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24 March, 2026

छोटी गोल्ड फ्लेक, दिल पर नन्हे लेकिन मज़बूत टांके लगाने के लिए।

जल्दी ठीक हो जाने के लिए, हर बड़े ज़ख़्म को सिलना पड़ता है। छोटी गोल्ड फ्लेक चाक हुए कलेजे को सिलती है। अगर गहरा ज़ख़्म देख कर तुम्हारे हाथ थरथरायें न तो। ये मत कहो, कि छोटी गोल्ड-फ्लेक ही क्यूँ, कि फिर हम कहेंगे, ठीक होने की इतनी भी जल्दी किसको है, फिर तुम क्यूँ भेज देना चाहते हो ऐसे दुखते कलेजे वाली लड़की को ख़ुद से इतना ज़्यादा दूर…बकवास मत करो, कि एक फ्लाइट की दूरी को दूर थोड़े कहते हैं, पास ही कहते हैं…जब मन हुआ, उड़ कर आ जाना। 

ये चारागर है जिसके पास चुप्पी भी है, बातें भी…कहो, किससे ठीक होना है तुम्हें…या कि गोली देना हो तो वो भी है, गोली खानी हो, तो सो भी है…वन स्टॉप सॉल्यूशन। मर्ज़ अच्छा लगने लगे, इतना अच्छा चारागर।

इस सिगरेट की छोटी साइज पर नहीं जाओ, कि इस ऑपरेशन में ज़्यादा देर लगेगी…मेरे पास वक्त ही वक्त है। देर तक पियेंगे, ढेर सारी, छोटी छोटी गोल्ड-फ्लेक…जब तक कि तुम्हारा कलेजा इतना जलने लगे कि भूल जाओ, किस ज़ख़्म की सिलाई करने बैठे थे। कैसा गर्म मौसम था, तसल्लीबख़्श। स्कूल में जब गर्मी छुट्टी होती थी, करने को कुछ नहीं होता था। नानीघर में गलियों में धूल फाँकते रहते थे या अमरूद के पेड़ पर लटके कौन सा अमरूद कब पकेगा का हिसाब लगाते रहते। जरूरी काम होते थे कि माँझे का धागा बनाने के लिए बल्ब या ट्यूबलाइट मिल जाये, तो कचरे में भी ढूँढने जाते थे कभी कभी। ग़ज़ब डेयरिंग हुआ करते थे उन दिनों। ये गर्मी वैसी ही थी। ये दिल वैसा ही होना चाह रहा था, तुम लोगों के साथ।

हम जो कि मग्गे में कॉफ़ी पीते हैं। तुम्हें मालूम, कमसेकम 350ml तो होनी ही चाहिए। छोटी कप में पीने में मजा नहीं आता। कुल्हड़ वाली चाय भी पीने जाते हैं तो लार्ज या मीडियम। यहाँ ये इत्ता छोटा छोटा काग़ज़ के कप में चाय, जैसे टेस्टिंग कराते हैं, वैसा ही…लेकिन जाते साथ थोड़े समझ आ जाता, कि एक ही बार में मग्गे भर चाय क्यों नहीं पी रहे। ये इत्मीनान की जगह थी। दोहराव की…बचपन में लिखना सीखते हैं तो बार बार एक ही शब्द लिखते हैं। खूब जोर से पेंसिल गड़ा कर नोटबुक में। डेस्क की लकड़ी में डिवाइडर से खुरच खुरच कर…याद करने वाली चीज़ को दोहराव चाहिए होता है, हमेशा।

अपने। तुम मेरे अपने लोग थे। मेरे अपने।

मैंने तुम्हें for-granted लिया। मैंने तुम्हें परेशान होने दिया, अपने लिए। कि ठीक है, आओ तुम भी सुबह सुबह उठ के एयरपोर्ट। ऐसा एक इतवार हो सकता है कि नींद से चोरी करें घंटे-घंटे भर। कि बिना किसी मुद्दे के बात करेंगे हम। कि उलझ जाएँगे किसी एक ही बिंदु पर और तुम झेल लोगे, एक रोज़, थोड़ी देर को…इतना साधिकार कहेंगे, अनाधिकार हो, तो भी सही।

