क्षितिज के कोने से अटक गया था
अप्सरा का साँवला दुपट्टा
खींच रही थी वो, आँखें दिखा रही थी
बिजलियाँ कौंध गयीं देर शाम...
बिखर गए दुपट्टे में अटके सितारे
बारिश खुशबू से भिगा गयी धरती को
मचल के उठी धुंध उसको एक बार छूने के लिए
डांटा उसने जोर से, बदल गरज गए
तीन ताल बज रहा था खिड़की के पल्ले पर
बूंदों को याद थी उसके पैरों की थाप
ठुड्डी पे हाथ टिकाये पेड़ रस में डूबे थे
झूम रहा था कण कण मदोन्मत्त होकर
सूरज शर्म से लाल हो गया
शाम अँधेरे में दबे पाँव उतर गयी
धीमा हो गया राग मल्हार
रंग बुझे, पर्दा गिरा...रात हुयी
14 April, 2010
07 April, 2010
अख़बार से रंगा एक दिन
आधा दिन से ऊपर होने को आया...
मैं मान लूंगी कि मैंने आज का अखबार नहीं पढ़ा।
कि अस्सी जवानों के मारे जाने की बात सुनकर मुझे बस झुंझलाहट हुयी कि मैंने पेपर पढ़ना फिर क्यों शुरू किया.
कि मेरे दिमाग में कॉलेज के ज़माने का मीडिया एथिक्स का एक लेक्चर आया जिसमें ये था कि पहले अखबार वाले फ्रंट पेज पर ऐसी तसवीरें नहीं छापते थे जो विचलित कर सकती हूँ, खून वाली तसवीरें ब्लैक एंड व्हाईट में छापते थे।
कि सुबह से मुझे घबराहट हो रही है, मुझे लगता है मेरे हाथों पर खून लगा हुआ है। कहीं ना कहीं मेरी कोई जिम्मेदारी है जिससे मैं भाग रही हूँ। मुंह छुपा रही हूँ।
कि मुझे लगता है कि मैं उन लोगों को जानती हूँ जो उनके परिवार में थे, कि खून से रंगी पोशाकों में जो चेहरे थे उन्हें मैंने कभी, कहीं हँसते देखा है।
कि मेरी जिंदगी में बस ये दुःख है कि मैंने अपनी माँ को खो दिया है पर मुझे वही दुःख पहाड़ लगता है और जिंदगी जीने के काबिल नहीं पर मुझे आज ये सोच कर शर्म आती है।
कि मुझे लगता है कि किसी भी वजह के लिए इतनी बर्बरता से खामोशी से इतने लोगों कि जान लेना गलत है और अगर कुछ लोग इसे सही ठहरा सकते हैं तो हमारे समाज कि बुनियाद में कोई खोट है
कि थोड़ा चैन पाने के लिए मैंने टीवी देखना शुरू किया पर टीवी में 'अब तक छप्पन' चल रही थी, जिसमें वो सीन था जहाँ नाना पाटेकर बात करते करते किसी को गोली मार देता है...अंग्रेजी में शोट हिम इन कोल्ड ब्लड...व्हाटेवर दैट मीन्स।
कि मुझे रसीदी टिकट का एक वाकया याद आता है जिसमें कोई जर्मन कहता है कि इस भाषा ने इतने गुनाह किये हैं जर्मन में कभी कवितायेँ नहीं रची जानी चाहिए। मुझे भी लगता है कि कविताओं का कोई औचित्य नहीं है।
कि मुझे आश्चर्य होता है कि कैसे हर बार मैं बस सोच के रह जाती हूँ और कुछ भी नहीं करती। कि मैं सोचती हूँ कि क्या वाकई मैं मुझ कर सकूंगी अगर करना चाहूँ तो।
कि किताबें अगर जला दी जाएँ तो हाथों में क्या थामें, दूसरा सहारा कहाँ है...संगीनों के साए में
कि जिंदगी से जरूरी ऐसी कौन सी जंग लड़ रहे हैं लोग...कितना भी पढूं समझ में नहीं आता।
कि एक मसीहा के इन्तेजार में बैठे हैं, पर मसीहा हम में से एक को ही तो बनना पड़ता है, जिम्मेदारी कभी कभी खुद से भी उठानी पड़ती है।
कि स्याही जैसे दिन पर फ़ैल गयी है...मुझे हर तरफ से रोना सुनाई देता है, ऐसा रूदन जिसमें आवाज नहीं है।
कि मनुष्य की बनायीं दुनिया की प्रोब्लेम्स का हल भगवान् के पास नहीं होता, हमें खुद तलाशना पड़ता है।
कि क्या मैं मन में गूंजते इस श्लोक की रौशनी में बस बैठी रहूँ..."असतो मा सदगमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय।"
मैं मान लूंगी कि मैंने आज का अखबार नहीं पढ़ा।
कि अस्सी जवानों के मारे जाने की बात सुनकर मुझे बस झुंझलाहट हुयी कि मैंने पेपर पढ़ना फिर क्यों शुरू किया.
