लाल तो खतरे का निशान होता है। लाल रंग देख कर रुकना चाहिए या तेज़ी से गुज़र जाना चाहिए? ट्रैफिक लाइट रेड हो तो रुकना चाहिए, इसलिए उसे सड़क किनारे सिगरेट पीता देख कर रुक गया। उसकी गाड़ी की इमरजेंसी लाइट्स जली हुई थीं। रात के डेढ़ दो बजे गाड़ी ख़राब होने पर ही कोई सड़क किनारे रुकेगी…लेकिन फिर ये सिगरेट क्यों फूंक रही है, गाड़ी ठीक करने की कोशिश क्यों नहीं कर रही?
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रात का इतना ही याद था कि कोई थी। शायद थी।
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ये ख़त सच का था। टैंजिबल। इतना ही रियल जैसे वो लगी थी। कुछ तो अजीब था उसके साथ। धुआँ धुआँ लगती थी। बिछड़ते हुए कहती है, ‘give me half a hug’. ये हग का आधा-पूरा हिसाब क्या होता है? लेकिन उसके गले लग के ऐसा लगा बदन से आत्मा निकलते हुए आख़िरी कोई चीज़ छुई हो। धरती पर का आख़िरी विदा।
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“तुम्हारे पाँवों के निशान चुन, इन से तेज खुखरियाँ बना ली हैं। इन्हें एक एक कर के चुभोया है कलेजे में - लहू रिसता है तुम्हारी गौर मौजूदगी से - absence, you know — नहीं, शायद। तुम्हें मालूम नहीं होगा। लेकिन ये इल्ज़ाम नहीं है। ये मुहब्बत का ऐक्सेप्टेंस लेटर है। You are appointed my muse, officially. Sorry for this! मेरे इस कमबख़्त दिल पर मेरा ही ज़ोर नहीं चलता। ये नासमझ, मर-मिट जाएगा तुम पर और मैं कुछ नहीं कर पाऊँगी। इस अल्टरनेट दुनिया में तुम्हारा स्वागत है। कहानियों की इस दुनिया में सब कुछ झूठ है। सिवाए तुम्हारे। कुछ चीज़ें तुम चुन सकते हो लेकिन, जैसे कि तुम्हें किस नाम से बुलायें…Darling, Sweetheart, Love, Sunshine, या कि बस तुम्हारे नाम से?”
Signed, Forever yours,
A
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बाक़ी बातें कहाँ हो रही थीं, ये मालूम नहीं…मन के भीतर…आसमान में…ज़िंदगी और मौत के बीच कहीं, नहीं मालूम। बस, इतना मालूम था कि वो थी।
मैंने पूछा उससे, सीधे ही…“और मेरा इसमें कोई रोल नहीं है? मुझे क्या करना होगा?”
“यही दिक्कत है। तुम्हें कुछ नहीं करना है…यानी, कर लो, तुम्हारा दिल करे तो…कोई ज़ख़्म देना हो, कोई उलाहना या कि कोई दुखती सी बात कहनी हो, तो चलेगा…लेकिन कुछ ना भी करो तो भी ये दिल इस लायक है कि पूरी कहानी बना लेगा तुम्हारे इर्द-गिर्द ख़ुद ही। तुम चाहो तो कभी कभार मेरे मुस्कुराने को एक आधी बात कर ले सकते हो प्यार से। वरना यूँ भी, कहानियाँ एब्सेंस के इर्द गिर्द ही रची जाती हैं। तुम्हारे होने से तो ज़िंदगी होती। तुम्हारे न होने से कहानी। मुझे चुनना होता, तो मैं भी कहानी ही चुनती। क्या है कि मुहब्बत की एक्सपायरी डेट होती है। हर मुहब्बत इक रोज़ चुक जाती है। मुकम्मल मुहब्बत तो हमेशा ही…लेकिन कहानी, वो एलआईसी पालिसी है जो ज़िंदगी के साथ भी, ज़िंदगी के बाद भी बनी रहती है।”
“मैं एलआईसी पालिसी हूँ?”
“हाँ, कहानी को भी भरोसा चाहिए होता है ना…कि लोग उसे भूल नहीं जायेंगे, किरदार के प्रेम में पड़ के।”
“तुम काफ़ी अजीब बातें करती हो।”
“Good word choice, strange, not scary. तुम्हें डर तो नहीं लगता ना?”