मेरे भीतर दो तरह की कहानियाँ रहती हैं। एक जो फर्स्ट पर्सन में लिखी जाए और दूसरी जो थर्ड पर्सन में लिखी जाए। दोनों कहानियाँ अलग अलग तरह की होती हैं। सच वाली कहानियाँ थर्ड पर्सन में लिखना आसान रहता है और पूरी काल्पनिक कहानी फर्स्ट पर्सन में…लेकिन आसान रहता है, इसलिए जरूरी नहीं हैं कि हम वही चुनें। मेरे भीतर लगातार बोलते रहने वाली कोई एक किस्सागो लड़की रहती है। पंखे के चलने की आवाज़, ट्रैफिक का शोर…जैसे ये वाइट नॉइज़ है, जिसपर हम ध्यान नहीं देते, मेंटली म्यूट कर के चलते हैं, मैं भी कहानी सुनाने वाली इस लड़की को अक्सर अनसुना कर के जी रही होती हूँ। लेकिन कभी कभी लेकिन उसका दिमाग़ एकदम ही ख़राब हो जाता है, it is chaotic…फिर वो मेरे भीतर भूचाल, सूनामी और ज्वालामुखी फटने जैसी प्राकृतिक आपदाएँ बुला लेती है…

उस रोज़ स्टारबक्स जाने का मन नहीं किया था। घर से एक घंटा दूर। बाहर बाहर की सड़कें, बिल्कुल भी शोर नहीं, ट्रैफिक नहीं…मौसम प्लीजेंट…मार्च है, बेहद सुंदर फूल खिले हुए हैं सब जगह। खास तौर से गुलाबी और बैगनी फूलों से ढके हुए पेड़…ताम झाम का क़िस्सा ये था कि कुर्ते की स्लीव थोड़ी सी बाँह पर अटकती थी और हमको लिखते हुए अक्सर हत्थे चढ़ाने की आदत है…कुर्ता पहन कर हम अक्सर लिखने तो नहीं ही जाते हैं…तो पहले fabindia में पिट-स्टॉप लिए…एक अच्छा सा कुर्ता खरीदा, मैचिंग झुमके ख़रीदे और फिर उस कैफ़े गई जहाँ कोई मुझे नहीं जानता।

आसमान में बादल की आउटलाइन सुनहली हो गई थी। शाम से वहाँ बैठ कर नॉवेल का पहला चैप्टर लिखे। सोचे, दोस्त ऐसे होने चाहिए जिनके घर बिना एडवांस नोटिस के जा सकें। जिन्हें बुलाने के लिए जिद मचायें तो वे मान जायें और आ जाएँ चुपचाप…तबीयत अच्छी-ख़राब, ऑफिस का काम, पति की किचकिच, सब छोड़छाड़ के…लेकिन ऐसा कोई है तो नहीं शहर में…फिर क्या ही करते। दिल को समझाने की कोशिश की, वही एक बात, जो इतने साल से समझा रहे हैं…कि वैराग्य भी अभ्यास से आता है। कि हम प्रैक्टिस कर के सीख जाएँगे, किसी की याद में तड़पने के बावजूद उसे बताये बिना जिया जा सकता है। कि कायनात के सामने भीख मांगने की जरूरत नहीं है। कि ये वक़्त गुज़र जाएगा और अभी जिसे एक नज़र देखने के लिए जान जा रही है, वो सामने होगा और तुम उस से दूर रह सकोगी। 

भर दोपहर और शाम कहानी लिखने के बाद किसी दोस्त की बहुत तलब लगती है। जिसे थोड़ी सी कहानी सुनायी जा सके। लेकिन बैंगलोर में मेरी कहानी किसी को समझ में तो आएगी नहीं। कि इतना इंटेंस जीना ही क्यों है…क्या समझायें, कि हमेशा ये ऑप्शन नहीं होता कि एसी के टेम्परेचर की तरह इंटेंसिटी कम ज़्यादा कर सकें…इसका कोई रिमोट नहीं होता.

साथ लाए बैग में सब कुछ था, आईपैड, मैकबुक, तीनों नोटबुक्स, सारी कलमों में फ्रेश इंक, बहुत सारे पोस्टकार्ड्स…और मन में एक गहरा दुःख। ख़त लिखने को दिल किया…वर्ड डॉक्यूमेंट खोल के पढ़ा…इस ख़त पर मेरा नाम नहीं है, सिर्फ़ डियर राइटर…कि मुझे जाने बगैर, सिर्फ़ मेरे शब्दों से मुझे जाने वाला कोई मुझे इतनी प्यारी चिट्ठी लिख सकता है। क़ायदे से तो ऐसे लोगों से कभी मिलना नहीं चाहिए…कि हम तो इतने उलझे हुए, बेसब्र, परेशान से हुए रहते हैं। हमसे मिलने का कोई फ़ायदा नहीं है। टाइमपास भी नहीं, टाइमवेस्ट। ख़त इतनी बार पढ़ चुकी थी, ये भी लगा कि कैसे लोग हैं ना दुनिया में…उन्हें तारीख़ें याद रहती हैं, उन्हें नंबर्स समझ आते हैं…उनका समय तक का हिसाब ठीक है।

एक हम हैं, जिससे कल बिछड़े हैं, लगता है पिछले जन्म में मिलेंगे और दुखता ऐसे है कि अगले जन्म उनसे मिले बिना जीवन लगभग सारा बीत जाएगा। इसी बेनामी ख़त में बहुत सुंदर शेर लिखा मिला था

