09 April, 2013

द हारमोनियम इन माय मेमोरी

हम अपने आप को बहुत से दराजों में फिक्स डिपाजिट कर देते हैं. वक़्त के साथ हमारा जो हिस्सा था वो और समृद्ध होता जाता है और जब डिपाजिट की अवधि पूर्ण होती है, हम कौतुहल और अचरज से भर जाते हैं कि हमने अपने जीवनकाल में कुछ ऐसा सहेज के रख पाए हैं. 

ऐसा एक फिक्स डिपोजिट मेरे हारमोनियम में है. छः साल के शाश्त्रीय संगीत के दौरान उस एक वाद्य यंत्र पर कितने गीतों और कितने झगड़ों का डिपोजिट है. आज सुबह से उस हारमोनियम की आवाज़ को मिस कर रही हूँ. हमारा पहला हारमोनियम चोरी हो गया था. शहर की फितरत, वहां चोर भी रसिक मिजाज होते हैं. दूसरा हारमोनियम जो लाया गया, कलकत्ते से लाया गया था. बहुत महंगा था क्योंकि उसके सारे कलपुर्जे पीतल के थे, उसमें जंग नहीं लगती और बहुत सालों तक चलता. उस वक़्त हमें मालूम नहीं था कि बहुत साल तक इसे बजाने वाला कोई नहीं होगा. उस वक़्त हम भाई बहन एक रियाज़ करने के लिए जान देते थे. 

हम उसे बहुत प्यार से छूते थे. नयी लकड़ी की पोलिश...चमड़े का उसका आगे का हवा भरने वाला हिस्सा...उसके सफ़ेद कीय्ज ऐसे दीखते थे जैसे बारीक संगेमरमर के बने हों. मैं अक्सर कन्फ्यूज होती थी कि वाकई संगेमरमर है क्या. उस वक़्त हमारी दुनिया छोटी थी और कोई चीज़ हो सकती है या नहीं हो सकती है, मालूम नहीं चलता था. हारमोनियम को गर्मी बहुत लगती थी तो गर्मियों में एक तौलिया भिगो कर, निचोड़ कर उसके ऊपर डाल देते थे और बक्सा बंद कर देते थे. कभी कभी ऐसा शाम को भी करते थे. 

गाना गाने को लेकर हमारी अलग बदमाशियां थी. राग देश में जो छोटा ख्याल सीखा था उसके बोल थे 'बादल रे, उमड़ घुमड़, बरसन लागे, बिजली चमक जिया डरावे'. मजेदार बात ये थी कि जून जुलाई के महीने में अक्सर छुट्टी में रियाज़ में यही राग गाती थी. अब बारिश होती थी तो अपने आप को तानसेन से कम नहीं समझती थी कि मेरे गाने के कारण ही बारिश हो रही है. जिमी ने संगीत सीखना मुझसे एक साल बाद शुरू किया था. वो छोटा सा था तो उसके हाथ हारमोनियम पर पूरे नहीं पड़ते थे. सर हम दोनों को अलग अलग ख्याल सिखाते थे. मैं हमेशा हल्ला करती थी कि सर जिमी को ज्यादा अच्छा वाला सिखाते हैं. राग देश में भी सर उसको कोई और छोटा ख्याल सिखाये कि उसका नाम बादल है न...बादल रे गायेगा तो अच्छा थोड़े लगेगा उसको. 

जिमी हमसे बहुत अच्छा गाता था बचपन में, एक्जाम देने जाते थे तो एक्जामिनर उससे प्यार कर बैठते थे. एक तो एकदम छोटा प्यारा और बहुत मासूम लगता था उसपर आवाज़ इतनी मीठी थी कि एक्जामिनर खुश होकर दो चार और राग सुनने के मूड में आ जाता, जिमी का और गाने का मूड नहीं होता लेकिन...एक तो हम लोग एक ही राग पूरा अच्छे से रियाज़ करके जाते थे, आलाप, ख्याल और तान के साथ. एक्जामिनर खुशामद करता, कोई भजन ही सुना दो...सर बोलते...अरे जिमी वो वाला सुना दो न जो अभी पिछले सन्डे सिखाये थे. जिमी गाता...एक्जामिनर सर या मैडम उसको खूब आशीर्वाद देते. हम दिल ही दिल में सोचते अच्छा है मेरा आवाज़ उतना अच्छा नहीं है, हमको अभी एक ठो और गाना गाने कोई बोले तो यहीं जान चला जाए. एक्जाम का खौफ होता था. एक बड़ा सा हॉल होता था उसमें पूरे शहर के दिग्गज बैठे होते थे...सबको सुनते थे तो कमाल लगता था, उसपर एक्जामिनर कभी कभी अच्छा अच्छा को सुन कर खुश नहीं होता था. हम तो डरे सहमे आधा चीज़ वहीँ भूलने लगते थे. एक उसी एक्जाम और एक उसी ऑडियंस का हमको लाइफ में डर लगा है. वरना हम बड़े तीस मारखां थे...कहीं, किसी से नहीं डरते. 

