18 November, 2012

जिंदगी, तुम्हारे जवाबों के लिए मेरे पास सवाल नहीं हैं

मैंने उसे बचाए रखा है जैसे सिगरेट के आखिरी कश में बचा रह जाता है थोड़ा सा तुम्हारे होठों का स्वाद...हाँ...मैंने बचा रखी है अब भी अपने अन्दर थोड़ी सी वो लड़की जिससे तुम्हें प्यार हुआ था. कि अब याद नहीं आखिरी बार कब चलाई थी बाईक...कितने दिनों से टूटी हुयी है पेट्रोल की टंकी...ठीक नहीं कराती हूँ...सर्विस स्टेशन नहीं भेजती हूँ...मगर आज भी चाबियों के गुच्छे में मौजूद है घर की और चाबियों के साथ ही बाईक की चाबी भी...
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एक एक करके इस घर में मेरी कितनी सारी कलमें खो गयीं...अब बस एक बची है...पर्पल कलर की...कितना सोचती हूँ पर फिर कहाँ खरीदती हूँ नयी कलम...सियाही की बोतलें भी तो आधी हो गयीं हैं अब. कितनी सारी कोपियाँ खरीद रखी हैं पर कहाँ लिख पाती हूँ तुम्हें एक पन्ने की चिट्ठी भी. गहरे हरे रंग से लिख रही हूँ आजकल...तुम्हें याद है वो ग़ालिब का शेर...हम बियाबां में हैं और घर में बहार आई है. कितना कुछ है तुमसे कहने को पर अब शब्दों में विश्वास नहीं होता और तुम मेरी खामोशियाँ नहीं समझते.
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देर रात वायलिन के तारों से नस काटने की कोशिश की थी...ख़ामोशी की झील पर...झिलमिल कुछ टुकड़े...इतने खूबसूरत कि मरने नहीं देते. आज चाँद भी बेहद तीखा और धारदार था, हंसुली की तरह...चांदनी में कोई गीत गाते हुए कटिया से धान की फसल काटती औरतें याद आयीं. यूँ याद नहीं आ सकती, मैंने कभी औरतों को धान काटते नहीं देखा है.
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मैं पैरानोइड हो गयी हूँ...आज फिर कुछ लोगों को देखा...
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बंगलौर की कुछ बेहद ठंढी शामें हैं. सिगरेट पीने का मन करता है...पीती नहीं हूँ कि ऐसे ही शौक़ से एक कश दो कश मारते हुए आदत लग जायेगी. मेरे पास एक हल्दी के रंग की शॉल है...जैसे दिल्ली में तुमने खो दी थी न, वैसी ही...आज देर रात सड़क पर सन्नाटा और कोहरा पसरा हुआ था. बहुत मन हुआ कि स्लीवलेस कोई टॉप पहन कर, बाएँ कंधे पर शॉल डाल कर थोडा सड़क पर टहल लूं...साइकिल चलाते हुए देखा कि सारे सूखे पत्तों को एक जगह इकठ्ठा कर दिया गया है...शायद सुबह इनमें आग लगाई जायेगी. आज से पहले ध्यान नहीं गया था कि पतझड़ आ गया है. मन के मौसम से वसंत को गए तो जैसे कितने महीने बीत गए. हर बार सोचती हूँ और बर्फ जमने नहीं देती...विस्की अकेले पीने का मन था आज.
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आप जैसे हो वैसे खुद को एक्सेप्ट कर लो या जैसा होना चाहते हो वैसे खुद को बदल लो...इनमें से कुछ नहीं हो सकता है तो कागज़ उठाओ...पागलों/लेखकों/कवियों की दुनिया में स्वागत है.
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शराब बहुत बुरी चीज़ है ऐसा सब कहते हैं...मैंने बहुत ज्यादा लोगों को कुछ पीते हुए देखा नहीं है...जो थोड़े लोगों को देखा है वैसे में देखा है कि पीने के बाद लोग बेहतर इंसान हो जाते हैं...दिल में जो है कह पाते हैं...प्यार है तो जता पाते हैं...अक्सर देखा है पहला काम कि लोगों को बताना कि वो कितने इम्पोर्टेन्ट हैं लाइफ में.
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लैपटॉप क्रैश करने से दो मेजर दिक्कतें हैं...आईफोन पर अपनी पसंद के नए गाने नहीं डाल सकती और फोटो नहीं देख सकती...कोई बैक-अप नहीं था तो सब कुछ याद करना होता है. ऐसे में अक्सर याद कुछ और करने चलती हूँ याद कुछ और आ जाता है.
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जनवरी की वो रात याद आ रही है...जयपुर में यही रात के कोई ढाई बज रहे थे...हम अपने होटल से निकल कर...निशांत के सौजन्य से किसी नेता की गाड़ी में अपने होटल जा रहे थे...गलत रास्ता था...सो कुछ दूर पैदल चलना था...हील्स में चलने में दिक्कत थी...मैंने बूट्स उतार दिए थे. ठंढ के दिन थे...सड़क पर नंगे पाँव चल रही थी. पूरी पलटन...आगे आगे मैं और डेल्टा...रास्ता खोजने के लिए...और पीछे कुणाल और पौन्डी...डेल्टा को चिढ़ाते हुए टर्रर्र टर्रर्र करते हुए. थोड़े से टिप्सी...बहुत सारे खुश...आज सब लखनऊ में मुझे मिस कर रहे हैं...मैं यहाँ उन्हें मिस कर रही हूँ.
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जिंदगी के साथ लव-हेट रिलेशनशिप है...

