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06 January, 2026

Have you met the wild women that have mysteriously obscure windmills in their hair?

Have you met the wild women that have mysteriously obscure windmills in their hair? When they drive fast on open roads past midnight…the city air feels as free as they are…the windmills create electricity and they come back to their work-desk, charged by the mad, wild, wind…racing through their hair…

They feel indestructible then. The women that thrive on coffee. Prowling their house full of people like time-thieves. They need just a couple of moments, alone, in order to survive the next day.

Do you know women feel like a live time bomb, most of their life? Something is always ticking inside their heart. But it’s been such a long time living with the bomb that they have forgotten if they are a part of the bomb diffuser squad or the bomb detonating one.

***

I’ve often raced like mad to catch a fleeting glimpse of one such woman. Sometimes, she does appear in the rear-view mirror of my Mini Cooper Convertible. They don’t write, “Objects in the mirror are closer that what they might appear”, on these mirrors anymore. Someone believes, all of us already know this fact. Though, we could all do with a reminder, some days, I guess. I might just cause an accident in order to touch her…one of these days. My palpitating heart calms down when it sees her. I should be scared though, the way most people are scared of ghosts. But I can’t ascertain the time to which she belongs…future or the past, definitely not the present…timeless in a way I can’t fully comprehend. We are born fearless and slowly learn to be afraid, a mix of causality and probability we pretend to understand.

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3:00 a.m., January the 6th, 2026.
मुझे मैकबुक पर लिखने के पहले काग़ज़ पर लिखना ज़रूरी होता है। जब तक इंक पेन से काग़ज़ पर न लिखूँ, सतरें नहीं लगतीं। साँस ज़्यादा रैंडम चलती है। लिखने के लिए साँस का एक लय में आना जरूरी होता है। इतनी देर रात सब कुछ एकदम शांत है। सिर्फ़ कीबोर्ड की आवाज़ आ रही है। निब का काग़ज़ पर चलना, टाइपिंग की आवाज़, सिगरेट का कश खींचते हुए जलते तंबाकू के पत्तों की मद्धम आवाज़…ये मेरी बेहद पसंद की आवाज़ें हैं। रात इसलिए भी अच्छी लगती है कि ये आवाज़ें दिन में इस रिदम के साथ सुनायी नहीं देती। जब से मुझे लिखने का होश रहा है, मेरे सोचने की भाषा हिंदी रही है। लेकिन मेरे बच्चे दिन भर अंग्रेजी में ही मुझसे भी बतियाते रहते हैं इसलिए मैं देखती हूँ कि आजकल पर्सनल भी कुछ लिखना होता है तो शुरुआत हमेशा अंग्रेजी से होती है। हाँ एक दो पैराग्राफ के बाद मन थक जाता है और अपनी आसान मातृभाषा की ओर लौटता है।

2025 कमाल का साल था, कुछ अर्थों में। जिसमें सबसे मजेदार चीज़ रही कि मैंने यह साल हांगकांग में शुरू किया। हम 31 January को हांगकांग पहुँचे थे। तो इस साल मुझे एक्स्ट्रा डेढ़ घंटे मिले। कि मेरा साल 2025, भारत के डेढ़ घंटा पहले आ गया था। साल की शुरुआत में एक बेहद सुंदर घर था, जिसमें बड़ा सा लॉन था। गहरी गुलाबी बोगनविला थी, गराज में झूलती हुई। जब भी मिनी कूपर बाहर निकालती, पहले गुलाबी झालर आती फिर नीला आसमान। गराज से गाड़ी निकालना अपने आप में बेहद सुंदर था। इस साल मैंने अपनेआप को ठहरने की इजाज़त दी। मेरे जुड़वाँ बच्चे हैं, मुझे अपने बच्चों का बचपन एक ही बार मिलना था। जैसे अधिकतर दो बच्चों की मम्मी को होता है, कि बचपन दो बार मिलता है…मेरे साथ नहीं था। लगभग पूरे समय घर पर रहने और एक भी सोलो ट्रिप नहीं करने के बाद भी मैंने महसूस किया, कि वक्त कभी पूरा नहीं पड़ता। हमेशा कम लगता है। बच्चों को भी लगता है कि मैं उनके साथ समय नहीं बिताती, मुझे भी लगता है, मैं उनके साथ ज़्यादा समय नहीं बिता पा रही। मैंने कुछ लिख नहीं रही, पढ़ नहीं रही…तो फिर ये समय जा कहाँ रहा था!

