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24 March, 2026

छोटी गोल्ड फ्लेक, दिल पर नन्हे लेकिन मज़बूत टांके लगाने के लिए।

जल्दी ठीक हो जाने के लिए, हर बड़े ज़ख़्म को सिलना पड़ता है। छोटी गोल्ड फ्लेक चाक हुए कलेजे को सिलती है। अगर गहरा ज़ख़्म देख कर तुम्हारे हाथ थरथरायें न तो। ये मत कहो, कि छोटी गोल्ड-फ्लेक ही क्यूँ, कि फिर हम कहेंगे, ठीक होने की इतनी भी जल्दी किसको है, फिर तुम क्यूँ भेज देना चाहते हो ऐसे दुखते कलेजे वाली लड़की को ख़ुद से इतना ज़्यादा दूर…बकवास मत करो, कि एक फ्लाइट की दूरी को दूर थोड़े कहते हैं, पास ही कहते हैं…जब मन हुआ, उड़ कर आ जाना। 

ये चारागर है जिसके पास चुप्पी भी है, बातें भी…कहो, किससे ठीक होना है तुम्हें…या कि गोली देना हो तो वो भी है, गोली खानी हो, तो सो भी है…वन स्टॉप सॉल्यूशन। मर्ज़ अच्छा लगने लगे, इतना अच्छा चारागर।

इस सिगरेट की छोटी साइज पर नहीं जाओ, कि इस ऑपरेशन में ज़्यादा देर लगेगी…मेरे पास वक्त ही वक्त है। देर तक पियेंगे, ढेर सारी, छोटी छोटी गोल्ड-फ्लेक…जब तक कि तुम्हारा कलेजा इतना जलने लगे कि भूल जाओ, किस ज़ख़्म की सिलाई करने बैठे थे। कैसा गर्म मौसम था, तसल्लीबख़्श। स्कूल में जब गर्मी छुट्टी होती थी, करने को कुछ नहीं होता था। नानीघर में गलियों में धूल फाँकते रहते थे या अमरूद के पेड़ पर लटके कौन सा अमरूद कब पकेगा का हिसाब लगाते रहते। जरूरी काम होते थे कि माँझे का धागा बनाने के लिए बल्ब या ट्यूबलाइट मिल जाये, तो कचरे में भी ढूँढने जाते थे कभी कभी। ग़ज़ब डेयरिंग हुआ करते थे उन दिनों। ये गर्मी वैसी ही थी। ये दिल वैसा ही होना चाह रहा था, तुम लोगों के साथ।

हम जो कि मग्गे में कॉफ़ी पीते हैं। तुम्हें मालूम, कमसेकम 350ml तो होनी ही चाहिए। छोटी कप में पीने में मजा नहीं आता। कुल्हड़ वाली चाय भी पीने जाते हैं तो लार्ज या मीडियम। यहाँ ये इत्ता छोटा छोटा काग़ज़ के कप में चाय, जैसे टेस्टिंग कराते हैं, वैसा ही…लेकिन जाते साथ थोड़े समझ आ जाता, कि एक ही बार में मग्गे भर चाय क्यों नहीं पी रहे। ये इत्मीनान की जगह थी। दोहराव की…बचपन में लिखना सीखते हैं तो बार बार एक ही शब्द लिखते हैं। खूब जोर से पेंसिल गड़ा कर नोटबुक में। डेस्क की लकड़ी में डिवाइडर से खुरच खुरच कर…याद करने वाली चीज़ को दोहराव चाहिए होता है, हमेशा।

अपने। तुम मेरे अपने लोग थे। मेरे अपने।

मैंने तुम्हें for-granted लिया। मैंने तुम्हें परेशान होने दिया, अपने लिए। कि ठीक है, आओ तुम भी सुबह सुबह उठ के एयरपोर्ट। ऐसा एक इतवार हो सकता है कि नींद से चोरी करें घंटे-घंटे भर। कि बिना किसी मुद्दे के बात करेंगे हम। कि उलझ जाएँगे किसी एक ही बिंदु पर और तुम झेल लोगे, एक रोज़, थोड़ी देर को…इतना साधिकार कहेंगे, अनाधिकार हो, तो भी सही।

मेरे भीतर दो तरह की कहानियाँ रहती हैं। एक जो फर्स्ट पर्सन में लिखी जाए और दूसरी जो थर्ड पर्सन में लिखी जाए। दोनों कहानियाँ अलग अलग तरह की होती हैं। सच वाली कहानियाँ थर्ड पर्सन में लिखना आसान रहता है और पूरी काल्पनिक कहानी फर्स्ट पर्सन में…लेकिन आसान रहता है, इसलिए जरूरी नहीं हैं कि हम वही चुनें। मेरे भीतर लगातार बोलते रहने वाली कोई एक किस्सागो लड़की रहती है। पंखे के चलने की आवाज़, ट्रैफिक का शोर…जैसे ये वाइट नॉइज़ है, जिसपर हम ध्यान नहीं देते, मेंटली म्यूट कर के चलते हैं, मैं भी कहानी सुनाने वाली इस लड़की को अक्सर अनसुना कर के जी रही होती हूँ। लेकिन कभी कभी लेकिन उसका दिमाग़ एकदम ही ख़राब हो जाता है, it is chaotic…फिर वो मेरे भीतर भूचाल, सूनामी और ज्वालामुखी फटने जैसी प्राकृतिक आपदाएँ बुला लेती है…

