18 January, 2015

जिंदगी एक टर्मिनल इलनेस है मेरी जान

वो एक कलपा हुआ बच्चा है जिसकी माँ उसे छोड़ कर कुछ देर के लिए पड़ोसी के यहाँ गयी है शायद...दौड़ते हुए आया है...चूड़ी की आहट हुयी है या कि गंध उड़ी है कोई कि बच्चे को लगता है कि मम्मी लौट आई वापस...जहाँ है वहां से दौड़ा है जोर से...डगमग क़दमों से मगर रफ़्तार बहुत तेज़ है...सोफा के पाए में पैर फंसा है और भटाक से गिरा है...मोजैक के फर्श पर इस ठंढ में माथा में चोट लगा है जोर से...वो चीखा है...इतनी जोर से चीखा है जितनी जोर से चीखने में उसको यकीन है कि मम्मी जहाँ भी है सब छोड़ कर दौड़ी आएगी और गोदी में उठा लेगी...माथा रगड़ेगी अपनी हथेली से...उस गर्मी और माँ के आँचल की गंध में घुलमिल कर दर्द कम लगने लगेगा. लेकिन मम्मी अभी तक आई नहीं है. उसको लगता है कि अभी देर है आने में. वो रोने के लिए सारा आँसू रोक के रखता है कि जब मम्मी आएगी तो रोयेगा. 

मैं उसकी अबडब आँखें देखती हूँ. ये भी जानती हूँ कि दिदिया का जिद्दी बेटा है. मेरे पास नहीं रोयेगा. उसी के पास रोयेगा. मैं फिर भी पास जा के देखना चाहती हूँ कि माथे पे ज्यादा चोट तो नहीं आई...अगर आई होगी तो बर्फ लगाना होगा. एक मिनट के लिए ध्यान हटा था. इसको इतना जोर से भागने का क्या जरूरत था...थोड़ा धीरे नहीं चल सकता. इतनी गो का है लेकिन एकदम्मे बदमाश है. दिदिया आएगी तो दिखा दिखा के रोयेगा...सब रोक के बैठा है. एक ठो आँसू नहीं बर्बाद किया हम पर. जानता है कि मौसी जरा सा पुचकार के चुप करा देगी...देर तक छाती से सटा कर पूरे घर में झुला झुला देने का काम नहीं करेगी...मौसी सोफा को डांटेगी नहीं कि बाबू को काहे मारा रे. मौसी का डांट से सोफा को कोई फर्क भी नहीं पड़ेगा. मौसी तो अभी खुद बच्ची है. उसका डांट तो दूध-भात हो जाता है. मौसी का डांट तो हम भी नहीं सुनते. मम्मी का डांट में असर होता है. मम्मी डांटते हुए कितनी सुन्दर लगती है. दीदी से जब गुलमोहर का छड़ी तुड़वाती है तब भी. 

तुमको पढ़े.
मन किया कि दुपट्टा का फुक्का बना के उसमें खूब सारा मुंह से गर्म हवा मारें और तुम्हारे सर पर जो चोट लगी है उसमें फुक्का दें...देर तक रगड़ें कि दर्द चला जाए. लेकिन ये मेरा हक नहीं है. तुमको पढ़े और देर देर तक अन्दर ही अन्दर कलप कलप के रोना चाहे. लेकिन हमको भी चुप कराने के लिए मम्मी का दरकार है. वो आएगी नहीं. 

हमको क्या बांधता है जानते हो? दुःख. ये जो बहुत सारा दुःख जो हम अपने अन्दर किसी बक्से में तरी लगा लगा के जमाते जाते है वो दुःख. मालूम है न हीरा कैसे बनता है? बहुत ज्यादा प्रेशर में. पूरी धरती के प्रेशर में. और फिर कभी कभी लगता है तुमको धुनाई की जरूरत है बस. तुम पुरानी रजाई की तरह होते जा रहे हो. तुम्हारे सारे टाँके खोल के...ऊपर की सारी परतें हटा कर सारी रुई धुन दी जाए...तुम्हारी रूह बाकी लोगों से अलग है...उसको कुटाई चाहिए होता है. मगर तुम्हारी रूह को मेरे सिवा और कोई छू भी तो नहीं सकता है. इतनी तबियत से बदन का पैराहन उतारना सबको कहाँ आता है. सब तुम्हारे जिस्म के कटावों में उलझ जायेंगे...ये डॉक्टर की तरह सर्जरी का मामला है...बदन की खूबसूरती से ऊपर उठ कर अन्दर लगे हुए कैंसर को देखना होता है.

हम तुमसे कभी नहीं मिलेंगे. तुम्हारे बदन पर पड़े नील के निशान अब लोगों को मॉडर्न आर्ट जैसे लगने लगे हैं. जल्दी ही तुम्हारा तमाशा बना कर तुम पर टिकट लगा देंगे लोग. हम तब भी तुमसे नहीं मिलेंगे. दिल्ली में बहार लौटेगी. गुलाबों के बाग़ देखने लोग दूर दराज से आयेंगे और उनकी खुशबू अपने साथ बाँध ले जायेंगे. मैं कभी तुम्हारे किचन में तुम्हारे लिए हल्दी-चूना का लेप बनाने का सोचूंगी. मैं तुम्हारे ज़ख्मों को साफ़ करने के लिए स्कल्पेल और डिटोल लिए आउंगी. तुम्हें जाने कौन सी शर्म आएगी मुझसे. मेरे सामने तुम कपड़े उतारने से इनकार कर दोगे...बंद कमरे में चीखोगे...नर्स. नर्स. सिस्टर प्लीज इनको बाहर ले जाइए. मैं फफक फफक के रोउंगी. तुम हंसोगे. 'तुमको हमसे प्यार हो रहा है'. 