“डर? क्यों...किस बात से डरना चाहिए मुझे?”
“कहानियों की दुनिया में इस दुनिया के नियम काम नहीं करते। तुम ख़ुद को वहाँ देखोगे तो पहचान भी नहीं पाओ शायद। ख़ुद की पहचान बदले जाने से कुछ लोगों को डर लगता है। सिर्फ़ वे लोग, जिन्हें अपने वजूद को लेकर यकीन पक्का नहीं है। जिन्हें लगता है उनके मर जाने के बाद भी लोग उनके बारे में बुरी बातें न करें। सिर्फ़ अच्छी बातें करें।’
‘तो ये तो नार्मल है ना, किसी के मरने के बाद बुरी बातें करने से क्या फ़ायदा, कोई वापस से उन चीज़ों को सुधारने तो आयेगा नहीं। तो अच्छी बातें याद रखना ठीक है ना। हम कितनी खूबसूरत चीज़ों के बने हो सकते हैं।”
“होता तो कोई भी अच्छी-बुरी चीज़ का बना हुआ, लेकिन तुम्हारी बात है तो तुम जादू के बने हो। तुम्हारी ये मुस्कान, disarming भले है, लेकिन dangerously fatal भी है।”
“इतने खतरनाक अडजेक्टिव्स! समझाओ जरा ठीक से। सिंपल सी मुस्कान को तुमने ऐसे मेटाफर में लपेट दिया कि मैं ख़ुद नहीं मानूँगा कि मेरे बारे में कह रही हो।”
“समझाते हैं, शुरू से शुरू करते हैं। देखो, लिखने के लिए एक muse चाहिए होता है। तुम मेरे लिए कच्ची मिट्टी हो। भुरभुरी। ऐसे ही नहीं बन जाता है क़िस्सा। उसके लिए पहले तुम्हें तैयार करना पड़ेगा। मिट्टी को सबसे पहले तोड़ते हैं…धुरमुस समझते हो?”
“जिससे मजदूर लोग मिट्टी को बराबर करते थे, वही?”
“हाँ…वही। लेकिन किरदार को धुरमुस से नहीं तोड़ते…बाँहों में भर के तोड़ते हैं। सुनने में लग भले अच्छा रहा होगा…लेकिन दुखेगा पूरी तरह…भयंकर…तुम जितना इमेजिन नहीं कर सकते, उतना।”
“हेल्प me इमेजिन, तुम्हारे पास इतने मेटाफर हैं…कैसा लगता है, किसी लेखक की बाँहों में टूटना? कोई तो इमेजरी होगी ही तुम्हारे पास”
“मैं कहती नहीं, लेकिन तुमने पूछा है तो ठीक है। तुम्हें तुम्हारी दुनिया के प्रतीकों में समझाती हूँ। बहुत साल पहले, किसी रोज़ तुमने सोचा होगा, दिल के ज़ख़्म को बराबर ठीक करने के लिए जिम जाना चाहिए, ठीक?”
“ठीक।”
“तुमने ट्रेनर को कहा होगा। पहली बार आए हो। पूछा होगा, कितना दुखेगा। पढ़ा भी होगा, इंटरनेट पर, कि कितना दुखेगा। लेकिन याद करो, फर्स्ट leg day। जब मसल्स एकदम एक एक सेल टूटा टूटा लग रहा था। जैसे धागे टूट गए हों। उलझ रहे हों। कोई भी चीज़ बनाने के पहले तोड़नी पड़ती है। मसल्स भी बनने के पहले टूटते हैं। पहले रोज़ का दर्द याद आया?”
“सिर्फ़ उतना दुखेगा? वो तो मैनेज कर लूँगा मैं।”
“सिर्फ़ उतना नहीं, उसके कई गुना ज़्यादा। ये सोचो, तुम्हारा पूरा वजूद इसी तरह धागों से बना हुआ है। ये सारे धागे तोड़ कर बारीक मिट्टी बनाना है। छलनी से छन जाओ, इतना। बारीक।”
“ऐसी कैसी बाँहें हैं तुम्हारी, कि बाँहों में भर के तोड़ दोगी और भुरभुरी मिट्टी में बदल जाऊँगा!”
