02 February, 2010

सबसे अच्छा ऑफलाईन हिंदी टूल आ ही गया :)

ऑफलाईन टाइपिंग के अच्छे टूल की बहुत दिन से तलाश थी, क्योंकि ऐसा कई बार होता था की कुछ लिखने का मन करता था पर इन्टरनेट नहीं होने के कारण नहीं लिख पाती थी. यहीं नहीं कई बार ऐसी जगह जहाँ इन्टरनेट न हो लिखना ही बंद हो जाता था. और एक बार हिंदी के लिए देवनागरी देखने की आदत लगने के बाद रोमन देखना एकदम बर्दाश्त से बाहर हो जाता है. पर मुझे यकीन नहीं हो रहा की फिर से गूगल सहायता के लिए आया है. मैंने पहली बार २००५ में ब्लॉगर पर हिंदी की ये सुविधा देखी थी और तब से हिंदी को रोमन में लिखना लगभग बंद ही कर दिया है. यही नहीं आदत अब वाकई ऐसी पड़ गयी है की रोमन में लिखा कुछ पढ़ने पर दिमाग पर बहुत जोर पड़ता है और अक्सर मैं नहीं ही पढ़ती हूँ.

तो आज गूगल के भले काम को प्रोत्साहन देने के लिए ये पोस्ट. मैंने इससे पहले बारहा पर लिखने की कोशिश की थी, पर वो असंभव रूप से कठिन था, उसपर लिखना एक तरह से सारी वर्णमाला फिर से सीखने के बराबर लगा मुझे. तो मैंने बारहा के बारे में सोचा भी नहीं, कट पेस्ट से काम चल ही जाता था. बस कभी कभार अखर जाता था.

कुछ पोस्ट्स में हिंदी में कमेन्ट लिखने के लिए पहले गूगल ट्रांसलिटरेट खोल के रखना जरूरी हो जाता था. कई बार ऐसा भी होता था की काम के सिलसिले में कुछ लिखना हो और इन्टरनेट बहुत धीरे चल रहा होता है. उस वक्त एक अच्छे ऑफलाइन टूल की बहुत जरूरत लगती थी.

आप भी देखें, इसको डाउनलोड करना बहुत आसान है और सेट उप भी, क्योंकि मुझे कोई भी दिक्कत नहीं आई. आप इसे यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं. मुझे पूरी उम्मीद है की मेरी तरह तकनीकी दृष्टि से कमजोर लोग भी इसका इस्तेमाल कर सकेंगे.

कुश से बात कर रही थी, तो पुछा उसने की फ़ोकट का प्रचार कर रही हो की पैसे मिल रहे हैं J काश मिलते, पर नहीं मिल रहे हैं. हो सकता है एक आध दुआओं का टोकरा इधर आ गिरे...मेरे इस भले काम के लिए.

28 January, 2010

उससे कह कभी मेरे गाँव भी आये...

ए खुदा!
सुना है तेरे गाँव में
एक ऐसा फ़रिश्ता है
जो मरहम से गीत गाता है
कि जिसके क़दमों की आहट से
वसंत बागों में उतर आता है

ए खुदा!
क्या कहीं कोई दरख़्त है
जिससे गले लग कर
तन्हाई ख़त्म सी हो जाती हो
कि जिसकी छाँव तले
इश्क फिर से पनपता है

ए खुदा!
कहते हैं तेरा दिल बड़ा है
तेरे दिल में मेरे लिए
बस थोड़ी सी रहमत नहीं हो सकती
जिंदगी जब मौत से मिलती हो
उस वक़्त मुझे थोड़ी सी खुशियाँ दे सकेगा

ए खुदा!
सब्र करने को, जज़्ब करने को
पल जीने, पल पल मरने को
बहुत लम्बी उम्र दिखती है
मेरे लिए दुआ मांगने
किसी को नहीं भेजा तूने

ए खुदा!
सुना है तुझे वो फ़रिश्ता
बहुत अजीज़ है
मेरी फरियाद सुन...
उससे कह कि वो गीत गाये
उससे कह कभी मेरे गाँव भी आये...