थे बहुत बे-दर्द लमहे खत्मे-दर्दे-इश्क़ के
थी बहुत बे-महर सुबहें मेहरबां रातों के बाद
-फैज़
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'और बता, कैसी है?'
'ठीक हूँ'
'अच्छा, तो अब झूठ बोलना भी सीख लिया'
(@#$%%^^&*((&^%)
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कहानी वाली लड़की का क्या हुआ? 
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b.r.e.a.t.h.e

15 November, 2012

स्मोकिंग अंडरवाटर

एक डूबे हुए जहाज के तल में बैठी हूँ...एक कमरे भर ओक्सिजन है. शीशे के बाहर काली गहराई है. लम्हे भर पहले एक मिसाइल टकराई थी और पूरा जहाज डूबता चला गया है. पानी में कूदने का भी कोई फायदा नहीं होने वाला था...मुझे तैरना नहीं आता. मेरे पास एक पैकेट सिगरेट हैं...मैं लंग कैंसर होने के डर से मुक्त हूँ. देखा जाए तो डर बीमारी का नहीं मौत का था...लेकिन जब मौत सामने खड़ी है तो उससे डर नहीं लग रहा.

एक के बाद दूसरी सिगरेट जलती हूँ...कमरे की ऑक्सीजन को बिना शिकायत हम दोनों आधा आधा बाँट लेते हैं...मेरी पसंदीदा मार्लबोरो माइल्ड्स...सफ़ेद रंग के पैकेट पर लिखी चेतावनी को देखती हूँ...जिंदगी के आखिरी लम्हों में कविता सी लगती है...स्मोकिंग किल्स.

धुएं के छल्ले बनाना बहुत पहले सीख लिया था...छल्ला ऊपर की ओर जाता हुआ फैलता जाता है...मौत बाँहें पसार रही है. शीशे के बाहर कुछ नहीं दिखता...पूरे जहाज़ पर चीज़ें टूट-फूट रही होंगी...खारा पानी शक्ति-प्रदर्शन में लगा होगा. मैं कोई गीत गाने लगती हूँ...विरक्त सा कोई गीत है जो मुझसे कहता है कि दुनिया फानी है...न सही.

दोपहर एक दोस्त को फोन किया था डाइविंग जाने के पहले...कुछ जरूरत थी उसे...समझाया था ढंग से...फिर बिना मौसम की बात की थी...चिंता मत कर...पुल से कूदने के पहले तुझे फोन कर लूंगी. बचपन की दोस्त की याद ऐसे आती है  कि दरवाजा खोल कर समंदर में घुल जाने का दिल करने लगता है. मोबाईल में एक एसएमएस पड़ा है...तुम्हें समझ नहीं आता...नहीं कर सकता बात मैं तुमसे...व्यस्त हूँ. सोचती हूँ...मैं वाकई कितनी बेवक़ूफ़ हूँ कि मुझे समझ नहीं आता. देवघर का घर...झूला...मम्मी का बनाया हुआ केक याद आता है.

मुझे विदा कहना नहीं आता...जिंदगी एक्सीडेंट ही है...मौत का इतना तमाशा क्यूँ हो?

मैं उससे पहली बार मिली तो जाना था हम किसी के लिए बने होते हैं...जिन परीकथाओं के बारे में सोचा नहीं था उन पर यकीन करने का दिल किया था. मैं उसके बारे में नहीं लिखती...कभी नहीं...उसका नाम इतना पर्सनल लगता है कि धड़कनों को भी उसका नाम तमीज से लेने की हिदायत दे रखी है. उससे मिलने के बाद जाना था किसी के लिए जीना किसे कहते हैं...मेरे लिए हमेशा वो ही है...एक बस वो.