“समझा तो कहानी में भी सकती थी, लेकिन ऐसे ही दिनों के लिए शायरों ने लिख रखा है, ऑलरेडी…तो मैं सिर्फ़ रिपीट कर देती हूँ…जौन एलिया साहब कहते हैं…
कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे
जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होगे
यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का
वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे”
“ये तो बहुत खतरनाक शेर है, क़यामत बाँहें तो उफ़्फ़ लग रही सुनने में…ऐसा होता है क्या? इसलिए तुमने half a hug मांगा था, आधा-आधा मरे हैं तुमसे मिल कर। पूरा हग माँगती, और ऐसे ज़ोर से हग करती तो पूरा मर जाता क्या मैं?”
“डर लग रहा है?”
“थोड़ा सा, लगना तो चाहिए भी ना?”
“वो तो तुम जानो, हम क्या कहें.”
“आगे की प्रोसेस सुनने में घबराहट हो रही है…”
“सुनने में घबराहट? ग़ज़ब लड़के हो…एक सौ बीस की रफ़्तार से गाड़ी चल रही होती है, उसमें चूमने में डर नहीं लगता और एक शेर सुन कर घबरा रहे हो।”
“अरे, झूठी राइटर…मैंने कब चूमा तुम्हें चलती गाड़ी में…उसमें भी इतनी तेज चलती गाड़ी में! कुछ भी लिखोगी तुम, अरे, तुम्हारी दुनिया में झूठ की कोई मियाद, बाउंड्री है भी या नहीं?”
“झूठ की सबसे अच्छी बात है कि हनुमान जी की तरह है, सुरसा के मुँह के आकार के हिसाब से कितना भी बड़ा हो सकता है…फ़ैल सकता है पूरे आसमान जितना…दुनिया भर की सड़कें नाप लूँ और ख़त्म न हो मुहब्बत या कि तुम्हें चूमने, तुम्हें छूने की इच्छा…नेरूदा कहते हैं, Love, how many roads to obtain a kiss, इतनी होती है मुहब्बत और ऐसे ही फैलाया जाता है झूठ का साम्राज्य… या कि जैसा जिगर मुरादाबादी साहब कहते हैं
इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है
सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है”
“तुम अकेले जान लेने आती हो, ऐसा सोचा था मैंने…अपने साथ दो भाषाओं के शायरों और कवियों की पूरी फौज लेकर तुम मेरी रियलिटी पर धावा बोलोगी, ऐसा पहले बताना चाहिए था ना?”
“तो तुम्हें किसने रोका है, तुम अपने साथ फ़िलॉस्फ़र्स की पूरी फौज ले आओ…साइंटिस्ट्स, रेशनलिस्ट्स…और तुम्हारे सारे दोस्त, पुराने आशिक़, भाई-बहन-माँ…मतलब पूरा परिवार जो तुम्हें कह रहा होगा, ये लड़की खतरनाक है…इससे बच कर रहना। कि मुहब्बत फ़र्ज़ी है…कि एक लेखक की पूरी दुनिया इमेजिनरी है, उसमें तुम्हारी-मेरी कोई जगह है ही नहीं…हो ही नहीं सकती…कि तुम दूर रहो मुझसे…कि भूल जाओ मुझे…बहुत कुछ मिलेगा पढ़ने को…कई सारी थ्योरीज हैं मुहब्बत के ख़िलाफ़…यूँ देखो तो पूरी दुनिया मुहब्बत के ख़िलाफ़ मिलेगी तुम्हें…एक तरफ़ सिर्फ़ हम हैं…हमारा दिल है, हमारी स्याही और कोरा काग़ज़ है…हमारा दिल है, जो तुम्हें बिना कुछ मांगे प्यार कर सकने की कूवत रखता है…एक पूरी दुनिया अपने साथ लिए चलता है, तुम्हारे साथ या तुम्हारे बगैर भी…तुम लेकर आओ अपने लोग, उनके जुमले, उनके लॉजिक, उनके पुराने अनुभव…तुम्हें पूरा अधिकार है कि तुम अपना असला-बारूद जुटाओ। ये युद्ध है…और मेरी जान, एवरीथिंग इस फ़ेयर इन लव एंड वॉर।”
“मैं सब कुछ ले भी आऊँगा तो तुम्हारे जैसा सिपहसालार कहाँ से लाऊँगा? तुम्हारे जैसे शार्प-शूटर्स…तुम्हारे जैसे शब्दभेदी बाण चलाने वाले योद्धा…तुम्हारे नावक के तीर कि जो हर जिरहबख़्तर भेद दें।’
‘ओह्हो, सतसैय्या के दोहे…यार तुमने तो दिल जीत लिया दुबारा से…लायक हो तुम, कि तुम्हारा दिल-विल तोड़ा जाये…तुम्हारे इर्द-गिर्द दुनिया रची जाये…तुम्हारी मिट्टी में पानी टिकेगा…’
“पहले तो आदमी से मिट्टी बना दिया तुमने। उसपे पानी टिकेगा…उफनती बाढ़ की तरह आई हो। कभी शायरी कहती हो, कभी हाफ ए हग माँगती हो अब मिट्टी बना दिया…दफ़नाओगी क्या अब?”