मैंने बच्चों को समझाया। आप किसी से प्यार करते हैं तो ये ज़रूरी नहीं है कि वो हर वैसी चीज़ करे, जिसमें आपको ख़ुशी मिले। Part of loving someone is letting them do things you don’t want them to do…this is called freedom…and this is a very important part of loving someone. वे धीरे-धीरे समझेंगे, मुझे मालूम है। बच्चे समझदार होते हैं। पर उसके पहले उन्हें बिल्कुल नासमझ होने का और बहुत सारा प्यार और समय मांगने का पूरा हक है। मुझसे जहाँ तक हो पाता है, मैं अपने हिस्से का वक्त उनके नाम करती हूँ। There are no rules of motherhood. We are doing the best we can. Really. The full time mothers, the part-time workers, the work from home mothers, the ones that are on a break. All of us. While being mothers, we are slowly being erased from everywhere…we do notice this…and yet choose silence and peace over protest on most days. I’ve realised, I have got my superpower back…making friends…and this time not over writing, because I hardly write anymore…but over motherhood. I’m friends with class-mates of my kids…as casually as I became friends with people who felt too deeply and wrote about the world with an urgency as if not noticing the mood would actually cause it to disappear. Theoretically, It will, but also, no one ever looking at the moon is actually impossible.

Diary by khwaab tanha collective
I have a traveling heartache. जब दिल दुखना बंद होता है, तो दर्द कहीं और शिफ्ट कर जाता है। Logically or medically समझ नहीं सकते, शायरों को समझ आता है, दुष्यंत कहते हैं ना, “सिर से सीने में कभी पेट से पाँव में कभी इक जगह हो तो कहें दर्द इधर होता है”। कुछ न कुछ दुखता रहता है। जयपुर गई थी, आख़िर नवंबर में तभी पैर में चोट लगी थी। हल्का दर्द था तो इलाज की जगह, इग्नोर कर दिया। इधर शिफ्टिंग में इतना ज़्यादा चलना फिरना हो गया कि पैर में दर्द उठ गया था बुरी तरह। हाथों में दर्द अलग। 

अभी चार तारीख को घर शिफ्ट किया है। कितने भी अच्छे पैकर्स एंड मूवर्स बुलवा लो। कितना भी कहो कि किताबें प्यार से, अच्छे से पैक करना…वे किताबों का सत्यानाश करने के लिए पूरी तरह सक्षम होते हैं। सामान सिर्फ़ लोड कर कर दूसरे घर पर रखने में रात के साढ़े नौ बज गए। बॉक्स को लेबल करने के बावजूद इन्होंने मेरी किताबों के बक्से उन कई सारे बक्सों में कहीं मिला कर रख दिया कि खोजते खोजते नहीं मिला। आख़िर को रात दस बजे के आसपास निकलने के ठीक पहले उन्होंने मेरी किताबों के बक्से ला कर रख दिए। बुकरैक अभी दीवार में फ़िक्स नहीं हुआ था इसलिए किताबें वहाँ रखना ख़तरनाक हो जाता, बच्चों का घर है। नौ बजे मैं बच्चों को सुलाने चली गई थी। दिन भर की भयंकर थकान थी। फिर भी रात के डेढ़ बजे नींद खुल गई। किताबों को कार्टन से निकाले बिना सो नहीं सकती थी। मालूम था नींद नहीं आएगी। मुझे पहले बार समझ में आया कि कैसे कुछ औरतें रात को किचन का काउंटर तब तक पूरी तरह साफ़ नहीं कर लेतीं, उन्हें नींद नहीं आती। रात को कम आवाज़ के साथ कार्टन पर लगा टेप निकालना अपनेआप में मुश्किल था। लेकिन धीरे-धीरे उसे काटा। चार कार्टन किताबें निकालीं। किसी तरह टेबल पर ऊँची ऊँची मीनारें बनाईं, ढेर सारी किताबें टीवी रैक पर रखीं। फिर चैन से जा कर सो गई।