कि मेरे दिमाग में कॉलेज के ज़माने का मीडिया एथिक्स का एक लेक्चर आया जिसमें ये था कि पहले अखबार वाले फ्रंट पेज पर ऐसी तसवीरें नहीं छापते थे जो विचलित कर सकती हूँ, खून वाली तसवीरें ब्लैक एंड व्हाईट में छापते थे।
कि सुबह से मुझे घबराहट हो रही है, मुझे लगता है मेरे हाथों पर खून लगा हुआ है। कहीं ना कहीं मेरी कोई जिम्मेदारी है जिससे मैं भाग रही हूँ। मुंह छुपा रही हूँ।
कि मुझे लगता है कि मैं उन लोगों को जानती हूँ जो उनके परिवार में थे, कि खून से रंगी पोशाकों में जो चेहरे थे उन्हें मैंने कभी, कहीं हँसते देखा है।
कि मेरी जिंदगी में बस ये दुःख है कि मैंने अपनी माँ को खो दिया है पर मुझे वही दुःख पहाड़ लगता है और जिंदगी जीने के काबिल नहीं पर मुझे आज ये सोच कर शर्म आती है।
कि मुझे लगता है कि किसी भी वजह के लिए इतनी बर्बरता से खामोशी से इतने लोगों कि जान लेना गलत है और अगर कुछ लोग इसे सही ठहरा सकते हैं तो हमारे समाज कि बुनियाद में कोई खोट है
कि थोड़ा चैन पाने के लिए मैंने टीवी देखना शुरू किया पर टीवी में 'अब तक छप्पन' चल रही थी, जिसमें वो सीन था जहाँ नाना पाटेकर बात करते करते किसी को गोली मार देता है...अंग्रेजी में शोट हिम इन कोल्ड ब्लड...व्हाटेवर दैट मीन्स।
कि मुझे रसीदी टिकट का एक वाकया याद आता है जिसमें कोई जर्मन कहता है कि इस भाषा ने इतने गुनाह किये हैं जर्मन में कभी कवितायेँ नहीं रची जानी चाहिए। मुझे भी लगता है कि कविताओं का कोई औचित्य नहीं है।
कि मुझे आश्चर्य होता है कि कैसे हर बार मैं बस सोच के रह जाती हूँ और कुछ भी नहीं करती। कि मैं सोचती हूँ कि क्या वाकई मैं मुझ कर सकूंगी अगर करना चाहूँ तो।
कि किताबें अगर जला दी जाएँ तो हाथों में क्या थामें, दूसरा सहारा कहाँ है...संगीनों के साए में
कि जिंदगी से जरूरी ऐसी कौन सी जंग लड़ रहे हैं लोग...कितना भी पढूं समझ में नहीं आता।
कि एक मसीहा के इन्तेजार में बैठे हैं, पर मसीहा हम में से एक को ही तो बनना पड़ता है, जिम्मेदारी कभी कभी खुद से भी उठानी पड़ती है।
कि स्याही जैसे दिन पर फ़ैल गयी है...मुझे हर तरफ से रोना सुनाई देता है, ऐसा रूदन जिसमें आवाज नहीं है।
कि मनुष्य की बनायीं दुनिया की प्रोब्लेम्स का हल भगवान् के पास नहीं होता, हमें खुद तलाशना पड़ता है।
कि क्या मैं मन में गूंजते इस श्लोक की रौशनी में बस बैठी रहूँ..."असतो मा सदगमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय।"
05 April, 2010
तीन दिनों का सफ़र
हमारे बीच एक ख़ामोशी का रिश्ता उग आया है. तीन दिन में सफ़र पूरा करने वाली इस ट्रेन के पहले पड़ाव से आखिरी पड़ाव के साथी हैं हम. इत्तिफाक से हम दोनों को खिड़की वाली आमने सामने की सीट मिली है.
