से बात करते हैं। बादल भैया से बात करते हैं। हम जहाँ पले-बढ़े हैं...ऐसे दुख में भी तड़पते हुए किसी के सीने पर सर नहीं रख सकते...चुपचाप कोने में बैठ के रोते हैं। बहुत बहुत साल बाद मिले...बीस पच्चीस साल बाद लगभग। अंकल सिर्फ अपने नहीं थे...उनके घर से सब लोग अपने ही घर के लोग थे। आशा दीदी, सरिता मौसी। बचपन की बातें। मम्मी की। उनके लड़कपन के दिन। वे सब कॉलेज आया-जाया करती थीं जब। घर पर पेंटिंग वगैरह सीखती थीं। उन्हें याद था कि हम बचपन में कैसे थे। हमको याद था यह प्यार, जो जाने कबसे हमारे हिस्से नहीं आया था। 

हम लोग जब छोटे थे, हर साल नानीघर जाते थे - पटना। देवघर से पटना ट्रेन में जनरल डिब्बे में। उन दिनों रूमाल या गमछा रख देने से सीट बुक हो जाती थी। ट्रेन आते ही लोग खिड़की से रूमाल अंदर डालने के लिए दौड़ते थे।

दिल पर भी ऐसे ही रूमाल रखा रहता है। इंतज़ार में।
कई कई साल।

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बच्चों को कोई बात समझाने के पहले ख़ुद को समझानी पड़ती है। पैरेंटिंग की कोई एक गाइड बुक नहीं होती। सबका अपने-अपने हिसाब से सही ग़लत होता है। मैं बच्चों को समझाना चाहती हूँ कि प्यार और आज़ादी दोनों ज़रूरी हैं। कि हम किसी से प्यार करते हैं तो हमको ये समझना पड़ेगा कि उनको ख़ुशी किस चीज़ से मिलती है…भले उन्हें जिस चीज़ से ख़ुशी मिलती है, उससे हमें फ़िक्र हो या दुख हो…हमें उन्हें वो काम करने से रोकना नहीं चाहिए…Love is the ability to set someone free. That our love should not be a shackle, but a home to come back to. ये कॉन्सेप्ट समझना उनके लिए जरूरी है और मुझे उन्हें ठीक से समझाना जरूरी है। लेकिन हम ख़ुद को ही कहाँ समझा पाते हैं अच्छे से। इस साल एक भी सोलो ट्रिप पर नहीं गए। बेटियां मुझे miss करती हैं, और मैं उनको। The most important part of parenting is to get them ready for a world in which I am not there.

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मेरे भीतर अभी भी बहुत भटकाव है। सतत बदलती दुनिया में जाने किस चीज़ पर ठहरती हूँ। भोर के चार बजने को आए। चौदह डिग्री दिखा रहा है मोबाइल पर। असल में ठंढ दस डिग्री के आसपास की होगी। पहले तल्ले पर खिड़की के पास डेस्क है। खिड़की से बाहर गोल्फ कोर्स दिखता है। वहाँ छोटे से पौंड में सामने वाले घर की परछाई काँपती दिखती है। पानी की वो परछाई एक अलग दुनिया है। एकदम अँधेरी रात है। बादल होंगे, तारे नहीं दिख रहे। खिड़की बंद कर दें ठंढी हवा नहीं आएगी भीतर, पर मालूम नहीं खिड़की खुली रखने की आदत छूटती नहीं। स्वेटर तो पहने हैं, लेकिन गर्म पजामे और मोजे नहीं हैं। पैर में ठंढ लग रही है। लैपटॉप के दोनों तरफ़ कैंडल जला लिए हैं। लिखते लिखते रुकते हैं तो हाथ लौ पर रख लेते हैं।

एक कैंडल का नाम तो वैसे ग्रीन बेसिलिकम है लेकिन महक रहा है पुटूस की तरह। पुटूस माने बचपन। छिले हुए घुटनों पर पुटस के पत्तों का रस लगा लिए, हो गया। उस समय की जादू जड़ी बूटी थी ये। मेरे हाथ पाँच साल की लड़की के हो गए हैं। जिसको पेंसिल छीलने, चौक का चूरा बनाने और होमवर्क भूल जाने की आदत थी। थोड़ा बड़े होने पर कबड्डी और बुढ़िया कबड्डी खेलते थे। किसी को उठा कर पटक देने में कितना मजा आता था। मिट्टी का रंग, स्वाद, गंध, टेक्सचर…सब पता था। सूखी, गीली, लाल मिट्टी। भूरी मिट्टी। काली मिट्टी। मुल्तानी मिट्टी।

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बॉलीवुड इतना होपलेस क्यों है? कोई भी डायरेक्टर या स्क्रिप्टराइटर इतना ख़राब किरदार क्यों रचता है। हम इस तरह की बॉलीवुड हीरोइनों और हीरो से थक गए हैं। Women having the god-complex, जहाँ वे किसी को बचाने के लिए जान दिए हुए हैं, बिना देखे कि किसी को बचाये जाने की इच्छा या ज़रूरत है भी या नहीं। साइकोलॉजी में पीएचडी कर रही है और ख़ुद में एमपैथी नाम की कोई चीज़ नहीं। अगर किसी सब्जेक्ट(व्यक्ति) को चुना है, तो थोड़ी तो प्रोफेशनल ईमानदारी रखनी थी। अगर वायलेंस की रूट कॉज तक जा रही है तो उसको इतनी सी बेसिक समझ नहीं है कि कोई इस तरह का इमोशनली अन्स्टेबल व्यक्ति प्यार जैसे किसी इमोशन से कितनी गहराई से जुड़ेगा, कितनी इंटेंसिटी से कुछ भी महसूस करेगा। एक एक्स्ट्रा ट्रॉमा देना और उसको लेकर कोई ग्लानि, कोई शर्म, कोई झिझक और ईमानदारी तो छोड़ दें, बेसिक इंसानियत, ह्यूमैनिटी तक नहीं है। रिसर्च अप्रूव हो गया है, लड़का अपनी माँ के बारे में बता रहा है…पहली बार खुला है। शायद किसी के पास पहली बार अपना दुख कह रहा है। मुक्ति एक झटके में वहाँ से दौड़ कर दूसरे लड़के के गले लग जाती है। अगर वह अबीर से प्रेम करती, तो मुझे यह सीन फिर भी क्षम्य लगता क्यूँकि प्रेम में होने पर आप बाक़ी लोगों की भावनाओं से ऊपर अपनेआप को रखते हैं। लेकिन वह तो सिर्फ़ दोस्त था। तो ऐसे व्यक्ति के पास दौड़ कर अगर चली भी गई है तो लौट कर शंकर तक ठीक उसी समय आना था। उसकी फीलिंग को वैलिडेट करना था। कितना आसान है कहना, तुम ना नहीं सुन सकते थे। इस लड़की ने कभी उसे ठीक-ठीक एक इंसान की तरह न देखा, न समझा…स्वार्थी हो कर, सिर्फ़ अपना पीएचडी अप्रूव करवाया। वो भी झूठा। मेरा ख़ून खौल जाता है ऐसी फिल्में देख कर। एयरफोर्स को मज़ाक़ बना दिया है। कोई पायलट मेंटली अन्स्टेबल है तो वहाँ उससे ठीक से काउंसलिंग करने की जगह इमोशनल ब्लैकमेल किया जा रहा है। उसके भीतर गुस्सा है…और वो एक ऐसा एयरफोर्स पायलट है, जिसको सिर्फ़ लड़ना है…इस तरह की बातें करने के बावजूद उसे प्लेन उड़ाने की परमिशन के काग़ज़ पर साइन कर दिया गया है। उसकी ड्यूटी पहले देश, फिर अपनी बटालियन, फिर अंत में ख़ुद के लिए होती है। यही अभी तक की वॉर मूवीज़ में देखा है।