फिर अगले दिन movers आ कर सामान अनपैक कर के गए। दिन भर उनके साथ लगी रही। दोपहर बच्चों को स्कूल से लाने के बाद थोड़ी देर आराम किया। फिर से कुछ-न-कुछ काम लगा रहा। इलेक्ट्रीशियन, इंटरनेट, प्लम्बर, कारपेंटर... नौ बजे सोने का टाइम, कि कल स्कूल भी जाना है। दस बजे तक तो जगी हुई थी, बच्चों के साथ, फिर नींद आ गई। कुणाल जब सोने आया तो उससे पूछे, टाइम कितना हो रहा है। वो बोला साढ़े बारह लगभग। हम पूछे, exactly कितना, तो बोला बारह अट्ठाइस। फिर पूछा, कि काहे। तो कहे कि चाय पीने का मन कर रहा है। उसको मालूम है, रात बारह बजे चाय पीने का मन कर रहा है मतलब किचन में चाय बना के पीने का नहीं, इसका मतलब गाड़ी लेकर बाहर जाने और चाय की दुकान चाय पीने का मन कर रहा है। तो बोला, इतनी रात में कहाँ जाएगी, थक गई है। सो जा, कल जाना। हमको मालूम था, दो मिनट में स्वेटर पहन कर, जूता पहन कर तैयार हो सकते हैं। जैकेट पहनने में एक मिनट और लगता, लेकिन देर हो जाती। तो कैलकुलेशन सही था। घर से स्टारबक्स वैसे तो आधा घंटा है, लेकिन रात को गाड़ी उड़ाते जायें तो बीस मिनट में पहुँच सकते हैं। जैसे ही कपड़ा पहनने उठे, बोलता है, इतनी रात को कुछ नहीं मिलेगा। और हम जो स्टारबक्स रेगुलर जाते हैं देर रात, जानते हैं कि भले बिल न हो, लेकिन कॉफ़ी तो मिल ही जाएगी चाहे ठीक एक बजे पहुँचें। तो इसी कॉन्फिडेंस से बोले, कि हमको मिल जाएगी। आँधी की तरह उड़ते हुए गाड़ी में बैठे और उड़ते उड़ते स्टारबक्स ठीक 12:55 में पहुँच गए। और ठीक, कॉफ़ी मिली, कि पेमेंट बाद में कर दीजिएगा। पता नहीं कैसे, लेकिन स्टारबक्स के सभी स्टोर्स में उन्होंने इतने अच्छे कस्टमर रिलेशन बना के रखें हैं, कि it feels like home. Always. अभी जब चीज़ें flux में हैं। पिछले घर से शिफ्ट कर गए हैं, नए घर में सेटल नहीं किए हैं। इस तरह देर रात गाड़ी में गाना बजाते, एक तरफ़ से थोड़े घिसे चाँद के नीचे कॉफ़ी की जादुई ख़ुशबू की तलाश में ड्राइव करते हुए लगता है…I’m home.

घर सिर्फ़ लौटने की जगह ही तो है।

इस घर में पूरब को खुलने वाली खिड़की तो है, पर उसमें पल्ले नहीं हैं, तो खुलती नहीं है। लेकिन ठीक है। सब कुछ तो कहाँ मिलता है किसी को। धूप खा के सूरज देख के संतोष करेंगे और क्या। बड़े शहर में खुला आसमान ही बड़ी बात है। यहाँ तो पूरब की खिड़की भी है। और पश्चिम वाली खिड़की तो खुलती भी है। इस साल ज़्यादा सोचेंगे नहीं। जितना जर्नलिज्म में सीखा था, सो जितना देखा-जिया है। उसको लिखेंगे बस। घर आ कर टेबल पर सामान जमाये तो देखते हैं Utopia का I गिर गया है। सोचे ठीक ही तो है, मेरे बिना थोड़े ना हो जाएगा, सब कुछ...परफेक्ट और impossible to exist. 


आपका नया साल सुंदर हो। रंगभरा हो। आपकी जादूगरी आपके भीतर के दरवाज़े खोले। आप अपने तिलिस्म की दीवारों पर रंग-रोगन करें। नारे-वारे लिखें। 


शुभम अस्तु।

07 November, 2024

मुहब्बत के ईश्वर को पसंद है सिगरेट, कि पूजा के हाथ धुआँ-धुआँ महकते हैं


हमारे देश में अधिकतर लोगों का वक़्त उनका ख़ुद का नहीं होता। गरीब हो कि अमीर, एक आधापापी अब तामीर में शामिल हो गई है। हम जहाँ हैं, वहाँ की जगह कहीं और होना चाहते हैं। समय की इस घनघोर क़िल्लत वाले समय में कुछ लोगों ने अपने लिए थोड़ा सा वक़्त निकाल रखा है। यह अपने लिए वाला वक़्त किसी उस चीज़ के नाम होता है जिससे दिल को थोड़ा करार आये…वो ज़रा सा ज़्यादा तेज़ भले धड़के, लेकिन आख़िर को सुकून रहे। यह किसी क़िस्म का जिम-रूटीन हो सकता है, कोई खेल हो सकता है, या कला हो सकती है।

