लेकिन दिल थक गया लगता है। मुहब्बत को गुनाह की कैटेगरी में डाल कर ख़ुद को इतना तड़पाया है कि मुस्कुराने से घबराता है दिल। सुख और सुकून के लम्हे को ऐसे बरतता है जैसे जमानत पर रिहा हुआ क़ैदी आसमान के चाँद को देखता है। कचकते, कसकते हुए। भगवान कभी आयें और पूछें कि क्या चाहिए, तो हम मुहब्बत भी नहीं माँगेंगे। कहेंगे, ये दिल का दुखना बंद हो जाये बस। मरने की दुआ माँग नहीं सकते, वरना माँग लेते।
आज ग़ज़ब दिन बीता है, सुबह लगभग ग्यारह बजे घर से निकले, कोई डेढ़ घंटे दूर गो-कार्टिंग ट्रैक था, वहाँ पर मिनी वालों ने मिनी चलाने के लिए लगा रखी थी। आप तेज चला कर कॉर्नरिंग देख सकते थे…ऐसा कहने को ठीक लगता है, पर असल में मिनी इतनी ज़्यादा पावरफुल कार है कि इतने छोटे ट्रैक पर ठीक से न स्पीडिंग हो पायी, न कॉर्नरिंग। लेकिन वहाँ मिनी की टीम थी, उनसे बात कर के अच्छा लगा। हमने कार के बारे में बात की, रेसिंग के बारे में बात की…मैंने उन्हें बताया कि हाईवे पर गाड़ी चलाते हुए ये मालूम चला कि तेज बारिश में भी बहुत तेज गाड़ी चला रहे हैं तो हुड खोल कर चलाने के बावजूद भीगते नहीं हैं। ये देखने में ग़ज़ब लगता है और इसका फिजिक्स हमको नहीं मालूम, पर प्रैक्टिकली ऐसा ही देखे हैं।
दोपहर में खाने के लिए पेपर ऐंड पाई चले गए, पास में था। वहाँ का अवोकेडो टोस्ट बहुत अच्छा लगता है। साथ में कहवा और अमेरिकानो पिये…याद आया कि हमको वो जगहें कितनी अच्छी लगती हैं जो हमारे दोस्तों ने बतायी हैं। इंदिरानगर में एक जगह थी, घर के पास, Antz Cafe…जेन लेकर गई थी वहाँ पहली बार कितने साल हो गए उस बात को…जेन से बहुत बहुत साल पहले मिली थी, वो सिंगापुर शिफ्ट हो गई तो ज़िंदगी से एकदम ग़ायब ही हो गई है, लेकिन उसके साथ पहली बार उस छोटे से कैफ़े में जाना दिल को इतना सुकून देने वाला था कि वो मेरी अपनी जगह बन गया। मैं वहाँ कई बार कई दोस्तों के साथ गई। कोई जगह क्यों अच्छी लगती है, कह नहीं सकते। कभी-कभी वहाँ का स्टाफ बहुत kind होता है। आपसे इतने प्यार से बात करता है कि आप भूल जाते हैं कि आपने कई दिनों से मुस्कुरा कर किसी को देखा नहीं है। मुझे हमेशा सफेद इमारतें बहुत अच्छी लगती हैं। ऐंट्ज़ कैफ़े में एक सिनेमन कॉफ़ी मिलती थी। उन दिनों अमेरिकानो का चस्का नहीं चढ़ा था। वहीं पर bruchetta मिलता था…ब्रेड के छोटे टुकड़ों पर टमाटर कटे हुए और थोड़ा शायद ओलिव आयल ड्रिज़ल किया हुआ…हम ऐंट्ज़ कैफ़े कई बारिश वाली दोपहर और शाम गए होते थे। अक्सर क्रिसमस लाइट्स लगी होती थीं। हर बार किसी दोस्त के साथ किस टेबल-कुर्सी पर बैठे थे, सो तक याद रहता था। गुज़र गए दिनों के दोस्त, अक्स की तरह दिखते थे। इंदिरानगर छूटा तो वाक़ई जो दोस्त थे, सारे छूट गए।
कितना आसान था उन दिनों, दोस्तों को फ़ोन कर के कॉफ़ी के लिए बुलाना। स्टारबक्स में तो अक्सर ही ऑफिस के बाद मिलते थे। मैं उन दिनों अपने नॉवेल पर काम कर रही होती थी। रात के एक बजे अपने ग्रीन वाली फ्लाइट पर घर लौटती थी। सपनीले दिन और रातें। याद की सारी चीज़ें सच नहीं होती हैं। बहुत कुछ हम अपनी कल्पना से मिला देते हैं, कुछ किसी कहानी का छूटा हुआ जुड़ जाता है। इन दिनों याद में दिक्कत होती है।
इस जनरेशन के पास कितने सारे और कितने अच्छे शब्द हैं। जिन चीज़ों को समझने में हमें कई किताबें लग जाती थीं…उनके लिए इनके पास एक शब्द है, situationship, ये अच्छा भी है और बुरा भी। मुझे जैसे उलझे हुए किरदार अच्छे लगते हैं, उतना उलझा हुआ क्या हर कोई होता है?
