09 December, 2011

मौन की भाषा में 'आई लव यू' कहना...

कैसा होता होगा तुम्हें मौन की भाषा में 'आई लव यू' कहना...जब कि बहुत तेज़ बारिश हो रही हो और हम किसी जंगल के पास वाले कैफे में बैठे हों...बहुत सी बातें हो हमारे दरमियाँ जिसमें ये भी बात शामिल हो कि जनवरी की सर्द सुबहों में ये आसमान तक के ऊंचे पेड़ बर्फ से ढक जाते हैं.

एक सुबह चलना शुरू करते हुए जंगल ख़त्म न हो पर दिन अपनी गठरी उठा कर वापस जाता रहे...उस वक़्त कहीं दूर रौशनी दिखे और हम वहां जा के शाम गुजारने के बारे में सोचें. किसी ठंढे और शुष्क देश में ऐसा जंगल हो जिसमें आवाजें रास्ता भूल जाया करें. कैफे में गर्म भाप उठाती गर्म चोकोलेट मिलती है...कैफे का मालिक एक मझोले से कद का मुस्कुराती आँखों वाला बूढ़ा है...वो मुझसे पूछता है कि क्या मैं चोकलेट में व्हिस्की भी पसंद करुँगी...मेरे हाँ में सर हिलाने पर वो तुम्हारा ड्रिंक पूछता है...तुम उसे क्या लाने को कहते हो मुझे याद नहीं आता. शायद तुम हर बार की तरह इस बार भी किसी अजनबी से कहते हो कि अपनी पसंदीदा शराब लाये. लोग जिस चीज़ को खुद पसंद करते हैं, उसे सर्व करते हुए उसमें उनकी पसंद का स्वाद भी 'घुल जाता है.

उस अनजान देश में...जहाँ मैं तुम्हारे अलावा किसी को नहीं जानती...जहाँ शायद कोई भी किसी को नहीं जानता, वो बूढ़ा हमें बेहद आत्मीय लगता है. बाहर बेतरह बारिशें गिरने लगी हैं और ऐसा लगता है कि आज रात यहाँ से कोई और राह नहीं जन्मेगी. बारिश का शोर हर आवाज़ को डुबो देता है और मुझे ऐसा महसूस होता है कि जैसे मैं सामने कुर्सी पर नहीं, तुम्हारे पास बैठी हूँ, तुम्हारी बाहों के घेरे में...जहाँ तुम्हारी धड़कनों के अलावा कोई भी आवाज़ नहीं है और वक़्त की इकाई तुम्हारी आती जाती सांसें हैं.

जब कोई आवाजें नहीं होती हैं तो मन दूसरी इन्द्रियों की ओर भटकता है और कुछ खुशबुयें जेहन में तैरने लगती हैं...तुम्हारी खुशबू से एक बहुत पुराना वक़्त याद आता है...बेहद गर्म लू चलने के मौसम होते थे...जून के महीने में अपने कमरे सोयी रहूँ और पहली बारिश की खुशबू से नींद खुले...तुम्हारे इर्द गिर्द वैसा ही महसूस होता है जैसे अब रोपनी होने वाली है और धान के खेत पानी से पट गए हैं. गहरी सांस लेती हूँ अपने मन को संयत करने के लिए जिसमें तुम्हारा प्यार दबे पाँव उगने लगा है.

मुझे आज शाम ही मालूम पड़ा है कि नीला रंग तुम्हें भी बेहद पसंद है...मैं अनजाने अपने दुपट्टे के छोर को उँगलियों में बाँधने लगी हूँ पर मन कहीं बंधता नहीं...सवाल पूछता है कि आज नीले रंग के सूट में तुमसे मिलने क्यूँ आई...मन का मिलना भी कुछ होता है क्या. सोचने लगती हूँ कि मैं तुम्हें अच्छी लग रही होउंगी क्या...वैसे ही जैसे तुम मुझे अच्छे लगने लगे थे, जब पहली बार तुम्हें जाना था तब से. आई तो थी यहाँ लेखक से मिलने, ये कब सोचा था कि उस शख्स से प्यार भी हो सकता है. सोचा ये भी तो कहाँ था कि तुम फ़िल्मी परदे के किसी राजकुमार से दिखोगे...या कि तुम्हारी आँखें मेरी आँखों से यूँ उलझने लगेंगी.

मैं अब भी ठुड्डी पर हाथ टिका तुमसे बातें कर रही हूँ बस मन का पैरलल ट्रैक थोड़ा परेशान कर रहा है. तुमसे पूछती हूँ कि तुम्हें उँगलियों की भाषा आती है क्या...और सुकून होता है कि नहीं आती...तो फिर मैं तुम्हारे पास बैठती हूँ और तुम्हारा हाथ अपने हाथ में लेती हूँ...हथेली के पीछे वाले हिस्से पर उँगलियों से लिखती हूँ 'I' और पूछती हूँ कि ये पढ़ पाए...तुम न में सर हिलाते हो...फिर मैं बहुत सोच कर आगे के चार अक्षर लिखती हूँ L-O-V-E...तुम्हें गुदगुदी लगती है और तुम हाथ छुड़ा कर हंसने लगते हो. मुझे लगता है कि जैसे मैं घर में बच्चों को लूडो खेलने के नियम सिखा रही हूँ, जानते हुए कि वो अपने नियम बना के खेलेंगे...आखिरी शब्द है...और सबसे जरूरी भी...तीन अक्षर...Y-O-U. तुम्हारे फिर इनकार में सर हिलाने के बावजूद मुझे डर लग जाता है कि तुम समझ गए हो.










