26 July, 2026

उम्मीद की ओवरडोज़ से मर जाओ तुम…तुम इसी काबिल हो।

बहुत ट्रैफिक है। बहुत ज़्यादा भीड़। एक एक इंच पर गाड़ियाँ, लोग, सड़क टूटी हुई कहीं से भी…बिल्कुल हिसाब से कार चलाती हूँ, फिर भी घड़ी-घड़ी डर लगता रहता है, अभी कोई बगल से रगड़ जाएगी गाड़ी, कोई टू-व्हीलर वाला ठुक जाएगा। कोई पैदल आदमी चिप जाएगा दो गाड़ियों के बीच से जो गुज़रने की कोशिश कर रहा। सिर्फ़ बम्पर टू बम्पर नहीं है, बॉडी टू बॉडी ट्रैफिक क्यों नहीं कहते इसको। इतनी मुश्किल ड्राइव में न कोई गाना सुन सकते हैं, न कोई पॉडकास्ट। लेकिन तुम्हारे ख्याल को कोई मतलब नहीं कि मेरे पास लिटरली कोई मेंटल स्पेस नहीं है…नो एंट्री, वन वे, रॉंग वे, कुछ से मतलब नहीं उसको…इतने ट्रैफिक में भी सपने और कहानी के बीच बौख रही हूँ मैं। गूगल मैप में देखती कि पटना की कौन सी सड़कें थीं, जिनपर तुम गए होगे…किन सड़को पर मैं घूम रही थी। तुम जिन दिनों थे, उन्हीं दिनों। क्या मैंने तुम्हें भीड़ में देखा है कभी? तुम मेरी याददाश्त में इसी जन्म से उलझे हो। तुम्हें देख कर अचानक से सोचा हो, तुमसे मिलना है…पर ठीक अभी नहीं। तुम्हें देख कर सोचा हो, तुम पिछले जन्म के परिचित नहीं, इसी जन्म के किसी फ्यूचर के परिचित हो…कुछ हो…जो मुझे समझ नहीं आता। फ़िलहाल नहीं आ रहा, बाद में भी नहीं आयेगा।

तुम उलझन हो…आत्मा का गिट्ठा।

साड़ी पहन कर कोई नदी किनारे नहाने चले गए हैं…सिक्का रखे हैं, आँचल में बाँध कर…खो न जाये इसलिए दो दो गिट्ठा लगाए हैं…तुमको मालूम, दो गिट्ठा को पक्का गिट्ठा कहते हैं। एक गिट्ठा को कच्चा गिट्ठा कहते हैं।

तुमको क्या कहते हैं? सपने और कहानी के बीच तुमसे मिलने की जगह टटोलते हुए पहुँचे हैं।
तुमको भूल क्यों नहीं जाते?

सपने। हमेशा सपने में ही। एकदम कहानी के भीतर खुलता है सपना। मैं उनींदी क्यों पकड़ना चाहती हूँ तुम्हारा हाथ। फिसलता है शहर…फिसलते हैं किरदार…तुम कहते हो, अगली बार सुनाऊँगा कहानी। हम कहते हैं, ना ले रहे एक जन्म तुम्हारे लिए…उसमें भी ये फुसला तक नहीं रहे, कि मुहब्बत हो जाएगी मुझसे…इतना ईमानदारी का क्या करें हम? भर दुनिया से झूठ बोलो और हमारे पास आए बड़ा हरिश्चंद्र। Am I just a scribe? हम भगवान जी से पूछ रहे, गाँव के पूजाघर में ज़मीन गीली है, छोटे से रौशनदान से धूप का गोल टुकड़ा भीतर आ गिरा है, चोट लगी है उसको, अगरबत्ती के धुआं का पट्टी लपेट रहे। बेवकूफ, ऐसे धप से थोड़े कूद जाते हैं, धीरे धीरे आना था ना, पोछा अभी लगा है, ज़मीन तो गीला होगा ही।

पूरब की ओर मुँह कर के लोटे से जल ढार रहे हो तुलसी से गमले में, पीठ पर नए जनेऊ से तनिक छूटा हुआ पीला रंग लगा हुआ है। मंत्र पाठ में उच्चारण भी सही है और लय भी वही है जो मेरे चाचा या पापा की है। पर तुम तो मेरे गाँव से नहीं हो। तुम्हारे यहाँ भी ऐसे ही पूजा में मंत्रपाठ होता है। तुम्हारा गाँव मेरे गाँव से कितना दूर है। मैं मेंटली गूगल मैप खोल कर धागा खींच रही हूँ। मैं एक धुन से बँधी हुई हूँ, बचपन और बहुत बाद के जीवन में भी। अगरबत्ती से धुआँ उठ रहा है। मेरी ज़ुबान पर ठेकुआ का स्वाद है। सतनारायण कथा का कच्चा, गीला परसाद। तुलसी का पत्ता।

बे, तुम आदमी हो कि जादूगर!

