09 April, 2009
मेरी जिंदगी का एक पन्ना
मैं गाने सुनती हूँ तो अक्सर एक ही गीत को बहुत देर तक सुनती हूँ, कई कई बार...और अक्सर नींद आने तक। घर पर सब परेशान हो जाते हैं मुझसे...जब थोड़ी छोटी थी तो मम्मी से इस कारण बहुत डांट खाती थी...बाकी सबका तो मन भर जाता था, पर मुझे अगर कोई गाना सुनना है तो बस...कोई लिमिट नहीं होती थी की पाँच बार सुनकर बंद कर दूंगी या ऐसा ही कुछ।
और दूसरी चीज़ होती थी, कोई गाना सुन लिया तो बस सुर चढ़ गया अब जब तक आकाश पाताल से ढूंढ कर दस बीस बार सुन न लें, खाना हज़म नहीं होता था। हमें तो प्यार भी इसी गीतों के जूनून के कारण हुआ है वरना तो हम कुणाल से कभी मिलते ही नहीं। वो भला मानुस एक ऐसे ही पागलपन में मेरे पसंद का गाना ढूंढ दिया था हमको...बस हम इम्प्रेस हो गए...काफ़ी आसान था :)
कुणाल का सबसे अच्छा दोस्त है रेड्डी...दोनों रूममेट रहे हैं...रेड्डी इतना प्यारा और अच्छा इंसान है कि यकीन नहीं होता कि आज भी ऐसी कैटेगरी के लोग होते हैं। और उसपर सुपर intelligent...अकल देने में भी भगवान ने उतनी ही दरियादिली दिखाई है जितनी शकल देने में :) ऐसा बड़ा कम होता है। इत्ता बड़ा तोप है पर बातें करो तो हवा तक नहीं लगेगी...वैसे कुणाल या उसके सारे दोस्त ऐसे ही हैं। मुझे लगता है IIT ठोक पीट के लड़कों को ये सब सिखा देता है। रेड्डी मुझे बहन मानता है...और गाहे बगाहे ख़बर लेता रहता है कि लाइफ में सब ठीक चल रहा है कि नहीं। अभी तक मिली तो नहीं हूँ उससे, सात समंदर पार जो बैठा है। मज़ा तो तब आता है जब हम बात करते हैं कि रेड्डी के लिए लड़की ढूंढनी है...उसकी पहली कैटेगरी है कि लड़की को डांस करना आना चाहिए, बाकी कैसी भी हो चलेगी :) हम सोचते हैं कि उसे कोई पसंद आ गई तो क्या करेगा...तो उसने कहा है कि सिखा देगा :)
वैसे मैं कई दिनों से उसे कह रही हूँ कि कुणाल को भी कहे कोई डांस सीख लेने को मगर यहाँ उसने भी हाथ खड़े कर दिए, लगता है कुणाल के साथ डांस करने के लिए मुझे दूसरा जनम लेना होगा ;-)
कल रेड्डी ने एक गाने का लिंक दिया...जब से सुना है दिमाग में चल रहा है...बोल इतने प्यारे और सिंपल से...और tune भी बड़ी मस्त है। मूड अच्छा हो जाए सुनकर...और प्यार तो हो ही जायेगा :)
और ये मेरी fav lines हैं...
im so glad i found you.
i love bein around you.
you make it easy,
as easy as 1 2,(1 2 3 4.)
theres only one thing two do three words four you.
i love you.
(i love you)
theres only one way two say those three words
and that's what i'll do.
i love you.
i love you
06 April, 2009
दिल ढूंढता है...फ़िर वोही फुर्सत के रात दिन...
जिंदगी की सबसे खूबसूरत यादें किसी कैमरा में कैद नहीं हो सकती...उन्हें दिल से लगा के रखना पड़ता है...उनकी खुशबू किसी अल्फाजों के तिलिस्म में बंधने को तैयार ही नहीं होती.
मुझे जाने क्यों रात हमेशा बड़ी प्यारी और खूबसूरत लगती है...उसपर दिल्ली की वो सर्द कोहरे वाली रातें। इंडिया गेट पर दोस्तों के साथ देर रात बैठ कर अपने स्कूल या कॉलेज के किस्से बयान करना...आहा वो काला खट्टा वाला बर्फ का गोला खाना, उफ़ वो स्वाद भला मैक डी के आइसक्रीम में आएगा कभी। बैलून खरीद कर सबके साथ खेलना, मारा पीटी करना...रेस लगाना और वो टूटे फूटे गानों के साथ अन्त्याक्षरी खेलना...वो गाने जो किसी फ़िल्म के नहीं, वो बोल जो किसी गीतकार ने नहीं लिखे...वो चाँद गाने जो दिल की धड़कनों से उठते थे...वो खोये हुए बोल...वो गुमी हुयी धुनें।
रास्ते भर कार में बजती वो गजलें या कोई शोर शराबा सा पंजाबी गीत...और हाँ उन दिनों...तारे ज़मीन पर का गाना कितना सुना था...तू धूप है...छम से बिखर, तू है नदी ओ बेखबर...अब भी कहीं भी ये गाना बजते सुनती हूँ तो मन उसी nh8 पर पहुँच जाता है। कमबख्त ये दिल्ली पीछा छोड़ती ही नहीं, कहीं भी जाओ।
वो दिन जब आधे दोस्तों की प्रेमकहानी में कोई ना कोई ट्विस्ट चल रहा था, और हम सब मिल कर उपाय ढूंढते रहते थे...वो दिन जब दोस्ती सबसे कीमती चीज़ होती थी दुनिया में और वो चंद लम्हे दिन भर की थकान उतारने का सबब।
पंख लगा के उड़ने वाले वो दिन...जब जिंदगी का नशा हुआ करता था और खुशियाँ सर चढ़ कर बोलती थीं...जब किसी की एक नज़र का खुमार हफ्तों नहीं उतरता था...जब आइना किसी भी हालात में आपपर मुस्कुराता था...जब कुछ भी पहन लो आखों में खिलखिलाहट होती थी।
उफ्फ्फ्फ्फ्फ
दिल्ली तेरी गलियों का...वो इश्क याद आता है
01 April, 2009
अप्रैल फूल कैसे बने?
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ऐसे :D
अब आप हमें गरिया लें...क्या कीजियेगा...भाई हमें तो यही सीधे साधे वाले अप्रैल फूल बनाने में मज़ा आता है.
31 March, 2009
किस्सा अमीबा का...
