15 June, 2008

यूँ ही...




दिल में बेआवाज़ रो रही होगी
बस तुम्हारे सामने हँस रही होगी

तुमसे ही क्यों हैं उम्मीदें उसको
वो कभी तुम्हारी कुछ रही होगी

नहीं उसे किसी का इंतज़ार नहीं
यूँ ही उस मोड़ पर रुक रही होगी

किसी पत्थर पे अपने आँसुओं से
कोई भूली ग़ज़ल लिख रही होगी

तुम जिस मोड़ से आगे चले आए
वो वहीं तुमको ढूंढ रही होगी

कब्र में सिर्फ़ जिस्म रखा है
रूह अब तक भटक रही होगी

10 comments:

  1. बहुत सुंदर लिखा आपने.. बधाई

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  2. bahut hi badhiya bhav,badhai

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  3. कब्र में सिर्फ़ जिस्म रखा है
    रूह अब तक भटक रही होगी

    सुन्दर रचना बधाई।

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  4. lajawab...puri ghazal lajawab....

    ye sher kuchh zyada hi chotdar laga...

    तुमसे ही क्यों हैं उम्मीदें उसको
    वो कभी तुम्हारी कुछ रही होगी

    likhte rahiye...

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  5. This comment has been removed by the author.

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  6. किसी पत्थर पे अपने आँसुओं से
    कोई भूली ग़ज़ल लिख रही होगी

    सुन्दर और कोमल रचना..

    ***राजीव रंजन प्रसाद

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  7. किसी पत्थर पे अपने आँसुओं से
    कोई भूली ग़ज़ल लिख रही होगी

    तुम जिस मोड़ से आगे चले आए
    वो वहीं तुमको ढूंढ रही होगी

    बहुत खूबसूरत शेर......

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  8. बेहतरीन ख़याल हैं..

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  9. साफ़ सी बात है मुझे हिंद युग्म में आपके रचना ने आपके ब्लॉग तक आने मज़बूर किया और अब यहाँ तो कविता क्या पूरा पूरा खजाना है
    मेरी शुभ कामनाए

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  10. i m speechless.....waaaah..hm jante hai k ye kam hai kahne ke liye lekin mere pas koi or shabd nahi hai tareef ke liye..khubsurat

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