उस रोज़ स्टारबक्स जाने का मन नहीं किया था। घर से एक घंटा दूर। बाहर बाहर की सड़कें, बिल्कुल भी शोर नहीं, ट्रैफिक नहीं…मौसम प्लीजेंट…मार्च है, बेहद सुंदर फूल खिले हुए हैं सब जगह। खास तौर से गुलाबी और बैगनी फूलों से ढके हुए पेड़…ताम झाम का क़िस्सा ये था कि कुर्ते की स्लीव थोड़ी सी बाँह पर अटकती थी और हमको लिखते हुए अक्सर हत्थे चढ़ाने की आदत है…कुर्ता पहन कर हम अक्सर लिखने तो नहीं ही जाते हैं…तो पहले fabindia में पिट-स्टॉप लिए…एक अच्छा सा कुर्ता खरीदा, मैचिंग झुमके ख़रीदे और फिर उस कैफ़े गई जहाँ कोई मुझे नहीं जानता।

आसमान में बादल की आउटलाइन सुनहली हो गई थी। शाम से वहाँ बैठ कर नॉवेल का पहला चैप्टर लिखे। सोचे, दोस्त ऐसे होने चाहिए जिनके घर बिना एडवांस नोटिस के जा सकें। जिन्हें बुलाने के लिए जिद मचायें तो वे मान जायें और आ जाएँ चुपचाप…तबीयत अच्छी-ख़राब, ऑफिस का काम, पति की किचकिच, सब छोड़छाड़ के…लेकिन ऐसा कोई है तो नहीं शहर में…फिर क्या ही करते। दिल को समझाने की कोशिश की, वही एक बात, जो इतने साल से समझा रहे हैं…कि वैराग्य भी अभ्यास से आता है। कि हम प्रैक्टिस कर के सीख जाएँगे, किसी की याद में तड़पने के बावजूद उसे बताये बिना जिया जा सकता है। कि कायनात के सामने भीख मांगने की जरूरत नहीं है। कि ये वक़्त गुज़र जाएगा और अभी जिसे एक नज़र देखने के लिए जान जा रही है, वो सामने होगा और तुम उस से दूर रह सकोगी। 

भर दोपहर और शाम कहानी लिखने के बाद किसी दोस्त की बहुत तलब लगती है। जिसे थोड़ी सी कहानी सुनायी जा सके। लेकिन बैंगलोर में मेरी कहानी किसी को समझ में तो आएगी नहीं। कि इतना इंटेंस जीना ही क्यों है…क्या समझायें, कि हमेशा ये ऑप्शन नहीं होता कि एसी के टेम्परेचर की तरह इंटेंसिटी कम ज़्यादा कर सकें…इसका कोई रिमोट नहीं होता.

साथ लाए बैग में सब कुछ था, आईपैड, मैकबुक, तीनों नोटबुक्स, सारी कलमों में फ्रेश इंक, बहुत सारे पोस्टकार्ड्स…और मन में एक गहरा दुःख। ख़त लिखने को दिल किया…वर्ड डॉक्यूमेंट खोल के पढ़ा…इस ख़त पर मेरा नाम नहीं है, सिर्फ़ डियर राइटर…कि मुझे जाने बगैर, सिर्फ़ मेरे शब्दों से मुझे जाने वाला कोई मुझे इतनी प्यारी चिट्ठी लिख सकता है। क़ायदे से तो ऐसे लोगों से कभी मिलना नहीं चाहिए…कि हम तो इतने उलझे हुए, बेसब्र, परेशान से हुए रहते हैं। हमसे मिलने का कोई फ़ायदा नहीं है। टाइमपास भी नहीं, टाइमवेस्ट। ख़त इतनी बार पढ़ चुकी थी, ये भी लगा कि कैसे लोग हैं ना दुनिया में…उन्हें तारीख़ें याद रहती हैं, उन्हें नंबर्स समझ आते हैं…उनका समय तक का हिसाब ठीक है।

एक हम हैं, जिससे कल बिछड़े हैं, लगता है पिछले जन्म में मिलेंगे और दुखता ऐसे है कि अगले जन्म उनसे मिले बिना जीवन लगभग सारा बीत जाएगा। इसी बेनामी ख़त में बहुत सुंदर शेर लिखा मिला था

