10 December, 2018

Paper planes and a city of salt


जिस दिन मुझे ख़ुद से ज़्यादा अजीब कोई इंसान मिल जाए, उसको पकड़ के दन्न से किसी कहानी में धर देते हैं।

इधर बहुत दिन हो गए तरतीब से ठीक समय लिखा नहीं। नोट्बुक पर भी किसी सफ़र के दर्मयान ही लिखा। दुःख दर्द सारे घूम घूम कर वहीं स्थिर हो गए हैं कि कोई सिरा नहीं मिलता, कोई आज़ादी नहीं मिलती।
चुनांचे, ज़िंदगी ठहर गयी है। और साहब, अगर आप ज़रा भी जानते हैं मुझे तो ये तो जानते ही होंगे कि ठहर जाने में मुझ कमबख़्त की जान जाती है। तो आज शाम कुछ भी लिखने को जी नहीं कर रहा था तो हमने सिर्फ़ आदत की ख़ातिर रेख़्ता खोला और मजाज़ के शेर पढ़ कर अपनी डायरी में कापी करने लगी। हैंडराइटिंग अब लगभग ऐसी सध गयी है कि बहुत दिनों बाद भी टेढ़ी मेढ़ी बस दो तीन लाइन तक ही होती है, फिर ठीक ठीक लिखाने लगती है।
इस बीच मजाज के लतीफ़े पढ़ने को जी कर गया। और फिर आख़िर में मंटो के छोटे छोटे क़िस्से पढ़ने लगी। फिर एक आध अफ़साने। और फिर आख़िर में मंटो का इस्मत पर लिखा लेख।
उसके पहले भर शाम बैठ कर goethe के बारे में पढ़ा और कुछ मोट्सार्ट को सुना। कैसी गहरी, दुखती चीज़ें हैं इस दुनिया में। कमबख़्त। पढ़ वैसे तो रोलाँ बार्थ को रही थी, कई दिनों बाद, फिर से। "प्रेमी की जानलेवा पहचान/परिभाषा यही है कि "मैं इंतज़ार में हूँ"'। इसे पढ़ते हुए इतने सालों में पहली बार इस बात पर ध्यान गया कि मुझे प्रेम कितने अब्सेसिव तरीक़े से होता है। शायद इस तरह डूब कर, पागलों की तरह प्रेम करना मेरे मेंटल हेल्थ के लिए सही नहीं रहा हो। यूँ कहने को तो मजाज भी कह गए हैं कि 'सब इसी इश्क़ के करिश्मे हैं, वरना क्या ऐ मजाज हैं हम लोग'। फिर ये भी तो कि 'उट्ठेंगे अभी और भी तूफ़ाँ मेरे दिल से, देखूँगा अभी इश्क़ के ख़्वाब और जियादा'। 

कि मैंने उम्र का जितना वक़्त किसी और के बारे में एकदम ही अब्सेसिव होकर सोचने में बिताया है, उतने में अपने जीवन के बारे में सोचा होता तो शायद मैं अपने वक़्त का कुछ बेहतर इस्तेमाल कर पाती। सोचने की डिटेल्ज़ मुझे अब भी चकित करती है। मैंने किसी और को इस तरह नहीं देखा। यूँ इसे इस तरह भी देख सकते हैं कि मैं चीज़ों को लेकर इन्फ़िनिट अचरज से भरी होती हूँ। बात महबूब की हो तो और भी ज़्यादा। गूगल मैप पर मैंने कई बार उन लोगों के शहर का नक़्शा देखा है, जिनसे मैं प्यार करती हूँ। उनके घर से लेकर उनके दफ़्तर का रास्ता देखा है, रास्ते में पड़ने वाली दुकानें... कुछ यूँ कि जैसे मंटो से प्यार है तो कुछ ऐसे कि उसके हाथ का लिखा धोबी का हिसाब भी मिल जाए तो मत्थे लगा लें। ज़िंदा लोगों के प्रति ऐसे पागल होती हूँ तो अच्छा नहीं होता, शायद। हमारी दुनिया में ऐसे शब्द भी तो हैं, ख़तरनाक और ज़हरीले। जैसे कि स्टॉकिंग।

मैं एक बेहतरीन stalker बन सकती थी। पुराने ज़माने में भी। इसका पहला अनुभव तब रहा है जब मुझे पहली बार किसी से बात करने की भीषण इच्छा हुयी थी और मेरे पास उसका फ़ोन नम्बर नहीं था। मैंने अपने शहर फ़ोन करके अपनी दोस्त से टेलिफ़ोन डिरेक्टरी निकलवायी और लड़के के पिताजी का नाम खोजने को कहा। उन दिनों लैंडलाइन फ़ोन बहुत कम लोगों के पास हुआ करते थे और हम नम्बरों के प्रति घोर ब्लाइंड उन दिनों नहीं थे। तो नाम और नम्बर सुनकर ठीक अंदाज़ा लगा लिया कि हमारे मुहल्ले का नम्बर कौन सा होगा। ये उन दिनों की बात है जब किसी के यहाँ फ़ोन करो तो पहला सवाल अक्सर ये होता था, 'मेरा नम्बर कहाँ से मिला?'। तो लड़के ने भी फ़ोन उठा कर भारी अचरज में यही सवाल पूछा, कि मेरा नम्बर कहाँ से मिला तुमको। फिर हमने जो रामकहानी सुनायी कि क्या कहें। इस तरह के कुछेक और कांड हमारी लिस्ट में दर्ज हैं।

