04 October, 2015

Let's begin from the end. अंत से शुरू करते हैं.

धूप की सुनहली गर्म उँगलियाँ गीले, उलझे बालों को सुलझाने में लगी हैं. आज गहरे लाल सूरज के डूब जाने के बहुत बाद तक भी ऐसा लगेगा जैसे धूप बालों में ठहरी रह गयी है. मुझे अब गिन लेना चाहिए कि तुम्हें गए कितने साल हुए हैं. मेरे शहर में ठंढ की दस्तक सुनाई नहीं देती है...मैं दिल्ली में रहती तो मुझे जरूरी याद रहता कि तुम्हारे जाने के मौसम बीते कितने दिन हुए हैं. धुंध इतनी गहरी नहीं होती कि कमरे में टंगा कैलेण्डर दिखाई न पड़े. अगर तुम्हारे जाने के मौसम को चेहरे की बारीक रेखाओं से गिना जा सके तो मैं कह सकती हूँ कि तुम्हारे जाने के सालों में मैं बूढ़ी हो गयी हूँ. आजकल मेरे जोड़ों में दर्द रहता है और मैं अपनी कलम में खुद से इंक नहीं भर सकती. यूं घर नाती पोतों से भरा पड़ा है लेकिन मेरी कलमों के बजाये वे मुझे कंप्यूटर पर टाइपिंग सिखाने में ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं. अब सोच रही हूँ कि कार्टरिज का इस्तेमाल शुरू कर दूं. आखिर ख़त तो तुम्हें टाइप करके नहीं भेज सकती ना. पेन्सिल से लिखने में मिट जाने का डर लगता है. पेन्सिल यूं भी सालों के साथ फेड करती जाती है. अब ये न कहो कि हमारे साल ही कितने बचे हैं या फिर ये कि मैं अब तुम्हें ख़त नहीं लिखती. मैं तुम्हें बताना चाहती हूँ कि अब भी सुबह का पहला ख्याल तुम्हारे नाम की गुलाबी स्याही में डूबा ही उगता है. हाँ अब उम्र के इस दौर में चटख रंगों के प्रति मेरा रूझान कम हो गया है और मैं सोचने लगी हूँ कि काली स्याही दरअसल काफी डीसेंट दिखती है. हमारे उम्र के हिसाब से. नहीं? ग्लिटर वाली कलम से छोटे छोटे दिल बनाने का मौसम अब कभी नहीं आएगा.

पिछले साल मेरे पड़ोस में एक नया परिवार आया है. उनका बड़ा बेटा ऐनडीए में पढ़ता है. फिलेटली का शौक़ है उसे. जाने कहाँ कहाँ के डाक टिकट इकट्ठे कर रखे हैं उसने. मैं उसकी बात हरगिज़ नहीं मानती लेकिन हुआ यूं कि एक दोपहर मैं इसी तरह बाल सुखा रही थी धूप में...शॉल में छुपे हाथों मे लिफ़ाफ़े थे. वो बालकनी में आया और उसने पेस्ट्री का बौक्स बढ़ाया मेरी तरफ...लिफाफा हाथ से फिसल गया और ज़मीन पर गिर पड़ा. उसने लिफाफे पर लगे डाक टिकट को देख कर बता दिया कि ये हांगकांग का स्टैम्प है...तिरासी में लागू हुआ था. फिर हम बातें करने लगे. मैंने उसे किताबों का रैक दिखाया जहाँ तुम्हारे सारे ख़त रखे हुए हैं. यूं तो बहुत ही तमीजदार बच्चा है, अपनी सीमाएं जानता है मगर शायद उस जेनरेशन ने इतने ख़त देखे नहीं हैं तो उत्साह में पूछ लिया कि मैं आपके ख़त पढ़ सकता हूँ. मैंने भी क्या जाना था कि उसे ऐसा चस्का लग जाएगा...हाँ बोल दिया. मुझे जानना चाहिए था तुम्हारे खतों का जादू ही ऐसा है, एक जेनरेशन बाद भी असर बाकी रहेगा.

मुझे डर ये लगता है कि बार बार खोलने बंद करने से कहीं बर्बाद न हो जाएँ तुम्हारे ख़त. इस बार दीवाली में बड़ी बहू जब घर की सफाई कर रही थी तो उसे आईडिया आया था कि खतों को लैमिनेट करा देते हैं. कोई गलत बात नहीं कही थी उसने मगर ऐसा सोच कर भी मुझे ऐसी घबराहट हुयी कि क्या बताऊँ. जैसे जीते जी अनारकली को जिंदा दीवार में चिन दिया हो. तुम्हारे ख़त तो जिंदा हैं...सांस लेते हैं...उन्हें छूती हूँ तो तुम्हारी उँगलियों की खुशबू रह जाती है पोरों में...वो शामें याद आती हैं जब दिल्ली के सर्द कोहरे में तुम्हारा एक हाथ अपनी दोनों हथेलियों के बीच लिए रहती थी देर तक...सूरज डूब जाने तक. पता है, जाड़े के दिनों में शॉल में हाथ छुपे रहते हैं तो कई दोपहरों में मैं कोई न कोई लिफाफा लिए धूप में बैठी रहती हूँ. यूँ लगता है तुम पास हो और मैंने थाम रखा है तुम्हारा हाथ. सिगड़ी की गर्माहट होती है तुम्हारे लिफाफों में. इसलिए मुझे गर्मियां पसंद नहीं आती हैं. मैं हर साल जाड़ों का इंतज़ार करती हूँ.

उसका नाम अंकुर है. बड़ा ही प्यारा बच्चा है. छुट्टियों में घर आता है तो पूरा मोहल्ला गुलज़ार हो जाता है. आये दिन पार्टियाँ होती हैं. ठहाके मेरे कमरे तक सुनाई देते हैं. वो सबका हीरो है. लड़के उसके साथ क्रिकेट खेलने के लिए जान दिए रहते हैं और लड़कियों का तो पूछो मत. मेरी बड़ी पोती भी उन दिनों बड़े चाव से सजने लगती है. हर ओर रंग गुलाबी यूं होता है कि मुझे इस उम्र में भी अपने दिन याद आने लगते हैं कि जब तुम छुट्टियों में शहर आते थे. मैं कुछ कांच की चूड़ियाँ पहन लेती थी, कि गोरी कलाइयों में सारे रंग फबते थे. चूड़ियों से ये भी तो होता था कि मेरे आने जाने से तुम्हें आहट सुनाई पड़ जाए और तुम बालकनी से झाँक लो. इक रोज़ अचानक तुम्हें सामने पा कर कितना घबरा गयी थी...दरवाज़ा हाथ पर ही बंद कर दिया था. वो तो चूड़ियाँ थीं, वरना कलाई टूट जाती. उफ़. किस अदा से तुमने गिरे हुए कांच के टुकड़े उठाये थे कि बुकमार्क बनाओगे. तुम्हारी किताबों में मेरी चूड़ियों की खनखनाहट भर गयी थी. मेरी खिलखिलाहटें भी तो. तुम शहर में होते थे तो मैं काजल लगाती थी...के आँखें सुन्दर दिखें और इसलिए भी कि मेरी इन चमकती आँखों को नज़र ना लगे किसी की. मैं जो अधिकतर गले में मफलरनुमा दुपट्टा डाले मोहल्ले में मवालियों की तरह डोला करती थी, तुम्हारे आने से झीने दुपट्टे ओढ़ने लगती थी. काँधे से कलाइयों तक कि दुपट्टे की खूबसूरती नुमाया हो. तुम शहर में होते थे तो लगता था कि दिन को सूरज इसलिए उगता है कि तुम किसी बहाने घर से बाहर निकलो और मैं तुम्हें देख सकूं. उन दिनों में तुम्हारे घर की हर चीज़ के ख़त्म हो जाने की मन्नतें माँगा करती थी. कभी चायपत्ती, कभी चीनी, कभी सब्जियां...तुम और तुम्हारी वो साइकिल. उफ़. तुम्हारी मम्मी अक्सर तुम्हें पूछ लेने बोलती थी मेरे घर में कि कोई सामान ख़त्म तो नहीं है. मेरा बस चलता तो उन दिनों घर की सारी रसद चूल्हे में झोंक आती. महज़ तुमसे एक लाइन ज्यादा बात करने के लिए.

गर्मी की बेदर्द दुपहरों में कभी कभी अंकुर घर चला आता है. मेरी बड़ी पोती को लगता है कि वह बहाने से उसे देखने आता है और वो मेरी स्टडी में आती जाती रहती है. आजकल सजने का अर्थ भी तो बदल गया है. मेरे दुपट्टे निकल आते थे और यहाँ मिन्नी की मिनी स्कर्ट्स निकल आती हैं. पगली है थोड़ी, उसे समझाउंगी एक दिन कि अंकुर को तुम्हारी लॉन्ग लेग्स में नहीं तुम्हारी नीली आँखों में इंटरेस्ट है...तुम्हारी टेबल पर फेंके हुए तुम्हारे जर्नल में लिखी उल्टी पुल्टी कविताओं में और तुम्हारे कमरे में लगे बेहिसाब पोस्टर्स में. पिछली बार पूछ रहा था मुझसे कि तुम क्या वाकई कवितायें लिखती हो. उसका एक दोस्त भी राइटर है और बड़ा होकर दूसरा शेक्सपीयर बनना चाहता है. वो सोचता है कि मिन्नी उसके दोस्त को समझा सकेगी कि शेक्सपियर एक डायनासोर था और उसकी प्रजाति के लोग लुप्त हो गए हैं. इस तरह से अंकुर अपने दोस्त की अझेल कवितानुमा कहानियों से बच जाएगा. वो मुझसे तुम्हारा पता मांग रहा था एक रोज़...पूछ रहा था कि मेरी जेनरेशन में सारे लोग इतने खूबसूरत ख़त लिखा करते थे क्या एक दूसरे को...और अगर ख़त इतने खूबसूरत थे तो फिर किताबों की जरूरत भी क्या पड़नी थी किसी को. मगर ये तब की बात है जब मैंने उसे ये नहीं बताया था कि तुमने किताबें भी लिखी हैं. कहानियां भी और कवितायें भी.

