11 October, 2017

'वे दिन' शूट. Pack up. Fade to सुख


उसे देख कर सहसा लगा, मैं बहुत सुखी हूँ। मझे लगा, एक ख़ास हद के बाद सब लोग एक-जैसे सुखी हो जाते हैं। जब तुम टिक जाते हो। किसी चीज़ पर टिक जाना...वह अपने में सुख ना भी हो, तुम उससे सुख ले सकते हो; अगर तुम ज़्यादा लालची न हो - यह उस शाम मैंने पहली बार जाना था। यह बहुत अचानक है और तुमसे बाहर है - उस फ़ोटो की तरह, जो तुम्हारी जानकारी के बिना किसी बाज़ारू फ़ोटोग्राफ़र ने सड़क पर खींच ली थी। बाद में तुम देखते हो तो हल्का-सा विस्माय होता था कि यह तुम हो...तुम चाहो तो उसे वापस कर सकते हो। लेकिन वह कहाँ है - तुम उसे वापस भी कर दो, तो भी वह वहाँ रहेगा...एक स्थिर चौंका-सा क्षण, जब तुम सड़क पार कर रहे थे...

- वे दिन, निर्मल वर्मा

***
उस चौराहे पर दो ओर ज़ेब्रा क्रॉसिंग थी और दोनों ओर के सिग्नल थे। जहाँ से उन्हें ठीक नब्बे डिग्री के अलग अलग रास्तों में जाना था। ये अच्छा था कि १८० डिग्री विपरीत वाले रास्ते लड़की को पसंद नहीं थे। उनमें इस बात का हमेशा भय होता था कि किसी का आख़िरी बार मुड़ कर देखना मिस कर जाएँगे। It's a shooting nightmare, वो अक्सर अपने दोस्तों को कहा करती थी। स्क्रीनराइटिंग के बाद डिरेक्शन करने से फ़ायदा ये होता था कि हर सीन अपनी पूरी पेचीदगी में लिखा होता था। ठीक वैसा जैसे उसके मन के कैमरे में दिखता था। सिनमटॉग्रफ़र उसके साथ कई कई दिन भटकता रहता था कि ठीक वही ऐंगिल पकड़ सके जो उसकी आँखों को दिखता है।

उस बिंदु से दूर तक जाती सड़क दिखती थी। लोगों के रेलमपेल के बावजूद। बहुत ज़्यादा भीड़ में भी कैसे एकदम टेलिफ़ोटो लेंस की तरह आप ठीक उस एक शख़्स पर फ़ोकस किए रखते हैं। दुनिया का सबसे अच्छा कैमरा भी उस तरह से चीज़ों को नहीं पकड़ सकता जैसे कि आपकी आँख देखती है। कि आँख के देखने में बहुत कुछ और महसूसियत भी होती है। लोगों का आना जाना। ट्रैफ़िक का धुआँ। एक थिर चाल में आगे बढ़ती भीड़। या कि तेज़ी से स्प्रिंट दौड़ता वो एक शख़्स। कि जिसे देख कर अचानक से लगे कि बस, सारी दुनिया ही हो रही है आउट औफ़ फ़ोकस। या कि ख़त्म ही। जैसे कुछ फ़िल्मों में होता है ना, विध्वंस। कोई सूनामी लहर आ रही हो दिल को नेस्तनाबूद करने या कि भूचाल और आसपास की सारी इमारतें गिर रही हों एक दूसरे पर ही। मरते हुए आदमी को ऐसा ही लगता होगा। ज़िंदगी छूट रही हो हाथ से। जिसे हेनरी कार्टीए ब्रेस्सों कहते हैं, 'द डिफ़ाइनिंग मोमेंट'।

इसे शूट करते हुए पहले हम क्रेन से एक लौंग शॉट लेंगे, इस्टैब्लिशिंग शॉट कि जिसमें आसपास की इमारतें, लोग, सड़क, ट्रैफ़िक सिग्नल, सब कुछ ही कैप्चर हो जाए। फिर क्रेन से ही हाई ऐंगल शॉट से दिखाएँगे लड़के को दौड़ते हुए... उसे कैमरा फ़ॉलो करने के लिए ऊपर से नीचे की ओर टिल्ट होता और टिल्ट होने के साथ ही ज़ूम इन भी करेगा किरदार पर...फिर हमें चूँकि उसकी नॉट-पर्फ़ेक्ट रन दिखानी है, हमें थोड़ा शेकी इफ़ेक्ट भी डालना पड़ेगा। इस सारे दर्मयान आसपास के लोग सॉफ़्ट्ली आउट और फ़ोकस रहेंगे। कि वो भीड़ में गुम ना जो जाए, इसलिए हम चाहेंगे कि किरदार बाक़ी शहर के हिसाब से सफ़ेद नहीं, कोई रंग में डूबा शर्ट पहने, कि जो लड़की का पसंदीदा रंग भी हो - नीला। सॉलिड डार्क कलर की शर्ट। फ़ीरोज़ी और नेवी ब्लू के ठीक बीच कहीं की। लिनेन की कि जिसमें आँसू जज़्ब करने की क्षमता हो। ख़याल रहे कि क्षमता ज़रूरी है, इस्तेमाल नहीं।

लड़की देखेगी कैमरापर्सन की ओर और परेशान होगी, कि कोई भी कहाँ कैप्चर कर पता है उतनी डिटेल में जैसे कि इंसान की आँख देखती है चीज़ों को। कितना कुछ छूट रहा है कैमरा से।

कैमरा मिड शॉट पर आ के रुका है जिसमें बना है जिसमें कि किरदार को फ़ॉलो करना मुश्किल है...फिर अचानक ही हमारा लीड कैरेक्टर मुड़ कर देखता है। एकदम अचानक। उसकी नज़र खींचती है चीज़ों को अपनी ओर जादू से। जैसे कैमरे को भी। लेंस के उस पार का कैमरापर्सन ठिठक जाता है। जैसे ठहर जाता है सब कुछ। पॉज़। किसी फ़िल्म में एकदम मृत्यु के पहले का आख़िरी लम्हा। एक आख़िरी मुस्कान। ज़िंदगी अपने पूरे रंग और खुलूस के साथ बादल जाती है एक ठहरे हुए लम्हे में। महसूस होता है। दिल की ठहरी हुयी धड़कन को भी। इसे ही जीना कहते हैं। बस इसे ही।

