03 October, 2018

ऑल्टर्नेट दुनिया का अलविदा

नामा-बर तू ही बता तू ने तो देखे होंगे
कैसे होते हैं वो ख़त जिन के जवाब आते हैं
~ क़मर बदायुनी

हमने कितनी फ़ालतू चीज़ें सीखीं अपने स्कूल में। किताबों की वो कौन सी बात है जो काम आती है बाद की ज़िंदगी में। वे पीले हरे रिपोर्ट कार्ड जो सीने से लगाए घर आते और उसमें लिखे रैंक - 2nd, 5th, 7th दिखा कर ख़ुश होते। हर बार वही बात सुनते, कि ध्यान से पढ़ो। ये सोशल स्टडीज़ में सिर्फ़ ७० काहे आए हैं। हाइयस्ट कितना गया, वग़ैरह।

हमें चिट्ठियाँ लिखनी सिखायी गयीं, प्रिन्सिपल को छुट्टी के लिए आवेदन देने को, सांसद को शहर की किसी मुसीबत के बारे में बताने को, पिता को पैसे माँगते हुए चिट्ठी। हमें किसी ने सिखाया होता कि प्रेम पत्र कैसे लिखते हैं, माफ़ी कैसे माँगते हैं, अलविदा कैसे कहते हैं। चिट्ठी लिखते हुए हिंदी उर्दू के कितने सारे सम्बोधन हो सकते हैं… ‘प्रिय’ के सिवा… कि मैं किसी चिट्ठी की शुरुआत में, ‘मेरे ___’ और आख़िर में सिर्फ़ ‘तुम्हारी___’ लिखना चाहती हूँ तो ये शिष्टाचार के कितने नियम तोड़ेगा। आख़िर में क्या लिखते हैं? सादर चरणस्पर्श या आपका आज्ञाकारी छात्र के सिवा और कुछ होता है जो हम किसी को लिख सकें… प्रेम के सिवा जो पत्र होते हैं, वे कैसे लिखते हैं।

हमने उदाहरण में अमृता प्रीतम के पत्र क्यूँ नहीं पढ़े? निर्मल वर्मा, रिल्के, प्रेमचंद, दुष्यंत कुमार या कि बच्चन के पत्र ही पढ़े होते तो मालूम होता कि चिट्ठियों के कितने रंग होते हैं। तब हम शायद तुम्हें चिट्ठी लिखने की ख़्वाहिश के अपराधबोध में डूब डूब कर मर नहीं रहे होते। मंटो ने जो ख़त खोले नहीं, पढ़े नहीं, उनमें क्या लिखा था?

मैंने पिछले कुछ सालों में जाने कितने ख़त लिखे। मैंने जवाब नहीं माँगे। ख़त दुआओं की तरह होते रहे। हमने दुआ माँगी, क़ुबूल करने का हिस्सा खुदा का था। हमने कभी दूसरी शर्त नहीं रखी कि जवाब आएँ तो ही ख़त लिखेंगे। लेकिन जाने क्यूँ लगा, कि तुम मेरे ख़तों का जवाब लिख सकोगे। लेकिन शायद तुमने भी स्कूल में नहीं पढ़ा कि वे लोग जो सिर्फ़ दोस्त होते हैं, दोस्त ही रहना चाहते हैं, उन्हें कैसी चिट्ठी लिखते हैं। तुम नहीं जान पाए कि मुझे क्या लिखा जा सकता है चिट्ठी में। ‘हाले दिल यार को लिखूँ क्यूँकर, हाथ दिल से जुदा नहीं होता’।