दिन के ढलते हुए मैं उसके चेहरे के बदलते मौसमों को देख रही हूँ. उसके माथे पर की बनती बिगड़ती लकीरें सब्जेक्टिव थीं, उनका मतलब कुछ भी हो सकता था. पर हमेशा की तरह हम वही देखते हैं जो हमारी खुद की जिंदगी में जिया होता है. अक्स हमेशा किसी जान पहचान वाले का होता है. वो चेहरा तीन दिन के सफ़र में अपना हो गया था.
ये एक पुरानी कहानी है, तब जब ट्रेन के सफ़र में एक कूपा आपकी पूरी दुनिया होता था...बातें उस समय की हैं जब मोबाइल इस तरह से हमारी जिंदगी में दखल अन्दाजी नहीं कर सकता था. ये भी कारण है की ट्रेन में बने रिश्ते, बिना कहे एक जरूरी अनछुए हिस्से में महफूज़ रहते हैं हमेशा.
स्लीपर के थ्री टायर डिब्बे में बीच की सीट पर आधी चांदनी आती रहती थी, पेड़ों और कुछेक मकानों के अँधेरे के अलावा. उसके गाल सहलाती चांदनी से उसे बेहद तकलीफ होने लगी थी और उसके सफ़ेद पड़े चेहरे पर दर्द की सिलवटें पड़ने लगी थीं.
शहर छूटते वक़्त मैंने उसकी आँखों में सारे मौसम देखे थे. वो हर इमारत को एक प्यार भरी नज़र से उसके पूरे डीटेल्स के साथ संजो रहा था. और एक जगह उसकी आँखें फ्रीज हो गयी थीं...वो स्कूल दूर तक उसकी आँखों में लिपटा हुआ था. सोलह साल की उम्र में विश्वास करना कितना आसान होता है कि इंसान को जिंदगी में एक ही बार प्यार हो सकता है. छोटे शहर के स्कूल में खूबसूरत लड़की भी कमोबेश एक ही होती है पर क्लास के अधिकतर लड़के उसे अलग अलग रंग में याद रखते हैं. याद रखते हैं इसमें कोई शक नहीं.
उसके बारे में मुझे कुछ बातें बिलकुल अच्छी तरह याद हैं. वह किसी से विदा लिए बिना आया है. सिर्फ इसलिए कि उसे एक दिन जरूर मिलेगा पर तब कब वो कुछ बन चुका हो. पर अभी उसे डर लग रहा है कि वो इंतज़ार क्यों करेगी जब उसे मालूम भी नहीं है कि इंतज़ार करना है. उसकी आँखों में लाल बत्ती वाली एक गाड़ी की रौशनी जलती बुझती है...
उसने ट्रेन से उतरते हुए मुझसे भी विदा नहीं ली...वो रिश्ता जो शुरू नहीं हुआ कभी...आज भी अधूरा है. ट्रेन के सफ़र में आज भी मुझे उसकी याद आती है, लगता है सामने वाली सीट पर आके बैठेगा शायद तो मैं उसे बता सकूंगी. शशांक, मेरा नाम पूजा है...तुम्हारा नाम संजीवनी में मेरे फ़ेवरिट डॉक्टर का है, तुम्हारी आँखों का भूरा रंग मेरे सबसे प्यारे दोस्त की आँखों जैसा है...और मैं तुम्हें आज भी याद करती हूँ.
02 April, 2010
विरह राग
देर रात के किसी पहर में
किसी भूले राग को गाते हुए
अक्सर 'पकड़' पर अटक जाती हूँ
सुर भटके हुए लगते हैं
याद आता है अपना हारमोनियम
और सर के तबले की थाप
उँगलियों पर तीन ताल गिनती हूँ
ह्म्म्म...वक़्त की गिनती अभी दुरुस्त है
कोई दिलासा मिलता है कहीं
मैं शायद कुछ उन लड़कियों में से हूँ
जिनको रात में अकेले डर नहीं लगता
चांदनी अच्छी लगती है कमरे में
चाँद को घूरते हुए सोचती हूँ
चाँद पूरा हो गया आज बढ़ते बढ़ते
तुम्हारा काम एक महीने से चल रहा है
गुलदान में से मुरझाये फूल निकालती हूँ
तीन दिन हो गए सन्डे बीते हुए
रजनीगंधा के फूल लाने होंगे नए
लैवेन्डर कैंडिल, रुकी हुयी लौ
उँगलियों से लौ को गुदगुदी करती हूँ
उसके थिरकने पर हंसी आती है
गिटार अब एकदम आउट ऑफ़ ट्यून है
मन कसैला हो जाता है सुन कर
डेरी मिल्क का एक टुकड़ा तोड़ती हूँ
बहुत कुछ करती हूँ बहुत देर जगी हुयी
तुम्हारे बिना रात वाकई बहुत लम्बी हो जाती है...