कि ज़िंदगी ऐसे किसी लम्हे को मुट्ठी में बांधे मुस्कुराती है कई सालों बाद तक भी। 'डेज़ औफ़ बीइंग वाइल्ड' का आख़िरी दृश्य होता है। लड़का अपनी आख़िरी साँसों के साथ याद कर रहा है। जो उसने कहा था। 'ये एक मिनट मैं अपनी पूरी ज़िंदगी याद रखूँगा'।

ट्रेन की आवाज़ आ रही होती है। पुरानी पटरियों को आदत है सुख और दुःख दोनों को अपने अपने अंजाम तक पहुँचा आती हैं। शिकायत नहीं करतीं। ज़्यादा माँगती नहीं। कैमरा लड़की के चेहरे पर टिका हुआ है। वो खिड़की से बाहर अंधेरे में अपनी आँखें देख रही है। नेचुरल लाइट में शूट करने के चलते हम उसकी आँखों में भरा पानी शूट नहीं कर पाते हैं। और फिर, सेल्युलॉड वंचित रह जाता है ख़ुशी से भरी आँखें रेकर्ड करने से।

मनुष्य के बदन में 'मन' कहाँ होता है, हम नहीं जानते। शायद हृदय के आसपास कहीं। लेकिन उस तक भी लिख कर ही पहुँचने की कोशिश की जा सकती है। डिरेक्टर उम्मीद करता है कि इतना सा देख कर ऑडीयन्स अपनी ज़िंदगी के हिस्से जोड़ देगी। वो टूटे हुए हज़ारों हिस्से जिनसे मिल कर एक लम्हे का सुख बनता है। एक लम्हे का मुकम्मल। सुख।

09 October, 2017

ख़्वाब के हथकरघे पर बुनी हैंडलूम सूती साड़ी


मेरे पास बहुत सी सूती साड़ियाँ हैं जो मुझे बहुत पसंद हैं। पर सिर्फ़ मुझे ही। बाक़ी किसी को वे पसंद नहीं आतीं। मुझे कुछ ठीक नहीं मालूम कि मुझे वे इतनी क्यूँ पसंद हैं, एक तो उनका कॉटन बहुत अच्छा है। इन दिनों मुझे कपड़े उनकी छुअन से पसंद आते हैं। नेचुरल फैब्रिक उसपर हैंडलूम की साड़ियाँ। दो हज़ार के आसपास की फ़ैबइंडिया की हल्की, प्योर कॉटन साड़ियाँ। मुझे उनका नाम तो नहीं पता, बस ये है कि उन साड़ियों को देख कर विद्या सिन्हा की याद आती है। रजनीगंधा में कैसे अपना आँचल काँधे तक खींच रखा होता है उसने। उन साड़ियों से मुझे अपने गाँव की औरतें याद आती हैं। सिम्पल कॉटन की साड़ियाँ जो सिर्फ़ एक सेफ़्टी पिन पर पहन लेती हैं। जिनकी चूड़ियों में अक्सर कोई ना कोई आलपिन हमेशा रहता है।

वक़्त के साथ मेरा मन गाँव भागता है बहुत। इतना कि मैं समझा नहीं सकती किसी को भी।

तुमने वो घरोंदा का गाना सुना है, ‘मुझे प्यार तुमसे नहीं है, नहीं है’? उसमें ज़रीना वहाब है और अमोल पालेकर। लेकिन यहाँ अमोल पालेकर बदमाशी भी करता है और शर्ट के बटन खोल कर लफुआ टाइप घूमता भी है। उसकी झालमुरी में मिर्ची डाल देता है, पानी पीते समय गिलास उढ़काता है अलग। सुनना वो गाना तुम। नहीं। माने सुनना नहीं, विडीओ देखना। बुद्धू। या उस दौर के बहुत से और गाने हैं। भले लोगों वाले। वो सुन लेना। मेरे लिए रूमान वहीं है, वैसा ही है। साड़ी में घूमती लड़की और साथ में कोई भला सा लड़का। लड़का कि जो हाथ पकड़ कर रोड क्रॉस करा दे। खो जाने पर तलाश ले भरे शहर की भीड़ में भी तुम्हें।

मैं तुमसे मिलने अपनी कोई कॉटन की साड़ी पहन कर आना चाहती हूँ। फिर हम चलेंगे साथ में छोटे छोटे सुख तलाशने कहीं। मुझे लगता है वो साड़ी पहनूँगी तो तुमको अच्छी लगेगी। तुम्हारा ध्यान भी जाएगा, शायद कोई कहानी भी हो तुम्हारे पास किसी साड़ी के मेहंदी रंग को लेकर। या की काँच की चूड़ियों की आवाज़ में घुलीमिली। हम लोग कितनी सुंदर चीज़ें भूलते जा रहे हैं, कि जैसे मैं बैठी हूँ रेलवे स्टेशन की किसी बेंच पर तुम्हारा इंतज़ार करते हुए। तुम पीछे से आकर चुपचाप से अपनी हथेलियाँ रख दो मेरी आँखों पर, मैं तुम्हारे हाथों की छुअन से तुम्हारी एक नयी पहचान चीन्हूँ कि जो मैं बंद आँखों से भी याद रख सकूँ। कि तुम कहो कि चाँदी के झुमके बहुत सुंदर लगते हैं मुझपर। या कि मैंने जो अँगूठी पहन रखी है दाएँ हाथ की सबसे छोटी ऊँगली में। लव लिखा हुआ है जिसमें। वो सुंदर है। कि तुम्हारे सामने मैं रहूँ तो तुम मुझे देखो। नज़र भर के। नज़रा देने की हद तक। आँख के काजल से लेकर माथे की बिंदी तक ध्यान जाए तुम्हारा। आँख के पनियाने से लेकर ठहाके के शोर तक भी तो।