ये साल जाते जाते उम्मीद और नाउम्मीद पर ऐसे झुलाता है कि लगता है पागल ही हो जाएँगे। न्यू यॉर्क का टिकट कटा के कैंसिल करना। pondicherry की ट्रिप सारी बुक करने के बाद ग़ाज़ा तूफ़ान के कारण हवाई जहाज़ लैंड नहीं कर पाया और वापस बैंगलोर आ गए। पेरिस की ट्रिप लास्ट मोमेंट में कुछ ऐसे बुक हुयी कि एक दिन में वीसा भी आ गया। कि पाँच बजे शाम को पास्पोर्ट कलेक्ट कर के घर आए और फिर सामान पैक करके उसी रात की फ़्लाइट के लिए निकल भी गए। 

कि साल को कहा, कि पेरिस ट्रिप अगर हुयी तो तुमसे कोई शिकायत नहीं करूँगी। जिस साल में इंसान पेरिस घूमने जाए, उस साल को बुरा कहना नाइंसाफ़ी है... और हम चाहे और जो कुछ भी हों, ईमानदार बहुत हैं। फिर बचपन में इसलिए तो प्रेमचंद की कहानी पढ़ाई गयी थी, 'पंच परमेश्वर', फिर किसी कहानी में उसका ज़िक्र भी आया। कुछ ऐसे ही वाक़ई बात मन में गूँजती रहती है, लौट लौट कर। 'बिगाड़ के डर से ईमान की बात नहीं कहोगे?'। तो इस साल की शिकायतें वापस। साल को ख़ुद का नाम क्लीयर करने का मौक़ा मिला और २०१८ ने लपक के लोक लिया।

मगर ये मन कैसा है कि आसमान माँगता है? ख़ुशियों के शहर माँगता है। इत्तिफ़ाकों वाले एयरपोर्ट खड़े करता है और उम्मीदों वाले पेपर प्लेन बनाता है। ऐसे ही किसी काग़ज़ के हवाई जहाज़ पर उड़ रहा है मन और लैंड कर रहा है तुम्हारे शहर में। कहते हैं सिक्का उछालने से सिर्फ़ ये पता चलता है कि हम सच में, सच में क्या चाहते हैं। इसलिए पहले बेस्ट औफ़ थ्री, फिर बेस्ट औफ़ फ़ाइव, फिर बेस्ट औफ़ सेवन... और फिर भी अपनी मर्ज़ी का रिज़ल्ट नहीं आया तो पूरी प्रक्रिया को ही ख़ारिज कर देते हैं। 

इक शहर है समंदर किनारे का। अजीब क़िस्सों वाला। इंतज़ार जैसा नमकीन। विदा जैसा कलेजे में दुखता हुआ। ऊनींदे दिखते हो उस शहर में तुम। वहाँ मिलोगे?

03 December, 2018

Au revoir, Paris. फिर मिलेंगे!

 सोचो, जो पेरिस पूछे, कि पूजा, तुम हमसे प्यार क्यूँ नहीं करती, तो कुछ कह भी सकोगी?

उसकी बहुत पुरानी चिट्ठी मिली थी, घर में सारा सामान ठीक से रखने के दर्मयान। हमने बहुत साल बाद बात की। उसने कहा, नहीं हुआ इस बीच किसी से भी 'उस तरह' से प्यार। प्यार कभी ख़ुद को दोहराता नहीं है, लेकिन अलग अलग रंगों में लौट कर आता ज़रूर है।

मैं दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत शहर में हूँ। इमारतें, मौसम, लोग, संगीत, कला... सब अपनी परकाष्ठा पर हैं। कविता जैसा शहर है। लय में थिरकता हुआ। बारिश में भीगता है तो इतना ख़ूबसूरत लगता है कि कलेजे में दुखने लगे। छोड़ कर आते हुए हूक सी लगती है। लौट कर आना चाहते हैं हम, इस शहर में रहते हुए भी।

भाषा की अपनी याददाश्त होती है। दिन भर आसपास फ़्रेंच सुनते हुए उसकी याद ना आए, ये नामुमकिन था। मैंने पहली बार उसी को फ़्रेंच बोलते सुना था। वो लड़का जिसने पहली बार मुझे ‘je t’aime’ का मतलब बताया था, कि i love you और कि जिससे कभी फ़्रेंच में बात करने के लिए मैं फ़्रेंच सीखना चाहती थी। कि फ़्रान्स के इस नम्बर से उसे फ़ोन करने का मन कर रहा है। कहूँ इतना, vous me manques. फिर याद आता है कि उससे दूर होने के सालों में कितना कुछ सीख गयी हूँ मैं। कि उसे vous नहीं, tu कहूँगी… कि फ़्रेंच में भी हिंदी की तरह इज़्ज़त देने के लिए आप जैसी शब्दावली है। फिर ये भी तो, कि तुम्हारी याद आ रही है नहीं, फ़्रेंच में कहते हैं मेरी दुनिया में तुम्हारी कमी है। मैं सोचती हूँ। कितनी कमी रही है तुम्हारी। ज़रा सी, दोस्ती भर? एक्स फ़्रेंड्ज़ जैसा कुछ, अजनबी जैसा नहीं।

शाम में चर्च की घंटियाँ सुनायी देती हैं। बारिश के बाद की हवा में धुल कर। शहर के बीच बहती नदी पर पेड़ों की परछाइयाँ भीग रही हैं। सुनहला है सब कुछ...याद के जैसे रंग का पीलापन लिए हुए। मैं अब लगभग किसी को भी पोस्टकार्ड नहीं लिखती। बस एक दोस्त को आने के पहले ही दिन लिखे बिना रहा नहीं गया। ‘मोने के रंग हर शहर में साथ होते हैं, ख़ूबसूरती का अचरज भी’।