मुझे लगता है, ऐसा नियम होना चाहिए कि आर्मी/नेवी/और एयरफोर्स ऑफिसर्स के बारे में कोई भी फ़िल्म बनाने के पहले अप्रूवल लिया जाये ताकि नियम/कानून का मजाक न बने। एयरफोर्स में प्रोटोकॉल्स होने की कई वजहें हैं। क्रिएटिविटी के नाम पर कहानी कुछ भी बना दे रहे हैं।

मैंने फ़िल्म देखी धनुष की लाजवाब एक्टिंग के लिए। हिंदी फ़िल्म में तमिल डायलॉग्स देख देख कर मेरा तमिल सीखने का मन करने लगा है। फ़िल्म में बनारस है। हम सोचते हैं, बनारस आते नहीं जब तक कि बुलावा नहीं आता। मैं आधे सपने में हूँ...ये कौन सी अल्टरनेट दुनिया है। मैं तुम्हारे साथ नाव पर बैठी हूँ। शोर बहुत है। सामने मणिकर्णिका घाट है...कहते हैं यहाँ की आग कभी नहीं बुझी। 

मुझे लगता है, हम-में कोई धागा है, जन्मपार का बँधा हुआ। फ़िल्म में कहता है, मुक्ति नहीं मिलेगी। ना इस जन्म ना कभी भी और। प्रेम में सिर्फ़ मृत्यु है। मैं नाव पर हूँ। सियाह धुआँ उठ रहा है। मेरी आत्मा में कुछ उमड़ रहा है। कोई गाँठ खुल रही है। एक सिरा तुम्हारे भीतर है इस धागे का। मुझे पक्का यकीन है, हम कई जन्म एक दूसरे से मिलते रहे हैं। 

दिसंबर में इतने सारे प्यारे लोगों का जन्मदिन है। अब गिफ्ट वगैरह में मजा नहीं। मजा है कि इस दिन वाक़ई अपने पसंद के लोगों के साथ समय बिता सकें। उन्हें मिलें तो जोर की जादू की झप्पी दें और कहें। तुमसे जादू है। मेरी कहानी का। मेरा। मेरी दुनिया में बने रहना, तुम्हारे होने से सब जगमग जगमग है। सब मीठा है। और अगर जाओगे तो मीठा खाने का मजा चला जाएगा। फिर हम अपने खुली गाड़ी में चाँद ताकते, सिगरेट फूंकते तुम्हें इतना याद करेंगे कि हिचकी लेते लेते थक जाओगे। 
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इंडिगो के प्लेन कैंसिल होने के कारण उस शादी में नहीं जा पाये, जिसमें जाने का, क़सम से बहुत बहुत बहुत मन था। और अगर ये भसड़ नहीं होती, तो पक्के से होते। लेकिन ऐसे केस में डर लगता है अकेले जाने से, तो गए नहीं। मुझे भीड़ से डर लगता है, चीज़ें जहाँ uncontrolled हों, वहाँ बहुत ज़्यादा। 

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बेवकूफ लड़का, हमसे कहता है...हमारी शकल ही ऐसी है वरना प्यार नहीं होता लड़कियों को हमसे। ये साल २०२५ का आख़िरी महीना है। लड़कों को अब भी समझ नहीं आता, प्यार में शकल का कोई काम नहीं होता। मुहब्बत होती है ख़ुशबू से, किसी की मुस्कान से...उसके लाये फूल से...उसकी लिखी चिट्ठी से...उसके भेजे उलाहने से...उसकी समझदारी से...

प्यार होता है तकलीफ़ से। 
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मन फिर से अंगकोर वात जाने का हो रहा है। 
मन पागल है। 

पिछले छह सालों में ये चौथा घर है। इतना सारा सामान बांधना, फिर से खोलना। ये घर मेरे लिए एकदम परफेक्ट था। सब कुछ अपनी जगह सही। लिखने वाली जगह के आसपास बहुत से पेड़ पौधे। सुबह कई तरह की चिड़ियों की चहचहाहट। हवा में नाचती विंड-चाइम। खुला आसमान।

एक ठंढ है जो भीतर से तारी है।
एक हिज्र का ठंढा सियाह पत्थर है। कलेजे पर रक्खा हुआ। 

17 November, 2025

तुम्हें पता है, There is only one absolute unit of longing, loneliness and love. ‘बस यूँ ही, तुम्हारी आवाज़ सुनने का मन कर रहा था।'

निष्कवच 
कर्ण ने बदन से छील कर उतारा था कवच...दान में देने के लिए। कैसे देवता थे वे, जिन्होंने कवच दान में माँग लिया! मैं दिल का कवच ऐसे ही उतार दूँ छील के?   

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आज एक नए कैफ़े में आई हूँ, बहुत सुंदर नाम है इसका। Paper& Pie. आगा शाहिद अली की कविता Stationery की एक पंक्ति है, The world is full of paper, write to me. काग़ज़ से बहुत लगाव है। इतना कि इस दुनिया को इसलिए आग लगाने का मन नहीं करता कि कभी कभी लगता है ये दुनिया काग़ज़ पर लिखी हुई है, शायद। इसे पानी में तैरने वाली नाव बनना है आख़िर को।
पेपर ऐंड पाई। 

कुछ दिन पहले ऑफिस के एक पुराने कलीग से मिलना था, तो उसके घर के पास की जगह गए थे। उसने इस कैफे का पता दिया था, कि अच्छी जगह है। हम हड़बड़ में मिले थे। एक घंटा टाइप्स…बोला, अगली बार फुर्सत में मिलेंगे। और हम कहे, कि फुर्सत नहीं मिलेगी कभी…इतना भी मिल लेंगे तो ठीक है। कैफ़े की थीम सफेद थी। कैरमेल कलर का फर्नीचर। शोर नहीं। कम्फर्टेबल। अच्छा लगा।