इस कैटेगरी की सब-कैटेगरी में वो लोग जिन्होंने इस ख़ास समय में अपने लिए कला के किसी फॉर्म को रखा है। नृत्य, गायन, लेखन, पेंटिंग…इनके जीवन में कला का स्थान अलग-अलग है। कभी यह हमारी ज़रूरत होती है, कभी जीने की सुंदर वजह, कभी मन के लिये कोई चाराग़र। मेरे लिये अच्छी कला का एक पैमाना यह भी है कि जिसे देख कर, सुन कर, या पढ़ कर हमारे भीतर कुछ अच्छा क्रिएट करने की प्यास जागे। उस कथन से हम ख़ुद को जोड़ सकें। हमारे समकालीन आर्टिस्ट्स क्या बना रहे हैं, उनकी प्रोसेस कैसी है…उनके डर क्या हैं, उनकी पसंद की जगहें कौन सी हैं, वे कैसा संगीत सुनते हैं…किसी हमउम्र लेखक या पेंटर से मिलना इसलिए भी अच्छा लगता है कि वे हमारे समय में जी रहे हैं…हमारे परिवेश में भी। हमारे कुछ साझे सरोकार होते हैं। अगर लेखन में आते कुछ ख़ास पैटर्न की बात करें तो विस्थापन, आइडेंटिटी क्राइसिस, उलझते रिश्ते…बदलता हुआ भूगोल, भाषा का अजनबीपन…बहुत कुछ बाँटने को होता है।

कहते हैं कि how your spend your days is how you spend your life. मतलब कि हमारे जीवन की इकाई एक दिन होता है…और रोज़मर्रा की घटनायें ही हमारे जीवन का अधिकतर हिस्सा होती हैं। मैं बैंगलोर में पिछले 16 साल से हूँ…और कोशिश करने के बावजूद यहाँ की भाषा - कन्नड़ा नहीं सीख पायी हूँ। हाँ, ये होता था कि इंदिरानगर के जिस घर में दस साल रही, वहाँ काम करने वाली बाई और मेरी कुक की बातें पूरी तरह समझ जाती थी। मुझे कुछ क्रियायें और कुछ संज्ञाएँ पता थी बस। जैसे ऊटा माने खाना, केलसा माने काम से जुड़ी कोई बात, बरतिरा माने आने-जाने संबंधित कुछ, कष्ट तो ख़ैर हिन्दी का ही शब्द था, निदान से…मतलब आराम से…थिर होकर करना। उनकी बातचीत अक्सर घर के माहौल को लेकर होती थी…उसके बाद अलग अलग घरों में कामवालियों की भाषा नहीं समझ पायी कभी भी। मैं शायद भाषा से ज़्यादा उन दोनों औरतों को समझती थी। उन्होंने एक बीस साल की लड़की को घर बसाने में पूरी मदद की…उसकी ख़ुशी-ग़म में शामिल रही। उनको मेरा ख़्याल था…मुझे उनका। वे मेरा घर थीं, उतना ही जितना ही घर के बाक़ी और लोग। ख़ैर… घर के अलावा बाहर जब भी निकली तो आसपास क्या बात हो रही है, कभी समझ नहीं आया…सब्ज़ी वाले की दुकान पर, किसी कैफ़े में, किसी ट्रेन या बस पर भी नहीं…कुछ साल बाद स्टारबक्स आया और मेरे आसपास सब लोग अंग्रेज़ी में सिर्फ़ स्टार्ट-अप की बातें करने लगे। ये वो दिन भी थे जब आसपास की बातों को सुनना भूल गई थी मैं और मैंने अच्छे नॉइज़ कैंसलेशन हेडफ़ोन ले लिये थे। मैं लूप में कुछ इंस्ट्रुमेंटल ही सुनती थी अक्सर। 2015 में जब तीन रोज़ इश्क़ आयी तो मैं पहली बार दिल्ली गई, एक तरह से 2008 के बाद पहली बार। वहाँ मेट्रो में चलते हुए, कहीं चाय-सिगरेट पीते, खाना खाते हुए मैं अपने आसपास होती हुई बातों का हिस्सा थी। ये दिल्ली का मेरा बेहद पसंदीदा हिस्सा था। मुझे हमेशा से दिल्ली में पैदल चलना, शूट करना और कुछ से कुछ रिकॉर्ड करना भला लगता रहा है।

