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06 January, 2026

Have you met the wild women that have mysteriously obscure windmills in their hair?

Have you met the wild women that have mysteriously obscure windmills in their hair? When they drive fast on open roads past midnight…the city air feels as free as they are…the windmills create electricity and they come back to their work-desk, charged by the mad, wild, wind…racing through their hair…

They feel indestructible then. The women that thrive on coffee. Prowling their house full of people like time-thieves. They need just a couple of moments, alone, in order to survive the next day.

Do you know women feel like a live time bomb, most of their life? Something is always ticking inside their heart. But it’s been such a long time living with the bomb that they have forgotten if they are a part of the bomb diffuser squad or the bomb detonating one.

***

I’ve often raced like mad to catch a fleeting glimpse of one such woman. Sometimes, she does appear in the rear-view mirror of my Mini Cooper Convertible. They don’t write, “Objects in the mirror are closer that what they might appear”, on these mirrors anymore. Someone believes, all of us already know this fact. Though, we could all do with a reminder, some days, I guess. I might just cause an accident in order to touch her…one of these days. My palpitating heart calms down when it sees her. I should be scared though, the way most people are scared of ghosts. But I can’t ascertain the time to which she belongs…future or the past, definitely not the present…timeless in a way I can’t fully comprehend. We are born fearless and slowly learn to be afraid, a mix of causality and probability we pretend to understand.

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3:00 a.m., January the 6th, 2026.
मुझे मैकबुक पर लिखने के पहले काग़ज़ पर लिखना ज़रूरी होता है। जब तक इंक पेन से काग़ज़ पर न लिखूँ, सतरें नहीं लगतीं। साँस ज़्यादा रैंडम चलती है। लिखने के लिए साँस का एक लय में आना जरूरी होता है। इतनी देर रात सब कुछ एकदम शांत है। सिर्फ़ कीबोर्ड की आवाज़ आ रही है। निब का काग़ज़ पर चलना, टाइपिंग की आवाज़, सिगरेट का कश खींचते हुए जलते तंबाकू के पत्तों की मद्धम आवाज़…ये मेरी बेहद पसंद की आवाज़ें हैं। रात इसलिए भी अच्छी लगती है कि ये आवाज़ें दिन में इस रिदम के साथ सुनायी नहीं देती। जब से मुझे लिखने का होश रहा है, मेरे सोचने की भाषा हिंदी रही है। लेकिन मेरे बच्चे दिन भर अंग्रेजी में ही मुझसे भी बतियाते रहते हैं इसलिए मैं देखती हूँ कि आजकल पर्सनल भी कुछ लिखना होता है तो शुरुआत हमेशा अंग्रेजी से होती है। हाँ एक दो पैराग्राफ के बाद मन थक जाता है और अपनी आसान मातृभाषा की ओर लौटता है।

2025 कमाल का साल था, कुछ अर्थों में। जिसमें सबसे मजेदार चीज़ रही कि मैंने यह साल हांगकांग में शुरू किया। हम 31 January को हांगकांग पहुँचे थे। तो इस साल मुझे एक्स्ट्रा डेढ़ घंटे मिले। कि मेरा साल 2025, भारत के डेढ़ घंटा पहले आ गया था। साल की शुरुआत में एक बेहद सुंदर घर था, जिसमें बड़ा सा लॉन था। गहरी गुलाबी बोगनविला थी, गराज में झूलती हुई। जब भी मिनी कूपर बाहर निकालती, पहले गुलाबी झालर आती फिर नीला आसमान। गराज से गाड़ी निकालना अपने आप में बेहद सुंदर था। इस साल मैंने अपनेआप को ठहरने की इजाज़त दी। मेरे जुड़वाँ बच्चे हैं, मुझे अपने बच्चों का बचपन एक ही बार मिलना था। जैसे अधिकतर दो बच्चों की मम्मी को होता है, कि बचपन दो बार मिलता है…मेरे साथ नहीं था। लगभग पूरे समय घर पर रहने और एक भी सोलो ट्रिप नहीं करने के बाद भी मैंने महसूस किया, कि वक्त कभी पूरा नहीं पड़ता। हमेशा कम लगता है। बच्चों को भी लगता है कि मैं उनके साथ समय नहीं बिताती, मुझे भी लगता है, मैं उनके साथ ज़्यादा समय नहीं बिता पा रही। मैंने कुछ लिख नहीं रही, पढ़ नहीं रही…तो फिर ये समय जा कहाँ रहा था!

मैंने बच्चों को समझाया। आप किसी से प्यार करते हैं तो ये ज़रूरी नहीं है कि वो हर वैसी चीज़ करे, जिसमें आपको ख़ुशी मिले। Part of loving someone is letting them do things you don’t want them to do…this is called freedom…and this is a very important part of loving someone. वे धीरे-धीरे समझेंगे, मुझे मालूम है। बच्चे समझदार होते हैं। पर उसके पहले उन्हें बिल्कुल नासमझ होने का और बहुत सारा प्यार और समय मांगने का पूरा हक है। मुझसे जहाँ तक हो पाता है, मैं अपने हिस्से का वक्त उनके नाम करती हूँ। There are no rules of motherhood. We are doing the best we can. Really. The full time mothers, the part-time workers, the work from home mothers, the ones that are on a break. All of us. While being mothers, we are slowly being erased from everywhere…we do notice this…and yet choose silence and peace over protest on most days. I’ve realised, I have got my superpower back…making friends…and this time not over writing, because I hardly write anymore…but over motherhood. I’m friends with class-mates of my kids…as casually as I became friends with people who felt too deeply and wrote about the world with an urgency as if not noticing the mood would actually cause it to disappear. Theoretically, It will, but also, no one ever looking at the moon is actually impossible.

Diary by khwaab tanha collective
I have a traveling heartache. जब दिल दुखना बंद होता है, तो दर्द कहीं और शिफ्ट कर जाता है। Logically or medically समझ नहीं सकते, शायरों को समझ आता है, दुष्यंत कहते हैं ना, “सिर से सीने में कभी पेट से पाँव में कभी इक जगह हो तो कहें दर्द इधर होता है”। कुछ न कुछ दुखता रहता है। जयपुर गई थी, आख़िर नवंबर में तभी पैर में चोट लगी थी। हल्का दर्द था तो इलाज की जगह, इग्नोर कर दिया। इधर शिफ्टिंग में इतना ज़्यादा चलना फिरना हो गया कि पैर में दर्द उठ गया था बुरी तरह। हाथों में दर्द अलग। 

अभी चार तारीख को घर शिफ्ट किया है। कितने भी अच्छे पैकर्स एंड मूवर्स बुलवा लो। कितना भी कहो कि किताबें प्यार से, अच्छे से पैक करना…वे किताबों का सत्यानाश करने के लिए पूरी तरह सक्षम होते हैं। सामान सिर्फ़ लोड कर कर दूसरे घर पर रखने में रात के साढ़े नौ बज गए। बॉक्स को लेबल करने के बावजूद इन्होंने मेरी किताबों के बक्से उन कई सारे बक्सों में कहीं मिला कर रख दिया कि खोजते खोजते नहीं मिला। आख़िर को रात दस बजे के आसपास निकलने के ठीक पहले उन्होंने मेरी किताबों के बक्से ला कर रख दिए। बुकरैक अभी दीवार में फ़िक्स नहीं हुआ था इसलिए किताबें वहाँ रखना ख़तरनाक हो जाता, बच्चों का घर है। नौ बजे मैं बच्चों को सुलाने चली गई थी। दिन भर की भयंकर थकान थी। फिर भी रात के डेढ़ बजे नींद खुल गई। किताबों को कार्टन से निकाले बिना सो नहीं सकती थी। मालूम था नींद नहीं आएगी। मुझे पहले बार समझ में आया कि कैसे कुछ औरतें रात को किचन का काउंटर तब तक पूरी तरह साफ़ नहीं कर लेतीं, उन्हें नींद नहीं आती। रात को कम आवाज़ के साथ कार्टन पर लगा टेप निकालना अपनेआप में मुश्किल था। लेकिन धीरे-धीरे उसे काटा। चार कार्टन किताबें निकालीं। किसी तरह टेबल पर ऊँची ऊँची मीनारें बनाईं, ढेर सारी किताबें टीवी रैक पर रखीं। फिर चैन से जा कर सो गई।