22 January, 2010

जिंदगी का एक दिन

मेरा आज का शेड्यूल
१२ बजे इंटरव्यू (जिसमें सवा बारह बजे पहुंची, कर्टसी एक लोकल नेता जो फुल लाल बत्ती में चिल्ला चिल्ला के जा रहा था, सोचती हूँ, ऐसे किसी अमबुलंस के किये ट्राफिक क्यों नहीं रुकता कभी)

एक बजे घर पहुंची, दो ब्रेड टोस्ट कर के चोखा के साथ खायी(जिनको चोखा का मतलब मालूम नहीं हैं, मेरा ब्लॉग पढ़ना अभी बंद करें, किसी बिहारी दोस्त के यहाँ धावा बोलें और लिट्टी चोखा, या खिचड़ी और चोखा बनवा के खाएं, खिचड़ी खाने के लिए शनिवार शुभ दिन है, गृह कटता है पर लिट्टी चोखा कभी भी चलेगा और वैसे भी वीकेंड है)

२:०० ड्राइविंग क्लास्सेस मारुती ड्राईविंग स्कूल में(वो कमबख्त बिल्ली जिसने दो बार मेरा कार सीखते समय रास्ता काटा, कहीं मिल जाए तो कार से चीप ही देंगे अबरी पक्का...या उसका मालिक अगर हो और अगर हमको मिल जाए तो पांच हज़ार दो सो पचास रुपये उससे वसूल लेंगे)

पहुंचे सवा दो के लगभग और बिल्ली की तरह दबे पांव घुसे क्लास में, प्रेजेन्टेशन के लिए किये गए अँधेरे का भरपूर फायदा उठाते हुए सीट पर विराजमान हुए। एयर कंडिशनर से आती मंद मंद पवन, अँधेरा और पेट में हाल फिलहाल पहुंचा खाना, ऐसी नींद आ रही थी की क्या बताएं। बमुश्किल क्लास पर ध्यान दिए, थ्योरी क्लास बहुत दिन बाद कर रहे थे।

साढ़े चार में क्लास ख़त्म हुआ और simulator पर आधे घंटे का क्लास करने गए। simulator एक डब्बेनुमा डब्बा होता है जिसमें कार का इंजन फिट होता है और बाकी कंट्रोल्स कार के ही होते हैं, सामने विडियो स्क्रीन होती है जिसपर रास्ता आता है। विडियो गेम की तरह...बस ये गेम मज़ेदार नहीं होके बड़ा पेनफुल एक्सपेरिएंस होता है...क्लच गियर वगैरह बदलने में इतनी मेहनत करो और डब्बा वहीं का वहीं। (उसमें पहिये नहीं होते)

सवा पाँच में घर पहुंची, भूख के बारे पेट में चूहे और बिल्ली दोनों दौड़ रहे थे फटाफट आलू पराठा बनाये तो देखे फ़ोन में पीडी का मिस कॉल था...भूख ऐसी लगी थी की पहले एक पराठा खाए साथ में पीडी से बतियाये भी, फिर फ़ोन पर ही दूसरा पराठा बनाये.(मतलब पराठा बनाते टाइम भी बात कर रहे थे) वो भला इंसान मेरे लिए परेशान हो रहा था, और हम खाने के लिए हलकान हो रहे थे...तो दोनों काम एक साथ कर लिए।

६ बजे से गिटार क्लास थी, आज दिन भर में टाइम ही नहीं मिला प्रक्टिस करने का, दुखी आत्मा टाईप निकल लिए की आज तो धोपन खायेंगे ही सर से...और खाए भी। कल का होमेवोर्क नहीं किये थे...कुछ बजा ही नहीं ठीक से। पर धीरे धीरे बजेगा ऐसा मुझे भरोसा है :)

दिन भर आना जाना लगा रहा...अभी हवा पी रहे हैं।

इसी दिन भर में सागर को PR के बारे में ज्ञान भी दे दिए, उस ज्ञान का उपयोग करते हुए वो हमको एक लिंक भी भेज मारा, तो पोस्ट भी पढ़ लिए...गज़ब लिखता है लड़का, एकदम्मे गज़ब।

कुल मिला के आज बहुत काम किये हैं हम। शाब्बाश!

