बहुत दिन हुए सूरज निकले
चाँद कहीं उग आये भी
इश्क-मुश्क है परी कहानी
हमको कोई समझाए भी
मैं हूँ तुम हो दीवारें हैं
कोई इन्हें गिराए भी
खुद को दरियादिल समझे थे
खो के तुम्हें पछताए भी
राशन, पानी, फूल, किताबें
जरा तो दिल बहलाए भी
अख़बारों में सब पढ़ती हूँ
नाम तुम्हारा आये भी
रह गए टूटे शब्द बिचारे
कहीं ग़ज़ल बन जाये भी
दुनियादारी बहुत कठिन है
कोई साथ निभाए भी
होठों से तो हँस लेते हैं
आँखों से मुस्काए भी
06 October, 2010
17 September, 2010
भारी राड़ है ई बादल
इ बादलवा नम्बरी बदमास है, कोने में नुका के बैठल रहेगा और जैसे ही कपडा लार के आयेंगे दन्न से बरसेगा जैसे केतना जो एमरजेंसी है. भोरे से बैठ के एतना चादर धोये हैं, तनी कमर सीधा करने लगे के आंख लग गया. भर दुपहर सुतले निकल गया. साम में माथा में ऐसा दर्द ऊठा के लगा के अबरी तो कपार फट जायेगा...बड़ी मुस्किल से चाय बना के पीए. तनी गो दर्द रुका तो जा के सब ठो चादर उलारे...संझा बाती देईए रहे थे कि बस...ए बादलवा का बदमासी सुरु. अब एक जान संझा दे की भाग के छत से कपड़वा उतारे.
छत पर अन्हेरा में छड़ से छेछार लग गया...चादरवा धर के सांसो नहीं लिए हैं कि बारिस ख़तम. भारी राड़ है ई बादल, ई कोई मौसम है बरसने का, ई कोई बखत है...बेर कुबेर देखे नहीं मनमर्जी सुरु हो गए...अबरी तो सेकायत लगा के मानेंगे. एकरा का लगता है कोई देखने वाला हैय्ये नहीं है का. पूरा एंगना में पिच्छड़ हो गया है, के गिरेगा इसमें पता नहीं. सब बच्चा सब एक जगह बैठ के पढ़ाई नहीं कर सकता...घर भर में भागते फिरेगा. हाथ गोड़ टूटेगा बोलते रहो कुछ बूझबे नहीं करता है.
अब लो...लालटेन में बत्ती ख़तम है, रे टुनकी भंसा से बत्ती लाओ, ऊपर वाले ताक पर है. ठीक से जाना आँगन में बहुत पिच्छड़ है, फिसलना मत. उठी रे!? बाप रे, केतना मच्छर हो गया है, एक मिनट चैन से नहीं बैठने देता है तब से भमोर रहा है. ई गर्मी के मौसम में मच्छर होने का है बरसात में तो बाप रे! उठा के ले जाएगा. कछुआ बारो रे कोई.
(गाँव के कच्ची पक्की यादों में से मेरे, दीदी, दादी, चाची और बहुत से लोगों के बीच का होता एकालाप जो मेरी भाषा में मुझे ऐसे ही याद रह पाता है)
वो कौन सा मौसम है जब तुम याद नहीं आती हो मम्मी.
छत पर अन्हेरा में छड़ से छेछार लग गया...चादरवा धर के सांसो नहीं लिए हैं कि बारिस ख़तम. भारी राड़ है ई बादल, ई कोई मौसम है बरसने का, ई कोई बखत है...बेर कुबेर देखे नहीं मनमर्जी सुरु हो गए...अबरी तो सेकायत लगा के मानेंगे. एकरा का लगता है कोई देखने वाला हैय्ये नहीं है का. पूरा एंगना में पिच्छड़ हो गया है, के गिरेगा इसमें पता नहीं. सब बच्चा सब एक जगह बैठ के पढ़ाई नहीं कर सकता...घर भर में भागते फिरेगा. हाथ गोड़ टूटेगा बोलते रहो कुछ बूझबे नहीं करता है.
अब लो...लालटेन में बत्ती ख़तम है, रे टुनकी भंसा से बत्ती लाओ, ऊपर वाले ताक पर है. ठीक से जाना आँगन में बहुत पिच्छड़ है, फिसलना मत. उठी रे!? बाप रे, केतना मच्छर हो गया है, एक मिनट चैन से नहीं बैठने देता है तब से भमोर रहा है. ई गर्मी के मौसम में मच्छर होने का है बरसात में तो बाप रे! उठा के ले जाएगा. कछुआ बारो रे कोई.
