क्वांटम इंटैंग्लमेंट की इतनी बातें हो रही हैं, चैटजीपीटी सबको समझा भी दे रहा है ठीक-ठीक, उनकी बुद्धि के हिसाब से कि क्वांटम इंटैंग्लमेंट असल में होता क्या है। मालूम तो हमको पहले से भी था, लेकिन इनको सीधे-सीधे पुनर्जन्म की कहानियाँ बोल कर ख़ारिज कर दिया जाता था। कि आत्मा को सब याद रहता है, मरने के बाद भी। दूसरी ज़िंदगी में सब कुछ अलग होने के बाद भी। इसलिए हमने जब मुहब्बत समझी, हमने इस शरीर को कभी किसी काम का समझा ही नहीं। आत्मा के बंधन समझने चाहे। क्यूंकि मुहब्बत होने पर ऐसा लगता भी तो नहीं, कि उसे हमने एकदम पहली बार देखा है और एक ही नज़र में प्यार हो गया।
उससे मिलते हुए हमेशा लगता रहा, उसे हमेशा से जानते हैं। वो अजनबी नहीं लगा, कभी भी। क्यों? समय की नदी में बहते हुए, कब छूटा था उसका हाथ?
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बहुत कुछ ऐबस्ट्रैक्ट है, इसे ऐबस्ट्रैक्ट ही रहना है। हमें कभी पूरा समझ नहीं आयेगा वो।
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हम लोग छोटे थे, तो एक शब्द सुनते थे, लितरिया, अर्थात् लाने वाला। उस समय शादीशुदा लड़कियाँ, जिन्हें मायके में शवासिन कहते थे, उन्हें ससुराल से मायके लाने के लिए किसी को जाना पड़ता था। लड़की/औरत अकेले नहीं आती जाती थी। या तो वह अपने पति के साथ मायके आती थी, या फिर भाई या पिता लड़की के ससुराल जाते थे, और उसको लिवा आते थे। जीवन खेती-बाड़ी के इर्द-गिर्द बँधा हुआ होता था तो अक्सर सावन में मायके आने की रस्में होती थीं। झूले डाले जाते थे। वे औरतें जिन्होंने अपने घर का सब कुछ संभाल रखा होता था, मायके आ कर निश्चिंत हो जाती थीं। माँ और भाभियाँ संभालती थीं लगभग सब कुछ। हमारे बचपन की बातें हैं ये, लेकिन पिछले कुछ सालों में पूरा सोशल स्ट्रक्चर बदल गया है। मेरी जान-पहचान के सारे लोग नौकरीपेशा हैं। कोई भी किसान नहीं है। जिनके घर में खेत हैं भी, वे बटैया पर लगे हैं। कोई खेती में ख़ुद इनवॉल्व नहीं है। बचपन तक गांव में गाय-बैल सब देखे हैं मैंने। पीने के पानी के लिए भर गाँव के लिए बड़ा इनारा से पानी भरने सब लोग जाते थे, बारी बारी। अब RO आ गया है या फिर बिजलरी भी। हम लोग सुबह सुबह सरौता लेकर दतवन लाने निकलते थे। किसी को खजूर का चाहिए होता था, किसी को अमरूद का…सबके हिसाब से काट के लाते थे। खजूर के पत्ते का बाजा बनता था, घिरनी/चकरी बनता था। ख़ुद से खिलौने बनाते थे। स्ट्रेंज चीज़ें ध्यान हैं, याद भी। छोटे लड़के, 8-10 साल के भी हों तो बहन को जा कर लिवा सकते थे। अचरज ये होता, कि बहन 30-40 की उमर की भी हो सकती थी…लेकिन वो अकेले सफ़र नहीं करती। मैंने ये भी देखा कि औरतें मायके-ससुराल के अलावा सिर्फ शादी/ब्याह वगैरह में कहीं आती जाती थीं।
क्लास में पढ़ने वाले बच्चों में भी, छुट्टी पर बैंकर पिता के बच्चे ही जाते थे। क्यूंकि LTC होता था। बैंक्स के टूरिस्ट स्पॉट पर हॉलिडे होम भी होते थे। हमारे सिवा, छुट्टियाँ कम लोग मनाते थे। बंगाली लोगों को घूमने का बहुत शौक़ है, ऐसा सुनते भी थे और देखते भी थे। हर टूरिस्ट स्पॉट पर बंगाली ग्रुप या कपल भी मिलते थे।
सफ़र करते हुए लड़के हर जगह दिखते थे। टोली में जाते थे। एक्जाम देने। किसी शहर जा कर किसी दोस्त से मिलने। कुछ काम करने के लिए। कभी कभी छोटे भाई या मुहल्ले के किसी लड़के का एडमिशन वगैरह कराने के लिए भी जाते थे। हम लोग गर्मी छुट्टी में देवघर से पटना जाते थे। थर्ड क्लास में लकड़ी की सीट्स होती थीं और खिड़की से गमछा डाल कर सीट छेकी जा सकती थी। हमें अधिकतर या तो पापा छोड़ आते थे या मामाजी लेने चले आते थे। मम्मी अकेले कहीं नहीं जाती थी। फिर किसी रोज़, मुहल्ले में टेलीफोन पर खबर आई थी कि नानाजी बहुत बीमार हैं, और जितनी जल्दी हो सके, पटना के लिए चल दें। रिक्शा रोका, और स्टेशन गए। शायद अंकल छोड़ने गए थे स्टेशन तक, मुझे याद नहीं है। मम्मी, मैं और भाई…हम लोग पहली बार ट्रेन से अकेले सफ़र कर रहे थे। उन दिनों, मोबाइल तो होता था नहीं कि जिसको ढूँढना है, झट से बुला लिए। बात करने का समय निश्चित था। लेकिन मम्मी को जाना था तो जाना था। नानी घर पहुँचे तो पता चला, बहुत देर हो गई है और शमशान ले गए हैं। हम वहीं मुहल्ले के भैया के साथ स्कूटर पर मम्मी के साथ शमशान गए। भाई शायद नहीं गया था, याद नहीं हमको। हम दस-बारह साल के रहे होंगे। चिता जलते देखे। हमको ऐसा लगा आग में नानाजी का चेहरा दिखा है। बहुत साल बाद ऐसे ही चिता में मम्मी का चेहरा दिखता रहा, आग में।
