29 April, 2026

चोट पर फूँक मारने से दुखना कम होता है, सच्ची?

दुनिया के कई सारे काम हैं, सिलसिलेवार ढंग से करूँ, तो पूरे होते चले जायेंगे। लेकिन हम तुम्हारी याद में अक्सर गिरफ़्तार हुए बैठे होते हैं। सब ठीक होता इतने में भी, लेकिन दिक्कत ये है कि सिपहसालार, हथकड़ी लगा देते हैं। ऐसे में लिखना-पढ़ना दुश्वार हो जाता है।

स्टारबक्स में बैठी हूँ। एक हॉट अमेरिकानो और एक आइस्ड अमेरिकानो ऑर्डर किया है। दोनों ड्रिंक्स सामने रखे हैं। मैं बरिस्ता को बोलना भूल गई कि एक के बाद एक बनाना। सामने दोनों ड्रिंक्स रखे हैं। काँच के ग्लास में कोल्ड और सिरेमिक कप में हॉट। इन दोनों को साथ देख कर अपनी याद आती है। सिर्फ़ अपनी नहीं, कई बार दोस्तों के साथ जो दिल्ली में कॉफ़ी पीने गई हूँ, वो याद आते हैं। पर याद आने में थोड़ी तेरी गुंडागर्दी चलने लगी है, तो तू ज़्यादा याद आने लगा है।

अच्छा है, तुझसे कम मिलते हैं, कहने वाले हम, इस बात पर थोड़ा उदास होने लगे हैं कि हम कम मिलते हैं। ज़िंदगी छोटी सी है। इसमें दोस्तों से मिलने में भी किफायती होना पड़ रहा है। क्या जुल्म है।

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तीन दिन पहले, इसी हफ़्ते के सोमवार

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तेरी ज़्यादा याद आती है तो मेरा दिमाग़ ही नहीं ख़राब होता है, दुनिया का हिसाब-किताब भी गड़बड़ा जाता है। देखो, ना, बरिस्ता ने आज मेरे लिए शोर्ट अमेरिकानो बना दिया। अब इत्ते से कॉफ़ी से तो हम कुल्ला भी न करें। तो बोलना पड़ा, कि देखो, तुम हमारे कॉफ़ी के ऑर्डर के हिसाब से छोटा कॉफ़ी बना दिए हो। बिचारी बरिस्ता नई थी। तो फिर दूसरी कप कॉफ़ी बना लिए वो लोग। अब बताओ, क्या ज़ुल्म है ना। शहर में तुम नहीं हो और हम बैठ के दो कप कॉफी अकेले पी रहे हैं।

छोटी सी बात है, लेकिन गाली तुमको देने का मन किया। सपना भी ऐसा ही सब देखे हैं आज रात। किसको किसको खींच लाए हैं सपने में। बदतमीज़ दिल। एकदम हाथ से बाहर होता जा रहा है।

तुम्हारे बारे में सोचते हुए इतने सुंदर लगते हैं कि तुम्हारे साथ होते हुए भी नहीं लगते। यू नो, मुहब्बत में सब कुछ इंतज़ार ही है। तुम्हारे आने का, तुम्हारे होने का। तुम्हारे साथ के शहर, तुम्हारे एब्सेंस के शहर। तुम्हारे लिए लिखे पोस्टकार्ड। तुम्हारे लिए न ख़रीदे गए शर्ट्स। तुम्हारे हिस्से की शामें। तुम्हारे हिस्से की दोपहरें। तेज ड्राईव्स।