तुमसे वो पहली और आखिरी बार मिलना था...वैसे हसीन इत्तिफाक फिर कभी जिंदगी में होंगे या नहीं मालूम नहीं...मैं अपनी रूह के दरवाजे बंद करती हूँ कि तुम्हारी इस एक मुलाकात के उजाले में जिंदगी की उदास और याद की तनहा शामें काटनी हैं मुझे. यकीन की मिटटी पर तुम्हारे हाथ के रोपे गुलाब में फूल आये हैं...इस खुशबू से मेरी जिंदगी खुशनुमा है कि मैंने तुमसे कह दिया है कि मैं तुमसे प्यार करती हूँ. 

11 comments:

  1. और इसके बाद कोई "ना" कहे तो प्यार उससे हमेशा हमेशा के लिए रूठ जाये!!!!

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  2. लग रहा है कि आपको कल्पना लोक का फ्री पास मिल गया है, न जाने कितना खजाना उठाने को है, इतनी गति से तो तभी लिखा जा सकता है।
    शब्द भाव को धारहीन कर देते हैं, मौन की शक्ति शब्दों से कहीं अधिक है।

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  3. @प्रवीण जी...कल्पनालोक की ट्रेन के कंडक्टर बने बैठे हैं :) आपको चाहिए तो टिकट कटा के भेज दूँ...या फिर प्रबंधन में एक जगह खाली है...आपको तो रेल प्रबंधन का बहुत अनुभव है...क्या कहते हैं, सिफ़ारिश लगाऊँ?

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  4. '......जैसे मैं घर में बच्चों को लूडो खेलने के नियम सिखा रही हूँ, जानते हुए कि वो अपने नियम बना के खेलेंगे...'
    वाह! यह बात कई सन्दर्भों में शत प्रतिशत सत्य है...

    आपके कल्पना लोक में ढ़ेर सारे रंग हैं... यथार्थ के धरातल पर इनकी थिरकन यहाँ वहाँ देख भावविभोर होते रहते हैं... आपने भी ऐसे सन्दर्भ इस धरातल पर देखे हैं न... तभी तो कल्पनाशील होते हुए भी यथार्थपरक है लेखनी!

    लेखनी की पूजा चलती रहे... कल्पनालोक का विचरण कई प्रतिमान गढ़े!

    शुभकामनाएं!

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  5. मौन की भाषा समझने वाले हों तो इससे बेहतर कोई भाषा ही नहीं।

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  6. आपकी किसी पोस्ट की चर्चा है नयी पुरानी हलचल पर कल शनिवार 10-12-11. को । कृपया अवश्य पधारें और अपने अमूल्य विचार ज़रूर दें ..!!आभार.

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  7. ..............!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

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  8. @ Puja Upadhyay
    .
    .
    स्वप्नों के सेवक हैं हम सब,
    स्वप्नों के महलों में जाकर,
    साधिकार नहीं रह सकते।
    .

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  9. itni pyari kalpanein....:) sach kahti hu pooja kash tumhari kalpanon ki sach me ek duniya ho.....to kabhi sham dhale me bhi kisi ka haath thame waha aa jae....kasam se kitna sukun hoga waha.....meri kalpanaein badi darawani si hui jati hai abhi sochti hu kuch din aapki kalpanein ji lu....:)

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  10. @ puja,
    लहरों का अनुशील तक आना अच्छा लगा!
    anyways,
    previously I wrote 'लेखनी की पूजा चलती रहे... कल्पनालोक का विचरण कई प्रतिमान गढ़े'
    इसे अगर पलट कर कहें तो भी कितनी सुन्दर बात निकलेगी...
    तो चलो अभी पलट देते हैं-
    'लेखनी की पूजा चलती रहे' कहा था, अब कहते हैं 'पूजा की लेखनी चलती रहे...:)'
    देखा, कभी कभी संरचना बदल भी जाए तो अर्थ का अनर्थ नहीं होता बल्कि अर्थ और सघन व सुन्दर हो जाते हैं!!!
    your new post is also amazing, as always...
    वहीँ से हो कर यहाँ आ रहे हैं! 'संरचना' वाली बात बेहद भायी!

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  11. सच में बारिशें हो रही हैं आपके ब्लॉग में....इतने पोस्ट और इतनी प्यारी बातें...
    ज्यादा देर रुकना अब 'खतरनाक' साबित हो सकता है सेहत के लिए...

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