18 September, 2026

Send me your co-ordinates, love

जियोग्राफी। जानलेवा चीज़ होती है। 
तुम्हें मालूम, तुम्हारे घर के पंद्रह मिनट के रेडियस में सबसे ज़्यादा दुखता है तुम्हारा न होना। मुझे अभी तक लगता था, शहर में तन्हा होना सबसे उदास बात है। लेकिन तुम मिले तो महसूस हुआ। शहर में तुम्हारे होते तन्हा होना सबसे ज़्यादा उदास बात है। चाह के भी तुमसे नहीं मिल पाना…एक नियत दूरी पर रहना। ये नियत दूरी कैसे तय करते हैं। कितने पास आने पर तुम क़रीब महसूस होने लगते हो?

ऐसे कैसे अचानक से कोई हो जाता है, ऐसे मन, प्राण, आत्मा में उलझा हुआ! मेरे सॉफ्टवेर में इतनी गड़बड़ क्यों है? ये मोह या कि अटैचमेंट सिर्फ़ मुझे क्यों होता है? क्यों होता है किसी के लिए भी आसान मुझसे एक सेफ़ डिस्टेंस बनाए रखना? मुहब्बत की इस सरज़मीं पर से रोशनी की कोई किरण बाहर क्यों नहीं निकलती…ये कैसा कमबख़्त ब्लैक होल है।

पूरे शहर की सड़कें बौखते हुए इतना तो समझ आ गया कि दिल तुम्हारा इंतज़ार करना बंद नहीं कर सकता। आज इक नई जगह, नई सीट पर बैठी थी। यहाँ सामने फ्लाइओवर था। काँच के ऊपर ब्लाइंड्स लगे थे। तो दिख कुछ नहीं रहा था, लेकिन फ्लाइओवर से उतरती गाड़ियों की रोशनी दिख रही थी। ये सारी गाड़ियाँ मेरे दिल से गुज़र रही थीं, दोस्त। जैसे श्रोडिंगर के एक्सपेरिमेंट में वो बिल्ली ज़िंदा और मरी हुई एक साथ थी और ये पता लगाने का कोई तरीका नहीं था…उसी तरह इन सारी गाड़ियों की धुँधली कार लाइट्स में कोई सी भी तुम्हारी गाड़ी की हो सकती थी। है नहीं, डेफिनिट नहीं कह सकते। जाने तुम कहाँ पर हो…जाने तुम्हारे जाने-आने का रास्ता कौन सा है। लेकिन हमने तो उन शहरों में भी उन लोगों का इंतज़ार किया है, जहाँ उनके होने का कोई मतलब नहीं बनता।

मैंने कभी इस तरह से चेन स्मोकिंग नहीं की है। अभी भी इतनी सिगरेट पीने का कोई तुक नहीं है। इन फैक्ट, ज़िंदगी बहुत बेतुकी हो गई है। कुछ लॉजिक काम नहीं कर रहा है। हम तो वैसे भी बेहद इलॉजिकल इंसान रहे हैं। लेकिन तुमसे मिल कर थोड़ा और बेवजह की बातें करने और सोचने लगे हैं। ज़ुबान कड़वी रहती है दिन भर। प्यास लगती रहती है। भूख नहीं लगती। ख़ुशी नहीं होती। मन पर उदास काले बादल उमड़ते घुमड़ते रहते हैं। तुम चले गए हो। और मैं तुम्हें पुकार नहीं सकती। पिछली बार पुकारा था तो तुम नहीं आए थे।

शहर की सारी सफेद गाड़ियाँ तुम्हारी ही कार हैं। मुझे न मॉडल्स पहचान में आते हैं, न नंबर याद है। सारा सफेद रंग तुम्हारा। हँसता हुआ हर शख़्स तुम्हारे जैसा दिखता है।

दिल कमबख़्त। इंतज़ार करना बंद नहीं करता। मैं इस पैटर्न से थक गई हूँ। आज बहुत देर तक समझ नहीं आया कि करूँ तो क्या करूँ। पूरा शहर तुम से भर गया है। हर तरफ़ सिर्फ़ तुम दिखायी देते हो, मेरी तरफ़ आते आते कहीं और चले जाते हुए। बताओ, हम अपने आप को इतना दुख क्यों देते हैं? तुम्हारे आने का कोई वादा नहीं, फिर भी इंतज़ार ख़त्म ही नहीं होता। एक टाइम बॉम्ब लगा हुआ है सीने के भीतर…उसकी टिकटिक किसी wrecking बॉल की तरह दिल की दीवारों पर धाड़-धाड़ लग रही है। बहुत कुछ टूट रहा है भीतर। बहुत कुछ दुख रहा है भीतर।

अच्छा ये है कि तुम इमेजिनरी हो…कहानी का नया किरदार। पर तुम्हारा इंतज़ार दुखने लगा है। तुम एक रोज़ आए क्यों? कैफ़े में उस सीट पर एक बहुत प्यारा सा कपल बैठा है, जहाँ पिछली बार हम बैठे थे। मैं आई थी तो वो सीट खाली थी, वो कैफ़े की मेरी सबसे पसंदीदा सीट है। लेकिन वहाँ अकेले बैठने का मन ही नहीं किया।