दुख ऐसा चाहिए कि मुसलसल रहे मुझे
और उस के साथ साथ अनोखा भी चाहिए
इक ज़ख़्म मुझ को चाहिए मेरे मिज़ाज का
या'नी हरा भी चाहिए गहरा भी चाहिए
- जव्वाद शेख 


उसका हिसाब थोड़ा भी पक्का होता तो गिन लेती न, कितने दिन बीते…कितने साल, कितने मौसम, कितने लम्हे…सड़क के साथ चलती नदी में कितना पानी बह गया। बहुत साल पहले हम अजनबी थे, बिल्कुल झूठी बात लगती है हालाँकि। उससे पहली बार मिलने पर भी अजनबी जैसा नहीं लगा कभी। ऊँचे पेड़ों वाले एक छोटे से शहर के किनारे किनारे नदी चलती थी। नदी के किनारे किनारे सड़क। सड़क पर छोटे छोटे पत्थर थे। नदी दिखने से ज़्यादा महसूस होती थी। ऐसा लगता था, कोई नदी बह रही है कहीं।

उस दिन ज़िद पर उतर आई थी कहानियों वाली लड़की, कि इस दिल को एब्सेंस से ज़्यादा presence की लत लग रही है, ऐसे में लतखोर दिल को थूर-थकूच के समझाना जरूरी था कि किसी के होने की आदत मत डालो…किसी को आवाज़ न दो। कोई है नहीं, इस भागते शहर में जो तुम्हारे बुलाने पर आ सके। सुनोगी तो मजबूरियाँ सुनायेंगे लोग तुम्हें, बहाने नहीं। इतना आसान थोड़े होता है तुमसे मिलना। लौंग राइड पर जाने के पहले जैसे बाइकर्स राइडिंग गियर पहनते हैं, वैसे ही तो दिल को पूरी तरह सेफ्टीगियर पहना कर लाना पड़ता है तुमसे मिलने। बहुत ताम-झाम है तुमसे मिलना, ऐसे नहीं होता कि कहो, पाँच मिनट में आ जाओ घर के नीचे, चलो, चाय पीने चलेंगे। उसको काल्पनिक किरदारों से मिलने के पहले पूरा तैयार होना होता था, साड़ी झुमके, बिंदी, परफ्यूम…लेकिन ज़िद इतनी भी होती थी कि बाल न उलझें…उससे कौन मिलेगा बिना तैयारी के…कोई भी नहीं तो। जो तुमसे नहीं मिलते, उनसे मिलने को काहे परेशान होती रहती हो। जो मिलना चाहते हैं, वाक़ई, जाओ उनसे मिल आओ।

मुझे लिखने के पहले बहुत से शहर देखने होते हैं। अहमदाबाद में एक पुरानी, रानी की वाव है। स्टेप-वेल…पत्थर की सीढ़ियों वाला कुआँ। याद नहीं बाओलियों के लिए मुझे इतना प्यार कब से उमड़ा…IIMC के अपने दोस्तों के साथ जब पहली बार एक स्टेपवेल देखी थी, तब से उनका सम्मोहन मेरे भीतर रहता है। मन के भीतर गहरे, कहानियाँ ऐसे ही रहती हैं।

सुबह साढ़े छह की फ्लाइट की टिकट साढ़े चार बजे कटायी…पंद्रह बीस मिनट में बैग पैक किया…और चालीस मिनट की ड्राइव है एयरपोर्ट की, सो बीस मिनट में आए, उड़ते उड़ते…दौड़ते हुए एयरपोर्ट के गेट से अंदर पहुँचे…जब वाक़ई प्लेन बोर्ड कर गए…तो दोनों मित्रों को ह्वाट्सऐप कर दिया, कि हम बोर्ड कर रहे…आ रहे हैं तुम्हरे शहर, लेकिन तुम परेशान मत होना. आराम से लंच पर मिलते हैं. और हमको एकदम ही नहीं लगा था, वे पहुँच जाएँगे.

अराइवल्स में बाहर निकलते ही देखा उन्हें…धूप थी. भली. वे भी. भले.
हम ऐसे मिले जैसे जन्मों के बिछड़े दोस्त हों…जैसे न मिलने का हिसाब किताब हम में से किसी को समझ नहीं आता…गाड़ी में बैठे, हम अपना सामान किसी को उठाने नहीं देते, लेकिन पता नहीं कैसे ये कुछ लोग होते हैं, आई insist वाले…कि मैं जाऊँगा ही नहीं तुम ऐसे बैग उठा के चलोगी तो…दूसरी बार मिल रहे थे। तीन साल हो चुके थे। और ये दोनों मुझे सिर्फ़ मेरे लिखे के कारण जानते हैं, प्यार करते हैं।