हर नाम का एक क़िस्सा होता है। हमको इस किस्से से हमेशा मतलब क्यों होता है? इस कैफे के नाम के साथ के लोगो था। जैसे स्टारबक्स का लोगो एक साईरन(siren) है…इन दिनों नई कंपनी के नाम, लोगो वग़ैरह के बारे में सोच रहे, रिसर्च कर रहे। दिमाग़ में यही सब चल रहा था। इंदिरानगर के कैफे में पहली बार आए थे…इसी लोगो का एक फोटो खींच कर दोस्त को भेजा। उसने पूछा ये क्या है? और हमने कहा कि प्रूफ कि लोगो से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। कुछ भी रख लो नाम, कैसा भी बना लो लोगो।

आज बहुत साल बाद इंदिरानगर ऐसे इत्मीनान से आए हैं। यहाँ पहली बार घर था…दस साल रही उसी घर में। भयंकर नास्टैल्जिया घेरता है। मैं इस इलाक़े के सभी पेड़ों को पहचानती हूँ। फूलों के मौसम में कहाँ फूल आयेंगे, वो भी। सारी गालियाँ, सारे चौराहे, आसमान का हर टुकड़ा चीन्हा हुआ लगता है। कभी-कभी उस लड़की की याद आने लगती है जो यहाँ अठारह साल पहले आई थी। दिल्ली के अपने सारे प्यारे दोस्तों को छोड़ कर…उस एक लड़के का हाथ थामे जिससे मुहब्बत की थी। चमकीले, रूई के फाहे की तरह हल्के दिन थे…घर में कोई फर्नीचर नहीं था। हम वाक़ई दो बक्से लेकर आए थे। कपड़े और किताबें, बस…और ढेर सारा प्यार। एक नए शहर में नई शुरुआत करने।

जिस घर में रह रही हूँ, एक साल भी नहीं हुआ है। मकान-मालिक ने खाली करने कह दिया है। बात सही है, मकान-मालिक है। जब उसका मन करे, खाली करने को बोल सकता है। लेकिन ऐसे दो बच्चे, सास, एक पति-पत्नी…बड़ा सा परिवार है, बहुत सारा सामान…चार कमरों का घर है। किराया भी बहुत ज़्यादा है। इस घर में 3000sq.ft. के आसपास का अपना लॉन है। बच्चों को बहुत अच्छा लगता था यहाँ से वहाँ दौड़ते रहते थे दिन भर। बड़े शहरों में अपना गार्डन या लॉन होना तो एकदम ही मुश्किल है। इतने सालों में ऐसे खुली ज़मीन वाला कोई घर नहीं देखा कभी। विला के सामने गोल्फ कोर्स है। सुबह सूरज उगता हुआ दिखता था…बच्चे धूप में कुनमुना के उठते थे। गहरे गुलाबी रंग की बोगनविला थी। विंडचाइम नाचती रहती थी, अक्सर। उसकी धुन नींद में झूलती रहती। गार्डन में एक ओर बार बना हुआ है, उसके सामने छोटा सा पौंड है…गोल्फ कोर्स के लिए। लेकिन वहाँ सुबह-सुबह कभी कभी लिखने बैठती थी। धुंध में। ठंढ में। चाँदनी रात में स्टडी टेबल से चांद उगता हुआ दिखता था। कई बार सूरज उगने के टाइम-लैप्स बनाए। ये ऐसा घर था, जिसमें कुछ साल इत्मीनान से रहने का मन था। अपने से ज़्यादा, बच्चों के लिए। ये उनके दौड़ने-भागने-खेलने कूदने के दिन हैं। सभी दोस्तों के बच्चे आते थे तो सबको खूब मन लगता था। पर ठीक इसलिए है, कि जो चीज़ अपनी नहीं, उससे ज़्यादा लगाव क्यों होना…शायद ज़्यादा दिन रुक जाते, तो ज़्यादा दुखता। अभी तो इतनी सुंदर जगह रह रहे हैं, इसका यक़ीन भी ठीक से नहीं हुआ था। सपने जैसा ही लगता था कई बार। कुछ ऐसा इत्तिफ़ाक़ रहा कि बच्चों के जन्म के छह साल में चौथे घर में जा रहे हैं। जिससे भी बात करेंगे, अपना घर ख़रीदने की तरफ़दारी करेगा…कि जैसा भी हो, घर अपना होना चाहिए।

कुँवर नारायण की एक कविता है, बहुत सुंदर। कई साल पहले अनुराग को ज़िद कर के कुछ लिखने को कहा था, तो यही कविता काग़ज़ पर लिख के दी थी उसने…उस दिन भी दुखा था इसे पढ़ना। शायद उन दिनों वह भी घर शिफ्ट कर रहा था। फ़िलहाल, याद नहीं…लेकिन यह कविता आज शाम से मन में घूम रही है…

कभी कभी इतना बेघर हो जाता है मन
कि कपड़े बदलते हुए भी लगता है
जैसे घर बदल रहा हूँ
- कुँवर नारायण

इस साल दिवाली बहुत सुंदर थी। घर पर सब के सो जाने के बाद दिल शुक्रगुज़ार था। तो मकान मालिक को एक लंबा, सुंदर सा मेसेज लिखा। जान-पहचान के सभी लोगों का कहना है कि उसी मेसेज के कारण मक़ान मालिक ने घर ख़ाली करने को कहा है। पता नहीं कैसे, पर सबको इस तरह की फीलिंग समझ में आती है, सिवाए मेरे। कि कोई उनके घर में रह कर इतना ख़ुश है, उसे इस घर की अच्छी चीज़ों से फ़र्क़ पड़ता है…कोई घर की हर छोटी-बड़ी चीज़ को नोटिस करता है, उससे जीवन में आई सुंदरता को लेकर शुक्रगुज़ार है…मेरा ये acknowledgement ही उन्हें अच्छा नहीं लगा। हम सोचते रहते हैं, कि दुनिया इस तरह की हो जाएगी तो हम बदल तो नहीं जाएँगे। कितनी कम बार होता है कि आपको कुछ अच्छा लगे और आप उन्हें बता पायें। कितनी ज़्यादा बार होता है कि कुछ अच्छा लगे, कोई अच्छा लगे तो आप चुप ही रहते हैं। Status-quo जो मेंटेन करना होता है। जबकि ज़िंदगी में बदलाव के सिवा कुछ भी परमानेंट नहीं है, लोग बदलाव से इतना डरते हैं कि हर बदलाव को बुरे की तरह ही सोचते हैं…जब कि बदलाव अच्छे के लिए भी तो हो सकता है, या कि कुछ अलग के लिए ही हो जाये…इसे अच्छे-बुरे के काले-सफेद में न बाँटें। हमने जितने घर बदले हैं, हर बार पिछले घर से कुछ अलग, कुछ बेहतर, कुछ सुंदर ही मिला है। शायद सिर्फ़ बदलाव की बात नहीं है, बात है कि हमारी मर्जी से नहीं हो रहा। फिर ऐसे समय पर हो रहा है जब बहुत कुछ ऐसे ही बदल रहा होता है…साल ख़त्म हो रहा होता है, नए साल के नए प्लान्स बन रहे होते हैं। छुट्टी मनाने जायेंगे…फिर लौटते ही घर बदलना होगा। ऐसे में छुट्टी पर जाने की जगह घर में रह कर खूब सी पार्टी करने का मन कर रहा। एक तरह का क्लोजर। पता नहीं क्या। कोई अफ़सोस न बाक़ी रहे।

