23 July, 2013

शिप ऑफ़ थीसियस

मुझे फिल्म ख़त्म होने के बाद की कास्टिंग के सारे टाइटल्स तक रुकना अच्छा लगता है. कल की फिल्म 'शिप ऑफ़ थीसियस' देखने के बाद भी सारे टाइटल्स तक रुकी रही. हॉल से बाहर आते हुए मन ऐसा भरा भरा सा था कि कुछ देर एकदम चुप रहने का मन था. इतना कुछ था कहने को कि समझ नहीं आ रहा था कि शुरुआत कहाँ से करूँ. मगर मालूम था कि इस फिल्म के बारे में लिखना पड़ेगा.
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Ship of Theseus के बारे में मालूम चला, IIMC के सहपाठी अंकुर ने इस पन्ने को लाईक करने का लिंक भेजा था. ट्रेलर देखते हुए फिल्म के बारे में एक गहरी उत्सुकता बन गयी थी. वीकेंड में व्यस्त थी तो नहीं देख पायी. कल मंडे होते हुए भी रात का शो देखने की ललक थी. ऑनलाइन कटाने की कोशिश की तो पीवीआर हाउसफुल. फिर बुकमायशो से टिकट कटाई. कुणाल व्यस्त था तो सोचा अकेली चली जाऊं, फिर नेहा से पूछा, वो फ्री थी तो उसके साथ चली गयी.

फिल्म में कुछ छूट न जाए इसलिए बिफोर टाईम पहुंचे, जो कि एक तरह का रिकोर्ड ही है. पोपकोर्न और कोल्ड ड्रिंक लेकर अन्दर गए तो अचरज से भर गए. पीवीआर कोरमंगला में मंडे को रात का शो वाकई हाउसफुल था. बंगलौर जैसे शहर में जहाँ भागते दौड़ते फुर्सत नहीं मिलती, कितने सारे लोग इस फिल्म को देखने आये थे.
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फिल्म का टाइटल शिप ऑफ़ थीसियस नाम की कहानी पर है. एक शिप होता है, जैसे जैसे उसके पुर्जे ख़राब होते जाते हैं, एक एक करके उसके सारे पुर्जे, लकड़ियाँ, खम्बे, सब कुछ बदल दिया जाता है. एक वक़्त में शिप में पुराने शिप का कोई पुर्जा भी नहीं होता. शिप के ख़राब हुए पुराने पुर्जों को जोड़ कर एक शिप बना दिया जाए, तो इन दोनों में असली शिप ऑफ़ थीसियस कौन सा होगा.

फिल्म में तीन कहानियां हैं. पहली एक फोटोग्राफर की कहानी है जो बचपन में आँखों के कोर्निया इन्फेक्शन के कारण देख नहीं सकती. उसके पास एक कैमरा है जो आसपास की चीज़ों के बारे में बोल कर बताता है. वो सुन कर, महसूस कर के तसवीरें खींचती हैं. उसका पार्टनर/बॉयफ्रेंड भी उसे उसकी खींची हुयी तस्वीरों के बारे में डिटेल में बताता है. दोनों में इस बात पर बहस होती है कि अच्छी तस्वीर कौन सी है, लड़की का कहना है वो तस्वीर जो मैंने सुन कर महसूस कर के खींची है...इत्तिफाक से खींची गयी अच्छी तस्वीर भी वो अपने कलेक्शन में नहीं रखना चाहती. उसे सिर्फ वो चीज़ें रखनी हैं जिन्हें उसने खुद कम्पोज किया है, जिस कहानी को वो कहना चाहती है. ये उसका अंतिम निर्णय है कि कौन सी तस्वीर रखी जाए और कौन सी नहीं.

फिल्म का ये सीन किचन में फिल्माया गया है. मुझे याद करने पर भी याद नहीं आता कि किसी आखिरी फिल्म में इस बात पर बहस कब देखी थी कि व्हाट इज आर्ट. कि हर एक का नजरिया अलग होता है. एक आर्टिस्ट लोगों के लिए, उनके हिसाब से नहीं रच सकता...वो इसलिए रचता है कि उसे अपना कुछ कहना होता है. वरना क्या फर्क पड़ता है. फिल्म का ये सेगमेंट मेरे लिए सबसे रियल था. सवाल जैसे मेरे सवाल थे. बैकग्राउंड स्कोर में सन्नाटे का बेहतरीन इस्तेमाल था.

फिल्म की दूसरी कहानी एक जैन साधू की है. सिनेमैटोग्राफी के लिहाज़ से ये मेरा सबसे पसंदीदा हिस्सा है. बारिश भीगता मुंबई हो या विंडमिल के खेतों में गुज़रती साधुओं की छोटी टोली. इसमें सवाल इतने सारे और फिलोसफी इतनी गहरी कि कई बार तो लगता था कितना कुछ मिस कर गए. फिल्म को स्लो मोशन में देखने का दिल करता था.