नाम लिखने का मन है, लेकिन नाम लेने से दोस्ती को नज़र लग जाएगी, इसलिए लिख नहीं रहे।
मैं, तुम, हम…कितना मुश्किल हो जाता है कभी कभी इन तीनों के साथ किसी किस्से को ज़िंदा करना।

पुरानी सीढ़ियों से उतर कर गई तो बहुत साल बाद उस गंध को पाया जो बचपन में गाँव में कुएँ की मुंडेर पर हुआ करती थी। मेरे गांव के घर में दो कुएँ थे, एक भीतरी आँगन में…एक बाहर गोहाल में, खेत के पास…और एक बड़ा इनारा, अर्थात्, बड़ा कुआं…जहाँ से पीने का पानी लाया जाता था। भीतरी कुएँ पर नहाना, मुँह हाथ धोना, और बर्तन माँजने का काम होता था। उन दिनों बर्तन और हाथ, दोनों राख से माँजे जाते थे।

सीले हुए पानी की गंध…मिट्टी और पुरानेपन की…कहानियों की गंध। ये ख़ुशबू मेरे भीतर अंधड़ की तरह उड़ती है…

मुझे अब अकेले घूमने की आदत हो गई है। दोस्तों की आदत छूट गई है।
रानी की वाव में पाँच तल्ले नीचे उतर कर पानी है। हम तीनों आसपास देखते हुए उतर रहे हैं। नक्काशीदार बलुआ पत्थर ऊपर में देखने से भुरभुरा लगता है। स्पंज की तरह सुराख़दार भी। नीचे के तल उतरने पर पत्थर छूने में खुरदुरा, ठंढा और सीला हुआ है। हम बातें कर रहे हैं। मुझे सब कुछ मायावी लग रहा। surreal, जैसे किसी कहानी के भीतर ही हैं। ऐसी पानी वाली ठंढी जगहों पर अजीब सा हौल फील होता है, सीने में…प्राचीन किसी दुख का होना। आत्मा में कुछ गहरा दुखना। दिल डूबता है।
मैं उन्हें देखती हूँ। सोचती हूँ, कितना अच्छा होता है, शहर में एक दोस्त होना भी।
चामुंडा चलते हैं, तुम्हारे सारे दुखों का इलाज वही है। मैं सोचती हूँ, कैसी जगह होगी…लेकिन कोई इमेज नहीं बनती। हम गाड़ी में जाते हैं…खुली हुई जगह है…मैदान जैसी, कुछ पेड़ हैं…वहीं बीच में बसा हुआ है…यह छोटा सा, चामुंडा. नखलिस्तान ही है. इतवार की सुबह है, एकदम अलसायी सी…लोग टेबल पर बैठे गप्पें कर रहे हैं…कुछ कुर्सियाँ हैं, सतरंगी धागे से बने कुछ छोटे स्टूल हैं…हम तीन कुर्सियों पर बैठ गए हैं…जूते मोजे उतार दिए हैं. पैर स्टूल पर टिका दिए हैं. 

छोटी छोटे काग़ज़ के कप में चाय…छोटी वाली गोल्ड फ्लेक…जेट फ्लेम लाइटर.
मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी ऐसी किसी दोपहर को नहीं जिया है…शायद इसलिए भी कि कॉलेज के दिनों में चाय पीते नहीं थे, न पॉलिटिक्स की ख़ास समझ थी। IIMC में पढ़ते हुए जब लोग चाय पीने टपरी पर निकलते थे, हम ऑलमोस्ट कभी नहीं जाते थे, ढाबा पर जाते थे तो खाने के लिए। चाय, सिगरेट, पॉलिटिक्स, ये तीनों मेरी ज़िंदगी में नहीं थे।
चाय हमको अब भी पसंद नहीं है। जैसे लोग सोशल ड्रिंकिंग करते हैं, वैसे ही हम चाय सिर्फ़ कुछ स्पेशल लोगों के साथ पीते हैं। ये स्पेशल लोग थे। ये स्पेशल सुबह थी।

इतनी बातें हम ख़ुद के लिए लिख रहे हैं, क्यूंकि बाद में सब कुछ भूल जाते हैं हम। दिन जल्दी शुरू करो तो वक्त धीरे बीतता है। ऐसा इतवार बचपन में ही मिलता था। पापा की छुट्टी रहती थी। सुबह रेडियो पर गाने चल रहे होते थे। मम्मी खाना बना रही होती थी। हम दोनों भाई बहन घास खोद रहे होते थे, कभी आलू उखाड़ रहे होते, कभी मटर छील रहे होते। फालतू के काम। झूला झूल रहे होते, दिन दिन भर। गर्मी छुट्टी के दिन।