सामान बंध गया है। टेबल पर दो गुलाब के फूल हैं। थोड़े से मुरझाए। चार दिन पुराने। गहरे लाल रंग के फूल। हल्की ख़ुशबू, पुरानेपन की... अच्छे पुरानेपन की, अपनेपन वाली... जैसे पुराने चावल से आती है या वैसे रिश्तों से जो नए नहीं होते हैं। मैं इन्हें ले नहीं जा सकती। ये मेरे मन में रह जाएँगे, इसी तरह... अधखिले।


शाम से बारिश हो रही थी, लेकिन इतनी हल्की कि छतरी ना खोलें। एफ़िल टावर के पास पहुँचते पहुँचते हल्का भीग गयी थी। रास्ते में एक बड़े सूप जैसे बर्तन में कुछ खौलाया जा रहा था और उसकी ख़ुशबू आ रही थी। दालचीनी, लौंग और कुछ और मसालों की...देखा तो पता चला कि गरम वाइन है। तब तक हाथ ठंडे हो गए थे और आत्मा सर्द। खौलती वाइन चाय के जैसे काग़ज़ के कप में लेकर चले। हल्की फूँक मार मार के पिए और ज़िंदगी में पहली बार महसूस किए कि गर्म वाइन पीने से सर्द आत्मा पिघल जाती है। बहुत शहर देखे हैं, ऐबसिन्थ, ब्लू लेबल, वाइन, शैम्पेन, कोनियाक... बहुत तरह की मदिरा चखी है लेकिन वो सब शौक़िया था। पहली बार महसूस किया कि ठंड में कैसे किसी भी तरह की ऐल्कहाल काम करती है। वो अनुभव मैं ज़िंदगी में कभी नहीं भूलूँगी। वाइन ख़त्म होते ही ठंड का हमला फिर हुआ। एफ़िल टावर पर तस्वीर खींच रहे थे तो मैं इतना थरथरा रही थी कि मोबाइल ठीक से पकड़ नहीं पा रही थी।

यूँ, कि आज शाम ऐसी ठहरी थी कि लगता था कोई पेंटिंग हो। कि जैसे ये रंग कभी फीके नहीं पड़ेंगे। पानी पर परछाईं जो किसी तस्वीर में ठीक कैप्चर हो ही नहीं सकती... कि मोने होता तो शायद घंटों पेंट करता रहता, इक ज़रा सी शाम।

मैं लिख रही हूँ कि इस पल को रख सकूँ ज़िंदा, हमेशा के लिए। कि इस लम्हे का यही सच है। मैं कितने कहानियों में जीती हुयी, उन सब लोगों को याद कर रही हूँ जिन्हें मैंने चिट्ठियाँ लिखी हैं… जिन्हें मैं पोस्टकार्ड भेजना चाहती हूँ। कि बिना पोस्टकार्ड गिराए जैसे छुट्टी अधूरी रह जाती है।

अब जब कि लगभग छह घंटे में यह शहर छूट जाएगा, मैं सोचती हूँ एकदम ही सिंपल सी बात… ज़रूरी नहीं है कि जो सबसे ख़ूबसूरत, सबसे अच्छा, सबसे… सबसे... सबसे superlative वाला हो… हमें उसी से प्यार हो। हमें किसी की कमियों से प्यार होता है। किसी के थोड़े से टूटे-फूटे पन से, अधूरेपन से… कि वहाँ हमारी जगह होती है। पर्फ़ेक्शन को दूर से देखा जा सकता है, प्यार नहीं किया जा सकता। या कि हमें प्यार कब होता है, हम कह नहीं सकते। तो पेरिस शायद दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत शहर हो। मैं प्यार सिर्फ़ दिल्ली और न्यू यॉर्क से ही करती हूँ। मैं उनके ही मोह में हूँ। पाश में हूँ।

तो पेरिस, मुझे माफ़ करना, तुमसे प्यार न कर पाने के लिए। तुम दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत शहर हो, लेकिन मेरे नहीं हो। और कि तुम मेरे बहुत कुछ हो..., बस महबूब नहीं हो... कि मेरे दिल पर किसी और की हुकूमत चलती है।

फिर मिलेंगे। Au revoir! 

23 November, 2018

नवम्बर ड्राफ़्ट्स

सपने में तुम थे, माँ थी और समुद्र था।

तूफ़ान आया हुआ था। बहुत तेज़ हवा चल रही थी। नारियल के पेड़ पागल टाइप डोल रहे थे इधर उधर। सपने को भी मालूम था कि मैं पौंडीचेरी जाना चाहती थी और उधर साइक्लोन आया हुआ था। उस तूफ़ान में हम कौन सा शहर घूम रहे थे?

ट्रेन में मैं तुम्हारे पास की सीट पर बैठी थी। तुम्हारी बाँह पकड़ कर। कि जैसे तुम अब जाओगे तो कभी नहीं मिलोगे। तुम्हारे साथ होते हुए, तुम्हारे बिना की हूक को महसूस करते हुए। हम कहीं लौट रहे थे। किसी स्मृति में। किसी शहर में। 

