27 November, 2008

शोक, क्षोभ, क्रोध

वो आयें

अपनी योजना बनाएं

और जहाँ मन करे विस्फोट कर दें

लोगों को बंधक बना लें

मांग करें आतंकवादियों को रिहा करने की

घंटों फायरिंग करें, ग्रेनेड फेकें

हमारे एक एक करके जवान शहीद हों

और मीडिया फ़िर से चीख चीख कर कहे

ये भारत पर अटैक है

और हमारे जवानों की सारी स्ट्रैटेजी टीवी पर दिखा दे

ताकि उन्हें मालूम होता रहे की जवाबी हमला कैसे होने वाला है

कहें की मुंबई रूकती नहीं, डरती नहीं

मगर क्या उपाय है...घर में बंद हो जाएँ

चूल्हा कैसे जलेगा

मैं दिन भर बस परेशान रह सकती हूँ

प्रार्थना कर सकती हूँ

इश्वर सबकी रक्षा करे

क्योंकि अब अपने ही देश में हम सुरक्षित नहीं
मैं न आर्मी में हूँ, न पुलिस में

ऐसी परिस्थिति में मैं कुछ नहीं कर सकती

कोई उपाय नहीं समझ आता इनसे मुकाबला करने का

खून खौल उठता है

ऐसा कुछ नहीं है जो मैं कर सकूँ

तो मैं क्या बस कविता लिखूँ?

26 November, 2008

एक शाम




आलसी चांद
आज बहुत दिनों बाद निकला
बादल की कुर्सी पे टेक लगा कर बैठ गया
बेशरम चाँद
पूरी शाम हमें घूरता रहा

लाज से लाल चेहरा...
संदली शाम में घुलता रहा
गुलाबी सितारे आँख मिचौली खेलने लगे

सारी शाम वो घास खोदता रहा
ग्लेशियर से जिस्म पिघलते रहे
मिट्टी में छोटी छोटी नदियाँ बहने लगीं

खिलखिलाती गुनगुनाती...
छोटी छोटी फ्राक पहने हुये लड़कियाँ
अंगूठा दिखाकर चिढ़ाती रही

मैं तितलियों के पीछे भागी बहुत
वो उंचे आसमानों में जाती रहीं
चाँद भी मुट्ठी से फिसलता रहा


अंजुरी में उठा कर तुम्हारा अहसास
मैं पलकों पे होंठों पे रखती रही
तुम जाने कहॉ खोये खोये रहे


पुरवा तुम्हारी बाहें बन कर
मेरी मुस्कुराहटें दुलराती रहीं
आँख भीगी भीगी रही

लबों पर धुआँ धुआँ सा रहा
मैं तरसती रही तुम तरसते रहे
एक शाम के धागे उलझते रहे

25 November, 2008

जहाँ न पहुंचे कवि, वहां पहुंचे ब्लोगर :D

"तुम्हारा और स्कॉच का कुछ रिलेशन समझ में नहीं आया" । वो मेरे ऑफिस में नई आई थी, उसके लैपटॉप पर कुछ सेटिंग करते हुए मैंने देखा कि उसने अपने आईपॉड का नाम "whiskey on the rocks" रखा था। जवाब देने के बजाये वह खिलखिला के हँस पड़ी, ये हँसी भी मेरी कुछ खास समझ में नहीं आई, लड़कियां जाने क्यों बिन वजह ही हँस देती हैं। जैसे कि उन्हें मालूम होता है कि हम उनकी हँसी से अपना सवाल भूल जायेंगे। पर मुझे मालूम करने की जिद पड़ गई। मैंने फ़िर पूछा, बताओगी नहीं, ये व्हिस्की ऑन द रॉक्स का क्या चक्कर है।


