18 February, 2026

क्या कहें, उस अजनबी से…तुम इतनी कड़वी सिगरेट न पिया करो, मेरा कलेजा जलता है!

The small things. Always the small things. 
सिगरेट कैसे भी पी लेने वाली चीज़ नहीं है। इससे जुड़ी हर छोटी-छोटी चीज़ से फ़र्क़ पड़ता है। मुझे सबसे अच्छी लगती है माचिस। उसमें भी लकड़ी की तीली वाली माचिस, जो लगभग चार सेंटीमीटर लंबी हो। वो जो काग़ज़ के ऊपर मोम लगा कर बनायी हुई तीली होती है, वो हमको एकदम भी अच्छी नहीं लगती। एक तो वो इतनी छोटी होती है, कि जलाते हुए हमेशा लगता है हाथ जल जाएगा। लकड़ी की छुअन, उसकी तासीर जलने की होती है। लगता है, इसे जलाया जा सकता है, इसे जलाया जाना चाहिए।

जैसे मुर्दा होता है ना। उसे छोड़ नहीं देते। उसे सूरज डूबने के पहले फूँक देते हैं।

माचिस आजकल रखना बंद कर रहे लोग, अधिकतर लोगों के पास लाइटर होता है। मुझे लाइटर सबसे अच्छा लगता है जिप्पो। पहली बार अनुपम के पास देखे थे। जिप्पो को जलाने, बुझाने का एक रिदमिक तरीक़ा होता है। फ़िल्मों में अक्सर देखा है, असल ज़िंदगी में कभी कभी। लेकिन जो जलती फ्लेम के एक झटके में खट से लाइटर के ढक्कन के बंद होते ही बुझ जाने का मजा है, किसी और चीज़ में नहीं। प्रैक्टिस कर कर के, हम भी सीख लिए हैं। स्ट्रेंजली मेरे दो अच्छे बॉस रहे, दोनों को जिप्पो पसंद था, और उनके पास हमेशा रहता भी था।

क्लिपर का लाइटर अच्छा लगता है मुझे, उसका जो गोल सा आकार होता है और ढेर सारे प्रिंट्स होते हैं। बहुत सारे अच्छे रंग भी। ब्लिंक-इट पर आजकल स्टैश प्रो के लाइटर मिलते हैं, वो भी अच्छे होते हैं। ये दोनों अगर नहीं रहे, तो नॉर्मल पान दुकान पर जो ट्रांसपेरेंट सा लाइटर होता है, १०-३० रुपए में मिलता है, फिर वो लाइटर भी चलता है।

मिनी का हुड ओपन रहता है, इसलिए उस में सिगरेट पीने में बहुत मज़ा आता है। उसमें जो लाइटर है, वो एक तरह का कॉइल नुमा होता है, जैसे पुराने ज़माने का हीटर होता था ना, वैसा। उसमें फ्लेम नहीं होती। धीप के लाल हो जाता है। तो चलती गाड़ी भी थोड़ा स्पीड घटा कर उसी से जला लेते हैं। वैसे अब तो इतना प्रैक्टिस हो गया है कि चलती गाड़ी में नॉर्मल लाइटर से भी सिगरेट जला लेते हैं। बैंगलोर में गाड़ी तो धीरे ही चलती है रोड पर। एक तो इतना स्पीडब्रेकर, उसपर गड्ढा।

एक होता है, जेट फ्लेम लाइटर। जिसमें फ्लेम दिखती नहीं है लगभग, पर बहुत तेज जलती है। यह विंड-प्रूफ लाइटर होता है। इसमें लौ नहीं होती है, बहुत तेज़ी से और बहुत ज़्यादा तापमान पर आग निकल रही होती है। बच्चे इससे हाथ न जला लें, इसलिए हम ये वाला लाइटर कभी नहीं ख़रीदते। एक बार मजबूरी में ख़रीदे भी थे, चलती गाड़ी में आदतन लाइटर जलाये और एकदम बीच हथेली जला लिए। उसके बाद कभी दूसरा विंड-प्रूफ लाइटर हम नहीं ख़रीदे।
***