(गाँव के कच्ची पक्की यादों में से मेरे, दीदी, दादी, चाची और बहुत से लोगों के बीच का होता एकालाप जो मेरी भाषा में मुझे ऐसे ही याद रह पाता है)
वो कौन सा मौसम है जब तुम याद नहीं आती हो मम्मी.
14 September, 2010
परी है वो
४ थप्पड़ों के बाद गिनती नहीं याद रहती.
१० थप्पड़ों के बाद बेहोशी सी छा जाती है...सब कुछ सुन्न पड़ जाता है. जैसे नींद में कुछ ना कर सकते वाली स्थिति रहती है वैसे ही, शरीर होता है पर नहीं होता...गाल का दर्द आँखों, कनपटी और सर पर होता हुआ आत्मा तक पहुँच जाता है. जख्म गहरे होते हैं...जिंदगी से भी गहरे.
ना माफ़ कर पाना एक ऐसा गहरा नासूर होता है कि अम्ल की तरह जिस्म को खोखला करता जाता है...माफ़ कर देना एक ऐसी जिंदगी होती है जिसमें खुद से आँखें मिलाने की हिम्मत बाकी नहीं रहती.
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लड़की है तो उसका नाम भी होगा...और ताज्जुब होगा लोगों को कि उसका नाम कुछ आम सा ही होता है...चलिए मान लेते हैं कि इस लड़की का नाम आँचल है, आँचल मिश्रा...जी हाँ कोई निचले जात की बीपीईल वाली परिवार की लड़की नहीं है जिसने घर पर बाप को दारू पी कर नशे में माँ को पीटते हुए देखा है. उच्च माध्यम वर्गीय परिवार की लड़की...शादी के लिए सुयोग्य हो इसलिए कॉन्वेंट में पढ़ी हुयी...पिटर पिटर अंग्रेजी बोलती है, अक्सर बातों से लोगों को चुप करा देती है...ताल ठोंक कर कहती है कि डिबेट में हरा के दिखाओ.
दिल्ली के एक अच्छे यूनिवर्सिटी में इकोनोमिक्स में शोध कर रही है...समाज की कई पेचीदगियों को समझती है. रिसर्च के सिलसिले में दुनिया देखी है...काफी ब्रोड माइंडेड है, अक्सर जलसों में भी हिस्सा लेती रहती है और काफी धारदार भाषण देती है. गे और लेस्बियन राइट्स पर खुल कर बोलती है. इन फैक्ट उसका 'लिव-इन' रिलेशन उस समय से है जब ये चीज़ें चर्चा का विषय हुआ करती थीं...अब तो खैर...फैक्ट सा हो गया है.
उसे जानने वाले कहते हैं कि उसकी उत्सुकता का लेवल काफी हाई है...घबराहट लेश मात्र भी नहीं...एक बार कदम आगे बढ़ा दिया तो मजाल है कि कोई उसे डरा के, समझा के या पुचकार के वापस हटा सके. उसका सच और झूठ, सही गलत का अपना हिसाब किताब है जो कभी दुनिया के साथ कभी दुनिया के खिलाफ होता रहता है...और जिंदगी छोटे मोटे हिचकोलों के साथ बढ़ती रहती है.
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लड़की से औरत बनने का सफ़र कभी आसान नहीं होता...खास तौर से तब जब ये सफ़र बिना के मर्द के नाम के साथ बिताया जाते...एक कच्ची उम्र से ३२ साल की उम्र का फासला तय किया आँचल ने और एक लड़की adopt की...लिव-इन से लिव-आउट होकर अपना फ्लैट लिए उसे चार साल बीत गए हैं. आज उसकी बेटी ने पहली बार बोलना शुरू किया है...म्मम्म जैसा कुछ जो जल्दी ही मम्मा में बदल जाएगा. फ्लैट में उसके साथ तीन लड़कियां और रहती है...सबकी अपनी अपनी कहानी है, सफलताओं की.
रात को कई बार उसे नींद नहीं आती देर तक...ऐसे में जब वो बेटी को लोरी नहीं सुना रही होती है तो कुछ आवाजें जेहन में घूमने लगती हैं. एक झन्नाटेदार 'तड़ाक', नीम बेहोशी...और मेडिकल अबार्शन के बाद की दिल दहलाने वाली चीखें.
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वो ना उसके थप्पड़ माफ़ कर पाती है...ना खुद को उसे वैसे टूट कर चाहने के लिए...हर दर्द के बावजूद.