मुझे डर इस बात से लगता है कि मुझे आजकल डर क्यों नहीं लग रहा है।

मालूम, पॉंडिचेरी गए थे। इस बार 183 पर मिनी चला लिए। कल कज़िन के यहाँ गए थे, पूछता है, ‘डर नहीं लगता है दीदी?’, समझाये उसको, कि इसी बात का तो डर है कि डर नहीं लगता है। काहे नहीं लगता है, लगना चाहिए। क्यों अच्छा लगता है ऐसे मौत को इस तरह क़रीब से छू कर आना। गाड़ी तेज चलती है, तो सोचती हूँ। जरा सी भी गलती हुई तो बॉडी इस तरह से टैंगल्ड हो जाएगी कार में कि चुन चुन के जलाना पड़ेगा। ख़ून दिखता है। ख़ुद को मरते हुए देखती हूँ कई बार। क्या ही कहें किसी ड्रग एडिक्ट की तरह होता है शायद इस तरह का नशा भी। तेज उड़ती है गाड़ी। बहुत बहुत तेज। उतनी थोड़ी देर कुछ भी नहीं दुखता। न पास्ट न प्रेजेंट न फ्यूचर। एकदम से ठीक उसी मोमेंट में होते हैं। योगा हमसे नहीं होगा। हमको फ्रीवे पर गाड़ी चलाने दो। करने दो कुछ छोटे गुनाह।

गाड़ी में सिगरेट पीते हैं और सुनते हैं…मेहंदी हसन मीर को गा रहे, ‘देख तो दिल कि जाँ से उठता है, ये धुआँ सा कहाँ से उठता है’. पता नहीं, क्यों, ये गाना बजा कर बहुत अच्छा लगता है। इसमें एक शेर आता है। “गोर किस दिलजले की है ये फ़लक, शोला इक सुब्ह याँ से उठता है।” शाम ऑलमोस्ट हो चुकी है। बैंगलोर से पॉण्डिचेरी का रास्ता स्टेट हाईवे है काफ़ी दूर तक। वैसे तो इस रास्ते पर कई बार आए गए होंगे, लेकिन शायद इस मौसम में इस गाड़ी में कभी नहीं आए गए हैं। धान की कटाई का समय है। धान की गंध उड़ रही है। सड़क पर कई जगहों पर लोगों ने अपने घर के आगे धान पसार रखा है सुखाने के लिए। गंध उड़ रही है, हवा में इर्द गिर्द है। धान की गंध लिबास की तरह बदन से लिपटती है…साड़ी की तरह लपेट रही…उसमें धूप की गर्माहट है और बचपन के दिन हैं। गर्मी की आहट वाले दिन जब कि पेड़ों पर आम नीचे लटके दिखते थे। होली के आसपास ऐसी गंध होती थी गाँव में। कटे पुआल की…इस गंध के साथ पूरे देह का छिलना भी याद रहता है। पुआल की टाली में सब बच्चे कूदते थे। पुआल में धार होती है। धान भी नुकीला होता है। देह में यहाँ वहाँ खरोंच पर अक्सर गेंदा के पत्ते मसल कर लगा लेते थे। या पानी से धो लिए…तनी-मनी छिलता था, ठीक हो जाता था अपनेआप।

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मेरे घर के आगे अमलतास के दो पेड़ हैं। वे बारी-बारी से फूले…पहले जिस पेड़ पर अमलतास आए, उसके पूरे फूल ख़त्म हो कर जब तक हरे पत्ते आए, उसके पास का अमलतास एकदम ठूँठ ही था। मुझे लगा, पेड़ में शायद कोई तरह की खाद डालनी चाहिए थी। कि हालांकि मैं इस साल जनवरी में इस घर में आई हूँ, फिर भी कहीं न कहीं इस छोटे से अमलतास के पेड़ का न फूलना मेरी ही गलती है।

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मेरी आँखें थोड़ी ख़राब हो गई हैं। अब अक्सर हर कुछ ही देखने में दिक्कत होती है। कभी दूर का तो कभी पास का नहीं दिखता। अंधे लोग चीज़ों की छू कर शिनाख़्त करते हैं। शायद बहुत साल से मैं ऐसी तैयारी कर रही थी कि जब देखने में दिक्कत हो, आँख बंद कर गहरी साँस ले सकूँ और चीज़ें ठीक ठीक याद रह जायें…स्टारबक्स में कॉफ़ी का गर्म कप पकड़ूँ और तुम्हारे हाथ याद रहें। कोई खुरदरी दिवाल पर हाथ फिराते चलूँ और सांची के स्तूप देखते समय भिक्षुओं के कमरे की दीवार पर हाथ फिराना महसूस हो…धूप, हवा और तुम्हारा होना महसूस हो…तुम्हारी मौजूदगी से दिल को थोड़ा सा करार आता है, वो रहे.