सिगरेट के कुछ अलिखित नियम क़ानून होते हैं या नहीं, मालूम नहीं। लेकिन किसी को लाइटर देते हैं, किसी के लिए लाइटर जला देते हैं…कि पास आ कर सिगरेट जला लो। लेकिन किसी के लिए सिगरेट जलाने को लाइटर जला देना, जला पाना, एक क़िस्म की क्लोज़नेस या इंटिमेसी होती है। ये मुझे तब पता चला जब हम ऐसे ही अपनी सिगरेट जलाये और लाइटर बढ़ाने की जगह जला दिए…ये प्रोसेस कितनी सुंदर होती है, हमको पूजा पाठ का ढेर मालूम नहीं, नियम क़ानून भी नहीं फॉलो करते, लेकिन सिगरेट comes closes to being spiritual, for me…लाइटर की फ्लेम को हथेली से ढके हुए, किसी की ओर बढ़ा देना, दिखने में जितना सरल लगता है…कभी कभी होता नहीं। इक रोज़ ऐसे ही एक दोस्त ने सिगरेट जलायी, फिर दूसरे की बारी आई तो हम लाइटर की फ्लेम बुझा कर उसके हाथ में सिगरेट दे दिए…कि तुम ख़ुद जला लो। हम इतने बदतमीज़ हो जाएँगे, कभी ऐसा सोचे नहीं थे। It was rude, uncharacteristically rude. I still think about it, sometimes.

सोशल जीवन में, कुछ चीज़ों के वास्ते हमें किसी के क़रीब होने की इजाज़त होती है। करीब यानी की किसी के पर्सनल स्पेस में प्रवेश करना…यानी एक फुट रेडियस का घेरा जो हम अपने दोस्तों के इर्द-गिर्द भी मेंटेंन करते हैं, उसके भीतर आना…जो हमारे सच में करीबी नहीं हैं, उनके भी…क्यूंकि प्रैक्टिकल वजह है।

फ्लेम वाला लाइटर जलाना होता था तो अक्सर उसकी लौ ना बुझे इसके लिए कुल जमा तीन हाथ चाहिए होते थे, एक हाथ लाइटर जलाने के लिए और दो हाथों से फ्लेम को ढका जाता था ताकि वो ना बुझे और कोई सिगरेट जला ले। अब इन हाथों के दो ही कॉम्बिनेशन होते थे। या तो आप किसी के लिए लाइटर जलाओ, वो अपने दोनों हाथों से लाइटर की लौ को ढके, और उससे सिगरेट जला ले…या, आप एक हाथ से लाइटर जलाओ, एक हथेली आपकी हो, दूसरी हथेली दोस्त की…आप दोनों की हथेलियों से लपट ढकी जाये और फिर कोई सिगरेट जलाये।

ये सब हम जितना ध्यान से देखते और स्लो मोशन में अपने दिमाग में रिवाइंड करके प्ले करते हैं, असल में इतना सोचना होता नहीं है सिगरेट जलाने में…सब कुछ जैसे ऑटो-पायलट पर होता है। वैसे ही जैसे दोस्तों के साथ जब साथ में खाना खाने जाते हैं तो फ़र्क़ नहीं पड़ता कि किसने मेनू में क्या आइटम मंगाया है, जिसका भी आइटम पहले आयेगा, सब लोग उसी पर टूट पड़ेंगे।

आपने सिगरेट जलायी, बारी बारी से सब या तो लाइटर से जलायेंगे, या आप लाइटर जला दीजिए, सब पास आ आ कर सिगरेट जला लेंगे…

फिर आता है विंडप्रूफ़ लाइटर। फ़र्क़ ही नहीं पड़ता उसको किसी हथेली से। उसे किसी हवा से बचाने की जरूरत नहीं होती। इन फैक्ट, क्यूंकि उसकी फ्लेम बहुत तेज होती है और धूप वग़ैरह में दिखती नहीं है, तो उस लाइटर को हाथ से ढकना खतरनाक भी है। कुछ लोगों को खतरों से खेलने में मजा भी आता है। ऑटोपायलट पर चल देते हैं…मज़े से, ये सोचे बगैर कि शायद किसी के दिल को आँच लग जाये।