"क्योंकि मैं स्कॉच, ऑन द रॉक्स पीती हूँ ...बस इसलिए", अब इस जवाब के बाद चौंकने की बारी मेरी थी। "पर...पर, तुम तो...तुम तो ऐसी लड़की नहीं लगती", मैं हड़बड़ा के बोला था। "कैसी लड़की नहीं लगती...जिसे स्कॉच पसंद हो?", "हाँ...नहीं नहीं, मेरा वो मतलब नहीं था", मुझे कुछ सूझा नहीं। बाप रे, अब मैं किसी तरह अपना पीछा छुडाने की सोच रहा था...पड़ा एक और महिला मुक्ति वाले से मोर्चा, अब तो ये मैडम मेरी धज्जियाँ उड़ा देंगी, दिखने में कैसी सीधी सादी लगती है(और प्यारी भी...कहीं से आवाज़ आई)। और मैं सोच रहा था कि बेचारी नई आई है, किसी को जानती नहीं, थोड़ा बात कर लेता हूँ मन बहल जायेगा(किसका? उनका या तुम्हारा...फ़िर से आवाज आई)। इतनी सारी बातें एक मिनट के अन्दर दिमाग में घूम गयीं, और फ़िर दिमाग घूम गया...भागने के रास्ते ढूंढ़ना इतना आसान भी तो नहीं था, लंच टाइम था, अपना खाना मैं ले कर ही आया था उनकी सीट पर...और लैपटॉप कि सेटिंग भी अभी पूरी नहीं हुयी थी, कहाँ जाऊं हे भगवान अब तू ही बचा। इतनी कैल्कुलेशन जब चल रही थी तो मैंने देखा नहीं कि उनके चेहरे का हावभाव क्या है, इसलिये कहते हैं कि आदमी को अपने अलावा औरों के बारे में भी सोचना चाहिए।


खैर अब ओखली में सर दिया तो मूसल से क्या डरना...मैंने देखा, मोहतरमा की आँखें उसी तरह चमक रही थी जैसे शेर की अपने सामने शिकार देख कर चमकती होंगी(मैंने वैसे कभी देखा नहीं है, पर शायद जैसे टॉम एंड जेर्री में जब जेरी हाथ में आता है तो टॉम के चेहरे का भाव जैसा ही होगा)। वो किसी दूसरी दुनिया में जा चुकी थी, "जानते हो, कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जिन्हें पहली बार देख कर भी नहीं लगता कि पहली बार देखा है, किसी से पहली बार मिल कर भी लगता है हम पिछले जनम में मिल चुके हैं...वैसा ही था व्हिस्की का स्वाद, कभी लगा ही नहीं कि पहली बार पी है...जैसे पानी, वैसे ही याद नहीं कि पहली बार कब पी थी..."।


अब तो मुझे काटो तो खून नहीं, इस बार बुरे फंसे बच्चू, कवयित्री से पाला पड़ा है, अब तो भगवान भी नहीं बचा सकते, मुझे पूरा यकीं था कि वो मुझे अब कविता पढ़ाने लगेगी। मैं भला आदमी, इस पूरे प्रकरण में सिर्फ़ अपनी इंसानियत के कारण फंसा हूँ। इससे ये निष्कर्ष निकलता है, इंसान होना ग़लत है, पूरी एवोलुशन प्रक्रिया ग़लत थी, आख़िर इवोल्व होके क्या बना...कवि!!?? इससे तो अच्छे हम पाषाण युग में थे, शिकार करो, खाओ...कम से कम किसी कि कविता तो सुननी नहीं पड़ती थी। जैसे मछली कांटे में फंसती है तो घंटों बैठे मनुष्य के चेहरे पर जो भाव होता है उनके चेहरे पर वही भाव नज़र आ रहा था। मैं क्या कर सकता था, मन मार के तैयार हो गया।


पर उन्होंने जब इन्टरनेट एक्स्प्लोरर पर ब्लोगेर खोला तो हमारी सारी हिम्मत जवाब दे गई...ब्लॉगर!!!!! ये तो मनुष्य की सबसे खतरनाक श्रेणी होती है...मैंने किसके चंगुल में फंस गया, हे हनुमान जी बचाओ...अब ये अपना लिंक रट्वायेंगि, और कमेन्ट न देने पर रोज ख़बर लेंगी...अब मैं क्या करूँ, किसकी शरण में जाऊं। मैंने वादा किया कि मैं रोज़ उनका ब्लॉग पढूंगा और कमेन्ट भी दूंगा, और कोई उपाय भी क्या था।