किसी भूले राग को गाते हुए
अक्सर 'पकड़' पर अटक जाती हूँ
सुर भटके हुए लगते हैं
याद आता है अपना हारमोनियम
और सर के तबले की थाप
उँगलियों पर तीन ताल गिनती हूँ
ह्म्म्म...वक़्त की गिनती अभी दुरुस्त है
कोई दिलासा मिलता है कहीं
मैं शायद कुछ उन लड़कियों में से हूँ
जिनको रात में अकेले डर नहीं लगता
चांदनी अच्छी लगती है कमरे में
चाँद को घूरते हुए सोचती हूँ
चाँद पूरा हो गया आज बढ़ते बढ़ते
तुम्हारा काम एक महीने से चल रहा है
गुलदान में से मुरझाये फूल निकालती हूँ
तीन दिन हो गए सन्डे बीते हुए
रजनीगंधा के फूल लाने होंगे नए
लैवेन्डर कैंडिल, रुकी हुयी लौ
उँगलियों से लौ को गुदगुदी करती हूँ
उसके थिरकने पर हंसी आती है
गिटार अब एकदम आउट ऑफ़ ट्यून है
मन कसैला हो जाता है सुन कर
डेरी मिल्क का एक टुकड़ा तोड़ती हूँ
बहुत कुछ करती हूँ बहुत देर जगी हुयी
तुम्हारे बिना रात वाकई बहुत लम्बी हो जाती है...
29 March, 2010
एक भूली सी धुन की तलाश में
अज़दक पर एक पॉडकास्ट सुना था कुछ दिन पहले। वैसे मैं पॉडकास्ट बहुत कम सुनती हूँ, अच्छा नहीं लगा अधिकतर जो भी सुना है। आवाज की जादूगरी मन मोह गयी...कितनी कितनी बार सुना, दोबारा तिबारा...जाने कब तक।
उसके अलावा जो एकदम से किसी याद के तार छेड़ता सा लगा वो था पार्श्व में बजता गीत। मुझे कमेन्ट करने में थोड़ा डर भी लगा, लेकिन कहे बिना रहा भी नहीं गया।
deja vu...मैंने बहुत कम podcasts सुने हैं, ऐसा एक भी नहीं लगा जो याद हो.
आपको आज पहली बार सुना, ये गीत जो है आपकी आवाज के दरमयान कौन सा है? बेख्याली में मैं कई बार कोई धुन गुनगुनाती रहती हूँ...ये वैसा ही गया हुआ कोई गीत लगा.
तारीफ़ के शब्द नहीं मिल रहे हैं, आज पहली बार कमेन्ट कर रही हूँ तो थोड़ा डर भी लग रहा है. आपकी आवाज बहुत अच्छी है.
और ये पोडकास्ट तो बहुत अच्छा लगा...एक छोटी सी कहानी जैसा. अगर इस गाने का कोई लिंक दे सकेंगे तो आभारी रहूंगी
उन्होंने फिल्म का नाम बताया उससे ढूंढते ढूंढते उसके जापानी version तक पहुंची...इसी सिलसिले में उसका फ्रेंच भी सुना। गीत कहीं मन में बजता सा महसूस होता था।
यूँ तो गाना या फिर सुनना अगलग अलग वजहों से होता है...मेरे लिए सबसे खूबसूरत वजह है कि संगीत को बताया नहीं जा सकता, समझाया नहीं जा सकता। कि इस गीत को सुनकर कैसा लगता है...ये एक ऐसी चीज़ है जो खुद महसूस करनी होती है। और हर एक के लिए हर गीत का अलग असर होता है।
फिर भी मैं कोशिश करुँगी कि इस गीत को सुन कर मुझे कैसा लगता है।
कदम बिलकुल हलके हों, कि डांस करते वक़्त फ्लोर को बिलकुल हलके से छुएं, जैसे कोई तितली फूल पर पल भर को रूकती है। पैर के अंगूठे पर घूम जाऊं...थोड़ा उचक कर तुम्हारी आँखों में देखूं...और जब तुम्हारी बाहों में घूमूं तो तुम्हारी आँखों में पूरे हाल का घूमना नज़र आये बस मेरा चेहरा रुका हो। डांस करना वैसे हो जैसे तन बिलकुल हल्का हो गया हो और ख़ुशी से पैर जमीन पर ना पड़ सकें।
बोल ऐसे हैं कि इनको गाने के लिए फ्रेंच सीखने का मन करे, ऐसी हलकी सी आवाज में हवा में तिरता सा गीत हो खुशबू की तरह। खूबसूरत सी गुलाबी रंग कि कोई ड्रेस हो जिसमें खूब सारी झालर हो...और रात पर रात बीतती जाए पर हम बस आँखों में आँखें डाले थिरकते रहे...और मैं कह सकूँ कि "la vie en rose/ looking at the world through rose coloured glasses".