दुख ऐसा चाहिए कि मुसलसल रहे मुझे
और उस के साथ साथ अनोखा भी चाहिए
इक ज़ख़्म मुझ को चाहिए मेरे मिज़ाज का
या'नी हरा भी चाहिए गहरा भी चाहिए
- जव्वाद शेख 


उसका हिसाब थोड़ा भी पक्का होता तो गिन लेती न, कितने दिन बीते…कितने साल, कितने मौसम, कितने लम्हे…सड़क के साथ चलती नदी में कितना पानी बह गया। बहुत साल पहले हम अजनबी थे, बिल्कुल झूठी बात लगती है हालाँकि। उससे पहली बार मिलने पर भी अजनबी जैसा नहीं लगा कभी। ऊँचे पेड़ों वाले एक छोटे से शहर के किनारे किनारे नदी चलती थी। नदी के किनारे किनारे सड़क। सड़क पर छोटे छोटे पत्थर थे। नदी दिखने से ज़्यादा महसूस होती थी। ऐसा लगता था, कोई नदी बह रही है कहीं।

उस दिन ज़िद पर उतर आई थी कहानियों वाली लड़की, कि इस दिल को एब्सेंस से ज़्यादा presence की लत लग रही है, ऐसे में लतखोर दिल को थूर-थकूच के समझाना जरूरी था कि किसी के होने की आदत मत डालो…किसी को आवाज़ न दो। कोई है नहीं, इस भागते शहर में जो तुम्हारे बुलाने पर आ सके। सुनोगी तो मजबूरियाँ सुनायेंगे लोग तुम्हें, बहाने नहीं। इतना आसान थोड़े होता है तुमसे मिलना। लौंग राइड पर जाने के पहले जैसे बाइकर्स राइडिंग गियर पहनते हैं, वैसे ही तो दिल को पूरी तरह सेफ्टीगियर पहना कर लाना पड़ता है तुमसे मिलने। बहुत ताम-झाम है तुमसे मिलना, ऐसे नहीं होता कि कहो, पाँच मिनट में आ जाओ घर के नीचे, चलो, चाय पीने चलेंगे। उसको काल्पनिक किरदारों से मिलने के पहले पूरा तैयार होना होता था, साड़ी झुमके, बिंदी, परफ्यूम…लेकिन ज़िद इतनी भी होती थी कि बाल न उलझें…उससे कौन मिलेगा बिना तैयारी के…कोई भी नहीं तो। जो तुमसे नहीं मिलते, उनसे मिलने को काहे परेशान होती रहती हो। जो मिलना चाहते हैं, वाक़ई, जाओ उनसे मिल आओ।

मुझे लिखने के पहले बहुत से शहर देखने होते हैं। अहमदाबाद में एक पुरानी, रानी की वाव है। स्टेप-वेल…पत्थर की सीढ़ियों वाला कुआँ। याद नहीं बाओलियों के लिए मुझे इतना प्यार कब से उमड़ा…IIMC के अपने दोस्तों के साथ जब पहली बार एक स्टेपवेल देखी थी, तब से उनका सम्मोहन मेरे भीतर रहता है। मन के भीतर गहरे, कहानियाँ ऐसे ही रहती हैं।

सुबह साढ़े छह की फ्लाइट की टिकट साढ़े चार बजे कटायी…पंद्रह बीस मिनट में बैग पैक किया…और चालीस मिनट की ड्राइव है एयरपोर्ट की, सो बीस मिनट में आए, उड़ते उड़ते…दौड़ते हुए एयरपोर्ट के गेट से अंदर पहुँचे…जब वाक़ई प्लेन बोर्ड कर गए…तो दोनों मित्रों को ह्वाट्सऐप कर दिया, कि हम बोर्ड कर रहे…आ रहे हैं तुम्हरे शहर, लेकिन तुम परेशान मत होना. आराम से लंच पर मिलते हैं. और हमको एकदम ही नहीं लगा था, वे पहुँच जाएँगे.