पूरी पूरी जिंदगी मौत के तैय्यारी हो या जीने का जश्न...फैसला हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता...कमरे में ऑक्सीजन कम हो गयी है...सांस लेने में तकलीफ होने लगी है अब...ये आखिरी कुछ लम्हे हैं...मुझे सब याद आता है...उसकी जूठी सिगरेट...उससे कोई एक फुट छोटा होना...उसका कहना कि हंसती हो तो दिखता कैसे है...तुम्हारी आँखें इतनी छोटी हैं. आज बड़ी शिद्दत से वो दिन याद आ रहा है जब उससे पहली बार मिली थी. हर छोटी छोटी चीज़...खुशबुएँ...दिल्ली का कोहरा...मैगी...कॉफ़ी...फर का वो भूरा कोट...मेरा शॉल जो उसने भुला दिया.

सब कुछ रिवाईंड में चलता है...जिंदगी...इश्क...बचपना...और फिर सब कुछ भूल जाना...

06 November, 2012

धूप देश की लड़की...छाँव देश का लड़का

लड़का बिखेरते चलता...धूप, हवा, खुशबू...लड़की समेटते चलती उसके पीछे, धानी दुपट्टा, दूब और पगडंडियाँ...लड़का उँगलियों से खड़े कर देता पहाड़...लड़की उनमें खींचती नदियाँ...लड़का बनाता रात का गहरा काला आकाश...लड़की उसमें उकेर देती बिजलियों की अल्पना...लड़का चलता चुप-चुप-चुप...लड़की चलती गुन-गुन-गुन. लड़का रचता जेठ का महीना...लड़की रचती बारिशें.

फिर एक दिन दोनों बिछड़ गए...फिर लड़के ने बनाया आँसू तो लड़की ने घोल दिया उसमें नमक...लड़के को नमक की तासीर कहाँ मालूम थी...उसने आँसू से नमक निकालने को बनाए समंदर तो लड़की ने बनाए नमक पत्थर के अभेद्य किले...कि लड़का बनता था पानी तो लड़की होती थी चट्टान...कि लड़का लगाता था आग तो लड़की बनती थी हवा...कि उनमें जो भी एक जैसा था वो टूटने लगा था.
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टूटने के यही दिन थे कि जब दुनिया में कुछ का भी नाम नहीं था...सिर्फ स्वर थे...संगीत के स्वर...षडज, रिषभ, गन्धर्व, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद...लड़की उसका नाम ढूंढ रही थी...कोमल सुर या तीव्र...मगर धीरे धीरे उसकी स्वर पहचानने की क्षमता घटती जा रही थी...एक एक करके उसके जीवन से सारे सुर लोप होते जा रहे थे...सबसे पहले गंभीर और अनुभवी षडज कहीं दूर चला गया. लड़की ने खुद को समझाया कि उसकी उम्र हुयी...कौन जाने किसी दिन अलंकार के जंगल में रास्ता भटक गया और भूखा कोई ताल उसे खा गया हो. फिर एक दिन रिषभ भी ज़ख़्मी हालत में वीणा के नाद में गुम हो गया...अब लड़की को गन्धर्व की चिंता शुरू हुई...वो कहाँ गुम होयेगा? कैसे जाएगा? गन्धर्व उसका पसंदीदा सुर था...कोमल 'ग' और शुद्ध 'ग'. दोनों उसके बचपन के दोस्त थे...जुड़वां भाई जो कुछ कुछ एक जैसे थे. फिर एक दिन एक सन्नाटे का अंधड़ चला और लड़की के हाथ से दोनों गन्धर्व छूट गए...लड़की बहुत रोई...बहुत रोई. फिर उसने बाकी बचे सुरों को समेटा और उनसे एक राग बनाया...अपूर्ण...षडज के बिना शुरुआत नहीं होती थी.
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लड़की चुप होती गयी...मध्यम ने बहुत दिन कोशिश की...वो समझाता कि एकदम चुप न रहे...कभी कभार कुछ तो कहे...कि वो समझता था कि लड़की का चुप रहने का मन करता है...फिर भी कभी कभार कुछ कहना जरूरी होता है. पंचम, धैवत और निषाद बहुत कोशिश करते थे कि कोई राग बना सकें कि लड़की का फिर से गाने का मन करे मगर लड़की एकदम चुप हो गयी थी. ऐसी कि तार सप्तक का षड्ज जब मिला तो उसे पहचान भी नहीं पाया.
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मगर उन्हें मिलना था तो वे फिर मिले...लड़के का अब तक कोई नाम नहीं था...युंकी देखा जाए तो लड़की का भी कोई नाम नहीं था...पर उसे नाम की जरूरत नहीं थी कि लड़का कभी उसे पुकारता नहीं था वो खुद उसकी परछाई की ऊँगली पकड़ कर उसके पीछे चला करती थी...कभी कभार लड़का ज्यादा तेज़ चलने लगता था तो लड़की को उसे बुलाना पड़ता था...इसलिए उसे एक नाम चाहिए था...लड़की ने सप्तक तोड़े...फिर से उसे अपने दोनों नन्हे, भटके, खोये हुए गन्धर्वों की याद आई...उसे याद आई वीणा...जंगल का अँधेरा.