रात के देर पहर बेटी का रोना उसे धीमी धीमी लोरी सुनाता है...और वो बच्चों की मानिंद सो जाती है...सुबह बेटी को देखती है तो हज़ार से ख्यालों में एक जरूरी बात याद आती है...बेटी बड़ी होगी तो उसे सिखाएगी...अगर किसी ने कभी भी तुम्हें एक थप्पड़ मारा हो तुम्हें तो माफ़ कर दो...मगर दूसरा थप्पड़ कभी जिंदगी में मत खाना...वो थप्पड़ गाल पर नहीं, आत्मा पर निशान बनाता है.
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यादें बेरहम सही...वर्त्तमान के अपने मरहम हैं...बेटी के गुलाबी फाहों से गालों को चूमते हुए ख्याल घुमड़ता है...और वो प्यार से उसे बुलाती है 'परी'.
09 September, 2010
एक आग का दरिया है
दिल्ली की चुभती गर्मियों की धूप तमाचे मार के रोज उठाती थी उसे. गर्मियों के ठहरी दोपहरों को उसकी उफनती क्रन्तिकारी सोच और आग लगा देती थी. यूँही थोड़े लोग कहते थे कि उसका दिमाग गरम रहता है हमेशा. लोग तो ये भी कहते थे कि उस लाल इमारत का कोई ऐसा मोड़ नहीं है जहाँ चार लोग उसको उसके फलसफे सुनने के लिए पकड़ ना लें...और बहसें कॉफ़ी या सिगरेट के साथ या बगैर गरमाती रहे.
लोगों को बस एक बात नहीं पता थी...कि एक दिन बुखार के तपते माथे पर किसी ने अमृतांजन लगा दिया है...और पूरब की उस इकलौती खिड़की पर एक पुराने चादर का पर्दा डाल दिया है...लोग ये भी नहीं जानते कि शाम को सूरज को चाय में डुबा कर होटों से लगाने लगा है वो.
ये भी नहीं कि जिस दिन वो बहस अधूरी छोड़ के गया था वो करवाचौथ था और एक लड़की ने अठन्नी के बदले उसकी एक लम्बी उम्र खरीद ली है भगवान से. कि उसका बेख़ौफ़ होना इसलिए हैं कि कोई उसकी चिंता करने लगा है हद्द से ज्यादा.
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आम लोग ये सच में नहीं जानते कि लिम्फोमा जैसे डराने वाली गंभीर बीमारी सिर्फ फिल्मों में नहीं...असल जिंदगी में भी किसी सत्ताईस साल की लड़की को सच में होते हैं...और किसी की जिंदगी से अचानक चले जाना हमेशा नीयत नहीं, नियति भी हो सकती है.
लोगों की तो छोडो...वो ही क्या समझ पाया है कि प्यार होता है...और उस लड़की को उससे हुआ था.
07 September, 2010
The lyric-less monster
I let the music saw me in half
as my soul dances away the grief
resonating with a pain so intense I die and resurrect
I let the tune wander in my memory
scrubbing fiercely the stubborn stains
easing out the river of hurt, betrayal and disbelief
There are no lyrics, no predetermined fate
just an ebbing tide of notes, conflicting currents
wasting themselves upon the shore of my heart
Oh Catharsis...It's a big lie.
Nothing Heals.
Forgetting has never been an option.
as my soul dances away the grief
resonating with a pain so intense I die and resurrect
I let the tune wander in my memory
scrubbing fiercely the stubborn stains
easing out the river of hurt, betrayal and disbelief
There are no lyrics, no predetermined fate
just an ebbing tide of notes, conflicting currents
wasting themselves upon the shore of my heart
Oh Catharsis...It's a big lie.
Nothing Heals.
Forgetting has never been an option.
01 September, 2010
जाना...लौटना
होना कुछ नहीं होता...एक पर्दा है, रेटिना कह लो...उसपर जो चित्र बनते हैं वही हमारा सच हो जाता है...हम कभी जवाब तलब नहीं करते...कि इस सच के पीछे क्या कुछ है.
मेरी रेटिना पर पतली, बिलकुल महीन धारियां पड़ी हुयी हैं...पुराने जख्मों के निशान जैसी...मैं जब भी अपनी कलाइयों को देखती हूँ मुझे खून रिसता नज़र आता है, हालाँकि जख्म बहुत पुराने हैं और उनके भरने के निशान रेटिना पर भी पक्के उकेरे गए हैं. मैंने जब भी मर जाना चाहा है मेरी रेटिना पर एक पतली रेखा उभर आई है. हालाँकि अभी इनकी संख्या कम है इसलिए मेरा दुनिया को देखने का नजरिया कुछ बचा हुआ है, मेरी जिंदगी जीने के पहले और मरने के बाद में नहीं बँटी हुयी है.