“नहीं, इतना जल्दी नहीं। पहले समझा देती हूँ, देखो क्या है, कि मुहब्बत की तासीर हर बार अलग अलग होती है। और तुम हो, आर्सेनिक। ग़ज़ब टॉक्सिक है तुम्हारा होना। यूँ समझो रेडियोऐक्टिव मटेरियल और आर्सेनिक का ब्लेंड हो तुम। पता है, मैडम क्यूरी ने रेडियोएक्टिविटी की खोज की थी, इसलिए उन्हें मालूम ही नहीं था, ये कितना घातक है उनके लिए। अभी भी उनके बनाए नोट्स एक लेड के बॉक्स में रखें हैं। उनके चारों तरफ़ बेहद टॉक्सिक रेडियोऐक्टिव मटीरियल्स रहते थे।”
“ये सब तो पता है शुरुआत में ही टॉक्सिक, उफ़्फ़, इतना बुरा हूँ तुम्हारे लिए तो ख़ुद से अलग क्यों नहीं कर देती? ये रेडियोएक्टिव नोटबुक में क्यों लिख रही हो कहानी। आख़िर को तुम्हारी भी तो जान जा सकती है।”
‘मेरी जान का कोई मोल नहीं। कहानी के लिए कुछ भी कर सकती हूँ, टॉक्सिक मटेरियल पचा जाना भी। आर्सेनिक ज़हर था, लेकिन लगभग उन्नीसवीं शताब्दी में कुछ औरतों ने रोज़ाना आर्सेनिक खाया ताकि उनकी त्वशा पारदर्शी चमकदार दिखे, पोर्सिलेन की तरह। सुंदरता के लिए मृत्यु एक छोटी क़ीमत नहीं है?”
“मृत्यु तो सबसे छोटी क़ीमत है, किसी भी चीज़ के लिए। भारी कीमत तो जीवन है। जीना है…तुम्हें मुझसे पूरी कहानी चाहिए, मिट्टी बना कर शुरुआत की है…आगे का बताओ…कितना कुछ होना पड़ेगा?”
