मेर मानना है की सही या ग़लत कुछ नहीं होता, बस देखने का नज़रिया अलग होता है। खास तौर से समाज के बदलते समीकरणों की बात करें तो।
जाने मेरे कॉलेज के टीचर्स के कारण या फ़िर मेरी मित्र मंडली ऐसी रही कि मुझे सवाल करने की बहुत बुरी आदत लग गई। और सवाल भी ऐसे वैसे नहीं, कुछ ऐसी बुनियादों चीज़ों पर कि सुनने वाले का अक्सर माथा ख़राब जो जाए, और मेरे केस में अक्सर सुनने वालियों का हाल बुरा होता था।
अब मैंने देखा कि एक दिन बात हो रही थी कि ये आजकल की लड़कियों को देखो, शादीशुदा होकर भी कुंवारियों जैसी दिखती हैं, सिन्दूर कहीं छुप के लगा है, न बिंदी न चूड़ी। अब मुझे हो गई कोफ्त बिन मतलब के तंग अदा दिए बहस में...
क्यों जरूरी है कि लड़की एक किलो सिन्दूर लगा के आधा मीटर लंबा मंगलसूत्र लटकाए...ताकि मीलों दूर से नज़र आ जाए कि वो शादीशुदा है। लड़कों पर ऐसा कुछ भी नियम लागू क्यों नहीं होता, उनके लिए शादी का एक भी चिन्हं क्यों नहीं है। और किसी लड़की के लिए ये नियम इतने जरूरी क्यों हैं। थोडी सी flexibility क्यों नहीं मिलती लड़कियों को। और जहाँ मिल रही है अगर वो अपने हिसाब से जी रही है तो सब के पेट में इतना दर्द क्यों होने लगता है।
इस समाज से मुझे जाने क्यों बड़ी खुन्नस रही है हमेशा से, देखती आई हूँ न कि इसके सारे नियमों का भर हम लड़कियों को ही उठाना पड़ता है। मेरे जेनरेशन कि किसी भी लड़की से पूछ लो अगर किसी वर्ड से सबसे ज्यादा चिढ है तो वो है "compromise" और यहाँ कहीं भी उससे पुछा तक नहीं जाता है। पता नहीं हम किस शताब्दी में जी रहे हैं कि अब भी माँओं को बेटियों को सिखाना पड़ता है कि सबसे हिसाब से एडजस्ट करना चाहिए। आख़िर बाकी लोग थोड़ा सा एडजस्ट क्यों नहीं करते।
और क्या करें हम जैसी लड़कियां जब शीला दीक्षित तक कहती है कि रात को निकलने कि जरूरत क्या है। अब कोई शीला दीक्षित को समझाए, हर इंटरव्यू में ये सवाल किया जाता है कि रात को देर तक काम होने में रुकने पर कोई दिक्कत तो नहीं है तुम्हें। अब कौन लड़की कहेगी कि दिक्कत है और मौका जाने देगी...कौन कह सकता है कि दिक्कत नहीं होगी अगर आप ओफ्फिस से घर तक मेर सुरक्षा का इन्तेजाम कीजिये या जिम्मेदारी लीजिये। घर से बाहर अपने दम पर निकलती है हम लड़कियां, हर कदम पर एक लडाई, कभी अपनों से कभी बेगानों से, कभी system से, कभी समाज से।
और जाने कितनी कितनी बार अपने आप से, सिर्फ़ ख़ुद को जिन्दा रखने कि खातिर। सिर्फ़ इसलिए कि माँ बेटी बहन प्रेमिका या पत्नी के अलावा भी हम कुछ हैं....मेरा ख़ुद का भी एक अस्तित्व है।
मेरे ड्राइविंग लाइसेंस, पैन कार्ड, पासपोर्ट पर मेरी माँ न नाम क्यों नहीं होता, कम से लिखने का आप्शन तक क्यों नहीं मिलता।बुनियादी सवाल...विद्रोही तेवर...फ़िर भी ये समाज मेरा कुछ नहीं बिगड़ सकता...क्यों....क्योंकि मैं आत्मनिर्भर हूँ, आश्रिता नहीं।काश मैं अपने तरफ़ कि हर लड़की को अपने पैरों पर खड़ा होने लायक बना सकती, अपनी जगह लेने के लिए तैयार कर सकती। हम जब कॉलेज में थे तब हामारे टीचर्स कहते थे, यहाँ लौट कर आना। तुम्हारे जैसे कितनी लड़कयों को तुम्हारी जरूरत होगी।मेरे बिहार...मैं लौट कर आउंगी, एक दिन जरूर आउंगी.