मैंने तुमसे पूछा, ‘रूमाल है ना तुम्हारे पास? देना ज़रा’। तुम अपनी जेब से रूमाल निकालते हो। सफ़ेद रूमाल है जिसमें बॉर्डर पर लाल धारियाँ हैं। एक बड़ा चेक बनाती हुयीं। मैं तुमसे रूमाल लेती हूँ और कहती हूँ, ‘हम ये रूमाल अपने पास रखेंगे’। रूमाल को उँगलियों से टटोलती हूँ, कपास की छुअन उँगलियों पर है। कल रात फ़िल्म देखी थी, कारवाँ। उसमें लड़का एक बॉक्स को खोलता है जिसमें उसके पिता की कुछ आख़िरी चीज़ें हैं। भूरे बॉक्स में एक ऐसा ही रूमाल था कि जो फ़िल्म से सपने में चला आया था। ट्रेन एयर कंडिशंड है। काँच की खिड़कियाँ हैं जिनसे बाहर दिख रहा है। बाहर यूरोप का कोई शहर है। सफ़ेद गिरजाघर, दूर दूर तक बिछी हरी घास। पुरानी, पत्थर की इमारतें। सड़कें भी वैसी हीं। सपने का ये हिस्सा कुछ कुछ उस शहर के जैसा है जिसकी तस्वीरें तुमने भेजी थीं। सपना सच के पास पास चलता है। क्रॉसफ़ेड करता हुआ। मैं उस रूमाल को मुट्ठी में भींच कर अपने गाल से लगाना चाहती हूँ। 

मुझे हिचकियाँ आती हैं। तुम पास हो। हँसते हो। मैं सपने में जानती हूँ, तुम अपनी जाग के शहर में मुझे याद कर रहे हो। सपना जाग और नींद और सच और कल्पना का मिलाजुला छलावा रचता है। 

तुम्हें जाना है। ट्रेन रुकी हुयी है। उसमें लोग नहीं हैं। शोर नहीं है। जैसे दुनिया ने अचानक ही हमें बिछड़ने का स्पेस दे दिया हो। मैं तुम्हें hug करती हूँ। अलविदा का ये अहसास अंतिम महसूस होता है। जैसे हम फिर कभी नहीं मिलेंगे।

नींद टूटने के बाद मैं उस शहर में हूँ जिसके प्लैट्फ़ॉर्म पर हमने अलविदा कहा था। याद करने की कोशिश करती हूँ। अपनी स्वित्ज़रलैंड की यात्रा में ऐसे ही रैंडम घूमते हुए पहली बार किसी ख़ूबसूरत गाँव के ख़ाली प्लेटफ़ॉर्म को देख कर उस पर उतर जाने का मन किया था। उस छोटे से गाँव के आसपास पहाड़ थे, बर्फ़ थी और एकदम नीला आसमान था। सपने में मैं उसी प्लैट्फ़ॉर्म पर हूँ, तुम्हारे साथ। जागने पर लगता है तुम गए नहीं हो दूर। पास हो।

मैं किसी कहानी में तुम्हें अपने पास रोक लेना चाहती हूँ। 

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कुछ तो हो जिससे मन जुड़ा रहे। 

किसी शहर से। 
किसी अहसास से।
किसी वस्तु से - कहीं से लायी कोई निशानी सही।
किसी किताब से, किसी अंडर्लायन लिए हुए पैराग्राफ़ से।
किसी काले स्टोल से कि जिसे सिर्फ़ इसलिए ख़रीदा गया था कि कोई साथ चल रहा था और उसका साथ चलना ख़ूबसूरत था। 
किसी से आख़िरी बार गले लग कर उसे भूल जाने से। 

आख़िरी बार। कैसा तो लगता है लिखने में। 

कलाइयाँ सूँघती हूँ इन दिनों तो ना सिगरेट का धुआँ महकता है, ना मेरी पसंद का इसिमियाके। पागलपन तारी है। कलाइयों पर एक ही इत्र महसूस होता है। 
मृत्युगंध। 

तुम मिलो मुझसे। कि कोई शहर तो महबूब शहर हुआ जाए। कि किसी शहर की धमनियों में थरथराए थोड़ा सा प्यार… गुज़रती जाए कोई मेट्रो और हम स्टेशन पर खड़े रोक लें तुम्हें हाथ पकड़ कर। रुक जाओ। अगली वाली से जाना। 

मैं भूल जाऊँ तुम्हारे शहर की गलियों के नाम। तुम भूल जाओ मेरी फ़ेवरिट किताब समंदर किनारे। रात को हाई टाइड पर समंदर का पानी बढ़ता आए किताब की ओर। मिटा ले मेरी खींची हुयी नीली लकीर। किताब के एक पन्ने पर लिखा तुम्हारा नाम। मुझे हिचकियाँ आएँ और मैं बहुत दिन बाद ये सोच सकूँ, कि शायद तुम याद कर रहे हो। 

पिछली बार मिली थी तो तुम्हारी हार्ट्बीट्स स्कैन कर ली थी मेरी हथेली ने…काग़ज़ पर रखती हूँ ख़ून सनी हथेली। रेखाओं में उलझती है तुम्हारी दिल की धड़कन। मैं देखती हूँ देर तक। सम्मोहित। फिर हथेली से कस के बंद करती हूँ दूसरी कलाई से बहता ख़ून। 

कि कहानी में भी तुमसे पहले अगर मृत्यु आए तो उसे लौट कर जाना होगा।
चलो, जीने की यही वजह सही कि तुमसे एक बार और मिल लें। कभी। ठीक?

