21 January, 2009

दर्द-ऐ लैपटॉप

मेरा लैपटॉप आजकल दर्दे दिल दर्दे जिगर हो गया है...बिल्कुल निर्मोही है, बिल्कुल ख्याल नहीं करता की बिना ब्लॉग्गिंग किए मेरा क्या हाल होगा। सारे webpages खोलता है बस ब्लॉगर देखकर ऐसे भड़क जाता है जैसे लाल कपड़ा देखकर सांड...ऐसा हैन्ग होता है जैसे कविता सुनकर चने के झाड़ पर चढा हुआ कवि...बस वही अटक के रह जाता है, नीचे उतरने का नाम ही नहीं लेता।

कितने मान मनुहार करूँ, बाज नहीं आता...सारे घर में झाडू पोछा हो या नहीं इसका स्क्रीन हमेशा साफ़ रखती हूँ, और तो और ब्रश लेकर keypad तक साफ़ करती हूँ...इतने प्यार से अपने डेस्कटॉप को रखा होता तो गुलामी करता मेरी और ये कमबख्त भाव खा रहा है।

उसपर दिल है की मानता नहीं...कितनी बार सोचा कि कॉपी पर लिख कर काम चला लूँ, आख़िर कलम पकड़े बरसों बीत जाते हैं, डायरी बस देखती है और आहें भरती है, उसे अपने हालात का पूरा अहसास है, बेचारी अब तो शिकायत भी नहीं करती। और एक जमाना हुआ करता था जब हमारी जान रहती थी उन जर्द पड़े पीले पन्नों में। कितने लोग ये सोचते सोचते उम्र गुजर देते हैं कि आख़िर उस डायरी में था क्या...अब पीडी को ही देख लीजिये और सब जानते हैं कि डायरी उड़ा कर पढने में जो मज़ा है वो लैपटॉप का पासवर्ड क्रैक कर के पढने में कहाँ। और हम जो ये भी नहीं जानते कि लड़कियां हिडेन फाइल बना कर अपने दिल कि बात लिखती हैं या नहीं...या पर्सनल ब्लॉग पर...इसके बारे में शायद हमें पता है।

इस मुश्किल से पिछली बार पाला पड़ा था तो लम्बी चौडी मुहिम छेडी थी बड़ी मुश्किल से टेम्पलेट बदल वदल के हालत कुछ काबू में आए थे...पर इस बार मुझे कोई उपरी चक्कर लगता है।

बरहाल मैंने कुछ उपाय सोचे हैं इस समस्या से निजात पाने को...आपको जो सही लगे कृपया वोट करें, जिस अन्स्वेर को मक्सिमुम वोट मिलेंगे हम वही करेंगे। आप अपने उपाय भी दे सकते हैं...कौन जाने किस उपाय से ये ब्लॉग्गिंग ठीक से होने लगे...

तो ये रहे ऑप्शंस
  1. बाल्टी में गुनगुना पानी लें, उसमें दो चम्मच सर्फ़ एक्सेल डाल दें अब इसमें लैपटॉप को तब तक डुबाये रखें जब तक उसमें लहरें न उठने लगें। ध्यान रहे लैपटॉप पूरी तरह पानी के अन्दर होना चाहिए।
  2. लैपटॉप को बालकनी से बन्जी जम्पिंग कराएं। इसके लिए आप लैपटॉप चार्जर कॉर्ड का भी इस्तेमाल कर सकते हैं वरना अलगनी पर की रस्सी भी चलेगी।
  3. लैपटॉप के ऊपर नीम्बू और मिर्चें लटकाएं।
  4. (और ये साउथ इंडियन तरीका बंगलोर आने के बाद inspired होकर )कीबोर्ड पर एक नारियल फोडें
  5. नया लैपटॉप खरीद लें :)
personally मुझे ५ नम्बर पसंद है :)
तब तक के लिए....इंतज़ार इंतज़ार और इंतज़ार :D

20 January, 2009

ख़त जो लिखे नहीं गए...