एक सेल और फ्लेक्सिबल आकार के कारण इसे सबसे ज्यादा पसंद करते थे। और जब भी अमीबा बनाना होता खुश हो जाते(आपके लिए भी फोटो दे रखी है, आए हाय देखिये तो कित्ता क्यूट लग रहा है)। पर हमारी बायोलोजी टीचर को जाने क्या खुन्नस थी...होमवर्क में सब कुछ बनवाती थी, अमीबा छोड़ कर। धरती पर वाकई अच्छे लोगो की बड़ी कमी है। वो...

वो लिखना चाहती है बहुत सारा कुछ, क्यों या किसके लिए ये मालूम नहीं...शायद आने वाली पीढ़ियों के लिए, शायद सिर्फ़ तुम्हारे लिए...तुमसे उसकी जिंदगी शुरू होती है और तुम पर ही आकर ख़त्म हो जाती है।
वो एक अजीब सी लड़की है, जिसे कविता लिखना पसंद है, सूर्यास्त देखना अच्छा लगता है, और किसी ऊँची पहाडी पर खड़े होकर बादलों को देखना भी।
वो लिखना चाहती है उन सारे दिनों के बारे में जब शब्द ख़त्म हो जाते हैं उसके पास से, जब वह बड़ी मुश्किल से तुम्हारी आंखों में तलाशती है जाने किन किन बिम्बों को...और उसे पूरा जहाँ नज़र आता है क्यों आता है ये भी मालूम नहीं।
उसे लिखना ही क्यों चाहिए कौन है जो उसका लिखा पढ़ेगा, वक्त की बर्बादी क्यों करना चाहती है वो. पर फ़िर भी वो लिखती है, इतना लिखती है कि एक दिन उसके सारे कागज ख़तम हो जाते हैं, कलमें टूट जाती हैं, दवात में स्याही नहीं बचती। उसे फ़िर भी लिखना होता है...वह आकाश बिछा कर लिखती रहती है, वो कहानियाँ जो कोई भी नहीं सुनता।
वो लिखती रहती है उन खामोश रातों के बारे में जब उसे अपनी माँ की बहुत याद आती है और उसकी आत्मा चीख उठती है...पर कोई आवाज नहीं आती। वह अपनी माँ को पुकारती रहती है और ये पुकार खामोशी से उसके शरीर के हर पोर से टकरा कर वापस लौटती रहती है। इतने सारे शब्द उसे अन्दर से बिल्कुल खोखला कर देते हैं और इन दरारों में दर्द आके बस जाता है।
वो लिखती रहती है जिंदगी के उन पन्नो के बारे में जो अब धुल कर कोरे हो गए हैं, जिनमें अब कोई याद नहीं है। एक बचपन जो माँ के साथ ही गुजर गया...कुछ सड़कें जो दिल्ली में ही छूट गयीं...कुछ चेहरे जो अब तस्वीरों में भी नहीं मुस्कुराते हैं।
वो लिखती रहती है चिट्ठियां जो कभी किसी लाल बक्से में नहीं गिरेंगी, खरीदती रहती है तोहफे जो कभी भेज नहीं सकती...इंतज़ार करती है राखी पर उस भाई का जिसका एक्साम चल रहा है और आ नहीं सकता। शब्द कभी मरहम होते हैं, कभी जख्म...तो कभी श्रोता भी।
वो लिखना चाहती है नशे के बारे में...पर उसने कभी शराब नहीं पी, वो चाहती है उस हद तक बहके जब उसे मालूम न हो की वो कितना रो रही है...शायद लोग ध्यान न दें क्योंकि नशे में होने का बहाना हो उसके पास। पर उसे कभी ऐसा करने की हिम्मत नहीं होती। वो चाहती है की सिगरेट दर सिगरेट धुएं में गुम होती जाए पर नहीं कर पाती।
वो चाहती है कि उसे कोई ऐसी बीमारी हो जाए जिसका कोई इलाज न हो...वो जीना ऐसे चाहती है जैसे कि मालूम हो कि मौत कुछ ही कदम दूर खड़ी है...और उससे चोर सिपाही खेल रही हो।
वो एक लड़की है...सब उससे पूछते हैं कि उसे इतनी शिकायत क्यों है, किससे है। क्यों है? शायद इसलिए कि वो लड़की है...सिर्फ़ इसलिए। और सबसे है...उन सबसे जो कभी न कभी किसी न किसी रूप में उसकी जिंदगी का हिस्सा बने थे।
उसे शिकायत है उस इश्वर से...और वह रोज उनके खिलाफ फरमान निकलना चाहती है...क्योंकि वह अपना विश्वास ऐसे खो चुकी है कि डर में भी उसे इश्वर याद नहीं आता।
उसका लिखना किसी कारण से नहीं हो सकता...किसी बंधन में नहीं बंध सकता.
वो लिखती है क्योंकि जिन्दा है...और वो जिन्दा है क्योंकि तुम हो।
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जिन्दा होने की गफलत लिए फिरते हैं
मौत आई हमें पता भी ना चला...
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खून में उँगलियाँ डुबोयीं हैं
लोग कहते है शायरी की है...
28 March, 2009
यूँ ही

मैं तुम्हें बताना चाहती हूँ बहुत सारा कुछ
इसलिए नहीं कि तुम्हें मालूम नहीं है
इसलिए भी नहीं कि
मुझे यकीन हो कि मेरे बताने से तुम भूलोगे नहीं
शायद सिर्फ़ इसलिए
कि किसी दिन झगड़ा करते हुए
तुम ये न कहो कि तुम्हें मैंने बताया नहीं था
झगड़े भी अजीब होते हैं यार
कभी एक किलो झगड़ा, कभी आधा क्विंटल
तुम जानते हो
कभी कभी मेरा मन करता है
कि मेरी आँखें नीली होती
या हरी, भूरी या किसी भी और रंग की होती
लेकिन तुम्हें काली आँखें पसंद है न?
कुछ उँगलियों पर गिनी फिल्में हैं
जो तुम्हारे साथ बैठ कर देख लेना चाहती हूँ
इसलिए नहीं कि मैंने देखी नहीं है
बस एक बार तुम्हारे साथ देखने भर के लिए
गॉन विथ थे विंड मैंने जब पहली बार देखी थी
मुझे पहले से मालूम था कि अंत क्या होने वाला है
मैं फ़िर भी बहुत देर तक रोती रही थी
वो अकेलापन जैसे मेरे अन्दर गहरे उतर गया था
शायद तुम्हारे साथ देखूं...तो वो जमा हुआ अकेलापन पिघल जाए
तुम्हें हमेशा rhett butler से compare जो करती हूँ
शायद मैं कोई आश्वाशन चाहती हूँ
कि तुम मुझे छोड़ कर नहीं जाओगे कभी...