20 January, 2010

उलझनें

जिंदगी बेतरह लम्बी फिल्म है
जिसके पात्र अचानक से कहीं चले गए हैं
और मैं स्टेज पर मौन हूँ
अकेली भी हूँ, और कहने को कुछ ढूंढ रही हूँ

फिल्म विथिन अ फिल्म
जब शब्द ना हों तो मुझे बहुत परेशानी होती है
ये शब्द ही इस दुनिया से जुड़े तंतु हैं
अचानक से माईम आर्टिस्ट कैसे बन जाऊं मैं

मैं चाहती हूँ कोई समझे
कि मैं क्यों बाईक ८० पर चलाती हूँ
कभी कभी
और गाने क्यों सुनती हूँ अँधेरे कमरे में
क्यों साफ़ करने लगती हूँ अलमारियां
क्यों बाल्टी भर कपड़े धो डालती हूँ

क्या ये मौन पात्र नहीं हैं
जिंदगी की फिल्म के फ्रेम का हिस्सा
जब बोलती नहीं हूँ
कलम भी नहीं चलती है

जब सोच में शब्द नहीं होते हैं
कोहरे में छिपे दृश्य होते हैं बस
इन्हें किसी कैनवास पर उतार दूं शायद
क्या मुझसे पेंटिंग हो पाएगी?

रंगों को देखती हूँ तो अचानक से
सब ब्लैक वाईट और ग्रे में बदल जाते हैं
अचानक से मैं खो देती हूँ अपनी आँखें
क्या रंगों को छू कर अलग रंगों का पता चल सकता है?

संगीत अपनी लय खो देता है
मुझे वक़्त का आभास होना बंद हो जाता है
इसलिए ताल नहीं दे सकती मैं
तीनताल, दादरा, कहरवा, दुगुन, तिगुन
सब अनजान हो जाते हैं मेरे लिए
खोयी हुयी दुनिया के खोये शब्द

मैं सृजन करना चाहती हूँ
शायद माँ बनना भी चाहती हूँ
ताकि अपने बच्चे की ऊँगली पकड़ कर
मैं अपनी दुनिया वापस पा सकूँ

जब कोई किरदार नहीं रहे मेरी फिल्म में
मैं एक किरदार पैदा करना चाहती हूँ

औरत हूँ मैं, जिंदगी जन्म दे सकती हूँ
और उसके इर्द गिर्द काट सकती हूँ बाकी समय
बिना गिने हुए, बिना देखे हुए

सिर्फ छू कर...

राधा का भी प्रेम था, यशोदा का भी
कृष्ण ने दोनों को बिछोह दिया


मैं अपने कृष्ण को कहाँ ढूंढ रही हूँ...

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मुझे लगता है मैं पागल हो जाउंगी बहुत जल्दी।

18 January, 2010

यूँ जिंदगी गुज़ार रहा हूँ तेरे बगैर

मुझे मालूम भी नहीं चला कब बाइक चलाना मेरे लिए बोलने या बात करने का पर्याय हो गया। जब मेरे शब्द मुझे बहुत परेशान करने लगते हैं, जब मुझे किसी से बात करने का बहुत मन होने लगता है मैं बाइक लेकर घर से बाहर निकल जाती हूँ...हाथ ऑटो pilot पर चला जाता है...टाइम पर अक्सेलेरटर देना, ब्रेक लेना, इन्डीकेटर देना...सब होता है...पर ऐसे में बहुत सी बातें दिमाग में घूमती रहती हैं, बहुत सी बातें जो मैं शायद किसी और से करना चाहती हूँ। सोचती हूँ इतना अकेले होना कितना दर्द देता है।