दोपहर के लगभग तीन बजे


डाकिया के आने का वक्त होता था


मैं रोज इंतज़ार करती थी


जाने कितने ख़त आने थे मुझे


अब uske रोज आने का सिलसिला तो ख़त्म हो गया है


इंतज़ार अब भी बदस्तूर जारी है...

13 January, 2009

दरख्वास्त

कहाँ दरख्वास्त दूँ...

खुदा के पास

मैं एक कतरा आवाज के लिए तरस रही हूँ

ऐसी खामोशियाँ क्यों लिख दी हैं

तकदीर शायद एक पन्ना है

फ़िल्म की तरह नहीं लिखी जाती

इसलिए कोई आवाज नहीं है...

बस एक खामोशी है

ए खुदा

मैं एक आवाज के कतरे के लिए तरस रही हूँ

तुम कब सुनोगे मेरी आवाज़?

06 January, 2009

मायका

एक शब्द है
जो माँ से बना है...मायका

सोचती हूँ
जब माँ ही नहीं है
तो मायका भी नहीं
तो क्या छूटेगा?

फ़िर दर्द क्यों
क्या शहर भी कभी मायका हो सकता है?
अगर चंदा मामा हो सकता है
तो...शायद हाँ

कुछ रिश्ते
अजन्मे होते हैं
जैसा उस शहर के साथ
जिसने इस बिन माँ की बच्ची को
सीने से लगाया...

मेरे शहर
तुम मेरे क्या हो?

05 January, 2009

समय के परे

साल के आने के एक दिन पहले
कुछ पुराने रिश्तों को एल्बम से उठाया
थोडी धूल लगी थी, झाड़ दी
और फ़िर से एल्बम उसी ताक पर रख दी
फ़िर जाने कितने सालों की धूल जमने के लिए...
कुछ रिश्ते ऐसे भी हैं...जिनमें बस मैं हूँ
साथ के लोग जाने कब का हाथ छोड़ कर जा चुके हैं
फ़िर भी
मैं तो हूँ...
और जब तक मैं हूँ...ये रिश्ते जिन्दा हैं।


नए साल में
कुछ नए रिश्ते
जाने कब हाथ पकड़ कर चलने लगे
मेरी मुस्कराहट में हंसने लगे
मेरे गीतों में ताल देने लगे
मेरे साथ हवाओं में उड़ने लगे

पुराने और नए साल के बीच
एक लम्हा था
जो न नया था न पुराना
उस लम्हे में मैंने तुमको देखा
और जाना...फ़िर से
तुम
न आए थे, न जाओगे
तुम बस हो
मुझमें...हममें।



मुझसे इतना प्यार करने का शुक्रिया...
तुमने कहा था न, इस साल मैंने तुम्हें कोई तोहफा नहीं दिया...साल की पहली पोस्ट तुम्हारे लिए.

24 December, 2008

नव वर्ष मुबारक हो...मैं चली छुट्टी मनाने

सबको मेरी तरफ़ से merry christmas and a very happy new year

ऐसा है की हम छुट्टी पर जा रहे हैं। एक हफ्ता...लगभग। ७ जनवरी को वापस आयेंगे...तब तक नया साल आ चुका होगा।

तो ऐसे भी कह सकते हैं कि अब एक साल बाद मिलेंगे। ३१ दिसम्बर के बारे में कुछ मजेदार लाइनें
  1. हम कहते थे कि आज नहा लो, नहीं तो साल भर बिना नहाये रहना पड़ेगा।
  2. आज झगड़ा किया है तो मना लेना जरूरी है, वरना वो साल भर रूठा रहेगा...और जाहिर है साल भर बहुत लंबा अरसा होता है। तो हम अपने झगड़े आज सुलझा लेते थे। अगर मेरी किसी बात से कहीं किसी को कोई दुःख हुआ है तो इसी साल मान जाइए...मैं please भी कह रही हूँ
  3. रात को पढ़ाई नहीं करते थे, बड़ा मज़ा आता था, जैसे कि साल भर वाकई पढ़ाई से छुट्टी हो।

बाकी अभी कुछ याद नहीं आ रहा, फ़िर कभी लिखूंगी।

वैसे आज मेरे बारे में राजस्थान पत्रिका में एक article आई थी। सोचा आपको भी लिंक दे दूँ।

आप उसे यहाँ पढ़ सकते हैं। आशीष जी को हार्दिक धन्यवाद.