तुम्हें पता है, अगर आँख भर आ रही हो तो पूरा चेहरा आसमान की ओर उठा लो और गहरी गहरी सांसें लो तो आँसू आँखों में वापस जज़्ब हो जाते हैं। बदन में घुल जाते हैं। टीसते हैं आत्मा में लेकिन गीली मिट्टी पर गिर कर आँसुओं का पौधा नहीं उगाते। आँसुओं के पौधे पर उदासियों का फूल खिलता है। उस फूल से अलविदा की गंध आती है। उस फूल को किताब में रख दो और भूल जाओ तो अगली बार किताब खोलने के पहले धोखा होता है कि पन्नों के बीच कोई चिट्ठी रखी हुयी है। लेकिन हर चीज़ की तरह इसका भी एक थ्रेशोल्ड होता है। उससे ज़्यादा आँसू हुए तो कोई ट्रिक भी उन्हें मिट्टी में गिरने से रोक नहीं सकती, सिवाए उस लड़के के जिसकी याद में आँखें बौरा रही हैं...वो रहे तो हथेलियों पर ही थाम लेता आँसू को और फिर आँसू से उसके हथेली में सड़क वाली रेखा बन जाती...उस सड़क की जो दोनों के शहरों को जोड़ती हो।

क्या तुम सच में एकदम ही भूल गए हो हमको? मौसम जैसा भी याद नहीं करते? साल में एक बार? क्या आसान रहा हमको भूलना? तुम्हें वे दिन याद है जब हम बहुत बात किया करते थे और मैं तुमसे कहती थी, जाना होगा तो कह के जाना। मैं कोई वजह भी नहीं पूछूँगी। मैं रोकूँगी तो हरगिज़ नहीं। लेकिन तुम भी सबकी ही तरह गुम हो गए। क्या ये मेरी ग़लती थी कि मैंने सोचा कि तुम बाक़ियों से कुछ अलग होगे। हम कैसे क्रूर समय में जी रहे हैं यहाँ DM पर ब्रेक ऑफ़ कर लेते हैं लोग। घोस्टिंग जैसा शब्द लोगों की डिक्शनरी ही नहीं, ज़िंदगी का हिस्सा भी बन गया है। ऐसे में अलविदा की उम्मीद भी एक यूटोपीयन उम्मीद थी? क्या किसी पर्फ़ेक्ट दुनिया में एक शाम तुम्हारा फ़ोन आता और तुम कहते, देखो, मेरा ट्रैफ़िक सिग्नल तुमसे पहले हरा हो गया है, मैं पहले जाऊँगा… मुड़ के देखूँगा भी, पर लौटूँगा नहीं… तुम मेरा इंतज़ार मत करना। सिग्नल ग्रीन होने पर तुम भी चले जाना शहर से, फिर कभी न लौटने के लिए।

या कि टेलीग्राम आता। एक शब्द का। विदा…
मैं समझ नहीं पाती कि विदा के आख़िर में तीन बिंदियाँ क्यूँ हैं। लेकिन उस काग़ज़ के टुकड़े से रूह में उस दिन को बुक्मार्क कर देती और तुम्हें भूल जाती। अच्छा होता ना?

देखो ना। मेरी बनायी ऑल्टर्नट दुनिया में भी तुम रह नहीं गए हो मेरे पास। तुम जा रहे हो, बस 'विदा' कह कर। बताओ, जिस लड़की की ख़्वाहिशें इतनी कम हैं, उन्हें पूरा नहीं होना चाहिए?

01 October, 2018

वयमेव याता:

जिन चीज़ों को गुम हो जाना चाहिए…

१. उस रोज़ शाम में बहुत रंग थे। मैं हाल में इस घर में आयी थी। कई हफ़्तों से लगातार कमरे में ही रही थी, इस घर में शिफ़्ट होने पर भी पहले तल्ले पर रह रही थी तो सीढ़ियाँ नहीं उतरती थी और ऊपर ही रहती थी। एक खिड़की भर ही आसमान मिल रहा था मुझे। दो दिन फ़िज़ियोथेरेपी करायी थी तो थोड़ी राहत थी आज। कमरे की खिड़की से थोड़ा गुलाबी दिखा तो आसमान देखने का बहुत मन कर गया। सीढ़ियाँ उतर कर घर के बाहर गयी। इस सोसाइटी में बहुत से विला एक क़तार से बने हुए हैं, इन्हें row-houses कहते हैं। शहर से थोड़ा हट के है ये इलाक़ा और यहाँ आसपास ऊँची इमारतें नहीं हैं इसलिए बहुत सारा आसमान दिखता है। पश्चिम की ओर इस कॉम्प्लेक्स का मुख्य दरवाज़ा है जहाँ से पूरी पश्चिम का खुला आसमान दिख रहा था। इंद्रधनुष के सारे रंग थे उधर। और बीच के कई सारे भी। गहरा गुलाबी। सेब का कच्चा हर। सुनहला पीला। मोरपंखी हरा की एक छब तो कहीं स्याही के रंग का नीला एकदम ही। मैं देखती ही रह गयी, इतना सारा आसमान कितने दिन बाद देखा था। इतने सारे रंग भी कितने दिन बाद ही। फ़ोन से तस्वीरें खींची तो देखा कि आइफ़ोन X से रंग लगभग जैसे हैं वैसे ही उतर आते हैं तस्वीर में। बहुत सुंदर तस्वीर थी। उसपर क्लिक किया कि whatsapp खुले। वहाँ सबसे ऊपर सजेशन में तुम्हारा नाम नहीं था। मैं एक मिनट को ठिठकी। टेक्नॉलजी के लिए कितना आसान है, किसी को लिस्ट में पीछे डाल देना। मन के लिए कितना उलझ जाता है सब कुछ। जैसे गुनगुनाती हुयी बहती नदी के रास्ते में कोई बड़ा सा पत्थर आ जाता है जिससे नदी को अपनी दिशा बदलनी पड़ती हो…सोच के सारे धागे उलझ जाते हैं।

वो तस्वीर रखी हुयी है। फ़ोन में। पर उसे ग़ायब हो जाना चाहिए। कहीं।

२. निर्मल को पढ़ना पिछले साल शुरू किया था। तब पहली बार जाना था कि उनके दीवाने धुंध से उठती धुन को इस पागलपन के साथ कैसे खोजते हैं जैसे मन आत्मा के छूटे किसी टुकड़े को। कोई ख़ालीपन बसता जाता है रूह के बीच और हम चाहते हैं कि वहाँ निर्मल के जिए हुए शब्द रहें। उनका लिखा हुआ शहर। उनके सुने हुए गीत। उनके ख़त। उनके हिस्से के दोस्त। गूगल ने बताया था कि धुंध से उठती धुन की एक कॉपी तुम्हारे शहर की लाइब्रेरी में है। उन दिनों सब कुछ क़िस्सा कहानी जैसा ही तो लगता था। मैंने कहा था कि लाइब्रेरी से वो किताब उड़ा लेंगे। तुमने कहा था कि तुम भी पार्ट्नर इन क्राइम बनने को तैय्यार हो।

फिर देखो ना। इतने सालों से जो किताब आउट औफ़ प्रिंट थी, छप के आ गयी इस साल। मुझे जिस लम्हे पता चला, मैंने Amazon पर दो कॉपी ऑर्डर कर दी। तुमसे पूछा भी कहाँ। कि वो किताब तो तुम्हारे हिस्से आनी ही थी। फिर कुछ यूँ हुआ कि जैसे जैसे मन के ख़ालीपन में निर्मल के शब्द बसते गए, तुम्हारे मन के शहरों से मैं बिसरती गयी वैसे ही। फिर वो एक दिन आया कि जब पूरा एक साल बीत गया हमारे बीच और मैंने महसूस किया…कि साल नहीं बीता, मैं बीत गयी हूँ, रीत गयी हूँ उस शहर से पूरी। इतनी तेज़ भागते शहर की याद्दाश्त कम होती है। तुम तक कुछ नहीं पहुँचता। काग़ज़ की नाव, whatsapp के मेसजेज़, वॉइस रिकॉर्डिंग, ईमेल, तस्वीरें, चिट्ठियाँ…मन की आवाज़…कुछ भी नहीं।