भोर की धूप में सब कुछ अच्छा दिखता है। लेकिन मैंने उसे देखा नहीं था। न मैंने लाइटर की फ्लेम को देखा। मालूम था वो जेट लाइटर रखता है। धूप में उसके अँगूठे और तर्जनी का हिस्सा चमक रहा था…ये जेट फ्लेम को कप क्यों कर रहा है, यह बुझेगी थोड़े…क़ायदे से हमको यही सोचना था, लेकिन हमारे दिमाग़ में पहला ख्याल आया कि उसका हाथ कितना सुंदर है…ज़बान से फिसलने ही वाला था वाक्य, कि तेरा हाथ कितना सुंदर है…मगर फिर सिगरेट जला चुके थे और एक गहरा कश…ऊपर वाले से शिकायत…काहे चैनल बदल बदल कर हमारे दिल तक आते हो? तुमको एंटरटेनमेंट के लिए किसी और का दिल नहीं मिलता कभी?

बहुत बहुत साल पहले ऐसे ही देखा था, उसका हाथ…कत्थई पत्थर की अंगूठी…किताबें। वो छुप के सिगरेट पीता था। याद नहीं उसे देखे हुए कितने साल हो गए। क्या अब भी सुंदर होंगे उसके हाथ!

धुएँ के पार सब कुछ सुंदर दिखता है। हमको सिगरेट पीना छोड़ देना चाहिए अब। या कमसेकम, सिर्फ़ अकेले में पिया करें। जान की आफत होती है ये सिगरेट कमबख़्त। कलेजा जलता है।

सिगरेट जलाने के लिए के लिए उसने लाइटर ऑन किया और हथेली से ढका, जैसे मैं कॉफ़ी कप तक रखती हूँ हथेली…जब किसी दोस्त का हाथ पकड़ के बैठे रहने का मन करता है। दोस्त ही तो। वो तो अजनबी था। हमको क्यों अजनबियों के साथ सिगरेट पीनी थी। मैंने पता नहीं क्यों, गौर से उसका हाथ देखा। इतना सुंदर हाथ था उसका, खूबसूरत कहते हैं जिसे। मन हुआ कहने का, लेकिन नहीं कहे। नहीं कह पाये।

होता है न कभी कभी, दिल pronoun भूल जाता है। दिमाग़ वाक्य फॉर्म नहीं कर पाया। उसको तू बोलते हैं, तुम बोलें या कि इंग्लिश में, you कह दें…इतनी मुश्किल बात नहीं थी। फिर ज़ुबान पर अटकी क्यों?

दो सिगरेटें।

क्या हमने कोई बात की? याद नहीं। शायद नहीं। चुपचाप सिगरेट पी रहे होंगे। धूप कितनी सुंदर थी। मन कितना हल्का था। सूरजमुखी खिला हुआ। “थी वस्ल में भी फ़िक्र-ए-जुदाई तमाम शब, वो आए भी तो नींद न आई तमाम शब”। बहुत दिन बाद ऐसा हुआ कि किसी के पास खड़े हैं और उसका चला जाना दुख रहा है।

अचानक से उसके हाथ देखे। कहने वाली थी, कितने सुंदर हाथ हैं तुम्हारे। कहा नहीं।


The heart is bitter. And broken.
The heart is longing. And searching.