खतों में तुम्हारा नाम नहीं इनिशियल्स होते थे. एक दिन अंकुर ने जिद पकड़ ली कि वो तुम्हारा पूरा नाम जानना चाहता है और तुम्हारी लिखी किताबें पढ़ना चाहता है. मैंने बात को टालने की बहुत कोशिश की मगर वो तुम्हारा दीवाना हो चुका था. मैं नहीं बताती तो शायद किसी और से पूछता. और फिर जाने कितना सच उसे सुनने को मिलता. तो मुझे लगा कि बेहतर होगा कि मैं ही उसे बता दूं.

तुम्हें सत्ताईस की उम्र में मरने का बहुत शौक़ था न. बचपन का ये मज़ाक जिंदगी की क्रूर सच्चाई बन जाएगा ये किसने सोचा था. हम अपनी अपनी नयी नौकरी में सुहाने सपने बुन रहे थे. छोटेमोटे मीडियाहॉउस में नौकरी लगी थी लेकिन हम खुश थे कि अपनी बात को बेहतर तरीके से लोगों तक पहुंचा पायेंगे. हमने पहली बार साथ मिल कर एक कौमिक्स शुरू करने का सोचा था. ज़ी डायलॉग लिखता और मैं स्केच करती. हम उस उम्र में थे कि जब दुनिया बदल देने के ख्वाबों पर यकीन होता है.

हमारा समाज एक टाइम बम पर बैठा था और पलीते में लगी चिंगारी किसी को नहीं दिखी थी. विश्व में किसी भी बड़ी घटना की व्यापकता को नापने का पैमाना मौतें हुआ करती थीं, बात सिर्फ चंद इक्की दुक्की मौतों की थी. ये दार्शनिक, साहित्यकार और इतिहासकार थे जो कि अपने विषय में प्रतिष्ठित विशेषज्ञ थे और जिनका पूरे विश्व में मान था. मीडिया ने लोगों का ध्यान हल्के विषयों के प्रति भटका दिया कि उन्हें भी डर था कि आग जल्दी न भड़क जाए. गहरा मुद्दा सबकी नज़र से छिपा हुआ था. समाज की परेशानी का कारण भूख, गरीबी, बेरोजगारी थी मगर लोगों के उन्माद को दिशा धर्म की मशाल दे रही थी. हम एक मुश्किल समय में जी रहे थे जहाँ धर्म हमारा इकलौता आश्रय भी था और इकलौता हथियार भी.

सब अचानक ही शुरू हुआ था. जैसे एक ही समय में. एक महीने के अन्दर. उस महीने विश्व के हर कोने और हर धार्मिक बस्ती को एक ही इन्टरनेट कनेक्शन से जोड़ा गया था. आदर्श सरकारों को लगा था कि इससे लोग एक दूसरे से बेहतर जुड़ेंगे, मगर जैसा कि डायनामाईट और ऐटम बम के साथ हुआ था. तकनीक का गलत इस्तेमाल होने लगा. चूँकि इस वर्चुअल दुनिया में किसी को ट्रैक करना मुश्किल था, आतंकवादी और दहशतगर्द लोगों को डराने और धमकाने लगे. वर्चुअल दुनिया की दीवारें नहीं होतीं मगर असल दुनिया में लोग धार्मिक बस्तियों के बाहर दीवारों का निर्माण करने लगे थे. यही नहीं पहचान के लिए धार्मिक चिन्हों का प्रचलन भी बढ़ गया था. लोगों को ये डर लगा रहता था कि कहीं वे गलत धर्म के लिए न मारे जाएँ.

उन्ही दिनों में मैंने और जीरो ने कोमिक्स शुरू की और उनका नाम दिया 'ज़ीरो' ये आईडिया उसका ही था. शून्य से शुरुआत करना. हमने एक ऐसा कोमिक्स लिखा जो धर्म आधारित था, लेकिन हमने हीरो और हीरोइन अलग अलग धर्मों के लिए थे और एक ऐसे काल्पनिक समाज की रचना की थी जिसमें हर व्यक्ति दो या तीन धर्म को मानता है. हमने एकदम आधुनिक किरदार रचे जिनके नाम तकनीक की सबसे नयी खोजों पर आधारित थे. हमारे किरदारों के टाइटल हमेशा मॉडर्न फिजिक्स के पार्टिकल के नाम पर होते थे 'ऐटम, टैकीऑन, बोसॉन, फोटोन, क्वार्क' इत्यादि. 

हमारे देखते देखते विश्वयुद्ध देश की सीमाओं में नहीं बल्कि धार्मिक बस्तियों के दरवाज़ों के बाहर होने शुरू हो गए थे.  भीषण धार्मिक दंगों की व्यापकता बढ़ती ही जा रही थी. लोग दिनों दिन कट्टरपंथी होते जा रहे थे. एक उन्माद था जिसकी लपेट में पूरा विश्व आता जा रहा था. मैं और ज़ीरो चूंकि मीडिया से जुड़े थे इसलिए अपनी इस काल्पनिक दुनिया में जाने अनजाने किसी न किसी खबर के इर्द गिर्द चीज़ें बुनने लगे थे. हमारी दुनिया के इश्वर मोबाइल टावर में रहा करते थे. उनका आशीर्वाद तेज़ इन्टरनेट स्पीड और डेटा के रूप में मिलता था और तपस्या के लिए लोग इन्टरनेट से दूर रहने की कसमें खाते थे. 

हमने अपनी कॉमिक स्ट्रिप कभी ऑनलाइन नहीं डाली थी, हम इसे छापते थे और ये लोगों तक बंट जाते थे. एक दिन किसी फैन ने उत्साह में आ कर बहुत सारी स्ट्रिप्स को स्कैन कर के अपलोड कर दिया. दुनिया को शायद ऐसे ही किसी बहाने की जरूरत थी. ज़ीरो नयी जेनरेशन का पोस्टर बॉय था. दुनिया भर में इस धार्मिक हिंसा से थके हुए लोगों ने ज़ीरो को अपना इश्वर मानना शुरू कर दिया. कुछ दिन तक तो लोगों को लगा कि ये क्षणिक रूझान है, वर्ल्ड कप फीवर की तरह. उतर जाएगा. मगर जब मामला तूल पकड़ने लगा तो कट्टरपंथियों ने ज़ीरो के निर्माताओं की खोज शुरू कर दी. हम दोनों अंडरग्राउंड हो गए. ये ख़त उन्ही दिनों लिखे गए थे. 

हर देश की सरकार ने 'ज़ीरो' की कॉपीज ज़ब्त करने की कोशिश की, लेकिन ज़ीरो वायरल हो गया था और नयी जेनरेशन हथियारों से तौबा कर चुकी थी. 'अहम् ब्रह्मास्मि' की तरह 'आई एम ज़ीरो' एक नारा, एक फलसफा बनता चला गया. मैं और ज़ीरो इसके लिए तैयार नहीं थे. हर नयी कॉमिक स्ट्रिप दुनिया को दो हिस्सों में बांट देती. पुराना और नया. ज़ीरो हेटर्स और ज़ीरो लवर्स. कट्टरपंथी और ज़ीरोपंथी.

फिर एक दिन एक ख़त आया. ज़ीरो का आखिरी ख़त. उसने आत्महत्या कर ली थी.
'व्हाट?' अंकुर जैसे नींद से जागा था. किसी मीठे सपने से. 'बट व्हाई?' 

हम इस दुनिया का हिस्सा होते चले गए थे. एक नया पंथ बनने लगा था. हमने एक काल्पनिक दुनिया बनायी थी. इसके सारे सिरे थामने में बहुत एनर्जी लग जाती थी. हम इतने वोलेटाइल समय में रह रहे थे कि ज़ीरो को कुछ दिन और भी अगर लिखा जाता तो शायद बात हमारे सम्हालने से बाहर हो जाती. हमने ज़ीरो की रचना जब की थी तो एक ऐसी दुनिया की कल्पना की थी जिसमें सेना की जरूरत नहीं रहे क्यूंकि इंसान की ह्त्या का हक किसी को भी नहीं था. उस रोज़ अख़बार में एक ग्रुप की तस्वीर आई थी जिसमें ज़ीरोपंथी वालों ने कट्टरपंथियों को अपने धार्मिक निशान मिटाने को मजबूर कर दिया था. बात यहाँ से शुरू हुयी थी...यहाँ से बात किसी और जंग तक जाती ही जाती.

'फिर?' अंकुर किसी ख्याल में खोया तुम्हारे खतों को उलट पुलट रहा था. 

अचानक से तुमसे वो चीज़ छिन जाए जिसमें तुम्हारी आस्था है...और तुम १५ से २० साल के बच्चे हो तो तुम कैसे रियेक्ट करोगे? दुनिया में चारों ओर खलबली मच गयी. अराजकता. अनुशाशनहीनता. बच्चे पागल हो गए थे. रोने धोने और सुबकने से जब ज़ीरो के वापस आने की कोई राह नहीं मिली तो वे विध्वंसक हो गए. उन्होंने तोड़फोड़ शुरू कर दी. 