मेरे पास धुंध से उठती धुन की एक कॉपी है। जिसके पहले पन्ने पर मैं लिखना चाहती हूँ तुम्हारे शहर का नाम और तुम्हारे शहर के हिस्से ढेर सारा प्यार।

३. तुम्हारे नाम चिट्ठियाँ, अधलिखी। नोट्बुक में रखे बहुत से सादे काग़ज़ जिनपर लैवेंडर फूल बने हैं, नर्म जामुनी रंग के। कुछ जामुनी और कुछ हल्के हरे रंग के लिफ़ाफ़े। पोस्टकार्ड। कहाँ कहाँ की टिकट। मैंने इतनी बेख़याली में तुम्हें ख़त लिखे हैं कि कुछ में 2019 की तारीख़ पड़ी हुयी है, कुछ में २००८ की… तुम्हारी बात आती है तो समय का कुछ पता कहाँ चलता है।

४. सुख के कई कोरे कच्चे लम्हे जो कि तुम्हारे साथ बाँटने से पूरे पूरे हो जाते। हँसते हुए फ़्रेम हो जाते।

५. सफ़ेद फूलों की ख़ुशबू, जिनका नाम मुझे नहीं पता। इस बिल्डिंग में एक सफ़ेद फूलों वाला पेड़ रहता है। रात दिन फूल झरते हैं उसके नीचे। अनवरत। याद जैसे रूकती नहीं है, वैसे। अनगिनत फूलों वाला उदास पेड़। अलविदा जैसा। बहुत दिन के बाद इक सुबह लिखने बैठी तो मिट्टी से बीन कर कुछ फूल ले आयी। घर के बाहर कुछ नन्हें पीले फूल खिलते हैं, उनमें से एक तोड़ लिया और एक काँच के पारदर्शी टकीला ग्लास में रख दिया। लिखते हुए उनकी ख़ुशबू आती रही।

कहती तुमसे, ये फूल हों तुम्हारे शहर में तो सूंघ के देखना, मेरी सुबह की ख़ुशबू ऐसी है इन दिनों।

६. दिल के एक हिस्से पर लिखा तुम्हारा नाम, जिसे बड़ी बेरहमी से खुरच कर मिटाने की कोशिश की थी एक शाम। टीसता रहता है वो हिस्सा। समय के दोनों सिरे पर थिर सिर्फ़ ज़ख़्म होते हैं। शायद। क़िस्से किरदारों वाला कोई एक रंगरेज़ हो कि दीवार पर थोड़ा सा चूना डाल के पुताई कर दे एकदम नए रंग में।

मेरे वजूद में कई ब्लैक होल होते चले गए हैं यहाँ इन चीज़ों को एकदम ही ग़ायब हो जाना चाहिए…लेकिन मन भी ever expanding universe की तरह ही है शायद। कितनी दुनियाएँ समा जाएँ और एक पैरलेल दुनिया को पता भी ना चले दूसरे के दुःख का। मैं तुम्हारी तस्वीर देखते हुए अक्सर सोचती हूँ, ब्लैक होल की तस्वीर नहीं उतारी जा सकती है…पर तुम्हारी मुस्कान को किया जा सकता है लम्हे में क़ैद। तो तुम रहो शायद। इस अनश्वर दुनिया में… इसी multiverse में कहीं और… पास के किसी शहर में। किसी ऑल्टर्नट रीऐलिटी में तुम्हें मेरी याद रहे थोड़ी सी। और मैं कह सकूँ तुमसे, ज़्यादा कुछ नहीं, बस उतना जितने पर हक़ हो किसी पुराने दोस्त का, कि याद आती है तुम्हारी, ‘I miss you.’, मिलना फिर कभी। Au revoir! 

