03 October, 2008

आतंक में सुबहें

इधर कुछ दिनों से सुबहें कुछ अजीब सी होती हैं। बेड से उठ कर अखबार उठाने जाने तक सच में इश्वर से प्रार्थना करती हूँ, कि भगवान आज कहीं ब्लास्ट न हुआ हो। आज फ़िर से खून में रंगी तसवीरें न दिखें सुबह सुबह। मेरे जीजाजी दिल्ली पुलिस में हैं, तो मैं उनसे भी बात कर रही थी कि ये अचानक क्या हो हो गया है, हर रोज़ कहीं न कहीं क्यों ब्लास्ट कर रहे हैं। उनके पास भी कोई जवाब नहीं था।

मैं सोच रही थी कि मेरी तरह कितने लोग इस डर में सुबह उठते होंगे कि कहीं कोई बम न फटा हो, पर उनके डर की वजह कहीं और गहरे होती हैं। मैं एक खास धर्म को मानने वालों कि बात कर रही हूँ, जिनको हर ब्लास्ट के बाद लगता है की कुछ निगाहें बदल गई हैं, अचानक लोगों की बातें थोडी सर्द हो गई हैं। कितना मुश्किल होता होगा न ऐसे जीना, सब कुछ हमारे जैसा होते हुए भी सिर्फ़ इसलिए की कुछ आतंकवादी इस धर्म के हैं उन्हें कितना कुछ झेलना पड़ता है।

आतंकवादी का क्या सच में कोई इमां, कोई धर्म होता है...क्या ये सब सिफर राजनीति नहीं है, एक गहरी साजिश जिसमें पहले रूस अमेरिका और अब कई जगह छोटे देश भी समस्या से जूझ रहे हैं। कल रात एक फ़िल्म देख रही थी, नाम तो याद नहीं पर उसमें एक डायलोग था "one man's terrorist is another man's freedom fighter"। फ़िर लगा की क्रन्तिकारी और आतंकवादी में कितना अन्तर होता है। कौन सा क्रन्तिकारी अपने किसी भी मकसद के लिए निर्दोषों की जान लेना सही समझता है, अगर मासूम बच्चो को अनाथ करके किसी का कोई उद्देश्य पूरा होता भी है तो is it worth it.

बरहाल मैं मूल मुद्दे से भटक गई, काफ़ी दिनों से सोच रही हूँ...

क्या बात है कि मुस्लिम हमारे साथ घुल मिल नहीं पाये हैं अभी तक। मेरी दादी को कोई मुस्लिम छू लेता था तो वो सर से nahati थी। मुझे याद है पापा के एक बड़े अच्छे दोस्त थे मुकीम, एक बार वो और भट्टाचार्जी अंकल साथ में घर आए, तो जैसा होता है दोनों ने पैर छुए दादी के। जब दोनों चले गए तो दादी ने पुछा कि क्या नाम था, तो पापा ने कह दिया कि भट्टाचार्जी और उसका छोटा भाई था।

और ये आज से तकरीबन दस साल पुरानी बात है, मैं ऐसे कई घरों को जानती हूँ जहाँ उनके खाने का बर्तन अलग होता था। मैं उस वक्त बहुत छोटी थी और मुझे आश्चर्य होता था कि ये अछूत वाला व्यवहार क्यों होता है। उन्हें रहने के लिए मकान ढूँढने में दिक्कत होती होगी, मैं इसलिए कह रही हूँ क्योंकि मैं जानती हूँ कि उन्हें कोई किरायेदार नहीं banana चाहता है। और ये सब हाल कि बात है