इस दर्द में. इस टर्मिनल इलनेस में तुम्हारा माथा ख़राब हो गया है या कि इश्क हो गया है तुमको. जिंदगी एक टर्मिनल इलनेस है मेरी जान. हम सब एक न एक दिन मर जायेंगे. मैं तुम्हारे कमरे के दरवाजे के आगे बैठी हूँ...तुम्हें जिलाने को एक ही महामृत्युंजय मन्त्र बुदबुदा रही हूँ 'आई लव यू...आई लव यू...आई लव यू'. तुम कोमा से थोड़ी देर को बाहर आते हो. डॉक्टर्स ने मोर्फिन पम्प कर रखी है. कहते हैं शायद तुम दर्द में नहीं हो. मैं तुम्हारी रूह में थर्मामीटर लगाना क्यूँ जानती हूँ? तुम मरणासन्न अपने बेड पर रोते हो. मैं तुम्हारे कमरे के बंद दरवाज़े के आगे. तुम पूछते हो मुझसे. 'बताओ अगर जो मैं मर गया तो?'. 

मेरी दुनिया बर्बाद होती है...अक्षर अक्षर अक्षर...मुझे कहने में जरा भी हिचक नहीं होती. 'तुम अगर मर गए, तो हम लिखना छोड़ देंगे'. 

पुनःश्च
'हम' लिखना छोड़ देंगे...अलग रहे हैं क्या मैं और तुम? मेरे लिखे में कब नहीं रहे हो तुम...या कि मेरे जीने में ही.
सुनो. हमको इन तीन शब्दों के मायने नहीं पता...लेकिन तुमसे कहना चाहते हैं.
आई लव यू.

15 January, 2015

तुम्हारी जुबां पे चाय है, हमारी जुबां पे इश्क़


लोगों के सीखने का तरीका अलग अलग होता है. कुछ लोग किताबों से सीखते हैं...कुछ फिल्मों से तो कुछ अपनी तरह का रिसर्च करते हैं. मैं सोचती हूँ कि मैं क्या क्या कैसे कैसे सीखती हूँ...तो अब तक देखा है कि जिंदगी में इश्क से बहुत कुछ सीखा जा सकता है. हर बार जब इस मुसीबत से सामना होता है तो जिंदगी अलग रंग में नज़र आती है. सब कुछ बदल जाता है...सिगरेट की ब्रैंड...पसंद की ड्रिंक...पसंद का परफ्यूम...इश्क हमें हर कुछ दिन में पुनर्नवा कर देता है. हम कोई और ही हो जाते हैं...और अक्सर पहले से न्यू इम्प्रूव्ड वर्शन ही बनते हैं.

इश्क में होने पर महबूब की सारी चीज़ें अच्छी लगती हैं...तो हम धीरे धीरे सब जानना शुरू करते हैं...उसका परिवेश...उसके शौक़...उसकी पसंद की ड्रिंक्स...चाय कैसी पसंद है उसे...आलम यहाँ तक हुआ है कि मुहब्बत में हमने चाय तक पीनी शुरू की है...बतलाइये, लोग देवदास को गाली देते हैं कि दारू पी के मर गया...हमारे लिए चाय दारू से ज्यादा बड़ी चीज़ थी. कसम से. बचपन से लेकर अब तक, जिंदगी में सिर्फ तीन कप चाय पिए थे. पहली बार कॉलेज के सेकंड इयर में एजुकेशनल ट्रिप पर गए थे...वहां सब को चाय सर्व की गयी, तो बोला गया कि न पीना बदतमीजी होगी. तो बड़ी मुश्किल से आधा कप गटके. वो था जिंदगी का पहला चाय का कप. दूसरी बार दिल्ली में एक दोस्त ने जिद करके पिलाई थी...सर्दियों के कमबख्त से दिन थे खांसी हो रखी थी...गला दर्द. उसने कहा अदरक डाल के चाय बना रही हूँ, चुप चाप पी...मेरे हाथ की चाय को कोई मना नहीं करता. तीसरी बार एक्स-बॉयफ्रेंड ने पिलाई थी. ब्रेक ऑफ के कई सालों बाद मिला था. उसकी जिद थी, मेरे हाथ की चाय पियो...बहुत अच्छी बनाता हूँ. उसके सामने जिद करने का मन नहीं किया. याद कर रही हूँ तो जाने क्यूँ लग रहा है कि इतना रोना आ रहा था कि चाय नमकीन लगने लगी थी. आखिरी बार मिल भी तो रही थी उससे. 

मुझे भी क्या क्या न जानना होता है उसके बारे में. तुम्हें चाय कैसी पसंद है? 'कड़क...बहुत कड़क'. मैं कहीं याद में घूमती भटकती इस शब्द के साथ कुछ तलाशने की कोशिश करती. कुछ हाथ नहीं आता. क्या कमज़र्फ शय है ये मुहब्बत भी कसम से. जिस चीज़ को कभी कॉलेज में हाथ नहीं लगाया...पीयर प्रेशर के सामने नहीं झुके...सो उसने बस बताया कि उसे चाय बहुत पसंद है और हम हो गए चाय के मुरीद. कॉफ़ी से पाला बदल लिया. 

चाय की पहली याद है दार्जलिंग की...चाय बागानों में जाने के लिए एक रोपवे होता है...उस छोटे से झूलते केबिन में खिड़कियाँ थीं...बीच में यूँ लग रहा था जैसे स्वर्ग में आ गए हों...चारों तरफ बादल ही बादल...नीचे ऊपर...सब ओर. बहुत बहुत दूर तक चाय के बगान...चाय के प्लांट्स में सूखती चाय की पत्तियां...चाय बनाने का पूरा प्रोसेस...वो तीखी मीठी गंध याद रही थी बहुत दिन तक. घर पर लोगों को मेरे हाथ की चाय बहुत पसंद थी. फरमाइशी चाय हुआ करती थी हमारी...कभी अदरक, कभी इलायची, कभी दालचीनी...जो मूड में आया वो डाल दिए. खुशबू से जानते थे कि चाय बनी है कि नहीं. मालूम, अपने हाथ की चाय खुद कभी नहीं टेस्ट किये हैं. आज तक भी. 