लेकिन लड़के को ठहरना नहीं आता था...वो फिर चल पड़ा...लड़की की आँखों में बहुत अँधेरा था इसलिए उसने रचा सूरज...लड़की के होठों पर बहुत उदासी थी इसलिए उसने रची गुदगुदी...लड़की के दिल को चोट लग गयी थी इसलिए उसने रचा इश्क.

बस...यहीं गलती हो गयी लड़के से...इश्क एकदम अपनी किस्म का मनचला था...जिद्दी...बद्दिमाग...और उसकी संगत में लड़की भी कुछ कुछ अलग ही होने लगी थी...पहले से ही वो बावरी थी...इश्क से मिलने के बाद तो उसके मूड का कोई ठिकाना ही नहीं रहता...लड़का परेशान रहने लगा था. उसे लड़की की बहुत फ़िक्र होती थी...वो खुद से रास्ते नहीं तलाश सकती थी. हर बार लड़का उसे ढूंढ के लाता...वो हर बार टूटी और सुबकती हुयी मिलती थी.

लेकिन लड़की अपनी तरह की जिद्दी थी...लड़का अपनी तरह का...लड़के ने बनायी डार्क चोकलेट और लड़की ने बनायी सिल्वर रैपर...लड़के ने उड़ायी केसर की गंध तो लड़की ने बनायी चावल की खीर...लड़का मुस्कुराया तो लड़की शरमाई...वे साथ चलते रहे...कभी लड़का आगे हो जाता...कभी लड़की...फिर लड़की ने बनाया रूठना तो लड़के ने बनाया मनाना...फिर लड़के ने बनाया कमरा तो लड़की ने बनाया घर...फिर लड़के ने बनायी कतार तो लड़की ने रोपी खुशियाँ...

फिर...

31 October, 2012

अच्छी वाली बारिशें

जब सुबह इन्द्रधनुष के बुलाने से नींद खुले
तुम बनाओ मेरे लिए दालचीनी वाली कॉफ़ी
खाने को कहीं से मिल जाए मम्मी के हाथ का खाना
पापा कॉल कर के पूछे कि मैं कैसी हूँ 

दोनों कानों के झुमके एक साथ टंगे हों 
बिना ढूंढें मिल जाए फेवरिट दुपट्टा
शैम्पू करने में लगे सिर्फ पांच मिनट
बारिश में घुल जाए मेरा परफ्यूम  

सड़क किनारे बन जाएँ नदियाँ
तुम छाता लेकर भागो मेरे पीछे
भीगूँ मैं और सर्दी तुम्हें हो 
फिर साथ बनाएं तुलसी का काढ़ा 

सेट-अप करें होम-थियेटर सिस्टम
सुने एक दूसरे की पसंद के गाने
उलटे-पुल्टे स्टेप्स वाले डांस करें
और थक के सो जायें बिना खाए पिए

फिर बारिश ही जगाये रात दो बजे
दो मिनट की मैगी बनाएं 
साथ खींचें अजीब एंगल में फोटो
बारिश को कहें...कम अगेन 

जाने दो...साढ़े आठ बज गए 
उठो जानेमन...कि दिन शुरू हुआ 
कमबख्त बारिश...कमबख्त ऑफिस 
तुम ये ख्याली पुलाव खाओ, मैं चाय बनाती हूँ 

29 October, 2012

अधीरमना...