मुझे लगता है कि मरने के लिए कच्ची उम्र में मेरी आँखों को बस धारियां दिखेंगी और कलाइयाँ टीस उठेंगी...वो एक ऐसा दौर होगा जब ब्लेड बनने ही बंद हो जायेंगे. मैं कितना भी कहूँ कि मेरी कलाइयाँ कटी हुयी हैं कोई इलाज नहीं होगा क्योंकि ना सिर्फ उनका दर्द मेरे अलावा किसी को महसूस होगा बल्कि उनका काटना भी बस एक पतला निशान होगा...रेटिना पर.
मेरे सपने फिल्मों के रूप में अमर हो चुके होंगे...दर्द बड़े परदे पर उभर आएगा....और सिनेमाहाल के बिना चेहरे वाले अँधेरे में लोग सीटी बजायेंगे...लड़कियां बिना कन्धों के सुबकेंगी और मुझे कोसेंगी, जैसे मैं कोसना चाहती थी 'पचपन खम्बे लाल दीवारें' पढ़ कर. हर कोई सोचेगा कि इतना गहरा दर्द कोई 'सोच' कैसे सकता है...खुशकिस्मत लोग दर्द को जीना नहीं जानते.
किसी जाड़ों की सुबह मैं चाहूंगी कि तुम मेरा हाथ थामे रहो...और मैं आँखें बंद कर सकूँ...कि रौशनी चुभती है. तुम जैसे सड़क पार कराते वक़्त मेरी कलाई थामते हो...छोटे बच्चे की तरह...वैसे ही मेरी कलाई थामना...जब कलाई नहीं दिखती है तो रेटिना पहले की तरह हो जाती है...ऐसे में सारी बारीकियां दिखती है...जैसे कि तुम्हारी आँखों में मेरा चेहरा...प्यार में डूबा हुआ...जीवन से लबालब भरा हुआ.
और ऐसा थोड़े हुआ है कभी...कि मैं तुम्हारा हाथ छुड़ा के गयी हूँ...लौट आउंगी फिर...फिर.
मेरी रेटिना पर पतली, बिलकुल महीन धारियां पड़ी हुयी हैं...पुराने जख्मों के निशान जैसी...मैं जब भी अपनी कलाइयों को देखती हूँ मुझे खून रिसता नज़र आता है, हालाँकि जख्म बहुत पुराने हैं और उनके भरने के निशान रेटिना पर भी पक्के उकेरे गए हैं. मैंने जब भी मर जाना चाहा है मेरी रेटिना पर एक पतली रेखा उभर आई है. हालाँकि अभी इनकी संख्या कम है इसलिए मेरा दुनिया को देखने का नजरिया कुछ बचा हुआ है, मेरी जिंदगी जीने के पहले और मरने के बाद में नहीं बँटी हुयी है.
मुझे लगता है कि मरने के लिए कच्ची उम्र में मेरी आँखों को बस धारियां दिखेंगी और कलाइयाँ टीस उठेंगी...वो एक ऐसा दौर होगा जब ब्लेड बनने ही बंद हो जायेंगे. मैं कितना भी कहूँ कि मेरी कलाइयाँ कटी हुयी हैं कोई इलाज नहीं होगा क्योंकि ना सिर्फ उनका दर्द मेरे अलावा किसी को महसूस होगा बल्कि उनका काटना भी बस एक पतला निशान होगा...रेटिना पर.
मेरे सपने फिल्मों के रूप में अमर हो चुके होंगे...दर्द बड़े परदे पर उभर आएगा....और सिनेमाहाल के बिना चेहरे वाले अँधेरे में लोग सीटी बजायेंगे...लड़कियां बिना कन्धों के सुबकेंगी और मुझे कोसेंगी, जैसे मैं कोसना चाहती थी 'पचपन खम्बे लाल दीवारें' पढ़ कर. हर कोई सोचेगा कि इतना गहरा दर्द कोई 'सोच' कैसे सकता है...खुशकिस्मत लोग दर्द को जीना नहीं जानते.
किसी जाड़ों की सुबह मैं चाहूंगी कि तुम मेरा हाथ थामे रहो...और मैं आँखें बंद कर सकूँ...कि रौशनी चुभती है. तुम जैसे सड़क पार कराते वक़्त मेरी कलाई थामते हो...छोटे बच्चे की तरह...वैसे ही मेरी कलाई थामना...जब कलाई नहीं दिखती है तो रेटिना पहले की तरह हो जाती है...ऐसे में सारी बारीकियां दिखती है...जैसे कि तुम्हारी आँखों में मेरा चेहरा...प्यार में डूबा हुआ...जीवन से लबालब भरा हुआ.