हिन्द-युग्म उत्सव में भोपाल गई थी। सुबह छह बजे की फ्लाइट थी, मैं एक दिन पहले पहुँच गई थी। सफ़र की रात मुझे यूँ भी कभी नींद नहीं आती। तो मेरा प्रोसेस ऐसा होता है कि रात के तीन बजे अपनी गाड़ी ड्राइव करके एयरपोर्ट गई। वहाँ पार्किंग में गाड़ी छोड़ी और प्लेन लिया। दिन भर भोपाल में दोस्तों से बात करते बीता। मैं वहाँ पर जहांनुमा पैलेस में रुकी थी, जो कि शानदार था। इवेंट की जगह पर शाम में गई, वहाँ इंतज़ाम देखा और उन लोगों के डीटेल लिए जिनसे अगले दिन इवेंट पर AI के बारे में बात करनी थी। भर रात की जगी हुई थी, तो थकान लग रही थी। रात लगभग 7-8 बजे जब रेस्टोरेंट गई डिनर करने के लिए तो हेडफ़ोन नहीं लिये। किंडल ले लिया, कि कुछ पढ़ लेंगे। कुछ सुनने का पेशेंस नहीं था। रेस्टोरेंट ओपन-एयर था। मैंने एक सूप और खाने का कुछ ऑर्डर कर दिया। मेरे आसपास तीन टेबल थे। दो मेरी टेबल के दायीं और बायीं और, और एक पीछे। इन तीनों जगह पर अलग अलग लोग थे और वे बातों में मशगूल थे। मुझे उनकी बातें सुनाई भी पड़ रही थीं और समझ भी आ रही थीं…यह एक भयंकर क्रॉसफेड था जिसकी आदत ख़त्म हो गई थी। मैं बैंगलोर में कहीं भी बैठ कर अकेले खाना खा सकती हूँ। सबसे ज़्यादा शोर-शराबे वाली जगह भी मेरे लिये सिर्फ़ व्हाइट नॉइज़ है जिसे मैं मेंटली ब्लॉक करके पढ़ना-लिखना-सोचना कुछ भी काम कर सकती थी। मैं चाह के भी किंडल पढ़ नहीं पायी…इसके बाद मुझे महसूस हुआ कि समझ में आने वाला कन्वर्सेशन अब मेरे लिये शोर में बदल गया है। एक शहर ने मुझे भीतर बाहर ख़ामोश कर दिया है।

बैंगलोर में मेरे पास एक bhk फ्लैट है - Utopia, जिसे मैं अपने स्टडी की तरह इस्तेमाल करती हूँ। लिखना-पढ़ना-सोचना अच्छा लगता है इस स्पेस में। लेकिन शायद जो सबसे अच्छा लगता है वो है इस स्पेस में अकेले होना। ख़ुद के लिए कभी कभी खाना बनाना। अपनी पसंद के कपड़े पहनना…देर तक गर्म पानी में नहाना…स्टडी टेबल से बाहर की ओर बनते-बिगड़ते बादलों को देखना। यह तन्हाई और खामोशी मेरे वजूद का एक हिस्सा बन गई है। बहुत शोर में से मैं अक्सर यहाँ तक लौटना चाहती हूँ।

मुराकामी की किताबें मेरे घर में होती हैं। किंडल पर। और Utopia में भी। ६०० पन्ने की The wind up bird chronicles इसलिए ख़त्म कर पायी कि यह किताब हर जगह मेरे आसपास मौजूद थी। कुछ दिन पहले एक दोस्त से बात कर रही थी, कि The wind up bird chronicles कितना वीभत्स है कहीं कहीं। कि उसमें एक जगह एक व्यक्ति की खाल उतारने का दृश्य है, वह इतना सजीव है कि ज़ुबान पर खून का स्वाद आता है…उबकाई आती है…चीखें सुनाई पड़ती हैं। कि मैं उस रात खाना नहीं खा पायी। वो थोड़े अचरज से कहता है, But you like dark stuff, don’t you? दोस्त हमें ख़ुद को डिफाइन करने के लिए भी चाहिए होते हैं। मैंने एक मिनट सोचा तो ध्यान आया कि मैं सच में काफ़ी कुछ स्याह पढ़ती हूँ। कला में भी मुझे अंधेरे पसंद हैं।

दुनिया में कई कलाकार हैं। इत्तिफ़ाक़न मैं जिनके प्रेम में पड़ती हूँ, उनके जीवन में असह्य दुख की इतनी घनी छाया रहती है कि कैनवस पर पेंट किया सूरज भी उनके जीवन में एक फीकी उजास ही भर पाता है। शिकागो गई थी, तब वैन गो की बहुत सारी पेंटिंग्स देखी थीं। वह एक धूप भरा कमरा था। उसमें सूरजमुखी थे। मैं वहाँ लगभग फफक के रो देना चाहती थी कि वैन गो…तुमने कैसे बनाए इतने चटख रंगों में पेंटिंग्स जब कि तुम्हारे भीतर मृत्यु हौले कदमों से वाल्ट्ज़ कर रही थी। अकेले। कि पागलपन से जूझते हुए इतने नाज़ुक Almond Blossoms कैसे पेंट किए तुमने…कि स्टारी नाइट एक पागल धुन पर नाचती हुई रात है ना? मैं ऐसी रातें जाने कहाँ कहाँ तलाशती रहती हूँ। कि जब न्यू यॉर्क में MOMA में स्टारी नाइट देखी थी तो रात को टाइम्स स्क्वायर पर बैठी रही, रात के बारह बजे अकेले…चमकती रोशनी में ख़ुद को देखती…स्याही की बोतल भरती बूँद बूँद स्याह अकेलापन से…