डर सा लगता है
जब सूनी सड़कों पर गाड़ी उड़ाती चलती हूँ
या दसमहले से एकटक नीचे देखती रहती हूँ
या खामोश सी सब्जी काटती रहती हूँ
कभी कभी तो गैस जलाते हुए भी
मौत की वजहें कहाँ होती हैं
वो तो हम ढूंढते रहते हैं
ताकि अपनेआप को दोषी ठहरा सकें
कि हम रोक सकते थे कुछ...हमारी गलती थी
किसी से बहुत प्यार करो
तो खोने का डर अपनेआप आ जाता है
क्या जिंदगी के साथ भी ऐसा ही होता है?
25 March, 2009
बिखरे लफ्ज़
20 March, 2009
संदूक

18 March, 2009
भैंस पड़ी पगुराय

आज हम एक लुप्तप्राय प्रजाति की बात करेंगे...यह प्रजाति है दूधवाला और भैंस, न न भैंस लुप्त नहीं हो रही है वो तो लालू यादव जी की कृपा से दूधो नहाओ पूतो फलो की तरह दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रही है। मैं तो बस इनके आंखों से ओझल होने की बात कह रही हूँ। और ये ख्याल मुझे कल इंडियन क्रिकेट टीम को शेर बचाओ आन्दोलन देख कर आया...भाई क्या जमाना आ गया है, एक टाइम होता था लोग शेर को देख कर बचाओ बचाओ करते थे...और एक आज का दिन हैकी शेर के पंजों के निशान देख कर दिल बहलाना पड़ता है।
उफ़ ये बड़ी खराबी बनती जा रही है मेरी...आजकल दिन रात बसंती हवा की तरह मनमौजी हुयी जा रही हूँ, बात कर रही थी भैंस की और आ गई शेर तक...अब भला इन का आपस में क्या सम्बन्ध।
कहानी पर लौटते हैं...मैं पढ़ी लिखी(कितना और कैसे आप तो जानते ही हैं) और बड़ी हुयी बिहार और झारखण्ड में(यार ये नेता कुछ से कुछ खुराफात करते रहते हैं, सोचो तो हमें कितनी मुश्किल होती है बचपन की यादें भी दो राज्यों में बातिन हुयी...उफ़, पर इनकी कहानी फ़िर कभी)। हमारे यहाँ एक स्थायी चरित्र होता था दूधवाले का, जो यदा कदा अपनी भैंस(या गाय) के साथ पाया जाता था। इस दूधवाले के किस्से कितनी भी नीरस गप्पों को रंगीन बना देते थे।
मुझे मालूम नहीं बाकी देश का क्या हाल है, पर हमारे यहाँ इनसे हमेशा पाला पड़ता रहता था। दूधवाला मानव की एक ऐसी प्रजाति है जिसके सारे लक्षण पूरे राज्य में एक जैसे थे...जैसा कि मैंने पहले कहा है देश का मुझे मालूम नहीं। किस्स्गोई में तो ये प्रजाति प्रेमचंद को किसी भी दिन किसी शास्त्रार्थ में धूल चटा सकती थी...या ये कहना बेहतर होगा की छठी का दूध याद दिला सकती थी।देवघर में मेरे यहाँ एक दूधवाला आता था...बुच्चन, बड़ी बड़ी मूंछें और रंग में तो अपनी भैंस के साथ खरा कोम्पीटिशन कर सकता था...काला भुच्च, दूध के बर्तन में दूध ढारता था तो गजब का कंट्रास्ट उत्पन्न होता था। बुच्चन कभी भी नागा कर जाता था, और हम दोनों भाई बहन खुश कि आज दूध पीने से बचे और बुच्चन के बहाने...भाई वाह। साइकिल पंचर होने से लेकर, बीवी के बाल्टी न धोने के कारण हमारा दूध नागा हो सकता था। फ़िर उसके गाँव में तीज त्यौहार होते थे जिसमें उसकी मेहरारू सब दूध बेच देती थी और फ़िर हम बच्चे खुश। बच्चन सिर्फ़ इतवार को नागा नहीं कर सकता था, जितने साल रामायण और फ़िर महाभारत चलती थी, बुच्चन भले टाइम से आधा घंटा पहले आ जाए पर एक मिनट भी देर से नहीं आ सकता था। और ऐसा कई बार हुआ है कि बुच्चन बिना दूध के आ गया हो और मम्मी उसकी कभी कुछ नहीं बोलती थी, कि टीवी देखने आया है bechara। सारे समय उसके हाथ जुड़े ही रहते थे।
माँ कभी कभी बाद में कहती थी, बुच्चन खाली भगवन के सामने हाथ जोड़ लेते हो और फ़िर दूध में वही पानी...बुच्चन दोनों कान पकड़ कर जीभ निकाल कर, आँखें बंद कर ऐसी मुद्रा बनता कि हम हँसते हँसते लोट पोट हो जाते...उसके बहने भी पेटेंट बहाने थे, मैंने फ़िर कभी कहीं भी नहीं सुने।
- दीदी आज भैन्स्वा पोखरवा में जा के बैठ गई थी...बहुत्ते देर बैठे रही, हमार बचवा अभी छोट है, ओकरा निकला नहीं वहां से, पानी में रही ना...इसीलिए दूध पतला होई गवा। माई के किरिया दीदी हम पानी नहीं मिलाए हैं. और मम्मी डांट देती उसे, झूठे का माई का किरिया मत खाओ.
- बरसा पानी में दूध दुहे न दीदी, इसी लिए दूध पतला होई गवा...हमरे तरफ बहुत्ते पानी पड़ रहा है। बच्चन का गाँव वैसे तो हमारे शहर से कोई दो तीन किलोमीटर दूर था, पर वहां का मौसम जो बुच्चन बताता था उसके हिसाब से चेरापूंजी से कुछ ही कम बारिश होती थी वहां)
- मेहरारू कुछ दर देले दीदी, हमरा नहीं मालूम कि दूध ऐसे पतला कैसे होई गवा। आज ओकर भाई सब आइल हैं, सब दूध उधरे दे देइल. हम का करीं दीदी ऊ बद्दी बदमास हैखन.