अराइवल्स में बाहर निकलते ही देखा उन्हें…धूप थी. भली. वे भी. भले.
हम ऐसे मिले जैसे जन्मों के बिछड़े दोस्त हों…जैसे न मिलने का हिसाब किताब हम में से किसी को समझ नहीं आता…गाड़ी में बैठे, हम अपना सामान किसी को उठाने नहीं देते, लेकिन पता नहीं कैसे ये कुछ लोग होते हैं, आई insist वाले…कि मैं जाऊँगा ही नहीं तुम ऐसे बैग उठा के चलोगी तो…दूसरी बार मिल रहे थे। तीन साल हो चुके थे। और ये दोनों मुझे सिर्फ़ मेरे लिखे के कारण जानते हैं, प्यार करते हैं।

नाम लिखने का मन है, लेकिन नाम लेने से दोस्ती को नज़र लग जाएगी, इसलिए लिख नहीं रहे।
मैं, तुम, हम…कितना मुश्किल हो जाता है कभी कभी इन तीनों के साथ किसी किस्से को ज़िंदा करना।

पुरानी सीढ़ियों से उतर कर गई तो बहुत साल बाद उस गंध को पाया जो बचपन में गाँव में कुएँ की मुंडेर पर हुआ करती थी। मेरे गांव के घर में दो कुएँ थे, एक भीतरी आँगन में…एक बाहर गोहाल में, खेत के पास…और एक बड़ा इनारा, अर्थात्, बड़ा कुआं…जहाँ से पीने का पानी लाया जाता था। भीतरी कुएँ पर नहाना, मुँह हाथ धोना, और बर्तन माँजने का काम होता था। उन दिनों बर्तन और हाथ, दोनों राख से माँजे जाते थे।

सीले हुए पानी की गंध…मिट्टी और पुरानेपन की…कहानियों की गंध। ये ख़ुशबू मेरे भीतर अंधड़ की तरह उड़ती है…

मुझे अब अकेले घूमने की आदत हो गई है। दोस्तों की आदत छूट गई है।
रानी की वाव में पाँच तल्ले नीचे उतर कर पानी है। हम तीनों आसपास देखते हुए उतर रहे हैं। नक्काशीदार बलुआ पत्थर ऊपर में देखने से भुरभुरा लगता है। स्पंज की तरह सुराख़दार भी। नीचे के तल उतरने पर पत्थर छूने में खुरदुरा, ठंढा और सीला हुआ है। हम बातें कर रहे हैं। मुझे सब कुछ मायावी लग रहा। surreal, जैसे किसी कहानी के भीतर ही हैं। ऐसी पानी वाली ठंढी जगहों पर अजीब सा हौल फील होता है, सीने में…प्राचीन किसी दुख का होना। आत्मा में कुछ गहरा दुखना। दिल डूबता है।
मैं उन्हें देखती हूँ। सोचती हूँ, कितना अच्छा होता है, शहर में एक दोस्त होना भी।
चामुंडा चलते हैं, तुम्हारे सारे दुखों का इलाज वही है। मैं सोचती हूँ, कैसी जगह होगी…लेकिन कोई इमेज नहीं बनती। हम गाड़ी में जाते हैं…खुली हुई जगह है…मैदान जैसी, कुछ पेड़ हैं…वहीं बीच में बसा हुआ है…यह छोटा सा, चामुंडा. नखलिस्तान ही है. इतवार की सुबह है, एकदम अलसायी सी…लोग टेबल पर बैठे गप्पें कर रहे हैं…कुछ कुर्सियाँ हैं, सतरंगी धागे से बने कुछ छोटे स्टूल हैं…हम तीन कुर्सियों पर बैठ गए हैं…जूते मोजे उतार दिए हैं. पैर स्टूल पर टिका दिए हैं. 

छोटी छोटे काग़ज़ के कप में चाय…छोटी वाली गोल्ड फ्लेक…जेट फ्लेम लाइटर.
मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी ऐसी किसी दोपहर को नहीं जिया है…शायद इसलिए भी कि कॉलेज के दिनों में चाय पीते नहीं थे, न पॉलिटिक्स की ख़ास समझ थी। IIMC में पढ़ते हुए जब लोग चाय पीने टपरी पर निकलते थे, हम ऑलमोस्ट कभी नहीं जाते थे, ढाबा पर जाते थे तो खाने के लिए। चाय, सिगरेट, पॉलिटिक्स, ये तीनों मेरी ज़िंदगी में नहीं थे।
चाय हमको अब भी पसंद नहीं है। जैसे लोग सोशल ड्रिंकिंग करते हैं, वैसे ही हम चाय सिर्फ़ कुछ स्पेशल लोगों के साथ पीते हैं। ये स्पेशल लोग थे। ये स्पेशल सुबह थी।

इतनी बातें हम ख़ुद के लिए लिख रहे हैं, क्यूंकि बाद में सब कुछ भूल जाते हैं हम। दिन जल्दी शुरू करो तो वक्त धीरे बीतता है। ऐसा इतवार बचपन में ही मिलता था। पापा की छुट्टी रहती थी। सुबह रेडियो पर गाने चल रहे होते थे। मम्मी खाना बना रही होती थी। हम दोनों भाई बहन घास खोद रहे होते थे, कभी आलू उखाड़ रहे होते, कभी मटर छील रहे होते। फालतू के काम। झूला झूल रहे होते, दिन दिन भर। गर्मी छुट्टी के दिन।