मैंने तुम्हें अपने गाँव के बारे में बताया है कभी? नहीं ना। लेकिन अभी का गाँव नहीं। ख़्वाब ही बुन रहे हैं तो मेरे बचपन के गाँव में बुनेंगे। उन दिनों मासूमगंज से गाँव जाने के लिए रिक्शा लेना पड़ता था या फिर खेत की मेड़ मेड़ पैदल चलना होता था। धान की रोपनी का समय होता हो या कि आम के मंज़र का। यही दो चीज़ हमको बहुत ज़्यादा याद है गाँव का। मेड़ पर चलने में जूता चप्पल पहन कर चलना मुश्किल होता तो दोनों प्राणी चप्पल खोल कर झोले में डाल देते हैं और ख़ाली पैर चलते हैं। मुझे मिट्टी में चलना बहुत ना तो अच्छा लगता है। और मुझे कैसे तो लगता है कि तुमको मिट्टी में ख़ाली पैर चलने में कोई दिक़्क़त नहीं होगा। चलते हुए मैं तुमको अपना खेत दिखाऊँगी जहाँ ख़ुशबूदार धान उगाया जाता है जिसको हमारे ओर कतरनी कहते हैं। वहाँ से आगे आओगे तो एक बड़ा सा आम का पेड़ है नहर किनारे। उसपर हम बचपन में ख़ूब दिन टंगे रहे हैं। उसके नीचे बैठने का जगह बना हुआ है। हम वहाँ बैठ कर कुछ देर बतिया सकते हैं। आसपास किसी का शादी बियाह हो रहा होता हो तो देखना दस पंद्रह लोग जा रहा होगा साथ में और शादी के गीत का आवाज़ बहुत दूर से हल्का हल्का आएगा और फिर पास आते आते सब बुझा जाएगा।

हम उनके जाने के बाद जाएँगे, उसी दिशा में जहाँ वे लोग गए थे। तुमको हम अपने ग्रामदेवता दिखाएँगे। एक बड़े से बरगद पेड़ के नीचे उनको स्थापित किया गया है। उनका बहुत सा ग़ज़ब ग़ज़ब कहानी है, वो सुनाएँगे तुमको। वहाँ जो कुआँ है उसका पानी ग़ज़ब मीठा है। इतने देर में प्यास तो लग ही गया होगा तुमको। सो वहाँ जो बालटी धरा रहता है उसी से पानी भर के निकालना होगा। तुम लड़ना हमसे कि तुम बालटी से पानी निकालने में गिर गयी कुइय्यां में तो तुमको निकालेगा कौन। हम कहेंगे कि हमारे बचपन का गाँव है। बाप दादा परदादा। सवाल ही नहीं उठता कि तुमको ये कुआँ छूने भी दें। तुम बाहर के आदमी हो।

किसी से साइकिल माँगें। आगे बिठा कर तुम चलाओ। लड़ो बीच में कि बाबू ऐसा घूमना है तो वेट कम करो तुम अपना। हम समझाएँ तुमको कि पैदल भी जा सकते हैं। तुम नहीं ही मानो। साइकिल दुनिया की सबसे रोमांटिक सवारी है। हैंडिल पकड़ कर बैठें हम और तुम्हारी बाँहों का घेरा हो इर्द गिर्द। थोड़ा सकचाएँ, थोड़ा लजाएँ। ग़ौरतलब है कि साड़ी पहन कर अदाएँ ख़ुद आ जाती हैं। जीन्स में हम कुछ और होते हैं, साड़ी में कुछ और।

हम जल्दी ही शिवालय पहुँच जाएँ। शिवालय में इस वक़्त और कोई नहीं होता, शंकर भगवान के सिवा। हम वहीं मत्था टेकें और शिवलाय के सामने बैठें, गप्पें मारते हुए। हल्का गरमी का मौसम हो तो हवाएँ गरम चलें। हवा के साथ फूलों की महक आए कनेर, जंगली गुलाब। तुम मेरे माथे पर की थोड़ी खिसक आयी बिंदी ठीक कर दो। मैं आँचल से थोड़ा तुम्हारा पसीना पोंछ दूँ।

हम बातें करें कि आज से दस साल पहले हम कहाँ थे और क्या कर रहे थे। कितने कितने शहर हम साथ में थे, आसपास क़रीब।

एक से दोस्तों के बीच भुतलाए हुए।
तलाशते हुए एक दूसरे को ही।

कर लो शिकायत वहीं डिरेक्ट बैठे हुए भगवान से
हम तुमसे पहले क्यूँ नहीं मिले।

और फिर सोचें। ये भी क्या कम है कि अब मिल गए हैं। 

05 October, 2017

'वे दिन', न्यू यॉर्क


मुझे कम महसूसना नहीं आता। रात के ढाई बजे मैं काग़ज़ क़लम उठा कर तुम्हें एक ख़त लिखना चाहती हूँ। फ़ीरोज़ी। लैवेंडर और पीले रंग से। मैं लिखना चाहती हूँ कि तुम कोई ऐसी दुआ हो जो मैंने कभी माँगी ही नहीं। माँग के पूरी होने वाली ख़्वाहिशें होती हैं। दुआएँ होती हैं। मन्नतें होती हैं। जो ईश्वर की तरफ़ से भेजी जाएँ…बोनस…वो फ़रिश्ते होते हैं। हमें ज़िंदगी के किसी कमज़ोर लम्हे में उबार लेने वाले। 

जितना लॉजिक मुझे समझ आता है, उस हिसाब से तुम्हें मैंने नहीं माँगा, तुम्हें ईश्वर ने भेजा है। जैसे मेरे हिस्से के कर्मों का फल रखने वाला कोई चित्रगुप्त का असिस्टेंट अचानक जागा और उसने देखा कि बहुत से अच्छे करम इकट्ठा हो गए हैं। या कि उसके पास जो दुनिया की भलाई का कोटा था उसमें एक नाम मेरा भी किसी ने सिफ़ारिश से डाल दिया। या कि उसे प्रमोशन चाहिए था और इसके लिए सिर्फ़ यही उपाय था कि धरती पर जो जीव उसे ऐलकेटेड है, वो उसके काम से बहुत ख़ुश हो। 

मैं कभी कभी बहुत तकलीफ़ में होती हूँ कि मुझे कम प्यार करना नहीं आता। ऐसे में कोई उम्मीद नहीं करती मैं किसी से, लेकिन कभी कभी होता है कि किसी की छोटी सी ही बात से मेरा दिल बहुत दुःख जाता है। बहुत ज़्यादा। ये तकलीफ़ इतनी जानलेवा हो जाती है कि रोते रोते शामें बीतती हैं और क़रार नहीं आता। कि कोई मेरे साथ बुरा क्यूँ करता है। मैं तो किसी का बुरा नहीं करने जाती कभी। इसमें ही पापा कहते हैं कि इंसान अच्छा इसलिए थोड़े करता है कि दुनिया उसके साथ अच्छा करे…इंसान अच्छा इसलिए करता है कि उसकी अंतरात्मा उसे कचोटे नहीं…उसकी अंतरात्मा चैन से रहे। सुकून से। हमको ये बात बहुत अच्छी लगी। उस दिन से हम और भी जो दुनिया से थोड़ा बहुत माँगना चाहते थे, सो भी अपनी हथेली बंद कर ली। 