कितना अच्छा होता है ना, जब किसी से कुछ नहीं चाहिये होता है। फिर जो भी मिलता है, सरप्लस ही होता है। भूख लगी थी ज़ोर से…दो प्लेट वेजिटेबल सैंडविच…खीरा टमाटर प्याज़, हरी चटनी और शायद चाट मसाला. गर्म. ताज़ा. इतना अच्छा स्वाद था. एक छोटू था, फ्लास्क और चाय के कप लिए घूम रहा था…हर कुछ देर में चाय पिला जाता था। 

कितने इत्मीनान से बैठे थे। कितनी सारी बातें थीं। बातें ही बस। लगातार चाय, सिगरेट, गप्प…लूप में. पानी की बोतलें. कहीं कोई शोर नहीं। कोई संगीत नहीं। कोई ackwardness नहीं…इतना सहज…जैसे कितने पुराने दोस्त हों. जैसे हम महीने की दो तीन इतवार तो वहीं पाये जाते हैं. ऐसी जगह, ऐसे लोग…कि अचानक से उस शहर में रहने को मन करने लगे। कितना कम चाहिए एक शहर से, लेकिन इतने पार्टिक्युअलर, कि बैंगलोर में सब कुछ मिलता…एक ऐसी दोपहर, एक ऐसी टपरी, दो ऐसे दोस्त और इतनी सारी बातें नहीं मिलतीं। इतना सा ही तो चाहिए, लेकिन। यही चाहिए। कोई और कॉम्बिनेशन नहीं।

कोई सिगरेट जला के पी हो, सो याद नहीं…जली हुई सिगरेट माँग माँग के पीते रहे…ये अलग था…ये अजब था…ये भीतर की किसी आग को बुझाता था…कोई दुख पे मरहम करता था। लोग क्यों पीते हैं सिगरेट, मालूम नहीं। हम हमेशा दोस्तों के साथ सिगरेट पीते हैं। सिगरेट अपने आप में एक किरदार है। किसी एक बार की सिगरेट, किसी दूसरे बार की सिगरेट जैसी नहीं होती। किसी एक दोस्त के साथ पी हुई सिगरेट, किसी दूसरे दोस्त के साथ पी हुई सिगरेट जैसी नहीं होती। हम अपने घर में बैठे, कभी सिगरेट पी भी रहे हैं तो ऐसे किसी रोज़ को याद करते हुए ही पी रहे। इत्ती इति सी गोल्ड फ्लेक…छोटी गोल्ड फ्लेक…कड़वी गोल्ड फ्लेक…दिल को जलाती, बुझाती…चारागर।

इम्पॉसिबल था यहाँ होना…ऐसे कैसे अचानक से खिंच के चले आए ना.
उसने ख़त में दिनों की गिनती लिखी थी…आख़िरी बार मिले हुए कितने दिन हुए.

मुझे रश्क हुआ उन दोनों से…कितना आसान था उनके लिए यहाँ होना…कितना मुश्किल और कितना rare है मेरे लिए, जो कितनों को सरलता से मिलता है।

जाना जितना आसान लग रहा था। लौटना उतना ही मुश्किल था।
गाड़ी से उतर कर गले लगे…गेट की ओर लौटे…दिल नहीं भरा…लौट लौट कर जाना चाहता था दिल. ये कौन से लोग हैं जो मुझ टूटे फूटे इंसान से इतना प्यार कर सकते हैं…तो क्या शहर की बात है? Bangalore finds me difficult to love. Impossible to love.
एक बार विदा करने के बाद, वो फिर से दौड़ कर साथ आई। गेट तक। हम दो बार गेट से लौटे। मैं वहाँ खड़ी उसे दूर जाते देखती रही। जब तक वो भीड़ में गुम नहीं गई।

मन नहीं भरा। मन कभी नहीं भरेगा।
फ़्लाइट में रोते सुबकते आई। मेरा कोई मायका है नहीं। बिन माँ की लड़कियों का मायका नहीं होता। लेकिन कभी कभी ज़िंदगी हमें ऐसे लोग दे देती है, जिनके पास हम लौट सकेंगे, ऐसा भरोसा होता है। कि वे हमारा इंतज़ार करेंगे। That they can love us in our worst form. That I can take them for-granted. हमेशा माँगते हुए ज़रूरत भर को हाथ फैलाने वाले हम, किफ़ायती लोग। ज़िंदगी उदार हो कर भेजती है, दोस्त, जान से प्यारे…जो बाँहें खोलते हैं और हमें समेट लेते हैं।

दिल दुखता है। लेकिन इसलिए कि भरा-भरा है।
और कुछ भी पूरी तरह ख़राब नहीं होता। सिगरेट भले बुरी चीज़ है, लेकिन हमारे लिए मरहम है।

ज़िंदगी के सबसे सुंदर मोमेंट्स की कभी तस्वीर नहीं होती। उससे बोला, चामुंडा की एक फोटो भेज दो…उसने जो भेजी है, उसमें एक कुर्सी पर बैग है, दो खाली कुर्सियाँ हैं…टेबल पर एक सिगरेट का पैकेट है…एक कप चाय.
मैंने अपनी ज़िंदगी में इससे उदास तस्वीर नहीं देखी।