Temples are temporary suspensions from the insanity of the world. Our refuge from the mad mad rush of life.
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मन कहता है कि शांति अगर यहाँ भी नहीं तो कहाँ...ज्वारभाटा के भी आने का नियत वक़्त होता है...चाँद के मूड के हिसाब से समंदर में लहरें नहीं उठतीं...वहां भी डिसिप्लिन है. समंदर किनारे टाइड के आने का वक़्त बड़ा खतरनाक और सम्मोहक होता है. समंदर बहुत तेजी से उठता है, जैसे कि कहीं रुकना ही नहीं हो...लहरें जैसे चन्द्रमा को लील जाने के लिए ऊंची होती जाती हैं. अभी तो किनारे पर बैठे थे...खेल रहे थे और पल में डुबा देने को तैयार हो जाती हैं लहरें. समंदर की तुलना इसलिए मन से की जाती है. मैंने भी ऐसा ही कुछ सोच के अपने ब्लॉग का नाम लहरें रखा था कि मन में हमेशा कोई न कोई ख्याल उठता ही रहता है.

मेरी नैचुरल स्टेट...केओटिक है...मैं स्थिरमना नहीं रहती. सफ़र में रहती हूँ तो कमसे कम कुछ देर चैन रहता है. नवम्बर आने को है...साल का ये समय मैं अक्सर सबसे ज्यादा लिखती हूँ...परेशान रहती हूँ...और साल के इसी वक़्त अक्सर कुछ नया मिलता है...कुछ अद्भुत जो पहले कभी नहीं देखा.

विजयादशमी सफ़र की शुरुआत के लिए अच्छा दिन होता है...उस दिन निकलने से सफ़र अच्छा रहता है. सदियों पहले बने गए नियमों के पीछे कुछ तो कारण होगा ही. इस विजयादशमी को हम रामेश्वरम और मदुरै के लिए सफ़र में चले थे. इनोवा में पीछे की सीट काफी स्पेशियस रहती है और रास्ते में गाना सुनते, हल्ला करते और फोटो खींचते जाया जा सकता है. आसमान मेरी पसंद के शेड का नीला था और बादल मेरी पसंद के शेड के वाईट. साउथ की सड़कें काफी अच्छी हैं, बंगलोर से मदुरै लगभग आठ लेन की सडकें थीं और ट्रैफिक भी कम था.

हर कुछ दिन की नौटंकी हो जाती है कि अब नहीं लिखूंगी...अब कुछ भी नहीं लिखूंगी...मगर फिर कुछ ऐसा हो जाता है कि लिखे बिना रहा नहीं जाता...अंग्रेजी में कहें तो I am cursed to write....लिखने के लिए अभिशप्त हूँ. हर कुछ बदलते रहता है...मौसम बदलते हैं, खिड़की पर के नज़ारे बदलते हैं, दिन से शाम...शाम से रात...फिर ये मन की स्थिति हमेशा केओटिक क्यूँ रहती है ये भी तो कभी मूड बदल कर शांत हो जाए. कि चलो...लेट्स टेक अ ब्रेक...आज कुछ नहीं सोचेंगे...सिंगल ट्रैक पर चलेंगे...ऑफिस में हैं तो ऑफिस का काम करेंगे...घर में हैं तो खाना क्या बनाना है इस बारे में सोचेंगे. सारे लोग तो ऐसे परेशान नहीं होते. चैन से रहते हैं...ये बेचैनी मुझे ही क्यों. पिछले साल से कुछ ज्यादा ही आती हैं मन में सुनामी लहरें...उनके जाने के बाद उजाड़ जमीन पर जाने क्या क्या बाकी रह जाता है.

कितने कितने सारे सवाल हैं...जवाब एक का भी नहीं. लोग कैसे गुज़ार लेते हैं जिंदगी बिना ये सोचे हुए कि इस जिंदगी का करना क्या है. ऑफिस है...बहुत अच्छा है...काम भी इंट्रेस्टिंग है मगर कुछ ऐसा नहीं कि सुबह उठ के इस बात पर खुश हुआ जाए कि आज ऑफिस जाना है. वो क्या है जो मुझे खींचता है? आखिर क्या चीज़ रोकती है मुझे...मेरे सारे डर मेरे अन्दर के ही तो हैं. मैं जो दुनिया रचती हूँ उसके किरदार स्याह होते हैं...डर लगता है कि मेरे लिखने भर से वो जिन्दा न हो जाएँ. उस एंटी-हीरो को लिखते हुए वो मेरे अन्दर पनाह पाने लगता है...जैसे ग्रहण लगता है वैसे ही उसके मन का कालापन मेरी आँखों के आगे अँधेरा करने लगता है. मेरे लिखने से चीज़ें होने लगती हैं.