इस बीच जैसे अचानक से कोई चित्रगुप्त होश में आया और उसे लगा कि मेरी ज़िंदगी में कुछ अच्छा होना चाहिए। मेरी लिखी किताब, ‘तीन रोज़ इश्क़’ दैनिक जागरण के कराए हिंदी किताबों की नील्सन बेस्टसेलर सर्वे में आठवें नम्बर पर आयी। मैंने ऐसा ना सोचा था, ना ऐसा चाहा था, ना ऐसा माँगा था। ये बोनस था। मुझे तो ये भी नहीं मालूम था कि इस देश में कितने लोग चुपके चुपके मेरी किताब पढ़ रहे हैं, बिना मुझे बताए, बिना पेंग्विन को बताए भी, शायद। बहुत दिन ख़ुमार में बीते। बौराए बौराए। 

पिछले साल ऑक्टोबर में स्वीडन गयी थी, उसके बाद फिर अपने ही शहर में थी। पारिवारिक ज़िम्मेदारियों में व्यस्त। मुझे घर बहुत अच्छे से रखना नहीं आता। लोगों का ख़याल भी नहीं। बस इतना है कि मेरे घर में रहते हुए किसी को परायापन नहीं लगता। मेरे दिल में बहुत जगह रहती है, सबके लिए। शायद मैं एक समय डिनर बनाना भूल जाऊँ या शाम के नाश्ते की जगह कहानी लिखती रह जाऊँ मगर इसके सिवा घर में किसी को कभी कुछ बुरा नहीं लगता। मेरे घर और मेरे दिल के दरवाज़े हमेशा खुले रहते हैं(figuratively, यू नो, दिल कोई मकान थोड़े है)। इतनी व्यस्त रही की नोवेल पर काम एकदम ही छूट गया। ह्यूस्टन जाने की बात हुयी। वहाँ पर हरिकेन हारवे चला आया। जाने का प्लान दस दिन आगे खिसकाना पड़ा। 

ह्यूस्टन में एक सबर्ब है, वुडलैंड्स। वहाँ रुकी। ऐसे रिज़ॉर्ट में जहाँ पर वाइफ़ाई के थ्रू कहीं कॉल ही नहीं जा रहे थे। बिना बात किए अकबका जाती हूँ, सो अलग। पब्लिक ट्रांस्पोर्ट कुछ भी नहीं तो कहीं आना जाना नामुमकिन। इंडिया और अमेरिका के टाइम में ऐसा अंतर होता है कि किसी से बात करना इम्पॉसिबल होता है। जब तक मैं फ़्री होती, इंडिया में सब लोग सो चुके होते। रिज़ॉर्ट की शटल सिर्फ़ एक मॉल तक जाती थी। वहाँ लेकिन मुझे किताबों की दुकान मिल गयी, barnes एंड नोबल। चूँकि वहाँ से कहीं और नहीं जाना था तो मैं अक्सर किताबें पढ़ने चली जाती थी। वहीं ऐलिस मुनरो की कहानी डिस्कवर की। ऐसे में अधूरी कहानी सुनने के लिए भी तुम थे। इस भागती दौड़ती दुनिया में ज़रा सा कौन निकालता है किसी के लिए वक़्त। 

आज रात मन विह्वल हो गया। जब ईश्वर प्रार्थना मानना शुरू कर दे तो डर लगता है। मगर इस बार सुकून था। न्यू यॉर्क जाने का प्रोग्राम जिस तरह कैंसिल हो कर फिर से बना, वो किसी अलग कहानी के हिस्से है पूरी पूरी कहानी। दो हफ़्ते हो गए। आज टेबल पर कुछ तो देख रही थी कि घड़ी पर ध्यान चला गया। आँख के लेवल पर घड़ी थी। यही वाली पहन कर न्यू यॉर्क गयी थी और तब से इसका टाइम ज़ोन वापस से बदला ही नहीं है। उसमें पाँच बज रहे थे। कुछ दुखा। गहरे। मन में। अभी से दो हफ़्ते पहले इस वक़्त मैं ह्यूस्टन एयरपोर्ट पर थी और एक घंटे में मेरी फ़्लाइट का टाइम था। 

जो बहुत सारे दिन हम सबका अच्छा करते चलते हैं, उसका कोई कारण नहीं होता। लेकिन यूँ होता है कभी फिर,  कि एक दिन ज़िंदगी अचानक से हमारे नाम एक शहर लिख दे। भटकना और रंग लिख दे। सड़कें लिख दे और कॉफ़ी का ज़ायक़ा लिख दे। स्टेशनों के नाम और खो कर फिर मिल जाना लिख दे।

अतीत के बारे में सबसे ख़ूबसूरत चीज़ यही है कि उसे हमसे कोई नहीं छीन सकता। कोई भी हमारे पास्ट में जा के उन दिनों की एक चीज़ भी बदल नहीं सकता। ना मेरी चिट्ठियों का रंग। ना वो मेरी आँखों की चमक। ना वो संतोष वाली, सुख वाली मुस्कुराहट। 

ऐसी कोई एक भी घटना होती है ज़िंदगी में तो कई कई दिनों तक अच्छाई पर यक़ीन बना रहता है। मैं रात तक जगे यही सोचती हूँ कि मेरे साथ इतना अच्छा कैसे हो रहा है। कि मुझे अच्छाई की आदत ही नहीं है। लेकिन होना ऐसा ही चाहिए। छोटे छोटे सुख हों। एक कोई किताब हो कि जिसे ले जाना पड़े सात समंदर पार किसी के लिए। कहानियाँ हों। शब्द हों। 

तुम जितने से थे, बहुत थे। जैसे पानी को जहाँ रख दो, कोने दरारों में भर आता है। कोई मरहम जैसे। पता है, तुम्हारी सबसे अच्छी बात क्या थी? तुम्हारा होना बहुत आसान था। 

कभी कभी छोटे छोटे सुख, बड़े बड़े सुखों से ज़्यादा ज़रूरी होते हैं।
मेरी इस छोटी सी ज़िंदगी में, ये इतना छोटा सा सुख होने का शुक्रिया न्यू यॉर्क।
मैं तुमसे हमेशा प्यार करूँगी। 
हमेशा। 

