19 August, 2011

शोर...

जिंदगी के सबसे खुशहाल दिनों में
कहीं, एक नदी सी खिलखिलाती है
सुनहरी धूपों में 

गिरती रहती है मन के किसी गहरे ताल में
झूमती है अपने साथ लेकर सब
नयी पायल की तरह 

कहीं तुम्हारी आँखों में संवरती हूँ तो  
मन का रीता कोना भरने लगता है 
धान के खेत की गंध से 

पल याद बहती है, माँ की लोरी जैसी
पोंछ दिया करती है गीली कोर
टूटता है एक बूँद आँसू

उलीचती हूँ अंजुली भर भर उदासियाँ 
मन का ताल मगर खाली नहीं होता 
मेरी हथेलियाँ छोटी हैं 

लिखने को कितनी तो कहानियां 
सुनाने को कितनी खामोशियाँ
पर, मेरी आवाज़ अच्छी नहीं है 

11 August, 2011

निर्मोही रे

निर्मोही रे
तन जोगी रे
मन का आँगन 
अँधियारा

निर्मोही रे
लहरों डूबे 
सागर ढूंढें 
हरकारा 

निर्मोही रे
आस जगाये
सांस बुझाए 
इकतारा 

निर्मोही रे
रीत निभाए
प्रीत भुलाए
आवारा 

निर्मोही रे
गंगा तीरे  
बहता जाए 
बंजारा

देर रात की कोरी चिट्ठी

बावरा मन
बावरा बन
ढूंढें किसको
जाने कैसे 

रात बाकी
दर्द हल्का
चुप कहानी
गुन रहा 

नींद छपके
चाँद बनके
आँख झीलें
डूब जा

याद लौटी
अंजुरी भर
आचमन कर
हीर गा 

भोर टटका 
राह भटका
रे मुसाफिर
लौट आ 

05 August, 2011

आवारगी...

Lake Geneva, Lausanne
किसी शहर को आप कैसे पहचानते हैं? 
अगर किसी की शहर की आत्मा से मिलना हो तो उसे कैसे ढूँढा जाए...तलाश कहाँ से शुरू की जाए? सड़कों, भीड़-बाजार, रेलवे स्टेशन...इमारतों से...या फिर वहां के लोगों से? किसी नए शहर में आते साथ कभी लगा है की बरसों से बिछड़े किसी दोस्त से मिले हों...या कि बरसों से बिछड़े किसी दुश्मन से. शहर में वो क्या होता है जो पहली सांस में अपना बना लेता है. 

मैं हमेशा शहरों के मिलने को प्यार से कम्पेयर करती हूँ...दिल्ली मेरे लिए पहले प्यार जैसा है...और बंगलोर अरेंज मैरेज के प्यार जैसा. इधर पिछले पंद्रह दिनों में बहुत से और शहर घूमी...कुछ से दोस्ती की...कुछ से इश्क तो कुछ से सदियों पुराना बैर मिटाया...कभी भागते भागते मिली तो कभी ठहर कर उसकी आत्मा को महसूस किया. 

मैंने कभी नहीं सोचा था की इतने कम अंतराल में मैं इतने शहर घूम जाउंगी...पिछले दो हफ़्तों से स्विट्जरलैंड में हूँ. जैसे अचानक से मेरे अन्दर के भटकते यायावर को पंख लग गए हों...एक शहर से दूसरे शहर...से गाँव से बस्ती से पहाड़ से जंगल से नदी से नाव...झील...बर्फ...क्या क्या नहीं घूमी हूँ...यहाँ एक बेहतरीन सी चीज़ होती है...स्विस पास...ये ट्रेन स्टेशन पर मिलने वाला एक जादुई पन्ना होता है...एक बार ये हाथ में आया तो पूरे देश के अन्दर चलने वाली हर चीज़ पर आप मुफ्त सफ़र कर सकते हैं. 

मेरे पास घूमने के लिए बहुत सा समय और मीलों बिछते रास्ते थे...आई-पॉड पर कुछ सबसे पसंदीदा धुनें/गीत/गजलें. लिस्ट में हमेशा पहला गाना होता था 'devil's highway' ये गीत अपूर्व के रस्ते मुझ तक पहुंचा था...तब कहाँ पता था कि कितने हाइवे से गुजरूंगी इस गीत को सुनते हुए और कितने शहरों की हवा में इस गीत के बोल घुल जायेंगे. सुबह कुणाल का ऑफिस शुरू और साथ शुरू मेरी आवारगी...

