19 March, 2026

कहो, कर सकोगे, अप्रेम में इतना, मेरे लिए?



मायावी लड़की, ख़ुद से डरती थी। जिसके इश्क़ में एक आँसू रो दे, उसकी आत्मा उसी एक कतरे में क़ैद हो जाती थी…फिर वो आँसू का कतरा जहाँ जज़्ब हो, प्रेमी की रूह का एक हिस्सा वहीं ग़ुम हो जाता था…फिर वे दुनिया में भटके भटके फिरते, कि जाने क्या छूट गया है…क्यों ज़रा खाली खाली सा लगता है, सीने के बीच ज़रा सा दुखता क्यूँ है। सिगरेट के कश में जो पुरसुकून सुख था, वो घट क्यों गया है। किसने मेरी ज़िंदगी का ज़रा सा सुकून ग़ायब किया है। सब कुछ हासिल कर के भी काफ़ी क्यों नहीं लगता…क्या छूट रहा है…क्या फिसल रहा है हाथ से…

काग़ज़ में जज़्ब होता आँसू का कतरा, तो कहानी बनता, उसे पढ़ते हुए हर अधूरे व्यक्ति को लगता, किसी ने उसकी रूह पर जरा सा मरहम लगा दिया है। कहानियों में कच्ची मिट्टी होती। इससे भरे जा सकते गहरे से गहरे ज़ख़्म। दो फाँक दिल पर लगा के जरा सी कहानी की मिट्टी, टांक देती लड़की अपनी हँसी के कच्चे धागे से ज़ख़्म। माचिस लिए घूमती। उसकी नज़र में इतनी तपिश थी, सियाह आँखें, कोयले जैसी। नज़र भर देखती तो आँच लगती, ज़ख़्म की मिट्टी पर खिलते अमलतास। बारिश में झूमते, नशे में…गुनगुनाते उसका नाम…मंत्र बाँधते, कि बिजली ना गिर जाये इस पेड़ पर।
रतजगों के बाद वे आँखें भट्ठी जैसी जलती थीं…कभी कभी आँसू भाप बन जाता। आसमान से बरसता। उसके ये अनजान प्रेमी फँस जाते बहुत तेज बारिश के बाद वाले किसी ट्रैफिक जाम में…सारी गाड़ियाँ खड़ी रहतीं अपनी जगह पर। वे एक ही सड़क के दो तरफ़ होते। एक दूसरे को नहीं देख पाते एक नज़र भी।
वे अजनबी थे, लेकिन जाते हुए एक बार लौट कर आते, हाथ मिलाने को…कि यकीन हो, छुआ हुआ सच है। लड़की हँसती, सिगरेट से जला देती उनकी उँगलियाँ। कहती, ज़ख़्म का निशान देखोगे तो पक्का याद रहेगा, कि मैं सच में थी।
सच तो कुछ भी नहीं था इस हर पल बदलती, युद्धरत दुनिया में…
इश्क़ और जंग में सब जायज़ है, कहती हुई लड़की किसी बहुत तेज बारिश की रात में पूरा भीगती लेकिन बारिश में गुम नहीं होता आँसू का वो कतरा जिसमें नाम घुला हो…वो कतरा चमकता…आसमान में… 
वो अजनबी हर बार जब बिजली कड़कते हुए देखता खिड़की से बाहर तो सोचता, ये उसके नाम का अक्षर हमेशा कैसे दिखता है सेकंड के क्षणांश में आसमान में लपकती रोशनी की लकीरों में…
तेज बारिश में गीली सिगरेट आसमान की ओर उठाती लड़की और आसमान को चैलेंज करती, उस लड़के को मुझसे जरा भी प्यार नहीं है, जो मैं झूठ बोलूँ तो इस सिगरेट को जला कर दिखा…भगवान हँसते, बेवकूफ लड़की, इतना सिंपल टेस्ट…आसमान से धरती की ओर बिजली लपकती और सिर्फ़ सिगरेट का सिरा जला कर ज़मींदोज़ हो जाती…
लड़की गहरा कश लेती, हँसती…यार भगवान, तुम भी ना, ये बिजली हमारे दिल पर गिरा कर क़िस्सा तमाम कर देते, इतना क्या सोचना है तुमको…एक मेरे मर जाने से कुछ भी तो हिसाब-किताब गड़बड़ नहीं होगा दुनिया पर…भगवान जी कहते, जरा-जरा मरो तुम इश्क़ में…पूरा मत मर जाना, जितनी बेवकूफ हो, उतनी ही प्यारी भी तो हो।