फिर सोच ही रही थी कि चाय के साथ ऐसा सौतेला व्यवहार ठीक नहीं. एक तो साउथ इंडिया में रहने के कारण सब जगह कॉफ़ी मिल जाता है तो कौन मगजमारी करे. लेकिन जाने क्यूँ उसने चाय के लिए कुछ तो ऐसा कहा था कि कलेजा जल मरा था. चाय न हुयी, सौत हो गयी. चख के देखना है स्वाद कैसा है उसका. समन्दरों वाला एक शहर था...बहुत तेज़ भागता...बहुत तेज़. उसके नमक से होटों पर जलन होती थी. मैं समंदर किनारे टहलते हुए पहाड़ों के बारे में सोच रही थी कि हम जहाँ होते हैं वहां के अलावा कहीं भी और होना चाहते हैं. जैसे मैं अभी सिर्फ उसके पास होना चाहती हूँ. मेरा न प्रोजेक्ट में मन लगेगा न किसी चिट-चैट में. सोचा थोड़ा टहल लूं...मन बहल जाएगा. वहां साइकिल पर चाय बेचता एक छोटा सा लड़का था 'दीदी चाय पियोगी?' मैं इस इसरार पर तुम्हें भी भूल गयी. फिर जाने कितनी कप चाय पी और उस छोटू के कितने किस्से सुने. वापस होटल आई तो चाय की तलब लग रही थी. तलब तुम्हारी भी लग रही थी. चाय आर्डर की और बेड पर पड़ गयी...टीवी पर मेरा पसंदीदा एनरिके का गाना आ रहा था 'आई कुड बी योर हीरो बेबी...आई कुड किस अवे द पेन'

तब से बस, ओकेज्नली पी लेते हैं चाय. ओकेजन बोले तो तुम्हारी याद तुम्हारे इश्क से ज्यादा हो जाए वैसा ओकेजन.

'व्हाट?...तुमने चाय पीनी छोड़ दी है...कि मैं नहीं पीती इस लिए...ब्लडी इडियट...डैम इट...इश्क़ साला फिर से हमसे बाज़ी मार ले गया!'

14 January, 2015

एक रोज़ वो खरीद लाता मेरे लिए गुलाबी चूड़ियाँ

उससे बात करते हुए उगने लगता है एक नया शहर
जिसमें हम दोनों के शहरों से उठ कर आये कुछ रस्ते हैं
कुछ गलियां, कुछ पगडंडियां और कुछ पुराने बाज़ार भी

उसके शहर का डाकिया मुझसे पूछता है उसकी गली का पता
मेरे मोहल्ले के मोड़ पर शिफ्ट हो जाता है उसकी सिगरेट का खोमचा
फेरीवाला उसके यहाँ से खरीदता है पुराना कबाड़
और मुझे बेच देता है उसकी लिखी सारी डायरियां
मैं देर देर रात भटकती रहती हूँ बैंगलोर में
यहाँ गंध आती है उसके गाँव की
उसके लड़कपन की...
उसके आवारागर्दी के किस्सों की

हम दोनों निकाल लाते हैं अपनी अपनी स्ट्रीट कैट
और उसके काले हैंडल पर फ़िदा होते हैं एक साथ ही
मुझे यकीन नहीं होता कि हमारे पास हुआ करती थी एक ही साइकिल
सुबहों पर मेरा नाम लिखा होता था, शामों पर उसका
हम किसी दोपहर उसी एक साईकिल पर बैठ कर निकल जाते किसी भुट्टे के खेत में

मैं उसे सिखाती गुलेल से निशाना लगाना
और वो मुझे तोड़ के देता मोहन अंकल के बगान से कच्चा टिकोरा
मैं हाफ पैंट की जेब में रखती नमक के ढेले
हम लौट कर आते तो पीते एक ही घैला से निकाला ठंढा पानी

उसे बार बार लगता मैं मैथ के एक्जाम में फेल हो जाउंगी
मुझे लगता वो सारे एक्जाम में फेल हो जाएगा
जब कि हम क्लास में फर्स्ट और सेकंड आते, बारी बारी से

एक रोज़ वो खरीद लाता मेरे लिए गुलाबी चूड़ियाँ
मैं अपने दुपट्टे से पोछ देती उसके माथे पर बहता पसीना
वो मुझे वसंत पंचमी के दिन एक गाल पर लगा देता लाल अबीर
मैं इतने में हो जाती पूरी की पूरी उसकी

मगर फिर ख़त्म हो जाते उसकी डायरी के पन्ने
और मुझे लिखनी होती एक पूरी किताब
सिर्फ इसलिए कि उसके नाम से रच सकूं एक किरदार
और कह सकूं दुनिया से 'कहानी के सारे पात्र काल्पनिक हैं'

12 January, 2015

दुनिया में अगर सिर्फ तीन लोगों से प्यार किया है तो बस पापा से, मंटो से और तुमसे

नहीं. आज मैं चीखूंगी. 'आई लव यू पापा'. मगर यहाँ क्यूंकि फोन पर कितना भी मन होने पर हिम्मत नहीं हो पायी. जबान अटक गयी. पापा से ऐसा नहीं कह सकती. इन फैक्ट हमारे बिहार में अपनों से आई लव यू कभी कहने का कल्चर ही नहीं रहा. भाई को भी कभी नहीं कहा. मम्मी को नहीं. बेस्ट फ्रेंड को नहीं. पर आज मन कर रहा था. फिर फाइनली भाई को फोन किया और किस्सा सुनाया...कि चिल्ला कर पापा को कहने का मन था. कह नहीं पाए.