बड़ों की दुनिया में हड़कंप मच गया. इस तरह की दिशाहीनता घातक थी. ये एक वैश्विक समस्या थी, हमारा भविष्य खतरे में था और हमारे वर्तमान का कोई हल दिख नहीं रहा था. एक 3 डी कर्फ्यू लागू किया गया जो रियल और वर्चुअल दोनों दुनिया के बाशिंदों पर बाध्य था. हर देश में अनिश्चितकाल के लिए मिलिट्री रूल लागू किया गया. समस्या का हल जल्दी तलाशना जरूरी था. एक सेक्योर हॉटलाइन पर दुनिया के हर देश के लीडर को मेसेज भजे गए और सब दिल्ली में इकट्ठे हुए. उनमें से कई लोग मुझसे बात करना चाहते थे. उन्हें लगता था मेरे पास इसका कोई उपाय होगा...या शायद कोई सही दिशा. मुझे आज भी वो मीटिंग रूम याद है. लगभग २०० लोग थे उसमें. सबके पास लाइव इन्टर्प्रेटर डिवाइस थी ताकि वो मुझे सुन सकें. मेरे पास भविष्य की कोई प्लानिंग नहीं थी...मगर हमारे वर्तमान के लिए जरूरी था कि कहानी कि शुरुआत के सारे एलीमेंट्स उनसे डिस्कस किये जाएँ. वे सब ज़ीरो के बारे में और जानना चाहते थे. मैं उन्हें बता रही थी कि जैसे हमें बचपन से सिखाया जाता है कि हम किसी भी धार्मिक स्थल पर प्रार्थना कर सकते हैं...हम मज़ार पर भी जाते थे और चर्च में भी, मंदिर में भी हाथ जोड़ते थे और स्तूप में भी. हमारा इश्वर एक भी था और उसके हज़ार रूप भी थे. इन्हीं कुछ बेसिक चीज़ों के हिसाब से हमने किरदार रचे जिनपर किसी एक धर्म का हक नहीं था. मैंने उन्हें अपने इनिशियल स्केचेस दिखाए, अपना आईडिया जितना डिटेल में हो सके डिस्कस किया और बाहर आ गयी.

कई सारे लोगों को लगा था कि ज़ीरो को रचने वाले किसी बड़े संगठन का हिस्सा होंगे जिसकी अपनी फिलोसफी होगी और तरीके होंगे. उनके समाधान में कई विरोधाभास थे...हम कई बार चीज़ों को जबरन पेचीदा करना चाहते हैं जबकि वे होती एकदम सिंपल हैं. लेकिन साथ ही चीज़ों का अत्यंत सरलीकरण भी बुरा होता है. जैसे कि हम ऐसे समाज में रहते हैं जिसके लोगों को किसी वाटरटाइट खांचे में बांटना नामुमकिन था. पर हुआ वही 'डेस्पेरेट टाइम्स कॉल फॉर डेस्पेरेट मेजर्स'. वर्ल्ड आर्डर का नया नियम लागू हुआ...बेहद सख्ती से...दुनिया एक धर्म को मान कर विध्वंस की तरफ जा रही थी. इसका एकदम सिंपल उपाय निकाला गया.

'एक ही धर्म के लोग शादी नहीं कर सकते'. दुनिया के बाकी सारे नियम ख़त्म कर दिए गए थे. बॉर्डर्स ख़त्म कर दिए गए. लोग विश्व नागरिक हो गए थे. इस नियम को दुनिया के सारे दस्तावेजों से मिटाया गया और पूरा पूरा इतिहास फिर से लिखा गया. जैसे कि जीने का तरीका हमेशा से ऐसा ही रहा था. अनगिन भाषाओं में लोग पिछले कई सालों का इतिहास बदलने में लगा दिए गए. इसमें सारे धर्म और धार्मिक चिन्ह, पूजा करने की जगहें, एक दूसरे से मिला दी गयीं, कुछ वैसा ही कि जैसे मैंने और ज़ीरो ने शुरू में लिखी थीं. कई सारी किंवदंतियाँ लिखी गयीं. तुम इसे एक तरह का प्रोपगंडा भी कह सकते हो.
'तो आपका कहना है कि धर्म की सारी हिस्ट्री मैनुफैक्चर्ड है?'
'हाँ' वी आल वांट द कन्वीनियेंट ट्रुथ. हमें आसान सच चाहिए होता है. लोगों को अपनी ज़िन्दगी में कोई खलल नहीं चाहिए था. वे मिलिट्री रूल के तले दबे नहीं रह सकते थे. नियम की बहुत खामियां थीं...लोगों को आइडेंटिटी क्राइसिस होते थे. मनोवैज्ञानिकों का एक बड़ा तबका सामने आया और उन्होंने लोगों को हर तरह से मदद की. धीरे धीरे सबने इसे एक्सेप्ट कर लिया. सब कुछ ऐसे चलने लगा जैसे कहीं कोई युद्ध कभी हुआ ही नहीं था. तानाशाही में बहुत बल होता है. सरकारें चाहे तो कुछ भी कर सकती हैं. जर्मनी के बारे में तो तुमने पढ़ा ही होगा. कैसे एक पूरा देश जीनोसाइड में इन्वोल्व था और कई बार लोगों को मालूम भी नहीं था कि वे किसी बड़ी मशीनरी का हिस्सा है. अनेक धर्मों में अपनी आइडेंटिटी ढूँढने को ग्लैम्राइज किया गया. और देखो, तुम सोच भी नहीं सकते कि एक ऐसा वक़्त था जब धर्म के लिए लड़ाइयाँ होती थीं. तुम्हारी पीढ़ी के अधिकतर बच्चे कमसे कम तीन धर्म में विश्वास करते हैं'
'तो केओस नाम का कोई इश्वर नहीं था जिसने वृन्दावन में रासलीला की, जिसमें सारे धर्म के अलग अलग इश्वर आये थे? 
'उनका नाम कृष्ण था'
'तो केओस था कौन?'
'केओस इस न्यू वर्ल्ड आर्डर का इश्वर था जिसे हमने रचा था'
'कोई कभी सवाल नहीं करता इन चीज़ों पर?'
'हमें आसान जिंदगी चाहिए अंकुर, ये बहुत मुश्किल सवाल हैं और सच जानकार भी तुम इतिहास को बदल नहीं सकते हो. लोग अभी भी रिसर्च करते हैं कि इसका क्या फायदा हुआ...इन फैक्ट तुम अपनी अकादमी में अभी इन चीज़ों के बारे में जानोगे. तुम्हें मालूम कि आर्मी का क्रेज इतना ज्यादा क्यों है लोगों में?'
'नहीं. क्यों?'
'क्योंकि सिर्फ उनके पास सच है. पूरा का पूरा सच. तुम्हें जब इतिहास पढ़ाया जाएगा तो कोई पन्ने ढके नहीं जायेंगे. पूरा का पूरा कड़वा सच बताया जाएगा तुम्हें. अभी के तुम्हारे क्लासेस के पहले तुम्हें ध्यान करने को कहा जाता होगा. तुम्हारे मेंटल टेस्ट्स भी हुए होंगे...सिर्फ वही लोग जो इस लायक है कि सच का भार वहन कर सकें उन्हें सब कुछ बताया जाता है'
'ये सब इतना मुश्किल क्यों है'
'क्यूंकि तुम्हें चुना गया है. अभी तुम्हारी जगह कोई नार्मल बच्चा होता तो इस सब को सिरे से ख़ारिज कर देता और अपनी उम्र के लोगों से मिलने चला जाता. बैठ कर मेरी चिट्ठियां नहीं पढ़ता. मेरी कहानियों में यकीन नहीं करता'
'मेरे यकीन करने से सच बनता है?'
'हाँ'
'कितने लोगों को बतायी है आपने ये पूरी बात?'
'सिर्फ अपने साइकैट्रिस्ट को'
'साइकैट्रिस्ट?'
'हाँ. पर वो कहता है मैं सिजोफ्रेनिक हूँ. मुझे लोग दिखते हैं जो सच में होते नहीं'
'मेरी तरह?'

02 October, 2015

राइटर्स डायरी - गुमे हुए शब्दों का नास्टैल्जिया

दोस्त. कुछ नहीं बचा है लिखने को. और जो है वो बस इतना है कि कागज़ पर एक बार लिख कर देख लिया जाए जी भर के. और आग लगा दी जाए. सिगरेट भी इसलिए ही होती है न कि लम्हे भर को जरा सी बेकरारी हो...जरा सा नशा...कि हल्का हल्का सा लगे सब कुछ. खूबसूरत. दिलकश. और जान देने जितना मीठा.

मैंने इश्क़ के लिए अपने शहर के दरवाज़े बंद कर दिए हैं. हमेशा के लिए. हालांकि 'हमेशा' एक खतरनाक शब्द है कि जिसके इस्तेमाल के पहले दास्ताने पहनने जरूरी होते हैं वरना लिखे हुए हर शब्द में एक 'finality' आ जायेगी. कि जैसे अंतिम सत्य लिखा जा चुका हो.

मैं जिस शहर में हूँ वहां बहुत से पुल हैं जिन्हें लोग प्यार से फ्लाईओवर कहते हैं. ये पुल नहीं होते तो जिंदगी थोड़ी धीमी होती. जैसे कि अपने देश में होती है. लोग जरा धीमे गुज़रते. जैसे कि मेरे दिल से गुज़रते हैं. मुझे सब कुछ मालूम हो जाता है उनके बारे में. वो कार में कौन सा गीत बजा रहे हैं. उनकी आँखों में कितना इंतज़ार है. उनकी कलाई पर बंधी घड़ी में जो इंतज़ार है वो किसी के दिल तक जा कर ख़त्म होता है कि या कि किसी पुल के ठीक बीचोबीच की एकतरफा ड्राइव तक. मैं सैन फ्रांसिस्को गयी थी. जानलेवा खूबसूरत शहर है. कोई इस बेइंतेहा खूबसूरत शहर से गुज़र कर जान कैसे दे सकता है? कोई ड्राइव कर के उस पुल तक जाता है. अक्सर टैक्सी में. दो माइल के उस पुल के बीच तक पैदल चलता है...नीचे...बहुत नीचे गहरा नीला पानी है. मैं जानती हूँ कि लोग वहां से जान क्यों दे देते हैं. वहां से जान देना एकदम आसान लगता है. बिलकुल लम्हे भर की बात होती है. कि जैसे प्यार हो जाता है किसी से. लम्हे भर में. वैसा ही कुछ. 