फिर अगले दिन movers आ कर सामान अनपैक कर के गए। दिन भर उनके साथ लगी रही। दोपहर बच्चों को स्कूल से लाने के बाद थोड़ी देर आराम किया। फिर से कुछ-न-कुछ काम लगा रहा। इलेक्ट्रीशियन, इंटरनेट, प्लम्बर, कारपेंटर... नौ बजे सोने का टाइम, कि कल स्कूल भी जाना है। दस बजे तक तो जगी हुई थी, बच्चों के साथ, फिर नींद आ गई। कुणाल जब सोने आया तो उससे पूछे, टाइम कितना हो रहा है। वो बोला साढ़े बारह लगभग। हम पूछे, exactly कितना, तो बोला बारह अट्ठाइस। फिर पूछा, कि काहे। तो कहे कि चाय पीने का मन कर रहा है। उसको मालूम है, रात बारह बजे चाय पीने का मन कर रहा है मतलब किचन में चाय बना के पीने का नहीं, इसका मतलब गाड़ी लेकर बाहर जाने और चाय की दुकान चाय पीने का मन कर रहा है। तो बोला, इतनी रात में कहाँ जाएगी, थक गई है। सो जा, कल जाना। हमको मालूम था, दो मिनट में स्वेटर पहन कर, जूता पहन कर तैयार हो सकते हैं। जैकेट पहनने में एक मिनट और लगता, लेकिन देर हो जाती। तो कैलकुलेशन सही था। घर से स्टारबक्स वैसे तो आधा घंटा है, लेकिन रात को गाड़ी उड़ाते जायें तो बीस मिनट में पहुँच सकते हैं। जैसे ही कपड़ा पहनने उठे, बोलता है, इतनी रात को कुछ नहीं मिलेगा। और हम जो स्टारबक्स रेगुलर जाते हैं देर रात, जानते हैं कि भले बिल न हो, लेकिन कॉफ़ी तो मिल ही जाएगी चाहे ठीक एक बजे पहुँचें। तो इसी कॉन्फिडेंस से बोले, कि हमको मिल जाएगी। आँधी की तरह उड़ते हुए गाड़ी में बैठे और उड़ते उड़ते स्टारबक्स ठीक 12:55 में पहुँच गए। और ठीक, कॉफ़ी मिली, कि पेमेंट बाद में कर दीजिएगा। पता नहीं कैसे, लेकिन स्टारबक्स के सभी स्टोर्स में उन्होंने इतने अच्छे कस्टमर रिलेशन बना के रखें हैं, कि it feels like home. Always. अभी जब चीज़ें flux में हैं। पिछले घर से शिफ्ट कर गए हैं, नए घर में सेटल नहीं किए हैं। इस तरह देर रात गाड़ी में गाना बजाते, एक तरफ़ से थोड़े घिसे चाँद के नीचे कॉफ़ी की जादुई ख़ुशबू की तलाश में ड्राइव करते हुए लगता है…I’m home.

घर सिर्फ़ लौटने की जगह ही तो है।

इस घर में पूरब को खुलने वाली खिड़की तो है, पर उसमें पल्ले नहीं हैं, तो खुलती नहीं है। लेकिन ठीक है। सब कुछ तो कहाँ मिलता है किसी को। धूप खा के सूरज देख के संतोष करेंगे और क्या। बड़े शहर में खुला आसमान ही बड़ी बात है। यहाँ तो पूरब की खिड़की भी है। और पश्चिम वाली खिड़की तो खुलती भी है। इस साल ज़्यादा सोचेंगे नहीं। जितना जर्नलिज्म में सीखा था, सो जितना देखा-जिया है। उसको लिखेंगे बस। घर आ कर टेबल पर सामान जमाये तो देखते हैं Utopia का I गिर गया है। सोचे ठीक ही तो है, मेरे बिना थोड़े ना हो जाएगा, सब कुछ...परफेक्ट और impossible to exist. 


आपका नया साल सुंदर हो। रंगभरा हो। आपकी जादूगरी आपके भीतर के दरवाज़े खोले। आप अपने तिलिस्म की दीवारों पर रंग-रोगन करें। नारे-वारे लिखें। 


शुभम अस्तु।

09 December, 2025

एक हिज्र का ठंढा सियाह पत्थर है। कलेजे पर रक्खा हुआ।

मुझे चीज़ों को महसूसने की अपनी इंटेंसिटी से डर लगता है। बहुत गहरा प्यार। बहुत ज़्यादा दुख। बहुत टीसता हुआ बिछोह। मैंने अपने जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा अपने इमोशंस को समझने और बहुत हद तक उन पर कंट्रोल करने में उलझाया है। ये ऐसे जंगली जानवर हैं कि जिन्हें पालतू नहीं बनाया जा सकता। इनके लिए गहरे, अंधेरे, ख़ामोश तहख़ाने बनाए जाते हैं और इन्हें क़ैद कर के रखा जाता है। इन्हें कहा जाता है कि बहुत दिन तक अच्छा व्यवहार करने वाले क़ैदियों को जिस तरह खिड़की वाली कोठरियों में डाला जाता है…उसी तरह मैं उन्हें भी खुले मैदान वाली जेल में भेज दूँगी। मैं कहती हूँ कि वहाँ से चाँद दिखता है।

दो बाय दो बाय छह फुट की कोठरी में जिस खतरनाक इश्क़ को रखा गया है उसने सूरज तो क्या चाँद भी कई सालों से नहीं देखा। जीने की उम्मीद छोड़ वो गहरी नींद में चला गया है…एक क़िस्म का सोया हुआ मासूम ज्वालामुखी। इनोसेंट स्लीपिंग वॉल्कैनो। कबसे किसी ने उसका नाम नहीं पुकारा। उसने फुसफुसाहट तक नहीं सुनी। उसके सपने में तुम्हारी आवाज़ का कतरा आता है…पहाड़ से लौटती हुई आवाज़ की तरह। लेकिन तुमने मेरा नाम नहीं पुकारा है…सड़क के इस छोर से मैं कहती हूँ…बाऽऽऽऽय और दूसरी ओर से तुम हाथ हिलाते हो…तुम्हारे होंठ हिले हैं…लेकिन इस बीच दमकल का सायरन बज गया है…तुम्हारे होंटों के हिलने से लगता है बाऽऽऽऽऽऽय ही कहा होगा तुमने…हो सकता है तुमने मेरा नाम पुकारा हो…क्या मालूम…ये दमकल मेरे दिल में लहक कर जलते हुए इश्क़ को बुझाने के लिए दुनिया वालों ने भेजा होगा…इतनी आग में तुम्हारा पूरा शहर जल कर राख हो जाता।

तुम्हें मालूम, तुम्हारी आवाज़ के एक कतरे से दिल के तहखाने का ताला खुल सकता है…तुम्हारा एक वॉइस नोट है, उसमें सबसे चहकते हुए तुम ‘बाय’ कहते हो। जैसे कि तुम्हें पूरा यकीन हो कि हम जल्द मिलेंगे।
***

ट्रॉमा। किसी से बात नहीं कर सकते इस बारे में। फ़िल्म देख कर आए। उसमें धनुष के किरदार का नाम शंकर है…बता रहा है उस बेवकूफ लड़की को, जो असल में इतनी बेवकूफ हो, इम्पॉसिबल है…लेकिन सच में, ऐसे लोग होते तो हैं...उन्हें अपने सिवा कुछ नज़र ही नहीं आता दुनिया में। पीएचडी करती हुई लड़की, मुक्ति...उसका सब्जेक्ट है कि वायलेंस अपेंडिक्स की तरह है, इसे पूरी तरह से शरीर से काट कर निकाला जा सकता है। मुश्किल विषय है, तो उसके प्रोफेसर बोलते हैं जब तक कोई प्रूफ नहीं दिखेगा, क्रेडिबल...यह एक्सेप्ट नहीं होगा। मुक्ति ने शंकर को अपना सब्जेक्ट बना लिया है। कि इस लड़के के अंदर बहुत गुस्सा है…उसने एक बार भी ठीक से जानने की कोशिश नहीं की है कि ट्रॉमा का सोर्स असल में क्या है, कितना गहरा है, कितना कॉम्प्लिकेटेड है…वायलेंस है तो क्यों है…नफ़रत है तो कितनी है…फ़िल्म ही सही, लेकिन हीरोइन है, मेन करैक्टर है...वो इतनी सेल्फिश और इतनी सेल्फ-सेंटर्ड कैसे हो सकती है। थीसिस पर साइन हो गया है। शंकर। आदमी है…ज़िंदा, धड़कता हुआ सामने…आँखें भर आई हैं…कहता है, “मेरी माँ का नाम कावेरी था…मैं दस साल का था, जब वो वो एक पाँच साल के बच्चे को बचाने में जल कर मर गई। कि ग़रीब आदमी हो तो उसकी माँ 20% बर्न्स में भी मर जाती है…कि मेरी खाल जलती है…सब जगह…यहाँ यहाँ यहाँ…लेकिन तुम साथ होती हो तो कम जलता हूँ…” उसकी आँखें भर आई हैं। शायद वह पहली बार किसी के सामने इस तरह वल्नरेबल हुआ है। इस मोमेंट मुक्ति सामने खड़ी है उसके...कोई उसे बुलाता है...वह मुड़ कर देखती है, और अबीर कहती हुई उस लड़के की और दौड़ती है और उसे हग कर लेती है। 