फिल्म का तीसरा हिस्सा एक व्यक्ति के बारे में है जिसने किडनी का ओपरेशन करवाया है. इसमें मेरा पसंदीदा हिस्सा है जहाँ वो अपनी नानी से बात कर रहा होता है. नानी का कहना है जिंदगी में इतना कुछ देखने को है, इतना कुछ करने को है, तुम एक आम सी जिंदगी कैसे जी सकते हो. जवाब है कि मुझे नहीं चाहिए इतनी सारी चीज़ें. मैं अच्छा कमाता खाता हूँ, लोग मेरी इज्ज़त करते हैं, अ लिटिल ह्युमनिटी...और क्या चाहिए इंसान को. मुझे वाकई सिर्फ इतना ही चाहिए.
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फिल्म देख कर गर्व की अनुभूति होती है. हालाँकि इसे किसी कैटेगरी में नहीं डाल सकते लेकिन मिनिमलिस्ट फिल्म है. इसकी रफ़्तार कभी धीमी तो कभी बहुत तेज़ है. बहुत सारे डायलॉग नहीं हैं पर जो हैं बेहतरीन हैं. फिल्म आपको पासिव ऑब्जर्वर नहीं, अपना हिस्सा बनाती है, अपने द्वन्द, ड्यूअलिटी का हिस्सा. जहाँ आप दोनों पक्ष देखते हैं.

फिल्म देख कर लगता है कि भारतीय सिनेमा एक युग आगे जा चुका है. अपने देश में ऐसी फिल्म बन भी सकती है यकीन नहीं होता. इसके सारे सरोकार भारतीय हैं, कुछ ऐसा जो कहीं और, किसी और देश में नहीं बन सकता था. मालूम नहीं चलता कि फिल्म कहाँ से आपकी अपनी हो जाती है, महज दर्शक होने से...आप फिल्म का हिस्सा हो जाते हैं. फिल्म आज के दौर की है मगर इसके सवाल हर दौर में उतने ही महत्वपूर्ण रहेंगे. फिल्म काल-क्षय से परे है. शिप ऑफ़ थीसियस की तरह, फिल्म के कई पुर्जे उन सारे लोगों में लग गए हैं जिन्होंने इस फिल्म को देखा है. जब तक ये लोग रहेंगे, शिप ऑफ़ थीसियस विस्मृत नहीं होगा.

अगर आपको फिल्में पसंद हैं और शिप ऑफ़ थीसियस आपके शहर में लगी है तो आपको ये फिल्म जरूर देखनी चाहिए. बड़ा पर्दा इन्ही चीज़ों के लिए अस्तित्व में आया है. जिंदगी की सूक्ष्म विशालताओं के लिए.

फिल्म को पांच में से साढ़े पांच स्टार्स.
Rating 5.5 out of 5 stars.

Ship of Theseus - Trailer


12 July, 2013

स्टॉप आई लव यू स्टॉप

i stop love stop you stop | i love you stop

दिल का टेलीग्राम कुछ ऐसे ही जाता है तुम्हें. समझ नहीं आता है कि क्या कहना चाह रही हूँ. दो फॉर्मेट सामने रखे हुए हैं. अख़बार में पढ़ने को आया कि भारत में आखिरी तार १४ जुलाई की रात को दस बजे भेजा जाएगा. कौन सी बात ज्यादा सही है? तुम्हें पूरा आई लव यू बोल कर रोकना है या कि हर लफ्ज़ पर स्टॉप...स्टॉप...स्टॉप... स्टॉप... रुक जाओ कि जान चली जायेगी.

तुम्हें कुछ भी लिखने चलूँ जगह कम पड़ जाती है. याद है वो शुरू के पोस्टकार्ड जो मैंने भेजे थे तुम्हें? उनमें कितना कुछ तो लिखना था मगर सिर्फ इतना ही कह पायी कि दूर देश के इस शहर तुम्हें याद कर रही हूँ. तुम्हें ख़त लिखते हुए अंतर्देशी में कितना छोटा छोटा लिखती थी सब. महीन वाली पेन्सिल से, एक एक लाइन में अनगिन बातें लिखती थी. सादे कागजों पर ख़त लिखती तो पुलिंदा इतना भारी हो जाता कि हर बार पोस्टल डिपार्टमेंट तुमसे एक्स्ट्रा पैसे लेता था.

तुम्हें याद है इजाजत का वो सीन जिसमें माया एक लम्बा टेलीग्राम भेजती है...मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है...

तुम्हारे नाम एक लम्बा टेलीग्राम मेरे पास भी लिखा हुआ है. अब तो कभी तुम्हें भेज नहीं पाउंगी. जानते हो ये इतनी बड़ी चिट्ठी भी आज क्यूँ लिख रही हूँ? क्यूंकि अभी भी चौदह जुलाई में कुछ घंटे बाकी हैं. मरने के पहले आखिरी कुछ घंटों में ऐसे ही तुम्हें पुकारूंगी...तुम दुनिया के किसी कोने से फिर मेरे लिए उड़ते हुए आना. पहुंचना मेरे मरने के पहले. कहना लेकिन सिर्फ ये शुरू के तीन शब्द...आई लव यू स्टॉप

लिखना चाहती थी तुम्हारा पूरा नाम भी...एक एक अक्षर तोड़ कर. कि जैसे पुकारती हूँ तुमको. एक एक सांस में अलग अलग. मैं भेजना चाहती थी मौसमों के हाथ ख़त. मगर जाने दो. जाते हुए टेलीग्राम को एक गुडबाई बोलना तो बनता है न.

सोचो भला...दिल की धड़कनें ऐसी ही होती हैं न...टेलीग्राफ मशीन जैसी...तुम्हें मालूम भी है दिल के मॉर्स कोड में क्या लिखा जाता है. जाने दो...ज्यादा बात करने से प्यार ख़त्म हो जाता है.