23 December, 2008

एहतेशाम...ईद...और वो चाँद

आज बस एक खूबसूरत शाम का जिक्र...

हमें IIMC छोड़े लगभग एक साल हो गया था, नई नई जॉब में सब बिजी थे...हफ्ते में एक भी दिन छुट्टी नहीं मिलती थी। ऐसे में दोस्त हैं, जेएनयू है या गंगा ढाबा नाम की किसी जगह को हम भूल चुके थे। और ये लगभग सबकी कहानी थी, मैं भी कभी कभी अगर PSR जा भी पाती थी तो अकेले डूबते सूरज को देख कर चली आती थी।

ऐसे में ईद आई और साथ में एहतेशाम का न्योता की तुम्हें आना है, और सबसे पहले आना है और सबसे देर से जाना है। वो मेरा बहुत प्यारा दोस्त है , न बोलने का कोई सवाल ही नहीं उठता था। उस दिन ऑफिस में बड़ी मिन्नत कर के मैं ७ बजे भागी थी वहां से। एहतेशाम के घर पहुँची तो एकदम कॉलेज के दिन याद आ गए, सारे लोग वहां थे, एक एक दोस्त।

वो ईद मेरी जिंदगी की सबसे खूबसूरत ईद थी, गई तो देखा एहतेशाम और राजेश ने मिल के बहुत ही बढ़िया सेवैयाँ बनाई थी, और साथ में कबाब और पनीर टिक्का। साथ में शायद रूह अफजा था, मुझे याद नहीं...याद है की कितने प्यार से जिद कर कर के हमने सब को खिलाया था। उस दिन मुझे एक प्रोजेक्ट पर भी काम करना था, पर शुक्र था की मेरा बॉस भी ईद मनाने गया हुआ था, उसने कॉल किया की पूजा काम की हो...मैंने डरते डरते कहा की मैं ईद मना रही हूँ, काम कैसे करुँगी। और उस दिन हमारे बिग बॉस यानि सीईओ का फ़ोन आने आला था मुझे, काम की प्रोग्रेस देखने के लिए मैंने पूछा की सर कॉल करेंगे तो क्या कहूँगी...और मुझे यकीं नहीं हुआ, उसने कहा की फ़ोन काट देना, पिक मत करना। और मैंने ऐसा ही किया।

देर रात तक किस्से चलते रहे, सबने अपने अपने ऑफिस की कहानी सुनाई जो की कमोबेश एक ही जैसी थी, फ्रेशेर होना शायद एक जैसा ही होता है। धीरे धीरे सब आपने अपने खेमे में बढ़ने लगे, पर मैंने वादा किया था की सबसे आख़िर में जाउंगी...तो निभाया।

मुझे आज भी ईद पर वो रात याद आती है...सड़क पर चलते हुए चाँद देखना। उस दिन एहतेशाम बहुत अच्छा लग रहा था, उसे कुरते में पहली बार देखा था। उस दिन जिंदगी थोडी अपनी सी लगी थी... लौटते हुए जान रही थी की शायद ऐसी ईद अब कभी नसीब नहीं होगी...पर फ़िर भी दिल ने यही दुआ मांगी चाँद को देख कर। खुदा ये दोस्ती सलामत रखना...ये ईद सलामत रखना। कहीं और नहीं तो मेरे दिल में वो रात आज भी जिन्दा है...साँसे लेती है, ख्वाब देखती है।

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