बारिश हो रही है…मुक्ति के दौड़ के जाने से वह चूड़ी टूट गई है, जिसे पकड़ कर शंकर उससे बात कर रहा है। मैं देखती हूँ, कि यहाँ भी उसने छुआ नहीं है उसे...उसका हाथ नहीं पकड़ा है...उसकी चूड़ी पकड़ी है...वह सही तो कहता है, वायलेंट होने के बावजूद 99% लड़कों से अच्छा है वो। 

मेरे भीतर एक बवंडर उठा हुआ है। यह डायलॉग डिलीवरी आत्मा में घबराहट की तरह बसती है। कहते हैं बर्न्स से हुई मृत्यु सबसे तकलीफ़देह मृत्यु होती है। मैं इस डायलॉग को सुनती हुई भीतर तक काँप जाती हूँ। लेकिन फ़िल्म देखते हुए नहीं कह सकती कुछ भी। किसको। क्या कहें। जिसने जिया है, उसके सिवा कोई नहीं जान-समझ सकता है। ट्रॉमा एक शब्द नहीं है…ज़िंदगी के कैनवास की सारी आउटलाइन बदल देता है। हम फिर इससे बाहर रंग भर ही नहीं सकते।

PTSD कहते हैं। Post Traumatic Stress Disorder.

एक बार एक दोस्त ने पूछा था, किसी ने तुमसे कहा नहीं, ये लो मेरा रूमाल…और ये रहा मेरा कंधा…तुम्हें जितना रोना है, रो सकती हो। हमारे यहाँ कंधे पर गमछा रखते हैं लोग। पापा के बेस्ट फ्रेंड थे, पत्रलेख अंकल। मेरी ज़िंदगी के पहले हीरो। पापा हॉस्टल लाइफ की अपनी कहानी सुनाते थे। कि कैसे वो प्याज़ लहसुन नहीं खाते थे…तो कुक को बोल कर सिर्फ़ दाल भात और भुजिया खा लेते थे। पत्रलेख अंकल को लगा बिना प्याज लहसुन खाने वाला लड़का ज़िंदगी में कैसे सर्वाइव करेगा तो कुक को बोल कर दाल में  लहसुन से तड़का लगवा दिए…क्या ही उमर थी उस समय…शायद 11th-12th या शायद कॉलेज फर्स्ट ईयर में आए होंगे…हमको याद नहीं, पर पापा भर आँख आँसू से रोने लगे…अंकल घबरा गए, अरे, रोता काहे है…और उस दिन जो अंकल पापा के लिए हुए…अपनी आख़िरी साँस तक रहे…उनके लिए और मेरे लिए भी। हमारे पैरों के नीचे की ज़मीन, हमारी आँखों के ऊपर का आसमान। हम किनसे कितना प्यार करते हैं, उनको हमेशा बता थोड़े पाते हैं। हम अपने किसी चाचा से भी कभी इतना प्यार नहीं किए जितना अंकल से करते रहे। ज़िंदगी भर।

मार्च में देवघर गए थे। वहाँ से लौटने की फ्लाइट रोज़ तीन बजे दोपहर को होती है। देवघर एयरपोर्ट से कुसुमाहा आधा घंटा-बीस मिनट की दूरी पर है। हम बोले थे कि फ्लाइट के पहले मिलने आयेंगे गाँव। लेकिन उस रोज़ फ्लाइट बारह बजे की थी। हफ़्ते में एक दिन फ्लाइट का समय दोपहर दिन नहीं, बारह बजे होता है। मुझे मालूम नहीं था। इतवार का दिन था। मैंने ठीक घर से निकलते टाइम देखा कि फ्लाइट के लिए लेट हो गए हैं। अंकल को फ़ोन किए कि आ नहीं पायेंगे। और ज़िंदगी हमारे हिस्से ऐसे अफ़सोस लिखती है। घर में खाना बनवा के रखे थे मेरे लिए। भात दाल बचका, बहुत अच्छा दही…बहुत कुछ और…लेकिन हम हड़बड़ में एयरपोर्ट चले गए मिले बिना। तुरंत ही लौटना था, एक अप्रैल को जाना था कुसुमाहा, पूजा में…लेकिन पापा का कैटरेक्ट का ऑपरेशन हुआ था और डॉक्टर डाँट के ट्रैवल मना कर दिया। हमको लगा, ठीक है। एक आध महीने में चले जाएँगे। एक अप्रैल को माँ कुसुमेश्वरी का पूजा हुआ…सब परिवार और गांव का लोग आया…सीने में दर्द से अंकल देर रात नींद से उठे, घर से निकले गाड़ी में, हॉस्पिटल के लिए…दोनों बेटे साथ में थे…लेकिन हॉस्पिटल पहुँचने के पहले उनका दिल जवाब दे गया था। उनके ज़िंदा रहते जो हम और पापा डॉक्टर की बात मान कर पूजा में नहीं गए…कि महीना भर का बात है, उसके बाद जाते रहेंगे देवघर। लेकिन ख़बर आते ही अगले दिन पापा के साथ देवघर निकल गए थे, जानते हुए कि अंतिम बार उनको देख भी नहीं पायेंगे। हमें वहाँ होना था बस। जबकि जाने वाला जा चुका था। 

हम ज़िंदगी के उस दौर में आ गए हैं, जहाँ से लोग जाना शुरू कर चुके हैं। दोस्तों के माता-पिता। अपने जीवन के बड़े भाई-बहन। चाचा-चाची। 

मार्च में छोटी सी गाड़ी ख़रीदे थे देवघर में। स्विफ्ट। बस घर से सोलह किलोमीटर दूर कुसुमाहा आने जाने के लिए। अंकल आंटी से मिलने जुलने के लिए। साल में कई बार दिल कलपते हुए सपने से जागता है। यूकलिप्टस के पेड़ों से ढका हुआ रास्ता…जहाँ अंकल से मिलने जाना था…खाली लगता है। सुलगता है। आँख में धुआँता है। विक्रम भैया से बात करते हैं। बादल भैया से बात करते हैं। हम जहाँ पले-बढ़े हैं...ऐसे दुख में भी तड़पते हुए किसी के सीने पर सर नहीं रख सकते...चुपचाप कोने में बैठ के रोते हैं। बहुत बहुत साल बाद मिले...बीस पच्चीस साल बाद लगभग। अंकल सिर्फ अपने नहीं थे...उनके घर से सब लोग अपने ही घर के लोग थे। आशा दीदी, सरिता मौसी। बचपन की बातें। मम्मी की। उनके लड़कपन के दिन। वे सब कॉलेज आया-जाया करती थीं जब। घर पर पेंटिंग वगैरह सीखती थीं। उन्हें याद था कि हम बचपन में कैसे थे। हमको याद था यह प्यार, जो जाने कबसे हमारे हिस्से नहीं आया था। 

हम लोग जब छोटे थे, हर साल नानीघर जाते थे - पटना। देवघर से पटना ट्रेन में जनरल डिब्बे में। उन दिनों रूमाल या गमछा रख देने से सीट बुक हो जाती थी। ट्रेन आते ही लोग खिड़की से रूमाल अंदर डालने के लिए दौड़ते थे।

दिल पर भी ऐसे ही रूमाल रखा रहता है। इंतज़ार में।
कई कई साल।

***
बच्चों को कोई बात समझाने के पहले ख़ुद को समझानी पड़ती है। पैरेंटिंग की कोई एक गाइड बुक नहीं होती। सबका अपने-अपने हिसाब से सही ग़लत होता है। मैं बच्चों को समझाना चाहती हूँ कि प्यार और आज़ादी दोनों ज़रूरी हैं। कि हम किसी से प्यार करते हैं तो हमको ये समझना पड़ेगा कि उनको ख़ुशी किस चीज़ से मिलती है…भले उन्हें जिस चीज़ से ख़ुशी मिलती है, उससे हमें फ़िक्र हो या दुख हो…हमें उन्हें वो काम करने से रोकना नहीं चाहिए…Love is the ability to set someone free. That our love should not be a shackle, but a home to come back to. ये कॉन्सेप्ट समझना उनके लिए जरूरी है और मुझे उन्हें ठीक से समझाना जरूरी है। लेकिन हम ख़ुद को ही कहाँ समझा पाते हैं अच्छे से। इस साल एक भी सोलो ट्रिप पर नहीं गए। बेटियां मुझे miss करती हैं, और मैं उनको। The most important part of parenting is to get them ready for a world in which I am not there.