ऐसे में अचानक से, बस ऐसे ही सिगरेट पीना चाहती हूँ। मुझे अब इस बात पर यकीन होने लगा है की लोग सिगरेट सबसे ज्यादा बोरियत में पीते होंगे। शायद ऐसा भी लगता है की सिगरेट पीना कहीं ना कहीं खुद को किसी बात के लिए सजा देने के लिए भी पी जाती है। जहर पी के जिन्दा रहना मुमकिन नहीं है ना, इसलिए...धीमा जहर। जो एकदम से मौत नहीं देता, पर इस बात की गारंटी देता है की एक ना एक दिन मौत चुपचाप आके अपने आगोश में ले लेगी।

मुझे शब्द शोर सा लगने लगे हैं, नाकाबिले बर्दाश्त...पढ़ना मुश्किल हो रहा है। एक अजीब सा निर्वात है जिसे किसी चीज़ से भरने में खुद को असफल पा रही हूँ। पहले संगीत या किताबें बिलकुल से ऐसे अजीब विचार मुझे से दूर रखती थीं पर अब नहीं हो पा रहा है। कोई ब्रेक चाहिए मगर किस चीज़ से...क्या अपनेआप से?

कितना आसान होता अगर कभी हम किसी और की जिंदगी जी सकते किसी से यादें स्वैप कर सकते। मैं कुछ पल कुछ और सोच सकती, कोई और सपने देख सकती...

मार्लबोरो लाईट्स का नया डब्बा रखा हुआ है मेज की दराज में कई कागजों के नीचे...उस भरी दराज में बहुत कुछ है, तसवीरें, बिल्स, atm की रसीदें, खुदरा सिक्के, और ढेरों आलतू फालतू चीज़ें। जिस दिन मैं अपने आलस को दूर कर सकुंगी, वो डिब्बा ढूंढ सकुंगी...मगर उसके बाद शायद मेरे बिखरे पड़े घर में लाईटर या माचिस ढूंढना आसान नहीं होगा। बहुत साल हुए उस दिन को...जब लाईटर ख़रीदा था और सिगरेट सुलगाई थी, उसी दिन ये वादा भी तो किया था की इस लाईटर के ख़त्म होने के बाद कभी कोई सिगरेट नहीं पियूंगी। तभी घर के किसी कोने में फेंका था उसे...

पुरानी डायरियों में ये भी देखा था की मुझे भगवान पे बहुत विश्वास था...और बहुत सपने भी थे।

पैक में २० सिगरेट हैं जो पी नहीं, पर साथ में लाये १० चुईंग गम कब के ख़त्म हो चुके हैं, चलूँ कुछ चिल्गम खरीद के रखती हूँ, अगली बार जब सिगरेट पीने की इच्छा जागे उसके लिए।

ये एक शेर, जाने किसका है...उस बेतरह आती याद के लिए जो मुझे जीने नहीं देती।
यूँ जिंदगी गुजार रहा हूँ तेरे बगैर
जैसे कोई गुनाह किये जा रहा हूँ मैं।

15 January, 2010

उसका नाम पम्मी था

मेरे घर वाले मुझे "पम्मी" बुलाते थे...विविध भारती पर या पाकिस्तान रेडियो पर एक अन्नौंसर या शायरा थी पंजाबी, पम्मी कौर...पापा को उसकी आवाज बहुत अच्छी लगती थी तो बेटी का नाम रख दिया पम्मी...मैं भी शायद आवाज के इसी प्रभाव से बहुत बोलती हूँ। मुझे अगर एक घंटे चुप रहने को बोल दिया जाए तो परेशान हो जाती हूँ।