स्टॉप आई लव यू स्टॉप 

18 June, 2013

हूमुस रेसिपी विद थोड़ी गप्पें

इस वाली पोस्ट में मेरी खूब सारी तारीफें होंगी...वो भी मेरी खुद के लफ़्ज़ों में :) जो लोग ऐसी किसी बात का समर्थन नहीं करते हैं ये वाली पोस्ट नहीं पढ़ें :)
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आज मैंने हूमुस बनाया. मुझे समझ नहीं आता है कि सितारों और ग्रहों की ऐसी कौन सी दशा होती है जब मेरा कुछ बनाने का मन करता है. वो भी तब जब कुणाल घर पर नहीं हो. वो रहता है तो फिर भी उसकी पसंद का कुछ बनाना अच्छा लगता है. हूमुस से मेरा परिचय ज्यादा पुराना नहीं है. पिछले साल किसी वक़्त खाया था पहली बार. ऑफिस में कोई ले कर आई थी...उसकी मम्मी ने बनाया था. मुझे अपने इन्डियन खाने के अलावा खुराफाती चीज़ें बहुत पसंद हैं. कुणाल हमको चिढ़ायेगा कि हूमुस चना दाल का चटनी जैसा ही लगता है, ब्लैंड है, कोई टेस्ट नहीं है वगैरा वगैरा लेकिन अगर मैं लेकर आउंगी तो खूब सारा खा भी जाएगा.

अच्छा हूमुस खोजना बहुत मुश्किल का काम है...उसपर कहीं भी आर्डर करो तो चिप्स, ब्रेड सब कुछ बहुत सा देंगे लेकिन हूमुस इतना थोड़ा सा देंगे कि वाकई चटनी जैसा ही खाना पड़ता है थोड़ा थोड़ा लगा कर. तो हम एकदम परेशान हो गए कि हो न हो हम हूमुस खुद से पढ़ के बनायेंगे. दुनिया के रेस्टोरेंट का हूमुस  go to the भाड़. काबुली चना कल रात को फुला दिए थे. पिछली बार भी ऐसी ही बनाने का बुखार चढ़ा था तो तिल भी ला के रख लिए थे. सुबह का चना बॉईल करके रखा था. जरूरत थी सिर्फ निम्बू की, तो वो याद से ले लिए. जब तक ऑफिस से आये, लेट हो गया था वरना मेरा खाखरा के साथ हूमुस खाने का मन था. खैर, ब्रेड खरीद लिए.

घर आके चिंतन मनन कर ही रहे थे कि आज हूमुस बना ही डालते हैं कि लाईट चला गया वो भी ट्रांसफोर्मर उड़ने का जोर का आवाज़ जैसा. बस हम माथा पकड़ लिए कि गया मेरा हूमुस भाड़ में. बिजली लेकिन थोड़ी देर में आ गयी. पहला काम था आईफ़ोन पर गाना लगाना. हमको किचन में आज भी सोनू निगम का दीवाना और जान सुनना अच्छा लगता है. इन्टरनेट पर घंटा भर पढ़ के रेसिपी निकाले...कमसे कम पचास ठो रेसिपी खोल रखे होंगे टैब में. खूब सारा पढ़ लिख कर गैस पर कड़ाही चढ़ाये. हूमुस बनाने के पहले बनाना था तहिनी. लिखा हुआ था कि तिल को खाली हल्का सा टोस्ट करने, भूरा नहीं करने. भुनी हुयी खुशबू आने लगी तो गैस से उतारे. उसमें से छोटे कंकड़ वगैरह चुने. चुनते हुए दादी की याद आई, सूप में चूड़ा फटकने की. लगा कि चीज़ें कैसे खो जाया करती हैं. तहिनी के लिए तिल को ओलिव आयल के साथ मिक्सी में चला दिए. अंदाज़े से इतना तेल डालना था कि थोड़ा पतला सा पेस्ट जैसा बन जाए.

हमको अचानक से याद आया कि हूमुस बहुत कॉमन चीज़ नहीं है...हूमुस एक मिडिल ईस्ट की रेसिपी है, जैसे चीज़ डिप होता है, वैसे ही चिप्स या फिर पिटा ब्रेड के साथ खाने के लिए. इसे ब्रेड में या सैंडविच में स्प्रेड की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं. बेसिकली कहीं पर भी चटनी जैसा भी यूज कर सकते हैं. हमको बहुत बहुत पसंद है.

हूमुस के लिए जरूरत होता है तहिनी, उबला हुआ काबुली चना, निम्बू, लहसुन, जीरा पाउडर, नमक और ओलिव आयल. विदेशों में अधिकतर लोग कैन में आया हुआ काबुली चना इस्तेमाल करते हैं. काबुली चना को छोला से थोड़ा सा ज्यादा बॉईल करना था कि उँगलियों के बीच मैश हो जाए.

मिक्सी से लगभग आधा ताहिनी बाहर निकाले और फिर उसमें दो कप उबला काबुली चना डाले, फिर एक निम्बू का रस, पांच सात लहसुन का कली, अंदाज़े से नमक, थोड़ा जीरा पावडर और थोड़ा ओलिव आयल डाले. इस सबको चलाये...थोड़ा सा पानी डाले और थोड़ा थोड़ा करके मिक्सी चलाते रहे. नेट पर पढ़े थे कि अच्छे हूमुस के लिए फ़ूड प्रोसेसर को देर तक चलने दें. थोड़ा देर बार मिक्सी खोले और खा के देखे, लाजवाब हूमुस तैयार था. हूमुस को कटोरी में निकाल कर ऊपर से ओलिव आयल डाले, जीरा पाउडर और लाल मिर्च भी बुर्के. फिर कैमरा से फोटो खींचे.