ये साल बहुत तेज़ी से बीता। बहुत व्यस्त रही, पारिवारिक चीज़ों में। सीखा यह कि जो मिला है, उसमें संतोष होना चाहिए। कि सब कुछ तो किसी को भी नहीं मिलता। तो कुछ न कुछ तो रहेगा ही अफसोस के खाते में। फिर, न चाहते हुए भी इतने अफ़सोस जमा हो गए हैं दिल में, लिखने चलें तो बचा हुआ जीवन कम पड़ जाये। फिर क्या मालूम, कितना जीवन बचा है। Camus कहते थे, जीवन में सब कुछ absurd है। कुछ भी प्लान नहीं कर सकते। Camus की मृत्यु एक कार एक्सीडेंट में हो गई थी। वे सिर्फ़ 46 साल के थे। उनके साथ उनका पब्लिशर भी था। 

One must imagine Sisyphus happy.
- Camus


बदलाव के साथ, ज़िंदगी में होने वाली सारी अब्सर्डिटी समझते हुए, हम फिर भी खुश रह सकते हैं…छोटी छोटी चीज़ों में। ख़ुशी कोई अल्टीमेट डेस्टिनेशन नहीं हो सकता। रोज़ की छोटी-छोटी चीज़ें अगर हमें ख़ुशी नहीं दे सकतीं तो हम कुछ भी हासिल कर लें, हमेशा कुछ और चाहिए होगा। मैं बेटियों को भी सिखाने की कोशिश करती हूँ, कि चाह का कोई अंत नहीं। जो सुंदर है, जो पास है, जो अपना है…उसके लिए खुश रहें तो ख़ालीपन कहीं होगा ही नहीं…और बिना खालीपन के उदासी रहेगी कहाँ?

मैंने लैवेंडर वाली चाय ऑर्डर की…कप से भाप उठ रही थी। उसपर हथेली रखी तो पुरानी कहानी की पंक्ति याद आई, उसकी शिराएँ लैवेंडर रंग की हैं। कितनी सुंदर कलाई थी, काटने में दुख हुआ था, कहानी में भी। चाय पीते हुए सोचती रही, शाम से कितनी काली कॉफ़ी पी रखी है, याद नहीं। कड़वाहट नहीं आती ज़ुबान पर, न दिल में। जाने कैसे हो गया है दिल इतना फॉरगिविंग।

हाँ, मुझसे छूट गया है तुम्हारा हाथ। लेकिन यही कायनात है, इक रोज़ सिगरेट पीते हुए सोचा था, मैं तुम्हारा हाथ पकड़ना चाहती हूँ और कायनात ने मान लिया था। पिछली बार डेंटिस्ट के पास गई थी तो सोच रही थी, ख़ुशी का कोई ऐसा इंटेंस लम्हा नहीं है कि इमोशनल एनेस्थीसिया की तरह काम कर सके। तो कायनात ने सोचा, कुछ लम्हे लिख दे मेरे हिस्से में।

मुझसे छूट गया है तुम्हारा हाथ। लेकिन मुझे मालूम है तुम्हारे ब्रांड की सिगरेट, तुम्हारा फ़ेवरिट कलर और तुम्हारे पसंद की ड्रिंक। मन करे तो मैं भी विस्की पी कर आउट हो सकती हूँ। मन करे तो कहानी में तुम्हें रख सकती हूँ सहेज कर। कि मेरे पास हैं ऐसे शब्द जिनमें से तुम्हारी ख़ुशबू आती है।

तुम्हें पता है, there is only one absolute unit of longing, loneliness and love.
‘बस यूँ ही, तुम्हारी आवाज़ सुनने का मन कर रहा था।’

19 October, 2025

Tight hugs. Unforgettable goodbyes. Normal days. Grateful heart.

अल्टरनेट वर्ल्ड।

आपको कभी ऐसा लगा है, किसी एक मोमेंट…कि यह सीन हमारी दुनिया का है ही नहीं…हमने अपनी अभीप्सा से कई हज़ार रियलिटीज़ वाले ब्रह्मांड से वो एक यूनिवर्स चुन ली है जहाँ यह हिस्सा होना था और वहाँ की जगह, ये हिस्सा हमारी इस यूनिवर्स में घटेगा…
कि चाह लेने से हमारी दुनिया बदल जाती है…भले पूरी की पूरी न सही और सारे वक्त न सही, लेकिन किसी छोटे वक़्फ़े सब कुछ ठीक वैसा होगा कि आपको आपकी मर्जी का एक लम्हा मिल जाये…
बशीर बद्र हमारे मन के स्याह में झाँकते हैं…गुनाहों के सीले कमरों में भी थोड़ा उजास होता है…मन आख़िर को वह क्यों माँगता है जो उसे नहीं माँगना चाहिए…वो लिखते हैं हमारे बारे में…

मैं कब कहता हूँ वो अच्छा बहुत है
मगर उसने मुझे चाहा बहुत है
मैं हर लम्हे में सदियाँ देखता हूँ
तुम्हारे साथ एक लम्हा बहुत है

सब कुछ किसी को कहाँ मिलता है। कभी।

लेकिन किसी को हग कर रहे हों, तो आँखें बंद कर सकें…थोड़ा इत्मीनान, थोड़ी सी मोहलत, और अपराधबोध न फील करने की आज़ादी, शायद सब को मिलनी चाहिए। शायद सबको, तो फिर किसको नहीं मिलनी चाहिए?

पता नहीं। कुछ तो होते होंगे, गुनाहगार लोग…जिन्हें सज़ा मिली हो, कि जब भी किसी को हग करो…आँखें बंद नहीं कर सकोगे। कि It will always be a fleeting hug. कि तुम्हें हमेशा हज़ार लोग घूर रहे होंगे। कि मेला लगा होगा और उस मेले के बीच चलते मेट्रो स्टेशन पर तुम्हें किसी को गले लग कर अलविदा कहना होगा। कि उस जगह रुक नहीं सकते। कि अगली मेट्रो आने ही वाली है। कि हर बार बिछड़ना, मर जाना ही तो है। ग़ालिब ने जो कहा, जाते हुए कहते हो क़यामत को मिलेंगे, जैसे कि क़यामत का, होगा कोई दिन और!