01 October, 2017

पर्फ़ेक्ट अलविदा


बिछोह के दो हिस्से होते हैं। एक जो ठहर जाता है और एक जो दूर चलता जाता है। हम कई बार डिस्कस करते हैं कि अलग कैसे होना है। अक्सर मिलने के लम्हे ही।

इक बार किसी से मिली थी दिल्ली में तो उसने कहा था कि जाते हुए लौट कर नहीं आना, मैं फिर जा नहीं सकूँगा। वो मेट्रो की सीढ़ियों पर ऊपर खड़ा रहा। मैं नीचे उतरते हुए मुड़ कर देखती रही। एक आख़िरी बार मुड़ कर देखा। बहुत दिल किया कि दौड़ कर वो पचास सीढ़ियाँ चढ़ आऊँ, एक बार और मिल लूँ उससे गले। लेकिन उसने मना किया था। यूँ तो मैं किसी की बात नहीं मानती, मगर उस बार उसकी मान ली। इसके बाद जब हमारी बात हुयी तो उसने कहा, तू लौट कर आयी क्यूँ नहीं...जब मेरी कोई बात नहीं मानती है तो मेरी ये वाली बात क्यूँ मानी...मुझे आज भी मालूम नहीं कि क्यूँ मानी। शायद मुझे अपने दिल की सुननी चाहिए थी।

मैं किसी को छोड़ कर जा नहीं सकती। अक्सर मुलाक़ातों के आख़िरी दिन मेरी ख़्वाहिश रहती है कि कोई दूर होते हुए गुम हो जाए और मैं उसके गुम हो जाने को आँखों में सहेज के रखूँ। ट्रेन के दूर जाते हुए। सड़क पर दूर जाते हुए। कहीं से भी दूर जाते हुए। मैं ठहरी रहती हूँ जब तक कि कोई दिखना बंद ना हो जाए। यूँ ही तो सूरज डुबाना अच्छा लगता है मुझे। मैं एकदम से उसकी आख़िरी किरण तक ठहरी रहती हूँ। तसल्ली से।

अलग होते हुए कुछ लोग मुड़ कर नहीं देखते। दो लोग अलग अलग दिशाओं में जा रहे हों तो ऐसा भी होता है कि जब आप मुड़ के देख रहे हों तो दूसरे ने मुड़ कर नहीं देखा हो मगर वो किसी और वक़्त मुड़ कर देखेगा और यही सोचेगा कि आपने जाते हुए एक बार भी मुड़ कर नहीं देखा।

दूर जाते हुए इक आख़िरी बार मुड़ कर क्या देखते हैं हम?

हम मुड़ कर ये देखते हैं कि जो हमारा था, वो वहीं है या लम्हे में गुम हो गया। कोई दूर जा रहा हो तो उस स्पॉट पर खड़े रहने की आदत मेरी है। मुझे लगता है दूर होते हुए हर कोई एक बार और लौट कर आना चाहता है। एक आख़िरी हग के बाद के आख़िरी हग के लिए शायद। पर हम लौट कर नहीं आते। दूर से देखते हैं और सोचते हैं...आदत दिलाते हैं ख़ुद को, उसके बग़ैर जीने की, उस लम्हे से ही।

ये मुड़ के देखना कुछ ऐसा है कि हर बार अलग होता है। कोई दो बार अलग होना एक जैसा नहीं होता। कोई दो शख़्स एक जैसे नहीं होते। हम भी तो बदल जाते हैं अपनी ही ज़िंदगी के दो बिंदुओं पर।

इस फ़िल्म में दूर जाती हुयी सेजल है। यहाँ सोचता हुआ ठिठका हैरी है कि वो क्या ढूँढ रहा है...और ठीक जैसे उसे लगता है कि जिसे वो ढूँढ रहा है, वो सेजल तो नहीं...वो उसका नाम लेता है, 'सेजल', ठीक उसी लम्हे वो मुड़ती है। एकदम हड़बड़ायी, आँख डबडबायी...कितनी ही ज़्यादा वल्नरेबल...उसकी आँखें रोयी हुयी आँखें हैं। उदास। नाउम्मीद। वो मुड़ती है कि उसे अचानक से लगा कि किसी ने उसे पुकारा है। उसका यूँ मुड़ के देखना, उसका जवाब है, कि मैंने सुन लिया अपना नाम जो तुमने पुकारा नहीं...लिया है बस...ठहर कर। कि आत्मा की पुकार पहुँच जाती है आत्मा तक। कि दो इंसानों को जो जोड़े रखता है, उस फ़ोर्स का कोई इक्वेज़न हमें ठीक ठीक समझ नहीं आता।

मैं उस बेहद भीड़भरे चौराहे पर खड़ी थी कि जब वो मेरे आसमान से टूटते तारे जैसा टूटा था और भीड़ में बुझ गया था एक बार तेज़ी से चमक कर। मैं खड़ी थी कि उसे आसमान में गुम होता देख लूँ आख़िर तक।

मुझे मालूम नहीं था, पर उम्मीद थी कि जाते हुए वो एक आख़िर बार मुड़ के देखेगा ज़रूर। अलग हो जाने के पहले के वो आख़िरी लम्हे को देखना उसे। ये जानते हुए कि इस इत्ति बड़ी दुनिया में, जाने कब ही आ पाऊँगी उसके शहर फिर कभी।
कि जिसके पास रहते कभी नज़र भर देखा नहीं उसे बहुत दूर से एक आख़िर बार यूँ भरी भरी आँख से देखना कि जैसे उम्र भर को काफ़ी हो, बस वो एक नज़र देखना। बस वो आख़िर नज़र देखना।

सुख में होना उस लम्हे। ये जानते हुए कि सुख, दुःख का हरकारा है। कि बाद बहुत साल तक दुखेगा उसका यूँ आख़िरी बार मुड़ कर देखना। उस लम्हे, ख़ुश हो लेना एक आख़िरी बार देख कर उसकी आँखें।