इतने में रात के डेढ़ बज गए थे. अब बहुत खुश होकर सोचे कि ब्रेड टोस्ट कर लें तो याद आया कि ब्रेड जो लाये थे वो बाईक की डिक्की में भूल गए हैं. अपनाप को लाख गरियाये कि एक काम ढंग से नहीं होता हमारा. रात को थोड़ा सा डर भी लगता है. मगर इतना मेहनत से बनाया हुआ इतना सुन्दर हूमुस कैसे नहीं खाते तो झख मार के गए चार फ्लोर नीचे. ब्रेड लाये, टोस्ट किये. फोटो खींचे, कुणाल को भेजे और फिर चैन से खाए. यूँ पढने में रेसिपी बहुत आसान लगता है पर जिसने कभी नहीं बनायी है उसके हिसाब से अंदाज़ा करना थोड़ा मुश्किल है. हम जब मूड में आ जाते हैं तो कुछ भी कर गुज़रते हैं.

रिकैप: हूमुस
बनाने का समय: लगभग आधा घंटा(पहली बार के लिए, फिर जैसे जैसे आप एक्सपर्ट होते जायेंगे, धनिया पत्ता की चटनी पीसने में जितना समय लगता है, उतना ही लगेगा)

सामग्री: लगभग ३/४ कटोरी काबुली चना
१ कटोरी तिल या फिर १/२ कटोरी तहिनी(रेडीमेड)
१ निम्बू का रस
५-५ लहसुन की कलियाँ
एक चुटकी जीरा पाउडर
नमक अंदाज से (आधा टीस्पून)
१ कटोरी ओलिव आयल

पहले काबुली चना को भिगो लीजिये पूरी रात. फिर तीन चार पानी में धो कर उबाल लीजिये. प्रेशर कुकर में लगभग १०-१० मिनट प्रेशर आने के बाद.

तहिनी बनाने के लिए एक कप तिल को गैस पर भून लीजिये. जब हलकी खुशबू आने लगे, गैस बंद कर दीजिये, देर करने से तिल भूरे हो जायेंगे और स्वाद बदल जाएगा. इसको मिक्सी में लगभग आधी कटोरी ओलिव आयल के साथ मिक्सी में पीस लीजिये. तहिनी तैयार है. इसे फ्रिज में एयर टाईट कंटेनर में एक हफ्ते तक रख सकते हैं. तहिनी की बहुत सी रेसिपीज होती हैं. तहिनी सुपरमार्केट में रेडीमेड भी मिलता है. (वैसे रेडीमेड तो हूमुस भी मिलता है ;) )

हूमुस के लिए पहले मिक्सी में १/२ कटोरी तहिनी डालें, निम्बू का रस और लहसुन डाल कर एक राउंड चला लें. सब थोड़ा थोड़ा मिक्स हो जाएगा. अब इसमें काबुली चना जीरा पाउडर, नमक और थोड़ा सा ओलिव आयल डालें. इसे एक राउंड चला लें. ये एकदम गाढ़ा होगा, इसमें अंदाज़ से थोड़ा पानी डालें और मिक्सी चला दें. तीन चार राउंड चलाने के बाद कंसिस्टेंसी चेक करें. ये एकदम हल्का हो जाता है.

चिप्स या सलाद के साथ खाएं :) या ब्रेड पर. जब भी हूमुस बनाने या खाने का मन करे तो सोचिये...अगर पूजा बना सकती है तो वाकई दुनिया का कोई भी शख्स बना सकता है :) हैप्पी ईटिंग. 

10 June, 2013

Happy Birthday Gorgeous :)

तीस की उम्र में बहुत सी चीज़ों में समझदारी आ जाती है. ये दुनिया वैसी नहीं है जैसी सोचा करती थी...चीज़ें उतनी सिंपल नहीं हैं और रिश्तों में बहुत सी पेचीदगी है...इश्क अभी भी समझ से बाहर है. हम जैसा अपना आने वाला कल सोचते हैं...कल वाकई वैसा नहीं होता कुछ अलग ही होता है. बहुत कुछ ऐसा खोया जिसके बिना जिंदगी अधूरी है तो बहुत कुछ पाया भी जिसके पाने की कल्पना नहीं की थी. 

बहुत सालों के बाद बर्थडे में पटना में हूँ, पापा और जिमी के साथ...उतने ही साल बाद कुणाल के बगैर हूँ... इस बार पहली बार मायके में हूँ तो महसूस किया कि कितना बड़ा परिवार है उधर और कितने सारे लोग कितना सारा प्यार करते हैं मुझे. कभी कभी चीज़ों को महसूस करने के लिए उनसे दूर जाना पड़ता है. रात को देर तक फोन बजता रहा...सुबह भी अनगिन फोन आये. 

थर्टी इज द बेस्ट टाइम इन लाइफ. 

जिंदगी में बहुत सारी चीज़ों के प्रति निश्चिन्तता आ जाती है. इसी बात से कई बार डर भी लगता है हालाँकि, लेकिन फिर लगता है कि नहीं...प्यास अभी बाकी है...बंजारामिजाजी ने रिजाइन नहीं किया है पोस्ट पर से. 

पापा से घूमने के बारे में बात कर रही थी, इस साल पापा को घूमने जाना है...तो मैं घुमक्कड़ी के अपने किस्से सुना रही थी...कि अब कुणाल और जिमी को तो काम है पापा...ऑफिस है, एक काम करते हैं हम और आप निकल जाते हैं घूमने. मेरे ख्याल से मेरा घुमक्कड़ी का 'जीन' पापा की तरफ से आया है. पता नहीं क्या प्रोग्राम बनेगा पर पापा के साथ योरोप का टूर...अल्टीमेट होगा. 