दुनिया बदल रही है। हम जाने कब मिलेंगे फिर। लेकिन इस बदलती दुनिया में, मिल लिए। ये अच्छा है।
और अच्छे से ज़्यादा, ये काफ़ी है। 

09 December, 2023

अधूरी कहानियों के सल्तनत की शहज़ादी

 


उम्र का तक़ाज़ा है। हम बहुत कुछ भूलने लगे हैं। चीज़ें कहीं रख कर भूल जाना। शहरों में अकेले जाती और अकेले लौटती हूँ तो कोई कमरे से निकलते हुए नहीं कहता, ठीक से देख लो, कुछ छूट तो नहीं गया। हम उन शहरों में छूटे हुए रह जाते हैं। कभी रातें छूट जाती हैं, कभी सुबह। कभी कोई मौसम रह जाता है बिना ठीक से देखे हुए। हम उस अनदेखे मौसम को अपने कपड़ों में टटोलते रहते हैंकि सिल्क की इस साड़ी को तो उस शहर की आख़िरी डिनर पार्टी में पहनना था। कैसे भूल गयी मैं। बहुत साल पहले एक कहानी पढ़ी थी, जिसमें दो लोग एक साथ चल रहे थे। ठंढ के दिन थे इसलिए लड़के ने लड़की का हाथ पकड़ पर अपनी कोट की जेब में रख लिया। वह लड़की जब उसके जीवन से जा चुकी थी, तब भी उसके उस कोट में उसे लड़की का हाथ महसूस होता था। 

मैंने उसे पहली बार देखा तो उसने काला कोट पहना हुआ था। उसके इर्द गिर्द वसंत की ख़ुशबू थी। आसमान में मेरी पसंद के फूल खिले थे। उसके पैरों तले घास का ग़लीचा था। मैं उसे दुनिया से छुपा कर देखना चाहती थी, इसलिए मैंने हम दोनों के इर्द गिर्द धुएँ का एक पर्दा खींच दिया। मैं भूल गयी हूँ कि मैं उससे पहली बार कितने साल पहले मिली थी। कि पहली बार मिलते हुए ऐसा लगा कि मैं उसके इर्द गिर्द हमेशा से रही हूँ। उस छूटी हुयी सिगरेट की तरह जो बेहद ख़राब आदत थी। 


उसकी सिफ़ारिश करते हुए उसके एक परिचित ने कहा कि वो अच्छा आदमी है। उसका परिचित शायद अच्छा आदमी रहा होगा। अच्छे आदमी दूसरे अच्छे आदमियों की यह कह कर तारीफ़ करते हैं कि वो अच्छा आदमी है। ख़राब लेखक, ख़ूबसूरत महबूब को दिल और क़िस्सों में बसाए रखते हैं, उसके अच्छे या ख़राब आदमी होने से बेपरवाह। 


***


यह शहर बेहद ठंढा है। इसकी तासीर भी और इसका मौसम भी। 

आजकल तो टेम्प्रेचर-कंट्रोल्ड स्विमिंग पूल का पानी भी ठंढा रहता है।


मुझे फ़ुरसत मिली तो मैंने धुएँ से रचे हाथ से सिगरेट छीन के पीने वाले दोस्त। कि उँगलियों में उलझ जाए उनकी बदमाशी, आँख में ठहर जाए उनकी मुस्कान। हम सोचते रह जाएँ कि ख़ूबसूरती का गोदाम तो आज ही शाम को हमने लूटा है, तो फिर आज इस ख़ुराफ़ाती के चेहरे पर इतनी रौशनी कैसे है। हम मजाज़ का शेर भूलना चाहते हैं सड़क क्रॉस करते हुए ही, “हुस्न को शर्मसार करना ही इश्क़ का इंतिक़ाम होता है।” 


***


वैसे तो आज क़ायदे से इक आध छोटा मोटा गुनाह कर लेना चाहिए।

क्या है आज मेरे उस नालायक दोस्त का जन्मदिन है, जो भगवान क़सम, इतना भला है कि हरगिज़ कभी नरक नहीं जाएगा। उसके बिना तो हमारा मन लगेगा ही नहीं। तो ऐसा करते हैं, आज कुछ गुनाह कर लेते हैं, और उसके बही-खाते में लिखवा देते हैं, बतौर तोहफ़ाकि तुमसे तो होगा नहीं। दोस्त आख़िर होते किस लिए हैं। इतना सारा अधूरा इश्क़ कर कर के छोड़े हो इस जन्म, सब को मुकम्मल करने के लिए मल्टिपल जन्म तो लेना ही होगा तुमको। 