यूँ, हुए जाना, एक पर्फ़ेक्ट अलविदा।
यूँ, हुए जानां, एक पर्फ़ेक्ट अलविदा।

30 September, 2017

पुराने, उदार शहरों के नाम

शहरों के हिस्से
सिर्फ़ लावारिस प्रेम आता है
नियति की नाजायज़ औलाद
जिसका कोई पिता नहीं होता 
याद के अनाथ क़िस्सों को
कोई कवि अपनी कविता में पनाह नहीं देता
कोई लेखक छद्म नाम से नहीं छपवाता
कोई अखबारी रिपोर्टर भी उन्हें दुलराता नहीं 
इसलिए मेरी जान,
आत्महत्या हमेशा अपने पैतृक शहर में करना
वहाँ तुम्हारी लाश को ठिकाना लगाने वाले भी
तुम्हें अपना समझेंगे 
***
बाँझ औरत
दुःख अडॉप्ट करती है
और करती है उन्हें अपने बच्चों से ज़्यादा प्यार 
लिखती है प्रेम भरे पत्र
पुराने, उदार शहरों के नाम
कि कुछ शहर बच्चों से उनके पिता का नाम नहीं पूछते 
***
असफल प्रेमी
मरने के लिए जगह नहीं तलाशते
जगहें उन्हें ख़ुद तलाश लेती हैं
दुनिया की सबसे ऊँची बिल्डिंग के टॉप फ़्लोर पर
उसके दिल में एक यही ख़याल आया 
***
उस शहर को भूल जाने का श्राप
तुम्हारे दिल ने दिया था
इसलिए, सिर्फ़ इसलिए,
मैंने इतना टूट कर चाहा
हफ़्ते भर में हो चुकी है कितनी बारिश
तुम्हें याद है जानां, सड़कों के नाम?
स्टेशनों के नाम? कॉफ़ी शाप, व्हिस्की, सिगरेट की ब्राण्ड?
तो फिर उस लड़की का क्या ही तो याद होगा तुमको
भूल जाना कभी कभी श्राप नहीं, वरदान होता है 
***
बंद मुट्ठी से भी छीजती रही
तुम्हारी हथेली की गरमी
दिल के बंद दरवाज़े से
रिस रिस बह गया कितना प्रेम
कैलेंडेर के निशान को कहाँ याद
बाइस सितम्बर किस शहर में थी मैं
रूह को याद है मगर एक वादा
अब इस महीने को, 'सितम' बर कभी ना कहूँगी

27 September, 2017

New York Diaries - 1


दो दिन पहले न्यूयॉर्क गयी थी। कुछ यूँ कि एक अधूरी नॉवल अटकी पड़ी है और कुछ ऐसे ही क़िस्से कि जिन्हें कोई ठहार नहीं मिलता। गयी थी तो ठीक थी मालूम नहीं था कि क्यूँ गयी हूँ, लेकिन लौटी हूँ तो मालूम है कि क्यूँ गयी थी। 
मुराकामी के लिखना शुरू करने के बारे में एक घटना का ज़िक्र आता है। अंग्रेज़ी के शब्द, 'epiphany' के साथ। मुराकामी एक बार कोई बेस्बॉल मैच देखने गए थे। नोर्मल सा दिन था। उनकी उम्र उनतीस साल थी। ठीक प्लेयर ने एक बॉल को हिट किया, वो क्रैक पूरे म्यूज़ीयम में गूँज गया और ठीक उसी लम्हे मुराकामी के हृदय में इच्छा जागी, 'मैं एक नॉवल लिख सकता हूँ'। वे उस रात घर जाने के पहले काग़ज़ और कलम ख़रीद के ले गए, और इसके बाद उन्होंने कई नॉवल लिखे। 
मैं न्यू यॉर्क से ह्यूस्टन लौटने के लिए ट्रेन में बैठी थी कि अचानक से कई सारे दृश्य मौंटाज़ बनाने लगे। कितना सारा कुछ ख़ुद में जुड़ने और खुलने लगा और मुझे महसूस हुआ। मैं न्यू यॉर्क अपने अटके हुए नॉवल के लिए एक नया शहर तलाशने गयी थी। कि लिखने के लिए बेस मटीरीयल बहुत सारा कल्पना से आता है लेकिन कल्पना के शहरों में सड़कों के नाम असली होते हैं। 
न्यू यॉर्क की सबसे कमाल की याद एक थरथराहट है। जैसे किसी के सीने पर हाथ रख कर उसकी तेज़ धड़कन को सुनना। न्यू यॉर्क का सबवे सिस्टम बहुत बहुत साल पुराना है। मेन शहर के ठीक कुछ फ़ीट नीचे अंडर्ग्राउंड पटरियों का जाल बिछा है जहाँ ट्रेनें आती जाती रहती हैं। मुझे ये मालूम नहीं था और मैं टाइम्ज़ स्क्वेयर पर चल रही थी कि सड़क के नीचे थरथराहट महसूस हुयी। ज़मीन के नीचे चलती ट्रेन की रफ़्तार को सड़क पर महसूस करना एक कमाल का अहसास था। नब्ज़ पकड़ कर ख़ून की रफ़्तार देखने जैसा। एकदम अलहदा। मैंने ऐसा कुछ कभी महसूस नहीं किया था। टाइम्ज़ स्क्वेयर पर ही ट्रेन की थरथराहट को सड़क पर महसूसने से लगा, कि ये न्यू यॉर्क का दिल है और ये कुछ यूँ धड़कता है। रात के बारह बजे वहाँ अकेली गयी थी। हज़ारों नीआन लाइट्स में दुनिया के कैपिटलिस्ट शहर का मोलतोल देखने। अपना हिसाब लगा कर। कि म्यूज़ीयम देखने हैं। पेंटिंग्स के रंग देखने हैं। देखना है कि शहर में क्या कुछ बिकता है और क्या कुछ ख़रीदा जा सकता है...इश्क़ इतना लॉजिकल थोड़े होता है। वो तो बस हो जाता है। 
मुहब्बत का यक़ीन दिल के तेज़ धड़कने से दिलाया जा सकता है ख़ुद को। या कि दिल के रुक जाने से ही। वो जो बहुत सारे " I ❤️ NY " के टीशर्ट या भतेरी चीज़ें बिकती हैं, वो वाक़ई इसलिए कि इस शहर को आप पसंद नहीं कर सकते, इश्क़ कर सकते हैं इससे बस। बेवजह। छोटी छोटी चीज़ों में सुख तलाशते हुए। 
दिल्ली मेरी जान, नाराज़ मत होना। बहुत साल बाद कोई शहर यूँ पसंद आया है। साँस लेने की रफ़्तार में तेज़ भागता। और ठहर जाता। याद में। 
किसी इन्फ़िनिट लूप में। हमेशा। 