कल सबरीना देख रही थी, एक पुरानी इंग्लिश फिल्म है audrey hepburn की...वो बेहद खूबसूरत है...और फिर मुझे याद आया कि ये गीत ऐसा सुना हुआ और आत्मा के तार छेड़ता क्यों लगता है। इसके साथ एक बेहद रूमानी प्यार का ख्वाब जो जुड़ा हुआ है।
कॉलेज में फिल्म अप्रेशिअशन के क्लास में दो फिल्में देखी थी इस बेहद खूबसूरत कलाकार की "रोमन होलीडे" और "सबरीना"। उस कच्ची उम्र में ये खूबसूरत गीत कितने शाम अकेले में गुनगुना के थिरकती रही थी...इंतज़ार में...मेरे प्रिंस चार्मिंग के इंतज़ार में। परीकथाओं पर यकीं करती थी, आज भी करती हूँ।
इसलिए ये गीत पहली नज़र के प्यार की तरह ताजगी से भरा अनछुआ सा लगता है...प्यार...दुनिया को गुलाबी चश्मे से ही तो दिखाता है।
je t'aime
ये रहा
उसके अलावा जो एकदम से किसी याद के तार छेड़ता सा लगा वो था पार्श्व में बजता गीत। मुझे कमेन्ट करने में थोड़ा डर भी लगा, लेकिन कहे बिना रहा भी नहीं गया।
deja vu...मैंने बहुत कम podcasts सुने हैं, ऐसा एक भी नहीं लगा जो याद हो.
आपको आज पहली बार सुना, ये गीत जो है आपकी आवाज के दरमयान कौन सा है? बेख्याली में मैं कई बार कोई धुन गुनगुनाती रहती हूँ...ये वैसा ही गया हुआ कोई गीत लगा.
तारीफ़ के शब्द नहीं मिल रहे हैं, आज पहली बार कमेन्ट कर रही हूँ तो थोड़ा डर भी लग रहा है. आपकी आवाज बहुत अच्छी है.
और ये पोडकास्ट तो बहुत अच्छा लगा...एक छोटी सी कहानी जैसा. अगर इस गाने का कोई लिंक दे सकेंगे तो आभारी रहूंगी
उन्होंने फिल्म का नाम बताया उससे ढूंढते ढूंढते उसके जापानी version तक पहुंची...इसी सिलसिले में उसका फ्रेंच भी सुना। गीत कहीं मन में बजता सा महसूस होता था।
यूँ तो गाना या फिर सुनना अगलग अलग वजहों से होता है...मेरे लिए सबसे खूबसूरत वजह है कि संगीत को बताया नहीं जा सकता, समझाया नहीं जा सकता। कि इस गीत को सुनकर कैसा लगता है...ये एक ऐसी चीज़ है जो खुद महसूस करनी होती है। और हर एक के लिए हर गीत का अलग असर होता है।
फिर भी मैं कोशिश करुँगी कि इस गीत को सुन कर मुझे कैसा लगता है।
कदम बिलकुल हलके हों, कि डांस करते वक़्त फ्लोर को बिलकुल हलके से छुएं, जैसे कोई तितली फूल पर पल भर को रूकती है। पैर के अंगूठे पर घूम जाऊं...थोड़ा उचक कर तुम्हारी आँखों में देखूं...और जब तुम्हारी बाहों में घूमूं तो तुम्हारी आँखों में पूरे हाल का घूमना नज़र आये बस मेरा चेहरा रुका हो। डांस करना वैसे हो जैसे तन बिलकुल हल्का हो गया हो और ख़ुशी से पैर जमीन पर ना पड़ सकें।
बोल ऐसे हैं कि इनको गाने के लिए फ्रेंच सीखने का मन करे, ऐसी हलकी सी आवाज में हवा में तिरता सा गीत हो खुशबू की तरह। खूबसूरत सी गुलाबी रंग कि कोई ड्रेस हो जिसमें खूब सारी झालर हो...और रात पर रात बीतती जाए पर हम बस आँखों में आँखें डाले थिरकते रहे...और मैं कह सकूँ कि "la vie en rose/ looking at the world through rose coloured glasses".