कितना अच्छा होता है ना, जब किसी से कुछ नहीं चाहिये होता है। फिर जो भी मिलता है, सरप्लस ही होता है। भूख लगी थी ज़ोर से…दो प्लेट वेजिटेबल सैंडविच…खीरा टमाटर प्याज़, हरी चटनी और शायद चाट मसाला. गर्म. ताज़ा. इतना अच्छा स्वाद था. एक छोटू था, फ्लास्क और चाय के कप लिए घूम रहा था…हर कुछ देर में चाय पिला जाता था। 

कितने इत्मीनान से बैठे थे। कितनी सारी बातें थीं। बातें ही बस। लगातार चाय, सिगरेट, गप्प…लूप में. पानी की बोतलें. कहीं कोई शोर नहीं। कोई संगीत नहीं। कोई ackwardness नहीं…इतना सहज…जैसे कितने पुराने दोस्त हों. जैसे हम महीने की दो तीन इतवार तो वहीं पाये जाते हैं. ऐसी जगह, ऐसे लोग…कि अचानक से उस शहर में रहने को मन करने लगे। कितना कम चाहिए एक शहर से, लेकिन इतने पार्टिक्युअलर, कि बैंगलोर में सब कुछ मिलता…एक ऐसी दोपहर, एक ऐसी टपरी, दो ऐसे दोस्त और इतनी सारी बातें नहीं मिलतीं। इतना सा ही तो चाहिए, लेकिन। यही चाहिए। कोई और कॉम्बिनेशन नहीं।

कोई सिगरेट जला के पी हो, सो याद नहीं…जली हुई सिगरेट माँग माँग के पीते रहे…ये अलग था…ये अजब था…ये भीतर की किसी आग को बुझाता था…कोई दुख पे मरहम करता था। लोग क्यों पीते हैं सिगरेट, मालूम नहीं। हम हमेशा दोस्तों के साथ सिगरेट पीते हैं। सिगरेट अपने आप में एक किरदार है। किसी एक बार की सिगरेट, किसी दूसरे बार की सिगरेट जैसी नहीं होती। किसी एक दोस्त के साथ पी हुई सिगरेट, किसी दूसरे दोस्त के साथ पी हुई सिगरेट जैसी नहीं होती। हम अपने घर में बैठे, कभी सिगरेट पी भी रहे हैं तो ऐसे किसी रोज़ को याद करते हुए ही पी रहे। इत्ती इति सी गोल्ड फ्लेक…छोटी गोल्ड फ्लेक…कड़वी गोल्ड फ्लेक…दिल को जलाती, बुझाती…चारागर।

इम्पॉसिबल था यहाँ होना…ऐसे कैसे अचानक से खिंच के चले आए ना.
उसने ख़त में दिनों की गिनती लिखी थी…आख़िरी बार मिले हुए कितने दिन हुए.

मुझे रश्क हुआ उन दोनों से…कितना आसान था उनके लिए यहाँ होना…कितना मुश्किल और कितना rare है मेरे लिए, जो कितनों को सरलता से मिलता है।

जाना जितना आसान लग रहा था। लौटना उतना ही मुश्किल था।
गाड़ी से उतर कर गले लगे…गेट की ओर लौटे…दिल नहीं भरा…लौट लौट कर जाना चाहता था दिल. ये कौन से लोग हैं जो मुझ टूटे फूटे इंसान से इतना प्यार कर सकते हैं…तो क्या शहर की बात है? Bangalore finds me difficult to love. Impossible to love.
एक बार विदा करने के बाद, वो फिर से दौड़ कर साथ आई। गेट तक। हम दो बार गेट से लौटे। मैं वहाँ खड़ी उसे दूर जाते देखती रही। जब तक वो भीड़ में गुम नहीं गई।

मन नहीं भरा। मन कभी नहीं भरेगा।
फ़्लाइट में रोते सुबकते आई। मेरा कोई मायका है नहीं। बिन माँ की लड़कियों का मायका नहीं होता। लेकिन कभी कभी ज़िंदगी हमें ऐसे लोग दे देती है, जिनके पास हम लौट सकेंगे, ऐसा भरोसा होता है। कि वे हमारा इंतज़ार करेंगे। That they can love us in our worst form. That I can take them for-granted. हमेशा माँगते हुए ज़रूरत भर को हाथ फैलाने वाले हम, किफ़ायती लोग। ज़िंदगी उदार हो कर भेजती है, दोस्त, जान से प्यारे…जो बाँहें खोलते हैं और हमें समेट लेते हैं।

दिल दुखता है। लेकिन इसलिए कि भरा-भरा है।
और कुछ भी पूरी तरह ख़राब नहीं होता। सिगरेट भले बुरी चीज़ है, लेकिन हमारे लिए मरहम है।