मंदिर एनेर्जी के श्रोत होते हैं. वहां जाने पर कुछ देर के लिए लगता है जैसे दुनिया ठहर गयी है. बहुत सालों से लगातार होते हुए मंत्रोच्चार से वहां के पत्थर भी द्वारपाल जैसे हो गए हैं और विचारों पर बाँध बना देते हैं...लगता है कि मन थमा है. कि शिवलिंग को देखने की इच्छा इतनी सान्द्र है कि कुछ और सोच नहीं सकती. वहां सब शांत होता है. मगर वहां भी ये मालूम होता है कि ये थामना थोड़ी देर का है...बाहर जाते ही पहले से ज्यादा कोलाहल होगा. मुझे लगता है कि अगर यहाँ भी नहीं तो फिर कहाँ. मैं क्या लिख दूं कि ये उफान थम जाए...कि ये ज्वारभाटा उतर जाये.

थोड़ा और फोकस...थोड़ा और...वो जो कागज़ है न...उसपर...वो जो सियाही है न...उसपर. लिखना और जीना अलग नहीं हैं...जैसे मैं और केओस अलग नहीं हैं. मैं केओटिक नहीं हूँ...मैं केओस हूँ. मूर्त रूप...अधीरमना...

बहुत कम आवाजें मुझे बाँध पाती हैं...अनजान रास्तों कहीं दूर से आवाज़ आती है...बचपन की निश्चिन्तता वाले दिनों जैसी...इस गीत में एक अनुरोध का स्वर है...एक याचना का...एक प्रार्थना का...लंगर डालने पर भी जहाज लहरों के साथ थोड़ा थोड़ा डोलता रहता है...बस वैसे...ठहरती हूँ...जरा सी...बस जरा सी...

केशव...नित कल्कि शरीरं...जय जगदीश हरे...

23 October, 2012

स्ट्राबेरी आफ्टरनून्स

Love is temporary madness.
-Louis de Bernieres
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'डेज ऑफ़ बीइंग वाइल्ड'. एक मिनट के लिए ऐसे ही रहना बस...सिर्फ एक मिनट. कहना न होगा कि जब से इस फिल्म को देखा है उस आखिर के लम्हे का इंतज़ार बेतरह बढ़ गया है. क्या नज़र आता है उस आखिरी लम्हे में...क्या वाकई ऐसी छोटी छोटी चीज़ें, छोटे छोटे वादे याद रहते हैं?

तो क्या लगता है...उस एक लम्हे की उम्र कितनी होगी? एक लम्हे...उसका चेहरा भी नहीं था सामने. आँखें देख नहीं सकती थीं मगर उसे छू कर महसूस कर सकती थी. वक़्त को भांग का नशा हो रखा था और वो धीमे गुज़र रहा था. जादू की तरह सारे लोग कहीं गायब हो गए...लम्हे भर को सूरज निकला और बहुत सारी रौशनी कमरे में भर गयी...मैं देख नहीं सकती थी इसलिए धूप दिखी नहीं वरना शायद पार्टिकल्स का डांस देख पाती कि कैसे धूल का एक एक कण मुझे देख कर मुस्कुरा रहा है...आती हुयी धूप हथेलियों में भर गयी और एक पूरे लम्हे की गर्माहट मैंने मुट्ठी में बंद कर ली. इश्वर के तथास्तु कहने के बाद का लम्हा था वो...जिसमें और कुछ भी मांगने की गुंजाईश ही नहीं बचती थी.

कभी कभी कितना जरूरी होता है ये अहसास कि कोई खो भी सकता है. फेसबुक के जमाने में किसी का खो जाना ही ख़त्म हो गया है...किसी से आखिरी बार मिलना. किसी से दूर जाते हुए उस आखिरी नज़र को किताब में बुकमार्क की तरह इस्तेमाल करना. खो जाना कभी कभी अच्छा होता है. खो जाने में उम्मीद होती है कभी तलाश लिए जाने की...कभी अचानक से मिल जाने की. वो दिन अच्छे थे जब बिछड़ना होता था. कीप इन टच एक जुमला नहीं होता था बस. किसी के चले जाने पर दिल में एक जगह खाली हो जाती थी और उसके कभी वापस आने का इंतज़ार करते हुए हम वो जगह हमेशा खाली रखते थे. ट्रेन में छेकी गयी सीट की तरह. कि यहाँ कोई अगले स्टेशन पर आ कर बैठने वाला है. कहने को जगह खाली होती थी पर यादें परमानेंट किरायेदार होती थीं. इस लिए कभी कभी जरूरी हो जाता है कि हम खुद खो जाएँ, ऐसी जगह कहाँ कोई और तलाश न सके.