मुझे पहले लगता था मुहब्बत पर उम्र का कब्जा है। एक उम्र के बाद मुहब्बत दस्तक दे कर, इजाज़त दे कर आएगी। ऐसे नहीं कि पतझड़ का पत्ता जिधर तेज हवा चली, उड़ गया। कि एक्सिडेंटली नहीं होगी मुहब्बत, कि क्रश नाम की शय पर टीनेजर्स का एकाधिकार है। ईगो पर लग जाता है किसी का इस तरह बदतमीजी से दिल के दरवाज़े एकदम से हिंदी फिल्मी हीरो की तरह तोड़ कर भीतर घुस आना…फ़िल्मों में भी आजकल नेगेटिव किरदार ऐसे लिख रहे हैं कि समझ नहीं आता किससे प्यार करना है, किससे नफ़रत और किसके लिए वफ़ा रखनी है। हम किस तरफ़ के हैं?
सब तरफ़ espionage चल रहा है। दिल अपनी ही जासूसी कर रहा और सारे राज उसे बता रहा है जिसे सिर्फ़ आपके क़त्ल से मतलब है, कोई भी करे।
कायनात, भगवान, शैतान…हमने हर दरवाजे मत्था टेक लिया। कि बस, ये दुखना बंद हो जाये। इक रोज़ तो इस बेतरह दुखा और टूटा कि लगा जान चली जायेगी। रात के जाने कितने बजे थे लेकिन दोस्त को फ़ोन करके फ़ोन पर चीखे, रोए, तड़पे…
वांग कार वाई की एक फ़िल्म है, डेज ऑफ़ बीइंग वाइल्ड। उसका जो सबसे ख़ूबसूरत सीन है, वही उसका सबसे ख़तरनाक सीन भी। कि इक लड़का है, जो एकदम अनजान लड़की को दीवार से टिका कर कहता है, मेरी घड़ी की ओर देखो, एक मिनट बीतता है और फिर वह कहता है, आज से हम एक मिनट के दोस्त हो गए…इसे अब कोई नहीं बदल सकता, क्यूंकि अतीत को बदला नहीं जा सकता…और कि इस एक मिनट के लिए मैं तुम्हें ज़िंदगी भर याद रखूँगा।
वे प्रेम में होते हैं, साथ होते हैं और आख़िर को वो लड़का, उसे छोड़ देता है। लड़की बावलों की तरह रातों को शहर भटकते रहती है। ऐसे में इक रोज़ उसे एक पुलिस वाला मिलता है। वह पुलिस वाले को कहानी बताती है, कहते हुए कि जब उस लड़के ने यह बात कहीं थी, तो सुनने में बहुत अच्छा लगा था, लेकिन जब से उसने मुझे छोड़ा है, मैं रोज़ सोचती हूँ, वो एक मिनट भूलना कितना मुश्किल है। इस सबके बाद वो लड़की कहती है, मैं अगर सिर्फ़ आज की रात काट लूँगी तो फिर चीज़ें ठीक हो जायेंगी। सिर्फ़ एक आज की रात।
मेरे पास भी सिर्फ़ ऐसी रातें हैं। लेकिन कई रातें। मुश्किल वे रिश्ते नहीं होते जो टूट गए। मुश्किल वे रिश्ते होते हैं, जो बने ही नहीं। उनके पास खाद-पानी नहीं रहा कभी कि ज़मीन से झाँक सकें बाहर, धूप चख सकें, चाय-कॉफ़ी का अंतर पता कर सकें। पता नहीं, शायद इस दुनिया में मेरी तन्हाई का कुछ काम होगा…वरना ऐसे थोड़े है कि इतने बड़े शहर में लोग नहीं हों।
