29 January, 2009

एक झगडा रोजाना...

"मैं बाईक तुमसे अच्छा चलाती हूँ"

"जानता हूँ"

"तो मुझे ही चलाने दो न, मैं नहीं बैठूंगी तुम्हारे पीछे...तुम्हें क्या पीछे बैठने में शर्म आती है"

"हाँ आती है, मैं किसी लड़की के पीछे नहीं बैठ सकता"

"और ये जो लड़कियों की बाईक चलते हो, उससे तुम्हारी शान नहीं घटती...कोई भी देख कर कहेगा की मेरी ही गाड़ी में मुझे भगाए ले जा रहे हो...भला ६ फुट का होते हुए ये पिद्दी सी गाड़ी क्यों चलाते हो...तुमपर बिल्कुल सूट नहीं करता।"

"तुम्हारे साथ पीछे बैठूं, मेरा दिमाग ख़राब हुआ है क्या...आख़िर एक्सपेरिएंस भी कोई चीज़ होती है, सिर्फ़ जानने से क्या होता है, कितने दिन हुए हैं तुम्हें अभी सड़क पर उतरे हुए, एक बिल्ली रस्ते में आ जाए तो ऐसे ब्रेक मरती हो की भगवान् बचाए"

"वाह वाह तुम्हें भगवन बचाए और बेचारी बिल्ली को...उसको तो भगवान बचने नहीं आएगा न उस बेचारी के लिए तो मुझे ही ब्रेक मारने पड़ेंगे। पता है बिल्ली को मरना ब्रह्महत्या के इतना बड़ा पाप है...घोर कुम्भीपाक नरक मिलता है उससे, और तो और सोने की बिल्ली बनवा कर दान करनी पड़ती है, वो भी बिल्ली के वजन जितनी"

"तुम्हें ये बातें कहाँ से सूझती हैं, दिमाग के अन्दर डायलोग फैक्ट्री फिट करा रखी है...बातें सुनूँ तुम्हारी की सड़क पर ध्यान दूँ...फ़िर पटक दूँगा तो बोलोगी सबको"

"वाह वाह उल्टा चोर कोतवाल को डांटे, एक तो गिराओगे और फ़िर हल्ला करोगे की किसी को बोलना नहीं...मेरे जैसी बेवकूफ लड़की मिल गई है न, अपनी नई नई गर्ल्फ़्रेन्ड को बाईक से गिरा दे, ऐसे लड़के के साथ कौन घूमेगी बताओ। तू बैठ एक दिन पीछे, मैं तुझे गिरूंगी...हद होती है, कभी मुझे चलने ही नहीं देता...अगर हर बार तू ही चलाएगा तो मैं सीखूंगी कैसे...डरपोक कहीं का"

"कुछ दिन रुक जा...इलेक्शन आ रहे हैं, कोई न कोई पार्टी चक्का जाम कराएगी ही , उस दिन पूरी सड़क खली रहेगी...तू आराम से चला लेना तब"

"हाँ हाँ तू तो चाहता ही यही है ऐसा कुछ हो और मेरी गाड़ी का कचूमर बन जाए...न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी...पर ये मत भूल मेरा ड्राइविंग लाइसेंस मुझे तेरी बाईक चलने की पेर्मिस्सिओं देता है...देखना एक दिन फुर्र्र हो जाउंगी, तेरी बाईक उठा के...फ़िर ढूंढते रहना"

"मैं भला क्यों ढूँढने लगा...तू और बाईक दोनों आफत से एक साथ छुटकारा...वैसे बता के भागना वरना मैं सोचूंगा ट्रैफिक वाले उठा कर ले गए।"

"हवा पियो...एक दिन मैं तुम्हें पक्का गिरा दूंगी....देख लेना"

(dialog लिखने की practice कर रही हूँ...स्क्रिप्ट के लिए...यहाँ छापने का मन किया...डाल दिया...आपको गरियाने का मन कर रहा है :) गरिया लीजिये)

कभी कभी हम कुछ चीज़ों को बड़ी सीरियसली लेने लगते हैं, ऐसे में उसे तोड़ने के लिए कुछ उट पटांग तो करना ही पड़ता है...इसलिए ये पोस्ट

16 comments:

  1. बंगलुरु में आप लोग बाईक चला लेते हो, यही ताज्जुब की बात है. पोस्ट पढ़ कर मजा आया. मनोरंजक है. आभार.

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  2. aap ki is ut pataang harkat ke ham kaayal ho gaye :)

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  3. जब चक्का जाम हो..
    उसके बाद इसका दूसरा भाग लिखना,
    टिप्पणी 12% फ़्लोटिंग पर बकाया रही, सच्ची !

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  4. पोस्ट पढ़ कर मजा आया ..... सही है लिखते रहो ....ऊट पटांग ही सही पर हरकत अच्छी थी

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  5. शायद दिल्ली का वाकया होगा, वहां की सड़कें बेहतरीन हैं| दोनों मिलकर कार खरीद लीजिये, आगे पीछे कौन बैठे का झंझट ही हट जाए!! :)

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  6. मज़ेदार बह्स,काल्पनिक ही सही।

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  7. ना.. हम नहीं मानते कि बस डायलोग या स्क्रिप्ट लिखने कि प्रैक्टिस हो रही है..
    हमें तो यह प्यार भरी चुहल साफ़ नजर आ रही है.. :)

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  8. han mujhe bhi yahi lagata hai, ye to pyar ki nok-jhok hai jo bahot hi sundar hai bahot badhiya likha hai aapne maza aagaya ....



    arsh

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  9. इसी ऊटपटांगता का नाम ज़िंदगी है...

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  10. ahi hai zindagi utpatang si,bahut badhiya

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  11. इस स्क्रिप्ट को शूट करलें तब बताईयेगा. फ़िल्हाल स्क्रिप्ट लाजवाब लगी.

    रामराम.

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  12. ना जाने क्यों ये झगड़ा अच्छा लगा? बैशक काल्पनिक ही सही पर काल्पनिक कही ना कही सच भी होती है? ये तो एक दिन का था दूसरे दिन के झग़डे का इंतजार रहेगा। :-)

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  13. bahut achha feelings ka potrayal laga...

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  14. KAMAAL HAI !!!! KABHI APNE PROFILE MEn MAINE YE PAnKTIYAn LIKHI THIn :-
    *****A humanitarian in real sense of the world will be a feminist soon if he is not today. Me also. In theory and ideology and striving constantly to be in practice also. A pillion ride with a girl on a bike doesn’t hurt my male-ego nor do kitchen chores. Though I’m a bit lazy and shirk from work to an extent.*****

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