और ऐसा थोड़े हुआ है कभी...कि मैं तुम्हारा हाथ छुड़ा के गयी हूँ...लौट आउंगी फिर...फिर.
24 August, 2010
मेहंदी का रंग
सावन में सैयां के लिए और भादों में भैय्या के लिए मेहंदी लगानी चाहिए...इससे प्यार बढ़ता है.
ऑफिस और घर की कवायद के बीच एक बहन कहाँ तक बची रह पाती है मालूम नहीं...वो भी तब जब तबीयत ऐसी ख़राब हो कि गाड़ी चलाना मुमकिन ना हो...किसी महानगर में जहाँ कुछ भी पैदल जाने की दूरी पर ना मिले...वो भी ऐसी जगह जहाँ पर राखी दुकानों में हफ्ते भर पहले ही आ पाती है.
पूरा बाज़ार घूमना, छोटे भाई का हाथ पकडे हुए...एक राखी ढूँढने के लिए...जो सबसे अलग हो, सबसे सुन्दर हो और जो भाई की कलाई पर अच्छी लगे...घर पर रेशम के धागों और फेविकोल का ढेर जमा करना साल भर...कि राखी पर अपने हाथ से बना कर राखी पहनाउन्गी..ऐसी राखी तो किसी के कलाई पर नहीं मिलेगी ना.
मेहंदी को बारीक़ कपडे से दो बार छानना...फिर पानी में भिगो कर दो तीन घंटे रखना...साड़ी फाल की पन्नी से कुप्प्पी बनाना...रात को पहले मम्मी को को मेहंदी लगाना...मेहंदी पर नीबू चीनी का घोल लगाना और पूरे बेड पर अखबार डाल के सोना...अगली सुबह देखना कि मेहंदी का रंग कितना गहरा आया है...जितना गहरा मेहंदी का रंग, उतना गहरा भाई का प्यार...सुबह उठ के नहा के तैयार हो जाना..राखी में हर बार नए कपडे मिलते थे...राखी बाँध कर झगडा करना, पूरे घर में छोटे भाई को पैसे लेने के लिए दौड़ाना...
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वो आसमान की तरफ देख रही है...भीगी आँखें, सोच रही है, पूछ रही है अगर कहीं कोई भगवान है तो...उलाहना...कोई मुझे प्यार नहीं करता...बहुत साल पहले...ऐसा ही उलाहना, जन्मदिन पर किसी ने चोकलेट नहीं दिया था तो...छोटा भाई पैदल एक किलोमीटर जा के ले के आता है...उस वक़्त वो अकेले जाता भी नहीं था कहीं.
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इस साल मेहंदी का रंग बहुत फीका आया है...नमक पानी रंग आने के लिए अच्छा होता भी नहीं है...रात डूबती जा रही है और मैं सोच रही हूँ कि अकेलापन कितना तकलीफदेह होता है...गहरे निर्वात में पलकें मुंद जाती हैं...जख्म को भी चुभना आ गया है...ये लगातार दूसरा साल है जब मेरी राखी नहीं पहुंची है...राखी के धागों में बहुत शक्ति होती है, वो भाई की हर तकलीफ से रक्षा करती है.
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नींद के एक ना लौटने वाले रास्ते पर...एक ही ख्याल...मेहंदी का रंग इस साल बहुत फीका आया है.
11 August, 2010
समंदर की खोज में
शनिवार रात...कोई डेढ़ बजे का समय...कुछ लोग जिंदगी पर बात करते करते अचानक सेंटी हो जाते हैं...और समंदर देखने की इच्छा होती है. बंगलोरे चेन्नई एक्सप्रेस वे के बारे में गूगल बताता है कि कुछ दो सौ किलोमीटर है...मेरी भी इच्छा थी कि १००-१२० की स्पीड से कर चला के देखूं.
बस इतना भर सोचना था, गीज़र चालू किया गया और एक एक करके सब नहा के ताज़ा हो गए...गैरतलब है कि रात के डेढ़ बज रहे थे. पीडी से रास्ता पूछा गया, ये पुराने यात्री रहे हैं इस रास्ते के...और अनुभव को कभी भी जाया नहीं करना चाहिए. कुल मिला के गाड़ी चलने वाले साढ़े तीन लोग थे, तीन लोग एकदम एक्सपर्ट और मैं एकदम कच्ची तो तय हुआ कि बारी बारी कार चलाएंगे. थोड़ा सा सामान पैक किया...कुछ कपड़े, तौलिया वगैरह और चप्पलें, चादर, तकिये...बस. दो बजते सब तैयार और गाड़ी में लोडेड. आई पॉड ख़राब हो रखा है तो फ़ोन से ही काम चलाना पड़ा. फाबिया में खूबी है कि किसी भी म्यूजिक प्लेयर को कनेक्ट कर सकते हैं.