बात छोटी सी है लेकिन आज यहाँ दर्ज करनी जरूरी है. एक अख़बार में वीकली कौलम लिखने की बात आई. अब बात आई है तो साथ हज़ारों सवाल भी लाती है. क्या लिखें, कैसे लिखें...संपादक की अपनी सोच होगी, मेरी अपनी. अपने विचारों को लेकर हम ऐसे ही परेशान रहते हैं कि काफी क्रन्तिकारी और बागी तेवर रहे हैं लड़कपन में. अभी खुद को समझा कर सभ्य करके और बाँध के रखते हैं. ऐसे किसी प्लेटफार्म का मिलना सॉलिड थ्रिल है. क्लिफ डाइविंग जैसा. 

पापा से बात हो रही थी. दुनिया जहान, घर परिवार की सारी बातें ख़त्म होने के बाद हमको ये बात कहनी थी पापा से. पूछना था एक तरह से कि सेल्फ-सेंसरशिप तो हम जाने नहीं कभी. कि पापा एक अख़बार से ऐसा मेल आया है...वीकली फीचर है...क्या करें...लिखेंगे तो लोग फूल भी फेंकेंगे और पत्थर भी...जाहिर तौर से फूल से ज्यादा पत्थर फेंकेंगे. पापा कहते हैं, 'बेटा मंटो अगर पत्थर का चिंता करता तो कभी लिख पाता' हमारा दिल मंटो के नाम पर ही धक् से रह गया. एकदम धक् से. जैसे कि एब्सोल्यूट फ्रीडम नाम की कोई चीज़ होती है. कि अब हम आग लगा सकते हैं दुनिया में. और फिर पापा कहते हैं 'आप कब से चिंता करने लगे कि दुनिया क्या कहती है'. तब मेरा चीख चीख के कहने का मन किया फ़ोन पर...कि आई लव यू पापा...और मैं एकदम पूरी की पूरी आपके जैसी हूँ. जैसी हूँ. एकदम आपकी बेटी. आखिर कारण है कि १५ साल की लड़की को राजदूत चलाने सिखा देते हैं आप...आज और किसी का भी उदहारण देते तो बात नहीं होती मगर मंटो...उफ़ मंटो मेरी जान...जैसे जिंदगी एकदम खुशरंग लगने लगी है. जैसे आवाजें कितनी साफ़ हो गयी हैं. जैसे मुझे अब किसी से डर नहीं लगता. किसी का डर नहीं लगता. जैसे कि मैं वही लड़की हूँ...चार नंबर गियर में अस्सी की स्पीड पर मोटरसाइकिल उड़ाने वाली कि जब गिरेंगे तब देखेंगे...जब चोट लगेगी तब डिटौल लगायेंगे...फिलहाल इस लम्हे मैं उड़ सकती हूँ. ये पूरा आसमान...देख रहे हो ये पूरा आसमान मेरा है. 

पहला काम किये कि दोस्त को फ़ोन किये...चीख रहे थे...मंटो मंटो मंटो...बता रहे थे उसको कि बताना है कि मंटो को हिचकियाँ आ रही होंगी. कि हम इतनी शिद्दत से याद कर रहे हैं. उसको बताये कि पापा से बात कर रहे थे. कि पापा मंटो बोले...जानते हो मेरी जान...पापा मंटो का नाम लिए. हम सीना ठोक के कहते है कि हम अपने बाप की बेटी हैं. वो हँसे जा रहा था हम पर. पापा पर इतना प्यार उमड़े, उसपर मंटो पर इतना प्यार उमड़े तो कसम से दुनिया पर प्यार उमड़ जाता है. और इस कदर प्यार उमड़ जाता है कि लगता है साला पेट्रोल छिड़क कर अभी इस दुनिया में आग लगा दें. कि चीखें...कि अगर हमको दुनिया में सिर्फ तीन लोग से प्यार हुआ है तो वो हैं पापा, मंटो और तुम...बोले कि हम छापने जा रहे हैं इसको. वो चोट्टा बोला कि तुम्हारे 'तुम' में तुम्हारा सारा बोय्फ्रेंड्स खुद को खोज लेगा. हम बोले कि भाड़ में जाए दुनिया और साला चूल्हे में गया इश्क...हम आज से सिर्फ और सिर्फ मंटो के नाम का कलमा पढ़ेंगे. 

हाँ, हम हैं जरा से पागल. जरा से सनकी. हाँ नहीं लगता है डर हमको. हाँ हम गिरते रहते हैं इश्क में. तो? हैं. बोलो. किसी के बाप का कर्जा खाए हैं जो डरेंगे. आओ मैदान में. लगाओ सियाही. सेट करो अखबार. हम आ रहे हैं दुनिया में आग लगाने. हाँ हमको गुस्सा आता है तो हम गाली देते हैं. हाँ हम बहुत रैश चलाते हैं गाड़ी...तो? हाँ...बहुत खतरा है हमसे इश्क करने में. हमसे परमिशन मंगोंगे तो हम बोलेंगे दूर रहो...इधर खतरा है कि जिंदगी कभी कभी भी बोरिंग नहीं होगी...हमेशा कोई न कोई खुराफात मचा रहेगा. या तो बहुत सुख होगा या तो बहुत दुःख. सुकून कभी नहीं होगा. चैन कभी नहीं होगा. दोस्त शायद होंगे एक आध...लेकिन जो होंगे वो ऐसे कमीने और लॉयल होंगे कि साथ में मर्डर की प्लानिंग कर लेंगे. डर लगता है न हमसे? लगना भी चाहिए कि पूरे होशो हवास में लिख रहे हैं. ऐसा हाल लोगों का दारू और गांजा कॉम्बिनेशन में पी के होता है जो मेरा नौर्मली हुआ रहता है. आई एम ऑलवेज ऑन अ हाई. आर यू रेडी फॉर द राइड? डर लगता है क्या? चलो चलो...आगे बढ़ो...लाइन क्लियर करो...पीछे वाला मारेगा तो हम बचाने नहीं आयेंगे. 