18 September, 2017

छोटी है ज़िंदगी, मिल लिया करो


वो बहुत ख़ूबसूरत लड़की नहीं थी। ख़ूबसूरत थी। इतनी कि बहुत देर तक उसके साथ बैठो और कोई बात ना भी करें तो सिर्फ़ उसको देखते रहना भी बुरा नहीं लगता। भला सा लगता। जैसे किसी अनजान देश में बैठे हुए वहाँ के स्थानीय संगीत को सुन रहे हों और आँख बंद कर लें कि सिर्फ़ संगीत पर ध्यान दिया जा सके। चुप रहते हुए उसे देखना बिना उसकी बातों से डिस्ट्रैक्ट हुए उसको डिटेल में संजोना था। अगली बार की याद के लिए। बारिश में खिड़की पर खड़े होकर फुहार में भीगना था। ज़रा ज़रा। 

उससे पहली बार मिल के लगता था, ये मुलाक़ात कभी भूली नहीं जा सकेगी। उसे देखते हुए कई सारी चीज़ों पर ध्यान जाता था। उसकी क़रीने से बंधी हुयी सिल्क की साड़ी जिसके रंग को शहर में सोबर/पेस्टल और गाँव में फीका/उदास कहा जाता था। जूड़े में लगा हुआ बड़ा सा लकड़ी का जूड़ा पिन कि जिसे देख कर चायनीज़ चॉप स्टिक की याद आती थी। एक आध बदमाश लट हमेशा उसके माथे पर झूलती ही रहती थी। छोटी सी बिंदी, अक्सर साड़ी के रंग से मैचिंग या फिर काली। कानों में चाँदी के झुमके कि जिन्हें देख कर हमेशा आपको अपनी ज़िंदगी में मौजूद उस लड़की की याद आ जाती थी जिसने कभी 'दिल्ली में मेरे लिए झुमके ख़रीदवा देना' का उलाहना दिया था। झुमके कि जिनमें छोटे छोटे घुँघरू होते थे। जब वो हँसती थी तो झुमके और बदमाश लटें सब झूल झूल जातीं और उन घुँघरुओं से बहुत महीन आवाज़ आती थी। आप उसके होने को अगर थोड़े थोड़े सिप में पी रहे हों तो ये आवाज़ आपको सुनायी भी पड़ती और सहेज भी दी जाती। ऐसे में उस किसी ख़ास लड़की की याद आने लगती कि जिसका जन्मदिन पास हो, आप उसके साथ जा कर किसी और के लिए एक जोड़ी झुमके ख़रीदना चाहते। एकदम वैसे ही, जैसे तुमने पहने हैं। आप कह नहीं सकते, लेकिन आप ठीक उसके जैसा कुछ रखना चाहते थे अपनी ज़िंदगी के क़िस्से में। चूँकि वो आपकी हो नहीं सकती तो आप कुछ ऐसा चुनते कि जो लोकाचार के ख़िलाफ़ नहीं होता। 

मौसम बदलने लगता उसके साथ चलते हुए। आप जिस भी शहर में होते, वो दिल्ली हुआ जाता। उसकी पसंद का शहर। महबूब शहर दिल्ली। वो इसलिए कि दिल्ली में वो खुल कर साँस लेती थी। मौसम इतना ख़ूबसूरत होता कि आप उसे अपने साथ किसी छोटी सी इत्र की डिब्बी में बंद कर के रखना चाहते। मौसम को, लड़की तो क्या ही बंद होगी शीशी में। फ़ैबइंडिया जैसी दुकान में जाने का फ़ायदा ये होता है कि कुछ चीज़ें बिना कहे भी हो जाती हैं। कि वो अचानक से पूछ ले, 'कुर्ता पहनते हो तुम?' और आप उसका दिल रखने के लिए झूठ नहीं बोल पाएँ, सच निकल जाए मुँह से, कि नहीं। कुर्ता नहीं पहनते। वो ऊपर से नीचे देखे एक ऐसी पूरी नज़र आपको कि भरसक लजा जाएँ आप। 'हाइट इतनी अच्छी है, कुर्ता बहुत अच्छा लगेगा तुम पर। मैं एक ले दूँ, प्लीज़, मेरी ख़ुशी के लिए ले लो। कभी पहन लेना। ना भी पहनो तो चलेगा'। ट्रायल रूम में काला कुर्ता पहनते हुए आप सोचते हो। 'तुम ज़हर ख़रीद के दे दो तो खा लें तुम्हारी ख़ुशी के लिए। तुम क्या तो कुर्ते की बात करती हो'। आप बाहर निकलते हो तो आइना नहीं देखते हो, उसका चेहरा देखते हो कि जो वसंत हो रखा है। 'ओह, कितने सुंदर लग रहे हो तुम। प्लीज़, मुझसे मिलने कुर्ता ही पहन कर आना अब से'। आप उसकी नज़र से देखते हैं ख़ुद को। 'मिरर मिरर ऑन द वाल, हू इज दी फ़ेयरेस्ट औफ़ देम ऑल?'। किन लंगूरों के साथ रह रहे थे आप इतने दिन? किसी ने कहा क्यूँ नहीं कभी कुर्ता पहनने को। आप कि जो हर जगह सिर्फ़ वेस्टर्न फ़ॉर्मल पहन कर जाते हो। कोट पैंट सूट वाले आप एकदम से कुर्ता पहन कर उसके साथ चलना चाहते हो। क्या साड़ी पहनने वाली हर औरत ऐसे ही कह सकती है कॉन्फ़िडेन्स के साथ, 'हिंदुस्तानियों पर हिंदुस्तानी कपड़े जितने अच्छे लगते हैं, और कुछ नहीं लगता'। 

बिलिंग के पहले वो लौट कर एक बार फिर झुमकों की जगह आती है। पूछती है आपसे, कोई छोटी बहन नहीं है तुम्हारी? ये छोटे वाले झुमके बहुत ट्रेंडी हैं, टीनएजर्स पर बहुत फबते हैं। मैंने अपनी उम्र में ख़ूब पहने थे ऐसे झुमके। आप कहते हैं उससे कि आपने अपनी छोटी बहन के लिए ही झुमके ख़रीदे हैं तो वो हँस देती है, कि उसने समझा था आपने अपनी गर्लफ़्रेंड या बीवी के लिए ख़रीदे हैं। लेकिन झुमके तो झुमके होते हैं। क्या फ़र्क़ पड़ता है उसे पहनने वाली का आपसे रिश्ता क्या है। या कि झुमके ख़रीदवाने वाली का आपसे कोई रिश्ता नहीं है।