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लड़की की उदास आँखों में एक शहर रहता था। 

लड़का अकसर सोचता था कि दूर देश के उस शहर जाने का वीसा मिले तो कुछ दिन रह आए शहर में। रंगभरे मौसम लिए आता अपने साथ। पतझर के कई शेड्स। चाहता तो ये भी था कि लड़की के लिए अपनी पसंद के फूल के कुछ बीज ले आए और लड़की को गिफ़्ट कर दे। लड़की लेकिन बुद्धू थी, उसकी बाग़वानी की कुछ समझ नहीं थी। उससे कहती कि बारिश भर रुक जाओ, पौधे आ जाएँ, फिर जाना। यूँ एक बारिश भर रुक जाने की मनुहार में कोई ग़लत बात नहीं थी, लेकिन शहर में अफ़ीम सा नशा था। रहने लगो तो दुनिया का कोई शहर फिर अच्छा नहीं लगता। ना वैसा ख़ुशहाल भी। उदासी की अपनी आदत होती है। ग़ज़लें सुनते हुए शहर के चौराहे पर चुप बैठे रहना, घंटों। या कि मीठी नदी का पानी पीना और इंतज़ार करना दिल के ज़ख़्म भरने का। उदास शहर में रहते हुए कम दुखता था सब कुछ ही। 

शहर में कई लोग थे और लड़की ये बात कहती नहीं थी किसी से…लेकिन बस एक उस लड़के के नहीं होने से ख़ाली ख़ाली लगता था पूरा उदास शहर। 

20 November, 2018

November Mornings

मेरा मैक चूँकि नया है और इतना साफ़ है कि मन करता है लिखने के पहले साबुन से हाथ धो कर आएँ :) हाथ में ज़रा सी भी चिकनाई हो तो कीबोर्ड पर फ़ील होने लगता है। क़लम से लिखने के साथ तो ये बात हमेशा से रही है कि हाथ एकदम साफ़ हों, लेकिन नॉर्मली कीबोर्ड के बारे में ऐसा नहीं सोचते थे। उसपर मेरे हाथों में पसीना बहुत आता है, ज़रा भी गरमी हुयी नहीं कि मुश्किल। स्कूल कॉलेज के टाइम अगर किसी इग्ज़ैम में रूमाल ले जाना भूल गए तो आफ़त ही आ जाती थी। लिखते हुए इतना हाथ फिसलता था कि बस! वरना तो बस स्कर्ट में हाथ पोछने के सिवा कोई चारा नहीं होता था। स्कूल के टाइम में मेरे पास एक ही स्कर्ट हुआ करती थी। तो अगर स्कर्ट गंदा कर दिए घर जाते साथ पहले स्कर्ट धो कर सुखाने के लिए डाल देते थे। बैंगलोर का मौसम लगभग पूरे साल ठंडा ही रहता है तो दिक्कत नहीं होती है। मैं भूल भी जाती हूँ कि लिखने में हाथ फिसलता था। फिर जब से Lamy डिस्कवर किए हैं, लिखने का सुख कमाल का है। क़लम की ग्रिप मेरे हाथ के लिए एकदम ही पर्फ़ेक्ट है, हाथ कभी नहीं फिसलता। लम्बे समय पर लिखने पर भी उँगलियाँ नहीं दुखतीं। अच्छा डिज़ाइन इसी को तो कहते हैं। जहाँ भी अच्छा डिज़ाइन होता है, वो साफ़ पता चलता है। जैसे कि मैकबुक के नए वाले ऑपरेटिंग सिस्टम में एक डार्क मोड है जो मुझे बेहद पसंद है। इसमें काग़ज़ एकदम साफ़ दिखता है बीच में। आसपास सब कुछ काला। ऐसे लेआउट में लिखने का ख़ूब मन करता है।

ऑफ़िस में अपने इस्तेमाल के लिए एक डेस्क ख़रीदनी है। कल पेपरफ़्राई पर देख कर आए लेकिन अपने पसंद की डेस्क नहीं मिली। इधर पापा आए हुए थे तो बता रहे थे कि वो जब कश्मीर गए थे तो लिखने के लिए इतना ख़ूबसूरत डेस्क देखे कि उनका मन किया कि आगे की ट्रिप कैन्सल करके वही एक डेस्क ख़रीद के लौट आएँ। अखरोट की लकड़ी का डेस्क। अब वैसी ही किसी डेस्क पर दिल अटका हुआ है मेरा। कैसी कैसी चीज़ों के लिए सफ़र करने का मन करता है। अब लगता है ऐसे किसी शहर जाएँ जहाँ लकड़ी पर inlay वर्क होता हो। एक अच्छी लकड़ी की डेस्क और किनारे पर सफ़ेद बारीक काम किया हुआ हो। इस बार घर जाएँगे तो सोच रहे हैं कि डेस्क तो बनवा ही लें लकड़ी की… हाँ उसपर काम होता रहेगा। घर पर अक्सर बढ़ई काम करने आते हैं। ससुराल में कुछ ख़ूब बड़े बड़े पलंग वग़ैरह बने हैं। फिर बड़ा घर है तो कुछ ना कुछ काम चलता ही रहता है हमेशा। उन्होंने कह भी रखा है, कुछ भी डिज़ाइन आप दिखा दीजिए, हम बना देंगे।

टेबल या डेस्क कुछ चौड़ी हो जिसपर लिखने के अलावा की चीज़ें रखी जा सकें। कुछ पेपरवेट, कुछ इधर उधर से लाए गए छोटे छोटे स्नो ग्लोब, एक नटराज की छोटी सी मूर्ति। फिर मुझे अपने लिखने के डेस्क पर नॉर्मली दो चार किताबें और कई सारी नोट्बुक रखनी होती है। कलमें होती हैं कई सारी। एक छोटा सा फूलदान होता है। अक्सर ताज़े फूल रहते हैं। चाय या कॉफ़ी का मग रहता ही है।

कल पेपरफ़्राई में एक बहुत सुंदर छोटी सी लकड़ी की टेबल देखी। उसपर मोर बना हुआ था। एक मन तो किया कि ख़रीद ही लें। मेरी वाली टेबल अब बहुत पुरानी हो गयी है। लेकिन दिक्कत ये थी कि उस टेबल में इंक्लाइन नहीं था। मुझे हाथ से लिखने के समय थोड़ा सा ऐंगल अच्छा लगता है। जैसे स्कूल के समय डेस्क में हुआ करता था। कोई पंद्रह डिग्री टाइप झुकाव। उसपर हाथ ठीक से बैठता है। चूँकि मैं अभी भी बहुत सारा कुछ हाथ से लिखती हूँ वैसा ज़रूरी होता है।