तुमको बता दें? मर तो नहीं जाओगे सुन कर? तुम्हारा डेरा मायका जैसा कैसे लगता है। तुम तो मेरे गाँव के भाई तक नहीं। तुम्हारे साथ बिगड़ने के किस्से सुनाते सुनाते बड़ा इनारा तक चले जाते हैं। सच में गाँव गए इतना टाइम हुआ। हम जिस गाँव तक लौटते हैं, वैसा कुछ बचा ही नहीं है कहीं। न गोबर से लीपा हुआ आँगन। न गोहाल में बाँधा गाय-बछड़ा। तुमको यकीन होगा कि हमको याद नहीं है कि तुलसी चौरा के अंदर हनुमान जी बने हैं या कोई और देवता। कोई देवता है भी या नहीं। दिया बारते हुए हमेशा आँख बंद किए। सोचो, भगवान को पहचान भी नहीं रहे। तुमको पहचान रहे, नींद में टटोल कर। तुमसे क्या है, मालूम नहीं। लेकिन निभाना। तुम पर क्यों भरोसा है, मालूम नहीं। तुमसे कुछ मांगने को हाथ फैलाती हूँ तो लगता है भीख नहीं, प्रसाद माँग रही।

***

मेरा माथा ख़राब है। इसमें इतना कोहराम मचा रहता है। इतना उलझा हुआ सब कुछ कि समझ नहीं आता कि करें तो क्या करें। किसी का नाम लिखने में हिचक होती है। एक बहुत पुराने दोस्त को कॉल नहीं किया है। लगभग साल भर से। मतभेद हो गया किसी मुद्दे पर। अब मुद्दा भी याद नहीं। लेकिन कहीं न कहीं ऐसी बात आई कि मुझे लगा, मैं उसकी ज़िंदगी में कुछ भी जोड़ नहीं रही, सिर्फ़ माँग रही, उससे, उसका वक्त…इस वक्त के बदले मैंने उसे कभी कुछ नहीं दिया, चंद कहानियों के सिवा…वो भी कुछ सच्ची, कुछ झूठी।

बातों के मोल इस दुनिया में कुछ नहीं ख़रीद सकते…और सब कुछ सौदा ही है।
हम ख़ाली हाथ हैं। मेरे पास कुछ है ही नहीं तुम्हें देने को। कुछ भी नहीं।

जेब में कहानी लिए घूमती हूँ। वक्त के बदले कहानी, एकदम नई। सुनोगे?

सच्ची कहानी। मिला था मुझे ऐसा लड़का, तुम इमेजिन भी नहीं कर सकते। कहता था, कहानी के पैसे मिलते हैं। पागल कहीं का। कौन सुनेगा…जाने किस ज़माने की कहानियाँ। मुहब्बत कोई सच की चीज़ थोड़े है, मुहब्बत तो शक की चीज़ है। हमने हमेशा गुनाह किया, मुहब्बत कभी ईमान की रही ही नहीं। लेकिन दिल, जाने किस ईश्वर को पूजता था…दिल हमेशा ख़ुद को बेगुनाह मानता रहा। उसे ना कचहरी से मतलब, न वकील से, न गवाह से…दिल कहता, मेरे हिस्से के लोग दो, मेरे किस्से के लोग दो मुझे…रात को बौखते रहो शहर में तन्हा…इंतज़ार करते रहो, जब कि कोई आने को नहीं है। आसमान को उलाहने दो…

उम्मीद की ओवरडोज़ से मर जाओ तुम…तुम इसी काबिल हो।

मैं बहुत तेज गाड़ी चलाने के बावजूद, हर जगह देर से पहुँचती हूँ। समय के पक्के लोग, मेरे कच्चे दोस्त होते हैं। समय के पक्के लोग, मेरे सच्चे महबूब होते हैं। मुहब्बत में मैं इन्तज़ार होती हूँ। दोस्तों को मालूम होता है, मैं देर से पहुँचूँगी…महबूब को मालूम होता है, मैं बिफ़ोर टाइम पहुँचूँगी…मैं बहुत दूर से लौट कर आऊँगी…मुझे जाना आयेगा ही नहीं। समय काटने के लिए स्विसआर्मी नाइफ़ रहती है बैग में…शोर्ट स्टोरीज की किताबें, कविताएँ, आधे पढ़े रैंडम नॉवेल्स…कई बार पढ़े, और लगभग पूरे याद किस्से…समय काट काट के पुर्ज़े उड़ाती रहती हूँ।

मुहब्बत के अमीर दूसरे किस्म के लोग होते हैं। उन के दिल में बने-बनाए प्लॉट्स रहते हैं। सच की ज़मीन, मेरे दोस्त…सच की ज़मीन…वो भी बाप-दादों की…ख़ुद की कमाई से खरीदी नहीं, ख़ानदानी अमीर होते हैं ये लोग। उनका पूरा दिल ख़ाली रहता है। उनकी जब इच्छा हो, किसी को भी वहाँ इमारत खड़ा करने के लिए बुला सकते हैं। महबूब के लिए मकान, सराय, खेल का मैदान, स्विमिंग पूल, जंगल, बगीचा, खलिहान…जो चाहे, उगा सकते हैं…बना सकते हैं।

मेरी कभी ऐसी औक़ात रही ही नहीं। मैंने उसको किस्तों में चाहा। मैंने उसको किस्सों में चाहा। मैंने उसको भूलने की हद तक चाहा। मैंने वाक़ई, उसे औक़ात से बाहर चाहा।

पर ये तो गुनाह ही होता ना?

***
मैं उससे पूछती हूँ, बहुत व्यस्त लोगों को भी मुहब्बत हो जाती है ना? ग़लत समय पर।
मुहब्बत का कोई सही समय होता भी है?
पागल हो जाने का भी सही समय कौन सा होता है। 

बस, मर जाने का सही समय होता है।
तुम देखना, हम एकदम ठीक समय मर पायेंगे। ना जल्दी, न देर से। 

1 comment:

  1. उम्मीद की ओवरडोज बढ़िया है और मारना वो भी सही समय पर गजब :)

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