यह दुनिया मुझे ज़रा कम ही समझ आती है। अधिकतर व्यक्ति जब कोई अच्छा काम कर रहे होते हैं तो वे चाहते हैं कि उन्हें एक मंच मिले, उन पर स्पॉटलाइट हो…वे गर्व मिश्रित ख़ुशी से सबके सामने अपनी उपलब्धियों के लिए कोई अवार्ड लेने जायें। मंच पर उन लोगों के नाम गिनायें जिन्होंने इस रास्ते की मुश्किलें आसान कीं…जो उनके साथ उनके मुश्किल दौर में खड़े रहे। ऐसे में दुनिया का अच्छाई पर भरोसा बढ़ता है और उन्हें लगता है मेहनत करने वाले लोग देर-सवेर सफलता हासिल कर ही लेते हैं। इन दिनों जिसे hustle कहते हैं। कि ऑफिस के अलावा भी कुछ और साथ-साथ कर रहे हैं। कि उन्होंने ख़ुद को ज़िंदा रखने की क़वायद जारी रखी है।

मुझे अपने हिसाब का जीवन मिले तो उसमें रातें हों…कहीं चाँद-तारे की टिमटिम रौशनी और उसमें हम अपनी कहानी सुना सकें। अंधेरा और रौशनी ऐसा हो कि समझ न आए कि जो सच की कहानी है और जो झूठ की कहानी है। कि किताब के किरदारों के बारे में लोग खोज-खोज के पूछते हैं कि कहाँ मिला था और मेरे सच के जीवन के नीरस होने को झूठ समझें। कि सच लिखने में क्या मज़ा है…सोचो, किसी का जीवन कहानी जितना इंट्रेस्टिंग होता तो वो आत्मकथा लिखता, उपन्यास थोड़े ही न।

मैं विरोधाभासों की बनी हूँ। एक तरफ़ मुझे धूप बहुत पसंद है और दूसरी तरफ़ मैं रात में एकदम ऐक्टिव हो जाती हूँ - निशाचर एकदम। घर में खूब सी धूप चाहिए। कमरे से आसमान न दिखने पर मैं अवसाद की ओर बढ़ने लगती हूँ। और वहीं देर रात शहर घूमना। अंधेरे में टिमटिमाती किसी की आँखें देखना। देर रात गाड़ी चलाना। यहाँ वहाँ भटकते किरदारों से मिलना…यह सब मुझे ज़िंदा रखता है।

एक सुंदर कलाकृति हमें कुछ सुंदर रचने को उकसाती है। हमारे भीतर के स्याह को होने का स्पेस देती है। हमें इन्स्पायर करती है। किसी के शब्द हमारे लिए एक जादू रचते हैं। कोई छूटा हुआ प्रेम हमारे कहानी की संभावनायें रचता है। हम जो जरा-जरा दुखते से जी रहे होते हैं…किसी पेंटिंग के सामने खड़े हो कर कहते हैं, प्यारे वैन गो…टाइट हग्स। तुम जहाँ भी रंगों में घूम रहे हो। प्यारे मोने, क्या स्वर्ग में तुम ठीक-ठीक पकड़ पाये आँखों से दूर छिटकती रौशनी को कभी?

मेरी दुनिया अचरज की दुनिया है। मैं इंतज़ार के महीन धागे से बँधी उसके इर्द गिर्द दुनिया में घूमती हूँ। जाने किस जन्म का बंधन है…उसकी एक धुंधली सी तस्वीर थी। खुली हुई हथेली में जाने एक कप चाय की दरकार थी या माँगी हुई सिगरेट की…बदन पर खिलता सफ़ेद रंग था या कोरा काग़ज़…

जाने उसके दिल पर लिखा था किस-किस का नाम…जाने कितनी मुहब्बत उसके हिस्से आनी थी…
मेरे हिस्से सिर्फ़ एक सवाल आया था…उसके काँधे से कैसी ख़ुशबू आती थी? 