अनगिन किस्से इकट्ठे हो गए हैं...आज ज्यूरिक में आखिरी दिन है...शाम ढल रही है और चौराहों पर लोग इकठ्ठा हो रहे हैं...मैं जरा अलविदा कह कर आती हूँ. फिर फुर्सत में आपको किस्से सुनाउंगी. 

14 July, 2011

गुज़र जायें करार आते आते

मेरा एक काम करोगे? बस आईने के सामने खड़े हो जाओ और अपनी आँखों में आँखें डाल कर कह दो कि मुझे दुःख पहुँचाने पर तुम्हारी आत्मा तुम्हें नहीं कचोटती है...क्यूंकि मुझे अब भी यकीन है कि दुनिया में अगर कुछ लोगों के अंदर आत्मा बची हुयी है तो तुम हो उनमें से एक...मेरे इस विश्वास को बार बार झुठला कर तुम्हीं क्या मिलता है?

पता है...अच्छा बनना बहुत मुश्किल है, दुनिया के हिसाब से तो बाद में चला जाए सबसे पहले हमें अपने खुद के हिसाब से चलना होता है. क्यूंकि अभी भी वो वक्त नहीं आया है कि हम अपने अंदर के इंसान को गला घोंट कर मार सकें...बहुत दुःख उठाने पड़ते हैं. लोग आते हैं चोट देकर चले जाते हैं और हम कुछ कर नहीं पाते...इसलिए नहीं कि हम चोट पहुँचाने के काबिल नहीं है...लेकिन इसलिए क्यूंकि हम चाह कर भी किसी को उस तरह से तोड़ नहीं सकते. अपनी अपनी फितरत होती है.

कितना अच्छा लगता है न कि तुम इस काबिल हो कि किसी को चोट पहुंचा सको...बहुत पॉवरफुल महसूस होता है...कि किसी को कुछ बोल दिया और लड़की रो पड़ी...तोड़ना सबसे आसान काम है...मुश्किल तो बनाना होता है. किसी रिश्ते को खून के आंसू सींच कर भी जिलाए रखना...सहना होता है...धरती की तरह तपना, जलना और फिर भी जीवन देना. सिर्फ इसलिए कि तुम जानते हो कि किसी को तुम्हारी जरुरत है...भले छोटी सी ही सही तुम उसकी जिंदगी का हिस्सा हो...उसे इस बात का और भी शिद्दत से अहसास दिलाना. अरे जी तो लोग भगवान से भी नाराज़ होकर लेते हैं...क्या फर्क पड़ता है किसी के होने न होने से.

बुरा बनना आसान है...कोई कुछ भी कहे तो कह दो कि हम ऐसे ही हैं...तुम्हें पता होना चाहिए था  कि हम बुरे हैं. बुरा होना कुछ नहीं होता...बस अपनी गलतियों के लिए बहाना होता है. कुछ लोग राशि को ब्लेम करते हैं और कुछ फितरत को. वाकई अच्छा बुरा कुछ नहीं होता...होती है बस जिद- दिखने की कि तुम मेरे लिए महत्वपूर्ण नहीं हो. अंग्रेजी में कुछ शब्द वाकई बड़े सटीक हैं जैसे Status-Quo यानि पलड़ा बराबर का रखना. कुछ देना तो बदले में कुछ लेना भी. पता नहीं हमारे संस्कार ही कुछ ऐसे हो जाते हैं कि रिश्तों में इतना मोलतोल नहीं कर पाते.

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पता नहीं क्यूँ आज शाम बारिश ने कई पुराने ज़ख्म धुला कर नए कर दिए. कितने शिकवे गीले हुए तार पर पड़े हैं...आज दुपहर ही सुखाने डाला था...बस ऐसे ही.
होता है न जब आप सबसे खुश होते हो...तभी आप सबसे ज्यादा उदास होने का स्कोप रखते हो.