मैंने इस बार बहुत कम पोस्टकार्ड लिखे. कुछ कहने को दिल नहीं कहता. कुछ ऐसा नहीं कि रह जाए किसी की उँगलियों में फिरोजी स्याही की तरह. मुझे आजकल लिखने में दिक्कत आ रही है. जिस किताब पर काम कर रही हूँ, उसके लिए भी कुछ लिख नहीं पा रही. शब्द जैसे रहते ही नहीं दिमाग में...फिसल कर बह जाते हैं. चिकना घड़ा हो गयी हूँ मैं. याद आता है कि ये बिम्ब मैंने पहले भी कभी इस्तेमाल किया है. शब्दों के यूं रूठ के चले जाने का अक्सर यही महीना होता है. बेरहम सितम्बर. बहुत सालों पहले पंकज ने एक पोस्ट लिखी थी 'वेक मी अप व्हेन सेप्टेम्बर एंड्स'. मैंने पहली बार वो गाना उसी बार सुना था. उस साल से हर साल, जब भी सितम्बर में उदास हुयी हूँ गीत की याद आई है. धीरे धीरे ये पंकज का गाना न रह कर मेरा गाना हो गया है. उदास मौसम का गाना. किसी के चले जाने का गीत. कि जब शब्द नहीं मिलते हैं. 

मुझे ब्लॉग्गिंग करते हुए दस साल हो जायेंगे इस नवम्बर. साथ के लोगों ने लिखना लगभग बंद कर दिया है. एक समय में लिखना सबके साथ किसी  कौलेज कैंटीन में गप्पें करने जैसा था. मैं दिल्ली से बैंगलोर आई थी. इस अजनबी शहर में दोस्त नहीं थे. उनकी कमी ब्लॉग ने पूरी की. हम एक दूसरे का लिखा पढ़ते थे. एक दूसरे के बारे में परेशान होते थे. जुड़ते थे. कि जैसे शायद असल लोगों से भी नहीं जुड़े कभी, वैसे. पीडी का दोबजिया बैराग. डॉक्टर अनुराग के जीवन के अनुभव...अच्छा होना...अच्छा इंसान और अच्छा डॉक्टर बनना. अज़दक के पोडकास्ट कि जिन रास्तों से 'जरा सा जापान', पचास साल का आदमी' और 'माचिस' जैसी चीज़ों के पीछे का संगीत ढूँढने की तलब लग जाती थी. अपूर्व की 'तीन बार कहना विदा' और उसके पोस्ट से भी बेहतर कमेंट्स...कि जलन हो जाए उससे...उन दिनों किसी का लिखा पढ़ कर परेशान होना नार्मल सा था...लेखक की तारीफ करूँ कि दोस्त के लिए परेशान होऊं. कॉफ़ी विद कुश वाले सेलिब्रिटीज(अफ़सोस हम कभी उतने फेमस न हो पाए). 

उसपर चीज़ थी चिट्ठाचर्चा...और उसपर अनूप शुक्ल की अद्भुत चर्चा, खुद के लेखन में ओरिजिनल होना नार्मल है, लेकिन दूसरों के लिखे को इस तरह से पेश करना कि बाकियों को पढ़ने में मज़ा आये बहुत मुश्किल था. अनूप जी मेरे लिए किंगमेकर रहे हैं. उनकी पारखी नज़र ने एक से बढ़कर एक लोगों से परिचय कराया है. सुबह सुबह चिट्ठाचर्चा खोले बिना हमारा दिन शुरू नहीं हो सकता था. लोगों को धकिया के ब्लॉग शुरू करवाना...बंद पड़े ब्लॉग को कोई कमेन्ट लिख कर जिन्दा कर देना ये सब नार्मल हुआ करता था. मैं आज यहाँ डैलस में बैठ कर नोस्टालजिक हो रही हूँ. रात हो गयी है बहुत. प्रोजेक्ट पर काम भी करना है. 

सोचती हूँ कि लिखना मुश्किल इसलिए है कि बात बंद है. लिखना फिर से उस डायरी की तरह हो गया है जिसे कोई नहीं पढ़ता. उन दिनों कितना आसान था किसी को गरियाना कि लिखा करो. अब कितने फॉर्मल से हो गए हैं. हँस के रह जाते हैं कि तुम लिखोगे ऐसा मुगालता हम नहीं पाल रहे. मगर लगता है कि काश होता ऐसा. किसी दिन लॉग इन करते तो देखते कि साइडबार भरा पड़ा है नयी पोस्ट्स से. धकमपेल हो रखी है. जी भर के गरियाये हैं सबको कि कमीनों एक ही साथ नींद से जाग गए हो. किसको पहले पढ़ें. 

हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन... 

बहुत साल पहले एक पोस्ट लिखी थी 'नीट विस्की पीना कि उसने आज कहा है कि वो तुमसे प्यार करता है' इस पोस्ट पर चुन चुन के कातिल कमेन्ट आये थे...मेरा अब तक का सबसे फेवरिट कमेन्ट का हिस्सा...ये गूगल वूगल पर नहीं नहीं मिलेगा. पोस्ट किताब में छपी है...कमेंट्स मेरे पास रखे हैं, फोल्ड किये खत जैसे. बस कभी कभी पढ़ के मुस्कुरा लेते हैं...ऐसे भी दिन थे जीवन में.

"सही बात है यहाँ..जरा सा पोस्ट मे व्हिस्की-विस्की की दो बूंदें टपकाओ और देखो कि दुनिया भर के गजटेड बेवड़े पुलियों-कुलियों के नीचे से निकल-निकल कर जमा हो जाते हैं आ कर अपना खाली गिलास ले कर..सिंगल माल्ट, ब्लेंडिग, टेक्स्चर, कोन्याकिंग, बनगंध और इलाकेभर के दारुहट..बड़ा संगीन माहौल बन गया है..बोले तो..खैर अपन तो ’कोला से कोला टकराये भोला हो बदनाम’ टाइप प्राणी हैं..जब दिल करता है तो दारू की दुकान (पुलिया वाली) के पास से गुजर भर जाते हैं..हफ़्ता हैंगओवर मे कटता है..वो भी मुफ़्त..(कभी कुछ ’मै नशे मे हूँ’ लेबल वाले प्राणियों से बतिया भी लेते हैं..फ़ार द सेम एफ़ेक्ट)."

