मौत की सम्मोहक आँखों में देखते हुए मैं तुम्हें बार बार याद करती हूँ...इत्मीनान है कि तुम्हें आज शाम विदा कह चुकी हूँ...बता भी चुकी हूँ कि तुमसे कितना प्यार करती हूँ...दोनों बाँहों के फ़ैलाने से जितना क्षेत्रफल घिरता है, उतना...मेरे ख्याल से इतने प्यार पर तुम अपनी बची हुयी जिंदगी बड़े आराम से काट लोगे...मुझे यकीन है...तुम बस याद रखना कि ये वाक्य संरचना नहीं बदलेगी 'मैं तुमसे प्यार करती हूँ' कभी भी 'मैं तुमसे प्यार करती थी' नहीं होगा. मेरे होने न होने से प्यार पर कोई असर नहीं होगा.
मैं ऐसे ही मर जाना चाहती हूँ, तुम्हारे इश्क में लबरेज़...तुम्हारी आवाज़ के जादू में गुम...तुम्हारे यकीन के काँधे पर सर रखे हुए कि तुम मुझसे प्यार करते हो. इश्क के इस पौधे पर पहली वसंत के फूल खिले हैं...यहाँ पतझड़ आये इसके पहले मुझे रुखसत होना है...तुम ये फूल समेट कर मेरे उस धानी दुपट्टे में बाँध दो...मेरे जाने के बाद दुपट्टे से फूल निकाल कर रख लेना और दुपट्टा अपने गाँव की नदी में प्रवाहित कर देना...उसके बाद तुम जब भी नदी किनारे बैठोगे तुम्हें कहीं बहुत दूर मैं धान के खेत में अपना दुपट्टा हवा में लहराते हुए, मेड़ पर फूल से पाँव धरते नज़र आउंगी. मेरा पीछा मत करना...मेरा देश उस वक़्त बहुत दूर होगा.
यकीन करना कि मैं कहीं नहीं जा रही...तुम्हारे आसपास कहीं रहूंगी...हमेशा...हाँ ध्यान रखना, मेरी याद में आँखें भर आयें तो उस रात पीना नहीं...कि खारा पानी व्हिस्की का स्वाद ख़राब कर देता है और तुम तो जानते ही हो कि व्हिस्की को लेकर मैं कितना 'टची' हो जाती हूँ. तुम्हें ऐसा लगेगा कि मैं ये सब नहीं देख रही तो मैं आज बता देती हूँ कि मरने के बाद तो मैं और भी तुम्हारे पास आ जाउंगी...आत्मा पर तो जिस्म का बंधन भी नहीं होता, न वक़्त और समाज की बंदिशें होती हैं उसपर...एकदम आज़ाद...मेरे प्यार की तरह...मेरे मन की तरह.
जिंदगी जितनी छोटी होती है, उतनी ही सान्द्र होती है...तुम तो मेरे पसंद के सारे लोगों को जानते हो कि जो कम उम्र में मर गए...कर्ट कोबेन, दुष्यंत कुमार, गुरुदत्त, मीना कुमारी...उनकी आँखों में जिंदगी की कितनी चमक थी...जिसके हिस्से जितनी कम जिंदगी होती है उसकी आँखों में खुदा उतनी ही चमक भर देता है. तुमने तो मेरी आँखें देखी हैं...क्या लगता है मेरी उम्र कितने साल है?
इतनी शिद्दत से किसी को प्यार करने के बाद जिंदगी में क्या बाकी रह जाता है कि जिसके लिए जिया जाए...मैं नहीं चाहती कि इस प्यार में कुछ टूटे...मुझे इस प्यार के परफेक्ट होने का छलावा लिए जाने दो. मैं टूट जाने से इतना डरती हों कि वक़्त ही नहीं दूँगी ये देखने के लिए कि हो सकता है इस प्यार में वक़्त के सारे तूफ़ान झेल लेने की ताकत हो.
मुझे चले जाने से बस एक चीज़ रोक रही है...फ़र्ज़ करो कि तुमने मेरे ख़त नहीं पढ़े हैं...ये ख़त भी तुम तक नहीं पहुंचा है...अपने दिल पर हाथ रख के जवाब दो, तुम्हें पूरा यकीन है तो सही कि मैं तुमसे बेइंतेहा प्यार करती हूँ या कि मेरे जाने के बाद कन्फ्यूज हो जाओगे?