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मेरे भीतर अभी भी बहुत भटकाव है। सतत बदलती दुनिया में जाने किस चीज़ पर ठहरती हूँ। भोर के चार बजने को आए। चौदह डिग्री दिखा रहा है मोबाइल पर। असल में ठंढ दस डिग्री के आसपास की होगी। पहले तल्ले पर खिड़की के पास डेस्क है। खिड़की से बाहर गोल्फ कोर्स दिखता है। वहाँ छोटे से पौंड में सामने वाले घर की परछाई काँपती दिखती है। पानी की वो परछाई एक अलग दुनिया है। एकदम अँधेरी रात है। बादल होंगे, तारे नहीं दिख रहे। खिड़की बंद कर दें ठंढी हवा नहीं आएगी भीतर, पर मालूम नहीं खिड़की खुली रखने की आदत छूटती नहीं। स्वेटर तो पहने हैं, लेकिन गर्म पजामे और मोजे नहीं हैं। पैर में ठंढ लग रही है। लैपटॉप के दोनों तरफ़ कैंडल जला लिए हैं। लिखते लिखते रुकते हैं तो हाथ लौ पर रख लेते हैं।

एक कैंडल का नाम तो वैसे ग्रीन बेसिलिकम है लेकिन महक रहा है पुटूस की तरह। पुटूस माने बचपन। छिले हुए घुटनों पर पुटस के पत्तों का रस लगा लिए, हो गया। उस समय की जादू जड़ी बूटी थी ये। मेरे हाथ पाँच साल की लड़की के हो गए हैं। जिसको पेंसिल छीलने, चौक का चूरा बनाने और होमवर्क भूल जाने की आदत थी। थोड़ा बड़े होने पर कबड्डी और बुढ़िया कबड्डी खेलते थे। किसी को उठा कर पटक देने में कितना मजा आता था। मिट्टी का रंग, स्वाद, गंध, टेक्सचर…सब पता था। सूखी, गीली, लाल मिट्टी। भूरी मिट्टी। काली मिट्टी। मुल्तानी मिट्टी।

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बॉलीवुड इतना होपलेस क्यों है? कोई भी डायरेक्टर या स्क्रिप्टराइटर इतना ख़राब किरदार क्यों रचता है। हम इस तरह की बॉलीवुड हीरोइनों और हीरो से थक गए हैं। Women having the god-complex, जहाँ वे किसी को बचाने के लिए जान दिए हुए हैं, बिना देखे कि किसी को बचाये जाने की इच्छा या ज़रूरत है भी या नहीं। साइकोलॉजी में पीएचडी कर रही है और ख़ुद में एमपैथी नाम की कोई चीज़ नहीं। अगर किसी सब्जेक्ट(व्यक्ति) को चुना है, तो थोड़ी तो प्रोफेशनल ईमानदारी रखनी थी। अगर वायलेंस की रूट कॉज तक जा रही है तो उसको इतनी सी बेसिक समझ नहीं है कि कोई इस तरह का इमोशनली अन्स्टेबल व्यक्ति प्यार जैसे किसी इमोशन से कितनी गहराई से जुड़ेगा, कितनी इंटेंसिटी से कुछ भी महसूस करेगा। एक एक्स्ट्रा ट्रॉमा देना और उसको लेकर कोई ग्लानि, कोई शर्म, कोई झिझक और ईमानदारी तो छोड़ दें, बेसिक इंसानियत, ह्यूमैनिटी तक नहीं है। रिसर्च अप्रूव हो गया है, लड़का अपनी माँ के बारे में बता रहा है…पहली बार खुला है। शायद किसी के पास पहली बार अपना दुख कह रहा है। मुक्ति एक झटके में वहाँ से दौड़ कर दूसरे लड़के के गले लग जाती है। अगर वह अबीर से प्रेम करती, तो मुझे यह सीन फिर भी क्षम्य लगता क्यूँकि प्रेम में होने पर आप बाक़ी लोगों की भावनाओं से ऊपर अपनेआप को रखते हैं। लेकिन वह तो सिर्फ़ दोस्त था। तो ऐसे व्यक्ति के पास दौड़ कर अगर चली भी गई है तो लौट कर शंकर तक ठीक उसी समय आना था। उसकी फीलिंग को वैलिडेट करना था। कितना आसान है कहना, तुम ना नहीं सुन सकते थे। इस लड़की ने कभी उसे ठीक-ठीक एक इंसान की तरह न देखा, न समझा…स्वार्थी हो कर, सिर्फ़ अपना पीएचडी अप्रूव करवाया। वो भी झूठा। मेरा ख़ून खौल जाता है ऐसी फिल्में देख कर। एयरफोर्स को मज़ाक़ बना दिया है। कोई पायलट मेंटली अन्स्टेबल है तो वहाँ उससे ठीक से काउंसलिंग करने की जगह इमोशनल ब्लैकमेल किया जा रहा है। उसके भीतर गुस्सा है…और वो एक ऐसा एयरफोर्स पायलट है, जिसको सिर्फ़ लड़ना है…इस तरह की बातें करने के बावजूद उसे प्लेन उड़ाने की परमिशन के काग़ज़ पर साइन कर दिया गया है। उसकी ड्यूटी पहले देश, फिर अपनी बटालियन, फिर अंत में ख़ुद के लिए होती है। यही अभी तक की वॉर मूवीज़ में देखा है।

मुझे लगता है, ऐसा नियम होना चाहिए कि आर्मी/नेवी/और एयरफोर्स ऑफिसर्स के बारे में कोई भी फ़िल्म बनाने के पहले अप्रूवल लिया जाये ताकि नियम/कानून का मजाक न बने। एयरफोर्स में प्रोटोकॉल्स होने की कई वजहें हैं। क्रिएटिविटी के नाम पर कहानी कुछ भी बना दे रहे हैं।

मैंने फ़िल्म देखी धनुष की लाजवाब एक्टिंग के लिए। हिंदी फ़िल्म में तमिल डायलॉग्स देख देख कर मेरा तमिल सीखने का मन करने लगा है। फ़िल्म में बनारस है। हम सोचते हैं, बनारस आते नहीं जब तक कि बुलावा नहीं आता। मैं आधे सपने में हूँ...ये कौन सी अल्टरनेट दुनिया है। मैं तुम्हारे साथ नाव पर बैठी हूँ। शोर बहुत है। सामने मणिकर्णिका घाट है...कहते हैं यहाँ की आग कभी नहीं बुझी। 

मुझे लगता है, हम-में कोई धागा है, जन्मपार का बँधा हुआ। फ़िल्म में कहता है, मुक्ति नहीं मिलेगी। ना इस जन्म ना कभी भी और। प्रेम में सिर्फ़ मृत्यु है। मैं नाव पर हूँ। सियाह धुआँ उठ रहा है। मेरी आत्मा में कुछ उमड़ रहा है। कोई गाँठ खुल रही है। एक सिरा तुम्हारे भीतर है इस धागे का। मुझे पक्का यकीन है, हम कई जन्म एक दूसरे से मिलते रहे हैं। 

दिसंबर में इतने सारे प्यारे लोगों का जन्मदिन है। अब गिफ्ट वगैरह में मजा नहीं। मजा है कि इस दिन वाक़ई अपने पसंद के लोगों के साथ समय बिता सकें। उन्हें मिलें तो जोर की जादू की झप्पी दें और कहें। तुमसे जादू है। मेरी कहानी का। मेरा। मेरी दुनिया में बने रहना, तुम्हारे होने से सब जगमग जगमग है। सब मीठा है। और अगर जाओगे तो मीठा खाने का मजा चला जाएगा। फिर हम अपने खुली गाड़ी में चाँद ताकते, सिगरेट फूंकते तुम्हें इतना याद करेंगे कि हिचकी लेते लेते थक जाओगे। 
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इंडिगो के प्लेन कैंसिल होने के कारण उस शादी में नहीं जा पाये, जिसमें जाने का, क़सम से बहुत बहुत बहुत मन था। और अगर ये भसड़ नहीं होती, तो पक्के से होते। लेकिन ऐसे केस में डर लगता है अकेले जाने से, तो गए नहीं। मुझे भीड़ से डर लगता है, चीज़ें जहाँ uncontrolled हों, वहाँ बहुत ज़्यादा। 

***

बेवकूफ लड़का, हमसे कहता है...हमारी शकल ही ऐसी है वरना प्यार नहीं होता लड़कियों को हमसे। ये साल २०२५ का आख़िरी महीना है। लड़कों को अब भी समझ नहीं आता, प्यार में शकल का कोई काम नहीं होता। मुहब्बत होती है ख़ुशबू से, किसी की मुस्कान से...उसके लाये फूल से...उसकी लिखी चिट्ठी से...उसके भेजे उलाहने से...उसकी समझदारी से...