11 July, 2011

खोये हुए मौसम

तुमने जो दिन गुमा दिए
उनमें कई खोये हुए मौसम थे
जिनका कसूर सिर्फ इतना था कि
उन्हें लौट आने के रास्ते मालूम नहीं थे

हवा टाँके हुए है...
किसी और शहर की बारिश का गीलापन
और शाम...टूटे वादों की तरह दिलफरेब
ऐसे किसी खोये हुए मौसम में
तुमसे मिलने का दिवास्वप्न. उफ़...

यादों की सारी फाइलें...
रिसाइकिल बिन में हैं बहुत दिनों से
परमानेंटली डिलीट करने में डरती हूँ
तुम कभी जो सर्च करने लगो किसी किस्से को
और नया कंप्यूटर भी इसलिए नहीं लेती...

तुमसे मिलने के लिए...
मंदिर का बहाना पहली गलती थी
भगवान को कमसेकम अपनी साइड रखते हम
उसका गुस्सा...इत्तिफकों का स्टॉक भी
इतने दिनों में कभी हमारे फेवर में नहीं होने देता..

सिर्फ इसलिए कि कुछ टूट गया...
सब कुछ खत्म तो नहीं हो जाता ना
ये कितना बड़ा हक है कि किसी वक्त तुमसे कह सकूँ
'बस तुम्हारी आवाज़ सुनने का मन कर रहा था'
और तुम कहो 'I love you too'.



08 July, 2011

दुआ की उम्र

'एक बात बतलाइए बड़े पापा, दुआ की उम्र कितनी होती है?'
छोटी सी सिम्मी अपने बड़े पापा की ऊँगली पकड़े कच्ची पगडण्डी पर चल रही थी. घर से पार्क जाने का शोर्टकट था जिसमें लंबे लंबे पेड़ थे और बच्चों को ये एक बहुत बड़ा जंगल लगता था. शाम को घर के सब बच्चे पार्क जाते थे हमेशा कोई एक बड़ा सदस्य उनके साथ रहता था. सिम्मी अपनी चाल में फुदकती हुयी रुक गयी थी. कल उसका एक्जाम था और वो थोड़ी परेशान थी...पहला एक्जाम था उसका. बड़े भैय्या ने कहा था भगवान से मांगो पेपर अच्छा जायेगा...वैसे भी तुम कितनी तो तेज हो पढ़ने में. छोटी सी सिम्मी के छोटे से कपार पर चिंता की रेखाएं पड़ रही थीं...कभी कभी वो अपनी उम्र से बड़ा सवाल पूछ जाती थी. अभी उसने नया नया शब्द सीखा था 'दुआ'.

बड़े पापा उसको दोनों हाथों से उठा कर गोल घुमा दिए...और फिर एकदम गंभीरता से गोद में लेकर समझाने लगे जैसे कि उसको सब बात अच्छे से समझ आएगी. 'बेटा दुआ की उम्र उतनी होती है जितनी आप मांगो...कभी कभी एक लम्हा और कभी कभी तो पूरी जिंदगी'. सिम्मी को बड़ा अच्छा लगता था जब बड़े पापा उससे 'आप' करके बात करते थे...उसे लगता था वो एकदम जल्दी जल्दी बड़ी हो गयी है.

'तो बड़े पापा आप हमेशा इस जंगल में मेरे साथ आयेंगे...हमको अकेले आने में डर लगता है. पर आप नहीं आयेंगे तो हम पार्क भी नहीं जा पायेंगे.'

'हाँ बेटा हम हमेशा आपके साथ आयेंगे'
'हर शाम!'
'हाँ, हर शाम'