मेरे बाद की कोई शाम... |
मैं तुम्हारे नाम अपनी बची हुयी धड़कनें करती हूँ...कि मोल लो इनसे इश्क के बाज़ार में तुम्हें जो भी मिले...याद का सामान जुगाड़ लो कि भूली हुयी शामों में राहत हो कि एक पागल लड़की ने चंद छोटे लम्हों के लिए सही...तुम्हें प्यार बहुत टूट के किया था.
सुना था प्यार जीना सिखाता है।
ReplyDelete@प्रवीण जी, प्यार के कई रंग हैं...कभी जिंदगी के, कभी मौत के। अलग अलग समय में अलग रंग की प्रासंगिकता दिखाई देती है।
ReplyDeleteऔर प्यार के कारण मरना तो हमेशा से लोगों का फेवरिट शगल रहा है :)
pyar ,pyar karte hai thoda pyar karke bhi dekha jae...
ReplyDeletejee to lie pyar me tere ab thoda marke bhi dekha jae....sach hai pyar sab kuch sikha deta hai....jab jab tumhe padhti hu lagta hai dil me kahin thoda pyar aur badh gaya.....
प्रभावशाली प्रस्तुति
ReplyDeletetooooo good,so deeply touching..hw can u be u so truly imaginative of such feelings in words,,keep it going :)
ReplyDeleteबहुत ही अच्छी प्रस्तुति ।
ReplyDeleteमेरा शौक
मेरे पोस्ट में आपका इंतजार है
आज रिश्ता सब का पैसे से
Vah bahut sundar upadhyay ji
ReplyDeleteBahut gahri anubhutiyon okera hai... bilkul samvedana ke swaron ko jhakjhor ne ka bahut hi khoobsoorat pryas .... abhar .... mere post ko jaroor dekhiyega kuchh gazle aur muktak apki prateeksha kr rahe hain ...
"....कि ये वाक्य संरचना नहीं बदलेगी 'मैं तुमसे प्यार करती हूँ' कभी भी 'मैं तुमसे प्यार करती थी' नहीं होगा."
ReplyDeleteसंरचनाएं नहीं बदलतीं... और ख़ास कर ऐसे कुछ एक दुर्लभ वाक्यों की संरचना तो कभी नहीं... और वो भी तब जब लेखनी उन भावों को शब्द दे रही हो जो हृदय कुञ्ज की अतल गहराईयों से निकलें हों.. किसी विशेष के लिए!
आपको पता है... हम लिखते हैं... हमारा लिखा हुआ कई लोग पढ़ते हैं... पर यह हर लिखने वाले की सच्चाई है कि वह किसी ख़ास के लिए लिखता है...' वो ' अगर बांच ले लिखी हुई पाती तो मानों लिखना सफल हो जाता है...
चार पंक्तियाँ अपनी एक पुरानी कविता से...
'भले हमारी रचनाओं को पढ़ें बहुत लोग
पर हम लिखते हैं बहुत कम लोगों के लिए
अरे! ऐसे कैसे कोई भी रो देगा...
एक हृदय चाहिए धड़कता हुआ आखों के नम होने के लिए'
आपकी लेखनी की विशेषता है कि वह गंभीर बातें करती हुई भी... हंसती खिलखिलाती हुई निकल जाती है... एक स्मित मुस्कान छोड़ जाती है पढ़ने वाले के मुख पर! आपकी लगभग सभी पोस्ट्स पढ़ कर इतना कहने के अधिकारी तो हम हैं ही:)
अब इसी पोस्ट को लें... मृत्यु की बात करती हुई भी हर पंक्ति जीवन से भरी हुई है... संजीवनी सी है मृतप्राय भावनाओं के लिए!!!
इन गद्यों से गुजरना सुन्दर कविताओं से गुजरने जैसा है!!!
प्यार जो ना कराये कम है …………बस शिद्दत से चाहत होनी चाहिये।
ReplyDeleteकातिलाना!!
ReplyDelete@ Pooja
ReplyDeleteचलिये अपना वाक्य संशोधित कर लेते हैं...
सुना था प्यार जीना सिखाता है। इस जनम नहीं तो अगले जनम।
@प्रवीण जी :) :)
ReplyDeleteशुक्रिया :D कभी कभी मरने के हक़ में खड़ा होना पड़ता है...प्यार के लिए मरना कितना सही है कुछ कुछ euthanasia जैसा ही विवादित है :)