हम पटना आए तो बहुत जोर का नकली दूध का हल्ला उठा हुआ था यूरिया का दूध मिल रहा है मार्केट में ऐसी खबरें रोज सुनते थे, कुछ दिन तक तो घर में दूध आना बंद रहा, पर बिना दूध के कब तक रहे. तो बड़ा खोजबीन के एक दूधवाला तय किया गया. वह रोज शाम को हमारे घर भैंस लेकर आता था और दूध देता था.
हमारे घर में फ्री का नल का पानी वह पूरी दिलदारी से भैंस पर उडेलता था...भैंस को भी हमारा घर सुलभ शौचालय की याद दिलाता था जाने क्या...रोज गोबर कर देती थी, उसपर रोज दूधवाला उसे नहलाता...बहुत जल्दी हमारे घर के आगे का खूबसूरत लॉन खटाल जैसा महकने लगा उसपर मच्छर भी देश कि जनसँख्या के सामान बिना रोक टोक के बढ़ने लगे।
फिर दूधवाले का टाइम बदल दिया गया और उसे सख्त हिदायत दी गयी कि भैंस को नहला के लाया करे, उसके बाद दूधवाला चाहे नहाये या नहीं, भैंस एकदम चकाचक रहती थी. मैंने अपनी जिंदगी में फिर उसकी भैंस से ज्यादा साफ़ सुथरी भैंस नहीं देखी.
लेकिन दूधवाले ने हमारे नल के पानी का इस्तेमाल करना नहीं छोड़ा...ये और बात थी कि अब वो पानी भैंस के ऊपर न बहा के दूध की बाल्टी में डाल देता था। वह हमें दूध देने के पहले पानी न मिला दे, इसलिए हम बिल्डिंग के लोग पहरा देते थे...इसी बहाने हमें खेलने और गपियाने का एक आध घंटा और मिल जाता था.
जिसने इस महात्म्य को देखा है वही जानता है, भैंस और दूधवाले की महिमा अपरम्पार है :)
कहानियों का अम्बार है, भैंस का कालापन बरक़रार है...बस इतना इस बार है :)
बाकी फिर कभी.
17 March, 2009
अजन्मी कविता

कविता तो अजन्मी होती है
मर ही नहीं सकती...
जो लोग कह रहे हैं की कविता मर चुकी है
छलावे में रह रहे हैं
जब तक स्त्री के ह्रदय में स्पंदन है
जीवित है कई अजन्मी कवितायेँ
साँसों के राग में...दिन-रात, सोते जागते
अपने पति के माथे पर थपकियाँ देते
हाथों के ताल में उठते गिरते
होठों पर किसी पुराने गीत की तरह
कविता जी उठती है हर सुबह
अल्पना के घुमावदार रास्तों में
पैरों में रचाई महावर में
त्योहारों में अतिथियों के कलरव में
गोसाईंघर में आरती करती दादी के कंठ में
आँगन में छुआ छुई खेलती बेटी की किलकारी में
सांझ देते तुलसी चौरा के दिये की लौ में
गोधूली में घर लौटती गायों की घंटियों में
चूल्हे में ताव देती माँ की चूड़ियों की खनक में
कुएं से बाल्टी खींचती दीदी के हाथों की फुर्ती में
सिलबट्टे पर मसाला पीसती चाची के माथे पर झूलती लटों में
लिपे हुए आंगन के अर्धचन्द्राकार pattern में
मैं स्त्री हूँ
जो भी मैंने छुआ, देखा, जिया
कविता बन जाता है
कविता को शब्दों की बैसाखियों की जरूरत नहीं
हर स्त्री अपनेआप में होती है एक कविता
सिर्फ़ अपने होने से...
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मेरी पिछली पोस्ट पर डॉक्टर अनुराग की टिप्पनी आई:
"कुश पहले की कहता है की हिंदी ब्लॉग अन्दर के कवि को धीरे धीरे मार देता है आपको ख़त्म किया देखिये पूजा की कविता को भी कर रहा है........क्या सचमुच ??????जवाब स्पीड पोस्ट से दीजियेगा ..."
डॉक्टर अनुराग...ये मेरा जवाब है :) उम्मीद है आपको पसंद आएगा.
16 March, 2009
नाम में बहुत कुछ रखा है भाई :)
आप कहेंगे ये तो नेताओं का गुण भी है...पर थाली के बैगन और बेपेंदी के लोटे से इतर भी एक प्रजाति होती है...ये प्रजाति मुझ जैसे कुछ लोगो की होती है। खैर छोड़िये एक छोटी कहानी सुनिए ...
एक लड़के को एक बार एक पुराना चिराग मिल गया...उसने जैसे ही चिराग को घिसा उसमें से एक जिन्न निकला। लड़का खुश...क्यों न हो गरीब तो होगा ही, आज तक किसी दंतकथा में आपने किसी रईस को चिराग मिलते सुना है, नहीं न? अब जिन्न ने कहा हुक्म दो मालिक...लड़का खुश, फटाफट खाना मंगवाया, जिन्न के लिए ये कौन सा मुश्किल का काम था फ़ौरन ले आया...लड़के ने खाना खाया। जिन्न ने फ़िर पूछा हुक्म दो मालिक...लड़के ने एक महल की फरमाइश की, फटाफट जिन्न ने महल भी तैयार कर दिया महल में खूब सारे नौकर चाकर और अच्छे कपड़े खाना पीना सब था। बस लड़के को और कुछ तो चाहिए नहीं था, उसने अपने घरवालों को महल में बुलवा लिया और पसंद की लड़की से शादी कर ली।
पर मुसीबत जिन्न था...उसने कहा की अगर लड़के ने उसे काम नहीं दिया तो वह उसे खा जायेगा...अब लड़का बड़ी जोर से घबराया...उसे कोई हल ही नहीं सूझ रहा था जिन्न की समस्या से छुटकारा पाने का। उसने सबसे पूछा पर वो कोई भी काम दे जिन्न तुंरत उसे पूरा कर देता था और फ़िर सर पे स्वर हो जाता था की काम दो मालिक। आख़िर में उसकी बीवी अपने भतीजे को लेकर आई जो कुछेक साल का था...जिन्न ने फ़िर सवाल किया। बच्चे ने कहा मुझे एक अंगूठी चाहिए...जिन्न ने तुंरत हाजिर कर दी, फ़िर बच्चा बोला मुझे एक हाथी चाहिए, वो भी जिन्न ने तुंरत हाजिर कर दिया...अब बच्चा बोला इस हाथी को अंगूठी में से घुसा के निकालो जिन्न बेचारा परेशां, कितना भी कुछ और देने का प्रलोभन दिया बच्चा माने ही न, एकदम पीछे पड़ गया रो रो के जिन्न का दिमाग ख़राब कर दिया की हाथी को बोलो अंगूठी में से घुस कर निकले।
जिन्न को कुछ नहीं सूझा तो लड़के के पास गया की मैं हार गया इस बच्चे का काम मैं पूरा नहीं कर सका, मैं क्या करूँ। लड़के ने कहा की तुम वापस चिराग में चले जाओ। इस तरह लड़के को जिन्न से छुटकारा मिल गया। :) कहानी ख़तम, ताली बजाओ।
तो मैं कविता लिख कर और गद्य लिख कर बोर हो गई थी, ब्रेक ले कर भी क्या करती...और बोर होती मैंने सोचा कुछ और काम करती हूँ...मुझे मेरे मित्र टेक्निकली चैलेन्ज्ड बोलते हैं जरा सा लैपटॉप पे कुछ इधर उधर हुआ की मेरी साँस अटक जाती है। हालाँकि कभी कभार मैं अपने इस फोबिया से उभरने की कोशिश करती हूँ।कल पूरी दोपहर मैंने यही किया। वैसे तो आप अक्लमंद लोग इसे मगजमारी कह सकते हैं पर हम इसे अपने लिए मैदान मारना और किला फतह करने से कम नहीं समझते हैं।मेरा ब्लॉग खोलने पर आप देखेंगे की ब्लॉग url के पहले P लिखा हुआ है, इसे favicon कहते हैं. जीमेल का लिफाफा, या गूगल का g और कई साइट्स पर अक्सर छोटी फोटो भी नज़र आती है. इसे personalisation या ब्रांडिंग का एक हिस्सा कह सकते हैं. चिट्ठाजगत का लोगो न सिर्फ ब्लॉग के नाम में बल्कि favicon में भी नज़र आता है.