हम बेचैन लोग हैं…शायद बहुवचन में लिखना सही न हो…मैं बेचैन रहती हूँ अक्सर…मेरे दिल को सलीके से धड़कना नहीं आता…बहुत कम सुबहें होती हैं कि palpitations न होते हों…अब तो याद भी नहीं आता कि कभी मैं ऐसे भी थी कि ये घबराहट रोज़मर्रा का हिस्सा नहीं थी। मालूम, मुझे कॉलेज में लोग पूछा करते थे, तुम हमेशा इतनी खुश क्यों रहती हो? क्या हासिल हुआ है तुम्हें? हासिल उन दिनों भी कुछ नहीं था…लेकिन छोटी छोटी चीज़ों को देखना और उनमें ख़ुश होना थोड़ा ज़्यादा होता था। चाहे वो पटना की सड़क पर चलना हो, जिसमें गुलमोहर और अमलतास अल्टरनेट लगे हुए थे। चाहे वो उस लड़के का इंतज़ार हो, जो कहता था कि मुझसे प्यार नहीं करता…शायद सिर्फ़ अच्छी लगती हूँ उसे…लेकिन इसको प्यार थोड़े न कहते हैं। मुझे इन दिनों भी छोटी छोटी चीज़ों से बहुत ख़ुशी मिलती है। धूप-छाँव वाला ज़मीन का कोई हिस्सा हो, कोई संगीत का टुकड़ा हो, गाड़ी चलाते हुए दिखता, एकदम नीला आसमान हो या कि सूर्यास्त या सूर्योदय। बच्चे भी मेरी तरह कोई फूलों से पूरा लदा हुआ पेड़ देख कर खुश होते हैं, उस पेड़ का नाम पूछते हैं। कभी-कभी होता है, मुझे मालूम नहीं होता, और कहती हूँ, मेरे पास सारे जवाब नहीं है, पर मैं खोजूँगी तुम्हारे लिए। 

शायद तुम समझो, तुम्हें बताने का मन करता है। हालाँकि, तुम्हें बचाने का मन भी तो करता है। मन के भीतर गहरा, गाढ़ा, चिपचिपा तारकोल है…गर्म, खौलता हुआ…इसकी गंध जलाती है, इसकी छुअन भी…इसी कोलतार से सड़कें बनाती हूँ, उन सड़कों पर फर्राटे से याद की गाड़ी चलती है…वरना पहले कच्ची सड़कें थीं…उनपर चलने से तुम्हारे जूते गंदे हो जाते। तुम्हें जूते उतार कर बैठना अच्छा नहीं लगता। शायद तुम भी मेरी तरह, बस, किसी भी समय उठ कर चले जाने का सोचते रहते हो। कभी-कभी। तुम्हें लगता है जूते उतार के बैठने से होटल का कमरा घर जैसा लगने लगेगा। कि घर के भीतर आने के पहले हम जूते उतार कर आते हैं। नहीं?