अब इस नाम को सुने इतने दिन बीत जाते हैं की आश्चर्य होता है, शायद कुछ दिन बाद मैं भूल ही जाऊं की मेरा कोई और नाम भी है...कोई अपना सा नाम...जिससे शीशम के पेड़ों की याद आती है, झूले की भी। पर इस नाम से सबसे ज्यादा याद आती है मम्मी की। मैं मम्मी को increasing आर्डर में अगर चिल्ला के बुला रही होती थी तो शुरू होता था मम्मीS , माँSS और आखिर में बस मीSSSS . और ये चिल्लाना हल्ला करना लगभग एक बार रोज तो हो ही जाता था।

दिल्ली आने के बाद रोज आधा घंटा सुबह, और लगभग एक घंटा रात को बात करते ही थे मम्मी से। जब से मम्मी नहीं है, रोज रात को छटपटा जाते हैं बात करने के लिए। कितना भी चाहूँ किसी और बात पर ध्यान लगाना, नहीं कर पाती। कई बार सोते वक़्त लगता है बहुत दिन हो गए मम्मी से बात नहीं किये हैं। फिर अचानक से याद आता है की अब जहाँ मम्मी है वहां तक कोई नेटवर्क नहीं जाता है।

जो लोग कहते हैं की वक़्त के साथ जख्म भर जाते हैं, झूठ कहते हैं...कुछ जख्म कभी नहीं भरते वक़्त के साथ और गहरे हो जाते हैं, हलकी सी चोट पहले से कहीं ज्यादा दर्द देती है। और दर्द की कोई दवा मुझे मालूम नहीं है। मुझे नहीं पता की ये पहाड़ सी दिखती जिंदगी मैं मम्मी के बिना कैसे काटूँगी...हर चीज़ में उसकी याद आती है।

मुझे ना तो उसके जैसी बादाम की चटनी बनानी आई इतने दिनों में, ना बादाम की चटनी के बिना आलू पराठा खाना आया...ना मुझे सांभर पसंद आता है ना कढ़ी...ना भुजिया ना मूढ़ी। परेशान हो गयी हूँ, खाने में से स्वाद आखिर कहाँ चला गया है?

किसी को खूबसूरत सा स्वेटर पहने देखती हूँ तो टीस उठती है की अभी मम्मी होती तो बस दिखाना भर था और स्वेटर बन के आ जाता। हर ठंढ में कितने स्वेटर, मोज़े, स्कार्फ सब बना देती थी। अब जबसे मम्मी नहीं है, ठंढ ही लगनी बंद हो गयी है। ठंढ का मौसम भी कितना रूखा सा हो गया है। पहले ठंढ का मतलब होता था मम्मी से जिद करके ऐसा कुछ बनवाना जो किसी के पास ना होता हो।

कोई परेशानी, दुःख, ख़ुशी...सब कुछ तो बात कर सकती थी माँ से। अब जैसे अचानक से कुछ नहीं रहा। सब टूट के बिखर गया है।

जो लोग कहते हैं की प्यार सब कुछ होता है जिंदगी में, झूठ कहते हैं। जिंदगी में सब कुछ बस माँ होती है। बस।

तुम्हारी बहुत याद आती है मम्मी।

11 January, 2010

बस इक उस के जैसा दूसरा चाहता है

ए खुदाया दिल मेरा ये क्या चाहता है
बस इक उस के जैसा दूसरा चाहता है

जख्म कितने मिलें मुझको परवा नहीं
उसके होठों पे मेरी दुआ चाहता है

कब रही जिंदगी अपने अरमानों सी
मौत वो एक हसीं ख्वाब सा चाहता है

हर शख्स से कुछ मिलता है उसका तसव्वुर
वो अपनी आँखों में पर्दा नया चाहता है

बहुत दिन हुए तेरा नाम होठों पे आये
बीता अरसा अब धड़कनें सुनना चाहता है

कल खोले थे मैंने डायरी के पन्ने
हर लफ्ज़ अब ग़ज़ल बनना चाहता है

तुम पुकारो नहीं फिर भी लौट आऊं मैं
कोई ऐसी वजह ढूंढना चाहता है

कतरे कतरे में बिखरा हुआ इश्क है
दिल्ली में वैसे ही बिखरना चाहता है

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