ज़िंदगी के सबसे सुंदर मोमेंट्स की कभी तस्वीर नहीं होती। उससे बोला, चामुंडा की एक फोटो भेज दो…उसने जो भेजी है, उसमें एक कुर्सी पर बैग है, दो खाली कुर्सियाँ हैं…टेबल पर एक सिगरेट का पैकेट है…एक कप चाय.
मैंने अपनी ज़िंदगी में इससे उदास तस्वीर नहीं देखी।

दुनिया बदल रही है। हम जाने कब मिलेंगे फिर। लेकिन इस बदलती दुनिया में, मिल लिए। ये अच्छा है।
और अच्छे से ज़्यादा, ये काफ़ी है। 

19 March, 2026

कहो, कर सकोगे, अप्रेम में इतना, मेरे लिए?



मायावी लड़की, ख़ुद से डरती थी। जिसके इश्क़ में एक आँसू रो दे, उसकी आत्मा उसी एक कतरे में क़ैद हो जाती थी…फिर वो आँसू का कतरा जहाँ जज़्ब हो, प्रेमी की रूह का एक हिस्सा वहीं ग़ुम हो जाता था…फिर वे दुनिया में भटके भटके फिरते, कि जाने क्या छूट गया है…क्यों ज़रा खाली खाली सा लगता है, सीने के बीच ज़रा सा दुखता क्यूँ है। सिगरेट के कश में जो पुरसुकून सुख था, वो घट क्यों गया है। किसने मेरी ज़िंदगी का ज़रा सा सुकून ग़ायब किया है। सब कुछ हासिल कर के भी काफ़ी क्यों नहीं लगता…क्या छूट रहा है…क्या फिसल रहा है हाथ से…

काग़ज़ में जज़्ब होता आँसू का कतरा, तो कहानी बनता, उसे पढ़ते हुए हर अधूरे व्यक्ति को लगता, किसी ने उसकी रूह पर जरा सा मरहम लगा दिया है। कहानियों में कच्ची मिट्टी होती। इससे भरे जा सकते गहरे से गहरे ज़ख़्म। दो फाँक दिल पर लगा के जरा सी कहानी की मिट्टी, टांक देती लड़की अपनी हँसी के कच्चे धागे से ज़ख़्म। माचिस लिए घूमती। उसकी नज़र में इतनी तपिश थी, सियाह आँखें, कोयले जैसी। नज़र भर देखती तो आँच लगती, ज़ख़्म की मिट्टी पर खिलते अमलतास। बारिश में झूमते, नशे में…गुनगुनाते उसका नाम…मंत्र बाँधते, कि बिजली ना गिर जाये इस पेड़ पर।
रतजगों के बाद वे आँखें भट्ठी जैसी जलती थीं…कभी कभी आँसू भाप बन जाता। आसमान से बरसता। उसके ये अनजान प्रेमी फँस जाते बहुत तेज बारिश के बाद वाले किसी ट्रैफिक जाम में…सारी गाड़ियाँ खड़ी रहतीं अपनी जगह पर। वे एक ही सड़क के दो तरफ़ होते। एक दूसरे को नहीं देख पाते एक नज़र भी।
वे अजनबी थे, लेकिन जाते हुए एक बार लौट कर आते, हाथ मिलाने को…कि यकीन हो, छुआ हुआ सच है। लड़की हँसती, सिगरेट से जला देती उनकी उँगलियाँ। कहती, ज़ख़्म का निशान देखोगे तो पक्का याद रहेगा, कि मैं सच में थी।
सच तो कुछ भी नहीं था इस हर पल बदलती, युद्धरत दुनिया में…
इश्क़ और जंग में सब जायज़ है, कहती हुई लड़की किसी बहुत तेज बारिश की रात में पूरा भीगती लेकिन बारिश में गुम नहीं होता आँसू का वो कतरा जिसमें नाम घुला हो…वो कतरा चमकता…आसमान में… 
वो अजनबी हर बार जब बिजली कड़कते हुए देखता खिड़की से बाहर तो सोचता, ये उसके नाम का अक्षर हमेशा कैसे दिखता है सेकंड के क्षणांश में आसमान में लपकती रोशनी की लकीरों में…
तेज बारिश में गीली सिगरेट आसमान की ओर उठाती लड़की और आसमान को चैलेंज करती, उस लड़के को मुझसे जरा भी प्यार नहीं है, जो मैं झूठ बोलूँ तो इस सिगरेट को जला कर दिखा…भगवान हँसते, बेवकूफ लड़की, इतना सिंपल टेस्ट…आसमान से धरती की ओर बिजली लपकती और सिर्फ़ सिगरेट का सिरा जला कर ज़मींदोज़ हो जाती…
लड़की गहरा कश लेती, हँसती…यार भगवान, तुम भी ना, ये बिजली हमारे दिल पर गिरा कर क़िस्सा तमाम कर देते, इतना क्या सोचना है तुमको…एक मेरे मर जाने से कुछ भी तो हिसाब-किताब गड़बड़ नहीं होगा दुनिया पर…भगवान जी कहते, जरा-जरा मरो तुम इश्क़ में…पूरा मत मर जाना, जितनी बेवकूफ हो, उतनी ही प्यारी भी तो हो।