25 September, 2015

राइटर्स डायरी - डैलस में रंगों का नृत्य

गंध है कोई. रेंगते कीड़ों जैसी चढ़ती जा रही है पैरों पर. काली लताओं जैसी. किसी गौथ टैटू की तरह. शायद आज दोपहर Millenium series की किताब 'Girl in the spider's web' पढ़ी है इसलिए. ये पूरी सीरीज मुझे बहुत पसंद आई है. लिसबेथ वैसी हिरोइन है जैसा मैं रचना चाहती हूँ बहुत दिनों से...मगर शायद थोड़ा सा बचा जाती हूँ लिखते हुए 'प्लेयिंग सेफ' जैसा कुछ. मगर किसी दिन मैं अपनी कलम को पूरी तरह से निर्भीक बना सकूंगी और रच सकूंगी किसी ऐसी लड़की को जिस पर मुझे गर्व हो.
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मुझे शब्दों की प्यास लगती है. जिन्दा शब्दों की. जिन्हें किसी जीते जागते इंसान ने लिखा है. मैं शब्दों को पढ़ते हुए इमैजिन करना चाहती हूँ उसको. उसके चेहरे पर के भाव. उसके शहर का मौसम. मगर ऐसा सारे लेखकों के साथ नहीं है. कुछ हैं जो अपने लिखे में घुले-मिले हैं. कुछ आर्टिस्ट इसी तरह होते हैं. अपनी कला में घुलेमिले. उनकी कला उनके मर जाने के हज़ारों साल बाद भी ज़िंदा रहती है. क्यूंकि उन्होंने अपनी हर कलाकृति में अपनी रूह का एक हिस्सा रख दिया होता है. मैं जब किसी म्यूजियम में पेंटिंग्स देखती हूँ तो अकस्मात् किसी पेंटिंग के सामने बहुत देर तक ठहर जाती हूँ. ब्रश स्ट्रोक्स की ऊर्जा को महसूसती हूँ. पहली बार पिकासो की पेंटिंग देखी थी वियेना में तो महसूस किया था कि महान होना शायद इसी को कहते हैं. इतने साल बाद भी उसके ब्रश स्ट्रोक्स लगता था जैसे अभी अभी उकेरे गए हों. जैसे आर्टिस्ट एक गीला कैनवास यहीं रख कर हाथ साफ़ करने गया हो. मैं उसके लौट आने का इंतज़ार करती हूँ. उलझे हुए बिम्ब और प्रतीकों वाली उस पेंटिंग के पीछे उसकी मनोदशा को जानना चाहती हूँ. इस जान पहचान के पीछे इस बात का भी हाथ रहता है कि मैंने उस आर्टिस्ट के बारे में कितना जाना है. शायद कर्ट कोबेन की आवाज़ की मर्मान्तक पीड़ा मुझे इसलिए महसूस होती है कि मैं उसके डायरी के पन्नों से गुज़र चुकी हूँ. मगर फिर भी...कर्ट की आँखों में जो स्याह अँधेरा है...उसे लाइव सुनते हुए मैं जैसे जानती हूँ कि वो इस लम्हे नज़र उठा कर देखेगा...वो देखता है और फिर जैसे स्क्रीन नहीं रहती, यूट्यूब नहीं रहता, वक्त एक बिंदु हो जाता है...मैं ठीक सामने होती हूँ उसके...उस लम्हे. मैंने उसे वाकई तब सुना है जब वो गा रहा था...'माय गर्ल माय गर्ल'. 
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मैं उसके शब्दों को अपनी ऊँगली में लेकर मसलना चाहती हूँ. बचपन में चोट लगती थी तो गेंदा के पत्तों को यूं ही मसल कर उनका रस टपकाते थे हमारे स्पोर्ट्स टीचर. ताज़ा घाव से खून बह रहा होता था. रस उसमें घुलमिल जाता. वे फिर पत्तों से ही घाव को दबा देते और अपनी जेब से एकदम साफ़ रुमाल निकालते...सफ़ेद रंग का, और पट्टी बाँध देते. फिर पीठ ठोकते हुए कहते कि खिलाड़ी को गिरने से डर नहीं लगना चाहिए. उन दिनों हम लड़के और लड़कियों में बंटे हुए नहीं थे. हम बस अपने हिस्से का खेल ठीक से खेलना चाहते थे. मैं ४०० मीटर की धावक हुआ करती थी. मुझे उन दिनों लम्बी पारी का खेल समझ आता था. अपनी सारी एनर्जी शुरू में नहीं झोंकनी चाहिए. आखिर के लिए बचा कर रखनी चाहिए. उन दिनों ज़ख्मों पर मिटटी भी रगड़ दिया करते थे हम. मिट्टी से भी घाव भर जाया करते थे. या कि उम्र ऐसी थी. बिना किसी चीज़ के भी घाव भर जाते.
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मैं पढ़ती हूँ उसका लिखा एक वाक्य. कविता का एक टुकड़ा होता है. संजीवनी बूटी के दो बूँद टपकाए गए हों जीभ पर जैसे. मैं जी उठती हूँ. 
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लास्ट टाइम डैलस आई थी तो आर्ट म्यूजियम लगभग रोज़ ही चली जाती थी. पहले दिन एक स्पेशल एक्जीबिशन लगा हुआ था, ''Between action and the unknown'. 'काजुओ शिरागा' एक जापानी आर्टिस्ट जो कि एक ख़ास ग्रुप 'गुटाई' के सदस्य थे. इसकी कहानी काफी रोचक थी. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जापान अपनी आइडेंटिटी क्राइसिस के दौर से गुज़र रहा था. कला और समाज में इसकी क्या जरूरत है...जब जीने के लिए बाकी चीज़ें ज्यादा जरूरी हों और समाज बहुत दिनों तक सिर्फ जीवन की बेसिक जरूरतों को किसी तरह पूरा करने में सक्षम रहा हो...जहाँ मौत और भूख चप्पे चप्पे पर दिखती हो ऐसे में कला सिर्फ साक्षी भाव से चीज़ों को देखना नहीं हो सकता...कला को भी कहीं न कहीं चीज़ों से जुड़ना होगा. चीज़ों से सिर्फ भावनात्मक जुड़ाव काफी नहीं है, इसके अलावा भी कई स्तरों पर एक कलाकार को कोशिश करनी होगी कि कला को बेहतर आत्मसात कर सके. अपनी सीमाओं से ऊपर उठ सके. अपने कैनवास से इतर सोच सके. 
The artist काजुओ को जब उसके गुरु ने कहा कि पेंटिंग को उसके माध्यम से इतर होकर कुछ नया देखना और सोचना होगा...सिर्फ ब्रश उठा कर कैनवास पर किसी दृश्य को उतार देने से बढ़ कर भी कुछ होना चाहिए कला में. तो काजुओ ने 'गति' को पेंटिंग का केंद्र बनाया. उसने कैनवास को ज़मीन पर रखा और छत से एक रस्सी लटकाई...कैनवास पर जगह जगह पेंट उड़ेला और नंगे पांवों से पेंट करना शुरू किया. ये पेंट एक नृत्य सरीखा था. काजुओ का कहना था कि उन्हें पेटिंग एक मूवमेंट की तरह महसूस होती है और वे उसकी लय में कैनवास पर झूमते जाते हैं...उनका पेंट करना बहुत हद तक गति को माध्यम देने जैसा था. पेंटिंग की इस शैली को 'एक्शन पेंटिंग' या 'काइनेटिक पेंटिंग' भी कहते हैं. काजुओ को इन पेंटिंग्स को बनाते हुए आध्यात्मिक अनुभव हुए थे. कला दीर्घा में इन पेंटिंग्स को देखते हुए मैं इनके सम्मोहन में खो जाती हूँ. अधिकतर पेंटिंग्स अपने आप में एक पूरी दुनिया हैं...एक गहन भाव जो पेंटिंग्स से रिसता हुआ महसूस होता है...आत्मा को संतृप्त करता हुआ. उन्हें छूने का मन करता है. हर पेंटिंग एक सान्द्र विलयन है. किसी दूसरी दुनिया का दरवाज़ा. कैनवास गीला लगता है. जैसे छूने से रंग उतर आयेंगे जिंदगी में. मैं देर तक सोचती हूँ. अगर कोई मुझे कहे कि ऐसी कहानी लिखो जिसमें शब्द न हों...ऐसी कविता जिसमें लय न हो...ऐसा अनुभव जिसमें कुछ भी पहले जैसा नहीं हो तो मैं क्या करूंगी. क्या कोई नया माध्यम बना पाऊँगी. नया. घबराहट होती है. शब्दों की प्यास लगती है. फिर.
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कल मैं कब्रिस्तान गयी थी. पूरी दोपहर कब्रों पर लिखी इबारतें पढ़ती रही. लोगों के जन्म मरण की तारीखें. उनका काम. उनके नाम लिखे संदेसे. सोचती रही कि कैसा होता होगा मरने के बहुत सालों बाद भी जरा सी जमीन पर अपना अधिकार जमाये रखना. 

कोई कब्रिस्तान होता है दिल. यूं ही दफन रहते हैं कितने लोग. नाम. तारीखें. इक आधी इबारत कोई. मगर कब्रिस्तान के बारे में डिटेल में फिर कभी. फिलहाल. कोई कहानी है. कुछेक पोस्टकार्ड्स हैं और खोये हुए स्टैम्प्स. इस बार स्याही की बोतल लेकर आई थी कि कम न पड़ जाए. मगर इस बार लिखा नहीं है कुछ. फिर किसी दिन. फिर किसी शाम के रंग में. घुलते. बहते. मिलेंगे खुद से. मुस्कुराएंगे उड़ते हुए हवाईजहाज़ को देख कर. कहेंगे अलविदा. और वाकई जा सकेंगे तुम्हारे दिल के इस कब्रिस्तान से बाहर. अपना कोई वजूद तलाशते हुए. 

<इक गहरी साँस. जैसे अटका हुआ है कोई नाम. कोई किरदार. किसी कहानी का अंत>

18 September, 2015

जीने से इतर

अन्दर एक विशाल खालीपन है. वैक्यूम. जैसे अन्तरिक्ष में होता है.
हम लिखते हैं कि इस खालीपन को भर सकें किसी तरह. शब्दों से. चुप्पी से. कहानियों से. उलटे-पुल्टे किरदारों से. हम लिखते हैं कि मुट्ठी मुट्ठी शब्दों से भर सकें एक कोना ही सही. कहीं एक घर बना सकें शब्दों का और रह सकें उसमें. हम शब्दों से खड़ी करते हैं दीवार. अपनी सुरक्षा के लिए. कि जिससे टिक कर महसूस किया जा सके अपने होने को भी. 

हम लिखते हैं कि भूल न जायें कि हमारा होना क्यों है. हम कई बार इसलिए भी लिखते हैं कि इसके सिवा हमें और कुछ नहीं आता. हमने अपनी जिंदगी में किसी को शब्दों के सिवा कुछ नहीं दिया है. हम दर्ज करते जाते हैं अपने दिन. रात. सुबह. शहर. व्हिस्की की ब्रांड. सिगरेट का धुआं. गाड़ियों का शोर. अनजान शहरों में मिले अजनबी के बच्चों के नाम. ट्रेन पर दिखा कोई गहरे लाल शर्ट पहने खूबसूरत लड़का. किसी म्यूजियम में किसी तस्वीर के सामने बैठी लड़की...जो फ्रेम में दिखती है इतनी खूबसूरत कि लगती है फ्रेम का हिस्सा. 

हम लिखते हैं कि हमें लगता है दुनिया लुप्त होती जा रही है. देखते देखते गायब हो जाते हैं लाल पोस्टबॉक्स. अगर हम न लिखें तो कोई जानेगा भी नहीं कि हुआ करता था यहाँ एक लाल डब्बा कोई. हम लिखते हैं पोस्टकार्ड कि दूर देश बैठे हमारे दोस्त गायब न हो जाएँ दुनिया से. कागज़ के इक टुकड़े पर हम लिखते हैं एड्रेस तो पुख्ता हो जाती है उनकी मौजूदगी. उन्हें कोई यूं ही मिटा नहीं सकता फिर दुनिया के मानचित्र से. हम लिखते हैं घुल जाने वाली शाम के बारे में. कि हम जानते हैं इस होटल में हमारे सिवा शायद ही कोई और देख रहा होगा इस 'heartbreakingly beautiful' शाम को. हम करते हैं जिद कि हमें पश्चिम दिशा का कमरा मिले कि सिर्फ हमारे लिए जरूरी होता है सूर्यास्त. 

हम लिखते हैं कि हमें कोई समझ नहीं सकता. हम लिखते हैं इकतरफे ख़त. हमारी दोस्तियों में भी बची रह जाती है थोड़ी सी जगह. हम लिख लिख कर उस जगह को पाट देना चाहते हैं. हम दिल की दरकी हुयी दरारों को भर देना चाहते हैं कविताओं से...कहानियों से...हैप्पी एंडिंग से. हम जाना चाहते हैं ग्रेवयार्ड. पढ़ते हैं किसी कब्र के पत्थर पर लिखी कहानी कोई. किसी के जीने का गुलाबी पन्ना. किसी के होने का सबसे खूबसूरत अहसास. हम लिखते हैं कि हमें नहीं आता है तसवीरें खींचना. हम लिखते हैं कि हमें चुप रहना नहीं आता. 

हम लिखते हैं कि भूल न जाएँ हम कौन हुआ करते थे. हमारा कोई दुश्मन नहीं. अपने दुश्मन हम खुद हुआ करते हैं. हम देर रात सुबकते हुए कहते हैं अपने बेस्ट फ्रेंड्स को...हमें इन लोगों से क्यूँ हुआ करता है इश्क़...हम क्यूँ नहीं जी सकते बाकी लोगों की तरह. हुआ होगा तुम सबके साथ ये हादसा भी कभी. कोई चाहता है लिखना वैसा जैसे कि लिखते हो तुम...मगर कोई नहीं चाहता वैसा जीना कि जैसे जीते हो तुम. इन तकलीफों को बुला कर अपने दिल में रिफ्यूजी कैम्प नहीं खोलना चाहता है कोई. 