*इस कहानी का एक भी पात्र काल्पनिक नहीं है सिवाए मंटो के. वो पूरा का पूरा मेरे सोच का पुर्जा है...मेरी कहानी का हाशिया है...मेरे आइडियल जिंदगी का बिगड़ा किरदार है...मेरे खुदा के डिपार्टमेंट में फर्जी फ़ाइल लिखने वाला अर्दली है. मंटो से थर थर कांपती है मेरी कलम कि उसका नाम लेने में भी डर लगता है. मगर फिर मंटो का नाम ही लेकर उसके ही बारे में इतना बकवास करने का कूवत है. कुछ तो बात है न मंटो में. वैसे कुछ बात तो हममें भी है ना? चलिये मूड में हैं तो एक बात आपको बता ही दें. इतना दिन से आप हमको पढ़ रहे हैं, कसम से कुछ बात तो आपमें भी है. चलिये, इसी बात पर, चियर्स.

उसके शहर में एक घंटे में होते हैं अनगिनत सेकंड्स


जब वो कहता है, तुम्हें करता हूँ आधे घंटे में फोन. उसके आधे घंटे के पहले पक्षी बना लेते हैं मेरे सामने वाली खिड़की पर एक पूरा घोंसला...चिड़िया सिखा देती है अपने बच्चे को उड़ना और कई शामों तक इधर उधर कर वही पक्षी फिर वापस लौट आते हैं मेरी खुली खिड़की पर अपना घोंसला बनाने. मगर उसका कॉल नहीं आता. 

मैं उतनी ही देर में जी लेती हूँ कई सारे मौसम. जाड़ों की कई दुपहरों को गीले बाल सुखाते हुए कर लेती हूँ अनगिनत कल्पनाएँ. मैं लौट जाती हूँ किसी उम्र में जब सलवार कुरता पहनना अच्छा लगा करता था. जब सूट के रंग से मिला कर ख़रीदा करती थी कांच की चूड़ियाँ. जब कि चूड़ीवाले की आँखें खोजती रहती थी मुझे कि एक मेरे आने से बिक जाती थीं उसकी कितने सारे रंगों की चूड़ियाँ...लाल...हरी...फिरोजी...गुलाबी...बैगनी...कि मेरी गोरी कलाइयों पर कितना तो सुन्दर लगता था कोई सा भी रंग. कितने खूबसूरत हुआ करते थे उन दिनों मेरे हाथ, कि बढ़े हुए नाखूनों पर हमेशा लगी रहती थी सूट से मैचिंग नेल पौलिश. मेरी कल्पनाओं में उभरते हैं उसके हाथ तो अपने हाथों पर अचानक से कोई मोइस्चराइजर लगाने का दिल करता है. मैं फिर से पहनना चाहती हूँ कोई नीला फिरोजी सूट और हाथों में कलाई कलाई भर सतरंगी चूड़ियाँ. मैं उसको कह देती हूँ कि मेरे लिए खरीद देना जनपथ से झुमके और मैं किन्ही ख्यालों की दुनिया में उन झुमकों का झूला डाल लेती हूँ. गोल गोल से उन झुमकों में नन्हीं नन्हीं घंटियाँ लगी हैं फिरोजी रंग कीं...जब मैं हंसती हूँ तो मेरे गालों के गड्ढे के आसपास इतराते हैं वो झुमके. याद के मौसम पर खिलती है मम्मी की झिड़की...ये क्या शादीशुदा जैसे भर भर हाथ चूड़ी पहनने का शौक़ है तुमको रे...करवा दें शादी क्या? और हम सारी उतार कर बस दायें हाथ में रख पाए हैं आधा दर्जन चूड़ियाँ. उसे कहाँ मालूम होगा कि उसके एक कॉल के इंतज़ार में कितनी चूड़ियों की गूँज घुलने लगी है. खन खन बरसता है जनवरी की रातों का कोहरा. कई कई साल उड़ते चले जाते हैं कैलेण्डर में. मेरी बालों में उतर आती है सर्दियों की शाम कोई...एकदम सफ़ेद...उसका कॉल नहीं आता. 

इतनी शिद्दत से इंतज़ार के अलावा भी कुछ करना चाहिए. मैं इसलिए लिखना चाहती हूँ कहानियां मगर शब्द बहने लगते हैं जैसे आँखों में जमे हुए आँसू...कोई नदी बाँध तोड़ देती है. पैराग्रफ्स में रुकता ही नहीं कुछ. सारे शब्द टूटे टूटे से गिरते हैं एक दूसरे के ऊपर...जैसे मैं चलती हूँ डगमग डगमग...कविता बनने लगती है अपनेआप. मुझे नहीं आता होना जरा जरा सा. मुझे नहीं आता लिखना पूरा सच...मैं घालमेल करती रहती हूँ उसमें बहुत सारा कुछ और...फिर भी हर शीर्षक में दिख जाती है उसकी भूरी आँखें. मैं संघर्ष फिल्म के डायलाग को याद करती मुस्कुराती हूँ 'ये आँखें मरवायेंगी'. कागज़ पर लिखती हूँ तो कविता की जगह स्केच करने लगती हूँ उसका नाम. रुमाल पर काढ़ने के लिए बेल बूटे बनाने लगती हूँ. कागज़ पर लिखती हूँ कुछ कवितायें. कहानियों का लड़का जिद्दी हुआ जाता है और कविताओं का शायर मासूम. मुझे डर लगता है उसका दिल तोड़ने से. मैं मगर चली जाना चाहती हूँ बहुत दूर. किसी हिल स्टेशन पर. किसी शाम पैक कर लेना चाहती हूँ अपना इकलौता तम्बू और निकल जाती हूँ बिना वेदर रिपोर्ट सुने हुए. मैं जानती हूँ कि लैंडस्लाइड से बंद हो जाएगा कई दिनों तक वापस जाने का रास्ता. मुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा दुनिया से. या कि मरने जीने से भी. मगर मेरी एडिटर को चिंता हो जायेगी मेरी और वो कहीं से ढूंढ निकालेगी मेरा जीपीएस लोकेशन. फिर इन्डियन आर्मी को भेजा जाएगा मुझे एयरलिफ्ट करने. मैं सोचूंगी. अब भी एक जान की कीमत है हमारे देश में. मैं परेशान होउंगी कि फालतू के लिए जान जोखिम में डाल रहे हैं जवान...कितनी कीमती है इनकी जान...कितनी मेहनत...कितना पैसा लगा होगा इनकी ट्रेनिंग के लिए. खुदा न खास्ता किसी को कुछ हो गया तो इनकी फैमिली को क्या जवाब दूँगी. ऐसा जीना किस काम का. मैं उस क्लिफ पर लगाये गए अपने तम्बू से कूद कर जान दे देना चाहूंगी. बीच हवा में मोबाईल में आएगा एक टावर का सिग्नल. फ़ोन पर आएगी तुम्हारी आवाज़. मैं कहूँगी आखिरी बार तुमसे. आई लव यू जानम.