कल सबरीना देख रही थी, एक पुरानी इंग्लिश फिल्म है audrey hepburn की...वो बेहद खूबसूरत है...और फिर मुझे याद आया कि ये गीत ऐसा सुना हुआ और आत्मा के तार छेड़ता क्यों लगता है। इसके साथ एक बेहद रूमानी प्यार का ख्वाब जो जुड़ा हुआ है।
कॉलेज में फिल्म अप्रेशिअशन के क्लास में दो फिल्में देखी थी इस बेहद खूबसूरत कलाकार की "रोमन होलीडे" और "सबरीना"। उस कच्ची उम्र में ये खूबसूरत गीत कितने शाम अकेले में गुनगुना के थिरकती रही थी...इंतज़ार में...मेरे प्रिंस चार्मिंग के इंतज़ार में। परीकथाओं पर यकीं करती थी, आज भी करती हूँ।
इसलिए ये गीत पहली नज़र के प्यार की तरह ताजगी से भरा अनछुआ सा लगता है...प्यार...दुनिया को गुलाबी चश्मे से ही तो दिखाता है।
je t'aime
ये रहा
27 March, 2010
आई मिस यू

रात, दिन, भोर, शाम
जब महीनों तुमसे बात नहीं कर पाती हूँ
फुर्सत नहीं मिल पाती...
रात की खिड़की से देखती हूँ
चाँद का अकेले बढ़ते जाना
पूर्णिमा तक और फिर वापस...
इकट्ठी हो जाती हैं बहुत सारी बातें
जो बस तुमसे कर सकती हूँ मैं
किसी भी और से नहीं...
थक जाने के बहुत बाद वाले किसी दिन
किसी शाम, फिर रात
तुम नहीं आते हो...
उस तन्हाई में
कुछ कहने को मन करता है
तब मुझे तुम्हारी नहीं...माँ की याद आती है।
25 March, 2010
खाली शाम
खामोश हूँ जैसे कि कहने को कुछ बचा नहीं रह गया, रुक गयी हैं उँगलियाँ कि हर अहसास, हर दर्द जो बयां किया जा सकता था लिखा जा चुका है. चलती हूँ तो लगता है पूरी धरती क़दमों से नाप लूं फिर भी क़दमों की तलाश ख़त्म नहीं होगी...नहीं हो सकती है क्योंकि मंजिल तुम ही तो हो, चार कदम के फासले पर. ऐसे चार कदमों के फासले पर जो पूरे नहीं किये जा सकते.
दर्द जिस्म के इर्द गिर्द यूँ लिपटता है जैसे तुम बाहें फैला रहे हो...सोचती हूँ कि ऐसा दर्द कितनो को होता होगा, पर फिर भी हर शाम महसूसती हूँ तो लगता है दर्द भी जैसे म्यूटेट करना सीख लेता है. जैसे हर बार बुखार आता है तो अजीब से तिलिस्म बना जाता है, उसके उघड़े हुए उदास रंग हर बार एक अलग धुन में गाने लगते हैं. सब कुछ गड्ड मड्ड सा होने लगता है. चादर गर्म होती है लगता है आंसुओं का कोई समंदर सा है और उसका आइना आँखों में भी आ रहा है.
"जिंदगी" कितना ओवर यूज्ड शब्द है, जिसे देखो इस्तेमाल कर रहा है, शब्द न हुआ जीरे का तड़का हो गया, किसी भी सब्जी में मार दो, चलता है. इस चलता है के चक्कर में कहाँ तक घूम रही हूँ चकर घिरनी सी. बचपन में पढ़ी एक पंक्ति याद आती है "सत्य हमेशा शिव होता है, पर वह हमेशा सुन्दरम भी हो ये जरूरी नहीं". मैं याद करने की कोशिश करती हूँ की आखिरी बार कौन सा सच सुना था जो सुन्दर भी था, बहुत जोर देने पर भी याद नहीं आता. संस्कार हमेशा प्रक्टिकालिटी पर हावी हो जाते हैं, झूठ बोलना किसी भी तरह से पचता नहीं है. तबियत ख़राब लगने लगती है. और अगर इमानदारी से पूरा सच कहूँ तो मुझे आज भी झूठ बोलने पर ऐसा लगता है की कोई पाप कर दिया हो. झूठ बोलना पाप है, नदी किनारे सांप है...ऐसा कुछ उस अनजानी उम्र से रट्टा मार रहे हैं जब न झूठ इतने बड़े लगते थे न सच इतना मुश्किल होता था.