प्यार होता है तकलीफ़ से। 
***

मन फिर से अंगकोर वात जाने का हो रहा है। 
मन पागल है। 

पिछले छह सालों में ये चौथा घर है। इतना सारा सामान बांधना, फिर से खोलना। ये घर मेरे लिए एकदम परफेक्ट था। सब कुछ अपनी जगह सही। लिखने वाली जगह के आसपास बहुत से पेड़ पौधे। सुबह कई तरह की चिड़ियों की चहचहाहट। हवा में नाचती विंड-चाइम। खुला आसमान।

एक ठंढ है जो भीतर से तारी है।
एक हिज्र का ठंढा सियाह पत्थर है। कलेजे पर रक्खा हुआ। 

19 October, 2025

Tight hugs. Unforgettable goodbyes. Normal days. Grateful heart.

अल्टरनेट वर्ल्ड।

आपको कभी ऐसा लगा है, किसी एक मोमेंट…कि यह सीन हमारी दुनिया का है ही नहीं…हमने अपनी अभीप्सा से कई हज़ार रियलिटीज़ वाले ब्रह्मांड से वो एक यूनिवर्स चुन ली है जहाँ यह हिस्सा होना था और वहाँ की जगह, ये हिस्सा हमारी इस यूनिवर्स में घटेगा…
कि चाह लेने से हमारी दुनिया बदल जाती है…भले पूरी की पूरी न सही और सारे वक्त न सही, लेकिन किसी छोटे वक़्फ़े सब कुछ ठीक वैसा होगा कि आपको आपकी मर्जी का एक लम्हा मिल जाये…
बशीर बद्र हमारे मन के स्याह में झाँकते हैं…गुनाहों के सीले कमरों में भी थोड़ा उजास होता है…मन आख़िर को वह क्यों माँगता है जो उसे नहीं माँगना चाहिए…वो लिखते हैं हमारे बारे में…

मैं कब कहता हूँ वो अच्छा बहुत है
मगर उसने मुझे चाहा बहुत है
मैं हर लम्हे में सदियाँ देखता हूँ
तुम्हारे साथ एक लम्हा बहुत है

सब कुछ किसी को कहाँ मिलता है। कभी।

लेकिन किसी को हग कर रहे हों, तो आँखें बंद कर सकें…थोड़ा इत्मीनान, थोड़ी सी मोहलत, और अपराधबोध न फील करने की आज़ादी, शायद सब को मिलनी चाहिए। शायद सबको, तो फिर किसको नहीं मिलनी चाहिए?

पता नहीं। कुछ तो होते होंगे, गुनाहगार लोग…जिन्हें सज़ा मिली हो, कि जब भी किसी को हग करो…आँखें बंद नहीं कर सकोगे। कि It will always be a fleeting hug. कि तुम्हें हमेशा हज़ार लोग घूर रहे होंगे। कि मेला लगा होगा और उस मेले के बीच चलते मेट्रो स्टेशन पर तुम्हें किसी को गले लग कर अलविदा कहना होगा। कि उस जगह रुक नहीं सकते। कि अगली मेट्रो आने ही वाली है। कि हर बार बिछड़ना, मर जाना ही तो है। ग़ालिब ने जो कहा, जाते हुए कहते हो क़यामत को मिलेंगे, जैसे कि क़यामत का, होगा कोई दिन और!

***

क्रश। पहली बार इस शब्द के बारे में पढ़ा था, तो किसी चीज़ को थूरने-चूरने के अर्थ में पढ़ा था। लेकिन समझ आने के कुछ ही दिनों में इसका दूसरा और ज़्यादा ख़तरनाक…वैसे तो मेटाफोरिकल, लेकिन बहुत हद तक सही शाब्दिक - लिटरल अर्थ समझ आया था। ‘क्रश’ उसे कहते थे जिसे प्यार नहीं कह सकते थे। थोड़ा सा प्यार। प्यार की फीकी सी झलक भर। लेकिन जानलेवा।

ये वो नावक के तीर थे जो गंभीर घाव करने वाले थे। इनसे बचने का कोई जिरहबख़्तर नहीं बना था।
इश्क़ को रोकने का जिरहबख़्तर होता भी नहीं…हम उसके बाद क्या करेंगे, अर्थात्…अपने एक्शन/कांड पर भले कंट्रोल रख लें…महसूस करने पर कोई कंट्रोल काम नहीं करता। अक्सर अचानक से होता है।

जैसे रात को तेज गाड़ी चलाते हुए, इकरार ए मुहब्बत का पहला गाना, ‘तुम्हें हो न हो, मुझको तो, इतना यकीं है…कि मुझे प्यार, तुमसे…नहीं है, नहीं है…’ अचानक से बजाने का मन करे। रात के साढ़े तीन-पौने चार हो गए थे। भोर साढ़े पाँच की फ्लाइट थी, किसी भी तरह साढ़े चार तक उड़ते-उड़ते एयरपोर्ट पहुंचना ही था। कुछ चीज़ों में जीवन बहुत प्रेडिक्टेबल रहा है। कुछ चीज़ों में बेतरह प्रेडिक्टेबल। मुहब्बत की हल्की सी ही थाप होती है दिल पर, इन दिनों। उसे पता है, दरवाज़ा नहीं खुलेगा…लेकिन मुहब्बत ढीठ है, थेथर है…एक बार पूछ ज़रूर लेती है, हम आयें? हम अपने-आप को दिलासा देते हुए गुनगुनाने लगते हैं, मुझसे प्याऽऽर तुमसे, नहीं है...मगर मैंने ये आज अब तक न जाना...कि क्यों प्यारी लगती हैं, बातें तुम्हारी, मैं क्यों तुमसे मिलने का ढूँढूँ बहाना...

खैर, अच्छा ये हुआ कि फ्लाइट छूटी नहीं। 
***

सुबह ज़ुबान पर कड़वाहट थी, पर मन मीठा था।
There is something about almost chain-smoking through the night. While not being drunk. एक नशा होता है जो अपने लोगों के साथ देर तक बतियाने से चढ़ता है। एक मीठा सा नशा।

सिगरेट का धुआँ मन के कोने-कोने पैठता जाता है। इसे समझाना मुश्किल है कि हमें क्या क्या सुनाई पड़ता है और क्या समझ आता है। ध्यान दो अगर, और रात बहुत गुज़र चुकी हो…सन्नाटे में जब सिगरेट का सिरा जला कर कश खींचते हैं तो तंबाकू के जलने की आवाज़ आती है, बहुत महीन, बहुत बारीक…जैसे किसी का हाथ छूटते हुए आप ज़ोर से न पकड़ें, बल्कि हौले से किसी के हाथ के ऊपर अपनी हथेली फिरा लें…वो बह जाये आपसे दूर, किसी पहाड़ी नदी के पानी की तरह।

फिर से कहते हैं न कि दुनिया में सब कुछ तो किसी को नहीं मिलता।

हम ज़्यादा नहीं चाहते। पर शायद इतना, कि किसी को hug करते हुए इतनी फुर्सत हो और इतनी तसल्ली कि आँखें बंद कर सकें। कि हड़बड़ी में न हग करें किसी को, जैसे कि दुनिया बर्बाद होने वाली है। बैंगलोर की भयंकर तन्हाई में इस एक चीज़ की कमी से मेरी जान जाने लगती है। दिल्ली जाती हूँ तो दोस्त बिछड़ते हुए दो बार गले मिलते हैं। एक बार तो अभी के लिए, और एक बार कि जाने कितने दिन बाद फिर मिलेंगे, एक बार और hug करने का मन है तो कर लेते हैं।

अक्सर हम उन लोगों के प्रेम में पड़ते हैं जिनमें हमारे जितनी गहराई होती है। लेकिन कभी कभी हम कुछ बेवकूफ के लड़कों के गहरे इश्क़ में गिरफ़्तार हो जाते हैं। जिन्हें शायरी सुनाओ तो फिर उसका मतलब समझाना पड़ता है। क्या कहें किसी से कि, ‘यूँ उठे आह उस गली से हम, जैसे कोई जहाँ से उठता है…तुम्हारी गली देखनी थी, तुम्हारा घर, तुम्हारे घर के पर्दे…उसे कैसे समझायें कि मुझे तुम्हारे घर की खामोशी से मिलना था। तुम्हारी खिड़की से आसमान को देखना था। इस जरा सी मुहब्बत का ठिकाना दुनिया में कहीं नहीं होता। कि बेवकूफ लड़के, जब हम कहते हैं कि, ‘इश्क़ एक मीर भारी पत्थर है, कब ये तुझ नातवाँ से उठता है’, तो इसका मतलब यह नहीं है कि बॉडी-बिल्डिंग शुरू कर दो। इसका मतलब हम तुम्हारे हक़ में दुआयें पढ़ रहे हैं कि इश्क़ का भारी पत्थर उठाने के लिए तुम्हारा दिल मज़बूत हो सके…फिर हमारे जैसी तो दुआ क्या ही कोई माँगता होगा, कि तुम्हें इश्क़ हो...भले हमसे न को, किसी से हो...लेकिन तुम्हारा दिल जरा ना नाज़ुक रहे। आँख थोड़ी सी नम। 