***

क्रश। पहली बार इस शब्द के बारे में पढ़ा था, तो किसी चीज़ को थूरने-चूरने के अर्थ में पढ़ा था। लेकिन समझ आने के कुछ ही दिनों में इसका दूसरा और ज़्यादा ख़तरनाक…वैसे तो मेटाफोरिकल, लेकिन बहुत हद तक सही शाब्दिक - लिटरल अर्थ समझ आया था। ‘क्रश’ उसे कहते थे जिसे प्यार नहीं कह सकते थे। थोड़ा सा प्यार। प्यार की फीकी सी झलक भर। लेकिन जानलेवा।

ये वो नावक के तीर थे जो गंभीर घाव करने वाले थे। इनसे बचने का कोई जिरहबख़्तर नहीं बना था।
इश्क़ को रोकने का जिरहबख़्तर होता भी नहीं…हम उसके बाद क्या करेंगे, अर्थात्…अपने एक्शन/कांड पर भले कंट्रोल रख लें…महसूस करने पर कोई कंट्रोल काम नहीं करता। अक्सर अचानक से होता है।

जैसे रात को तेज गाड़ी चलाते हुए, इकरार ए मुहब्बत का पहला गाना, ‘तुम्हें हो न हो, मुझको तो, इतना यकीं है…कि मुझे प्यार, तुमसे…नहीं है, नहीं है…’ अचानक से बजाने का मन करे। रात के साढ़े तीन-पौने चार हो गए थे। भोर साढ़े पाँच की फ्लाइट थी, किसी भी तरह साढ़े चार तक उड़ते-उड़ते एयरपोर्ट पहुंचना ही था। कुछ चीज़ों में जीवन बहुत प्रेडिक्टेबल रहा है। कुछ चीज़ों में बेतरह प्रेडिक्टेबल। मुहब्बत की हल्की सी ही थाप होती है दिल पर, इन दिनों। उसे पता है, दरवाज़ा नहीं खुलेगा…लेकिन मुहब्बत ढीठ है, थेथर है…एक बार पूछ ज़रूर लेती है, हम आयें? हम अपने-आप को दिलासा देते हुए गुनगुनाने लगते हैं, मुझसे प्याऽऽर तुमसे, नहीं है...मगर मैंने ये आज अब तक न जाना...कि क्यों प्यारी लगती हैं, बातें तुम्हारी, मैं क्यों तुमसे मिलने का ढूँढूँ बहाना...

खैर, अच्छा ये हुआ कि फ्लाइट छूटी नहीं। 
***

सुबह ज़ुबान पर कड़वाहट थी, पर मन मीठा था।
There is something about almost chain-smoking through the night. While not being drunk. एक नशा होता है जो अपने लोगों के साथ देर तक बतियाने से चढ़ता है। एक मीठा सा नशा।

सिगरेट का धुआँ मन के कोने-कोने पैठता जाता है। इसे समझाना मुश्किल है कि हमें क्या क्या सुनाई पड़ता है और क्या समझ आता है। ध्यान दो अगर, और रात बहुत गुज़र चुकी हो…सन्नाटे में जब सिगरेट का सिरा जला कर कश खींचते हैं तो तंबाकू के जलने की आवाज़ आती है, बहुत महीन, बहुत बारीक…जैसे किसी का हाथ छूटते हुए आप ज़ोर से न पकड़ें, बल्कि हौले से किसी के हाथ के ऊपर अपनी हथेली फिरा लें…वो बह जाये आपसे दूर, किसी पहाड़ी नदी के पानी की तरह।

फिर से कहते हैं न कि दुनिया में सब कुछ तो किसी को नहीं मिलता।

हम ज़्यादा नहीं चाहते। पर शायद इतना, कि किसी को hug करते हुए इतनी फुर्सत हो और इतनी तसल्ली कि आँखें बंद कर सकें। कि हड़बड़ी में न हग करें किसी को, जैसे कि दुनिया बर्बाद होने वाली है। बैंगलोर की भयंकर तन्हाई में इस एक चीज़ की कमी से मेरी जान जाने लगती है। दिल्ली जाती हूँ तो दोस्त बिछड़ते हुए दो बार गले मिलते हैं। एक बार तो अभी के लिए, और एक बार कि जाने कितने दिन बाद फिर मिलेंगे, एक बार और hug करने का मन है तो कर लेते हैं।

अक्सर हम उन लोगों के प्रेम में पड़ते हैं जिनमें हमारे जितनी गहराई होती है। लेकिन कभी कभी हम कुछ बेवकूफ के लड़कों के गहरे इश्क़ में गिरफ़्तार हो जाते हैं। जिन्हें शायरी सुनाओ तो फिर उसका मतलब समझाना पड़ता है। क्या कहें किसी से कि, ‘यूँ उठे आह उस गली से हम, जैसे कोई जहाँ से उठता है…तुम्हारी गली देखनी थी, तुम्हारा घर, तुम्हारे घर के पर्दे…उसे कैसे समझायें कि मुझे तुम्हारे घर की खामोशी से मिलना था। तुम्हारी खिड़की से आसमान को देखना था। इस जरा सी मुहब्बत का ठिकाना दुनिया में कहीं नहीं होता। कि बेवकूफ लड़के, जब हम कहते हैं कि, ‘इश्क़ एक मीर भारी पत्थर है, कब ये तुझ नातवाँ से उठता है’, तो इसका मतलब यह नहीं है कि बॉडी-बिल्डिंग शुरू कर दो। इसका मतलब हम तुम्हारे हक़ में दुआयें पढ़ रहे हैं कि इश्क़ का भारी पत्थर उठाने के लिए तुम्हारा दिल मज़बूत हो सके…फिर हमारे जैसी तो दुआ क्या ही कोई माँगता होगा, कि तुम्हें इश्क़ हो...भले हमसे न को, किसी से हो...लेकिन तुम्हारा दिल जरा ना नाज़ुक रहे। आँख थोड़ी सी नम। 

देख तो दिल कि जाँ से उठता है, ये धुआँ सा कहाँ से उठता है…

देख रहे हैं आसमान। धुएँ के पार। तुम्हारी किरमिच सी याद आती है। तुम्हारी इत्ती सी फ़िक्र होती है। मैं कुछ नहीं जानना चाहती तुम्हारे बारे में…लेकिन कहानी का कोई किरदार पूछता है तुम्हारे बारे में, कि अरे, उस लड़के का बचपन किस शहर में बीता था, तुम्हें याद है? मैं कहानी के किरदार को बहलाती हूँ, कि मुझे कुछ न मालूम है तुम्हारे बारे में, न याद कोई। कि दूर से मुहब्बत आसान थी, लेकिन इतनी आसान भी कहाँ थी।