***


अधूरी कहानियों की एक सल्तनत थी। वहाँ की एक शहज़ादी थी। जिसके इर्द गिर्द कच्ची कहानियों के मौसम रहते थे। उसकी ज़ुबान पर टूटी-फूटी शायरी के मिसरे भटकते रहते थे। कभी कुछ पूरा नहीं करती। उसका दिल भी क़रीने से ठीक ठीक पूरा टूटा नहीं था। 


वहाँ कुछ क़िस्से लूप में चलते थे, कुछ गाने लूप में बजते थे और कुछ लोगों को उमर भर उन्हीं लोगों से बार बार प्यार होता रहता था, जिनसे एक बार भी नहीं होना चाहिए था। 


07 March, 2023

अपनी कहानी कोई नहीं

मैं किस किताब में  जी रही हूँ? रात से रो रो कर आँखें सुजा ली हैं। 

सुबह उठी तो मेसेज देखा society ग़्रुप पे, कि होली वीकेंड में मनाएँगे। 

हम अपने साथ क्या ला सकते हैं किसी जगह से? मैं कहाँ ला पायी हूँ दिल्ली से पलाश का एक फूल, या कि उँगलियों में उसकी ख़ुशबू या कि उसका रंग ही। यहाँ होली सहूलियत का त्योहार है, वहाँ मन का। मुहब्बत का। शरारत का। उस शहर में कहा, तुम्हें थोड़ा रंग लगा दूँ, तो शहर कहता है, मैं तुम्हारे ही रंग में रंगा हूँ जानां, मुझ पर अब और क्या रंग लगाओगी। 


इश्क़ रंग। 


पिछली किताब के बाद मेरे पास कुछ भी था। कुछ भी नहीं। जिंदगी के सारे हसीन क़िस्से, सारे हौलनाक हादसे, सब ख़त्म हो गए थे। पिछले चार सालों में मैंने लगभग कुछ नहीं लिखा है। कोविड के बाद जिंदगी में इतनी uncertainity हो गयी थी कि ना क़िस्से पे यक़ीन होता था, किसी से मिलने पर। चार साल कितना लम्बा अरसा होता है, ये बता नहीं सकते। इसे सिर्फ़ महसूस कर सकते हैं। कि आज सुबह से सिर्फ़ इसलिए रोना रहा है कि यक़ीन नहीं हो रहा कि इतने लम्बे इंतज़ार के बाद वाक़ई मिलते हैं लोगों से। कि गले लगते हैं। कि चूमते हैं माथा और कहते हैं उस शहर में धड़कते नन्हे दिल से, मैं हूँ, तुम्हारे लिए। मैं रहूँगी, तुम्हारे इश्क़ में हमेशा। मैं तुम्हें खोने नहीं दूँगी। मन के भीतर इतना कुछ चल रहा है कि ब्लॉग पर लिख रही हूँ। समंदर में कभी कभी सूनामी लहरें आती हैं। 


दिल्ली। 


हज़ार बार उजाड़ कर बसी है दिल्ली। हमारे दिल की तरह ही न। 

हमारे भीतर बसने लगे हैं नए अरमानों के जलते हुए मकान। कि जो कबीर की उलटबाँसी में फूँका हुआ घर होता है। चल देते हैं इश्क़ राह। 


उलझना मेरी फ़ितरत रही है। बौराए बौराए फिरते हैं। जाने क्या चाहिए होता है कि दिल्ली जा के भर आता है दिल इस तरह। कि जैसे मायके से लौटती हैं बेटियाँ बहुत सी चीजों के साथ। माँ के हाथ कि चुनी हुयी साड़ियाँ। दोस्तों के दिए हुए झुमके। सतरंगी चूड़ियाँ। बचपन की पसंद कि मिठाई। पैर रंगे, आलता लगाए। मायका, जहाँ बचपन से पले-बढ़े होते हैं। जहाँ का मंदिर, जहां के रास्ते, इमारतें। पौधे, फूल। सब आपके जाने-पहचाने होते हैं। जहाँ वे भी आपको जानते हैं जिन्हें आप नहीं जानते। आपका चेहरा देख कर वे जानते हैं कि आप किसकी बेटी हैं। 


कि हमारे शब्दों से जानते हैं हमें वे लोग भी जिन्होंने मुझे कभी नहीं देखा। हमसे वे भी प्यार करते हैं जो जाने कहाँ कहाँ तलाशते रहे हमें मेले में और छोटा सा उलाहना दे रहे कि आप मिले नहीं। जिनसे हम मिलना चाहते थे ख़ूब ख़ूब मन से, वे मिलते रहे। सिगरेट फूंकते, चाय पीते, गपशप करते, बाँहों में भरते लोग। हम काग़ज़ पर लिखते रहे छोटे छोटे संदेश, इन शहरों में भटकने में सुख हो, दुआ, मुहब्बत, love सब लिखा हमने। 