वो बड़ी मीठी गंध थी. गाँव के लोग जैसी मीठी. अच्छे लोगों जैसी अच्छी. ताज़ी रोटियों की गंध जैसी अतुलनीय...मैं उसकी हथेली की एक लकीर माँगना चाहती थी, मेरे शब्दों के ऊपर की रेखा खींचनी थी...फिलहाल सारे अक्षर अलग अलग थे. उस एक लकीर से जोड़ना चाहती थी. उसकी हथेली में बहुत सी रेखाएं थीं मगर सिर्फ एक कविता कहने के लिए कैसे मैं एक लकीर मांग लेती. इकतारा बजाता एक फकीर गुज़रता है दरवाज़े से...उसकी फैली हुयी झोली में वो मेरे हाथ से एक रेखा मांगता है...मैं उसे अपनी हार्ट लाइन देती हूँ...फकीर उसे अपने झोले में रख लेता है...फिर अचानक से कहता है...उसे हार्ट लाइन नहीं लाइफ लाइन चाहिए थी. वो मेरी लकीर वापस करता है मुझे. मैं उसे कहना चाहती हूँ, ये मेरी हार्ट लाइन नहीं, किसी और की है...मगर मेरी लाइफ लाइन के बदले मुझे वही तुम्हारी एक रेखा मिलती है. उस रेखा को अपने अक्षरों के ऊपर रख कर मैं कविता पूरी करती हूँ. तब तक जिंदगी पूरी हो गयी है...मुझे सिर्फ एक ही कविता लिखने का वक़्त मिला है. मैं हैरान हूँ कि मुझे कोई शिकायत नहीं है.

The aftertaste of strawberry afternoons is you.

मेरी दोपहरों में रंग नहीं हैं इसलिए मुझे खुशबुएँ याद रह जाती है...तुम्हें पता है...इंसान सबसे जल्दी सेन्स ऑफ़ स्मेल एडजस्ट कर लेता है. मुझे तुम्हारे ब्रांड का परफ्यूम चाहिए...तुम जो परफ्यूम लगाते हो उसका ब्रांड नहीं. बताओ...है कोई जो तुम्हारा इत्र एक शीशी में बंद कर मुझे गिफ्ट कर सके. मैं तुम्हें छूने में डरती हूँ...मेरी उँगलियाँ तुम्हारी आँखों की याद दिलाती हैं...उन आँखों की जो मैंने देखी नहीं हैं. कोई गीत गुनगुनाते हुए तुम्हारी आदत है कुर्सी पर आगे पीछे झूलने की...मेरी आँखों पर रौशनी और परछाई के परदे बदलते रहते हैं. तुम्हें नहीं देख पाना एक अजीब किस्म की घबराहट है.

शायद एक दिन मैं फिर से देख पाउंगी...दुनिया शायद तब तक वैसी ही रहेगी. सूरज तब भी गुलाबी रंग का होगा...सड़क किनारे पेड़ों पर गुलाबी पत्ते होंगे...मेरे गाँव में बर्फ पिघल चुकी होगी और स्ट्राबेरी के छोटे पेड़ों पर पके लाल स्ट्राबेरी तोड़ने के लिए मैं एक छोटी डोलची लेकर घर से चलूंगी...तुम किसी सराय में रुके होगे और मैं तुम्हें देख कर पहचान नहीं पाउंगी क्यूंकि मेरी यादों में तुम्हारा कोई चेहरा ही नहीं है.

मैं हर बार भूल जाउंगी कि किसकी तलाश में गाँव के एकलौते बस स्टॉप पर बैठी हूँ...वहीं किसी पैरलल दुनिया में मेरी आँखों की रौशनी सलामत होगी और मैं तुम्हें देखते ही पहचान जाउंगी...तुम गाँव के मुखिया को रीति रिवाज के अनुसार मेरी चुनी हुयी स्ट्राबेरी की डोलची दोगे और बदले में मेरा हाथ मांग लोगे. जब इतना कुछ हो रहा होगा...किसी और पैरलल दुनिया में मैं ऐसा कुछ लिख रही होउंगी.

तो ये कौन सी वाली दुनिया है?

18 October, 2012

जिंदगी...ड्रग...मैं कमबख्त...अडिक्ट.