शाम में मिलन की किताब के बारे में बातचीत थी, अट्टा-गलाटा में। Heartbreak Unfiltered. नॉन-फिक्शन किताब है। कई तरह के दिल टूटने के किस्से हैं इसमें। किताब कब से पास में है, लेकिन पढ़ नहीं रहे, मन होते हुए भी। एक शाइनी उनसे सवाल पूछती हैं, कि क्या दिल टूटने से लोग मर सकते हैं, तो मिलन बताती हैं, कि किताब लिखते हुए उन्होंने स्टडी की और उनको पता चला कि दिल टूटने से सच में मर जाते हैं लोग।
हमने मुहब्बत को हमेशा रोमांस के चश्मे से देखा है, स्त्री-पुरुष के अलावा भी ऐसे प्रगाढ़ संबंध हो सकते हैं, ऐसे उदाहरण हमने बहुत कम पढ़े हैं। ऐसे रिश्ते होते होंगे, लेकिन हमने आमतौर पर प्रेम में दिल टूटने के सारे किस्से मुहब्बत के ही सुने हैं। नॉन-रोमांटिक जो क़िस्सा मुझे सबसे ज़्यादा पसंद है, वो वैन गो और उसके भाई थियो का है। वैन गो के छोटे भाई, थियो ने हमेशा वैन गो का ख्याल रखा, पैसा भेजते रहे और वैन गो के लिए क्या करना अच्छा रहेगा इसके बारे में भी खतों में लिखते रहे। दोनों भाई आपस में बहुत गहरे जुड़े हुए रहे…वैन गो के मरने के छह महीने के अंदर थियो की भी मृत्यु हो जाती है।
मुझे वैन गो बहुत पसंद हैं। इसलिए भी कि मेंटल हेल्थ बहुत ख़राब होते हुए भी उन्होंने बहुत सी पेंटिंग्स बनाईं। ये वैसा ही है जैसे बहुत डिप्रेशन में भी कोई लेखक लिखना जारी रखे। जैसे स्वदेश दीपक ने ‘मैंने मांडू नहीं देखा’ लिखी होगी। हमेशा मुमकिन नहीं होता है कि कला हमें बचा ले, लेकिन कई बार होता है कि कुछ रचना हमें डिस्ट्रक्टिव होने नहीं देता। हमें थोड़ा सुकून होता है कि जैसे एनर्जी को ना क्रिएट कर सकते हैं न डिस्ट्रॉय कर सकते हैं, वैसे ही दुख है…इसे सिर्फ़ दिल से निकाल कर काग़ज़ पर रखा जा सकता है। दुख को नष्ट नहीं कर सकते। अगर करने की कोशिश करेंगे तो दुनिया वैसे ही तबाह हो जाएगी जैसे एक इलेक्ट्रान को तोड़ कर नाभिकीय ऊर्जा को जन्म दिया जाता है। नार्मल केस में तो यही होता है एक एक व्यक्ति का दुख थोड़ा थोड़ा बहुत लोगों में बंटे…तब जा कर उसके दिल का बोझ थोड़ा हल्का होता है।
13th march. Friday. डायरी में लिखने के बाद भी कुछ चीज़ें इंटरनेट पर सहेजने का मन करता है। खास तौर से शुक्रिया दर्ज करने को…कि हमने जिसके लिए कुछ लिखा है, उस तक तो कभी नहीं पहुँचेगा, लेकिन शायद बहुत लोगों में बँटे तो हमारे सीने में चुभती खुखरी थोड़ी कुंद हो जाये.