देख तो दिल कि जाँ से उठता है, ये धुआँ सा कहाँ से उठता है…

देख रहे हैं आसमान। धुएँ के पार। तुम्हारी किरमिच सी याद आती है। तुम्हारी इत्ती सी फ़िक्र होती है। मैं कुछ नहीं जानना चाहती तुम्हारे बारे में…लेकिन कहानी का कोई किरदार पूछता है तुम्हारे बारे में, कि अरे, उस लड़के का बचपन किस शहर में बीता था, तुम्हें याद है? मैं कहानी के किरदार को बहलाती हूँ, कि मुझे कुछ न मालूम है तुम्हारे बारे में, न याद कोई। कि दूर से मुहब्बत आसान थी, लेकिन इतनी आसान भी कहाँ थी।

दिल्ली जाते हैं तो जिनसे बहुत ज़ोर से मिलने का मन कर रहा होता है, ये कायनात उन्हें खींच कर ले आती है दिल्ली। हम बहुत साल बाद इकट्ठे बैठे उसकी पसंद की ड्रिंक पी रहे हैं। ओल्ड मौंक विथ हॉट वाटर। उसके पसंद का खाना खा रहे हैं। भात, दाल, आलू भुजिया। जाने कितने साल हो गए उसकी ज़िंदगी में यूँ शामिल और गुमशुदा हुए हुए। वीडियो कॉल पर ही देखते थे उसको। एक साथ सिगरेट फूंकते थे। सोचते थे, जाने कौन सा शहर मुकम्मल होगा। कि हम कहेंगे, हमारी सिगरेट जला दो। कि you give the best welcome hugs and the most terrible goodbye hugs. कि इतनी छोटी ज़िंदगी में तुमसे कितना कम-कम मिले हैं।

स्वाद का भी गंध के जैसा डायरेक्ट हिट होता है, कभी कभी। कभी-कभी इनका कोई कनेक्ट नहीं होता। एक पुराना दोस्त गोल्ड-फ्लेक पीता था। यूँ तो गाहे बगाहे कई बार गोल्ड फ्लेक पिए होंगे, उसकी गिनती कहाँ है। लेकिन कल शाम गोल्ड फ्लेक जलायी और पहले कश में एक अलविदा का स्वाद आया। सर्द पहाड़ों पर बहती नदी किनारे घने पेड़ होते हैं, उन सर्पीली सड़कों पर गाड़ी खड़ी थी। गुडबाय के पहले वाली सिगरेटें पी जा रही थीं। कभी कभी कोई स्वाद ज़ुबान पर ठहर जाता है। इत्ती-इत्ती सी सिगरेट, लेकिन कलेजा जल रहा था। मन तो किया पूरा डिब्बा फूँक दें। और ऐसा भी नहीं था कि फ्लाइट मिस हो जाती, बहुत वक्त था हमारे पास। लेकिन ये जो सिगरेट के धुएँ से गाढ़ा जमता जा रहा था दिल में कोलतार की तरह। उसकी तासीर से थोड़ा डरना लाज़िमी था। मेरे पास अभी भी वो पीला कॉफ़ी मग सलामत है जो उसने ला कर दिया था। उसके हिस्से का मग। जाने कैसे वो मिल गया था अचानक। यूँ मेरे हिस्से का तो वो ख़ुद भी नहीं था।

***
मुहब्बत में स्पर्श की करेंसी चलती है। यहाँ बड़े नोटों का कोई काम नहीं होता। यहाँ रेज़गारी बहुत क़ीमती होती है। कि सिक्के ही तो पॉकेट में लिए घूमते हैं। यही तो खनखनाते हैं। इन्हें छू कर तसल्ली कर सकते हैं कि कोई था कभी पास। 

स्पर्श को संबंधों में बांटा नहीं जा सकता। हम किसी का हाथ पकड़ते हुए ये थोड़े सोचते हैं कि वो हमारा प्रेमी है या मित्र है या कोई छोटा भाई-बहन या कि अपना बच्चा। हम किसी का हाथ पकड़ते हुए सिर्फ़ ये सोचते हैं कि वो हमारे लिए बहुत क़ीमती है और दुनिया के मेले में खो न जाये। हम उसक हाथ पकड़े पकड़े चलते हैं। झूमते हुए। कि हमें यकीन है कि भले कई साल तक न मिलें हम, इस फ़िलहाल में वो सच में हमारे पास है, इतना टैंजिबल कि हम उसे छू सकते हैं।

दिल्ली की एक दोपहर हम सीपी में थे। दोस्त का इंतज़ार करते हुए। लंच के लिए। गाड़ी पार्क करवा दिए थे। उसके आने में टाइम था, सोचे सिगरेट पी लेते हैं। तो एक छोटा बच्चा बोला, दीदी हमको चाय पिला दो। नॉर्मली हम चाय तो पीते नहीं। लेकिन वो बोला कि पिला दो, तो उसके साथ हम भी पी पीने का सोचे…दो चाय बोल दिए। आइस-बर्स्ट का मेंथोल और चाय में पड़ी अदरक…ऐसा ख़तरनाक कॉम्बिनेशन था कि थोड़े से हाई हो गए। फिर सोचे कि दिल्ली में यही हाल तो रहता है, हवा पानी का असर मारिजुआना जैसा होता है। कितना मैजिकल है किसी शहर से इतना प्यार होना।

***

हम इन दिनों बिखरे बिखरे से रहते हैं। तसल्ली से लेकिन। किसी चीज़ की हड़बड़ी नहीं होती। सिवाए, जनवरी के आने की... और कभी कभी, अब तो, वो भी नहीं लगता। 

96 फ़िल्म में एक सीन है। जानू, राम के घर आई हुई है। वे बारिश में भीग गए थे, इसलिए उसने नहाने के बाद राम की ही शर्ट पहनी है। भूख लगी है तो जानू ने खाना बनाया है। अपनी अपनी थाली में दोनों खाना खा रहे हैं। राम उससे पूछता है, तुम खुश हो...सीन में तमिल में पूछता है, सबटाइटल्स इंग्लिश में हैं लेकिन उस एक सीन में मुझे तमिल समझ आने लगती है। जानू कहती है, हाँ हाँ, बहुत ख़ुश हूँ...राम कहता है, बेवकूफ, अभी नहीं। ऐसे...जीवन में। जानू ठहर जाती है...और उसका जवाब होता है, कि संतोष है। 

मुझसे मेरे करीबी जब पूछते हैं, कि क्या लगता है, तुम्हें जो मिला, वो तुम डिजर्व करती हो...तो हम ठीक ठीक नकारते नहीं। कि डिज़र्व तो क्या ही होता है। जो दुख मिला, क्या वह हम डिजर्व करते थे...तो फिर सुख की यह जो छहक आई है हमारे हिस्से, इसे सवाल में क्यों बाँधे? क्यों न जियें ऐसे कि जिस ऊपर वाले के हाथ में सब कुछ है, वो हमारा हमसे बेहतर सोच रहा है। कि सुख और दुख साइक्लिक हैं। कि फ़िलहाल, हमारे पास बहुत है। और जो थोड़ा नहीं है, सो ठीक है। कि सब कुछ दुनिया में किसी को भी कहाँ मिलता है। कि चाह लो, तो जितना चाहते हैं...और जितने की सच में जरूरत थी। उतना तो मिल ही जाता है। 

***
मुझे लिख के ख़ुशी मिलती है। हम खूब खूब लिखते हैं। 
लेकिन इन दिनों डायरी से शुरू कर के मैकबुक तक आते आते समय पूरा हो जाता है। इसलिए कई सारी चिट्ठियाँ पेंडिंग हैं। कई सारी कहानियाँ भी। कुछ लोग हैं जिनसे मिलने का बहुत मन है। लेकिन वे दुनिया के दूसरे छोर में रहते हैं। 