जलता हुआ दिल सिगरेट के धुएँ जैसा महकता है। भगवान ही जानता है कि कितनी पागल रातें आइस्ड वाटर पिया है। बर्फ़ीला पानी दिल को बुझाता नहीं। नशा होता है। नीट मुहब्बत का नशा। कि हम नालायक लोग हैं। बोतल से व्हिस्की पीने वाले। इश्क़ हुआ तो चाँद रात में संगमरमर के फ़र्श पर तड़पने वाले। आत्मा को कात लेते किसी धागे की तरह और रचते चारागार जुलाहों का गाँव कि जहाँ लोग टूटे हुए दिल की तुरपाई करने का हुनर जानते। कि हमारे लिये जो लोग ईश्वर ने बनाये हैं, वे रहते हैं कई कई किलोमीटर दूर…कि उनके शहर से हमारे शहर तक कुछ भी डायरेक्ट नहीं आता…न ट्रेन, न प्लेन, न सड़क…हर कुछ के रास्ते में दुनियादारी है…

हम थक के मुहब्बत के उसी ईश्वर से दरखास्त करते, कि दिल से घटा दे थोड़ी सी मुहब्बत…कि इतने इंतज़ार से मर सकते हैं हम। कि कच्ची कविताओं की उम्र चली गई। अब ठहरी हुई चुप्पियों में जी लें बची हुई उम्र।

लेकिन दिल ज़िद्दी है। आख़िर, किसी लेखक का दिल है, इस बेवक़ूफ़ को लगता है, हम सब कुछ लिख कर ख़त्म कर देंगे। लेकिन असल में, लिखने से ही सब कुछ शुरू होता है।


***
कलाई पर प्यास का इत्र रगड़ता है
बिलौरी आँखों वाला ब्रेसलेट
इसके मनके उसकी हथेलियों की तरह ठंढे हैं।

***
इक जादुई तकनीक से कॉपी हो गये
महबूब के हाथ
वे हुबहू रिप्लीकेट कर सकते थे उसका स्पर्श
उसकी हथेली की गर्माहट, कसावट और थरथराहट भी

प्रेमियों ने लेकिन फेंक दिया उन हाथों को ख़ुद से बहुत दूर
कि उस छुअन से आती थी बेवफ़ाई की गंध।

***

मुहब्बत के ईश्वर को पसंद है सिगरेट
कि पूजा के हाथ धुआँ-धुआँ महकते हैं


27 August, 2024

Random रोज़नामचा - वाइट मस्क

मनुष्य की पाँच इंद्रियों में एक स्पर्श है जिसकी नक़ल नहीं बनायी जा सकती। तस्वीर और वीडियो किसी को न देखने की भरपाई कर देते हैं। कोविड में हम लोग जो दिन भर घर में रहते थे, तो वीडियो कॉल करना आसान हो गया। किसी दोस्त को कह सकते हैं, वीडियो कॉल कर लें? पहले वीडियो कॉल एक त्योहार की तरह होता था, एक डेट की तरह जिसके लिये ना केवल तैयारी की जाती थी, बल्कि इत्तर वग़ैरह भी लगाये बैठते थे, कि जैसे ख़ुशबू जाएगी दूर तक। वीडियो कॉल की टेक्नोलॉजी तो बहुत साल पहले से थी लेकिन कंप्यूटर पर वेब-कैम लगाना, ख़राब इंटरनेट में धुंधली तस्वीर देखने में मज़ा नहीं आता था। अब तेज़ इंटरनेट के कारण एकदम साफ़ दिखता है चेहरा, आँखें…किसी का ठहरना भी। बात करते हुए स्क्रीनशॉट ले सकते हैं। FOMO कम होता है। दोस्तों के बच्चों को पैदा होने के बाद से लेकर कर साथ में पलते-बढ़ते वीडियो तस्वीर शेयर करते लगता है हमने देखा है उन्हें। यार दोस्त कहीं गये तो वहाँ की वीडियो भेज दी, वहाँ से वीडियो कॉल कर दिया, तेरी याद आ रही है बे। 

किसी जंगल से गुजरते हैं तो वक़्त ठहरता है और हम लौटते हैं। ठीक ठीक याद में कितने साल पीछे, मालूम नहीं। दार्जिलिंग। बारिश, सिंगल माल्ट। कोई ख़ुशबू कभी मिल जाती है कहीं अचानक से, सिगरेट पीते हुए, कैंडल की लौ से उँगली जलाने के ठीक पहले तो कभी रेगिस्तान की शाम में…रेत में पाँव डाले बैठे दूर से धुएँ की गंध आती है। किसी नयी जगह कोई पुरानी सब्ज़ी खा रहे होते हैं और लगता है कि बचपन में पहुँच गये, या कि किसी दोस्त ने कौर तोड़ कर मुँह में खिला दिया और किसी पिछले जन्म तक का कुछ याद आ गया। 