कैल्सब्लैंका...ओ कैसब्लैंका...कहाँ तलाशूँ तुम्हें. ओ ठहरे हुए शहर...ठहरे हुए समय...तुम्हें तलाशने को दुनिया के कितने रास्ते छान मारे...कितने देशों में घूम आई. कहीं नहीं मिलता वो ठहरा हुआ शहर. मैं ही कहाँ मिलती हूँ खुद को आजकल. कितने दिनों से बिना सोचे नहीं लिखा है...पहले खून में शब्द बहते थे...अब जैसे धमनियों में रक्त का बहाव बाधित हो रहा है और थक्का बन गया है शब्दों का. कहीं उनका अर्थ समझ नहीं आता. कभी कभी हालत इतनी खराब हो जाती है कि चीखने का मन करने लगता है...मैं कोई टाइम बम हो गयी हूँ आजकल. कोई बता दे कि कितनी देर का टाइमर सेट किया गया है.

क्या आसान होता है धमनियां काट कर मर जाना? खून का रंग क्या होता है? कभी कभी लगता है नस काटूँगी तो नीला सा कोई द्रव बाहर आएगा. ऐसा लगता है कि खून की जगह विस्की है धमनियों में...नसों में...आँखों में...कितनी जलन है...ये मृत कोशिकाएं हैं. आरबीसी कमबख्त कर क्या रहा है मुझे इन बाहरी संक्रमणों से बचाता क्यूँ नहीं...कैसे कैसे विषाणु हैं...मैं कोई वायरस इन्क्युबेटर बन गयी हूँ. 

मैं पागल होती जा रही हूँ. पागल दो तरह के होते हैं...एक चीखने चिल्लाने और सामान तोड़ने वाले...एक चुप रह कर दुनिया को नकार देने वाले...मुझे लगता है मैं दूसरी तरह की होती जा रही हूँ. ये कैसी दुनिया मेरे अन्दर पनाह पा रही है कि सब कुछ धीमा होता जा रहा है...सिजोफ्रेनिक...बाईपोलर...सनसाइन जेमिनी. खुद के लिए अबूझ होती जा रही हूँ, सवाल पूछते पूछते जुबान थकती जा रही है. वो ठीक कहता था...मैं मासोकिस्ट ही हूँ शायद. सारी आफत ये है कि खुद को खुद से ही सुलझाना पड़ता है. इसमें आपकी कोई मदद नहीं कर सकता है. उसपर मैं तो और भी जिद्दी की बला हूँ. नोर्मल सा डेंटिस्ट के पास भी जाना होता है तो बहादुर बन कर अकेली जाती हूँ. एकला चलो रे...

क्या करूं...क्या करूँ...दिन भर राग बजते रहता है दिमाग में...उसपर गाने सुनती हूँ सारे साइकडेलिक... तसवीरें देखती हूँ जिनमें रंगों का विस्फोट होता है...सपनों में भी रंग आते हैं चमकदार.. .सुनहले...गहरे गुलाबी, नीले, हरे...बैगनी...नारंगी. कैसी दुनिया है. दुनिया में हर चीज़ नयी क्यूँ लगती है...जैसे जिंदगी बैक्वार्ड्स जी रही हूँ. बारिश होती है तो भीगे गुलमोहर के पत्तों से छिटकती लैम्पपोस्ट की रौशनी होती है तो साइकिल से उतर कर फोटो खींचने लगती हूँ...जैसे कि आज के पहले कभी बारिश में भीगे गुलमोहर के पत्ते देखे नहीं हों. अभी तीन चार दिन पहले बैंगलोर में हल्का कोहरा सा पड़ने लगा था. या कि मैंने लेंस बहुत देर तक पहन रखे होंगे. ठीक ठीक याद नहीं. 

आग में धिपे हुए प्रकार की नोक से स्किन का एक टुकड़ा जलाने के ख्वाब आते हैं...बाढ़ में डूब जाने के ख्याल आते हैं. कलम में इंक ज्यादा भर देती हूँ तो लगता है लाइफ फ़ोर्स बहने लगी है कलम से बाहर. ये कैसी जिजीविषा है...कैसी एनेर्जी है...डार्क फ़ोर्स है कोई मेरे अन्दर. खुद को समेटती हूँ. शब्दों से एक सुरक्षा कवच बनाती हूँ. कोई  मन्त्र बुदबुदाती हूँ...सांस लेती हूँ...गहरे...अन्दर...बाहर...होटों पर कविता कर रहा है अल्ट्रा माइल्ड्स का धुआं...जुबान पर आइस में घुलती है सिंगल माल्ट...जिंदगी...ड्रग...मैं कमबख्त...अडिक्ट.


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