तुम सो गए होगे। तुम्हारे जीवन के प्रैक्टिकल दुख हैं। रोज़गार हैं। मेरी तरह दिन भर याद में घुलना तुम अफोर्ड नहीं कर सकते। मुझे लेकिन पागलपन के सिवा कुछ आता नहीं। मैं तुम्हारे कपड़ों के रंग में घुल रही हूँ। सफेद, पीला, नीला और काला। अभी तो मैंने तुम्हें रेड में नहीं देखा है। इक रोज़ मुझसे मिलना, ड्रेस शर्ट पहन कर। मैं एकदम सुर्ख साड़ी पहन कर आऊँगी तुमसे मिलने। मैचिंग कपड़े पहन कर चलेंगे लाँग ड्राइव पर…पर इस बार शहर की सड़कों पर नहीं, सीधे चाँद पर चलेंगे, ओके? तुम अपना एस्ट्रोनॉट सूट रखना मत भूलना। मैं अपना स्पेस रॉकेट लेकर आऊँगी। लेकिन प्रॉमिस करना होगा, रॉकेट उड़ाते समय बेवकूफ की तरह मुझे चूम नहीं लोगे…जैसे कि कितनी ना मुहब्बत है तुम्हें। स्पेस में थोड़ा सा भी भटक गए तो चाँद की जगह किसी धूमकेतु पर लैंड कर गए तो! साथ में रसद बहुत ज़्यादा नहीं है स्पेसशिप में…इतना तो तुम्हें भी मालूम है.

मैगी वैगी की ज़िद मत करना…लिक्विड ही लेकर जाते हैं। थोड़ी ब्लैक कॉफ़ी, थोड़ी नींबू की चाय। और चलो, तुम्हारा दिल रखने की ख़ातिर थोड़ा सा आलू पराठा भी पैक कर लेंगे। खुश?

यार तुम्हारी खुशी की इतनी परवाह क्यों है मुझे? जब कि तुम्हारी ख़ुशी को मुझसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। तुम्हारी यही बात तो सबसे अच्छी लगी थी मुझे। इन दिनों ख़ुश लोग दिखते कहाँ हैं! सालों बीत गए थे किसी को बेवजह हँसता हुआ देखे। मुझे लगा थोड़ी सी तुम्हारी हँसी मैं भी अपनी साड़ी के अंचल में गाँठ लगा कर रख लूँगी। ख़ुशी के सिक्के ढलते हैं, तुम्हें तो मालूम ही होगा।

इतने दिन तो तुमसे मिली भी नहीं हूँ, जितने दिन तुमसे न मिलने पर दुखती दुखती बौरा रही हूँ शहर के एक छोर से दूसरे छोर। माना सुख और दुख का हिसाब बराबर से नहीं होता। मुहब्बत का भी नहीं। दोस्ती का भी नहीं। असल में हिसाब किसी चीज़ का ठीक से इसलिए नहीं होता कि मुझे हिसाब समझ में आता ही नहीं।

शायद नाइन्थ में थी, जब चश्मा लगा था। याद नहीं ठीक से। पर स्कूल में नॉर्मली चश्मा सारे टाइम पहनने की जरूरत नहीं होती थी। या होती होगी, याद नहीं है। कॉलेज तक भी सारे टाइम चश्मा नहीं लगाती थी। फिर किसी समय पॉवर थोड़ा ग़लत चश्मा पहनने के कारण बढ़ गया। तो फिर चश्मा लगातार पहनने लगी हूँ। अब तो इतने साल हो गए, सुबह उठते साथ अंधे की तरह टटोल कर पहले चश्मा पहनते हैं, तब जा कर कोई भी और काम कर सकते हैं।

आज समझ में आया, दिल तुम्हारा इंतज़ार करना बंद नहीं करेगा। न आँखें तुम्हें तलाशना। तो फिर मैंने चश्मा उतार दिया। पिछले कई घंटों से दुनिया में कुछ भी नहीं दिखा है। लेकिन पिछले कुछ घंटों से कुछ दुखा भी नहीं है। कुछ दिख ही नहीं रहा तो हर आते-जाते व्यक्ति में तुम्हारा कुछ न कुछ खोजना बंद कर दिया मैंने। सिगरेट पीते हुए कई बार लगा फिसल कर गिरूँगी। ज़मीन समतल तो है नहीं। उसपर बदन में इतनी हरारत है कि ठीक ठीक बैठ नहीं पा रही किसी एक जगह पर। बहुत हिसाब से एक एक कदम रखते हुए टहलती रही। कितनी सिगरेट यार, कितनी सिगरेट।

जितने लोगों को जानती हूँ, सब के पास इसी तरह सब्र होता है। ज़ब्त भी।

बस, मेरे पास नहीं होता। मेरे पास ऑब्सेशन होता है। मुहब्बत होती है। मोह होता है। लगाव होता है। एडिक्शन होता है। विथड्रावल सिम्पटम्स होते हैं। 

तुमने क्यों रोका मुझे?

जाता हुआ तूफ़ान अपनी और खींच लिया और फिर रास्ते से हट गए। अब मैं क्या तबाह करूँ? तूफ़ान की फ़ितरत होती है कुछ न कुछ तोड़ने की…उस रोज़ से अपने भीतर तोड़फोड़ मचा रही हूँ। बिखर रही।

न लौट पा रही, ना आगे बढ़ पा रही।
मैं एक ठहरा हुआ तूफ़ान हो गई हूँ। एक बिंदु पर। कॉन्सेंट्रेटेड। इंटेंस। मैड।
And in love.

और तुम।
थिर हो। निष्ठुर हो। rational हो। मुझे ज़्यादा समझदार हो।

और हम।
Imaginary हैं। 

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