दिल्ली जाते हैं तो जिनसे बहुत ज़ोर से मिलने का मन कर रहा होता है, ये कायनात उन्हें खींच कर ले आती है दिल्ली। हम बहुत साल बाद इकट्ठे बैठे उसकी पसंद की ड्रिंक पी रहे हैं। ओल्ड मौंक विथ हॉट वाटर। उसके पसंद का खाना खा रहे हैं। भात, दाल, आलू भुजिया। जाने कितने साल हो गए उसकी ज़िंदगी में यूँ शामिल और गुमशुदा हुए हुए। वीडियो कॉल पर ही देखते थे उसको। एक साथ सिगरेट फूंकते थे। सोचते थे, जाने कौन सा शहर मुकम्मल होगा। कि हम कहेंगे, हमारी सिगरेट जला दो। कि you give the best welcome hugs and the most terrible goodbye hugs. कि इतनी छोटी ज़िंदगी में तुमसे कितना कम-कम मिले हैं।

स्वाद का भी गंध के जैसा डायरेक्ट हिट होता है, कभी कभी। कभी-कभी इनका कोई कनेक्ट नहीं होता। एक पुराना दोस्त गोल्ड-फ्लेक पीता था। यूँ तो गाहे बगाहे कई बार गोल्ड फ्लेक पिए होंगे, उसकी गिनती कहाँ है। लेकिन कल शाम गोल्ड फ्लेक जलायी और पहले कश में एक अलविदा का स्वाद आया। सर्द पहाड़ों पर बहती नदी किनारे घने पेड़ होते हैं, उन सर्पीली सड़कों पर गाड़ी खड़ी थी। गुडबाय के पहले वाली सिगरेटें पी जा रही थीं। कभी कभी कोई स्वाद ज़ुबान पर ठहर जाता है। इत्ती-इत्ती सी सिगरेट, लेकिन कलेजा जल रहा था। मन तो किया पूरा डिब्बा फूँक दें। और ऐसा भी नहीं था कि फ्लाइट मिस हो जाती, बहुत वक्त था हमारे पास। लेकिन ये जो सिगरेट के धुएँ से गाढ़ा जमता जा रहा था दिल में कोलतार की तरह। उसकी तासीर से थोड़ा डरना लाज़िमी था। मेरे पास अभी भी वो पीला कॉफ़ी मग सलामत है जो उसने ला कर दिया था। उसके हिस्से का मग। जाने कैसे वो मिल गया था अचानक। यूँ मेरे हिस्से का तो वो ख़ुद भी नहीं था।

***
मुहब्बत में स्पर्श की करेंसी चलती है। यहाँ बड़े नोटों का कोई काम नहीं होता। यहाँ रेज़गारी बहुत क़ीमती होती है। कि सिक्के ही तो पॉकेट में लिए घूमते हैं। यही तो खनखनाते हैं। इन्हें छू कर तसल्ली कर सकते हैं कि कोई था कभी पास। 

स्पर्श को संबंधों में बांटा नहीं जा सकता। हम किसी का हाथ पकड़ते हुए ये थोड़े सोचते हैं कि वो हमारा प्रेमी है या मित्र है या कोई छोटा भाई-बहन या कि अपना बच्चा। हम किसी का हाथ पकड़ते हुए सिर्फ़ ये सोचते हैं कि वो हमारे लिए बहुत क़ीमती है और दुनिया के मेले में खो न जाये। हम उसक हाथ पकड़े पकड़े चलते हैं। झूमते हुए। कि हमें यकीन है कि भले कई साल तक न मिलें हम, इस फ़िलहाल में वो सच में हमारे पास है, इतना टैंजिबल कि हम उसे छू सकते हैं।

दिल्ली की एक दोपहर हम सीपी में थे। दोस्त का इंतज़ार करते हुए। लंच के लिए। गाड़ी पार्क करवा दिए थे। उसके आने में टाइम था, सोचे सिगरेट पी लेते हैं। तो एक छोटा बच्चा बोला, दीदी हमको चाय पिला दो। नॉर्मली हम चाय तो पीते नहीं। लेकिन वो बोला कि पिला दो, तो उसके साथ हम भी पी पीने का सोचे…दो चाय बोल दिए। आइस-बर्स्ट का मेंथोल और चाय में पड़ी अदरक…ऐसा ख़तरनाक कॉम्बिनेशन था कि थोड़े से हाई हो गए। फिर सोचे कि दिल्ली में यही हाल तो रहता है, हवा पानी का असर मारिजुआना जैसा होता है। कितना मैजिकल है किसी शहर से इतना प्यार होना।

***

हम इन दिनों बिखरे बिखरे से रहते हैं। तसल्ली से लेकिन। किसी चीज़ की हड़बड़ी नहीं होती। सिवाए, जनवरी के आने की... और कभी कभी, अब तो, वो भी नहीं लगता। 

96 फ़िल्म में एक सीन है। जानू, राम के घर आई हुई है। वे बारिश में भीग गए थे, इसलिए उसने नहाने के बाद राम की ही शर्ट पहनी है। भूख लगी है तो जानू ने खाना बनाया है। अपनी अपनी थाली में दोनों खाना खा रहे हैं। राम उससे पूछता है, तुम खुश हो...सीन में तमिल में पूछता है, सबटाइटल्स इंग्लिश में हैं लेकिन उस एक सीन में मुझे तमिल समझ आने लगती है। जानू कहती है, हाँ हाँ, बहुत ख़ुश हूँ...राम कहता है, बेवकूफ, अभी नहीं। ऐसे...जीवन में। जानू ठहर जाती है...और उसका जवाब होता है, कि संतोष है। 

मुझसे मेरे करीबी जब पूछते हैं, कि क्या लगता है, तुम्हें जो मिला, वो तुम डिजर्व करती हो...तो हम ठीक ठीक नकारते नहीं। कि डिज़र्व तो क्या ही होता है। जो दुख मिला, क्या वह हम डिजर्व करते थे...तो फिर सुख की यह जो छहक आई है हमारे हिस्से, इसे सवाल में क्यों बाँधे? क्यों न जियें ऐसे कि जिस ऊपर वाले के हाथ में सब कुछ है, वो हमारा हमसे बेहतर सोच रहा है। कि सुख और दुख साइक्लिक हैं। कि फ़िलहाल, हमारे पास बहुत है। और जो थोड़ा नहीं है, सो ठीक है। कि सब कुछ दुनिया में किसी को भी कहाँ मिलता है। कि चाह लो, तो जितना चाहते हैं...और जितने की सच में जरूरत थी। उतना तो मिल ही जाता है। 

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मुझे लिख के ख़ुशी मिलती है। हम खूब खूब लिखते हैं। 
लेकिन इन दिनों डायरी से शुरू कर के मैकबुक तक आते आते समय पूरा हो जाता है। इसलिए कई सारी चिट्ठियाँ पेंडिंग हैं। कई सारी कहानियाँ भी। कुछ लोग हैं जिनसे मिलने का बहुत मन है। लेकिन वे दुनिया के दूसरे छोर में रहते हैं। 

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ख़ुशी के बारे में सबसे अचरज की बात ये हैं कि बहुत कम लोग हैं जिन्हें सच में पता होता है कि उन्हें किस चीज़ से ख़ुशी मिलती है। वे कभी ठहर के देख नहीं पाये, सोच नहीं पाये कि उनका मन कब शांत रहता है। कब उन्हें कहीं और भागने की हड़बड़ी नहीं होती। किस से मिल कर किसी और की कमी महसूस नहीं होती। 

ख़ुद को थोड़ा वक़्त देना गुनाह नहीं है। ख़ुद को थोड़ा जानना समझना। भले आपको लगे कि आप मेटामॉर्फ़ोसिस वाला कीड़ा हैं...लेकिन आईने में देखिए तो सही :) क्या पता आपको मालूम चले, आप बैटमैन हैं :D

Happy Diwali. 
अपना मन और आपका घर रोशन रहे।

24 March, 2025

जादू टूटता भी तो है।

There are monsters inside my heart. Every couple of days or months I need to go on a holiday to let them lose in the wilderness of solitude. They graze upon silent hours and come back to their cell, voluntarily. When I fail to do so, they keep ramming against the bars of my heart. I live, anxiously. Afraid the bars are not strong enough, and maybe, not even my heart. 