उसके बाद उनका रोज का वादा था...शाम को सिम्मी के साथ पार्क जाना...उसको कहानियां सुनाना...बाकी बच्चों के साथ फुटबाल खेलने के लिए भेजना. सिम्मी के शब्दों में बड़े पापा उसके बेस्ट फ्रेंड थे.
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उस दुआ की उम्र कितनी थी?
नन्ही सिम्मी को कहाँ पता था कि दुआओं की उम्र सारी जिंदगी थोड़े होती है...वो बस एक लम्हा ही मांग कर आती हैं. बिहार के उस छोटे से शहर दुमका में उसकी जिंदगी, उसकी दुनिया बस थोड़े से लोग थे...पर सिम्मी की आँखों से देखा जाता तो उसकी दुनिया बहुत बड़ी थी...और ढेर सारी खुशियों से भरी भी. जैसे पार्क का वो झूला...ससरुआ...कुछ लोहे के ऊँचे खम्बे और सीढियां जिनसे सब कुछ बेहद छोटा दिखता था. घर से सौ मीटर पर का चापाकल...जिसमें सब बच्चे लाइन लगा कर सुबह नहाते थे. घर का बड़ा सा हौज...काली वाली बिल्ली जिसे सिम्मी अपने हिस्से का दूध पिला देती थी. बाहर के दरवाजे का हुड़का- जिसे कोई भी बंद नहीं करता था...बडोदादा का स्कूटर...गाय सब...पुआल और चारों तरफ बहुत सारे पेड़.

छुटकी सी सिम्मी...खूब गोरी, लाल सेब से गाल और बड़े बड़ी आँखें, काली बरौनियाँ...एकदम गोलमटोल  गुड़िया सी लगती थी. उसपर मम्मी उसको जब शाम को तैयार करती थी रिबन और रंग बिरंगी क्लिप लगा कर सब उसे घुमाने के लिए मारा-मारी करते थे. मगर वो शैतान थी एकदम...सिर्फ बड़े पापा के गोदी जाती थी...बाकी सब के साथ बस हाथ पकड़ के चलती थी...अब बच्ची थोड़े है वो...पूरे ३ साल की हो गयी है. अभी बर्थडे पर कितनी सुन्दर परी वाला ड्रेस पहना था उसने. बड़े पापा उसको ले जा के स्टूडियो में फोटो भी खिंचवाए थे.

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दुमका से पटना, दिल्ली और फिर शिकागो...एकदम होशियार सिम्मी खूब पढ़ लिख कर डॉक्टर बन गयी...रिसर्च के लिए विदेश आये उसे कुछ डेढ़ साल हुआ है. सोचती है अब डिग्री लेकर घर जायेगी एक बार दुमका का भी जरुर प्रोग्राम बनाएगी. हर बार वक्त इतना कम मिलता है कि बड़े पापा से मिलना बस खास शादी त्यौहार पर भी हो पाया है. घर से पार्क के रास्ते में अब भी जंगल है...उसने पूछा है. बड़े पापा अब रिटायर हो गए हैं और शाम को टहलने जाते हैं अपने पोते के साथ. इस बार दुमका जायेगी तो शाम को पक्का बड़े पापा के साथ पार्क जायेगी और इत्मीनान से बहुत सारी बातें करेगी. कितनी सारी कहानियां इकठ्ठी हो गयी हैं इस बार वो कहानियां सुनाएगी और कुछ और कहानियां सुनेगी भी. इस बार जब इण्डिया आना होगा तो बड़े पापा के लिए एक अच्छा सा सिल्क का कुरता ले जायेगी...मक्खन रंग का. उन्हें हल्का पीला बहुत पसंद है और उनपर कितना अच्छा लगेगा.

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उसने सुना था कि जिंदगी का कोई भरोसा नहीं...पर जिंदगी ऐसे दगा दे जायेगी उसने कहाँ सोचा था...जब भाई का फोन आया तो ऐसा अचानक था कि रो भी नहीं पायी...घर से दूर...एकदम अकेले. एक एक साँस गिनते हुए उसे यकीं नहीं हो रहा था कि बड़े पापा जा सकते हैं...ऐसे अचानक.

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याद के गाँव में एक पुराने घर का सांकल खटखटाती है...बड़े पापा उसे गोद में उठा कर एक चक्कर घुमा देते हैं और कहते हैं...दुआ की उम्र उतनी जितनी तुम मांगो बेटा...है न?

आँखें भर आती हैं तो सवाल भी बदल जाता है...
'याद की उम्र कितनी बड़े पापा?'

04 July, 2011

एक टुकड़ा जिंदगी (A slice of life )

पात्र: मैं, Anupam Giri (जिसे मैं अपना friend philosopher guide मानती हूँ)

वक़्त: कुछ रात के लगभग बारह बजे...कुणाल को आज देर तक काम है और मुझे फुर्सत है...अनुपम को फुर्सत रात के ११ बजे के पहले नहीं होती है. 