इस बर्थडे पर बहुत दिन से बहुत सारा कुछ लिखने का मन था...लेकिन दिल भरा भरा सा है...कुछ खास लिखने का मन नहीं है. कल शाम को गंगा आरती देखने गयी थी...गंगा किनारे नाव पर बैठ कर बहुत दूर का चक्कर लगाया...लकड़ी की उस नाव पर बैठे अनगिन तसवीरें उतारीं. गंगा का पानी हमेशा की तरह था...निर्विकार... मन में कहीं हिमालय पर भाग जाने की ख्वाहिश को बोता हुआ. आरती करते हुए पंडितों के चेहरे पर अजीब तेज था...जैसे वो किसी और दुनिया के लोग हों...तप्त...आभा में दमकते हुए. धूप, अगरबत्ती, शंख...बहुत सारा मंत्रोच्चार. 
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नाव का किराया ३० रुपये था. नाव में अधिकतर लड़के थे...हर उम्र के लड़के...मैं उनके बारे में कितना कुछ सोचती रही. जाने किसी गरीब लड़के का भी कैसे तो ख्याल आया या कि छुट्टियों में घर आये किसी लड़के का जिसने आने के पहले सोचा न हो कि ऐसी कोई चीज़ देखने को मिल जायेगी. हर रोज़ ३० रुपये जुगाड़ने की मशक्कत करनी पड़े. मुझे मालूम नहीं मुझे ऐसा ख्याल क्यूँ आया मगर उन अनजाने चेहरों में कोई अजीब किस्म का अपनापन था. जैसे मेरे घर, मोहल्ले, गाँव के लड़के हों. कि जैसे गंगा आरती देखने वाले लड़के कोई अपराध नहीं कर सकते. कि उनके मन में कोई गंगा ऐसी ही बहती होगी...गंगाजल कभी भी ख़राब नहीं होता, सालों साल बाद भी. एक कहानी भी उभरी मन में...कि गंगा किनारे किसी से मिलने आना कैसा होता होगा. कुछ नहीं बस बरसात के मौसम में मिलने आना कि जब गंगा पटना के घाट तक आ जाती हो. किसी नाव पर पाँव लटकाये बैठे रहे...क्या क्या किस्से सुनाते रहे. कि लगा कि कितनी सारी कहानियां सुनाना चाहती है गंगा. हिलोरे मारती लहरें...कि डूब कर किया जाता है प्यार. कि शाम को आरती के बाद बहा देना चाहिए कोई नाम पत्ते के दोने पर रख कर दिए की लौ में...कि गंगा किनारे आ कर मन का कितना सारा रीता कोना भरने लगता है. कि किसी के जाने के बाद भी उन जगहों पर रह जाता है सोच का कतरा...कि किसी समय गंगा में मेरे नाम की मन्नतें किसी ने बहायीं होंगी. 
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बहुत कुछ उलझा हुआ है जिंदगी में मगर कहीं एक यकीन है कि सुलझा लूंगी. घर पर इतने सारे लोग हैं...इतने अच्छे दोस्त...और मेरा कुणाल :) इतने में बहुत कुछ किया जा सकता है...बनाया जा सकता है...रचा जा सकता है. 

अच्छा अच्छा सा लग रहा है. और ये वाला कोट...बहुत दिनों से रखा था देख कर...आज टांग देती हूँ...कि हमेशा याद रहे...




You can be gorgeous at thirty, charming at forty, and irresistible for the rest of your life.
-Coco Chanel

And on that note...happy birthday Gorgeous 

16 May, 2013

मकबरे के दोनों बुत एक दूसरे का चेहरा देखते सोये थे


वो बहुत जोर से इस बात पर चौंका था कि मैंने कभी कोठा नहीं देखा था...किसी तरह का चकला, कोई बाईजी का घर नहीं. मैं इस बात पर परेशान हुयी थी कि उसने क्यों सोचा कि मैंने कोठा देखा होगा...शायद उसे मेरी उत्सुकता और मेरे पागलपन से कुछ ज्यादा ही उम्मीद थी. मुझे याद है मैंने हँसते हुए कहा था...कोठे में मेरे लिए क्या होगा...मैं तो लड़की हूँ. इस बात पर हद गुस्सा हुआ था मुझपर...बेवक़ूफ़ लड़की...मैं तुम्हारे लड़की होने की नहीं, लेखक होने की बात कर रहा हूँ...तुम लिखती हो फिर भी कभी तुमने देखने की जरूरत नहीं समझी...देश, विदेश इतनी जगह घूमी हो, कभी नहीं...चलो इस बार मेरे शहर आना, मैं तुम्हें ले जाऊँगा कोठा दिखाने. 

लोग प्यार में ताजमहल दिखाने की बात करते हैं...ये मैं किससे प्यार कर बैठी थी इस बार...और उसे किस कमबख्त से प्यार हो गया था. हम तकलीफों के तोहफे देते थे एक दूसरे को...हमारा हर दर्द दुगुना होता था, एक अपने लिए और एक उसके हिस्से का दर्द भी तो जीते थे हम. एक पुरानी मज़ार थी शहर के किन्ही उजड़ चुके हिस्से में. बेहद पुरानी ईटें और उनमें खुदे हुए कैसे कैसे तो नाम...हमारा पसंदीदा शगल था कहानियां बुनना. साल के किसी हिस्से हमें वहां जाने की फुर्सत मिलती थी...हम किसी ईंट पर लिखे नामों को लेते और उन किस्सों को, उन किरदारों को बुनते रहते...मैं लड़के का किरदार बनाती, वो लड़की का...हम अक्सर इस बात पर भी लड़ते कि जो नाम लिखे हैं वो लड़के ने लिखे हैं कि लड़की ने...ऐसा कम ही होता कि नाम दो हैण्डराईटिंग में होते. 