नशा।

हम कहते हैं कि हमें नीट पानी दे दो, आइस डाल के, हम उसमें ही हाई हो जाएँगे। दिल्ली में हम ऐसे ही सुरूर में रहते हैं। ज़रूरत क्या है किसी नशे की। बैंगलोर में हम पीते नहीं। दुनिया के बाक़ी शहरों में भी नहीं, ऐक्चूअली। हमको पीने का शौक़ नहीं है। पर पीते हैं तो सिंगल मॉल्ट या फिर JD लेकिन हमारे आसपास सब कुछ तरतीब से चाहिए होती है। माहौल होना चाहिए। रोशनी, म्यूज़िक। काँच के गिलास। आइस। ये क्या है कि प्लास्टिक के ग्लास में विस्की डाले और एक सिप में पूरी दुनिया डोल गयी। कि कह सकें किसी को कि ऐसे नहीं पिएँगे, जुठा के दो। कि हाथ बढ़ा के माँग लें किसी के हाथ से ग्लास। नीम अंधेरे में सिगरेट फूंकते जाने किस मुहब्बत में गाएँ। मीठा, मुहब्बत में। मीठा। 


तिलिस्म।

क्या होता है जब दो तिलिस्म मिलते हैं

वे चुप हो जाते हैं।


इश्क़ तिलिस्म में लिखा है


‘“सब लोग तुम्हारे हाथ पहचानते हैं। 

वे शायद बिसार दें तुम्हारा माथा। तुम्हारी सोना आँखें। तुम्हारे काँधे का टैटू। मगर कोई नहीं भूल सकता तुम्हारे हाथ। 

कि हम तुम्हारी कहानी के किरदार हैं।

और तुम्हारे हाथ ईश्वर के हाथ हैं।


तुम्हारा हाथ थाम कर भटकती रही शहर दिल्ली। हथेलियों में उगता रहा नक़्शा, ख़्वाहिशों के शहर  का। बनते रहे मकान कि जिनमें होती धूप, जहां पीले पर्दे होते जहाँ बालकनी से दिखता शाम का सिंदूरी सूरज। नए-पुराने महबूब याद आते तो उन यादों को कटघरे में खड़ा नहीं होना होता। 


आसान नहीं है हमसे प्यार करना। मेरे साथ उम्र काटना। उमरक़ैद होगी, पता नहीं। 

हमको कुछ पता नहीं। कुछ दिन लगेंगे प्रॉसेस करने में कि हमको हुआ क्या है। 


कोई आरी से चीर गया है वजूद के दो हिस्से। 

एक वही लड़की है, दिल्ली की दीवानी। बीस पच्चीस की। जिसका दिल कभी टूटा नहीं है। जिसकी मम्मी उसको सुबह काजल लगा के भेजी है बाहर कि पूरी दुनिया के लोग बैठे हैं उसकी सुंदर बेटी को नज़र लगाने। जिसे मुहब्बत से डर नहीं लगता। जिसे ज़माने से डर नहीं लगता। सालों बाद लौटते हैं दिल्ली, इतने खुश, इतने खुश। दिन में दस बार बोलते हैं, दोस्तों को, हम बहुत खुश हैं। 


भूलने और याद करने के बीच का शहर। 


कि इस दूसरी औरत को डर लगता है कि पहली वाली लड़की उसपर हावी हो जाए। कि वो दीवानों की तरह कहीं मर जाए। किसी सफ़र पर निकल जाए। कि उसे इस ख़ुशी कि क्रेविंग न होने लगे बहुत ज़्यादा।


 जिसकी दो जुड़वां बेटियाँ हैं तीन साल कीं। जिसका घर बेतरह बिखरा हुआ रहता है। जिसे घर का कोई काम-काज करना-करवाना नहीं आता। जो इस शहर में खुद को मोटी, भद्दी और बदसूरत समझती है। जिसके क़िस्से सुनने इस शहर में कोई नहीं आता। 


जब दो हिस्से हो जाते हैं तो कोई टूट जाता है बुरी तरह से। कैसे जीते हैं कि अपने दोनों हिस्से के साथ न्याय कर सकें। लिख भी सकें और जी भी सकें। मर जाएँ। कि इतना vulnerable होना कितना डराता है। कि हमारे मन के भीतर क्या चल रहा है, उसको हम भी ठीक-ठीक न समझ सकते हैं, न लिख सकते हैं। तो क्या जवाब दें किसी को, कि सुबह सुबह रो क्यूँ रही हो?ख़ुशी में? दुःख में?


कि हमें मरने से नहीं, तुमसे दुबारा मिले बिना मर जाने से डर लगता है। 

***


सज्जाद अली का गाया हुआ रावी, इसे लूप में सुन रहे हैं। समझ कुछ नहीं आ रहा, न गाने के बोल। न अपना मन-मिज़ाज।  


https://youtu.be/rBk5EKHggKo



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