कुछ चीज़ें कभी नहीं बदलतीं। मुझे इस दुनिया को उन चीज़ों के लिए शुक्रिया कहना चाहिए।
पता नहीं कितने साल बाद बात कर रहे थे, लेकिन दूर से ट्रेन की सीटी की आवाज़ सुनायी पड़ी फ़ोन पर। इस ट्रेन के सिग्नल से हमेशा लैंडलाइन वाले फ़ोन की याद आती थी। याद ऐसे ही आती है, बेसिरपैर की…उसके आने का न कोई ठिकाना होता है, न कोई तयशुदा वक्त। ग़लत लोगों के साथ होने पर, सही लोगों की याद आती है।
हमारे बीच कितने साल थे, मुझे मालूम नहीं।
मालूम बस इतना था कि इस दुनिया में बदन के इतने हिस्से हो नहीं सकते कि हर बार प्रेम करने पर दिल का टुकड़ा छोड़ आयें उसके पास, इसलिए हमने रूह के हिस्से किए…हर बार जब हमें मुहब्बत हुई। लेकिन उससे मिलने के बाद अफ़सोस हुआ कि काश रूह साबुत सलामत रहती…कि काश उसके पास रहते हुए किसी और हिस्से के लिए दिल टहकता नहीं।
मैंने सबसे ज़्यादा यही पूछा है, कि मुझे इतना गहरा प्रेम क्यों होता है…मुझे कम में जीना क्यों नहीं आता? मुझे इतनी याद क्यों आती है…आती है तो इस बेतरह दुखती क्यों है…इन सवालों का कोई जवाब नहीं होता। इस दुख की कोई दवा नहीं होती।
मुझे वो संगमरमर का फर्श याद रहता है, जिसकी ठंढी, कठोर सतह पर गिरती चाँदनी से दिल पर फफोले पड़ते थे…उस चाँदभीगे फर्श पर तड़पते हुए इक रोज़ सोचा था, काश कभी ऐसा होता, उसे एक क्षण के लिए सही पर इस ताप, इस दाह का अंदाज़ होता…एकदम ठीक ठीक ऐसा नहीं और इतनी देर तक तो बिल्कुल नहीं…पर जैसे आँच को छू कर उँगली जल जाती है, उतना सा छू सके विरह उसको…लेकिन इस विरह में उसकी आँखें जलेंगी तो मेरे दिल के अमलतास और पलाश के जंगल झुलस जाएँगे ये कहाँ मालूम था मुझे।
नया नॉवेल लिख रही हूँ, यहाँ पर लोगों ने अपनी फीलिंग महसूस करनी बंद कर दी हैं। बस कुछ ही लोग हैं, जिनका दिल थोड़ी तेज धड़कता है…यहीं एक किरदार है, ब्लैक शर्ट में जानलेवा दिखता…मुस्कुराता तो उसकी धार से काट लेती कलाइयाँ। वो पास आता है, इतना कि जिसे क़रीब कहते हैं…उसकी आवाज़ बहुत दूर से आ रही है…लैंडलाइन फ़ोन के ज़माने में हैं हम दोनों…मैं खिड़की पर खड़ी चाँद के उगने का इंतज़ार कर रही हूँ, वो तड़प कर कहता है, ‘कोई एक पूरे जन्म मेरे पास रह जाना…जाना मत।’
मैं काग़ज़ पर जल्दी से डायलॉग को लिखती हूँ। कलम के पाउच से खोलती हूँ कई रंग की कलमें, स्याही कौन सी है उसके शर्ट के रंग की…और उसकी आँखों के रंग की?
मैं चीखना चाहती हूँ, लेकिन काग़ज़ कोरा रहता है…
वो मेरी रूह में उलझ गया है…मैं जिस्म से रूह को अलगा कर मर जाना चाहती हूँ।
दोपहर में खाने के लिए पेपर ऐंड पाई चले गए, पास में था। वहाँ का अवोकेडो टोस्ट बहुत अच्छा लगता है। साथ में कहवा और अमेरिकानो पिये…याद आया कि हमको वो जगहें कितनी अच्छी लगती हैं जो हमारे दोस्तों ने बतायी हैं। इंदिरानगर में एक जगह थी, घर के पास, Antz Cafe…जेन लेकर गई थी वहाँ पहली बार कितने साल हो गए उस बात को…जेन से बहुत बहुत साल पहले मिली थी, वो सिंगापुर शिफ्ट हो गई तो ज़िंदगी से एकदम ग़ायब ही हो गई है, लेकिन उसके साथ पहली बार उस छोटे से कैफ़े में जाना दिल को इतना सुकून देने वाला था कि वो मेरी अपनी जगह बन गया। मैं वहाँ कई बार कई दोस्तों के साथ गई। कोई जगह क्यों