जहाँ न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि, और जहाँ न पहुंचे कवि वहां पहुंचे ब्लोगेर. तो बचने का कोई उपाय ही नहीं था. आते साथ मैंने सारी नौकरी की साइट्स पर अपना resume डाला...मोंस्टर से लेकर शाइन तक। और आप सब से अनुरोध है कि अगर किसी के ऑफिस में कोई पोस्ट खाली हो तो मुझे बताएं। मानता हूँ आप ब्लोगेर हैं पर उससे पहले आप एक इंसान है, इसलिए कृपया मेरी मदद कीजिये। आज से मैं कान पकड़ता हूँ, व्हिस्की नहीं पियूँगा, कोई लड़की चाहे व्हिस्की पिए या किरासन तेल उससे कारण नहीं पूछूँगा, और किसी लड़की की मदद करने नहीं जाऊँगा।

नोट:इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं उनका किसी भी व्यक्ति जीवित या मृत से कोई लेना देना नहीं है :D.

21 November, 2008

तुम्हें प्यार है मुझसे

फ़िर से एक पुरानी नज़्म, फ़िर से पीले जर्द पन्ने...और लबों पर वो हँसी कि क्या लिखती थी मैं उस समय...ये लिखा है ३१/०८/०२ को। अब सोचती हूँ तो लगता है कितने साल बीत गए...

सोचती हूँ की जी लोगी मेरे बगैर

एक दिन के लिए कोशिश कर कर देखो

गूँज उठेगा तुम्हारी धडकनों में नाम मेरा

कभी खामोशी में मुझे याद कर देखो

मैं कोई ख्वाब नहीं की मुझे भूल जाओ कल सुबह तुम

मैं हकीकत हूँ न यकीं हो तो छू कर देखो

झूठ कहती हो कि हर नज़्म तुम्हारी अपनी है

मुझे सोचे बगैर एक लफ्ज़ भी लिख कर देखो

रात भर रोओगी मगर छुपाओगी मुझसे

कभी अपने गम मेरे साथ बाँट कर देखो

तुम्हारा हर अहसास जुड़ा हुआ है मुझसे

मेरी हँसी को अपने लबों से जुदा कर देखो

मेरा हर दर्द टीस उठता है तुम्हारे अन्दर

तुम्हारी आँखें नम हैं मेरे अश्कों से जा कर देखो

तुझे मालूम नहीं ए मेरी मासूम सी ख्वाहिश

तुम्हें प्यार है मुझसे मेरा यकीन कर देखो।

19 November, 2008

जागने का वक्त आ गया है.