हम मशीनों को समझदार बना रहे हैं।
और अपना ख़ुद का दिल ही कुछ सोचने समझने के लायक नहीं रहता।
इतना बेवकूफ क्यों होता है दिल।

प्रेम, इश्क़, मुहब्बत…इन शब्दों से दिमाग़ में कोई इमेज नहीं बनती। एक ही सटीक शब्द होता था…बचपन में खूब सुना था…crush. 
क्या खतरनाक बला होती है ये कसम से! लगता है कोई ट्रक गुज़र गया है ख़ुद के ऊपर से…कभी लगता है धुर्मुस से कोई एकदम पूरे बदन को बराबर में कूट-कूट के मिट्टी बना गया है। लगता है कि मर के भी चैन नहीं आयेगा। और दुख तो इतना होता है, इतना होता है कि लगता है जान चली ही जाएगी इस बार।

लेकिन बच जाते हैं तो मन मेटाफर ढूँढता है।
कपूर की तरह होता है क्रश।
एक लौ लगती है और भभक के जलता है। जब तक आख़िरी कतरा हवा न हो जाये। कैसी ख़ुशबू होती है हथेली में। कैसा मोहक होता है उसका जलना। आरती लेते हैं, पानी से नीछते हैं। अर्घ्य ईश्वर तक पहुंचता है। हम कहते हैं, प्रभु…किसी और का दिल जला लो ना, इतने साल हो गए…और क्या बच्चे की जान लोगे! 

अपनी तासीर समझ आती है। हम प्यार मुहब्बत के लिए नहीं, यारी दोस्ती के लिए बने हैं। कितना ख़ुश रहते हैं दोस्तों के साथ। कितना कलपते हैं जब इश्क़ होता है। उसपर भी बिना किसी वार्निंग के। दिमाग़ इतने अल्टरनेट वर्ल्ड के इतने परम्यूटेशन कॉम्बिनेशन बनाता है कि core dump हो जाता है। समझ नहीं आता कि हम जो देख, सुन, समझ रहे हैं उसमें कितना सच का है और कितना हम ख़ुद मैन्युफैक्चर कर लिए हैं।

आग मेरी सबसे पसंदीदा चीज़ है और बर्फ शायद सबसे नापसंद। हम बहुत गर्मी में भी ठंढा पानी पी लें तो गला ख़राब हो जाता है। हम सिर्फ़ किसी परिचित के कहने पर बर्फ के टब में कूद जायें…ऐसे तो हैं हम…

बॉडी इतने शॉक में थी कि कुछ सोचने समझने तो रहने दो, महसूसने से भी परे थे। इसके लिए ही टर्म है, comfortably numb. दो घंटे की हाई इंटेंसिटी ट्रेनिंग की थी। बदन पूरा धीप रहा था। आसपास बर्फ के क्यूब्स थे। तो पानी तो ठंढा ही होगा। पर कुछ फील क्यों नहीं हो रहा! न बर्फ ठंढी लगी, ना उसका हाथ गर्म, जिसने हाथ थाम कर बर्फीले पानी से बाहर निकाला। दिल, दिमाग़, बदन…सब एक साथ काम करना बंद कर देते हैं कभी कभी।

क्या कहें, उस अजनबी से…तुम इतनी कड़वी सिगरेट न पिया करो, मेरा कलेजा जलता है! 
वो पलट के जो कह दे, लो बुझा दी तुम्हारे लिए...अब कभी नहीं पियेंगे। फिर? फिर क्या करेंगे हम!

हम Ice-Burst पीते हैं, क्या होता है उससे? दिल में जमे ग्लेशियर पिघलते हैं? नहीं ना...

हमेशा थोड़े कह सकते, तुम अच्छे लगते हो हमें...ये भी तो कह सकते हैं कभी कभी, पागल लगते हो!

फिर रहने ही दो ना...जान ही देनी है तो क्या फ़र्क़ पड़ता है कि क़ातिल का फ़ेवरिट क्या है...खुखरी, भाला, गोली...
या कि चुप्पी। 

06 January, 2026

Have you met the wild women that have mysteriously obscure windmills in their hair?

Have you met the wild women that have mysteriously obscure windmills in their hair? When they drive fast on open roads past midnight…the city air feels as free as they are…the windmills create electricity and they come back to their work-desk, charged by the mad, wild, wind…racing through their hair…

They feel indestructible then. The women that thrive on coffee. Prowling their house full of people like time-thieves. They need just a couple of moments, alone, in order to survive the next day.