अच्छी लगती है, कह नहीं सकते। कभी-कभी वहाँ का स्टाफ बहुत kind होता है। आपसे इतने प्यार से बात करता है कि आप भूल जाते हैं कि आपने कई दिनों से मुस्कुरा कर किसी को देखा नहीं है। मुझे हमेशा सफेद इमारतें बहुत अच्छी लगती हैं। ऐंट्ज़ कैफ़े में एक सिनेमन कॉफ़ी मिलती थी। उन दिनों अमेरिकानो का चस्का नहीं चढ़ा था। वहीं पर bruchetta मिलता था…ब्रेड के छोटे टुकड़ों पर टमाटर कटे हुए और थोड़ा शायद ओलिव आयल ड्रिज़ल किया हुआ…हम ऐंट्ज़ कैफ़े कई बारिश वाली दोपहर और शाम गए होते थे। अक्सर क्रिसमस लाइट्स लगी होती थीं। हर बार किसी दोस्त के साथ किस टेबल-कुर्सी पर बैठे थे, सो तक याद रहता था। गुज़र गए दिनों के दोस्त, अक्स की तरह दिखते थे। इंदिरानगर छूटा तो वाक़ई जो दोस्त थे, सारे छूट गए।
कितना आसान था उन दिनों, दोस्तों को फ़ोन कर के कॉफ़ी के लिए बुलाना। स्टारबक्स में तो अक्सर ही ऑफिस के बाद मिलते थे। मैं उन दिनों अपने नॉवेल पर काम कर रही होती थी। रात के एक बजे अपने ग्रीन वाली फ्लाइट पर घर लौटती थी। सपनीले दिन और रातें। याद की सारी चीज़ें सच नहीं होती हैं। बहुत कुछ हम अपनी कल्पना से मिला देते हैं, कुछ किसी कहानी का छूटा हुआ जुड़ जाता है। इन दिनों याद में दिक्कत होती है।
इस जनरेशन के पास कितने सारे और कितने अच्छे शब्द हैं। जिन चीज़ों को समझने में हमें कई किताबें लग जाती थीं…उनके लिए इनके पास एक शब्द है, situationship, ये अच्छा भी है और बुरा भी। मुझे जैसे उलझे हुए किरदार अच्छे लगते हैं, उतना उलझा हुआ क्या हर कोई होता है?
मुझे पहले लगता था मुहब्बत पर उम्र का कब्जा है। एक उम्र के बाद मुहब्बत दस्तक दे कर, इजाज़त दे कर आएगी। ऐसे नहीं कि पतझड़ का पत्ता जिधर तेज हवा चली, उड़ गया। कि एक्सिडेंटली नहीं होगी मुहब्बत, कि क्रश नाम की शय पर टीनेजर्स का एकाधिकार है। ईगो पर लग जाता है किसी का इस तरह बदतमीजी से दिल के दरवाज़े एकदम से हिंदी फिल्मी हीरो की तरह तोड़ कर भीतर घुस आना…फ़िल्मों में भी आजकल नेगेटिव किरदार ऐसे लिख रहे हैं कि समझ नहीं आता किससे प्यार करना है, किससे नफ़रत और किसके लिए वफ़ा रखनी है। हम किस तरफ़ के हैं?
सब तरफ़ espionage चल रहा है। दिल अपनी ही जासूसी कर रहा और सारे राज उसे बता रहा है जिसे सिर्फ़ आपके क़त्ल से मतलब है, कोई भी करे।
कायनात, भगवान, शैतान…हमने हर दरवाजे मत्था टेक लिया। कि बस, ये दुखना बंद हो जाये। इक रोज़ तो इस बेतरह दुखा और टूटा कि लगा जान चली जायेगी। रात के जाने कितने बजे थे लेकिन दोस्त को फ़ोन करके फ़ोन पर चीखे, रोए, तड़पे…
वांग कार वाई की एक फ़िल्म है, डेज ऑफ़ बीइंग वाइल्ड। उसका जो सबसे ख़ूबसूरत सीन है, वही उसका सबसे ख़तरनाक सीन भी। कि इक लड़का है, जो एकदम अनजान लड़की को दीवार से टिका कर कहता है, मेरी घड़ी की ओर देखो, एक मिनट बीतता है और फिर वह कहता है, आज से हम एक मिनट के दोस्त हो गए…इसे अब कोई नहीं बदल सकता, क्यूंकि अतीत को बदला नहीं जा सकता…और कि इस एक मिनट के लिए मैं तुम्हें ज़िंदगी भर याद रखूँगा।