***
शहर दिल्ली से बेइंतहा मुहब्बत करने के कोई सुबूत नहीं हैं मेरे पास, सिवाए इसके कि किसी रैंडम से दिन बहुत मुश्किल से पायी हुई एक ख़ाली दोपहर में लिखने बैठी हूँ, कहानी मिजाज में घुली हुई है। मॉल का गेट सामने है। लोग इर्द-गिर्द हैं। मैं किसकी याद में हूँ, मालूम भी नहीं। मुहब्बत को तो उस शहर में भी याद करते हैं, जहाँ उसके होने का कोई ठिकाना नहीं होता। शहर दिल्ली में अभी पलाश और सेमल खिले होंगे। लोधी गार्डन में बोगनविला के उस पेड़ पर झूम कर गुलाबी रंग खिला होगा। हौज खास की इमारतों के पत्थर अभी पूरी तरह धीपते नहीं हैं। शाम को वहाँ बैठा जा सकता है। जिसे एक दिन ज़िद करके हौज खास ले गई थी, कि देखो, ज़िंदगी अभी कमरे से बाहर भी है। कि देखो, शाम के रंग सुंदर हैं। कि देखो, तुम्हरे अपने पर्सनल दुख के अलावा दुनिया कितनी बड़ी है। वो, जिसने उस रोज़ कहा था, तुम्हारे साथ यहाँ आ कर पता नहीं क्यों मन करता है कि फिर से पेंट ब्रश उठाऊँ और कुछ पेंटिंग्स बनाऊँ इस जगह की…वो, जिसने तड़प के कहा था, आज तुम्हारी बहुत याद आ रही है। आज आ जाओ बस, फिर किसी रोज़ नहीं आना। और मैं सिर्फ़ इसलिए नहीं गई थी, कि दो दिन ही लगते हैं दुखती हुई आदत के लिए। किसी से एक दिन मिलना हमेशा anomaly होता है, दिल कभी इस बात का यकीन नहीं करता कि उससे मिल कर जो महसूस हुआ था, वो सच का रूह में धँसा हुआ था। दिल कहता रहता है, एक्सेप्शन था वह, उतनी तेज धड़कना, वो ख़ुशी का फूल जो खिलता था, मुस्कुराता था, एक रोज़ का फूल था…उस पर भरोसा मत करो, वो गलती से बेमौसम खिला था। अभी वसंत आने में एक जन्म का फ़ासला है। वो लड़की नहीं थी, भरम थी। उससे दो बार मिल लोगे, लगातार, तो रूह में ज़ख़्म की तरह दर्ज हो जाएगी। फिर चुभेगी हर रोज़, एक तीसरी बार की मुलाकात की ज़िद लिए। कि स्पेस में भी ग्राफ प्लॉट करने के लिए दो वेल्यूज़ चाहिए होते हैं, एक्स एक्सिस के अलग, वाय एक्सिस के अलग। समय और स्थान। दो बार मिलने से यकीन हो जाता है कि किसी एक जगह पर, किसी एक वक्त में वो सचमुच थी। मरीचिका के पीछे क्यों भागना यायावर। सब कुछ भरम था उसका, किसी पुराने खंडहर में आती खुशबू हमेशा किसी प्रेत की होती है। किसी अधूरी इच्छा की…इन प्रेतों को इग्नोर करना ही सबसे अच्छा उपाय होता है। जैसे ही इनके होने का तुमपर असर पड़ने लगेगा, तुम्हें मालूम भी नहीं चलेगा और तुम्हारी घड़ी की सुइयाँ उलटी दिशा में घूमने लगेंगी। तुम गुज़रा हुआ सारा वक़्त लौटा लेना चाहोगे सिर्फ़ उस एक लड़की के साथ एक शाम, एक दोपहर, एक मौसम पहली बार जीने के लिए। तुम अपना जिया हुआ सब कुछ इरेज कर दोगे उसके लिए। वो जो है भी नहीं, जो कभी नहीं होगी तुम्हारे आसपास। उसने अनाधिकार अपनी साड़ी का आँचल तुम्हारी ओर बढ़ा दिया था कि इसमें धीपा हुआ, भीगा हुआ चेहरा पोंछ लो। वो अपनी साड़ी के आँचल में गाँठ बाँध लेती तुम्हारी ख़ुशबू…फिर तुम्हारी कलाइयों से कपास की गंध उठती और तुम सिगरेट पीते हुए अपनी कलाइयाँ जला लेते लेकिन उसके गीले बालों से उड़ती गंध तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ती। 