तो लगता है की इनमें रोष क्यों नहीं होगा, क्यों नहीं ये थोड़ा बरगलाने पर तैयार हो जाते होंगे. इन्हें सच में दिखता है की परायों की तरह हैं ये अपने देश में. नेता भी सिर्फ़ वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करते हैं उनको. एक आम राय में उन्हें भरोसेमंद नहीं माना जाता है...ऐसा क्यों है.मैं एक ब्राह्मण परिवार से हूँ, भागलपुर तरफ़ से, मध्यमवर्गीय, देवघर और पटना में रही हूँ, मुझे नहीं पता की देश के अन्य हिस्सों में उनके साथ कैसा सलूक किया जाता है. पर जिस समाज में मैं रही हूँ उसमे बहुत जगह भेद भाव है. हालाँकि बहुत बदलाव आया है, जैसे की पापा के दोस्त मुस्लिम भी थे, और मुझे तो इससे कभी कोई फर्क ही नहीं पड़ा. ईद पर की सेवई मैं कभी नहीं छोड़ती थी. तो क्या आने वाली जेनरेशन ज्यादा आसानी से एक्सेप्ट करेगी उन्हें.
पर फ़िर मुझे लगता है...कहीं ऐसा तो नहीं की बहुत देर हो चुकी है. वो हमसे इतनी दूर जा चुके हैं की लौट आना सम्भव नहीं. की ये ब्लास्ट हर दिन होते रहेंगे छोटे छोटे शहरों में मौत बेमोल सडकों पर चीखती चिल्लाती रहेगी और घेत्तो में बस जायेंगे लोग. हर धर्म की अलग बस्ती, हर जाति का अलग मोहल्ला.
कभी कभी डर जाती हूँ...

मैंने इस पोस्ट में सिर्फ़ अपने ख्याल व्यक्त किए हैं, ये मेरा अनुभव है जिंदगी का. कईयों का अलग होगा मुझसे पर ये मेरी जिंदगी का हिस्सा है. मालूम नहीं पर नाज़ुक विषय है अगर मेरी बात से किसी को दुःख पहुँचता है तो अग्रिम क्षमाप्रार्थी हूँ.

17 comments:

  1. विषय पर सशक्त लेखन ! बहुत प्रभावित करने वाली पोस्ट !
    शुभकामनाए !

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  2. आपने बहुत ज्वलंत मुद्दे को विषय बनाया है ! अमूमन सार्वजनिक रूप से इस विषय से लोग बचने की कोशीश करते हैं ! पर आपने जिस साफगोई से लिखा, वो काबिले तारीफ़ है ! सारे मुद्दे जो आपने लिखे वो बिल्कुल सत्य हैं ! बल्कि जो आपके aubhav लिखे उनमे कुछ बदलाव जरुर है ! बावजूद इसके एक बात मैं कहना चाहूँगा और कहता रहूंगा की दैनिक जीवन में किसी भी हिन्दू मुस्लिम को
    आपस में कोई तकलीफ नही है ! और ये जो सारी झगडे की जड़ हैं ये सब स्वार्थों की है ! जब तक राजनैतिक स्वार्थ रहेंगे, ये इस खाई को और बढाते रहेंगे, क्योंकि इसी में इनके हित हैं !

    आपने बहुत अच्छा और सुंदर लिखा है ! लिखने की शैली पसंद आई ! बहुत शुभकामनाएं !

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  3. आज जो सब हो रहा है वह बहुत दुखद है ...मुझे लगता है की आपस में किसी की किसी से कोई दुश्मनी नही है पर कुछ लोग हैं जो सिर्फ़ अपने स्वार्थ के बारे में सोचते हैं और इसका नुकसान आम जनता उठाती है ...आपने बहुत अच्छा लिखा है ..कुछ बातें बिल्कुल सही लिखी है ...

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  4. निःसंदेह जो हो रहा है वह समाज को आखिर में तोड़ता ही है
    गावों में छुआछूत भले थी पर दिलों में दूरी नही थी आज दिलों में दुरी बढती जा रही है और शक के साए रिश्तों पर छाते जा रहे हैं इन दूरियों को समझना होगा और मिटाना होगा वरना दरारों का फायदा फिरकापरस्त उठाएंगे ही

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  5. माफ़ी मांगने की क्या ज़रूरत है? सच तो सच ही है। कारण खोजना और उनके समाधान खोजना भी हमारा ही काम है।

    पुनश्च: मेरे ब्लोग का लिंक यहां? अनेकानेक धन्यवाद!!!