हम अभिशप्त लोग हैं. जीने को अभिशप्त. हमें सीमाएं समझ नहीं आतीं. हम ताउम्र परेशान रहते हैं कि हमसे कहाँ गलतियाँ हुयीं और के ये दुनिया इतनी सिंपल क्यूँ नहीं है जैसी हमें लगती है. किसी से बात करने का मन हुआ तो बात क्यों नहीं की जा सकती...कितना मुश्किल होता है बात करना. आखिर हम क्यूँ कर सकते हैं किसी से भी बात. एअरपोर्ट पर कस्टम ऑफिसर से अचार के बारे में मज़ाक कर सकते हैं. होटल के रिसेप्शन पर लोगों को पोस्टकार्ड के पीछे लिखी हिंदी के छोटे से ख़त का अंग्रेजी अनुवाद कर सकते हैं. हम अगर पूरी दुनिया से बात कर सकते हैं तो उससे क्यों नहीं कर सकते जिससे करने को जी चाह रहा है. ऐसा कौन सा आसमान टूट पड़ता है बात करने से. क्या हो जाता है. क्या. बटरफ्लाई इफ़ेक्ट. उनसे एक रोज़ बात करने से कहीं समंदर में तूफ़ान आ जाता है. है न? 
डैलस आये हुए तीन दिन हुए. कहीं गयी नहीं हूँ. खिड़की से गहरे नीले आसमान से गुज़रते सफ़ेद बादल दिखते हैं. गाड़ियों का शोर आता है. उदासी और आलस का गहरा और खतरनाक कॉम्बिनेशन है. हम चाहते हैं कि लिख लिख कर सारी उदासी को ख़त्म कर दें. आज शहर घूमने जायेंगे. थोड़ी दारू पियेंगे. थोड़ी तसवीरें खींचेंगे. भेजेंगे कुछ पोस्टकार्ड. अपने बदतमीज दोस्तों को. जहाँ गाड़ियां इतनी तेज़ी से गुज़रती हैं कि जिंदगी भी नहीं गुज़रती...उस शहर में लेना चाहती हूँ एक गहरी सांस और चीखना चाहती हूँ अपने सारे दोस्तों का नाम. आई मिस यू. ब्लडी इडियट्स.

11 September, 2015

किस्सा-ए-बदतमीज़ शाहज़ादा, पागल लड़की और नीली स्याही

कभी कभी लगता है हमसे ड्रामेबाज़ कोई और हो तो हम जानते नहीं. शाम में मूड बना...आंधी तूफ़ान की तरह घर से निकले हैं....भागते मूड को पकड़ना जरूरी था...दिल तो ये भी कर रहा था कि कोई विस्की टाइप चीज़ होता तो नीट पी जाते बोतल से ही...मगर घर पर था नहीं और दूर जा के लाने का इन्तेजाम नहीं था...मने कि बाइक चलाना अभी डॉक्टर अलाव नहीं किया है...हम उसको बोले कि हम दो बार चला लिए पिछले हफ्ते तो हमको घूरा...कि हमसे पूछने का मतलब ही क्या है जब अपने ही मन का करती हो...पर खैर दस दिन का बात है और फिर हम अपने हाथ का जो चाहे इस्तेमाल कर सकते हैं...मार पिटाई...ढिशूम ढिशूम वगैरह वगैरह.

तो शाम को उधर से ही डोलते डालते आये थे कि बस...आज तो जो करवा लो हमसे...बीड़ी पहले कभी खरीदी नहीं थी...पान की दूकान पर पूछे तो बोला यहाँ नहीं आगे मिलेगा...आगे मिलेगा...तीन और पान का दूकान पर पूछे तब जा के चौथे पर बोला कि हाँ है...दो पैकेट बीड़ी खरीदे...वहीं से धूंकते हुए घर आये...कान में इयरफोन लगा हुआ था फुल साउंड में...रंगरेज़ मेरे सुनते हुए आये...
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बहुत सी बीड़ी धूंकने के बाद बावले होने का मौसम आया था. लड़की ने जाने कब से शैम्पू नहीं किया था...बालों में शहर का मौसम इस कदर उलझ गया था कि बस...हर कश में मुहब्बत सा जलता था...पहली बार इश्क हुआ था तो भी ऐसा ही लगा था.
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'ये १७वीं बीड़ी है मेरी जान. कलेजा जल जाएगा', मेरे होठ चूमते हुए उसने पूछा, 'अब किससे इश्क़ हो गया है तुझे?'
'मौत से'
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घर पर खूब सारा डांस किया...खूब सारा...सर दर्द के मारे फटा जा रहा था...खुमार की तरह शब्द चढ़ रहे थे...बहुत बहुत बहुत दिनों बाद...लग रहा था मैं पूरी पूरी लिक्विड बन गयी हूँ और बस कागज़ पर उतर जाऊं किसी तरह...बीड़ी रखने को ऐशट्रे मिल नहीं रही थी...कानों में हेडफोन लगे हुए थे...बोस वाले...कि बस आगे दुनिया फिर मुझे दिखती कहाँ है. इधर बहुत सोचने लगती हूँ मैं...अच्छा बुरा...जाने क्या क्या. सही गलत. मेरे अन्दर वो जो पागल लड़की रहती थी, उसे जेल में डाल दिया था. वो मुझे पागल कर रही थी. सलीके से जीना पहले कहाँ आता था मुझे. न चीज़ों को परफेक्ट करना.

इधर लिखने की आदत छूट गयी है तो शब्द आते हैं तो उनको लिखने का डिसिप्लिन गायब था...उँगलियाँ बौरा रही थीं...और फिर ये भी लग रहा था कि शब्दों में नहीं हो पायेगा...कुछ और मीडियम चाहिए इनको. तो बस. हेडफोन ऑन था ही. लैपटॉप पर रिकॉर्ड कर दिया. ये इसलिए नहीं है कि कोई इसे पसंद करे....ये इसलिए है कि मेरे अन्दर इक लड़की रहती है...दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की. उससे मुझे बेपनाह इश्क़ है...अब ये गुनाह है तो गुनाह सही.
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तुम्हें देखना चाहिए उसे. अभी. इस लम्हे. इस शहर की किसी बालकनी से...इस बेमुरव्वत शहर की किसी खिड़की से...इस नामुराद शहर की किसी सड़क पर चलते हुए...यूँ झूमते हुए...खुद के इश्क़ में यूं डूबी हुयी कि मौत के गले पड़ जाए तो मौत पीछा छुड़ा कर भाग ले पतली गली से.
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इक दुष्ट शहजादा था...हाँ, वही...जिसने लड़की का दिल चुरा लिया था...इस बार वो उसकी नीली स्याही की दवात लिए भागा है...बताओ, शोभा देता है उसको...शहजादा होकर भी ऐसी हरकतें...उफ़...आपको कहीं मिले तो समझाना उसे...ठीक?

09 September, 2015

तालपत्र, संस्कृत की लिपियाँ और इतिहास की चिप्पियाँ

मुझे याद है कि जब मैं स्टैण्डर्ड एट या सेवेन में थी तो मुझे लगता था हम हिस्ट्री क्यूँ पढ़ते हैं. सारे सब्जेक्ट्स में मुझे ये सबसे बोरिंग लगता था. एक कारण शायद ये भी रहा हो कि हमारी टीचर सिर्फ रीडिंग लगा देती थीं, अपनी तरफ से कुछ जोड़े बगैर...कोई कहानी सुनाये बगैर. उसपर ये एक ऐसा सब्जेक्ट था जिसमें बहुत रट्टा मारना पड़ता था. पानीपत का युद्ध कब हुआ था से हमको क्या मतलब. कोल्ड वॉर चैप्टर क्यूँ था मुझे आज भी समझ नहीं आता. या तो हमारी किताबें ऐसी थीं कि सारे इंट्रेस्टिंग डिटेल्स गायब थे. अब जैसे प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध को अगर कोई टीचर रोचक नहीं बना पा रहा है तो वो उसकी गलती है. उन कई सारे किताबों पर भारी पड़ती थी एक कहानी, 'उसने कहा था'. मुझे लगा था कि टेंथ के बाद हिस्ट्री से हमेशा के लिए निजात मिल गयी.

बीता हुआ लौट कर आया बहुत साल बाद 2006 में...नया ऑफिस था और विकिपीडिया पहली बार डिस्कवर किया था. मुझे ठीक ठीक याद नहीं कि मैं द्वितीय विश्व युद्ध के बारे में क्यों पढ़ रही थी...शायद हिटलर की जीवनी से वहाँ पहुंची थी या ऐसा ही कुछ. उन दिनों जितना ही कुछ पढ़ती जाती, उतना ही लगता कि दुनिया के बारे में कितना सारा कुछ जानने को बाकी है. उस साल से लेकर अब तक...मैंने इन्टरनेट का उपयोग करके जाने क्या क्या पढ़ डाला है. विकिपीडिया और गूगल के सहारे बहुत सारा कुछ जाना है. उन दिनों पहली बार जाना था कि खुद को और इस दुनिया को बेहतर जानने और समझने के लिए इतिहास को समझना बहुत जरूरी है.

ग्रेजुएशन में मैंने एडवरटाइजिंग में मेजर किया है. दिल्ली में जब पहली बार ट्रेनिंग करने गयी तो वो एक ऐड एजेंसी थी. उन दिनों कॉपीराइटर बनने के लिए भाषा परफेक्ट होनी जरूरी थी. प्रूफ की गलतियाँ न हों इसलिए नज़र, दिमाग सब पैना रखना होता था. कॉमा, फुल स्टॉप, डैश, हायफ़न...सब गौर से हज़ार बार चेक करने की आदत थी. बात हिंदी की हो या इंग्लिश की...मेरे लिखे में कभी एक भी गलती नहीं हो सकती थी. न ग्रामर की न स्पेलिंग की...और इस बात पर मैं स्कूल के दिनों से काफी इतराया करती थी.