वे प्रेम में होते हैं, साथ होते हैं और आख़िर को वो लड़का, उसे छोड़ देता है। लड़की बावलों की तरह रातों को शहर भटकते रहती है। ऐसे में इक रोज़ उसे एक पुलिस वाला मिलता है। वह पुलिस वाले को कहानी बताती है, कहते हुए कि जब उस लड़के ने यह बात कहीं थी, तो सुनने में बहुत अच्छा लगा था, लेकिन जब से उसने मुझे छोड़ा है, मैं रोज़ सोचती हूँ, वो एक मिनट भूलना कितना मुश्किल है। इस सबके बाद वो लड़की कहती है, मैं अगर सिर्फ़ आज की रात काट लूँगी तो फिर चीज़ें ठीक हो जायेंगी। सिर्फ़ एक आज की रात।
मेरे पास भी सिर्फ़ ऐसी रातें हैं। लेकिन कई रातें। मुश्किल वे रिश्ते नहीं होते जो टूट गए। मुश्किल वे रिश्ते होते हैं, जो बने ही नहीं। उनके पास खाद-पानी नहीं रहा कभी कि ज़मीन से झाँक सकें बाहर, धूप चख सकें, चाय-कॉफ़ी का अंतर पता कर सकें। पता नहीं, शायद इस दुनिया में मेरी तन्हाई का कुछ काम होगा…वरना ऐसे थोड़े है कि इतने बड़े शहर में लोग नहीं हों।
शाम में मिलन की किताब के बारे में बातचीत थी, अट्टा-गलाटा में। Heartbreak Unfiltered. नॉन-फिक्शन किताब है। कई तरह के दिल टूटने के किस्से हैं इसमें। किताब कब से पास में है, लेकिन पढ़ नहीं रहे, मन होते हुए भी। एक शाइनी उनसे सवाल पूछती हैं, कि क्या दिल टूटने से लोग मर सकते हैं, तो मिलन बताती हैं, कि किताब लिखते हुए उन्होंने स्टडी की और उनको पता चला कि दिल टूटने से सच में मर जाते हैं लोग।
हमने मुहब्बत को हमेशा रोमांस के चश्मे से देखा है, स्त्री-पुरुष के अलावा भी ऐसे प्रगाढ़ संबंध हो सकते हैं, ऐसे उदाहरण हमने बहुत कम पढ़े हैं। ऐसे रिश्ते होते होंगे, लेकिन हमने आमतौर पर प्रेम में दिल टूटने के सारे किस्से मुहब्बत के ही सुने हैं। नॉन-रोमांटिक जो क़िस्सा मुझे सबसे ज़्यादा पसंद है, वो वैन गो और उसके भाई थियो का है। वैन गो के छोटे भाई, थियो ने हमेशा वैन गो का ख्याल रखा, पैसा भेजते रहे और वैन गो के लिए क्या करना अच्छा रहेगा इसके बारे में भी खतों में लिखते रहे। दोनों भाई आपस में बहुत गहरे जुड़े हुए रहे…वैन गो के मरने के छह महीने के अंदर थियो की भी मृत्यु हो जाती है।
मुझे वैन गो बहुत पसंद हैं। इसलिए भी कि मेंटल हेल्थ बहुत ख़राब होते हुए भी उन्होंने बहुत सी पेंटिंग्स बनाईं। ये वैसा ही है जैसे बहुत डिप्रेशन में भी कोई लेखक लिखना जारी रखे। जैसे स्वदेश दीपक ने ‘मैंने मांडू नहीं देखा’ लिखी होगी। हमेशा मुमकिन नहीं होता है कि कला हमें बचा ले, लेकिन कई बार होता है कि कुछ रचना हमें डिस्ट्रक्टिव होने नहीं देता। हमें थोड़ा सुकून होता है कि जैसे एनर्जी को ना क्रिएट कर सकते हैं न डिस्ट्रॉय कर सकते हैं, वैसे ही दुख है…इसे सिर्फ़ दिल से निकाल कर काग़ज़ पर रखा जा सकता है। दुख को नष्ट नहीं कर सकते। अगर करने की कोशिश करेंगे तो दुनिया वैसे ही तबाह हो जाएगी जैसे एक इलेक्ट्रान को तोड़ कर नाभिकीय ऊर्जा को जन्म दिया जाता है। नार्मल केस में तो यही होता है एक एक व्यक्ति का दुख थोड़ा थोड़ा बहुत लोगों में बंटे…तब जा कर उसके दिल का बोझ थोड़ा हल्का होता है।
13th march. Friday. डायरी में लिखने के बाद भी कुछ चीज़ें इंटरनेट पर सहेजने का मन करता है। खास तौर से शुक्रिया दर्ज करने को…कि हमने जिसके लिए कुछ लिखा है, उस तक तो कभी नहीं पहुँचेगा, लेकिन शायद बहुत लोगों में बँटे तो हमारे सीने में चुभती खुखरी थोड़ी कुंद हो जाये.