***
शहर दिल्ली से बेइंतहा मुहब्बत करने के कोई सुबूत नहीं हैं मेरे पास, सिवाए इसके कि किसी रैंडम से दिन बहुत मुश्किल से पायी हुई एक ख़ाली दोपहर में लिखने बैठी हूँ, कहानी मिजाज में घुली हुई है। मॉल का गेट सामने है। लोग इर्द-गिर्द हैं। मैं किसकी याद में हूँ, मालूम भी नहीं। मुहब्बत को तो उस शहर में भी याद करते हैं, जहाँ उसके होने का कोई ठिकाना नहीं होता। शहर दिल्ली में अभी पलाश और सेमल खिले होंगे। लोधी गार्डन में बोगनविला के उस पेड़ पर झूम कर गुलाबी रंग खिला होगा। हौज खास की इमारतों के पत्थर अभी पूरी तरह धीपते नहीं हैं। शाम को वहाँ बैठा जा सकता है। जिसे एक दिन ज़िद करके हौज खास ले गई थी, कि देखो, ज़िंदगी अभी कमरे से बाहर भी है। कि देखो, शाम के रंग सुंदर हैं। कि देखो, तुम्हरे अपने पर्सनल दुख के अलावा दुनिया कितनी बड़ी है। वो, जिसने उस रोज़ कहा था, तुम्हारे साथ यहाँ आ कर पता नहीं क्यों मन करता है कि फिर से पेंट ब्रश उठाऊँ और कुछ पेंटिंग्स बनाऊँ इस जगह की…वो, जिसने तड़प के कहा था, आज तुम्हारी बहुत याद आ रही है। आज आ जाओ बस, फिर किसी रोज़ नहीं आना। और मैं सिर्फ़ इसलिए नहीं गई थी, कि दो दिन ही लगते हैं दुखती हुई आदत के लिए। किसी से एक दिन मिलना हमेशा anomaly होता है, दिल कभी इस बात का यकीन नहीं करता कि उससे मिल कर जो महसूस हुआ था, वो सच का रूह में धँसा हुआ था। दिल कहता रहता है, एक्सेप्शन था वह, उतनी तेज धड़कना, वो ख़ुशी का फूल जो खिलता था, मुस्कुराता था, एक रोज़ का फूल था…उस पर भरोसा मत करो, वो गलती से बेमौसम खिला था। अभी वसंत आने में एक जन्म का फ़ासला है। वो लड़की नहीं थी, भरम थी। उससे दो बार मिल लोगे, लगातार, तो रूह में ज़ख़्म की तरह दर्ज हो जाएगी। फिर चुभेगी हर रोज़, एक तीसरी बार की मुलाकात की ज़िद लिए। कि स्पेस में भी ग्राफ प्लॉट करने के लिए दो वेल्यूज़ चाहिए होते हैं, एक्स एक्सिस के अलग, वाय एक्सिस के अलग। समय और स्थान। दो बार मिलने से यकीन हो जाता है कि किसी एक जगह पर, किसी एक वक्त में वो सचमुच थी। मरीचिका के पीछे क्यों भागना यायावर। सब कुछ भरम था उसका, किसी पुराने खंडहर में आती खुशबू हमेशा किसी प्रेत की होती है। किसी अधूरी इच्छा की…इन प्रेतों को इग्नोर करना ही सबसे अच्छा उपाय होता है। जैसे ही इनके होने का तुमपर असर पड़ने लगेगा, तुम्हें मालूम भी नहीं चलेगा और तुम्हारी घड़ी की सुइयाँ उलटी दिशा में घूमने लगेंगी। तुम गुज़रा हुआ सारा वक़्त लौटा लेना चाहोगे सिर्फ़ उस एक लड़की के साथ एक शाम, एक दोपहर, एक मौसम पहली बार जीने के लिए। तुम अपना जिया हुआ सब कुछ इरेज कर दोगे उसके लिए। वो जो है भी नहीं, जो कभी नहीं होगी तुम्हारे आसपास। उसने अनाधिकार अपनी साड़ी का आँचल तुम्हारी ओर बढ़ा दिया था कि इसमें धीपा हुआ, भीगा हुआ चेहरा पोंछ लो। वो अपनी साड़ी के आँचल में गाँठ बाँध लेती तुम्हारी ख़ुशबू…फिर तुम्हारी कलाइयों से कपास की गंध उठती और तुम सिगरेट पीते हुए अपनी कलाइयाँ जला लेते लेकिन उसके गीले बालों से उड़ती गंध तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ती। 