मेरी अपनी जिंदगी थी...उसका अपना काम...अपना परिवार जिसमें एक माँ, दो कुत्ते, एक पैराकीट और अक्वेरियम की बहुत सी मछलियाँ शामिल थीं. दोनों का काम ऐसा था कि हम शहर में होते ही नहीं. वो एक स्पोर्ट्स फोटोग्राफर था मैं एक इंडिपेंडेंट डाक्यूमेंट्री फिल्म मेकर. उसे रफ़्तार पसंद थी...मेरे पास अजीब आंकड़े लेकर आया करता था...जितने देश गया वहां के चकलाघरों के किस्से ले कर लौटा...मुझे बताता था कि औसत कितना वक़्त लगता है एक लड़की को एक ग्राहक निपटाने में...किस देश की वेश्याएं सबसे ज्यादा टाइम-इफिशियेंट हैं. जिन देशों में वेश्यावृत्ति लीगल है वहां की औरतों और यहाँ की औरतों में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है. वो मुझे कितनों के किस्से सुनाता, उनके नाम...उनकी तसवीरें...उनकी कहानियां. तुम्हारे जाने से उनका कितना वक़्त ख़राब होता है तुम्हें मालूम है? उनका कितना नुक्सान कर देते हो तुम. मगर उसे सनक थी...दिन को जाता और उनके लिए ख़ास फोटो-शूट रखता. मैं उसका एल्बम देखते हुए सोचती जिस्म पर इतने निशान हैं तो आत्मा पर जाने कितने होते होंगे. उनमें अधिकतर ड्रग लेती हैं. अपने जिस्म से भाग कर तो नहीं जाया जा सकता है कभी. 

फिर वैसे भी दिन होते जब हम कोई तितलियों सी रंग-बिरंगी कहानी रचते, मगर उसे मेरी कहानियों के अंत पसंद नहीं आते...वो कहता जिंदगी में कभी हैप्पी एंडिंग नहीं होती, ऐसा सिर्फ फिल्मों में होता है. उसके जाने के बाद मुझे उसकी कही कोई बात याद नहीं रहती. कई बार तो यकीन नहीं होता था कि मैं वाकई उससे मिली भी थी. उसकी याद लेकिन हर जगह साथ चलती थी. यूँ याद करने को था ही क्या...एक उसकी आँखों और एक वो लम्हा जब हम जाने किसकी तो बात करते ऐसे उदास और तनहा हो गए थे कि लग रहा था पूरा मकबरा मेरे ऊपर गिर पड़ेगा...उसने कहा था 'यू नीड अ हग' और मुझे अपनी बांहों में समेट लिया था. मैंने उस लम्हे को रेजगारी वाले पॉकेट में डाल दिया था. मैंने कितने शहरों में उस लम्हे को खोल कर देखा...कितने लोगों के साथ उस लम्हे को साझा किया मगर उसका जादू कहीं नहीं जाता. 

इस साल हमें एक दूसरे से मिलते हुए दस साल हो जायेंगे...यूँ हमारे बीच रिश्ता कुछ नहीं है सिवाए इस यकीन के कि हम अगर एक शहर में हैं तो एक फोन कॉल की दूरी पर हैं, एक देश में हैं तो एक सरप्राइज की दूरी पर हैं और अगर इस दुनिया में हैं तो एक विस्की ग्लास की दूरी पर हैं...किसी लम्हे...किसी शहर...किसी देश...हम अपने लिए एक ऑन द रॉक्स बनाते हैं तो आसमान की ओर उठा कर कहते हैं...जानेमन...आई लव यू.
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ताजमहल को देखता हुआ शाहजहाँ क्या सोचता होगा? किसी की याद में पत्थर हो जाना भी कुछ होता है क्या? पुराने किले से चलती हवा में किसका नाम आता है? उसके नाम के बाद मेरा नाम लिख दो तो कैसा लगेगा देखने में? उसका नाम कैसे भूल जाती हूँ मैं हर बार...मज़ार पर भटका हुआ, दिया जलाने हो हर शाम आता है, सफ़ेद बाल और लम्बी दाढ़ी वाला, कमर से झुका लाठी के बल पर चलता बूढ़ा...नाम क्या है उसका...और मेरी कहानी में ये कौन सा किरदार आ गया...ऐसे हो नहीं ख़त्म होनी थी कहानी...सब ख़त्म होने के समय जो कहानी शुरू होती है...वो कब ख़त्म होती है? तुम्हारे शहर में मेरे नाम से कोई मकबरा है? नहीं...तो मेरे मरने का इंतज़ार कर रहे हो मकबरा बनवाने के लिए...अच्छा, क्या कहा...तुम मुझसे प्यार ही नहीं करते...यु मीन मेरे मर जाने के बाद मुझसे प्यार नहीं करोगे...ओफ्फो...कहानी ख़त्म हुयी...ये ट्रेलर ख़त्म करो मेरी जान. 

दी एंड...