वेबसाईट की पहचान me कई एलेमेंट्स का योगदान होता है, इसमें सबसे महत्वपूर्ण होता है उसका पता, यानि कि वेब एड्रेस. हम इसलिए ब्लॉग के कई अलग अलग से एड्रेस देखते हैं...ये एड्रेस या तो वेब पोर्टल की सामग्री से जुड़ा हुआ होता है जैसे की चिट्ठाजगत या फिर अगर कला से जुड़ा कोई ब्लॉग है तो कोई रोचक नाम होता है जो उसे अलग पहचान देता है. इसी अलग पहचान की कड़ी है favicon. यह एक ऐसा चित्र या अक्षर होता है जिसे लोग ब्लॉग से जोड़ कर देख सकें और याद रख सकें.
मैंने अपना favicon बनाने में हिंदी ब्लॉग टिप्स की मदद ली, आशीष खंडेलवाल जी ने एक बेहद आसान और पॉइंट by पॉइंट अंदाज में favicon बनाया क्या नामक पोस्ट में बताया है. इसके अलावा थोडा गूगल सर्च भी मारना पड़ा...दिन भर माथापच्ची की पर आखिरकार मैंने अपना favicon बना ही लिया.
मेरा आइकन P है...यह मेरे नाम का पहला लैटर भी है और इंग्लिश में कवितायेँ पोएम ही कहलाती हैं इसलिए भी. मुझे P इसलिए भी अच्छा लगता है की यह इसके हिंदी अक्षर प जैसा ही लगता है. shakespear ने गलत कहा था कि नाम में क्या रखा है...हमें तो बहुत कुछ रखा मिलता है भाई :)
एक बात और, किसी को चिढ़ाने वाला smiley ऐसा ही होता है न :P
14 March, 2009
मेरा पुराना बचपन :)
याद आते हैं वो फोकट में मुस्कुराने के दिन
दिन भर बाहर खेलने वाले बहाने के दिन
याद आती है वो राखी पर मिली टाफियां
और उसे सबको दिखा कर चिढ़ाने के दिन
वो तितिलियों से दोस्ती वो चिड़ियों सा गाना
पिल्लों और बिल्लियों से याराने के दिन
बारिशों में दिन भर सड़कों पे खेलना वो
वो शाम को मम्मी से डांट खाने के दिन
कित कित की गोटियाँ थी सबसे बड़ा खजाना
जमीं में गाड़ कर भाइयों से छुपाने के दिन
चिनियाबदाम में खुश हो जाने वाले लम्हे
कुल्फी के लिए रोज मचल जाने के दिन
तस्वीरों सा धुंधला है बचपन का वो मौसम
उफ़ वो बेफिकर उठने और सो जाने के दिन
नोट: फोटो में मैं अपने छोटे भाइयों के साथ हूँ। clockwise मैं चंदन, जिमी और कुंदन हैं। (कुणाल कहता है की मैं सबमें सबसे ज्यादा बदमाश लगती हूँ)
13 March, 2009
और भी गम हैं ज़माने में ब्लॉग्गिंग के सिवा...
मिजाज प्रसन्न है तो हमने सोचा क्यों न ये ही लिख दिया जाए की ब्लॉग पोस्ट लिखी कैसे जाती है...तो भैय्या मैं नोर्मल ब्लॉग पोस्ट की बात कर रही हूँ, मेरी इस वाली जैसे पोस्ट की नहीं की भांग चढ़े और कुर्सी टेबल सेट करके लैपटॉप पर सेट हो गए...कि जो लिखाये सो लिखाये डिस्क्लेमर तो पहले ही लगा दिए हैं। क्या चिंता क्या फिकर...