मुझे तुम्हारी हर सिम्त जरूरत महसूस होती है. बहुत ज्यादा नहीं, बस थोड़ा थोड़ा. आज तक कभी महसूस नहीं किया था...पर मेरे शब्द तुमसे बात करने पर ही मिलते हैं मुझे. तुम नहीं होते तो बेजान शब्द निकलते ही नहीं. कुछ लिख नहीं पाती, पढना भी अच्छा नहीं लगता है खास. चुराती हूँ थोड़े शब्द तुम्हारे सोये हुए चेहरे की थकान से, कुछ तुम्हारी रुकी हुयी ख़ामोशी से और काम में डूबी रात से. लैपटॉप की किटिर किटिर लोरियां तो नहीं सुना सकती न.
जितनी थी किताबें घर में, सब पढ़ चुकी हूँ...अब बचे हुए खाली वक़्त में एल्बम के पन्ने पलटती रहती हूँ. चलो कुछ तो है तो कभी बीतता नहीं है. वनिला की खुशबू है रात में घुली हुयी, कैंडिल बहुत धीमे जलती है...बगल के मंदिरों में रामनवमी के लिए ढोल बज रहे हैं, लोग नाच रहे हैं उन्मुक्त होकर...डोली तैयार है, बरात जा रही है पर मुझे भगवान का चेहरा नहीं दिखता मेरी बालकनी से. सोचती हूँ की भगवान दिखते तो कुछ मांगती क्या?
कब से एक डायरी लाकर रखी है...जाने उसमें क्यों नहीं लिखती अब.
"जिंदगी" कितना ओवर यूज्ड शब्द है, जिसे देखो इस्तेमाल कर रहा है, शब्द न हुआ जीरे का तड़का हो गया, किसी भी सब्जी में मार दो, चलता है. इस चलता है के चक्कर में कहाँ तक घूम रही हूँ चकर घिरनी सी. बचपन में पढ़ी एक पंक्ति याद आती है "सत्य हमेशा शिव होता है, पर वह हमेशा सुन्दरम भी हो ये जरूरी नहीं". मैं याद करने की कोशिश करती हूँ की आखिरी बार कौन सा सच सुना था जो सुन्दर भी था, बहुत जोर देने पर भी याद नहीं आता. संस्कार हमेशा प्रक्टिकालिटी पर हावी हो जाते हैं, झूठ बोलना किसी भी तरह से पचता नहीं है. तबियत ख़राब लगने लगती है. और अगर इमानदारी से पूरा सच कहूँ तो मुझे आज भी झूठ बोलने पर ऐसा लगता है की कोई पाप कर दिया हो. झूठ बोलना पाप है, नदी किनारे सांप है...ऐसा कुछ उस अनजानी उम्र से रट्टा मार रहे हैं जब न झूठ इतने बड़े लगते थे न सच इतना मुश्किल होता था.
मुझे तुम्हारी हर सिम्त जरूरत महसूस होती है. बहुत ज्यादा नहीं, बस थोड़ा थोड़ा. आज तक कभी महसूस नहीं किया था...पर मेरे शब्द तुमसे बात करने पर ही मिलते हैं मुझे. तुम नहीं होते तो बेजान शब्द निकलते ही नहीं. कुछ लिख नहीं पाती, पढना भी अच्छा नहीं लगता है खास. चुराती हूँ थोड़े शब्द तुम्हारे सोये हुए चेहरे की थकान से, कुछ तुम्हारी रुकी हुयी ख़ामोशी से और काम में डूबी रात से. लैपटॉप की किटिर किटिर लोरियां तो नहीं सुना सकती न.
जितनी थी किताबें घर में, सब पढ़ चुकी हूँ...अब बचे हुए खाली वक़्त में एल्बम के पन्ने पलटती रहती हूँ. चलो कुछ तो है तो कभी बीतता नहीं है. वनिला की खुशबू है रात में घुली हुयी, कैंडिल बहुत धीमे जलती है...बगल के मंदिरों में रामनवमी के लिए ढोल बज रहे हैं, लोग नाच रहे हैं उन्मुक्त होकर...डोली तैयार है, बरात जा रही है पर मुझे भगवान का चेहरा नहीं दिखता मेरी बालकनी से. सोचती हूँ की भगवान दिखते तो कुछ मांगती क्या?