Do you know women feel like a live time bomb, most of their life? Something is always ticking inside their heart. But it’s been such a long time living with the bomb that they have forgotten if they are a part of the bomb diffuser squad or the bomb detonating one.

***

I’ve often raced like mad to catch a fleeting glimpse of one such woman. Sometimes, she does appear in the rear-view mirror of my Mini Cooper Convertible. They don’t write, “Objects in the mirror are closer that what they might appear”, on these mirrors anymore. Someone believes, all of us already know this fact. Though, we could all do with a reminder, some days, I guess. I might just cause an accident in order to touch her…one of these days. My palpitating heart calms down when it sees her. I should be scared though, the way most people are scared of ghosts. But I can’t ascertain the time to which she belongs…future or the past, definitely not the present…timeless in a way I can’t fully comprehend. We are born fearless and slowly learn to be afraid, a mix of causality and probability we pretend to understand.

***

3:00 a.m., January the 6th, 2026.
मुझे मैकबुक पर लिखने के पहले काग़ज़ पर लिखना ज़रूरी होता है। जब तक इंक पेन से काग़ज़ पर न लिखूँ, सतरें नहीं लगतीं। साँस ज़्यादा रैंडम चलती है। लिखने के लिए साँस का एक लय में आना जरूरी होता है। इतनी देर रात सब कुछ एकदम शांत है। सिर्फ़ कीबोर्ड की आवाज़ आ रही है। निब का काग़ज़ पर चलना, टाइपिंग की आवाज़, सिगरेट का कश खींचते हुए जलते तंबाकू के पत्तों की मद्धम आवाज़…ये मेरी बेहद पसंद की आवाज़ें हैं। रात इसलिए भी अच्छी लगती है कि ये आवाज़ें दिन में इस रिदम के साथ सुनायी नहीं देती। जब से मुझे लिखने का होश रहा है, मेरे सोचने की भाषा हिंदी रही है। लेकिन मेरे बच्चे दिन भर अंग्रेजी में ही मुझसे भी बतियाते रहते हैं इसलिए मैं देखती हूँ कि आजकल पर्सनल भी कुछ लिखना होता है तो शुरुआत हमेशा अंग्रेजी से होती है। हाँ एक दो पैराग्राफ के बाद मन थक जाता है और अपनी आसान मातृभाषा की ओर लौटता है।

2025 कमाल का साल था, कुछ अर्थों में। जिसमें सबसे मजेदार चीज़ रही कि मैंने यह साल हांगकांग में शुरू किया। हम 31 January को हांगकांग पहुँचे थे। तो इस साल मुझे एक्स्ट्रा डेढ़ घंटे मिले। कि मेरा साल 2025, भारत के डेढ़ घंटा पहले आ गया था। साल की शुरुआत में एक बेहद सुंदर घर था, जिसमें बड़ा सा लॉन था। गहरी गुलाबी बोगनविला थी, गराज में झूलती हुई। जब भी मिनी कूपर बाहर निकालती, पहले गुलाबी झालर आती फिर नीला आसमान। गराज से गाड़ी निकालना अपने आप में बेहद सुंदर था। इस साल मैंने अपनेआप को ठहरने की इजाज़त दी। मेरे जुड़वाँ बच्चे हैं, मुझे अपने बच्चों का बचपन एक ही बार मिलना था। जैसे अधिकतर दो बच्चों की मम्मी को होता है, कि बचपन दो बार मिलता है…मेरे साथ नहीं था। लगभग पूरे समय घर पर रहने और एक भी सोलो ट्रिप नहीं करने के बाद भी मैंने महसूस किया, कि वक्त कभी पूरा नहीं पड़ता। हमेशा कम लगता है। बच्चों को भी लगता है कि मैं उनके साथ समय नहीं बिताती, मुझे भी लगता है, मैं उनके साथ ज़्यादा समय नहीं बिता पा रही। मैंने कुछ लिख नहीं रही, पढ़ नहीं रही…तो फिर ये समय जा कहाँ रहा था!