22 September, 2018

परदे पर मंटो

मंटो। इसके पहले कि टाइम्लायन लोगों के रिव्यू से भर जाए, मुझे ख़ुद फ़िल्म देखनी थी। कि मंटो तो महबूब मंटो है। फिर इसलिए भी कि ट्रेलर देख कर लगा भी कि नवाज़ बेहतरीन हैं मंटो के रूप में। मंटो का रिव्यू लिखना मुश्किल है मेरे लिए। इसलिए फ़िल्म देख कर जो लगा, वो लिख रही हूँ। 


फ़िल्म से मंटो के हर चाहने वाले ने अलग क़िस्म की उम्मीद की होगी। हम मंटो को जीते जागते जब देखें तो कौन सी बातें हैं जो जानना चाहेंगे। उसके कपड़े, रहन सहन, बात करने का तरीक़ा। उसके दोस्त, परिवार। लेकिन मुझे अगर कुछ जानना था सबसे ज़्यादा तो उसकी लेखन प्रक्रिया। समाज का उसपर पड़ता असर। उसका लिखने का ठीक ठीक तरीक़ा। 

मुझे मंटो से इश्क़ है। गहरा। किसी और लेखक से इस तरह मन नहीं जुड़ता जैसे मंटो से जुड़ता है। उसके छोटे छोटे क़िस्से, उसकी बतकही, यारों के साथ उसका जीना, उठना, बैठना। सब कुछ ही मैं ख़ूब ख़ूब पढ़ रखा है। तो ज़ाहिर है, मेरे मन में मंटो की कोई इमेज होगी। फ़िल्म देखते हुए मन में ये सवाल लेकर नहीं गयी थी कि नवाज़ मंटो के रूप में कैसा दिखेगा। मैं इस फ़िल्म को निष्पक्ष होकर देख ही नहीं सकती थी। एक पॉज़िटिव बायस मन में था। गुलाबी चश्मा या कि प्रेम में अंधा होना। दोनों सिलसिले में, मैं बहुत ज़्यादा सवाल नहीं करती। बहुत चीज़ों को ख़ारिज नहीं करती। फ़िल्म अच्छी लगती, हर हाल में।

मैं ख़ुश थी। मंटो को ऐसे जीते जागते हुए अपने सामने पा कर। मैं सारे वक़्त बस उसे ही देखना चाहती थी। मंटो - एक लेखक के रूप में। जिन वाक़यों ने उसे बनाया, उन्हें। फ़िल्म में मंटो और सफ़िया के इर्द गिर्द है। मंटो का पारिवारिक जीवन ज़्यादा दिखाया गया है, उसके लेखकीय जीवन की तुलना में। मंटो के मेंटल ब्रेकडाउन के हिस्सों पर भी ज़्यादा ज़ोर नहीं दिया गया। 