बरिस्ता ने कॉफ़ी टेबल पर ला कर रख दी, हम दिल्ली में थे, या ख़्वाब के किसी शहर में, अनायास ज़बान से शुक्रिया कहा, और आँख से आँसू उसी समय छलक गए। ऐसे कैफ़े में बैठ बिना मतलब एकदम अचानक आँसू से रो देने की वजह कोई माँग ले, तो क्या ही कह सकेंगे हम। कि लोधी गार्डन में सेमल के पेड़ों का वो छोटा सा जंगल क्या अब भी खिल के आसमान और ज़मीन दोनों को गहरा लाल रंगता है? कि शुक्रिया कहना दुखता है? कि कॉफ़ी कलेजा जलाती है? कि हम कुछ भी कर लें, इस तन्हाई के ख़िलाफ़ कोई मुकदमा जीत नहीं सकेंगे। कि इतने साल में भी आदत क्यों नहीं पड़ती। कहते तो हैं ना, कि “कफ़स भी हो तो बन जाता है घर, आहिस्ता आहिस्ता”, लेकिन किसी औरत ने क्यों नहीं लिखा कि घर हो जाता है कफ़स आहिस्ता आहिस्ता? कि भाग जाने के सपने में गाड़ी उलट जाती है, बस खाई में गिर जाती है। कि बारिश में भीगते हुए दोस्त की याद आती है तो इतना ही कह पाते हैं, वॉइस नोट भेज दिया कर, तेरी याद आती है। ग़ज़ब ज़िद में दुखती है तन्हाई।
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मुझे कोई बहुत अच्छा लगता है तो उससे सिंपल सवाल पूछती हूँ, तुम्हारा सबसे पसंदीदा रंग कौन सा है…पता नहीं क्यों। शायद उस रंग को उसकी नज़र से देखना होता है। शायद उसकी नज़र से दुनिया देखनी होती है। मेरे पापा का सबसे फ़ेवरिट रंग हरा था। मैंने जब अपनी मर्जी की कलमें खरीदनी शुरू की थीं, तो मेरा सबसे पसंदीदा रंग हरा था। मेरे पास हमेशा एक हरे रंग का पायलट पेन जरूर रहता था। कुछ हादसे आपको कैसे बदल देते हैं ना, ज़िंदगी से कोई एक रंग चुरा लेते हैं। आप कह भी नहीं सकते, ऑलमोस्ट किसी से भी…कि आपको हरे रंग से डर लगता है।
धूसर रंग पसंद था उसे…मिट्टी के सारे रंग। मैंने कई बार ख़ुद को ऑफ वाइट या beige रंग की साड़ी में लपेटते हुए सोचा, वो मुझे देखता तो क्या कहता…क्या वो कहता कि मेरी पसंद के रंग की साड़ी में अच्छी लग रही हो। क्या उसे मालूम होता कि मैंने जो बस, ऐसे ही, लाइट कन्वर्सेशन जैसा सवाल किया है, उसके इर्द-गिर्द मेरी वार्ड-ड्रोब बन रही है? क्रीम पैंट और ब्लैक शर्ट का मेरा सबसे फ़ेवरिट कॉम्बिनेशन सिर्फ़ ब्लैक ऑन ब्लैक से हराया जा सकता है। यार, ब्लैक पहन कर मेरी जान लेने आते हो तो पहले वार्न कर दिया करो, हम दिल का जिरहबख़्तर पहन कर मिलेंगे तुमसे।

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मेरे दिमाग़ में फालतू चीज़ें सेव्ड रहती हैं। शहर के स्पीडब्रेकर का नक्शा है। और मेरी ज़िंदगी की जिन चीज़ों को तुमने छुआ है, उनका भी…चाहे तुमने किसी कॉफ़ी कप से एक घूँट लिया हो, किसी ग्लास या बॉटल से मुँह लगा कर पानी पिया हो…किसी कॉफ़ी शॉप में लकड़ी के स्टिरर से चीनी मिलायी हो…मैं क्या करूँ कि तुम्हारी छुई हर चीज़ को उठा कर दिल के म्यूजियम में स्टोर करती गई हूँ।

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तुम इक रोज़ भूल जाओ कि मैं कॉफ़ी में चीनी नहीं पीती, भगवान कसम, उसी रोज़ तुमको एकदम से भूल जाऊँगी। लेकिन इसके लिए किसी कॉफ़ी शॉप में मिलो तो सही…मेरे लिए अमेरिकानो ऑर्डर करो और उसमें अपनी कॉफ़ी की तरह, दो चम्मच चीनी डाल दो…
सिंपल है ना…कहो, कर सकोगे, अप्रेम में इतना, मेरे लिए?

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