(btw, you know I hate the three dots)

15 May, 2013

जंकयार्ड डायरीज

तुम कोई उदास कविता नहीं हो कि तुम्हारे खो जाने पर आंसू बहाए जाएँ...तुम तो जिंदगी का रस हो, राग हो, नृत्य हो...तुम्हारे होने से धूप निकलती है...तुम पास होते हो तो जैसे सब कुछ थिरक उठता है...अब किसी दिन ऐसी ही कोई धुन गुनगुनाते आओगे कि पाँव रुक नहीं पायेंगे तो मैं क्या करूंगी बताओ...फिर कभी कभी सोचती हूँ बड़ी खूबसूरत चीज़...सोलह साल की लड़की होती है तो सोचती है...क्या वो मुझसे प्यार करता है...नहीं करता है...कुछ भी महसूस करता है मेरे लिए...मगर ३० की उम्र पहुँचने पर ऐसी छोटी चीज़ों में वक़्त जाया नहीं करते, इसलिए मैं तुम्हें कह सकती हूँ...डांस विद मी...मुझे जो चाहिए उसके बारे में अब दुआएं नहीं करती...तुमसे पूछ सकती हूँ और अगर तुम ना कह दो तो मैं उस लम्हे को वहीँ बिसार कर आगे बढ़ जाउंगी. मेरी फितरत नदी के विपरीत सी होती जा रही है. पहले तो समंदर के पास की नदी जैसा कुछ ठहराव था मगर अब पहाड़ी नदी जैसा बाँध तोड़ता बहाव है. मैं रुक नहीं सकती...ठहर नहीं सकती...मुझसे प्यार है तो मेरे साथ बह जाओ वरना नदी किनारे अनेक सभ्यताओं के बसने के निशान हैं...तुम भी किसी विस्मृत सभ्यता जैसे हो जाओगे जिसका बचा हुआ टुकड़ा टुकड़ा मिलेगा, पूरा कुछ कभी नहीं हो पायेगा...वो शब्द जो तुमने मुझसे कहे ही नहीं कोई ऐसी लिपि हो जायेगी जिसे सुलझाते पुरातत्त्वेत्ता उम्र गुज़ार देंगे.

जब हमें बहुत सी बात छुपानी होती है तो या तो हम बहुत चुप हो जाते हैं या बहुत बोलते हैं...इतनी सारी बातों में वो बात भी खो जाती है जो हम कहना चाहते तो हैं मगर सिर्फ एक उस बात को कहने में डरते हैं. आई लव यू ऐसी ही कोई शय है...दुनिया जहान की बातें करते हुए...फिल्मों पर बहस करते हुए...तुम्हारे पसंदीदा लेखक की कोई कविता पढ़ते हुए कहोगे मुझसे...मैं जानती हूँ...वैसे ये शब्द हैं भी काफी खतरनाक, इन्हें बाकी शब्दों के ककून में ही लपेट कर रखना चाहिए. बिना दस्ताने की उँगलियों से छू लो तो फ्रॉस्टबाईट हो सकता है. अगली बार मेरे गले लगो तो गौर से महसूस करना...मेरे गुडबाय में आई लव यू की खुशबू आती है. तुमने यूँ तो बहुत विदा के गीत सुने होंगे...आजकल किस गीत से गुज़र रहे हो? वो लैम्पशेड याद है जो हमने मिल कर बनाया था? हर रंग के रिबन में लपेट कर कांच की चूड़ियों संग...ड्रीम कैचर जैसा दिखता वो लैम्पशेड तुम्हारे ख्वाबों को रोशनी से भरता है क्या?

तुम्हारा प्यार किसी सोलर लैम्प जैसा है...जब तुम होते हो तो तुम्हारी मुस्कुराहटें सहेज कर रख देता है...बारिशों वाले दिन के लिए और जैसा कि बैंगलोर का मौसम है, इस लैम्प की अक्सर जरूरत पड़ती है. फिर इस मुस्कुराते उजाले में मैं शैडो डांस करती रहती हूँ...मेरी परछाई मुझसे कहीं ज्यादा डार्क और मिस्टीरियस है...कई बार तो मुझे अपनी परछाई खुद से ज्यादा अच्छी लगती है. 

सोच रही थी कि लोगों को कभी चीज़ों से नहीं जोड़ना चाहिए...लोग चले जाते हैं पर वो इनऐनीमेट चीज़ें कतरा कतरा जान लेती रहती हैं. मैं उन सारी चीज़ों से दूर नहीं भाग सकती जो तुम्हारे साथ रहते हुए मुझे अच्छी लगती थीं. वाईट लिली...वाईट चोकोलेट...वाईट फॉक्स मिंट...वाईट अल्ट्रा माइल्ड सिगरेटें...मेरी वाईट शर्ट...कमरे में आता सफ़ेद धूप का संगमरमर के सफ़ेद फर्श पर गिरता पहला टुकड़ा. तुम सफ़ेद रंग हो...तुमसे सारे रंग की रोशनियाँ निकलती हैं. 

खैर जाने दो...ऐवें ही कुछ कुछ लिखने का मन कर रहा था...बहुत सारा वर्कलोड होता है तो दिमाग में कुछ शब्द फँस जाते हैं...इन्हें लिखना जरूरी होता है वरना कुछ नया लिखने में दिक्कत होती है. जंकयार्ड डायरीज... ऐसा ही कुछ लिखने के लिए होती हैं. कल कोई तो कहानी लिखने का मन कर रहा था...फिर कभी...आज फिर ऑफिस को देर हो जायेगी...लिखेंगे बाकी वाकया ऐसे ही. आजकल लिखना प्यार की तरह हो गया है...भागते दौड़ते, दो मिनट निकाल कर लिखते हैं...बहरहाल...ओके...टाटा...लव यू...बाय. 