Context: discussing a film script i am working on nowdays


कुछ आधे एक घंटे से मैं उसको कहानी सुना रही हूँ....बिट्स एंड पीसेस में...जैसे की मेरे दिमाग में कुछ चीज़ें हैं...कुछ घटनाएं...कुछ पंक्तियाँ...कुछ चेहरे जो अटके हुए हैं. किरदारों के साथ घुलते मिलते कुछ मेरे जिंदगी के लोग...कुछ गीत....और तेज़ हवा में सालसा करती विंडचाइम...अच्छा सा मूड.
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मैं: और पता है अनुपम...ये जो कहानी है न ...पहली बार ऐसा हुआ है कि मुझे कुछ पसंद आया है और मैंने उसे २४ घंटों के अंदर कचरे के डब्बे में नहीं डाला है...और तुम ही कहते थे न...The best way to judge your work is to read it the next morning...if you still like it...its a good idea.'

अनुपम: हाँ...but you really have to know this girl inside out...her every single trait...her sun-sign...her dressing habits, her fears...dressing sense...her background...तुम उसे जितना अच्छे से जान सकती हो. 

मैं: हाँ मगर अभी मैं बाकी लड़कों का character sketch कर रही हूँ....उसे बाद में लिखूंगी.

अनुपम: What are you afraid of?...तुम्हें डर लग रहा है that in finding this girl you might accidentally  discover who you truly are?

मैं: (बिलकुल ही यूरेका टाइप मोमेंट में कुछ बुदबुदाते हुए) How well do you know me Anupam...gosh...how can you read me like this...(some intelligible sounds) yeah...i mean...no...मतलब...हाँ...उहूँ...ह्म्म्म...ok you win yar!!

(Still astounded)

01 July, 2011

आवाज़ की गुमशुदा गलियों में


देर रात स्टूडियो में...ऑडियो कंसोल पर तुम्हारे आवाज़ की खुरदुरी नोकें हटा रहा हूँ...ये पिनक ऐसी है जिसे मैं चहकना कहता हूँ पर तुम्हारे सुनने वालों को तुम्हारी ठहरी हुयी आवाज़ पसंद आती है...गहरी नदी की तरह. ये काँट छाँट  इलीगल(illegal) कर देनी चाहिए.

यूँ लग रहा है जैसे पहाड़ी नदी पर बाँध बना रहा हूँ...उसकी उर्जा को किसी 'सही' दिशा में इस्तेमाल करने के लिए...गोया कि सब कुछ बहुतमत की भलाई (पसंद!) के लिए होना चाहिए. साउंड वेव देखता हूँ और बचपन में तुम्हारा झूला झूलना याद आता है कि तुम पींग बढ़ाते जाती थी...और जब तुम्हारे पैर शीशम के पेड़ की उस फुनगी को छू जाते थे तुम किलकारियां मार के हँसती थी...और फिर अगली बार में वहां से छलांग...तुम क्या जानो पहले बार तुम्हें वैसे कूदते देखा था तो कैसे कलेजा मुंह को आ गया था मेरा...मुझे लगा कि तुम गिर गयी हो...अब भी डर लगता है...तुम्हें खो देने का. मैं अपने कमरे की खिड़की से तुम्हें कभी देखता था, कभी सुनता था और कभी डरता था कि तुम्हारे पापा का ट्रांसफर मेरे पापा से पहले हो गया तो?

इतनी बार मेरी जिंदगी में आती जाती रही हो कि अब आदत लग जानी चाहिए...फिर भी तुम्हारे जाने की आदत कभी नहीं लगती. जाने कैसे तुम्हारा दिल्ली आना हुआ...और मेरा भी आल इण्डिया रेडियो ज्वाइन करना  हुआ. वैसे तो सब कहते थे तुम्हारी दिन रात के बकबक से कि तुम्हें रेडियो में होना चाहिए...तुम्हें यहाँ देख कर आश्चर्य नहीं होना चाहिए...उस हिसाब से तो मैं यहाँ एकदम अनफिट हूँ...हमेशा से पढ़ाकू, चश्मिश...शांत, शर्मीला...पर जिंदगी ऐसी ही है. हमें मिलाना था...मगर तुम ठहरी जिद्दी...तुम्हारा रास्ता नहीं बदल सकी तो मेरा बदल दिया...और हम ऐसे ही स्टूडियो के आड़े तिरछे रास्तों में टकरा गए.