***
आँख खुलेगी तो चेहरा सुन्न पड़ा होगा. शौकिया सीखी गयी क्लिफ डाइविंग बचा लेगी मुझे उस रोज़ भी...गिरते हुए...तुम्हारी आवाज़ के ताने बाने में डूबते हुए भी शरीर खुद को मिनिमल इम्पैक्ट के लिए एंगल कर लेगा. सर्द जमी हुयी झील से मुझे निकाल लायेंगे फ़रिश्ते. आँख खुलेगी तो हेलीकाप्टर में कोई कर्नल साहब होंगे...खींच के मारेंगे थप्पड़. पागल लड़की. फिर बेहोशी छाएगी. देखूँगी उनकी आँखें तुम्हारी आँखों जैसी है. ब्राउन. दिल खुदा को देखेगा मुस्कुराते हुए. चित्रगुप्त बोलेगा. आमीन.

09 January, 2015

इक बेमुरव्वत महबूब के इंतज़ार में

जब अगले दिन हैंगोवर से माथा फट रहा होता है तब जा के समझ आता है कि साला ओल्ड मौंक बहुत ही वाहियात दारू होती है. एकदम पहले प्यार कि तरह जब हमारा कोई टेस्ट नहीं था या कि कहिये कोई क्लास नहीं था...या कि एकदम ख़तम क्लास था कि कोई भी पसंद आ जाए. ओल्ड मौंक से प्यार सच्चा प्यार है. इसमें कोई मिलावट नहीं सिवाए कोक के...या फिर ज्यादा मूड या दिमाग खराब हुआ और मौसम हमारे आशिक की तरह हॉट तो कुछ आइस क्यूब्स भी डाल दिए जाएँ. ओल्ड मौंक पीना अपने अन्दर की सच्चाई से रूबरू होना है. खुद को समझाना है कि पैग के नियत डेफिनेशंस बकवास हैं. बिना पिए भी मुझे कभी मालूम नहीं चल पायेगा कि ३० मिली कितना है और पटियाला पेग कहाँ तक आएगा. तो आपको कितनी चढ़ेगी ये सिर्फ और सिर्फ उस पर डिपेंड करता है कि आपने ग्लास कैसा चुना है. अगर आप मेरी तरह थोड़े से सनकी हैं और शीशे के स्क्वायर वाले ग्लासेस में दारू पीते हैं तो आपका हिसाब फिर भी थोड़ा ठीक हो सकता है. मुझे फिफ्टी फिफ्टी लगभग पसंद आता है. मैं दारू भी कोल्ड ड्रिंक की तरह पीती हूँ. ये वाइन पीने वाले लोगों के ड्रामे कि साला ग्लास में मुश्किल से एक चौथाई वाइन है मुझे हरगिज़ पसंद नहीं आती. मेरा गिलास पूरा भरा होना चाहिए. जिंदगी की तरह.

नशा. हाँ नशा कितना चढ़ता है ये इसपर निर्भर करता है कि आप इश्क में है या नहीं. इश्क नहीं है तो ओल्ड मौंक आपकी ऐसी उतारेगा कि जिंदगी भर बोतल देखते खार खायेंगे. बचपन के सारे डर...सारी लड़कियों के ब्रेक-ऑफ जो आपने दोस्तों को बड़े शान से बताये थे कि आपने उस लड़की को छोड़ दिया...सारे खुल्ले में उभर आयेंगे. बचपन में नाइंथ स्टैण्डर्ड में जिस लड़के ने आपको भाव नहीं दिया और जिसके कारण लगता था कि जिंदगी जीने लायक नहीं है. ये सारे किस्से कुछ यूं निकलेंगे कि जिंदगी भर आपके दोस्त रुपी दुश्मन आपको चिढ़ा चिढ़ा मारेंगे. रूल हमेशा एक है. अगर आपको चढ़ी है तो दुनिया को डेफिनेटली आपसे कम चढ़ी है. और लड़कियों के साथ तो कभी दारू पीना ही मत. उनके सेंटियापे से बड़ा ज़हर कुछ नहीं होता. अब कौन ध्यान देना चाहता है कि किसने दो किलो वजन बढ़ा लिया है पिज़्ज़ा खा खा के. उस कमबख्त को आप कितना भी कह लें कि तुम बहुत हॉट हो, उसको कभी यकीन नहीं होगा. उसकी नज़रों में वो सिर्फ एक ओवरवेट लड़की है. उसको कौन बताये कि सेक्स अपील लाइज इन द ब्रेन बेबी. उस पर माया ऐन्ज्लेउ की कविताओं का असर भी नहीं पड़ेगा...फिर भी आप उसे सुनाना...कुछ लाइंस जो पार्टी में सबको अनकम्फर्टेबल कर दें...आप राइटर हो, आपका काम है अच्छी खासी हंसती खिलखिलाती पार्टी को ज़हर बना देना. सबके ऊपर आप अपने एक्सपर्ट कमेन्ट दीजिये. लेकिन इसके पहले कि हम भूल जायें कि ओल्ड मौंक और हमारे मन में कविताओं के उपजने का क्या किस्सा है..,कविता की कुछ लाइंस जो कि हर लड़की को जुबानी याद होनी चाहिए...
You may shoot me with your words,
You may cut me with your eyes,
You may kill me with your hatefulness,
But still, like air, I’ll rise.