मेरे नए फ़ोन...विवाज़...में जीपीएस की सुविधा है जो आपकी पोसिशन बताती है और ये मेरे उम्मीद से कहीं ज्यादा अच्छा परफोर्म करती है...मजे की बात कि मैंने अपने घुमक्कड़ी मूड के हिसाब से कर्णाटक का पूरा नक्शा खरीद के रखा था कि किसी दिन ऐसे ही मूड बन जाए तो भुतलाने का कोई स्कोप न हो...मैं ख़ुशी ख़ुशी उठी कि चेन्नई जाना है, अच्छा है मेरे पास मैप है...और जैसे ही मैप देखा तो देखा कि चेन्नई तो दूसरे राज्य में है :) अब इतनी लम्बी प्लानिंग तो मैं कर नहीं सकती. मैं अपने आप को टेक्निकली चैलेंज्ड (तकनीकी रूप से अक्षम ;) ) मानती थी...अब नहीं मानती. काफी खुराफात की है मैंने तो अब प्रोमोट होके तकनीकी जुगाडू मानती हूँ :)
एक्सप्रेस वे पर १०० की स्पीड तो सोचा था पर इतने ही स्पीड पर ओवेर्टेक करने की बात नहीं सोची थी, वो भी भीमकाय ट्रक और वैसे ही अजीबोगरीब वाहनों को तो किसी फिल्म जैसे लग रहे थे. सीधी खूबसूरत सड़क थी और कुणाल ऐसे चला रहा था जैसे हम कोई विडियो गेम खेल रहे हों. रात बेहद खूबसूरत थी...और गाने और भी प्यारे...कोई सात बजे लगभग हम चेन्नई पहुंचे...यहाँ से गोल्डन बीच जाना इतना मुश्किल था कि क्या कहें...सारे लोग तमिल में बात करते थे...प्रशांत को फ़ोन किया तो मेरे नेटवर्क में कुछ पंगा था...आवाज नहीं आई...उसने sms किया उससे कुछ आइडिया हुआ कि सही रास्ते जा रहे हैं. और फिर जीपीएस और भगवान भरोसे हम लोग रिसोर्ट पहुंचे.
थकान के मारे हालत ख़राब...और पेट में चूहे दौड़ रहे थे...ईसीआर कोस्ट पर कहीं कुछ खाने को ही नहीं मिल रहा था उतनी सुबह...इडली डोसा भी नहीं...जिस रिसोर्ट में टिके थे, उन्होंने खाना देने से इनकार कर दिया "सार दे वील नोट गीव यु" खाना पूछने पर किचन से यही जवाब मिला. हालत ऐसी हो गयी थी कि आधे घंटे और खाना नहीं मिलता तो सोच रहे थे प्रशांत से सत्तू मंगवाएंगे और घोर के पियेंगे ;) किसी तरह इन्तेजाम हुआ...और खा पी के अलार्म लगा के सो गए.
तीन बजे लगभग उठे, कॉफी पी और सीधे समुन्दर...चेन्नई में गोल्डन बीच को वीजीपी ग्रुप वालों ने खरीद लिया है, तो बीच पर जाने के लिए टिकट लगता है...मैं चेन्नई बहुत सालों बाद आई थी...यहाँ पानी बहुत साफ़ और पारदर्शी था...समंदर भी खूबसूरत नीला...मौसम सुहाना, थोड़ा बादल...थोड़ी धुप...समंदर का पानी गुनगुना...लहरें परफेक्ट...न ज्यादा ऊँची न ज्यादा शांत. सूरज डूबने तक हम पानी में ही बदमाशी करते रहे...चेन्नई में सूरज समंदर की विपरीत दिशा में डूबता है, तो शाम को समंदर का पानी एकदम सुनहला लगता है, पारदर्शी सुनहला...
दिन का समंदर और रात का समंदर एकदम अलग होते हैं...दिन को लहरें अलग थलग आती हैं...रात को जैसे गहरे नीले समंदर में बिजली कौंधती है, एक लहर बीच समंदर से उठती है और दौड़ती है दूसरी लहर का हाथ थामने...लम्बी पतली सफ़ेद रेखाएं...समंदर किनारे चुप चाप बैठना...थोड़ा और करीब ला देता है.