Everyone tells me I should be thankful and grateful to the universe that has given me everything. I am, eternally grateful. Yet, I don’t understand the insane desire to get away. क्या इसे ही मन से आवारा होना कहते हैं। क्या एक सुंदर घर बसाना मुझे कभी नहीं आयेगा? क्या हम सुख से भाग रहे हैं?


मन इतना अशांत क्यों होता है?


आज मन बहुत विरक्त हुआ है सुबह से ही। स्विमिंग नहीं गए। वरना थोड़ा यह सोच कर अच्छा लगता है कि मन का कोई इलाज नहीं है लेकिन एक घंटा तैर लेने के कारण शरीर होता बेहतर रहेगा। एड्रेनलिन पंप हो जाता है तो एनर्जी लेवल ठीक रहता है दिन भर। लेकिन गए नहीं। हाई बीपी की दवाई चलनी शुरू हुई है। जैसे ही ये दवाई शुरू होती है, दो चीज़ें होती हैंमन एकदम शांत हो जाता है, इतना कि जैसे आइलैंड के आसपास का समंदर होता हीउसमें कोई लहरें नहीं उठतीं। और दूसरी चीज़ कि बहुत नींद आती है, इतनी थकान और आलस कि दिन भर सोने के सिवाये कोई काम करने का मन नहीं करता। कोई किताब पढ़ने का का कहीं घूमने या घर का और कोई भी काम करने का। Procrastination मोड में चला जाता है। 


हम जो हमेशा फाइट या फ्लाइट के मोड में रहते हैं, दिमाग़ एक तरह से हार मान जाता हैऔर कुछ भी नहीं करता। 


गाहे बगाहे यूँ भी होता है कि दिल में दर्द उठने लगता है। मुझे समझ नहीं आता कि क्यों। डेढ़-दो साल पहले कार्डियोलॉजिस्ट को दिखाया था, उस समय सब कुछ ठीक था। फिर ऐसे रहे-रहे दर्द और हॉट-फ़्लैश क्यों होते हैंऐसा लगता है कि कुछ तो गड़बड़ है, लेकिन ठीक-ठीक समझ नहीं आता कि कहाँ। क़ायदे से, हॉस्पिटल जा के फुल-बॉडी चेक-अप कराना चाहिए, लेकिन हम जानते हैं कि हमको एक लंबी छुट्टी चाहिए। सोच ये भी नहीं पा रहे कि अकेले जायें या किसी दोस्त के साथ। 


अजीब उलझन है। समझ नहीं आता। अकेले रहना है या किसी दोस्त के साथ। घर पर बच्चों को छोड़ कर सोलो ट्रिप पर जाते हैं तो भयंकर गिल्टी भी फील होता है। मॉम-गिल्ट से कैसे पार पाती हैं औरतें पता नहीं। इतना ज़्यादा सेंसिटिव क्यों ही होनाफिर ये भी तो है कि ख़ुद को एकदम से विरक्त कर भी पाते तो क्या कर ही लेते। 


मुझे फिक्शन के टुकड़े लिखने में सबसे ज़्यादा खुशी मिलती थी। कोई एक किरदार, यूँ सामने नज़र से गुज़र गया। जितना सा उस समय दिख पाया, उतना सा ही लिख पाये। पिछले कुछ सालों में ढूँढ ढूँढ कर अपने पसंद की औरतों के लिखने के किस्से पढ़े। कि शायद कोई रास्ता मिले, लेकिन उन्होंने लिखा नहीं है इस बारे में। इस्मत की काग़ज़ी है पैरहन पढ़ते हुए दो चीज़ों को जाने की हुलस थी, वो कैसे लिखती हैं और लिखते हुए जो जीवन में सवाल आते हैं इस इमेजिनरी के लिए, उसके लिए ख़ुद को कैसे तैयार या डिफेंड करती हैं। उनके लिखे में ये दोनों नहीं मिला मुझे। एलिस मुनरो अच्छी लगती रहीं, उनकी कहानियों का ट्विस्ट, उनकी कहानियों के किरदारलेकिन जब से जाना कि उन्होंने अपनी नाबालिग बेटी के सेक्सुअल असॉल्ट को कहानी में बरता लेकिन अपने उस पति के साथ रहीं और बेटी को भी नहीं बचायातब से चाहने के बावजूद उनकी कहानियाँ नहीं पढ़ पा रही। लेखन और लेखक का जीवन अलग होता है, लेकिन जब लेखक का कोई fatal flaw इस तरह से उजागर होता है तो फिर हम उस लगाव के साथ उसे नहीं पढ़ पाते। नेरूदा के बारे में जान कर ऐसा ही कुछ हुआ था। अब भी उनका लिखा पसंद आता है लेकिन फिर भी उससे मन उस तरह से नहीं जुड़ पाता। जैसे बाहर की हवा लगने के बाद मूढ़ी थोड़ा मेहा जाता है, उसका खनक चला जाता है तो खाने में उतना मजा नहीं आता। लेखक ऐसा ही होता हैएकदम खनकता हुआ होना चाहिए। ये लाइन कहाँ खींची जानी चाहिए, भगवान जानेकुछ लोगों को ये भी बहुत बुरा लगता है कि कोई लेखक सिगरेट-शराब पीता है या किसी ख़ास राजनीतिक विचारधारा का है या उसके कई प्रेम-संबंध रहे। मेरे लिए ये सब मायने नहीं रखताअधिकतर किसी की कला को उसके व्यक्तित्व से अलग रख कर देखने की कोशिश करते हैं। यह भी तो है कि ग़लतियाँ और गुनाह तो सबके होते हैं। 