अंग्रेजी का एक टर्म है 'occupational hazard' यानि पेशे के कारण होने वाली परेशानियाँ. जैसे कि फौजी को छुट्टियाँ नहीं मिलतीं. सिंगर को किसी भी ग्रुप में लोग हमेशा गाने के लिए परेशान कर देते हैं. कवि से लोग कटे कटे से रहते हैं. डॉक्टर से सब लोग बीमारियों की बहुत सी बातें करते हैं वगैरह वगैरह. तो ये कॉपीराइटर के शुरू के तीन महीनों के कारण मेरी पूरी जिंदगी कुछ यूँ है कि हम शब्दों पर बहुत अटकते हैं. लिखा हुआ सब कुछ पढ़ जाते हैं. फिल्मों के लास्ट के क्रेडिट्स तक. रेस्टोरेंट के मेनू में टाइपो एरर्स देखते हैं...यहाँ तक कि हमें कोई लव लेटर लिख मारे(अभी तक लिखा नहीं है किसी ने) तो हम उसमें भी टाइपो एरर देखने लगेंगे. जब पेंग्विन से मेरी किताब छप रही थी, 'तीन रोज़ इश्क़' तो उसकी बाई लाइन थी 'गुम होती कहानियाँ'. जब किताब का कवर बन के आया तो मैंने कहा, 'कहानियां' में टाइपो एरर है, बिंदु नहीं चन्द्रबिन्दु का प्रयोग होगा. मेरे एडिटर ने बताया कि पेंग्विन चन्द्रबिन्दु का प्रयोग अपने किसी प्रकाशन में नहीं करता. मुझे यकीन नहीं हुआ कि पेंग्विन जैसा बड़ा प्रकाशक ऐसा करता है. कमसे कम आप्शन तो दे ही सकता है, अगर किसी लेखक को अपने लेखन में चन्द्रबिन्दु चाहिए तो वो खुद से कॉपी चेक करके दे. मगर पहली किताब थी. हम चुप लगा गए. अगर कभी अगली किताब लिखी तो इस मुद्दे पर हम हरगिज़ पीछे नहीं हटेंगे.

भाषा और उससे जुड़ी अपनी पहचान को लेकर मैं थोड़ा सेंटी भी रहती हूँ. मुझे अपने तरफ की बोली नहीं आती...अंगिका...मेरी चिंताओं में अक्सर ये बात भी रहती है कि भाषा या बोली के गुम हो जाने के साथ बहुत सी और चीज़ें हमेशा के लिए खो जायेंगी. बोली हमारे पहचान का काफी जरूरी हिस्सा है. मुझे अच्छा लगता है जब कोई बोलता है कि तुम्हारे हिंदी या इंग्लिश में बिहारी ऐक्सेंट आता है. इसका मतलब है कि दिल्ली और अब बैंगलोर में रहने के बावजूद मेरे बचपन की कोई चीज़ बाकी रह गयी है जिससे कि पता चल सके कि मेरी जड़ें कहाँ की हैं.

ओरियेंटल लाइब्रेरी में रखे रैक्स में तालपत्र
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मैसूर युनिवर्सिटी का ये शताब्दी साल है. इस अवसर पर एक कॉफ़ी टेबल बुक का लेखन और संपादन कर रही हूँ जो कि यूनिवर्सिटी द्वारा जनवरी में प्रिंट होगा. प्रोजेक्ट की शुरुआत में हम वाइसचांसलर और रजिस्ट्रार से मिलने गए. यूनिवर्सिटी में ओरिएण्टल लाइब्रेरी है. हमने रिसर्च की शुरुआत वहीं से की...इस लाइब्रेरी में कुल जमा 70,000 पाण्डुलिपियाँ हैं, जिनमें कुछ तो आठ सौ साल से भी ज्यादा पुरानी हैं. मैंने पांडुलिपियों की बात सुनी तो सोचा कि एक आध होंगी. अभी तक जितनी भी देखी थीं वो सिर्फ संग्रहालयों में, वो भी शीशे के बक्से में. यहाँ पहली बार खुद से छू कर ताड़ के पत्तों पर लिखा देखा. इनपर लिखने के लिए धातु की नुकीली कलम इस्तेमाल होती थी...तालपत्र पर लिखने वालों को लिपिकार कहते थे. कवि, लेखक, इत्यादि अपनी रचनायें कहते थे और लिपिकार उन्हें सुन कर तालपत्रों पर उकेरते जाते थे. 
उसे लाइब्रेरी कहने का जी नहीं चाहता...ग्रंथालय कहने का मन करता है. लोहे के पुराने ज़माने के रैक और लोहे की जालीदार सीढियाँ. ज़मीन से तीन तल्लों तक जाते रैक्स और उनपर ढेरों पांडुलिपियाँ. एक अजीब सी गंध. पुरानी लकड़ी की...लेमनग्रास तेल की...और पुरानेपन की. जैसे ये जगह किसी और सदी की है और हम किसी टाइम मशीन से यहाँ पहुँच गए हैं. सन के धागे से बंधे तालपत्र. उनपर की गयी नम्बरिंग. मैंने सब फटी फटी आँखों से देखा. मुझे पहली बार मालूम चला कि संस्कृत को देवनागरी की अलावा कई और लिपियों में लिखा गया है. कन्नड़. ग्रंथ. तमिल. ये मेरे लिए बहुत आश्चर्य की बात थी. उन्होंने दिखाया कि कन्नड़ में लिखी गयी संस्कृत के श्लोकों के बीच खाली जगह नहीं दी गयी थी. संस्कृत में वैसे भी लम्बे लम्बे संयुक्ताक्षर होते हैं लेकिन बिना किसी स्पेस के लिखे हुए श्लोकों को पढ़ना बेहद मुश्किल होता है. फिर हर लिपिकार की हैण्डराइटिंग अलग अलग होती है...हमें वहां मैडम ने बताया कि कुछ दिन तो एक लिपिकार की लिपि समझने में ही लग जाते हैं. उन्होंने ये भी बताया कि देवनागरी में तालपत्रों पर लिखने में मुश्किल होती थी क्योंकि देवनागरी में अक्षरों के ऊपर जो लाइन खींची जाती है, उससे तालपत्र कट जाते थे और जल्दी ख़राब हो जाते थे.
तालपत्र- ओरियेंटल लाइब्रेरी, मैसूर, clicked by my iPhone

मैसूर गए हुए दो महीने से ऊपर होने को आये लेकिन ये तथ्य कि संस्कृत किसी और लिपि में भी लिखी जाती है, मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा था. मगर फिर पिछले कुछ दिनों से एक्सीडेंट के कारण कुछ अलग ही प्राथमिकताएं हो गयीं थीं तो इसपर ध्यान नहीं गया. कल फिर प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया तो बात यहीं अटक गयी. एक दोस्त से डिस्कस कर रही थी तो पहली बार ध्यान गया कि संस्कृत या फिर वेद...मेरे लिए ये दोनों inter-changeable हैं. मैं जब संस्कृत की बात सोचती हूँ तो वेद ही सोचती हूँ. फिर लगा कि वेद तो 'श्रुति' रहे हैं. तो पूरे भारत में अगर सब लोग वेद पढ़ रहे होंगे या कि सीख रहे होंगे तो लिपि की जरूरत तो बहुत सालों तक आई भी नहीं होगी...और जब आई होगी तो जिस प्रदेश में जैसी लिपि का प्रचलन रहा होगा, उसी लिपि में लिखी गयी होगी.

बात फिर से आइडेंटिटी या कहें कि पहचान की आ जाती है. मैंने शायद इस बात पर अब तक कभी ध्यान नहीं दिया था कि मैं एक ब्राह्मण परिवार में जन्मी हूँ और उसके बाद देवघर में पली बढ़ी. वेद और श्लोक हमारे जीवन में यूँ गुंथे हुए थे कि हमारी समझ से इतर भी एक इतिहास हो सकता है इसपर कभी सोच भी नहीं पायी. अगर आप देवघर मंदिर जायेंगे तो वहां पण्डे बहुत छोटी उम्र से वेद-पाठ करते हुए मिल जायेंगे. उत्तर भारत की इस पृष्ठभूमि के कारण भी मैंने कभी संस्कृत के उद्गम के बारे में कुछ जानने की कोशिश भी नहीं की. आज मैंने दिन भर भाषा और उसके उद्गम के बारे में पढ़ा है. भाषा मेरी समझ से कहीं ज्यादा चीज़ों के हिसाब से बदलती है...इसमें बोलने वाले का धर्म...उस समय की सामाजिक संरचना...सियासत...कारोबार... बहुत सारी चीज़ों का गहरा असर पड़ता है.

Brahmi script on Ashoka Pillar,
Sarnath" by ampersandyslexia 
भारत की सबसे पुरानी लिपि ब्राह्मी है. 250–232 BCE में बने अशोक स्तम्भ पर ब्राह्मी लिपि के उद्धरण हैं. ब्राह्मी लिपि से मुख्यतः दो अलग तरह के लिपि वर्ग आगे जाके बनते गए...दक्षिण भारत की लिपियाँ जैसे कि तमिल, कन्नड़, तेलगु इत्यादि वृत्ताकार या कि गोलाई लिए हुए बनीं जबकि उत्तर भारत की लिपियाँ जैसे कि देवनागरी, बंगला, और गुजराती में सीधी लकीरों से बनते कोण अधिक थे. संस्कृत को कई सारी लिपियों में लिखा गया है. 

मेरी मौसी ने संस्कृत में Ph.D की है. इसी सिलसिले में आज उनसे भी बात हुयी. अपनी थीसिस के लिए उन्होंने ग्रन्थ लिपि सीखी थी और इसमें लिखे कई संस्कृत के तालपत्रों को बी ही पढ़ा था. उन्होंने एक रोचक बात भी बतायी...लिपिकार हमेशा कायस्थ ही हुआ करते थे. इसलिए कायस्थों की हैण्डराइटिंग बहुत अच्छी हुआ करती है. 

जाति-व्यवस्था के बारे में मैंने कभी सोचा नहीं था. अपने ब्राह्मण होने या अपने कायस्थ दोस्तों की राइटिंग अच्छी होने के बारे में भी इस नज़रिए से कभी नहीं देखा था. अब सोचती हूँ कि गाहे बगाहे हमारा इतिहास हमारे सामने खड़ा हो ही जाता है...हमारी जो जड़ें रही हैं, उनको झुठलाना इतना आसान नहीं है. इतने सालों बाद सोचती हूँ कि वाकई इतिहास को सही तरह से जानना इसलिए भी जरूरी है कि हम अपनी पुरानी गलतियों को दोहराने से बचें.