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  6. well edited, and amazing word power in simple array
    regards

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  7. बहुत ही दुख होता है ऐसी खबरों को देख । आतंक मानवता के लिए घातक है पर हमारे यहां लोग इसे जाति और धर्म से जोड़ कर देखते हैं । अच्छा लिखा है आपने ।

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  8. पूजा
    पिछले कई दिनों से हम सब व्यथित है ओर कई बार मै कुछ लिखते लिखते छोड़ देता हूँ ये सोचकर की इस सवेदनशील मुद्दे पर लिखने के लिए वक़्त ओर शब्दों के सही चुनाव की जरुरत होगी ,कई बार कुछ ब्लॉग पढ़कर मन व्यथित हो जाता है....इस समय समाज जिस धुंध से गुजर रहा है उसमे दोनों ओर से कदम बढ़ाने की जरुरत है ,बहुसंख्यक समाज को ओर धर्य रखने की ओर अल्पसंख्यक समाज के बुद्दिजीवी वर्ग को राष्ट्विरोधी ताकतों के सामने खुलकर सामने आने की जरुरत है ,ओर दोनों को अपने अपने पूर्वाग्रह त्यागने पड़ेगे अगर इस देश को दूसरा अफगानिस्तान या पकिस्तान बन्ने से बचाना है तो !
    मीडिया को अपने सरोकार टी.आर .पी से नही समझ बूझ से तय करने होगे ,हमें ये भी ध्यान रखना होगा की हमारी आर्म फाॅर्स ओर पुलिस का मनोबल न टूटे .....कही न कही हम सबको ये रास्ता तय करना होगा ....अलगाववादी एक आम समाज में नफरत ओर अविश्वास का बीज बोना चाहते है ....ओर उसे ही हमें ग़लत साबित करना है....अपनी असहमतियों को अलग छोड़कर ...
    तुमने लिखा ओर खुलकर लिखा मुझे अच्छा लगा ओर गर्व भी हुआ ....i am proud of you

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  9. bahut achcha aur sundar lekhan....

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  10. अच्छा लिखा है आपने. लेकिन क्या ऐसा है की हम साम्प्रदायिकता की भावना से ऊपर उठ गए है लेकिन जातियता से नहीं? पता नहीं कैसे लेकिन आपकी ये post देख के इस post (http://laharein.blogspot.com/2008/09/blog-post_08.html) की आखिरी line के बारे में ध्यान आ गया.

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  11. @chandan. aap bilkul hi do alag posts ko compare kar rahe hain. aap agar gaur se poori post padhte to shayd aapko dikhta ki dono ki shaily kitni alag hai. aapne jis post ka link diya hai wah poori tarah se vyangya me likha gaya hai...us mazak me likhe gaye post ko is post ke sath tulna karna bilkul bemani hai aur is post ki gambheerta ko kam karta hua lagta hai. kya aapne dono posts padhi bhi hain ya sifr last line dekh kar comment kar diya hai?

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  12. सही है!! आपने अपने विचार रखे,आना वाला समय एक बड़ा बदलाव लेकर आयेगा. ऐसा मेरा मानना है.

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  13. अच्छा लिखा है। हिंदू-मुसलमान के बर्तन अभी भी तमाम जगह अलग चलते हैं।

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  14. Bahut sahi likha hai... hamaara samaaj aaji wahiiN ghada hai - haalaaNki hum sah uss ke hisse --- kitni aheej baat hai ..... kitme majboor hain hum.......... Ek din aayega .... jaldi hi ... hum san agar isii tarah apni baat saafgoi se kehte ragen.... Bahut khoob Pooja

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  15. घुमते-घुमाते आपके ब्लॉग पर पहुंचा.... अच्छा लगा. आपके लेखों/कविताओं में एक ईमानदारी झलकती है. और यही आपके लिखने की खासियत है. आपका भविष्य उज्जवल है... ढेर सारी शुभकामनाएँ

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