वापसी में तो मुझे पूरा यकीन था कि हम खो जायेंगे, आखिर फिर से डेढ़ बजे रात को रास्ता कौन बताएगा चेन्नई से बाहर जाने का...लगा कि अनजान शहर में एक अपना होना कितना विश्वस्त करता है...कि एकदम भटक गए तो प्रशांत को बुला लेंगे...बाइक उठा के आ जायेगा...भला आदमी है...एक बार भी मिली नहीं हूँ उससे हालाँकि...सोच रही थी...नेट पर बने रिश्ते भी कितने सच्चे से होते हैं.
जीपीएस के सहारे पूरे रास्ते आये...वाकई बड़े काम की चीज़ है, फोन लेते वक़्त सोचा भी नहीं था कि इसकी कभी जरूरत भी पड़ेगी और ये इतना काम भी आएगा...रात फिर से बहुत खूबसूरत थी...सुबह ६ बजे बंगलोर पहुँच गए...भागा भागी जाना....फटाफटी आना.
जिंदगी...आवारगी...जिंदगी
(पीडी का ख़ास धन्यवाद)
29 July, 2010
मेरा बिछड़ा यार...
इत्तिफाक...एक अगस्त...फ्रेंडशिप डे...और हमारी IIMC का रियुनियन एक ही दिन...वक़्त बीता पता भी नहीं चला...पांच साल हो गए...२००५ में में पहला दिन था हमारा...आज...पांच साल बाद फिर से सारे लोग जुट रहे हैं...
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आखिरी दिन...कॉपी पर लिखी तारीख...आज से पांच साल बाद हम जहाँ भी होंगे वापस एक तारीख को यहीं मिलेंगे...उस वक़्त मुस्कुरा के सोचा था...यहीं दिल्ली में होंगे कहीं, मिलने में कौन सी मुश्किल होगी...आज बंगलोर में हूँ...जा नहीं सकती.
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मैं फेसबुक बेहद कम इस्तेमाल करती हूँ...आज तबीयत ख़राब थी तो घर पर होने के कारण देखा...कम्युनिटी पर सबकी तसवीरें...गला भर आया...और दिल में हूक उठने लगी...जा के एक बार बस सब से मिल लूं तो लगे कि जिन्दा हूँ.
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भर दोपहर स्ट्रिंग्स का गाना सुना...मेरा बिछड़ा यार...सुबह के खाने के बाद कुछ खाने को था नहीं घर पर...बाहर जाना ही था...कपडे बदले, जींस को मोड़ कर तलवे से एक बित्ता ऊपर किया, फ्लोटर डाले और रेनकोट पहन कर निकली ब्रेड लाने...गाना रिपीट पर था...कुछ सौ मीटर चली थी कि बारिश जोर से पड़ने लगी...
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रेनकोट का हुड थोड़ा सा पीछे सरकाती हूँ...तेज बारिश चेहरे पर गिरती है, आँखों में पानी पानी...बरसाती नदी...और बंगलोर पीछे छूट गया...जींस के फोल्ड खुल गए, ढीला सा कुरता और हाथों में सैंडिल...कुछ बेहद करीबी दोस्त...एक भीगी सड़क. गर्म भुट्टे की महक, और पुल के नीचे किलकारी मारता बरसाती पानी. ताज़ा छनी जिलेबियां अखबार के ठोंगे में...गंगा ढाबा की मिल्क कॉफ़ी और वहां से वापस आना होस्टल तक...
उसकी थरथराती उँगलियों को शाल में लपेटना...भीगे हुए जेअनयू के चप्पे चप्पे को नंगे पैरों गुदगुदाना...पार्थसारथी जाना...आँखों का हरे रंग में रंग जाना...दोस्ती...इश्क...आवारगी...जिंदगी.
IIMC my soul.
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काश मैं दिल्ली जा सकती...
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करे मेरा इन्तेजार...मेरा बिछड़ा यार...मेरा बिछड़ा यार...
28 July, 2010
बिल्ली भयी कोतवाल अब डर काहे का
बंगलोर का मौसम आजकल बड़ा सुहाना हो रखा है. हलकी सी ठंढ पड़ती है और फुहारों वाली बारिश होती रहती है. सुबह सूरज भी बादल की कुनमुनी रजाई ढांप कर पड़े रहता है. ऐसे मौसम में सुबह उठना मुश्किल और नामुमकिन के बीच का कुछ काम है.