फ़िल्म में मंटो के क़िस्सों को जिस तरह शामिल किया गया है वो अच्छा लगा है। किरदार मंटो की ज़िंदगी से घुले मिले दिख रहे हैं। लेकिन फ़िल्मांकन में वो करारी चोट, वो हूक, वो तड़प, नहीं पायी है जो मंटो को पढ़ कर आती है। खोल दो जैसी छोटी कहानी जिस पढ़ते हुए मन में धँस जाती है, लेकिन फ़िल्म में वही कहानी का क्लाइमैक्स खो जाता है। इज़ारबंद खोलने का दृश्य उतना मज़बूत नहीं हो पाया है। थोड़ा ड्रैमटिज़ेशन बेहतर होना चाहिए था। कैमरा ऐंगल और म्यूज़िक थोड़ा बेहतर बुना जाता तो शायद वैसी कचोट को जीवंत कर सकता जो कहानी के अंत में महसूस होती है। ठंढा गोश्त भी ठीक ठीक वैसा नहीं लग सका है जैसे कहानी में था। फ़िल्म देखते हुए लेकिन जो ख़ाली जगहें थीं, वो हमने अपने मन से भर दीं। टोबा टेक सिंह का फ़िल्मांकन बहुत अच्छा है। पढ़ने से ज़्यादा हूक इसे देख कर उठी। बूढ़ा अपनी दयनीयता में, अपने पागलपन में और अपनी लाचारी में जी उठता है और लिखे हुए से ज़्यादा तकलीफ़ देता है। बाक़ी कहानियाँ मेरी इमेजरी से मैच नहीं करतीं, इंडिपेंडेंट्ली अच्छी हैं लेकिन जिन्होंने मंटो को नहीं पढ़ा है, शायद वे फ़िल्म देख कर नहीं जान पाएँ कि मंटो कैसा लिखता था। कहानी पढ़ते हुए हम अपने मन में एक इमेज लेकर चलते हैं, फ़िल्म उस इमेज में फ़िट हो भी नहीं सकती है कि सबने अपने अपने तरीक़े से कहानियों को इंटर्प्रेट किया होगा। 

फ़िल्म में सबसे अच्छी चीज़ ये लगी है कि कई बार नवाज़ पूरी तरह मंटो हो जाते हैं। अपनी डाइयलोग डिलिवरी में नहीं लेकिन बॉडी लैंग्विज में। उनके कपड़े, उनका चलना, ठहरना, दारू पीना, चलते हुए किसी कोठे वाली को अपनी सिगरेट दे देनायहाँ वे एकदम मंटो लगते हैं। डाइयलोग काफ़ी बेहतर हो सकते थे इस फ़िल्म के। मंटो ने इतना कुछ लिख रखा है, उसमें से कई अच्छे डाइयलॉग्ज़ उठाए जा सकते थे। उनका ना होना अखरता है। जैसे कि मंटो का ये कहना, ‘यदि आप मेरे अफसानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते तो इसका मतलब ये समाज ही नाकाबिले बर्दाश्त हो चला है। मैं सोसाइटी की चोली क्या उतारूंगा, जो है ही नंगी. मैं उसे कपड़े पहनाने की कोशिश नहीं करता, क्योंकि यह मेरा काम नहीं, दर्ज़ियों का काम है फहशी के मुक़दमे में इस डाइयलोग की कमी ख़ूब अखरती है।  

फ़िल्म उस मूड को बुनने में कामयाब होती है जो मंटो के इर्द गिर्द होगा। उस हताशा को ठीक दिखाती है। लो लाइट वाले शॉट्स से। किरदारों से। ये लो लाइट लेकिन कुछ ज़्यादा हो जाती है कि कई बार हम मंटो के चेहरे का एक्स्प्रेशन देखना चाहते हैं जो नहीं दिखता। वैसे में झुँझलाहट भी होती है। मैं मंटो से आयडेंटिफ़ाई कर सकती हूँ बहुत दूर तक। आसपास का माहौल उसे किस तरह अंदर से तोड़ रहा है, इसे मंटो डाइयलोग के माध्यम से नहीं चुप्पी से और अपनी बॉडी लैंग्विज से कहता है। पैसों की क़िल्लत, ख़ुद्दारी, और शराब की लत। मंटो के बच्चियों के साथ के दृश्य बहुत प्यारे हैं, ठीक वैसे ही जैसे मंटो अपने लिखने के बारे में कहता है कि बच्चियाँ शोर मचा रही होती हैं और इनके बीच मैं लिख रहा होता हूँ। 

मंटो और इस्मत के कुछ और सीन साथ में होने चाहिए थे। उनकी आपस में बातचीत, उनका एक दूसरे की ज़िंदगी में क्या जगह थी, वग़ैरह। इस्मत को थोड़ा और फ़ुटेज मिलता तो अच्छा रहता। बॉम्बे के कुछ और दृश्य भी होते तो अच्छे रहते। 