सोचता हूँ तुम्हारे ऑडियोग्राफ के मुताल्लिक एक मेरा ईसीजी भी निकला जाए...शायद ऐसा ही कुछ आएगा...जिगजैग...कि दिल की धड़कनें कहाँ कतार में चलती हैं...तुम्हारा नाम आया नहीं कि सब डिसिप्लिन ही ख़त्म हुआ जाता है...तुम्हारी आवाज़ का एको(echo) हो जाती हैं बस. 

सोच रहा हूँ तुम्हारा आवाज़ में 'आई लव यू' सुनना कैसा लगेगा.
शायद. परफेक्ट!

24 June, 2011

अधूरा सा 'बाय' अटका पड़ा है

'चलो रखती हूँ...गुडनाईट'
'गुडनाईट '

'ओके बाय'
'बा...'
बीप बीप...उधर से फोन कट चुका था...

'बाय' बिचारा बीच में अटका हुआ सोच रहा था किधर जाए...उसे ऐसे बीच में अटके हुए रहने की आदत थी नहीं.

लड़का अलग भौंचक्का सा खड़ा रह गया...कि ये क्या हो गया...उसे मेरे लिए आधा सेकण्ड टाइम नहीं है...अक्सर उसके बाय बहुत लम्बे हुआ करते थे...जैसे की कोई फ़्लाइंग किस भेज रही हो...उसका बा....से शरू होकर ...य तक आना किसी गीत के आलाप सा लगता था. खुशमिजाज़ और जीवंत...अल्हड़ और जोशीला. 

किसी भागते दौड़ते शहर में मोबाईल किसी जादू से कम है...जहाँ लोगों के पास किसी को भूलने की फुर्सत नहीं है...हर शाम ठीक आठ बजे उसका कॉल इतना नियमित था जैसे दिल की दो धड़कनों के बीच का अन्तराल... जैसे ठीक सवा ग्यारह बजे के बाद मेट्रो का न आना...जैसे कि हर शाम का बेहूदा यकीन की सारी जेबें खंगाल कर गोल्डफ्लेक के लिए ढाई रुपये ही निकलेंगे.

मेट्रो स्टेशन के बाकी पांच मिनट बेहद लम्बे खिंच गए...हालाँकि घड़ी बता रही थी कि मेट्रो ठीक ग्यारह बज कर बारह मिनट पर आई थी उसे लगा कि मेट्रो आज लेट आई...पूरे आधे सेकण्ड लेट. उसे लेट से आने वाली चीज़ें पसंद थी...पर आज उसे बेहद झुंझलाहट हुयी. दरवाज़े बंद हुए...झटके से मेट्रो चली और वह अपना अधूरा सा बाय लेकर सीट पर बैठा. अचानक से उसे तेज प्यास सी महसूस हुयी...हलक में अटका बाय उसका दम घोंटने लगा. आजकल जब वह फोन करती है तो अक्सर हेल्लो या कुछ और नहीं...उसकी बातें शुरू होती हैं...'हाँ' से. जैसे कि वो एक सदियों से ना पूछा गया सवाल है...और वो बाय के त्रिशंकु की तरह अटका हुआ जवाब. 

उसने अक्सर नोट किया है कि वो अपने ख़त में 'सुनो' बहुत बार कहती है...जैसे कि लिख कर उसका दिल नहीं भरता हो...कि जैसे वो सारे ख़त उसे बोल कर सुनाना चाहती है. रात की आखिरी मेट्रो एकदम खाली होती है और उसमें आवाज़ बहुत गूंजती है...वो शाम की बातों के टुकड़े उछालता रहता है और लौट कर आती आवाजें उसके बालों में उँगलियाँ फिरा जाती हैं...मेट्रो में सिगरेट पीना मना है और चूँकि एक ही सिगरेट है वो पैदल चलने के एकांत के लिए रखना चाहता है. पर हाथ बार बार पॉकेट में चला जाता है...

एक सिगरेट है...मोबाईल...और अटका हुआ 'बाय'.

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