झुमकों के रैक के पास ही रोल ऑन पर्फ़्यूम्ज़ हैं। वो उनमें से एक उठाती है। 'मस्क'। कहती है आपसे, सिगरेट पीने के बाद कलाइयों पर अक्सर यही रोल ऑन लगती है वो। धुएँ और मस्क की मिली जुली गंध उसे बहुत ज़्यादा पसंद है। वो अपनी कलाइयाँ बढ़ा देती है आपकी ओर, सूंघ के देखो ना। आपने अपने लिए एक रोल ऑन ख़रीदा है, जानते हुए कि आपकी कलाइयों से वैसी तिलिस्मी गंध कभी नहीं आ सकती। 

यहाँ से निकल कर आप दोनों यूँ ही टहल रहे हैं। एक रिहायशी इलाक़ा है कि जहाँ कुछ दूर में आपका घर है। ज़रा सी दूर चलना है। एक कॉफ़ी शॉप में कड़वी कॉफ़ी पीनी है। बस। उम्र ख़त्म। 

शाम अपने उतार पर है। वो अचानक आपका घर देखने की इच्छा ज़ाहिर करती है। आप कहते हैं उससे, 'मेरा घर बहुत बोरिंग है। कुछ नहीं है वहाँ देखने को'। पर वो कहती है कि दुनिया में बोरिंग कुछ नहीं होता। नयी चीज़ तो ख़ास तौर से कभी नहीं। हमें जो लोग पसंद आते हैं, उनका सब कुछ ही अच्छा लगता है। उनसे जुड़ी हर चीज़ में हमें इंट्रेस्ट होता है। कुछ भी चीज़ें ऐब्स्ट्रैक्ट इंट्रेस्टिंग नहीं होती हैं। जैसे मुझे पेंटिंग्स पसंद हैं, किसी को वो बहुत बोरिंग लगेंगी। किसी को इमारतें, शहर का इंफ़्रास्ट्रक्चर बहुत इंट्रेस्टिंग लग सकता है। 

उसके हिसाब से चलिए तो आपका घर बहुत कमाल की जगह है। वाइन की बॉटल में लगे हुए मनी प्लांट। अधूरा रखा हुआ सर्किट बोर्ड। बैगनी परदे, कि जो बदसूरत हैं, इसलिए इंट्रेस्टिंग हैं। वो कहती है कि आपके लिए परदे भेज देगी नए। आपका बुकरैक। क़रीने से रखी किताबें। बुक्मार्क्स। दीवाल का रंग। जिन खिड़कियों से आप बाहर देखते हैं वो। छत पर अटक गया आधा टुकड़ा चाँद। किचन में बनी दो कप कॉफ़ी। सब कुछ इंट्रेस्टिंग है उसके लिए। 

साड़ी पहने हुए कोई लड़की आपके साथ एनफ़ील्ड पर कभी बैठी नहीं है। तो आप पूछते भी नहीं हैं उससे। वो भूलती नहीं लेकिन, पार्किंग लौट में आप दिखा देते हैं। नीले रंग की अपनी नीलपरी को। घर से निकल कर आप टैक्सी करते हैं और शहर के फ़ेवरिट पाँच सितारा होटल की कॉफ़ी शॉप में जाते हैं। ये चौबीसों घंटे खुला रहता है और आप दोनों को यहाँ से कहीं जाने की हड़बड़ी नहीं है। ब्लैक कॉफ़ी सिप करते हुए आप दोनों एक ही दिशा में देख रहे हैं। उधर एक पानी का फ़व्वारा चल रहा है। उसकी आवाज़ भली सी लग रही है। यहाँ कोई और आवाज़ें नहीं हैं। वो किसी कविता की किताब से दो लाइनें पढ़ती है और बेतरह उदास हो जाती है। कविता के पीछे की, कवि के जीवन की कोई घटना सुना रही होती है आपको। 

आप बहुत ग़ौर से देखते हैं उसको। उसकी साड़ी, बिंदी, झुमके...उसकी आँखें...काजल और उँगलियों पर लगी हुयी नेलपोलिश भी। फिर अचानक से आप जानते हैं कि वो क्या बात है जो उसको ख़ास बनाती है। उससे मिल कर भले ही आपका ध्यान बहुत देर तक इस चीज़ पर जाए कि वो दिखती कैसी है...लेकिन उसके साथ वक़्त बिताने के बाद आप भूल जाते हैं कि वो दिखती कैसी है...आपको बस ये याद रहता है कि उसके साथ होते हुए आप कैसा महसूस करते हैं। दिखना मैटर नहीं करता, होना मैटर करता है। उसके साथ रहते हुए आप ज़िंदगी से मुहब्बत में होते हैं। उसी जगह। उसी लम्हे। आप कहीं और नहीं होते। किसी और के साथ नहीं होते, ख़यालों में भी। 

दुनिया में ख़ूबसूरत लड़कियाँ बहुत हैं। उन्हें देख कर ख़ुशी होती है। मगर इस लड़की के साथ होने से ख़ुशी होती है। यही होना सुख है। ठीक तभी आपको डर लगता है कि अगले लम्हे लड़की चली जाएगी, तो फिर? आप तभी पहली बार जानते हैं कि किसी के साथ होते हुए उसी लम्हे इस बात का दुःख क्या होता है कि वो लम्हा जल्दी ही बीत जाएगा। कि अगली रोज़ भी शहर होगा। साँस होगी। ज़िंदगी होगी। उसके बग़ैर। 

और इसी डर से, आप उस लड़की से कभी भी नहीं मिलते। कभी नहीं जानते कि ऐसा भी कोई होता है जिसका साथ होना सुख है। कि जो ख़ूबसूरत दिखती नहीं, महसूस होती है। कि अफ़सोस ऐसी किसी हसीन लड़की के नाम लिखे जाने चाहिए। आपको अफ़सोस पसंद हैं। आप ख़ुश हैं अपनी मर्ज़ी का एक अफ़सोस पा कर। 

जब वो चली जाती है ज़िंदगी से बहुत दूर। उसने किसी को कह रखा है, आप तक ख़बर पहुँचा दे कि वो अब दुनिया में नहीं रही।  आप तब पहली बार चाहते हैं कि उससे एक बार मिल लेना चाहिए था। 

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