आजकल ब्लॉग पर भी बड़ा सोच समझ के लिखना पड़ता है...क्या पता पुलिस पकड़ के ले जाए, वैसे भी आजकल पुलिस को ऐसे निठल्ले कामों में ही मन लगता है...मैं तो सोच रही हूँ पुलिस वालो को ब्लॉग्गिंग का चस्का लगवा दिया जाए, एक ही बार में मुसीबत से छुटकारा मिल जायेगा। तो आजकल डर के मारे ब्लोग्स के ज्यादा आचार संहिता पढ़ती हूँ, सोचा तो था की लॉ कर लूँ पर शायद कोई फरमान आया है की २५ साल से कम वाले ही admission ले पायेंगे(इस ख़बर की मैंने पुष्टि नहीं की है) "शायद" लिखने से या फ़िर "मैं ऐसा सोचती हूँ" लिखने से आप कई मुसीबतों से बच जाते हैं इसलिए मैं इनका धड़ल्ले से इस्तेमाल करती हूँ। वैसे तो मेरी सारी मुसीबत इस मुए ब्लॉग की वजह से है और इस बीमारी का कोई इलाज मिल नहीं पाया है अब तक तो खुन्नस में सारी पोस्ट्स ब्लॉग पर ही लिखे जा रही हूँ।
अब इस सोच समझ के लिखने वाली पहली शर्त के कारण हम जैसे लोगों का जो हाल होता है वो क्या बताएं...कविता लिखने से बड़ी प्रॉब्लम कुछ है ही नहीं...अब मैं लिखूंगी कि आजकल धूप कम निकलती है मेरे आँगन में और सोलर पैनल वाले आ जाएँ झगड़ा करने कि मैडम आपलोगो को सोलर एनर्जी इस्तेमाल करने से रोक रही हो। अब लो, अर्थ का अनर्थ, बात का बतंगड़। या फ़िर मैं लिखूं कि आजकल रोज आसमान गहरा लाल हो जाता है और बीजेपी वाले चढ़ जाएँ त्रिशूल लेकर कि आप गहरा लाल कैसे लिख रही हैं आसमान तो केसरिया होता है, आप ऐसे कवितायेँ करके कम्युनिस्टोंको खुल्लेआम सपोर्ट नहीं कर सकती। कविता में से तो कुछ भी अर्थ निकले जा सकते हैं, अब आप चाहे कुछ भी समझाने कि कोशिश कर लो...मुसीबत आपके सर ही आएगी। और हम ठहरे छोटे से ब्लॉगर कम से कम जर्नलिस्ट भी होते तो कुछ तो धमकी दे सकते थे।
अब इतना सोच समझ के कविता किए तब तो हो गया लिखना...भाई कविता लिखने का तरीका है कि बस धुंआधार कीबोर्ड पर उँगलियाँ पटके जाओ, थोड़ी थोड़ी देर में इंटर मार दो...बस हो गई कविता। अब सोचे लगे तो थीसिस न कर लें जो कविता लिख के मगजमारी कर रहे हैं। हमारा तो कविता लिखने का स्टाइल चौकस है, हम तो बस चाँद, बादल, प्यार, बारिश या फ़िर दिल्ली पर लिखेंगे इससे ज्यादा हमसे मेहनत मत करवाओ जी...कभी कभी बड़े बुजुर्गों का आदेश हो तो कुछ और पर भी लिख लेते हैं, जैसे देखिये शिव जी के गुझिया सम्मलेन में हमने गुझिया पर कविता लिखी।
कवियों को कहीं भी ज्यादा भाव नहीं दिया जाता, उसपर कोई भी टांग खींच लेता है, लंगडी मार देता है...कवि का जीवन बड़ा दुखभरा होता है उसपर ऐसा कवि जो ब्लॉगर हो...उसे तो जीतेजी नरक झेलना पड़ता है जी, अपनी आपबीती है, कितना दुखड़ा रोयें, वैसे भी और भी गम है ज़माने में ब्लोग्गिन के सिवा।
समाज के बारे में पता नहीं लोग कैसे इतना लिख लेते हैं, हमारे तो कुछ खास पल्ले नहीं पड़ता...अब पिछली पोस्ट लिखी थी कि भैय्या हमें अपना देश बिराना लग रहा है...कोई योगेश गुलाटी जी आकर कह गए कि एक बार फ़िर विचार कीजिये, देश पराया हो गया है कि आपकी सोच विदेशी हो गई है? डायन, आधुनिक लड़कियां, छोटे कपड़े, जाने क्या क्या कह गए जिनका पोस्ट से कोई सम्बन्ध नहीं था...कहना ही था तो शिष्टाचार तो बरता ही जा सकता था चिल्लाने की क्या जरूरत थी...इन्टरनेट पर रोमन में कैपिटल लेटर्स में लिखना चिल्लाना माना जाता है. इतना लम्बा कमेन्ट वो भी मूल मुद्दे से इतर, भई इससे अच्छा आप पोस्ट ही लिख देते अपने ब्लॉग पर...मेरे कमेन्ट स्पेस को पब्लिक प्रोपर्टी समझ कर इस्तेमाल करने की क्या जरूरत थी. मेरे होली पर जो विचार थे मैंने लिखे आप असहमत थे आप लिखते, बाकी चीज़ें क्यों लपेट दी?
तो समाज के प्रति लिखने का ठेका कुछ लोगो ने ले रखा है, जिनका अपने ब्लॉग पर लिखने से मन नहीं भरता तो दूसरो के कमेन्ट स्पेस भरते चलते हैं...वैसे मेरा पाला इन लोगो से कम ही पड़ा है. कह तो देती की इनसे भगवान बचाए पर भगवान ने इनसे बचने का सॉफ्टवेर अभी तक इजाद नहीं किया है, शायद कुछ दिन बाद ऐसी अर्जियां वहां एक्सेप्ट होने लगें. तब तक इनको झेलना तो हमारी मजबूरी है.
हम वापस आ कर कविता पर ही टिक जाते हैं...इसपर हमें गरियाया जाए तो क्या कर सकते हैं.
ये वाली पोस्ट हमारी रिसर्च का hypothesis है आगे आगे देखें क्या नतीजा निकलता है।
12 March, 2009
रहना नहीं देश बिराना रे...
आज अखबार देख कर मन कसैला हो गया, मालपुओं की सारी मिठास ख़त्म हो गई। क्या हम एक ही भारत में रहते हैं? बंगलोर में भगवान महावीर कॉलेज के छात्रों की पुलिस ने डंडो से खूब पिटाई की और फ़िर थाने भी लेकर गए...उनका जुर्म(?), वो होली खेल रहे थे। वहीँ आरवी इंजीनियरिंग कॉलेज में वार्डेन ने होली खेलने वाले छात्रों को हॉस्टल से बाहर निकाल दिया और फ़िर कॉलेज के गेट भी बंद कर दिए गए।छात्रों का कहना है कि पुलिस उन्हें रंग खेलने से मना कर रही थी और उनके घर भेजना चाह रही थी, पुलिस ने उनके साथ बदतमीजी भी की...हालाँकि छात्रों को कुछ देर पुलिस थाने में रखने के बाद छोड़ दिया गया।
समझ नहीं आता कि ये पढ़ कर गुस्सा होऊं, दुखी होऊं या फ़िर मैं भी कुछ महसूस करना बंद कर दूँ...