यूँ भी गलती के हिसाब से सज़ा बराबर की होती है, ना माफ़ी।  


आज एकदम कहीं मन नहीं लग रहा था। मॉल में स्टारबक्स में बैठी हूँ। सामने एस्कलेटर लगे हुए हैं। कोई बच्चा नीचे आने वाले एस्कलेटर पर ऊपर जाने की कोशिश कर रहा है। उसे मजा रहा एक-एक सीढ़ी ऊपर चढ़ने पर भी नीचे आने में। हम भी अक्सर ऐसा ही करते हैं नासमय का एस्कलेटर हमें फ्यूचर में ले जा रहा होता है और हम समय की उलट दिशा में, अतीत में पीछे जा रहे होते हैं। जानते हुए कि ये ख़तरनाक है। कि हमें चोट लग सकती है। और ये भी कि आख़िर को हमें आगे ही जाना पड़ेगा। हम छोटे से बच्चे हैं। बहुत तेज दौड़ने वाले धावक नहीं कि एस्केलेटर की दुगुनी स्पीड से चढ़ाई पर दौड़ सकें और ऊपर जा सकें। उस स्थान पर जहाँ एक एस्कलेटर ऊपर रहा, एक नीचे की ओर जा रहा है। 


सुबह एडोलोसेंस देखने की कोशिश की। थोड़ी देर देखने के बाद हिम्मत नहीं हुई। छोटे बच्चों को एक्टिंग में देखना दुखता है। मालूम है ये एक्ट कर रहे हैं, फिर भी। क्यूंकि एक्टिंग करना किसी और के जिए हुए को थोड़ी देर को ही सही, जीना होता है। 


लिखते हुए थोड़ी देर को हम किसी किरदार का ग़म-ख़ुशी अपने भीतर महसूस कर रहे होते हैं। बहुत साल पहले जब इश्क़ तिलिस्म लिख रही थी तो उसमें दादी सरकार का किरदार था। एक रोज़ ऐसे ही स्टारबक्स में उसका एक चैप्टर लिख रही थी जब इतरां अपने ब्लैक-आउट से जूझने के लिए तिलिसमपूर जा रही थी। उस रोज़ आज की तरह ही स्टारबक्स में बैठे थे। ये इंदिरानगर ब्रांच था, यहाँ फर्स्ट फ्लोर पर ऊंची टेबल थी और आगे रेक्टैंगयुलर टेबल। बाहर कांच से शहर दिख रहा था। भागता हुआ। तभी अचानक से तिलिसमपूर के गाँव का वो आँगन दिखा जहाँ रूद्र दादी सरकार को बताने आया है कि वो इतरां को इलाज के लिए शहर ले कर जा रहा है। ठीक वहीं बड़ी सरकार ने देखा भय और उनके प्राण छूट गएयह मेरी आँखों के सामने घटा था। मैंने अपने जीवन में मृत्यु को इतने क़रीब से एक ही बार देखा था। यह काल्पनिक मृत्यु थी लेकिन जैसे सीने के बीच कोई तलवार घुंप गई। मैं फूट-फूट के रो पड़ी थी, जैसे किसी ने मेरे किसी अपने की मृत्यु का समाचार दिया हो। यह मेरे उपन्यास के प्लॉट में था ही नहीं। यह चैप्टर कहीं था ही नहीं। लेकिन मैं अपने किरदारों के हाथ इतनी बेबस थी कि चाह कर भी यह चैप्टर मूल उपन्यास से डिलीट नहीं कर सकती थी। मैंने उस चैप्टर को पूरा लिखा। उसके आगे का उपन्यास भी लिखा। लिखते हुए कितना कुछ भीतर महसूस होता है, हम इसे ठीक ठीक बता भी नहीं सकते। समझा नहीं सकते। कि उपन्यास ख़त्म करना एक लंबे रिश्ते को तोड़ कर आगे बढ़ जाना होता है। लेकिन ये ब्रेक-अप आसान नहीं होता। उपन्यास के किरदार आपके इर्द-गिर्द बने रहते हैं। 


और एक दिन अचानक से वे आपको छोड़ कर चले जाते हैं। मैं स्टेज पर थी। दिल्ली में। जो मेरा दुनिया का सबसे प्यारा शहर है। मैं अपनी कहानी पूरी तरह भूल गई। एकदम ब्लैंक। ऐसा कुछ दोस्तों के साथ एग्जाम टाइम में होता था कि पढ़े हुए सवाल दिमाग़ से उड़ गए। मेरे साथ कभी नहीं होता था। मुझे भूलना आता ही नहीं था। फिर मेरे बनाए किरदार तो मेरे भीतर रहते हैं, यहाँ से जाएँगे कहाँ। 


मैंने कहानी सुनानी शुरू कीऔर लगा जैसे मेले में हाथ छूट गया हो किसी का। इतरां, रुद्र, मोक्ष, दादी सरकारसब एक पानी की दीवार के पीछे थे। मुझे कुछ याद नहीं था। यह अब मेरी कहानी थी ही नहीं। मुझे हमेशा लगता था लिखना जादू है। की वाक़ई सरस्वती का आशीर्वाद है। वरना अच्छा-बुरा, कोई कहानी नहीं लिख सकते थे हम। लिखने से ज़्यादा मज़ा मुझे सिर्फ़ कहानी सुनाने में आता था। This was my forte, this was who I always was, a phenomenal storyteller. मेरे साथ ऐसा कभी नहीं हुआ हो कि मैं कोई क़िस्सा-कहानी सुना रही हूँ और सुनने वाले का ध्यान भटक जाये। एक जादू था जो मेरे भीतर रौशन हो जाता था। हम ख़ुद एक तिलिस्म, एक जादू, एक अचरज बन जाया करते थे। उस लड़की से मुझे बहुत प्यार था जो स्टेज पर कहानी सुनाने आती थी। 


उस रोज़ वो जादू टूट गया। 

कि जैसे बदन एक जादू भरा मर्तबान था और मेरे हाथ से गिर कर टूट गया और सारा जादू हवा हो गया। 


जादू तलाशना होता तो मुझे मालूम था कि कहाँ जा के खोजते हैंलेकिन जादू होना फिर से कैसे सीखते हैं। यह तो ख़ुद-बख़ुद होता था। मुझे यह करना नहीं आता। 


हम जादूगर नहीं थे, जादू थे। 


जादू करना सीख लेते, जादू होना कैसे सीखें। कहाँ से सीखें। मालूम नहीं। 


मुझे यह भीतर-भीतर खा रहा है। चाह के भी हम कुछ कर नहीं पा रहे। लिखने का मन करता है और कहीं दूर भाग जाने का। खूब घूमने का। दरिया किनारे। गंगा-किनारे। किसी मंदिर के फर्श पर बैठना सर टिकाये हुए। गाड़ी चलाते जाना, तेज और तेज।  पता नहीं, ये कभी फिर से होगा या नहीं। 


लेकिन काश कि हो पाये। 


कोई पुराना इंटरव्यू सुन रहे थे कहीं, आनंद बख्शी काउनकी एक कविता के अंत में आती है लाइन। यही उनकी किताब का शीर्षक भी हैपर लगता है, शायद यही दुआ हो आख़िर भी


मैं जादू हूँ, मैं चल जाऊँगा

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