कितने शहर जाने का मन करता है। यायावर। बंजारा मन। 

19 November, 2018

रोज़नामचा - नवम्बर की किसी शाम


हम कहाँ कहाँ छूटे रह जाते हैं। इंटर्नेट पर लिखे अपने पुराने शब्द पहचानना मुश्किल होता है मेरे लिए। ऐसे ही कोई जब कहता है कि उनको मेरी किताब का कोई एक हिस्सा बहुत पसंद है। का किसी कहानी की कोई एक पंक्ति, तो मुझे कई बार याद नहीं रहता कि ये मैंने लिखा था। 

8tracks एक ऑनलाइन रेडिओ है जिसका इस्तेमाल मैं लिखने के दर्मयान करती थी। ख़ास तौर से अपने पुराने ऑफ़िस में स्क्रिप्ट लिखते हुए या ऐसा ही कुछ करने के समय जब शोर चाहिए होता था और ख़ामोशी भी। कुछ ऐसी चीज़ें होती हैं जिनसे हमें किसने मिलवाया हमें याद नहीं रहता। किसी शाम के रंग याद रहते हैं बस। बोस के noise कैन्सेलेशन हेड्फ़ोंज़ वाले चुप्पे लम्हे। 8tracks के मेरे पसंदीदा मिक्स पर कमेंट लिखा था मैंने। अब मैं वैसी बातें करती ही नहीं। पता नहीं कब, क्या महसूस किया था जो वहाँ लिखा भी था। “My soul was searching for these sounds...somewhere in vacuum. Thank you. Your name added to the playlist's name makes a complete phrase for my emotional state now...'How it feels to be broken my mausoleums'. Redemptions come in many sounds. Solace sometimes finds its way to you. And darkness is comforting. Thank you. So much.”

आज बहुत दिन क्या साल बाद लगभग ऑफ़िस का कुछ काम करने आयी। मैं काम के मामले में अजीब क़िस्म की सिस्टेमैटिक हूँ। मुझे सारी चीज़ें अपने हिसाब से चाहिए, कोई एक चीज़ इधर से उधर हुयी तो मैं काम नहीं कर सकती। चाय मेरे पसंद की होनी चाहिए, ग्रीन टी पियूँगी तो ऐसा नहीं है कि कोई भी पी लूँ… ‘ginger mint and lemon’ फ़्लेवर चाहिए होता है। कॉफ़ी के मामले में तो केस एकदम ही गड़बड़ है अब। starbucks के सिवा कोई कॉफ़ी अच्छी नहीं लगती है। लेकिन उस कॉफ़ी के साथ लिखना मतलब कोई क़िस्सा कहानी लिखना, टेक्नॉलजी नहीं। 

फिर मैं जाने क्या लिखना चाहती हूँ। जो चीज़ें मुझे सबसे ज़्यादा अफ़ेक्ट करती हैं इन दिनों, मैं उसके बारे में लिखने की हिम्मत करने की कोशिश कर रही हूँ। सब उतना आसान नहीं है जितना कि दिखता है। जैसे कि पहले भी मुझे डिप्रेशन होता था ऐंज़ाइयटी होती थी लेकिन हालत इतनी बुरी नहीं थी। इन दिनों ज़रा सी बात पर रीऐक्शन कुछ भी हो सकता है। ख़ास तौर से कलाइयाँ काटने की तो इतनी भीषण इच्छा होती है कि डर लगता है। मैं जान कर घर में तेज धार के चाक़ू, पेपर कटर या कि ब्लेड नहीं रखती हूँ। इसके अलावा सड़क पर गाड़ी ठोक देने के ख़याल आते हैं, किसी बिल्डिंग से कूद जाने के या कि कई बार डूब जाने के ख़याल भी आते हैं। मुझे डाक्टर्ज़ और दवाइयों पर भरोसा नहीं होता। आश्चर्यजनक रूप से, मुझ पर कई दवाइयाँ काम नहीं करती हैं। ये कैसे होता है मुझे नहीं मालूम। पहले ऐसा बहुत ही ज़्यादा दुःख या अवसाद के दिन होता था। आजकल बहुत ज़्यादा फ़्रीक्वंट्ली हो रहा है। 

इन चीज़ों का एक ही उपाय होता है। किसी चीज़ में डूब जाना। तो काम में डूबने के लिए सब तैय्यारी हो गयी है। टेक्नॉलजी मुझे पहले से भी बहुत ज़्यादा पसंद है, सो उसके बारे में पढ़ रही हूँ। एक बार सारी इन्फ़र्मेशन समझ में आने लगेगी तो फिर लिखने भी लगूँगी। आर्टिफ़िशल इंटेलिजेन्स, मशीन लर्निंग, एंटर्प्रायज़ ऑटमेशन…सब ऐसी चीज़ें हैं जिनके बारे में में मुझे एकदम से शुरुआत से पढ़ाई करनी है। फिर, आजकल अच्छी बात ये है कि हिंदी अख़बार शुरू किया है। सुबह सुबह हिंदी में पढ़ना अच्छा लगता है। कुछ ऐसे भी शब्द अब रोज़ाना मिलने लगे हैं जिनसे मिले अरसा हो जाता था। जैसे कि प्रक्षेपण। इंदिरानगर में रहते हुए दस साल से हिंदी अख़बार पढ़ा नहीं, कि उधर आता ही नहीं था। इस घर में राजस्थान पत्रिका मिल जाती है। यूँ मुझे हिंदुस्तान पढ़ना पसंद था, लेकिन ठीक है। पत्रिका का स्टैंडर्ड ठीक-ठाक है। कुछ आर्टिकल्ज़ अच्छे लगते हैं। हिंदुस्तान पढ़े कितना वक़्त बीत गया। देवघर में ससुराल में भी प्रभात ख़बर आता है, वो तो इतना बुरा है कि पढ़ना नामुमकिन है। 