मुझे भूल जाने से बहुत डर लगता है…भुला दिए जाने से भी। दरअसल ज़िंदगी में कोई बड़ा हादसा होता है तो वो हमारी core identity हो जाता है। हम चाह कर भी अपनेआप को उस हादसे से इतर बना नहीं पाते।

एक मई को मम्मी का बर्थडे है। मैं कभी कभी चाहती हूँ कि ये तारीख़ भूल जाऊँ। लेकिन भूल नहीं पाती, वैसे उस दिन छुट्टी रहती है, तो चाह के भी भूलना मुमकिन नहीं है। घर पर रहने का मन नहीं करता एक मई को…अजनबियों के बीच रहना चाहती हूँ…उन्हें मम्मी की बहुत सी बातें बताना चाहती हूँ, कि शायद वे बिना जजमेंट के सुनेंगे…अटकती हुई कहना चाहती हूँ, कि मुझे भुला दिए जाने से इसलिए डर लगता है कि मैं जानती हूँ, बहुत कोशिश करने से हम सब कुछ भूल सकते हैं…

मैं अपना पूरा बचपन भूल गई हूँ…वो सब कुछ जो उसके इर्द-गिर्द था। उसकी साड़ियों के रंग…उसकी ख़ुशबू…उसके बनाए खाने का स्वाद…कभी कभी जब उन लोगों से मिलती हूँ जो उसे जानते थे, जो मुझे जानते थे और वो मुझे उसके बारे में बताते हैं, तो मुझे याद आता है…दुखता हुआ, कि ज़िंदगी में ये सुख भी था।

हम जिससे प्यार करते हैं, उससे मिलना हमेशा जादू होता है…

लेकिन कभी-कभी, कुछ ख़ुशक़िस्मत लोगों को नसीब होता है कि जिससे बहुत प्यार करते हैं, उससे बिछड़ते हुए, उनके सीने से लग कर, मन भर रो सकें। जैसा बिछोह लिखा है कभी कहानी-किताब में, वैसा कोई बिछोह जी सकें। कभी ऐसा भी हो ज़िन्दगी में, कि रोने पर कोई पोंछ सके आँसू, कि रोते हुए तमीज़ का ख़्याल न रखें…कि कोई बाँध टूटे आँसुओं का, तो टूट जाने दें। कि तुमसे बिछड़ने के दुख में मिल जायें, जीवन के सारे पुराने दुख, “चाँद के साथ कई दर्द पुराने निकले, कितने ग़म थे जो तेरे ग़म के बहाने निकले”। तुमसे बिछड़ना-मिलना तो कई जन्म का किस्सा है। बिछड़ते हुए, हर बार लगता है, इस जन्म, आख़िरी बार मिल रहे हैं। मिलते हुए, हर बार लगता है, बीच में कई जनम बीत गए।

हाथ से बुने कपास में जादू होता है। उसकी मेमोरी डिस्क होती है…तभी तो, वो हैंडलूम की नीली साड़ी जो तुमसे मिलने के दिन पहनी थी, तह कर के रखी है। उस दिन के बाद दुबारा पहन नहीं पायी हूँ। लगता है कोई फ्रैजिल तिलिस्म है उसमें, खोलने से टूट जाएगा। साड़ियाँ कम रिपीट होती हैं वैसे भी, इतनी सारी ख़रीदती रहती हूँ, कम ही मौक़े आते हैं पहनने के…

मिलने वाले दिन के विजुअल cues हैं, याद को खंगालती हूँ, तुम्हारी ब्लैक शर्ट, तुम्हारे बिना क्रीज वाले लिनेन पैंट्स…तुम्हारी चवन्नी हँसी…सब कुछ आपस में मिला जुला है…मोंटेज.

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आज सुबह एक चिट्ठी मिली…स्त्रीलिंग पुल्लिंग, जेंडर डिफाइन करने में मुश्किल हो रही है…कभी लिखती हूँ, तुम्हारा ख़त मिला. कभी लिखती हूँ, चिट्ठी. सुबह उठी तो पैल्पिटेशंस थे, अक्सर जैसे होते हैं. चिट्ठी पढ़ी और इतना रोना आया…ख़ुशी वाले आँसू। कभी यकीन नहीं होता, कि किसी की ज़िंदगी में मेरी कोई ख़ाली जगह है. इक इतवार जैसी. 

कि कितना सादा वाक्य है, ‘तुम्हारी याद आती है’, कलेजे में राहत महसूस होती है, जैसे माँ चोट पर फूँक मार रही हो.

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