सिर्फ़ एक स्पर्श है, जो कहीं नहीं मिलता। दुबारा कभी।

किसी के हाथों को रेप्लीकेट नहीं कर सकते। हाथों की गर्माहट, दबाव, नरमाई…कुछ नहीं मिलता कभी, कहीं फिर। हम हम क्या इसलिए तुम्हें नींद में टटोलते चलते हैं? इसलिए देर रात भले एक पोस्टकार्ड, भले एक पन्ने की चिट्ठी, मगर लिखते हैं तुम्हारे नाम। कि उस काग़ज़ को छू कर तुम्हें यक़ीन आये कि इस हैंडराइटिंग का एक ही मतलब है, ये पागल लड़की इस काग़ज़ को हाथ में लिए सोच रही थी, सफ़र करती हूँ तो भी तुम्हारा शहर रास्ते में नहीं मिलता। किसी के लिये कोई साड़ी ख़रीदना, कभी कोई रूमाल काढ़ना, कभी कोई स्कार्फ भेज देना…इतना हक़ बनाये रखना और इतने दोस्त बनाए रखना। आज सुबह लल्लनटॉप के एक वीडियो का क्लिप देखा जिसमें सलाह दी जा रही है कि किताब ख़रीद के पढ़ें, माँग के नहीं। हम किताब माँग के भी खूब पढ़े हैं और ख़रीद के भी। अपनी किताब आपने को पढ़ने को दी है, तो आपका एक हिस्सा साथ जाता है। किसी की पढ़ी हुई किताब पढ़ना, मार्जिन पर के नोट्स देखना। यह जीवन का एक अनछुआ हिस्सा है। अगर वाक़ई आपने कभी माँग के किताब नहीं पढ़ी, या आप इतने लापरवाह हैं कि दोस्त आपको किताब उधार नहीं देते तो आप जीवन में कुछ बहुत क़ीमती मिस कर रहे हैं। 

कपड़ों की छुअन। मैं जो अनजान शहर में तुम्हारे शर्ट की स्लीव पकड़ कर चलती थी। या किसी कहानी में किसी किरदार के सीने पर सर रखे हुए जो कपास या लिनेन गालों से छुआया था। किसी ने कभी गाल थपथपाया। कभी बालों में उँगलियाँ फ़िरा दीं। किसी ने hug करते हुए भींच लिया और हम जैसे उस ककून में लपेट रहे ख़ुद को, सिल्क में लपेटी शॉल की तरह। मेले में फिरते रहे आवारा, दोनों हाथों में दो तरफ़ दो दोस्तों के बीच, स्कूल की silly वाली दोस्ती जैसी। हम जो फ़िल्मों में देख हैं, किसी के सीने पर हाथ रख कर दिल की धड़कन को महसूस करना…नब्ज़ में बहता खून भागते हुए रुक-रुक सुनना, उँगलियों से। किसी का माथा छू कर देखना, बुख़ार कम-ज़्यादा है या है ही नहीं। 

स्पर्श की डिक्शनरी नहीं होती। हम अपने हिस्से के स्पर्श उठाते चलते हैं। मैं अलग अलग शहरों में हथेली खोले घूमती हूँ, इमारत, फूल-पौधे, स्टील की रेलिंग, दीवारें…सब कुछ स्पर्श की भाषा में भी दर्ज होता है मन पर। 

मैं याद में भटकती हूँ…

याद तो कभी कभी आनी चाहिए ना? दिन भर याद साथ चलती हो तो आना-जाना थोड़े कहते हैं। कभी लगता है याद कभी जाये भी। हम अपने प्रेजेंट में प्रेजेंट रहें, एबसेंट नहीं। एबसेंट-माइंडेड नहीं।

आज सुबह नया परफ्यूम ख़रीदा, Mont Blanc का Signature. दुकान में कहा कुछ मस्क चाहिए, तो उसने कहा ये White Musk है. एक बार में अच्छा लगा, तो ले आये। कलाई पर लगाये। उँगलियों के पोर पर सुबह जो खाये, सो खाये नारंगी छीलने की महक रुकी हुई थी। लिखने के पहले हथेलियों से चेहरा ढक लेने की आदत पुरानी है। अंधेरे में वो दिखता है जो आँख खोलने पर ग़ायब हो जाता है। हम जाने किस खुमार में रहते हैं सुबह-सुबह। पुराना इश्क़ है, आदत की तरह। आज सुबह सोच रहे थे, कुछ पिछले जन्म का होगा बकाया, इतना कौन याद करता है किसी को। इक छोटी सी नोटबुक है, उसमें बहुत कम शब्द हैं, लेकिन उन बहुत कम और बहुत प्यारे दोस्तों के हाथ से लिखे हुए जो शायद कई जन्म से साथ-साथ चल रहे हैं। 

फ़िराक़ साहब कह गये हैं, न कोई वा'दा न कोई यक़ीं न कोई उमीद मगर हमें तो तिरा इंतज़ार करना था।’

मुहब्बत शायद कम-बेसी होती रहती है। लेकिन इंतज़ार लगातार बना रहता है। अक्सर भी, हमेशा भी।

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