आज पूरा दिन बहुत थका देने वाला रहा। ऑफ़िस में दूसरे हाफ में तो नींद भी आ रही थी बहुत तेज़। कल से सोच रही हूँ अपना फ़्रेंच प्रेस कॉफ़ी मेकर और कॉफ़ी पाउडर ले कर ही आऊँ ऑफ़िस। काम करने में अच्छा रहेगा। फिर कभी कभी सोचती हूँ कॉफ़ी मेरी हेल्थ के लिए सही नहीं है, तो पीना बंद कर दूँ। 

इंग्लिश विंग्लिश बहुत सुंदर फ़िल्म है। और सबसे सुंदर उसका आख़िर वाला स्पीच है। श्रीदेवी ने कितनी ख़ूबसूरती से स्पीच दी है। मैं अक्सर उस स्पीच के बारे में सोचती हूँ। ख़ुद की मदद करना ज़रूरी होता है ज़िंदगी के कुछ पड़ावों पर। कि आख़िर में, सारी लड़ाइयाँ हमारी पर्सनल होती हैं। चाहे वो हमारे सपनों को हासिल करने की लड़ाई हो या कि अपने भीतर रहते दैत्यों से रोज़ लड़ते हुए ख़ुद को पागल हो जाने से बचा लिए जाने की। जैसे जैसे उम्र बढ़ रही है, ज़िंदगी के कई स्याह पहचान में आ रहे हैं। ऐसा क्यूँ है कि अवसाद का रंग और गाढ़ा ही होता जाता है? 

मैं अपने शहर बनाना चाहती हूँ लेकिन विदा के शहर नहीं। बसे-बसाए शहर कि जिनमें भाग के जाने को नहीं, घूमने जाने को जी चाहे। ख़ूबसूरत शहर। बाग़ बगीचों वाले। कई रंग के गुलाब, गुलदाउदी, पीले अमलतास, सुर्ख़ गुलमोहर और पलाश वाले। कहते हैं कि हमें जीने के लिए कुछ चीज़ों से जुड़े रहने की ज़रूरत होती है। चाहे वो कोई छोटी सी चीज़ ही हो। बार बार याद आने वाली बातों में मुझे ये भी हमेशा याद आता है कि रामकृष्ण परमहंस को लूचि (अलग अलग कहानियों में अलग अलग खाद्य पदार्थों का ज़िक्र आता है। कहीं गुलाबजामुन और जलेबी का भी) से बहुत लगाव था और उन्होंने एक शिष्य को कहा था कि दुनिया में अगर हर चीज़ से लगाव टूट जाएगा तो वे शरीर धारण नहीं कर पाएँगे। मोह जीवन का एक ज़रूरी हिस्सा है। बस, कुछ भी अधिक नहीं होना चाहिए। अति सर्वत्र वर्जयेत और त्यक्तेन भुंजीथा भी पढ़ा है हमने। पढ़ने से इन बोधकथाओं का कोई हिस्सा अवचेतन में अंकित हो जाता है और हमें बहुत ज़्यादा अवसाद के क्षण में बचा लेता है। बीरबल की उस कहानी की तरह जहाँ बर्फ़ीले ठंडे पानी में खड़े व्यक्ति ने दूर दिए की लौ को देख कर उसकी गर्माहट की कल्पना की और रात भर पानी में खड़ा रहा। 

कभी कभी किसी और को अपनी जिंदगी के बारे में बताती हूँ तो अक्सर लगता है कि life has been extremely kind to me. शायद इसलिए भी, छोटी छोटी चीज़ों में थोड़ी सी ख़ुशी तलाश के रख सकती हूँ। ख़ुद को बिखरे हुए इधर उधर पा के अच्छा लगता है। मैं रहूँ, ना रहूँ…मेरे शब्द रहेंगे। 

02 November, 2018

काँच की चूड़ियाँ

मेरी हार्ड डिस्क में अजीब चीज़ें स्टोर रहती हैं। अवचेतन मन कैसी चीज़ों को अंडर्लायन कर के याद रखता है मुझे मालूम नहीं। 

मुझे बचपन से ही काँच की चूड़ियों का बहुत शौक़ था। उनकी आवाज़, उनके रंग। मम्मी के साथ बाज़ार जा के चूड़ियाँ ख़रीदना। कूट के डब्बे में लगभग पारदर्शी सफ़ेद पतले काग़ज़ में लपेटी चूड़ियाँ हुआ करती थीं। जब पटना आए तो वहाँ एक चूड़ी वाला आता था। उसके पास एक लम्बा सा फ़्रेम होता था जिसमें कई रंग की चूड़ियाँ होती थीं। प्लेन काँच की चूड़ियाँ। वे रंग मुझे अब भी याद हैं। नीला, आसमानी, हल्दी पीला, लेमन येलो, गहरा हरा, सुगरपंखी हरा, टस लाल, कत्थई, जामुनी, काला, सफ़ेद, पारदर्शी, गुलाबी, काई हरा, फ़ीरोज़ीलड़कियों को भर हाथ चूड़ी पहनना मना था तो सिर्फ़ एक दर्जन चूड़ियाँ मिलती थीं, दोनों हाथों में छह छह पहनने को। मेरे चूड़ी पहनने के शौक़ को देख कर मम्मी अक्सर कहती थी, बहुत शौक़ है चूड़ी पहनने का, शादी करा देते हैं। पहनते रहना भर भर हाथ चूड़ी। 