मैंने बच्चों को समझाया। आप किसी से प्यार करते हैं तो ये ज़रूरी नहीं है कि वो हर वैसी चीज़ करे, जिसमें आपको ख़ुशी मिले। Part of loving someone is letting them do things you don’t want them to do…this is called freedom…and this is a very important part of loving someone. वे धीरे-धीरे समझेंगे, मुझे मालूम है। बच्चे समझदार होते हैं। पर उसके पहले उन्हें बिल्कुल नासमझ होने का और बहुत सारा प्यार और समय मांगने का पूरा हक है। मुझसे जहाँ तक हो पाता है, मैं अपने हिस्से का वक्त उनके नाम करती हूँ। There are no rules of motherhood. We are doing the best we can. Really. The full time mothers, the part-time workers, the work from home mothers, the ones that are on a break. All of us. While being mothers, we are slowly being erased from everywhere…we do notice this…and yet choose silence and peace over protest on most days. I’ve realised, I have got my superpower back…making friends…and this time not over writing, because I hardly write anymore…but over motherhood. I’m friends with class-mates of my kids…as casually as I became friends with people who felt too deeply and wrote about the world with an urgency as if not noticing the mood would actually cause it to disappear. Theoretically, It will, but also, no one ever looking at the moon is actually impossible.

Diary by khwaab tanha collective
I have a traveling heartache. जब दिल दुखना बंद होता है, तो दर्द कहीं और शिफ्ट कर जाता है। Logically or medically समझ नहीं सकते, शायरों को समझ आता है, दुष्यंत कहते हैं ना, “सिर से सीने में कभी पेट से पाँव में कभी इक जगह हो तो कहें दर्द इधर होता है”। कुछ न कुछ दुखता रहता है। जयपुर गई थी, आख़िर नवंबर में तभी पैर में चोट लगी थी। हल्का दर्द था तो इलाज की जगह, इग्नोर कर दिया। इधर शिफ्टिंग में इतना ज़्यादा चलना फिरना हो गया कि पैर में दर्द उठ गया था बुरी तरह। हाथों में दर्द अलग। 

अभी चार तारीख को घर शिफ्ट किया है। कितने भी अच्छे पैकर्स एंड मूवर्स बुलवा लो। कितना भी कहो कि किताबें प्यार से, अच्छे से पैक करना…वे किताबों का सत्यानाश करने के लिए पूरी तरह सक्षम होते हैं। सामान सिर्फ़ लोड कर कर दूसरे घर पर रखने में रात के साढ़े नौ बज गए। बॉक्स को लेबल करने के बावजूद इन्होंने मेरी किताबों के बक्से उन कई सारे बक्सों में कहीं मिला कर रख दिया कि खोजते खोजते नहीं मिला। आख़िर को रात दस बजे के आसपास निकलने के ठीक पहले उन्होंने मेरी किताबों के बक्से ला कर रख दिए। बुकरैक अभी दीवार में फ़िक्स नहीं हुआ था इसलिए किताबें वहाँ रखना ख़तरनाक हो जाता, बच्चों का घर है। नौ बजे मैं बच्चों को सुलाने चली गई थी। दिन भर की भयंकर थकान थी। फिर भी रात के डेढ़ बजे नींद खुल गई। किताबों को कार्टन से निकाले बिना सो नहीं सकती थी। मालूम था नींद नहीं आएगी। मुझे पहले बार समझ में आया कि कैसे कुछ औरतें रात को किचन का काउंटर तब तक पूरी तरह साफ़ नहीं कर लेतीं, उन्हें नींद नहीं आती। रात को कम आवाज़ के साथ कार्टन पर लगा टेप निकालना अपनेआप में मुश्किल था। लेकिन धीरे-धीरे उसे काटा। चार कार्टन किताबें निकालीं। किसी तरह टेबल पर ऊँची ऊँची मीनारें बनाईं, ढेर सारी किताबें टीवी रैक पर रखीं। फिर चैन से जा कर सो गई।