ध्यान रखे कि ओल्ड मौंक से प्यार आपको एम्बैरस भी कर सकता है. वैसे ही जैसे पहला प्यार करता है. कि पहला प्यार आप दुनिया को दिखाने के लिए नहीं करते. पहला प्यार जब होता है आपका कोई पैमाना नहीं होता...डाल दे साकी उतनी शराब कि जितने में खुमार हो जाए...आज तुम्हारी कसम खा के कहते हैं जानम, ओल्ड मौंक इज अ नॉन प्रेटेंसीयस ड्रिंक. जिससे प्यार है उससे है यार...अब ये क्या बात हुयी कि कुंडली के लक्षण, जात और गोत्र देख के प्यार करेंगे. हो गया तो हो गया. धांय. तो उस पार्टी में सब अपने अपने ड्रिंक्स शो ऑफ कर रहे होंगे जैसे कि लड़कियां अपने बॉयफ्रेंड्स या कि वाइस वरसा. आपको अगर अपने पर यकीन है तो आप खुल्लम खुल्ला अपने ओल्ड मौंक वाली मुहब्बत का इज़हार कर सकते हैं. मगर अगर आपको ज़रा सा भी इन्फीरियोरिटी काम्प्लेक्स है तो आप किसी कमबख्त ब्लू लेबल की बीस हज़ार के प्राइस टैग के पीछे कुछ बहुत ओरिजिनल और ओथेंटिक खो रहे हैं. कुछ ऐसा कि जिसे देख कर उस खूबसूरत लड़की को आपसे प्यार होने ही वाला था. कि जब वो पूछे कि व्हाट इस योर चोइस ऑफ़ पोइजन...आप उसकी आँखों में आँखें डाल कर कह सकें...डार्लिंग इफ यू आर आस्किंग, हाउ डज ईट मैटर...आई वुड चूज यू...तुम्हारे हाथों से पानी में भी नशा होगा. मगर ये कहने के लिए जो जिगर जैसी चीज़ चाहिए उसे ओल्ड मौंक जैसी कोई वाहियात दारू ही मज़बूत कर सकती है. नफासत वाले ड्रिंक्स आपको जेंटलमैन बनायेंगे. कलेजा. सर. कलेजा. ओल्ड मौंक पचा जाने वाला. कहिये. है आपमें? तो अगर आपको ओल्ड मौंक पच जाती है...या फिर आपको ओल्ड मौंक अच्छी लगती है तो शायद आप मुझसे बात करने का कोई कॉमन ग्राउंड तलाश सकते हैं. मेरे खयाल से आपको भी ग़ालिब पसंद होंगे. और दुष्यंत. हाँ क्या? कमाल है. हम पहले क्यूँ नहीं मिले? अच्छा, आप भी इसी ठेके से हमेशा अपनी दारू खरीदते हैं. कमाल है. चलिए. मिल गए हैं तो जिंदगी लम्बी है. किसी रोज़ बैठते हैं इस सर्द मौसम में अलाव जला कर. कुछ आपके किस्से, कुछ ओल्ड मौंक और जरा सी हमारी मुहब्बत.

लाइए जाम...इस बेमुरव्वत....बेतरतीब...बेलौस और बेइंतेहा मुहब्बत के लिए चियर्स.

05 January, 2015

जिन्दा हूँ. हर गहरी साँस के साथ शुक्रगुज़ार.

मैं खुद से पूछती हूँ...
व्हेन डू आई स्लीप?
देर रात जाने किस किस नए बैंड को सुनते हुए...यूट्यूब के कमेंट्स सेक्शन में देखती हूँ कि डार्क म्यूजिक है ये...लोग इसे सुनते हुए कहीं डूब जाना चाहते हैं या किसी का क़त्ल कर देना चाहते हैं. कुछ लोगों को चिलम फूंकने या ऐसा कोई और नशा करने की ख्वाहिश होने लगती है. लिखना मेरे लिए नशे में होने जैसा है शायद इसलिए मैं लौट लौट कर अपने कागज़ कलम तक आती हूँ. साल २०१४ में मैंने अब तक का सबसे कम ब्लॉग पर लिखा है मगर आश्चर्यजनक रूप से मैंने नोटबुक में बहुत ज्यादा लिखा है. मई से लेकर दिसंबर तक में एक नोटबुक भर गयी है. ये किसी भी और साल से चार गुना है. कितने रंग की इंक से लिखती गयी हूँ मैं...जाने क्या क्या सहेज कर रख दिया है उसमें.