एक वक्त होता था जब स्कूल में जम कर होली खेली जाती थी और होली के हुडदंग में ये बिल्कुल नहीं देखा जाता था कि जिसपर रंग डाल रहे हैं वो किस धर्म का है, या किस जगह का रहने वाला है। हमें याद है कि हम होली खेलते थे तो हमारा यही मानना होता था कि होली सबके लिए है। देवघर में पापा के दोस्त थे, मुकीम अंकल वो तो हर बार होली पर हमारे घर भी आते थे, और हम भी उनके घर जाते थे...उनके बच्चे मुहल्ले के बाकी बच्चों के साथ मिलकर लाल हरे पीले हुए रहते थे। मुझे याद है मुकीम अंकल कहते थे कि बच्चे जब पूछेंगे कि हम होली क्यों नहीं खेल सकते तो क्या जवाब देंगे? कि तुम अलग हो, कि तुम मुसलमान हो...ऐसा तो नहीं कर सकते न सर। हमारे टीचर्स साउथ इंडियन थे पर वो भी हमारे साथ होली खेलने में शरीक होते थे।
होली के दिन किसी को भी रंग लगाने की इजाजत होती थी, चाहे वो पड़ोसी हों, राह चलते लोग हों, दूधवाले भैय्या हो, या उनकी भैंस हो ;) हालाँकि भैंस कि काली कमरिया पर दूजा रंग नहीं चढ़ता था। होली के दिन रंग भरी बाल्टी और पिचकारी लेकर हम रोड पर खड़े रहते थे और हर आने जाने वाले को रंगते थे। दस बजते बजते मम्मी लोग का किचेन में खाना बनाना बंद और टोली निकल पड़ती थी, कितना हल्ला होता था। लोगो को जबरदस्ती घर से निकाल निकाल के रंगा जाता था।
एक वो दिन था और एक आज का दिन है...कल होली आई और चली गई, पता भी नहीं चला...कोई भी नहीं आया रंग खेलने, कई जगह तो ऑफिस में छुट्टी भी नहीं थी...और मुझे लगता था कि होली पूरे भारत में खेलने वाला पर्व है। पर क्या पूरा भारत जैसी कोई जगह है भी? क्या हम सब अपने अपने प्रान्त में नहीं सिमट गए हैं?
कभी मुंबई में हल्ला होता है कि बिहारी लोग छठ मनाते हैं, और आज बंगलोर में हल्ला हो रहा है होली मनाने पर। और हल्ला क्या बाकायदा पुलिस ने होली खेलने नहीं दिया...शक्ति का ग़लत प्रयोग इसी को कहते हैं। और किसी भी बड़े अखबार में इसकी ख़बर तक नहीं छपी है...हम किस मुंह से एकता और भाईचारे की बात करते हैं
असहिष्णुता इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि हम अपने से अलग कुछ भी बर्दाश्त ही नहीं कर पाते...चाहे वो धर्म हो, मान्यताएं हो, त्यौहार हों, या फ़िर जीने का ढंग हो। ये क्यों भूल जाते हैं हम कि हम एक स्वतंत्र देश के नागरिक हैं और ये चुनने की आजादी हर एक का मौलिक अधिकार है।
होली तो सारे भेद भाव मिटाने का त्यौहार है, जिसमें सब रंग जाते हैं, कोई छोटा बड़ा नहीं, कोई जात पांत नहीं...कम से कम इस त्यौहार को तो प्यार से खेलने दिया जाए। वैलेंटाइन डे अच्छे से मनाया जा सके इसलिए ये पुलिस तैनात रहती है ताकि कोई भी परेशान न करने पाए, और हमारा अपना त्यौहार होली जो प्यार और मेलजोल का प्रतीक है, उसी में रंग में भंग डालने पुलिस पहुँच जाती है...ये कौन सा भेद भाव है?
मुझे बंगलोर बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता...अपने ही देश में पराये हो गए लगते हैं, कहाँ तो लोग विदेशों में रह कर होली मना लेते हैं...और कहाँ अपने ही देश में लोगो की पिटाई के बारे में अखबार में पढ़ रही हूँ...
रहना नहीं देश बिराना रे...
09 March, 2009
काश मेरे पास रिवोल्वर होता
ये वो वक्त था जब मैंने कॉलेज जाना शुरू किया था, और हमारे कॉलेज में चूँकि ड्रेस कोड था तो सिर्फ़ सलवार कुरता पहन कर ही जा सकती थी...उस वक्त कई बार हुआ था कि किसी लड़के ने दूर तक पीछा किया हो, और डर ये लगता था कि अगर किसी ने देखा तो मुझे डांट पड़ेगी। दुपट्टे को बिल्कुल ठीक से लेती थी अपने आप को पूरी तरह ढक के चलती थी, और उस वक्त बिल्कुल सिंपल कपड़े पहनती थी वो भी हलके रंगों में...फ़िर भी ऐसा कई बार होता था। पटना में ऑटो रिजर्व करके नहीं चलते, एक ऑटो में तीन या चार लोग बैठते हैं। कई बार लगता था कि बगल में बैठा लड़का जान कर कुहनी मार रहा है, मगर सड़कें ख़राब होती थीं तो कुछ कह भी नहीं सकते थे।
घर से कॉलेज कोई तीन किलोमीटर था और लगभग १० मिनट लगता था जाने में, पर वो दस मिनट इतनी जुगुप्सा में बीतते थे...वाकई घिन आती थी और लगता था कि काश मैं स्टील के या ऐसे ही कुछ कपड़े पहनती या बीच में एक पार्टीशन रहता। ऑटो में हमेशा देख कर बैठते, ये हम सब लड़कियों को अपने अनुभव और seniors में मिले नसीहतों के कारण पता था कि अधेड़ उम्र के पुरुषों के साथ बिल्कुल नहीं जाना है ऑटो में। उनका लिजलिजा स्पर्श ऐसी वितृष्णा भर देता था कि पहले period ठीक से पढ़ाई नहीं हो पाती थी। मम्मी ने कहा था कि जब भी असहज हो उतर जाऊं...और मैं ऐसा ही करती थी। लेकिन कई बार होता था कि लगता था कि कहीं हमें ही शक तो नहीं हो रहा...या फ़िर लेट हो रहा रहता था...कोई भी लड़का ये सोच भी नहीं सकता है कि ऐसी स्थिति में लड़की की क्या हालत होती है, मेरी तो साँस रुकी रहती थी, जितना हो सके अपनेआप में सिमट के बैठती थी।