बरिस्ता ने कॉफ़ी टेबल पर ला कर रख दी, हम दिल्ली में थे, या ख़्वाब के किसी शहर में, अनायास ज़बान से शुक्रिया कहा, और आँख से आँसू उसी समय छलक गए। ऐसे कैफ़े में बैठ बिना मतलब एकदम अचानक आँसू से रो देने की वजह कोई माँग ले, तो क्या ही कह सकेंगे हम। कि लोधी गार्डन में सेमल के पेड़ों का वो छोटा सा जंगल क्या अब भी खिल के आसमान और ज़मीन दोनों को गहरा लाल रंगता है? कि शुक्रिया कहना दुखता है? कि कॉफ़ी कलेजा जलाती है? कि हम कुछ भी कर लें, इस तन्हाई के ख़िलाफ़ कोई मुकदमा जीत नहीं सकेंगे। कि इतने साल में भी आदत क्यों नहीं पड़ती। कहते तो हैं ना, कि “कफ़स भी हो तो बन जाता है घर, आहिस्ता आहिस्ता”, लेकिन किसी औरत ने क्यों नहीं लिखा कि घर हो जाता है कफ़स आहिस्ता आहिस्ता? कि भाग जाने के सपने में गाड़ी उलट जाती है, बस खाई में गिर जाती है। कि बारिश में भीगते हुए दोस्त की याद आती है तो इतना ही कह पाते हैं, वॉइस नोट भेज दिया कर, तेरी याद आती है। ग़ज़ब ज़िद में दुखती है तन्हाई।
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मुझे कोई बहुत अच्छा लगता है तो उससे सिंपल सवाल पूछती हूँ, तुम्हारा सबसे पसंदीदा रंग कौन सा है…पता नहीं क्यों। शायद उस रंग को उसकी नज़र से देखना होता है। शायद उसकी नज़र से दुनिया देखनी होती है। मेरे पापा का सबसे फ़ेवरिट रंग हरा था। मैंने जब अपनी मर्जी की कलमें खरीदनी शुरू की थीं, तो मेरा सबसे पसंदीदा रंग हरा था। मेरे पास हमेशा एक हरे रंग का पायलट पेन जरूर रहता था। कुछ हादसे आपको कैसे बदल देते हैं ना, ज़िंदगी से कोई एक रंग चुरा लेते हैं। आप कह भी नहीं सकते, ऑलमोस्ट किसी से भी…कि आपको हरे रंग से डर लगता है।
धूसर रंग पसंद था उसे…मिट्टी के सारे रंग। मैंने कई बार ख़ुद को ऑफ वाइट या beige रंग की साड़ी में लपेटते हुए सोचा, वो मुझे देखता तो क्या कहता…क्या वो कहता कि मेरी पसंद के रंग की साड़ी में अच्छी लग रही हो। क्या उसे मालूम होता कि मैंने जो बस, ऐसे ही, लाइट कन्वर्सेशन जैसा सवाल किया है, उसके इर्द-गिर्द मेरी वार्ड-ड्रोब बन रही है? क्रीम पैंट और ब्लैक शर्ट का मेरा सबसे फ़ेवरिट कॉम्बिनेशन सिर्फ़ ब्लैक ऑन ब्लैक से हराया जा सकता है। यार, ब्लैक पहन कर मेरी जान लेने आते हो तो पहले वार्न कर दिया करो, हम दिल का जिरहबख़्तर पहन कर मिलेंगे तुमसे।

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मेरे दिमाग़ में फालतू चीज़ें सेव्ड रहती हैं। शहर के स्पीडब्रेकर का नक्शा है। और मेरी ज़िंदगी की जिन चीज़ों को तुमने छुआ है, उनका भी…चाहे तुमने किसी कॉफ़ी कप से एक घूँट लिया हो, किसी ग्लास या बॉटल से मुँह लगा कर पानी पिया हो…किसी कॉफ़ी शॉप में लकड़ी के स्टिरर से चीनी मिलायी हो…मैं क्या करूँ कि तुम्हारी छुई हर चीज़ को उठा कर दिल के म्यूजियम में स्टोर करती गई हूँ।

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तुम इक रोज़ भूल जाओ कि मैं कॉफ़ी में चीनी नहीं पीती, भगवान कसम, उसी रोज़ तुमको एकदम से भूल जाऊँगी। लेकिन इसके लिए किसी कॉफ़ी शॉप में मिलो तो सही…मेरे लिए अमेरिकानो ऑर्डर करो और उसमें अपनी कॉफ़ी की तरह, दो चम्मच चीनी डाल दो…
सिंपल है ना…कहो, कर सकोगे, अप्रेम में इतना, मेरे लिए?

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