***
ख़ुशी के बारे में सबसे अचरज की बात ये हैं कि बहुत कम लोग हैं जिन्हें सच में पता होता है कि उन्हें किस चीज़ से ख़ुशी मिलती है। वे कभी ठहर के देख नहीं पाये, सोच नहीं पाये कि उनका मन कब शांत रहता है। कब उन्हें कहीं और भागने की हड़बड़ी नहीं होती। किस से मिल कर किसी और की कमी महसूस नहीं होती। 

ख़ुद को थोड़ा वक़्त देना गुनाह नहीं है। ख़ुद को थोड़ा जानना समझना। भले आपको लगे कि आप मेटामॉर्फ़ोसिस वाला कीड़ा हैं...लेकिन आईने में देखिए तो सही :) क्या पता आपको मालूम चले, आप बैटमैन हैं :D

Happy Diwali. 
अपना मन और आपका घर रोशन रहे।

22 March, 2025

एक घूँट चाय


साल 2025 मेरी ज़िंदगी में थोड़ा जल्दी आ गया। Hongkong में थी और वहाँ इंडिया से डेढ़ घंटा पहले है समय। वो डेढ़ घंटा कवर करने के लिए यह साल बहुत तेज रफ़्तार भाग रहा है। कुछ दिन पहले देखा कि तीन महीने बीत गए और मैंने कोई भी पोस्ट नहीं लिखी। जब कि इतना कुछ चल रहा है जीवन में। आज बस यूँ ही लिख रहे हैं...लहरें जो मन में उठ रहीं, यहाँ बिखर जायें...  

मुराकामी का नावेलनॉर्वेजियन वुडमुझे बहुत पसंद है। खास तौर से, जहाँ वह शुरू होता है। प्लेन लैंड करते समय लड़का सोचता है कि उस लड़की के गुज़रे हुए लगभग एक साल हो गया है और अब उसे उसका चेहरा पूरा याद करने में एक मिनट लगता है। इतना भूल जाना काफ़ी है कि उसके बारे में अब लिखा जा सके। जब उसके गुज़रे हुए ज़्यादा वक़्त नहीं हुआ था तो वह उसके बारे में नहीं लिख सकता था क्यूंकि यह बहुत दुखता था। 

हम में से सारे लोग अपने दुख के बारे में नहीं लिख सकते। लेकिन किसी और के लिखे में अपने दुख का हिस्सा देख कर थोड़ी राहत ज़रूर पा लेते हैं। किताब पढ़ना तन्हाई और मिलने के बीच की जगह है। हमारे हाथ में फिजिकली एक किताब होती है, हम छू रहे होते हैं किसी का लिखा हुआ और मन से हम विषय पर लिखी हुई जगह और अपने जिए हुए जगह के बीच के एक क्रॉसफेड में होते हैं। गाँव और कीचड़ भरी पगडंडी हर किसी के मन में अलग खुलती है। जंगल भी। मृत्यु और उससे उपजा दुख भी। 


मुझे अपनी किताबों से बहुत प्यार है। मेरे जीवन में प्यारे ऐसे लोग हमेशा बने रहे जिन्हें किताबों से बहुत-बहुत प्यार रहा। प्रमोद सिंह की एक किताब है, अजाने मेलों मेंउसकी पहली कहानी एक व्यक्ति के बारे में है जो पूरी दुनिया में भटक कर एक ऐसी किताबों की आलमारी ढूँढ रहा है जो सबसे अच्छी होदेश-विदेश घूमने के बाद और कई अद्भुत लोगों से मिलने के बाद भी उसे उनकी अलमारियों में कोई ख़ास बात नहीं दिखी। लेकिन एक छोटे से गाँव में, एक छोटे से परिवार के पास एक अद्भुत किताबों की आलमारी थीवैसी ही जिसे देख कर उसकी आँखें फटी रह जाएँवैसी ही जैसा वह कई दिनों से तलाश रहा था। मुझे धुंधली सी यह कहानी एक बार पढ़ने के बाद हमेशा याद रही। जैसे प्रमोद जी के पॉडकास्ट रहे, ज़िंदगी की खामोशी में घुले हुए हमेशा। मैं बैंगलोर 2008 में आई थीघर परिवार दोस्तों को छोड़ कर। एक छोटे से दो कमरे के घर को घर बना रही थी। किचन में अक्सर कुछ गुनगुनाती खाना बनाती रहती थी। लूप में वे पॉडकास्ट चलते रहते थे, जिनमें बहुत सी बतकही थीकुछ बेहद सुंदर फिल्मी और ग़ैर-फिल्मी धुनों के साथ रचे बसेकोई भरे हुए घर में माचिस खोज रहा है और लड़के को सिगरेट और माचिस लाने भेज रहा हैकोई दीदी की गुलाबी चप्पल के बारे में कहता है कि कैसी बेढ़ब थी वो चप्पल, लेकिन तुम्हारे पैर में कितनी सुंदर लगती थीतो कहीं जरा सा जापान को जान लेने की बात है और पीछे में ला वियों रोज़ गा रही हबारी मिसोरा की आवाज़ हैउन दिनों Shazam तो था नहीं, तो कोई धुन पसंद आई तो महीनों बौराए उसे खोजते रहते थे। पिछले साल भोपाल में प्रमोद जी से मिले तो उन्हें बताया कि उनके पॉडकास्ट एक अकेली लड़की के लिए, जो शादी के बाद नया घर बसा रही थीपरिवार और दोस्तों को छोड़ कर एक अनजान और अजनबी भाषा के शहर में आई थीवे पॉडकास्ट मेरा मायका थे। मेरे गाँव का घर। दीदी, बड़ी माँ, दादावे सारे लोग जो मुझसे छूट गए थे मुझे वे उन रिकॉर्डिंग में मिलते थे। कि हम कभी अकेले नहीं पड़े, कभी भी नहीं। 


मैंने अक्सर देखा है कि जो लोग मुझे ब्लॉग पढ़ कर जानते हैं उनके सामने सहज होना आसान होता है। इसलिए कि वे मेरे भीतर की बेतरतीबी को जानते हैं। जिन्हें मैं ब्लॉग पढ़ कर जानती हूँ, उनसे कभी भी मिली हूँ ऐसा जगा है कि उन्हें हमेशा से जानती थी। ब्लॉग पर लिखा एकदम मन का होता था। उस समय सोशल मीडिया के फिल्टर अस्तिव में ही नहीं आए थे। हम एकदम ही सच्ची डायरी लिखते थे कई बार यह सोचते हुए कि कौन ही पढ़ेगा और क्या ही फ़र्क़ पड़ेगाइनमें से कौन ही बहस करेगा। 


एक हैं हमारीप्रत्यक्षा…2005-08…याद नहीं कब इनका ब्लॉग पहली बार पढ़े, लेकिन उन दिनों जब सब लोग खूब खूब लिखते थे, हम खूब खूब पढ़ते थे। सोचते थे कैसा टटका स्वाद लगता है पढ़ने में। ऐसे मीठे-धूप सेकते लोग। ऐसा रंग-भीगा आसमान। प्रत्यक्षा इसलिए भी अच्छी लगती थीं कि वे संगीत के बारे में लिखती थीं, शास्त्रीय संगीत के बारे मेंअपनी माँ के गाने के बारे में और कभी कभी अपने गाने के बारे में भीपहर दोपहर ठुमरी में एक कहानी है, सजनवा तुम क्या जानो प्रीतहम अब भी कभी उस कहानी को पढ़ लेते हैं, लगता है उँगली के पोर में बाँस का एक महीन तिनका घुस गया हैअभी भी निकला नहीं है, दुखता हैउनके पानी वाले रंग देखते हैं। संगीतरंगऔर शब्दसबमें उनकी कहानी उतनी ही सुंदर है। एक बार उन्होंने पेरिस में The Shakespeare and Company के सामने की एक तस्वीर डाली थीबस ऐसे हीहम पेरिस गए तो लगभग दस किलोमीटर का चलना हो गया, लेकिन किताबों की उस पुरानी दुकान के आगे कुर्सी पर बैठ कर ख़ुशी हुईअपने प्यारे किसी के जिए हुए में किसी दूसरे समय में ठहर गए


फेसबुक पर देखते हैं कभी कभी धूप में भीगा उनका कमरा। सोचते हैं। ऐसे सुंदर लोग होते हैं। इसी दुनिया में। इतने सुंदर लोग। 