मम्मी रही नहीं। शादी के बाद बहुत कम पहनीं मैंने भर भर हाथ चूड़ियाँ। लेकिन चूड़ी ख़रीदने का शौक़ हमेशा रहा। उसमें भी प्लेन काँच की चूड़ियाँ। पटना का वो चूड़ीवाला मुझे अब भी याद आता है। उस समय हाथ कितने नरम हुआ करते थे। दो-दो की चूड़ियाँ आती थीं। प्लेन जॉर्जेट के सलवार कुर्ते पहनती थी और बेपरवाही से लिया हुआ दुपट्टा। हाँ, चूड़ियाँ एकदम मैच होती थीं कपड़े से और नेल पोलिश। माँ के जाने के साथ मेरा लड़कीपना भी चला गया बहुत हद तक। मैं सँवरती इसलिए थी कि मम्मी आए और पूछे, इतनी सुंदर लग रही हो, काजल लगाई हो कि नहीं। नज़रा देगा सब। 

आजकल साड़ी पहनती हूँ, लेकिन चूड़ी नहीं पहनती। चूड़ियों की खनक डिस्टर्ब करती है। मैं जिन शांत जगहों पर जाती हूँ, वहाँ खनखन बजती चूड़ियाँ अजीब लगती हैं। मीटिंग में, कॉफ़ी शॉप में, लोगों से मिलनेऐसा लगता है कि चूड़ियाँ पहनीं तो सारा ध्यान उनकी आवाज़ में ही चला जाएगा। 

मुझे काँच बहुत पसंद है। शायद इसके टूटने की फ़ितरत की वजह सेकुछ इसकी ख़ूबसूरती से और कुछ इसके पारदर्शी होने के कारणफिर काँच का तापमान थोड़ा सा फ़रेब रचता है कि गरम कॉफ़ी पीने में मुँह नहीं जलता। हैंडब्लोन काँच के बर्तन, शोपीस वग़ैरह के बनाने की प्रक्रिया भी मुझे बहुत आकर्षित करती है और मैं इनके ख़ूब विडीओ देखती हूँ। भट्ठी में धिपा के लाल किया हुआ काँच का गोला और उसे तेज़ी से आकार देते कलाकार के ग्लव्ज़ वाले हाथ। 

आज मैसूर क़िले के सामने एक बूढ़े बाबा चूड़ियाँ बेच रहे थे। मेटल की चूड़ियाँ थीं। नॉर्मली मैं नहीं ख़रीदती, लेकिन आज ख़रीद लीं। पाँच सौ रुपए की थींख़रीदी तो पहन भी ली, सारी की सारी दाएँ हाथ में। मेटल चूड़ियों की आवाज़ उतनी मोहक नहीं होती जितनी काँच की चूड़ियों की। मुझे चूड़ियाँ और कलाई में उनकी ठंडक याद आती रही। गोरी कलाइयों में कांट्रैस्ट देता काँच की चूड़ियों का गहरा रंग। लड़कपन। भर हाथ चूड़ी पहनने की इच्छा। 

यूँ ही सोचा कि देश में काँच की चूड़ियाँ कहाँ बनती हैं और अचरज हुआ कि मुझे मालूम था शहर का नाम - फ़िरोज़ाबाद। क्या फ़ीरोज़ी रंग वहीं से आया है? मुझे क्यूँ याद है ये नाम? कि बचपन से चूड़ियों के डिब्बे पर पढ़ती आयी हूँ, इसलिए? कि कभी खोज के फ़िरोज़ाबाद के बारे में पढ़ा हो, सो याद नहीं। गूगल किया तो देखती हूँ कि याद सही है। हिंदुस्तान में काँच की चूड़ियाँ फ़िरोज़ाबाद में बनती हैं। 


ख़्वाहिशों की फेरहिस्त में ऐसे ही शहर होने थे। मैं किसी को क्या समझाऊँ कि मैं फ़िरोज़ाबाद क्यूँ जाना चाहती हूँ। कि मैं वहाँ जा कर सिर्फ़ बहुत बहुत से रंगों की प्लेन काँच की चूड़ियाँ ख़रीदना चाहती हूँ। कि मेरे शहर बैंगलोर में जो चूड़ियाँ मिलती हैं उनमें वैसे रंग नहीं मिलते। ना चूड़ी बेचने वालों में वैसा उत्साह कि सिर्फ़ एक दर्जन चूड़ियाँ बेच कर ख़ुश हो गए। एक दर्जन चूड़ी अब बीस रुपए में आती है। बीस रुपए का मोल ही क्या रह गया है अब। 

मैं कल्पना में फ़िरोज़ाबाद को देखती हूँ। कई सारी चूड़ियों की दुकानों को। मैं लड़कपन के पक्के, गहरे रंगों वाले सलवार कुर्ते पहनती हूँ मगर सूतीदुपट्टा सम्हाल के रखती हूँ माथे पर, धूप लग रही है आँखों मेंऔर मैं भटकती हूँ चूड़ियाँ ख़रीदने के लिए। कई कई रंगों की सादे काँच की चूड़ियाँ। 

मैं लौटती हूँ शहर फ़िरोज़ाबाद सेलकड़ी के बक्से में चूड़ियाँ और एकदम ही भरा भरा, कभी भी टूट सकने वाला, काँच दिल लेकर। 

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