मैं रात को नहीं सोती...मुझे दिन को नींद नहीं आती. भयानक इनसोम्निया है कि मैं सो कर भी नहीं सोती...कुछ जागता रहता है मेरे अन्दर हमेशा. दिन रात धड़कन इतनी तेज़ रहती जैसे दिल कमबख्त कहीं भाग जाना चाहता है जिस्म से बाहर...कुछ कुछ मेरी तरह...जैसे मैं रहती हूँ इस दुनिया में मगर भाग जाना चाहती हूँ कहीं और. कहाँ? मैं आखरी बार सोयी कब थी?
मैं खुद से पूछती हूँ...
व्हेयर डू यू स्लीप?
नींद किस तलघर से आती है? नींद आती भी है? मेरे इर्द गिर्द बेड होता है...वाकई होता है क्या? सामने खिड़की भी होती है. वही खिड़की जिसमें से जाड़ों की देर दोपहर सूरज ताने मारता रहता है कि कभी घर से बाहर निकलो...ये क्या हाल बना रखा है. ये कोई मौसम है घर में रहने का. मगर रात को सब बदल जाता है. कमरे की दीवारें सियाह हो जाती हैं और उनमें से पुराने कागजों की गंध आती है. कभी कभी लगता है कि मैं अपनी किसी पुरानी किताब में सोती हूँ. किताब की कहानियां मेरे सपनों को बुनती हैं. मैं अक्षर अक्षर तकिया बना कर सोती हूँ.

मुझे अँधेरा इतना खींचता क्यूँ है? आखिर क्या बात है कि एक परफेक्ट शाम एक खूबसूरत रात में ढलती है...कुछ यूँ खूबसूरत कि बालकनी से चाँद को देखती हूँ और सिगरेट का कश फेंकती हूँ उसकी तरफ कि जैसे फ्लाइंग किसेज भेज रही हूँ. अब चाँद की भी गलती है न...मेरे जैसी लड़की से प्यार करेगा तो फ्लाइंग किसेज तो मिलेंगे नहीं...सिगरेट का धुआं ही मिलेगा... फ़िलहाल हवा चल रही है तो सारे रिंग्स टूटे टूटे बन रहे हैं वरना ऐसी किसी रिंग को चाँद की ऊँगली में पहना कर कह देती तुम हमेशा के लिए मेरे हो गए. अब मैं तुम्हें कहीं नहीं जाने दूँगी. पकड़ के रख लूंगी डिब्बे में और रात को तुम्हें टेबल लैम्प की तरह इस्तेमाल करूंगी. हाँ बाबा...मुझे मुहब्बत ऐसी ही आती है कि इस्तेमाल करूँ तुम्हारा. ना सॉरी. तुम्हें ग़लतफ़हमी हुयी थी कि मैं बहुत भली हूँ. मुझसे पूछना चाहिए था न.

बहरहाल मैं इस खूबसूरत और डार्क रात की बात कर रही थी. तो हुआ ये कि शाम को सोनू निगम के गाने सुन रही थी और सोच रही थी कि साल का पहला लव लैटर उसके नाम लिखूंगी कि आज तक प्यार जब भी होता है पहली बार ही होता है और फिर सिर्फ और सिर्फ सोनू निगम सुनती हूँ...कि जब तक चिल्ला चिल्ला कर 'दीवाना तेरा' नहीं गा रही हूँ नौटंकी है सब...कोई प्यार व्यार नहीं है. मगर आजकल जाने क्या क्या तो खुराफात घूमती है. मुझे लगता है जैसे जैसे उम्र बढ़ रही है मेरा पागलपन भी बढ़ रहा है. व्हीली सीखने का मन करता है. स्टंट्स करने का मन करता है बाइक पर. थ्रिल अब तक सिर्फ कागज़ के पन्नों में अच्छा लगता था लेकिन आजकल कुछ फिजिकली करने का मन करता है. तेज़ बाइक चलाना बहुत बोरिंग हो गया है. कुछ ज्यादा चाहिए. और ज्यादा. बंजी जम्पिंग? पैरा सेलिंग. डीप सी डाइविंग. हेलमेट पहन के बाइक...आर यू फकिंग किडिंग मी? इस सेफ सेफ लाइफ में इकलौता थ्रिल है पागलों की तरह बाइक चलाना...जिस दिन गिरूंगी उस दिन सोचूंगी. वैसे भी जिंदगी और मौत ऊपर वाले के हाथ में है. व्हाटेवर. नेवरमाइंड.

मैं बतिया रही थी कि बात जहाँ से शुरू हो...किसी अँधेरे मोड़ पर क्यूँ रुक जाती है. मैं अच्छा खासा साजन फिल्म का गाना, मेरा दिल भी कितना पागल है सुनते सुनते कैसे किसी हंगेरियन सुसाइड सौंग पर पहुँच जाती हूँ शोध का विषय है. कुछ तो बात है कि ऐसी ही चीज़ें खींचती हैं मुझे. मुझे रौशनी नहीं अँधेरे खींचते हैं. मुझे अच्छे लोगों से डर लगता है. बुरे लोग तो मैं आराम से हैंडल कर लेती हूँ. एक है कोई...उसे लूसिफर कहती हूँ. शैतान वाले स्माइली भेजती हूँ. खुश होती हूँ कि उसे हिंदी नहीं आती. मेरा ब्लॉग नहीं पढ़ सकता. वरना कितनी गलियां देता. 

कुछ ख़त पेंडिंग हैं. कुछ लोगों को जताना भी कि वो कितने कितने अजीज़ हैं मुझे. बॉम्बे गयी थी. अंशु से आधा घंटा मिलने के लिए ठाने से डेढ़ घंटा सफ़र करके गोरेगांव गयी टैक्सी कर के. आठ साल बाद मिली. बातें शुरू हो गयीं और जाने का वक़्त आ गया. टैक्सी में बाकी के डेढ़ घंटे बतियाती रही. वापसी में हँस रहे थे दोनों. इतने साल हो गए. लोग बदल गए लेकिन टॉपिक बात का अब भी वही फेवरिट. बॉयज. 
आज बहुत दिन बाद अचानक से लगा कि स्पेशल हूँ. वापस से अपनी फेवरिट बनने लगी हूँ. कहानियां कुलबुलाने लगी हैं. मुहब्बत है बहुत बहुत सी. दोस्त हैं कुछ बेहद बेहद प्यारे. 

जिंदगी में कुछ अफ़सोस हैं. होने चाहिए.
जिन्दा हूँ. हर गहरी साँस के साथ शुक्रगुज़ार.



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