वापस घर लौटते वक्त वही बेधती निगाहें, चौराहे पर खड़े लफंगे जाने आपस में क्या कहते हुए, बस सर झुका कर नज़र नीचे रखते हुए जितने तेजी से हो सके गुजर जाती थी वहां से...फ़िर भी लगता था वो नजरें पीछा कर रही हैं। और ऐसा एक दो दिन नहीं पूरे तीन साल झेला मैंने...और मैंने ही नहीं हर लड़की ने झेला था...हम सब का गुस्सा एक था और इस गुस्से को बाहर करने कि कोई राह नहीं।
मैं एक बार ऐसे ही बोरिंग रोड के पास अपने प्रोजेक्ट के लिए कुछ सामान ले रही थी, एक दुकान से दूसरी जाते हुए एक आदमी साइकिल से मेरे पीछे से कुछ बोलते हुए गुजरा, मैंने नजरअंदाज कर दिया सामान लेकर वापस आई तो वही आदमी फ़िर कुछ बोलते हुए निकला...मैं आगे बढ़ी थी वो फ़िर आगे से आता दिखा...उस दिन शायद मेरा गुस्सा मेरे बस में नहीं रहा, मेरे हाथ में एक पोलीथिन बैग था जिसमे छाता और बहुत सा सामान था जो मैंने ख़रीदा था॥मैंने पोलीथिन से खीच कर मारा था उसे बहुत जोर से, सीधे मुंह पर...उसका साइकिल का करियर पकड़ लिया और जितनी गालियाँ आती थी बकनी शुरू कर दी, सोच लिया था की आज इसका मार मार के वो हाल करुँगी की किसी लड़की को छेड़ने में इसकी रूह कांपेगी...चाहे मुझे पुलिस के पास जाना पड़े, परवाह नहीं। मैंने उसे तीन चार बार मारा होगा उसी पोलीथिन से और जोरो से गुस्से में चिल्लाये जा रही थी पर आश्चर्य जनक रूप से कहीं से कोई भी कुछ कहने नहीं आया...वो आदमी आखिर साइकिल छुड़ा के भाग गया।
मैंने ऑटो लिया और सीधे घर आ गयी, घर पर किसी को कुछ नहीं बताया, अगले दिन कॉलेज में दोस्तों को बताया...बात पर सब खुश भी हुए और डरे भी...की मान लो वो आदमी फिर आ गया और खूब सारे लोगो के साथ आया तो तुम अकेली क्या कर लोगी। बात डरने की थी भी, पर खैर वो आदमी फिर नहीं दिखा मुझे, पर बोरिंग रोड मैं अगले कुछेक हफ्तों तक अकेले नहीं गयी.
ऐसी एक और घटना ऑटो में हुयी, एक लड़का बगल में बैठा था, कुछ १६-१७ साल का होगा...सारे रास्ते कुहनी मार रहा था और जब उसे डांटा की क्या कर रहे हो, तमीज से बैठो तो उसने ऑटो रुकवाया और कुछ तो कहा, बस मैं भी उतरी और उसका कॉलर पकड़ के एक झापड़ मारा, बस वो हड़बड़ाया और भागने के लिए हुआ, पर कॉलर तो मेरे हाथ में था और मैं छोड़ नहीं रही थी उसका कॉलर पूरी तरह फट गया और वो भाग गया.
ये दो दुस्साहस के काम मैंने किये थे...पर मुझे बहुत डर लगता था, डर उनसे नहीं अपनेआप और अपने इस न डरने से लगता था कि किसी दिन इसके कारण मुसीबत में न फंस जाऊं। पटना में उस वक़्त पुलिस और कानून नाम की कोई चीज़ नहीं थी, पूरा गुंडाराज चलता था...ऐसे में अगर कोई मुझे उठा के ले जाता तो कहीं से कोई चूँ नहीं करता.
आज जब लोगो को बोलते हुए सुनती हूँ कि लड़की ने छोटे या तंग कपड़े पहने थे इसलिए उसके साथ ऐसा हादसा हुआ तो मन करता है एक थप्पड उन्हें भी रसीद कर दूँ...क्योंकि मैंने बहुत साल फिकरे सुने हैं और ये वो साल थे जब मैं सबसे संस्कारी कपड़े पहनती थी जिनमें न तो कोई अश्लीलता थी और न मेरे घर से निकलने का वक़्त ऐसा होता था कि मेरे साथ ऐसा हो। जब भी ऐसी कोई बहस उठती है मेरे अन्दर का गुस्सा फिर उबलने लगता है और इन समाज के तथाकथित ठेकेदारों और झूठे संस्कारों कि दुहाई देने वालो को सच में गोली मार देने का मन करता है.
दिल्ली में बस पर चलती थी तो हमेशा हाथ में एक आलपिन रहता था कि अगर किसी ने कुहनी मारी तो चुभा दूंगी...नाखून हमेशा बड़े रखे इसलिए नहीं कि खूबसूरत लगते हैं, इसलिए कि अगर किसी ने मुझे कुछ करने की कोशिश की तो कमसे कम अँधा तो कर ही सकती हूँ...और यही नहीं कई दिन बालों में जूड़ा पिन लगाती थी सिर्फ इसलिए कि ये एक सशक्त हथियार बन सकता है.
कहने को हम आजाद हैं, लड़कियों और लड़कों को बराबरी का दर्जा मिला है...मगर क्या ऐसी किसी भी मानसिक प्रताड़ना किसी लड़के ने कभी भी झेली है जिंदगी में? क्या ये कभी भी समझेंगे कि एक लड़की को कैसा महसूस होता है...नहीं...क्योंकि ये नहीं समझेंगे कि ऐसा होने पर हमारा क्या करने का मन करता है...ये कहेंगे अवोइड करो, ध्यान मत दो...अगर एक बार भी किसी लड़के को ऐसा लगा न तो वो बर्दाश्त नहीं करेगा लड़ने पर उतर आएगा...क्यों? क्योंकि वो सशक्त है? eve teasing जैसा नाम दिया जाता है और इसकी शिकायतों पर कोई ध्यान नहीं देता.
आज मैं उस वक़्त सी छोटी नहीं रही...लड़के मुझे अब भी घूरते हैं...बाईक चलाती हूँ तो पीछा करते हैं...मैं अनदेखा कर देती हूँ...मगर हर उस वक़्त मैं परेशान होती हूँ और हालांकि उन शुरूआती दिनों में जब मेरी सोच खुली नहीं थी और आज जब मैंने इतनी दुनिया देख रखी है...इतने अनुभवों से गुजर चुकी हूँ. आज भी सिर्फ इसलिए कि मैं लड़की हूँ मुझे इस मानसिक कष्ट को झेलना पड़ता है.
मेरा आज भी मन करता है कि मेरे पास एक रिवोल्वर होता...इन लड़कों को कम से कम एक झापड़ मारने में डर तो नहीं लगता.