इधर कुछ दिनों से मेरी तबीयत भी काफी ख़राब चल रही थी. बात दरअसल गोल गोल घूमकर ढाक के तीन पात हो गयी थी. तबीयत खराब होने के कारण खाना नहीं बनती थी, और खाना नहीं बनाने के कारण तबीयत और खराब होती जाती थी. तो कुछ दिन पहले मैंने हथियार डाल दिए, हथियार बोले तो बेलन, छोलनी, चिमटा आदि...घर में एक कुक का इंतज़ाम कर लिया. सुबह का नाश्ता और रात का खाना घर पर बन जाता था और दीपहर में ऑफिस की कैंटीन जिंदाबाद.
हाथ में दर्द होने के कारण बाइक चलाना बंद था...कुणाल रोज सुबह कार से पहुंचा देता था, लौटते हुए श्रुति नाम की बेहद भली लड़की अपनी बाइक से घर पहुंचा दिया करती थी. ऑफिस आते जाते दोनों भले इंसानों से गप्प करते हुए रास्ता भी मजे से कट जाता था. कह सकते हैं कि मेरी ऐश थी. लगता था होस्टल वाले दिन वापस आ गए हैं. बस ऑफिस जाओ, दोस्तों से गप्पें करो और अच्छी किताबें, फिल्में, गाने...सब अच्छा चल रहा था.
तो मैं बता रही थी बिल्ली के बारे में....
ऐसा हुआ कि एक भले दिन मैं घर से देर चली थी, हमेशा की तरह. वैसे लेट की उतनी फिकर नहीं होती है क्योंकि ऑफिस में नौ घंटे बिताना जरूरी है बस...फिर भी लेट जाना अच्छा नहीं लगता है ऑफिस. सारे लोग आ गए होते हैं...यहाँ मेरी टीम में अधिकतर लड़के हैं उनको सुबह करना ही क्या होता है, भोरे भोर उठ कर पहुँच जाते हैं. शामत हम बेचारों की आती है :)
कुणाल बेचारा आधी नींद में उठता है और कार ले कर चल देता है हमको पहुंचाने. तो हमारी कार का होर्न ही नहीं बज रहा था...और बंगलोर में बिना होर्न बजाये जाना नामुमकिन है. तो घर से आधी दूर पर हम झख मारते ऑटो का इन्तेजार करने लगे. भगवान् मेहरबान था तो ऑटो मिल गया.
गाड़ी सर्विस सेंटर भेजी...दोपहर को फ़ोन आया उनका...कार के तार चूहे कुतर गए हैं...अब बताओ भला, इत्ती बड़ी गाड़ी बनायीं, उसमें एक ऑटोमेटिक चूहेदानी नहीं लगा सके कि चूहे नहीं आयें. कमसे कम जाली टाईप का ही कुछ लगा देते कि चूहे अन्दर नहीं आ सकें. गाड़ी वापस आई तो हमने पुछा कि क्या करें...तो बोलता है कि गाड़ी सुरक्षित जगह पर लगायें. अब अपार्टमेन्ट में लगाते हैं, और किधर लगायें, कौन सा गटर में लगते हैं कि बेहतर जगह लगा सकें.
चूहे मारने कि दवा रखने कि सलाह भी दी उन्होंने. मैं सोचती हूँ कि और कैसी जगहें होंगी जहाँ चूहे नहीं होते होंगे. किसी कार के सर्विस स्टेशन से मिली ये अब तक की सबसे अजीब सलाह में से आती है. चूहे मारने की दवा दें...
गाड़ी की सुरक्षा के लिए हम एक बिल्ली पालने की सोच रहे हैं...एक ऐसी बिल्ली जिसका खाने का टेस्ट एकदम खालिस बिल्ली वाला हो, और जो चूहों के शिकार में निपुण हो. बिल्ली को रोज सुबह दूध मलाई मिलेगी...दिन भर भूखा रखा जाएगा ताकि शाम को चूहे पकड़ने के काम में उसका मन लगे. बिल्ली को दिन भर सोने की पूरी इजाजत है...रात को जाग कर पहरा देने के लिए जरूरी है कि वो दिन में भरपूर नींद ले. बिल्ली को महीने में एक वीकेंड छुट्टी मिलेगी जिसमें वो बाकी बिल्लियों से मिलने जा सकती है. बिल्ली की इच्छा हो तो वो अपने साथियों को भी बुला सकती है. बिल्ली चतुर और निडर हो...दिखने में मासूम और क्यूट हो और कम बोलने वाली हो तो अतिरिक्त बोनस मिलेगा.
तो अगर आप किसी ऐसी बिल्ली को जानते हैं तो कृपया खबर करें...जानकारी देने वाले को उचित इनाम दिया जाएगा.
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