फिर अगले दिन movers आ कर सामान अनपैक कर के गए। दिन भर उनके साथ लगी रही। दोपहर बच्चों को स्कूल से लाने के बाद थोड़ी देर आराम किया। फिर से कुछ-न-कुछ काम लगा रहा। इलेक्ट्रीशियन, इंटरनेट, प्लम्बर, कारपेंटर... नौ बजे सोने का टाइम, कि कल स्कूल भी जाना है। दस बजे तक तो जगी हुई थी, बच्चों के साथ, फिर नींद आ गई। कुणाल जब सोने आया तो उससे पूछे, टाइम कितना हो रहा है। वो बोला साढ़े बारह लगभग। हम पूछे, exactly कितना, तो बोला बारह अट्ठाइस। फिर पूछा, कि काहे। तो कहे कि चाय पीने का मन कर रहा है। उसको मालूम है, रात बारह बजे चाय पीने का मन कर रहा है मतलब किचन में चाय बना के पीने का नहीं, इसका मतलब गाड़ी लेकर बाहर जाने और चाय की दुकान चाय पीने का मन कर रहा है। तो बोला, इतनी रात में कहाँ जाएगी, थक गई है। सो जा, कल जाना। हमको मालूम था, दो मिनट में स्वेटर पहन कर, जूता पहन कर तैयार हो सकते हैं। जैकेट पहनने में एक मिनट और लगता, लेकिन देर हो जाती। तो कैलकुलेशन सही था। घर से स्टारबक्स वैसे तो आधा घंटा है, लेकिन रात को गाड़ी उड़ाते जायें तो बीस मिनट में पहुँच सकते हैं। जैसे ही कपड़ा पहनने उठे, बोलता है, इतनी रात को कुछ नहीं मिलेगा। और हम जो स्टारबक्स रेगुलर जाते हैं देर रात, जानते हैं कि भले बिल न हो, लेकिन कॉफ़ी तो मिल ही जाएगी चाहे ठीक एक बजे पहुँचें। तो इसी कॉन्फिडेंस से बोले, कि हमको मिल जाएगी। आँधी की तरह उड़ते हुए गाड़ी में बैठे और उड़ते उड़ते स्टारबक्स ठीक 12:55 में पहुँच गए। और ठीक, कॉफ़ी मिली, कि पेमेंट बाद में कर दीजिएगा। पता नहीं कैसे, लेकिन स्टारबक्स के सभी स्टोर्स में उन्होंने इतने अच्छे कस्टमर रिलेशन बना के रखें हैं, कि it feels like home. Always. अभी जब चीज़ें flux में हैं। पिछले घर से शिफ्ट कर गए हैं, नए घर में सेटल नहीं किए हैं। इस तरह देर रात गाड़ी में गाना बजाते, एक तरफ़ से थोड़े घिसे चाँद के नीचे कॉफ़ी की जादुई ख़ुशबू की तलाश में ड्राइव करते हुए लगता है…I’m home.

घर सिर्फ़ लौटने की जगह ही तो है।

इस घर में पूरब को खुलने वाली खिड़की तो है, पर उसमें पल्ले नहीं हैं, तो खुलती नहीं है। लेकिन ठीक है। सब कुछ तो कहाँ मिलता है किसी को। धूप खा के सूरज देख के संतोष करेंगे और क्या। बड़े शहर में खुला आसमान ही बड़ी बात है। यहाँ तो पूरब की खिड़की भी है। और पश्चिम वाली खिड़की तो खुलती भी है। इस साल ज़्यादा सोचेंगे नहीं। जितना जर्नलिज्म में सीखा था, सो जितना देखा-जिया है। उसको लिखेंगे बस। घर आ कर टेबल पर सामान जमाये तो देखते हैं Utopia का I गिर गया है। सोचे ठीक ही तो है, मेरे बिना थोड़े ना हो जाएगा, सब कुछ...परफेक्ट और impossible to exist. 


आपका नया साल सुंदर हो। रंगभरा हो। आपकी जादूगरी आपके भीतर के दरवाज़े खोले। आप अपने तिलिस्म की दीवारों पर रंग-रोगन करें। नारे-वारे लिखें। 


शुभम अस्तु।

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