फ़िल्म में कितना कुछ चाहते हैं हम। कि ये हमारे महबूब मंटो की फ़िल्म है। ये सब हमारी चाह थी। लेकिन ये हमारी फ़िल्म नहीं, नंदिता की फ़िल्म है, नवाज़ की फ़िल्म है और उन्होंने अपने हिसाब से क़िस्से चुने हैं, कहानी बुनी है। फ़िल्म देखते हुए हम इतना कुछ सोचते नहीं। हम मंटो के साथ तड़प रहे होते हैं। मंटो, कि जिसे पिता, माँ और पहले बेटे की क़ब्र हिंदुस्तान में है। मंटो जो कि इस बँटवारे में बँटा हुआ है। कि जिसे इस बात से बेहद तकलीफ़ होती है कि उसके अफ़साने को फहश कहा जा रहा है। कि फ़ैज़ ने उसके अफ़साने को लिटरेचर नहीं कहा। हम मंटो के दो दुनिया में बँटे हुए दुःख को जीते हैं। उसके साथ तड़पते हैं। शाद जब उसे हर जगह से खींच कर शराब पीने ले जाता है तो हम तकलीफ़ में होते हैं कि ऐसे दोस्तों के कारण इतनी कम उम्र में मर गया मंटो। फ़िल्म देखते हुए हम उस तकलीफ़ को समझते हैं जो मंटो को महसूस होती थी, उसकी पूरी भयानकता में। ये इस फ़िल्म की कामयाबी है। नवाज़ जब फ़र्श पर बैठ कर पेंसिल से काग़ज़ पर लिख रहे होते हैं, वे मंटो होते हैं। जब अपने अफ़साने की क़ीमत के लिए लड़ रहे होते हैं, हम समझते हैं कि उन्हें पैसों की कितनी सख़्त ज़रूरत रही होगी। दुनिया जैसी है उसे वैसा लिख पाने की जिस तकलीफ़ से लेखक - मंटो गुज़रता है, हम उसे जी रहे होते हैं। ये काफ़ी दुर्लभ है इन दिनों। और इसलिए ऐसी फ़िल्में बननी चाहिए। हमारे तरफ़ लोग अक्सर कहते हैंराम नाम टेढ़ो भला तो मंटो पर बनी कोई फ़िल्म हमें ख़राब तो लग ही नहीं सकती है। मंटो जैसे किरदार पर ख़राब फ़िल्म बनायी भी नहीं जा सकती। नामुमकिन है। आप मंटो को प्यार करते हैं तो फ़िल्म ज़रूर देखिए। आप मंटो को जानना चाहते हैं तो फ़िल्म ज़रूर देखिए। हाँ, उसके बाद मंटो की कहानियाँ पढ़िएमंटो वहीं मिलेगा, ख़ालिस। 

मंटो के बारे में एक क़िस्सा पढ़ा था। कि एक ताँगे पर चलते हुए सवारी ने बात बात में कहा कि मंटो मर गया। ताँगेवाले ने घोड़े की लगाम खींच ली, ताँगा रुक गया, फिर उसने अचरज मिले दुःख में पूछा, ‘क्या, मंटो मर गया! साहब अब ये ताँगा आगे नहीं जाएगा। आप कोई दूसरा देख लो फ़िल्म ख़त्म हुयी है। मैं बस ये सोच रही हूँ। मैं अगर फ़िल्म बनाती तो यहाँ ख़त्म करती।

महबूब मंटो है। हम उसे अपने अपने तरीक़े से प्यार करने के लिए आज़ाद हैं। मंटो को अपनी नज़र से देखने और दुनिया को उससे मिलवाने के लिए भी। शुक्रिया नंदिता। शुक्रिया नवाज़। मंटो को यूँ परदे पर ज़िंदा करने के लिए। कि मंटो ने ठीक ही तो कहा था, सादत हसन मर गया पर मंटो ज़िंदा है। 

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