“मुझे लगता नहीं है तुम से कुछ भी माँगने का अधिकार है मेरा…तुम, leave me alone, पर हो, जहाँ एक मेसेज, एक वॉइस नोट, एक फ़ोन कॉल, एक मुलाक़ात तक तुम्हें मुश्किल लगती है। और मैं सब कुछ इमेजिनेशन से बना तो लूँ, लेकिन फिर इस कहानी में मैं चुकती जाती हूँ, धीरे धीरे। थोड़ा थोड़ा कहानी ख़त्म होती है तो मैं भी ख़त्म होते जाती हूँ। तुम थोड़ा थोड़ा मिलो, तो कहानी थोड़ी थोड़ी बढ़े। मैं कहानी ख़त्म करने के बावजूद थोड़ी सी बच जाऊँ, ऑलमोस्ट फिनिश्ड। लेकिन थोड़ा सा बचा रहे। फिर से किसी कहानी को लिखने लायक हिम्मत रहे, इसलिए लिए बहुत थोड़ी सी मुहब्बत चाहिए। थोड़ी सी केयर। बहुत थोड़ी सी। बहुत गहरी और दुखती हुई याद के बाद, एक छोटी सी मुलाक़ात। एक प्लेट बाँटी हुई मैगी। एक बॉटल जूठा पानी। एक गाना गुनगुनाते हुए तुम। एक सिगरेट जो तुमने जला दी हो। इतना ही चाहिए। ये मिल जाएगा तो थोड़े से बच जाएँगे हम। वरना फिर से लिखने की हिम्मत करने में शायद अगला जन्म लग जाये। कहानी बदन से नहीं लिखते ना, उसमें जान डालने के लिए आत्मा ही चाहिए, लेकिन साबुत नहीं। वरना चुभेगी। आत्मा का पूरा चुरा बनाना होता है। जैसे तुम्हारे बदन को पीस कर मिट्टी बना रही ना, वैसे ही…”
“तुम बार बार मेरे बदन तक क्यों लौटती हो…मिट्टी तक…”
“तुम्हारी आत्मा तो माँग नहीं सकती…उस पर किसी का कोई अधिकार नहीं होता…और कहानी में जब तक आत्मा नहीं हो, जान नहीं आती…फिर, कहानी की आत्मा भगवान तो बना कर भेजते नहीं ना, अपनी ही आत्मा इस्तेमाल करनी पड़ती है।”
“तो फिर करो आत्मा का इस्तेमाल, दिक्कत क्या है…”
“यार, दिल टूटने से डर लगता है. I’m not like other girls.”
“अच्छा, कैसे?”
“मेरा दिल टूटता है तो I am never clueless, कि ओह, दिल टूट गया, इसका करते क्या हैं। टूटे हुए दिल का एक ही काम होता है, उससे कहानी लिखते हैं। दिक्कत सिर्फ एक है, कि तुम्हारे जैसा एकदम बहुत ही प्यारा, क्यूट और ऐसा किरदार मिल जाये जिसका दिल तोड़ने में मेरी आत्मा कचक जाये, तो उसका एक ही अंजाम होता है, क़त्ल!”
“What the actual fuck! You are going to kill me in the end? तो फिर इतनी मुहब्बत से क्यों बात कर रही थी मुझसे?”
“तुम्हारा दिल रख रही थी। तुम मर चुके हो अभी। ये सब अफ़्टरलाइफ़ वाली जगह घट रहा। हम टाइमपास कर रहे जब तक चित्रगुप्त तुम्हारा हिसाब-किताब कर रहा है।”
“तुम मज़ाक़ कर रही हो!”
“नहीं। तुम सच में, उसी मोमेंट मर गए थे जब तुमने मुझे पहली बार देखा था। रोड एक्सीडेंट केस। इतनी देर तो मैं भगवान से जिरह कर रही थी, तुम्हें वापस भेज दे…कि तुम बहुत अच्छे लगे थे मुझे। That I want you for a story.”
“तुम मेरे लिए भगवान से जिरह कर रही थी? क्यों?”
“कॉम्प्लिकेशन हो गई थी।”
“कॉम्प्लिकेशन?”
“तुमसे मुहब्बत हो गई थी। गहरी वाली। इश्क़ वाली। जिसमें दो तीन जन्म इन्वॉल्व करने का मन करने लगा था।”
“तो कर लो, सब कुछ तो तुम्हारे हाथ में ही है ना?”
“अरे कर लेती, तुम बेवकूफ हो इतने, तुमसे पूछा तो था, Can I call you darling?”
“हाँ तो, उसमें क्या दिक्कत थी?”
“कहानी में मज़ा नहीं आ रहा था।”
“कहानी में मज़े के लिए तुम मर्डर कर दोगी! आख़िर क्या हो तुम?”
“Firstly a writer, secondly a lover…and lastly…finally, human.”
‘I was dead all along?’
‘All along!’
“I fucking HATE you!’
“My goodness, all caps…गाली वो भी इंग्लिश में…awww, so cute!”
“Leave me alone.”
“With pleasure, my muse, my darling…peace…I don’t talk to ghosts. Wish you all the best in afterlife. OVER AND OUT!”
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