कब से एक डायरी लाकर रखी है...जाने उसमें क्यों नहीं लिखती अब.
12 March, 2010
रेत पर लिखी इक इश्क की दास्ताँ
रेत पर खेलना, दौड़ना, भागना...नाम लिखना मिटाना सब किया...सीपियाँ देखीं दूर दूर तक बिखरी हुयी...केकड़े भी देखे
खारा पानी अजीब होता है...और उसमें भी बालू...समंदर का पानी और चिलचिलाती धूप...रंग ऐसा माशा अल्लाह हो गया था कि क्या कहा जाए। ध्यान दिया तो पहले तो लगा कि कुछ लगा रह गया है...खुद को इतना काला पहले कभी नहीं देखा था ना...फिर realise हुआ कि ये अंग्रेजों का शौक़ है, और हम परेशान हो रहे हैं इसी टैन के लिए बेचारे कितने देर धूप में पड़े रहते हैं।
महाबलीपुरम में वैसे तो बहुत से मंदिर हैं, पत्थरों के बहुत सी शैली की मूर्तियाँ हैं...पर अगर बंगलोर से महाबलीपुरम जाने के लिए एक वजह चाहिए तो वो वजह होगी...सड़क...ऐसी खूबसूरत सड़क कि साढ़े तीन सौ किलोमीटर पता ही नहीं चले। इतना अच्छा रास्ता..और पूरे रास्ते खूबसूरत फूल और अच्छी बनी हुयी सड़क।
हम तो समंदर देखने और चिरकुटई करने गए थे...सो किये...ढेर सारा खरीद दारी भी। शंख सीप, क्या क्या उठा लाये। हमारा बस चलता तो जिस झोपड़ी में रह रहे थे उसी को उठा लाते, समंदर समेत...वो कहते हैं ना आसमान में सूराख हो सकता है टाईप। तेज़ गर्मी में लहकती हुयी बोगनविलिया की खूबसूरती को बयां करने के लिए शब्द नहीं है...गहरा गुलाबी रंग आँखों में काजल वाली ठंढक देता था।
सूरज उगा तो जैसे समंदर पिघला सोना बन गया...लहरें लेस की सुनहरी झालर...दूर दूर तक धुली हुयी रेत, जिसपर किसी के पैरों के निशान नहीं। इतना नाज़ुक था वो भोर का लम्हा कि लगे सांस लेने से टूट जाएगा...कैमरा क्लिक करना भूल जाएँ।
आखिर कुछ यादें बस आँखों में बसाने के लिए भी होती हैं।
10 March, 2010
जन्मदिन मुबारक मेरी जान
है ना लाजवाब केक? खाने में भी बहुत अच्छा था...और अगर आप ध्यान से देखेंगे तो काली ब्लू बेर्री की आइसिंग के बीच एक सफ़ेद धब्बा दिखेगा...ये वो जगह है जहाँ मैंने ऊँगली से उठा कर चख ली थी थोड़ी सी...बस ये देखने के लिए कि अच्छी है कि नहीं :)
हर दिन तो इतना खास होता नहीं ना...तो सब परफेक्ट होना जरूरी है। कुणाल का जन्मदिन जो है...वैसे हम दोनों में तीन महीने का फर्क है...मैं १० जून और वो १० मार्च।
आज के दिन कुछ शेयर करना चाहूंगी...आज से तीन साल पहले १४ बेलातेदहैप्पीबर्थडेmई को लिखा हुआ इसे "the conspiracy theory" कहते हैं। उस दिन हम दिल्ली में सीपी में थे.
yesterday...at a place i would have shuddered to go...lets say an year before...i found some of the most beautiful truths of my life...and love.
i found that you are the man i have dreamt right since my childhood or perhaps even before that, you are my prince charming, exactly as i thought you would be,and it feels great to have finally discovered you.
you are all i ever wanted...you are customised for me :-)
god made you tall coz i always wanted to wear high heels...
he made you an IITian to justify my childhood fantasy for them
he made you intelligent so that if i am in a company where i can't learn anything from anybody else at least i have you to turn to
he made you dark so that i could realise that there is more to a person than his complexion...
and he kept you single till the time you met me so that you could fall in love with me
a lot of coincidences....nahin...or can it be safely said ye sab god ki planing thi...lambi planning.
belated happy birthday :D
08 March, 2010
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