मेले में मिलते हैं तो बहुत हुलस कर बात करने का मन होता है। वे कहीं और जा रही थीं, दो और दोस्तों के साथहम बेख़याली में चलते रहे साथसामने चाय वाले स्टाल्स थेउनके दोस्त ने उनके हाथ में चाय का कुल्हड़ दे दियाहम टाटा कहने को आए, कि ठीक है, हम फिर मिलते हैंवे कहती हैं, ‘अरे, चाय का एक घूँट तो ले लो!’ हम अचरज में देखते हैं। वे बड़ी हैं हमसे उम्र में, अनुभव में, stature मेंहर तरह सेहम उनकी चाय कैसे जुठा देंलेकिन हम इस प्यार को जानते हैं, हाँ ये प्यार हमारे हिस्से आया बहुत कम। उस समय वे बस हमारे घर-परिवार की बड़ी दीदी हो गईंये मेरे लिए इतनी बड़ी बात थी कि ताउम्र याद रहेगीहमेशा हमेशाकि जैसे शायद हम रहे अपने से छोटों के लिए, कोई हमारे लिए भी हो सकता हैचाय का एक छोटा सा घूँटमन प्राण में ख़ुशी का बिरवा रोपता हुआइस दुनिया के सुंदर होने और बने रहने की उम्मीद का बिरवा। 


आज सुबह उठे तो मन खाली था। सोचा कुछ पढ़ लेते हैं। 


किताबों से भरे हुए घर में होना एक कमाल की चीज़ है। आपने सामने कई दुनियाएँ खुली हुई होती हैं। वे लोग जो पूछते हैं कि इतनी किताबें क्यों ख़रीदती हो। क्या तुमने सारी किताबें पढ़ ली हैं जो तुम्हारे घर में हैं? तो बात इतनी ही है कि हम समग्र में कुछ नहीं पढ़ पाते हैं। पूरा पढ़ लेने से ही कौन सा किताब जाती है समझ में पूरी पूरी। निर्मल कीवे दिनकितने बार पढ़ चुकी हूँ, अब भी हर बार ख़ुद से पूछती हूँ कि जब वो पूछती है, ‘तुम विश्वास करते होतो किस चीज़ पर विश्वास करने की बात कह रही है। मुझे नहीं आता समझ मेंमैं बस भटकती हूँ उन किरदारों के साथदूसरे शहरों में, दूसरे लोगों से मिलते हुए। 


पिछले कुछ सालों में हमारी ज़िंदगी बहुत विजुअल हो गई है। फ़ोन हमें कई दृश्य दिखाता है, कमोबेश ठीक-ठीक रंगों में। वीडियो भी। बिना देखे भी हमने बहुत कुछ देखा है। कई सारे रंग हमारी ज़िंदगी में घुले हैं। पहले ऐसा नहीं था, हमने सिर्फ़ पढ़ा था और पढ़ कर ही सोचते थे कि समंदर का फ़िरोज़ी रंग कैसा होता होगा। फ़िरोज़ी स्याही से लिखते थे और आँख बंद कर सोचते थे कोई ब्लैक शर्ट में कैसा दिखेगा। अब आप जो भी इमैजिन करते हैं, ऐसे AI ऐप्स गए हैं कि आपके सोचने के हिसाब से तस्वीर बना कर दिखा देंगे। अब सच में इमैजिन करना ही दुर्लभ होता जाएगा। सब कुछ दिख ही रहा है सामने तो आँख बंद कर के कुछ देखने की क्या ज़रूरत है।


दुख की दुनिया भीतर है। छोटी सी किताब है। आज यही किताब उठायी। दृश्य खुलता जाता है। इसका गाँव, कीचड़ वाला रास्ता, घर तक पहुँचने की यात्रासब खुलता है आँख के आगे। कुछ पन्ने पढ़ के रख दी किताब। अभी यह पढ़ने का मन नहीं है। इसे पढ़ते हुए घर तक पहुँचने की वे यात्राएँ याद आयीं जहाँ अंतिम दर्शन के लिए परिवार के लोग सफ़र कर रहे हैं। मैं ऐसे दो बार गई हूँ। एक बार दादी के गुज़र जाने पर, और एक बार अपने बड़े मामाजी के गुज़र जाने पर। इस विषय पर पढ़ना मुश्किल हैआप एक ख़ास मनःस्थिति में इसे पढ़ सकते हैं। किताब पढ़ने का बहुत मन है, कई बार उलटाती पलटाती हूँ। बीच के कुछ वाक्य पढ़ती हूँ। बेहद सुंदर, सुगढ़ गद्य। जिससे प्यास मिट सकती हो लेकिन मन दुखता है। रख देती हूँ फिर से, कि आज नहीं। 


इसे पढ़ते हुए उस अच्छे एडिटर के बारे में सोचा, जिसका ज़िक्र किताब के आख़िरी पन्ने में आता है। अनुराग। जो कई सालों से दोस्त है। एक अच्छा संपादक रचना से कई बार गुज़रता है, एक पाठक की तरह और एक एडिटर की तरह भी। उसका काम यह देखना है कि किताब में कोई नुक्स रह जाये, कोई टाइपो की कील निकली हो, जो पढ़ते हुए माथे में ठुक जाये। किताब की सरसता अपनी जगह है, टेक्स्ट का अप्रतिम परफेक्शन अपनी जगह। मन हिलग जाता है। सोचती हूँ, दुख की इस भीतरी दुनिया को साथ में रचते/ठीक-करते/सँवारते हुए, उसे कितना कुछ दुखा होगा। किताब में font, काग़ज़, बाइंडिंग, छपाई के लिए प्रेस का चुनावसब कुछ से अक्सर, अकेले जूझते हुए। कितना मुश्किल होगा यहकई साल लगातार सुंदर किताबें रचने के ख्याल से भरे रहना। 


मैंने उसे बहुत साल पहले देखा था। स्काइप की खिड़की में। किताबों और शब्दों से उलझता हुआ लड़का। उसके अनुवाद की हुई कविताएँ पढ़ते हुए मेरी अपनी हो गईं। हिंदी में कविताओं को पढ़ने में अलग मिठास आती है। इतने साल में अब भी वैसा ही है। एक एक शब्द किसी जौहरी की तरह बारीकी से नाप-चुन कर रखता हुआ। उसके लिए शब्द सोने से ज़्यादा क़ीमती हैं। उसके हाथ से गुज़र कर कोई किताब आती है तो ये भी सोचती हूँ कि उसने इसे कैसे पढ़ा होगा। 


2008 से बैंगलोर में हूँ। यहाँ का स्टार्ट-अप कल्चर है। सबने कभी कभी अपना कुछ करने का सोचा ही होगा। स्टार्ट-अप करने वाले एक सपना जी रहे होते हैं। मैंने अपने घर में यह देखा है। कुणाल को कई साल लगातार। ख़ुद भी कब से सोच रहे हैं कि एक स्टार्ट-अप खोलेंगे, लेकिन ऐसा सोचना और सच में एक कंपनी खोलने में बहुत अंतर होता है। एक ज़िद होती है, दुनिया को बेहतर करने कीऔर ये काबिलियत कि अपना सपना सबकी आँखों में रोप सकें। इन दिनों कुणाल दो कमाल के आइडियाज़ पर काम कर रहा है। मैंने पिछली बार उसके स्टार्ट-अप का कम्यूनिकेशन पूरा हैंडल किया था। एक बहुत अच्छी कहानी को उतने ही अच्छे ढंग से सुनाना होता है। मैं उस कंपनी में इम्प्लॉयड नहीं थी, उसकी फाउंडर थी। टेक बनाने और डिप्लॉय करने वो कहानी मेरी भी कहानी थी। अब फिर से वैसी कहानियाँ बन रही हैं। 


मेरे भीतर अब कहानियाँ नहीं उगतीं, लेकिन कभी कभी पुरानी कहानियाँ सुनाने का मन करता है। मेरी ख़ुद की। धूप, समंदर, आसमान की कहानी। उन लड़कियों की जिन्हें प्यार होता था। जो चाय के एक घूँट पर मन में समंदर लिए चलती थीं। मुझे लगता है जैसे मेरे जैसे लोगों की दुनिया में कहीं जगह नहीं हैं। टू सेंसिटिव। ज़्यादा ही दुखता है, ज़्यादा ही ख़ुश हो लेते हैं। ज़्यादा मुहब्बत हो जाती है। ज़्यादा जलन होती है। कम में जीना आया ही नहीं। मेरे जैसी लड़कियों की कहीं जगह नहीं है दुनिया में, इसलिए कहानियों में अपने हिस्से की ज़मीन चाहते हैं हम। थोड़ी सी। 


लिखना भी आदत है। शायद तैरने या साइकिल चलाने की तरह। बहुत साल छोड़ दें तो थोड़ा स्लो हो जाता है। लेकिन बस डेस्क पर बैठ भी जायें तो काफ़ी कुछ लिखा जाता है। इसे पहले की तरह ही ब्लॉग पर पोस्ट कर रहे हैं। कि आज के लिए मन में इतना ही कुछ है। 


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