13 May, 2013

तुम सी बस एक है मेरी जान, तोश्का

मैं उसका नाम तोश्का नहीं रखना चाहती थी...कि इस नाम में बहुत सारी उदासी थी...लेकिन मुझे मालूम ही नहीं चला कब एक शब्द से उठ कर वो एक जीती जागती जिद्दी लड़की बन गयी...रशियन...नीली आँखों और दो सुनहली चोटियों वाली लड़की को ऐसा कौन सा गम था कि मेरी जान खा गयी कि मेरी कहानी लिखो.

पहली बार इस शब्द के सामने पड़ी थी तो लगा था कि ये मेरा नाम होना था...तोस्का...लेकिन दन्त स में वो बाद नहीं आती जो तालव्य श में आती है. श से कशिश आती है, कुछ मेरे पसंदीदा शब्दों में श होता है...इश्क, रश्क, अश्क, खानाबदोश, तलाश, पलाश...जाने और कितने सारे. स से श हो जाना कुछ वैसे था जैसे आप किसी के प्यार में होते हैं तो उस नाम को एक ख़ास लहज़े में पुकारते हैं...नाम वही होता है मगर महबूब के होटों पर अजीब से नशे में लिया हुआ लगता है. दरअसल आप सिर्फ उसका नाम नहीं लेते हैं...हर बार उसका नाम लेते हुए अपना एक हिस्सा जोड़ देते हैं उसमें...जैसे मैंने उसका नाम पुकारते हुए 'इश्श्श' सा कुछ कहा. सबसे छुपा के उसका नाम लिखा जैसे...चुपचाप जैसे चिरमिरा के फूलों में छिपी हुयी तितली.

उस रोज़ आसमान सियाही हो गया था और मेरी कहानी लिखने को जरा भी रौशनी नहीं बची थी. हवा ने खुद को वैसे रोक रखा था जैसे तुम्हारे आने पर मैं अपनी तेज़ होती साँसों को रोक के रखती हूँ. समंदर के पास का मौसम था कोई...बेहद गर्म और उमस से भरा हुआ. मेरे आसपास की चीज़ों में कोई कलात्मकता नहीं थी...वे इस मशीनी युग की बनी चीज़ें थीं जिन्हें कभी किसी कामगार ने हाथ भी नहीं लगाया था. उनमें कोई आत्मा नहीं थी. मुझे तुम्हारे लिखे प्रेमपत्र याद आ रहे थे, मुझे वो वक़्त भी याद आ रहा था जब खेलते हुए पहली बार तुमने धूल में अपना और मेरा नाम एक साथ लिखा था.

मुझे हमेशा ऐसा लगता है कि तोश्का ने जब लिखना सीखा था तो उसने अक्षर नहीं सीखे थे...उसने सबसे पहले तुम्हारा नाम लिखना सीखा था. फिर एक वाक्य कि वो तुमसे प्यार करती है...इतने के बाद उसने खुद को जानने की कोशिश की होगी. तोश्का वैसी लड़की है जिसने आइना शायद कभी देखने की जरूरत ही नहीं समझी. तुम मेरे आसपास कहीं रहते जहाँ मैं रोज़ तुम्हें देख सकती तो मैं भी आइना नहीं देखना चाहती कभी. मगर होता ऐसा है कि तोश्का को हर उस चीज़ से प्यार होने लगता है जिससे तुम्हें प्यार है और इस सिलसिले में वो खुद को जानने की कोशिश करती है.

तोश्का बंजारन है...उसे जमीन से नहीं सफ़र से प्यार है. नदियाँ भी प्यासी होती हैं न...वैसी है तोश्का...प्यास का सान्द्र रूप...नदी का सान्द्र रूप...वो हवा को चूम लेती है तो शहर के लोग दीवाने हो जाते हैं. तोश्का...समंदर किनारे चलती जाती है...उसकी घेरदार स्कर्ट भीगती है तो तोश्का का गीत समंदर की सीपियों में परत दर परत जमा होने लगता है. हथेलियों में एक अंजुरी भर पानी आसमान की ओर उछालती है तो दूर हिमालय के सीने में बसे शहरों में मीठे पानी की बरसातें होती हैं.

तोश्का...एक बरसातों के पहले उगने वाली लड़की है, जब आसमान बिलकुल सियाह हो जाता है तो  इसी सीली गहरी उदासी से खुद को रचती है वो. उसकी आँखों में कितने सूरज डूब जाते हैं मगर वो ग्रहण के बाद के चाँद जितनी रौशनी भी नहीं मांगती है. उसकी पसंद का संगीत रचने के लिए इश्वर को वाद्ययंत्र उठाना पड़ता है...कभी पियानो, कभी गिटार कभी जलतरंग.

तोश्का को इश्क से प्यार हो गया है...मेरी कहानियों के इश्क से...थोड़ा जिद्दी, थोड़ा पागल...हद दर्जे का मनमौजी... बदतमीज...दुष्ट...मैंने तो उन्हें मिलाया भी नहीं था मगर किस्मत भी कोई शय है. अब मैं उस रोज़ से डरती हूँ जब इश्क मेरी प्यारी तोश्का का दिल तोड़ देगा और मुझे उसे सम्हालना होगा. मैं तोश्का को बता तो नहीं सकती न कि इस कमबख्त, नामुराद इश्क से मुझे भी प्यार हो रखा है और क्यूँ न होता...मैंने उसे अपने लिए ही तो रचा था...मगर वो एक नंबर का दिलफेंक आशिक निकला. मेरी लिखी सारी कहानियों में जबरन अपना रोल लिखवा लेता है.

बहरहाल, तोश्का मेरी जान...मेरी दुआएं तेरे साथ...और या खुदा...मेरे हिस्से की दुआएं लिखने के लिए किसी को अलॉट कर!

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