हमें याद है की १०वीं में हमारा सिविक्स नाम का विषय होता है...उसी में हम संविधान के बारे में पढ़ते थे। हम जब fundamental rights के बारे में पढ़ते हैं तो उसी पैराग्राफ में हमारी duties के बारे में भी लिखा होता है। ऐसा क्यों होता है कि हम अपने अधिकारों को लेकर बहुत सचेत रहते हैं और हो हल्ला भी मचाते हैं पर अपनी जिम्मेदारियों का क्या? क्या अपनी जिम्मेदारियां ताक पर रखने के बाद हमें अपने अधिकारों के लिए लड़ने का हक है?
इस दौर में सब सब सवाल करते हैं कि आप क्या कर रहे हो...समाज के लिए...देश के लिए वगैरह वगैरह, ये सवाल करने के पहले वो ये बताएं कि उन्होंने क्या किया है, किस बदलाव कि दिशा में कदम उठाये हैं?
आज मैं भी ऐसे ही एक बदलाव के बारे में कहना चाहती हूँ जी बहुत जरूरी है। और ये है वोट देना, हममें से अधिकतर लोग सरकार को कोसते हैं उसकी हर नाकामी पर, मगर जब वोट देने का वक्त आता है हम अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट जाते हैं। हालाँकि मैं मानती हूँ कि इसका एक बहुत बड़ा कारन ये है कि कोई भी एलेक्टीओं में खड़ा होने वाला नेता इस काबिल नहीं होता कि उसे चुना जाए। सारे भ्रष्ट और अक्सर अपराधिक पृष्ठभूमि के होते हैं। पर वोट देना पहला कदम है हमारे देश के लिए कुछ सार्थक करने कि दिशा में।
हम कॉलेज में थे जो चुनाव और राजनीति को गंभीरता से लेते थे...जेएनयू में तो खास तौर से इस तरह कि हवा चलती है कि आप किसी न किसी विचारधारा से प्रेरित हो ही जाते हैं। मेरे कुछ दोस्त ऐसे भी हैं जिन्होंने राजनीति में उतरने का और चीज़ों को बदलने का प्रण लिया है। मुझे उन पर गर्व है, मैं सीधे इलेक्शन में उतर तो नहीं सकती पर मैंने वादा किया है कि उनका इलेक्शन कैम्पेन मैं सम्हालूंगी।
मैं और मेरे जैसे कई लोग इस लिए भी वोट नहीं दे सकते क्योंकि हमारा नाम हमारे घर कि वोटर लिस्ट में जुदा है, और हम रहते हैं दूसरे शहर में...अब वोट कैसे दें।मुझे ये मालूम नहीं था कि किसी भी शहर में ६ महीने तक रहने के बाद हम अपना नाम वहां की वोटर लिस्ट में शामिल करने के लिए आवेदन दे सकते हैं। और वोट करने के लिए बस लिस्ट में नाम होना जरूरी है, वोटर आइडी कार्ड नहीं है तो DL या PAN कार्ड भी चलता है।इस सारी प्रक्रिया को बिल्कुल आसान कर दिया है टाटा टी ने अपने नए वेबसाइट में
मेरा आपसे अनुरोध है कि आप www.jaagore.com पर जरूर जाएँ। वाकई वोट करना अब बिल्कुल आसान हो गया है। मैंने अपने सारे दोस्तों को इस बारे में बताया और उन्होंने भी सूचना को आगे forward किया।ummid है इन छोटे छोटे क़दमों से ही हमारा हमारे अपने भारत का सपना पूरा होगा।

वंदे मातरम्

18 November, 2008

मैं और तुम

मेरे तुम्हारे बीच

उग आया है

कंटीला मौन का जंगल

जाने कब खो गयीं

शब्दों की राहें

खिलखिलाहटों की पगडंडियाँ

ऊपर नज़र आता है

स्याह अँधेरा

नहीं दिखता है चाँद

नहीं दिखती तारों सी तुम्हारी आँखें

काँटों में

उलझ जाता है तुम्हारा स्पर्श

ग़लतफ़हमी की बेल

लिपट जाती है पैरों से

और मैं नहीं जा पाती तुम्हारे करीब

बहुत तेज़ होता जाता है

झींगुरों का शोर

मैं नहीं सुन पाती तुम्हारी धड़कन

पैरों में लोटते हैं

यादों के सर्प

काटने को तत्पर

शायद मेरी मृत्यु पर ही

निकले तुम्हारे गले से एक चीख

और तुम पा जाओ

शब्द और जीवन ...

16 November, 2008

फ़िर


इंतज़ार में
बिल्कुल कण कण में
टूट जाता है मेरा वजूद
और क्षण क्षण गिरता रहता है
रेत घड़ी के एक से दूसरे छोर पर

धीरे धीरे फ़िर से जुड़ जुड़ कर
पूरी होने लगती हूँ मैं
और एक तरफ़ से बिल्कुल खाली

पर स्थायित्व नहीं है मेरे जीवन में
जैसे ही गिरता है पूरा वजूद
वक्त मुझे फ़िर से पलट देता है
और शुरू हो जाता है
मेरा बिखरना
फ़िर से...

Related posts

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...