यमन देश के एक छोटे से प्रान्त में एक कहवाखाना हुआ करता था. रेत के टीलों में दूर देश के मुसाफिर जैसे पानी की गंध पा कर पहुँच जाते थे. एक छोटा सा चश्मा उस छोटी सी बस्ती को जन्नत बनाये रखता था. बस्ती से कुछ ही दूर समंदर शुरू होता था, इस अनोखी जगह को लोग खुदा की नेमत समझते थे. व्यापारी यहाँ मसाले, हीरे, पन्ने , कई और बेशकीमती जवाहरात और महीन रेशम की बिक्री करने के लिए आते थे. जिंदगी को खूबसूरत बनाने वाली ये चीज़ें मुंहमांगे दाम पर बिकती थीं.
बस्ती का कहवाखाना किस्सों की एक चलती फिरती तस्वीर हुआ करता था. कई देशों की तहजीबें, अलग लोग, अलग रहन सहन, किस्सों का अलग तरीका...यूँ तो किस्से तरह तरह के होते थे, सुल्तानों के, कर ना दिए जाने पर ढाए सितम के, पर किस्से का खुमार बस एक ही...इश्क.
शाम ढलते ही कई रंग घुल जाते थे समंदर से आती हवाओं में और रुबाब गाने लगता था. कहवाखाने के दो कोने में मोम पिघलता रहता था पूरी रात...समंदर की नमकीन हवाओं में थिरकती लौ में एक उन्नीस साल का लड़का किस्से कहता था. उसकी आँखें नीली और पारदर्शी थी, जब रुबाब छेड़ता तो उड़ती रेत उसके किस्से एक दर्द की धुन में छुपा कर नीलम के एक ऊंचे कंगूरे तक पहुंचा देती थी. अगली सुबह जब पर्दानशीनो का जुलूस बाग़ के लिए निकलता था तो बिना हवा के भी एक नकाब खुल सा जाता था और सुनहली आँखें उसकी नीली आँखों पर थिरक उठती थीं. सहर की धूप समंदर की लहरों को छू कर ऊपर उठती थी. एक अगली रोज के लिए.
साल के जलसे पर एक रूहानी गीत के गाया गया, इश्क के इन्द्रधनुषी रंगों को समेटे हुए...एक हसीना का नकाब हलके से सरका और नीली और सुनहली आँखों ने सदियों के बंधन क़ुबूल लिए.
अगली सुबह समंदर का नीला पारदर्शी गहरा लाल होता जा रहा था. लहरें, किनारे, आसमान...सब कुछ लाल...कत्थई और धीरे धीरे सियाह हो गया.
कहते हैं उस रात पूरी बस्ती रेत में मिल गयी...आज भी रेगिस्तान में भटके लोगों को पानी का छलावा होता है. रात को चलते कारवां अक्सर एक रूहानी गीत की तलाश में भटक जाते हैं.
इश्क तब से जाविदा है. और इश्क करने वाले... फ़ना
कहते हैं उस रात पूरी बस्ती रेत में मिल गयी...आज भी रेगिस्तान में भटके लोगों को पानी का छलावा होता है. रात को चलते कारवां अक्सर एक रूहानी गीत की तलाश में भटक जाते हैं.
इश्क तब से जाविदा है. और इश्क करने वाले... फ़ना