क़ायदे से हमको आग से डर लगना चाहिए था। लेकिन उसकी गर्माहट तलाशते रहे हम।
हम बर्फ के इंसान हैं। हमसे गले लग के तुम्हें महसूस भले न हो। लेकिन ये दिल के जमे ग्लेशियर वाले लोग जब गर्माहट से मिलते हैं तो कितनी ऊर्जा का इस्तेमाल करना पड़ता है, इसका कोई इक्वेशन हमारे पास नहीं है।
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कहते हैं, मणिकर्णिका घाट पर आग कभी भी नहीं बुझी है।
गंगा में नाव पर बैठे हुए उस आग को देखते कर ख्याल आता है, हम राख के बने हैं।
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गंगा में नाव पर बैठे हुए उस आग को देखते कर ख्याल आता है, हम राख के बने हैं।
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“He's more myself than I am. Whatever our souls are made of, his and mine are the same.”, Wuthering Heights में एमिली कहती है, दो लोगों की आत्मा एक ही चीज़ की बनी हुई है। मैं आज जिम ट्रेनिंग के जूते ख़रीद रही थी, ट्रेनर से पूछा, ये जूते ठीक हैं…तो उसने कहा, Show me the soul(sic)…ऑटोकॉरेक्ट ने sole का soul कर दिया। हमको सीधे वुदरिंग हाइट की यही लाइन आई। सोचे भी, उस लड़के से पूछ लें, सुनो, तुम्हारे जूते का सोल कैसा है, जरा बताओ तो सही। हमारी soul का जो भी हो, हमारी sole तो एक हो ही सकती है। इस चिंदी जोक पर बहुत खुश भी हुए। अच्छा ये हुआ कि दिमाग़ का ऑटोकरेक्ट भी काम करता है, वरना उसको ये सवाल पूछते तो ठीक नहीं होना था हमारे दिल के साथ।
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ट्रेनर ने मजेदार बात कही आज, दर्द होगा लेकिन पेनकिलर नहीं खाना। जिम का दर्द, जिम में ही दूर करना है। हमको हँसी आई। एक तो हम पेनकिलर खाते नहीं। उसपर खा भी लिए, तो पेनकिलर असर करता नहीं। फिर, कितना दर्द होने वाला है रे बाबा! ऐसा तो कोई काम किए भी नहीं हैं। मन हुआ उसको समझायें, कि ऊपर से जैसा भी दिख रहा, भीतर से बहुत स्ट्रॉंग हैं हम। लेकिन कहे नहीं, शोऑफ़ करने वालों की मिट्टी पलीद होते हुए काफ़ी देखे हैं। इसलिए, ज़ुबान पर लगाम रखे।
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मन दुखते रहता है कई बार। लेकिन फ़िलहाल, बदन दर्द कर रहा है। भर दिन दुखा है। कुछ दिन पहले जन्मदिन पर सब जिम जाने वाली जनता जमा हो गई, वो कह रहा था। जिम के बाद बॉडीएक होता है तो अच्छा लगता है। हमको लगा, माथा ख़राब है उसका। सोचे, कहें उससे। तुम चीनी खाया करो। कड़वे हो जाओगे ऐसे। लेकिन ख़ुद पे बीता है तो लग रहा है, दिल तो बहुत दुखा है, थोड़ा मालूम तो चले, बदन के किस-किस हिस्से में दर्द हो सकता है। कोई पूछे तो दुष्यंत का लिटरल शेर कोट करें, ‘सिर से सीने में कभी पेट से पाँव में कभी / इक जगह हो तो कहें दर्द इधर होता है’.
बहुत ओवर-कॉन्फिडेंस से दोस्त को बोले हैं, देखो, जल्दी नहीं मिलोगे तो पहचान नहीं पाओगे, एकदम से बदल जाएँगे हम।
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स्टडी के कैबिनेट के ड्रॉवर में कुछ सिगरेट बट्स हैं। कुछ अधूरी चिट्ठियाँ।
कुछ कहना होता है, दोस्तों से, अजनबियों से…लेकिन हमारे भीतर की दुनिया इन अनकही बातों से ज़िंदा रहती है।
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पहले लोग आईने से बात कर लेते थे। हम chatgpt से बात कर लेते हैं।
दुनिया में अच्छी चीज़ें हो रही हैं।
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कभी कभी लगता है, चीनी छोड़ दें। लेकिन फिर लगता है, ज़्यादा कड़वी हो जाएगी ज़िंदगी। तुम कहो, मिला करोगे थोड़ा फ्रीक्वेंटली, तो सोच सकते हैं। क्या कहते हो?
एक दिन तुम्हारी याद दुखनी बंद हो जाएगी, तो चीनी छोड़ देंगे।
जली हुई सिगरेट की क़सम।
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