भाषा और इसके कई और पहलुओं पर बहुत दिन से सोच रही हूँ. कोशिश करूंगी और कुछ नयी चीज़ों को साझा करूँ. इस पोस्ट में लिखी गयी चीज़ें मेरे अपने जीवन अनुभवों और थोड़ी बहुत रिसर्च पर बेस्ड हैं. ये प्रमाणिक नहीं भी हो सकती हैं क्योंकि मैं भाषाविद नहीं हूँ. कहीं भूल हुयी होगी तो माफ़ की जाए.

07 September, 2015

जहाँ भी रहो...अपने जाम में हमारे नाम की बर्फ डालना मत भूलना.

'कहाँ जा रही हो जानेमन?',
'जहन्नुम'
'इतना बड़ा बक्सा लेकर? इसमें क्या मंटो उस्ताद के लिए किताबें ले जा रही हो?'
'गोश्त ले जा रही हूँ. कलेजी. तुझ जैसे जले बुझे लोगों की हाय. तू मेरे मंटो का पीछा छोड़ के मर क्यूँ नहीं जाती?'
'मरें तेरे आशिक़...इस बेतरह खूबसूरत दुनिया से रुखसत होने को जब तक मंटो का पर्सनल लेटर नहीं आएगा...हम तो न जाने वाले हैं...हाँ तू जा ही रही है तो ये ले...मेरा रूमाल लेते जा सरकार के लिए...उन्हें कहना, बंदी उनके इश्क़ में अपनी जिंदगी बर्बाद कर रही है...वे मुझे जल्द बुलावा भेजें कि हालत बहुत नाज़ुक है'.
'तेरी नाज़ुक हालत से मंटो का क्या कनेक्शन? ये सब इस कमबख्त सिगरेट का किया धरा है...इतनी सिगरेट न पिया कर...यूँ भी तेरा जिगर जला हुआ है...जुबान जल जायेगी तो और जली कटी बातें किया करेगी'
'इत्ती चिंता है तो एक आध अपने आशिकों का कोटा मेरे नाम करती जा'
'मैं घूमने जा रही हूँ...मर नहीं रही जो अपने आशिकों का कोटा तेरे नाम कर दूं...और दुनिया में लड़कों की कमी पड़ गयी है...तुझसे सेकंड हैण्ड माल में कब से इंटरेस्ट होने लगा?'
'तेरी छुअन से नार्मल लड़के भी नशीले हो जाते हैं मेरी जान...हम तो उन्हें वहां वहां चूमेंगे जहाँ तुम्हारे निशान बाकी होंगी...तू न सही...तेरे यार सही'
'मैं न सही? दिन भर, रात भर मेरे कमरे में घर बनाया हुआ है...आखिरी बार अपने घर कब गयी थी? कपड़े मेरे पहनेगी...माँ को मुझसे ज्यादा तेरी पसंद के बारे में पता है...पापा तेरे कैरियर को लेकर परेशान हैं...भाई तेरा दिया फ्रेंडशिप बैंड पहनता है, मेरी लायी राखी नहीं...मेरे आशिकों की गिनती मेरे से ज्यादा तुझे याद है...और मैं कितनी चाहिए तुझे बे?'
'पर तुझे मुझसे प्यार नहीं होता'
'क्यूंकि तूने मंटो पर बुरी नज़र डाल रखी है. तू मंटो को छोड़ दे, मैं पूरी की पूरी तुम्हारी'
'घाटे का सौदा मैं नहीं करती मेरी जान'
'मर फिर. मैं कुछ नहीं बता रही कि कहाँ जा रही हूँ. फुट यहाँ से...कर ले जो करना है'
'देख, कर तो मैं बहुत कुछ सकती हूँ...तू हाथ तो लगाने दे'
'उफ़. लड़के क्या कम आफत थे जो तुमने ये नया शगल पाला है. आई एम स्ट्रेट'
'स्ट्रेट बोले तो सीधी...माने कि जलेबी की तरह'
'भुक्खड़...हमेशा खाने का सोचेगी'
'सोचो, तुम दुनिया की आधी आबादी से इश्क़ करने का चांस मिस कर रही हो'
'तुम्हें ऐसा लगता है कि मुझे इश्क़ की कमी है? जितना है उतनी आफत है...इससे ज्यादा हैंडल नहीं होगा मुझसे'
'यू आर अंडरएस्तिमेटिंग योरसेल्फ...अगर किसी से हैंडल होगा तो तुमसे होगा...कोई ख़ास अंतर नहीं है...तुम एक बार सोच के तो देखो...अपने दिमाग की खिड़कियाँ खोलो मेरी जान...ये लिहाफ हटाओ'
'अच्छा...तो अभी तक इस्मत का जादू चढ़ा हुआ है तेरे सर माथे...मंटो की जगह उससे प्यार कर लो...तुम्हें तो औरतें पसंद आती हैं'
'इस्मत में तेरी वाली बात नहीं है'
'अच्छा...कौन सी बात?'
'हॉटनेस मेरी जान...इस्मत में हॉटनेस की कमी है'
'तुम बायस्ड हो.'
'हाँ, हूँ. मेरा हक बनता है'
'तुम्हें इस्मत से इसलिए प्यार नहीं है क्यूंकि मुझे इस्मत से प्यार नहीं है.'
'अब तुम खुद को ओवरएस्टीमेट कर रही हो. तुम्हें क्या लगता है मेरी जिंदगी तुम्हारे इर्द-गिर्द घूमती है? तुम्हारे बगैर मैं किसी को नापसंद भी नहीं कर सकती?
'मुझे तुझसे उस तरह का प्यार नहीं होगा कभी. कित्ती बार बोलूंगी तो बात समझ आएगी तुझे?'
'कभी नहीं आएगी. पर वो झगड़ा तो अपन जिंदगी भर कर सकते हैं...फिलहाल ये सामान कहाँ के लिए बाँध रही है वो बता'
'अपने देश में एक नदी है. चम्बल. वहाँ. एक फकीर रहता है'
'चम्बल किनारे डाकू होते हैं. फकीर नहीं.'
'डाकू हॉट हुए तो मुझे दिक्कत नहीं है.'
'मरने का इतना शौक़ है तो हिमालय जा के मर. पहले एक आध किताब लिख मार. न हो तो सुसाइड लेटर्स की एक किताब लिख दे...इतने तो ड्राफ्ट्स लिखे पड़े हैं. तेरे जाने के बाद ये सब मेरा हो जाएगा?'
'तू मेरे सामान से दूर रह. और यूं भी डाकू और फ़कीर में कोई बहुत ज्यादा अंतर नहीं है. दोनों दुनिया को ठुकराए हुए लोग होते हैं...ज्ञान जहाँ से मिले लपेट लेना चाहिए. चम्बल किनारे का डाकू भी जीना सिखा सकता है'
'तू मर जाने की वजह टाइप करने वाली चलती फिरती टाइपरायटर है...तुझे जीना कोई नहीं सिखा सकता'
'चम्बल की खासियत मालूम है तुझे...चम्बल उलटी बहती है...दक्खिन से उत्तर की तरफ...जबकि भारत की सारी नदियाँ उत्तर से दक्खिन बहती हैं'
'तो?'
'मने, चम्बल की धार उलटी है...चम्बल के किनारे का फ़कीर दुनिया से उलट होगा...उसे मैं समझ आउंगी'
'ये किसने कहा? बात की है तूने फ़कीर से...उसका फेसबुक पेज है? व्हाट्सऐप्प पर उसकी प्रोफाइल पिक दिखा'
'मुझे ये सब नहीं मालूम है'
'तो फिर?'
'बस...कुछ है तो जो मुझे खींच रहा है उस ओर...मैं जानती हूँ चम्बल किनारे कोई फ़कीर है जिसके पास मेरे हिस्से के सारे सवाल होंगे'
'और मेरे सवालों का जवाब कौन देगा? ये किसने गोली दी है तुझे नदियों की दिशा के बारे में? नील नदी भी उत्तर से दक्खिन बहती है...तो? नील नदी के किनारे चली जाएगी?'
'चली जाती अगर कोई मेरा टिकट कटा देता'
'मैं भी चलूंगी तेरे साथ?'
'क्यूँ?'
'इन उलटे पुल्टे प्लान्स का कुछ नहीं होगा...कोई जरूरत नहीं है जाने की...तुझे क्या लगता है कि वाकई चम्बल किनारे कोई फ़कीर बैठा होगा?'
'जानेमन...कुछ न होगा तो तजरबा होगा'
'घंटा होगा...तेरा दिमाग खराब है'
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आपको किसी ने बताया कि चम्बल उल्टी दिशा में बहती है? या कि किसी फ़कीर के बारे में ही?
अब भी उसके लिखे खतों से चम्बल की उजाड़ उदासी बहती है...बीहड़ों में कुछ जिद्दी यादें डाका डालने को तैयार रहती हैं हर वक़्त. दुनिया से किसी एक लड़की के गुम हो जाने से किसी को फर्क नहीं पड़ता. मैं देखती हूँ कि सब पहले जैसा चल रहा है. लोग उसके इंतज़ार के बिना जीने की आदत डाल चुके हैं. मुझे ठीक ठीक याद नहीं मैं उसकी कौन सी बात मिस करती हूँ सबसे ज्यादा. अक्सर मुझे लगता है कि मुझे सबसे ज्यादा दुःख इस बात का होता है कि उसके बिना मंटो से मुहब्बत करने में कोई जायका नहीं.
दोस्त. दुश्मन. परिवार. सब अपनी अपनी जगह है...बहुत खोजने से शायद मिल जाते हैं...या इनके बिना जी जा सकती है ज़िन्दगी. मगर एक अच्छा रकीब...उफ्फ्फफ्फ्फ़. बहुत किस्मत से मिलता है. बहुत. 

तो मेरे रकीब...चियर्स. जहाँ भी रहो...अपने जाम में हमारे नाम की बर्फ डालना मत भूलना.

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