कुछ चीज़ें कभी नहीं बदलतीं। मुझे इस दुनिया को उन चीज़ों के लिए शुक्रिया कहना चाहिए।
पता नहीं कितने साल बाद बात कर रहे थे, लेकिन दूर से ट्रेन की सीटी की आवाज़ सुनायी पड़ी फ़ोन पर। इस ट्रेन के सिग्नल से हमेशा लैंडलाइन वाले फ़ोन की याद आती थी। याद ऐसे ही आती है, बेसिरपैर की…उसके आने का न कोई ठिकाना होता है, न कोई तयशुदा वक्त। ग़लत लोगों के साथ होने पर, सही लोगों की याद आती है।
हमारे बीच कितने साल थे, मुझे मालूम नहीं।
मालूम बस इतना था कि इस दुनिया में बदन के इतने हिस्से हो नहीं सकते कि हर बार प्रेम करने पर दिल का टुकड़ा छोड़ आयें उसके पास, इसलिए हमने रूह के हिस्से किए…हर बार जब हमें मुहब्बत हुई। लेकिन उससे मिलने के बाद अफ़सोस हुआ कि काश रूह साबुत सलामत रहती…कि काश उसके पास रहते हुए किसी और हिस्से के लिए दिल टहकता नहीं।
मैंने सबसे ज़्यादा यही पूछा है, कि मुझे इतना गहरा प्रेम क्यों होता है…मुझे कम में जीना क्यों नहीं आता? मुझे इतनी याद क्यों आती है…आती है तो इस बेतरह दुखती क्यों है…इन सवालों का कोई जवाब नहीं होता। इस दुख की कोई दवा नहीं होती।
मुझे वो संगमरमर का फर्श याद रहता है, जिसकी ठंढी, कठोर सतह पर गिरती चाँदनी से दिल पर फफोले पड़ते थे…उस चाँदभीगे फर्श पर तड़पते हुए इक रोज़ सोचा था, काश कभी ऐसा होता, उसे एक क्षण के लिए सही पर इस ताप, इस दाह का अंदाज़ होता…एकदम ठीक ठीक ऐसा नहीं और इतनी देर तक तो बिल्कुल नहीं…पर जैसे आँच को छू कर उँगली जल जाती है, उतना सा छू सके विरह उसको…लेकिन इस विरह में उसकी आँखें जलेंगी तो मेरे दिल के अमलतास और पलाश के जंगल झुलस जाएँगे ये कहाँ मालूम था मुझे।
नया नॉवेल लिख रही हूँ, यहाँ पर लोगों ने अपनी फीलिंग महसूस करनी बंद कर दी हैं। बस कुछ ही लोग हैं, जिनका दिल थोड़ी तेज धड़कता है…यहीं एक किरदार है, ब्लैक शर्ट में जानलेवा दिखता…मुस्कुराता तो उसकी धार से काट लेती कलाइयाँ। वो पास आता है, इतना कि जिसे क़रीब कहते हैं…उसकी आवाज़ बहुत दूर से आ रही है…लैंडलाइन फ़ोन के ज़माने में हैं हम दोनों…मैं खिड़की पर खड़ी चाँद के उगने का इंतज़ार कर रही हूँ, वो तड़प कर कहता है, ‘कोई एक पूरे जन्म मेरे पास रह जाना…जाना मत।’
मैं काग़ज़ पर जल्दी से डायलॉग को लिखती हूँ। कलम के पाउच से खोलती हूँ कई रंग की कलमें, स्याही कौन सी है उसके शर्ट के रंग की…और उसकी आँखों के रंग की?
मैं चीखना चाहती हूँ, लेकिन काग़ज़ कोरा रहता है…
वो मेरी रूह में उलझ गया है…मैं जिस्म से रूह को अलगा कर मर जाना चाहती हूँ।
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