हारमोनियम हम पटना लेकर आये...वहां कभी कभी रियाज़ करते थे, डर लगता था पड़ोसी हल्ला करेंगे. दरअसल रियाज़ करने का असल मज़ा भोर में है, जब सब कुछ एकदम शांत हो, हलकी ठंढी हवा बह रही हो. पटना में वही गाते थे पर हारमोनियम नहीं बजा पाते थे. याद नहीं कितने साल पहले आखिरी बार हारमोनियम बजाया था. कल रिकोर्डिंग स्टूडियो में थी...शीशे के उस पार जाते ही दिल की धड़कन बढ़ जाती है, गीत के बोल भूलने लगती हूँ, जबकि मैंने लिखे हैं और मुझे हर शब्द जबानी याद है. कल आर्टिस्ट को आलाप लेते देखा तो पुराने दिन याद आये...अब तो सपने में भी ऐसा आलाप नहीं ले सकती. 

शायद हारमोनियम का फिक्स डिपोजिट कम्प्लीट हो गया है. अबकी देवघर जाउंगी तो ले आउंगी अपने साथ. बहुत सालों से टाल रही हूँ, पर इस बार सर से भी मिलूंगी. अन्दर बहुत सा खालीपन भर गया है...उसे कुछ सुरों से, कुछ लोगों से, कुछ आशीर्वादों से भरूँगी. 
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इस सब के दरमयान चुप चुप रोउंगी कि मम्मी के बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगता, कहीं कभी भी. उसकी याद खुशबू की तरह है...कुछ कहती नहीं...दिल में कहीं बसती है. कल सुबह दराजों को हवा लगा कर कपड़े वापस रख रही थी, मम्मी के बुने सारे स्वेटर थे...वो थी यहीं कहीं. किसी दूसरे कमरे में फंदे गिनती...पीठ से लगा कर बित्ता हिसाब करती. मैं थक गयी हूँ उस खालीपन को दुनिया भर के काम से भरती हुयी. थक कर सो जाना चाहती हूँ हर रोज़ मगर याद भी कोई धुन की तरह ही है...कहीं नहीं जाती. मैं जाने कब उसके बिना जीना सीखूंगी. 
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बहुत दिन से रियाज़ करने का मन कर रहा है. सुर सारे भटक गए हैं. स थोड़ा ऊपर जो जाता है...कोमल ग ठीक से नहीं लगता है...नी जाने कैसा तो सुनने में आता है. पहले जब रियाज़ करती थी तो एक एक सुर पहले साधती थी. अब फिर से थोड़ा जिंदगी को साध रही हूँ. बहुत कुछ सुर से भटक गया...बहुत कुछ स्केल से अलग है. केओस को थोड़ा कम कर रही हूँ. जैसे कुछ सबसे खूबसूरत राग जिनमें सारे स्वर नहीं लगते, कुछ स्वर निषेध होते हैं. कभी कभी होता है...सन्डे को सुबह का वक़्त होता है...यूट्यूब पर कोई पसंद का गीत लगा देती हूँ और दूसरे कमरे में रोकिंग चेयर पर बैठ कर सिलास मारीनर जैसा कोई पुराना क्लासिक पढ़ती हूँ. जिंदगी अच्छी लगती है. सुकून लगता है. लगता है कि बहुत अच्छे से रियाज़ कर के उठे हों. मन शांत होता है. 

याद में स्वर आते हैं...कुछ शुद्ध, कुछ कोमल...गु ज री या  गा आ ग र  भ र ने ए  च ली  रे
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शीर्षक एक कोरियन फिल्म के नाम से. 

03 April, 2013

वो जो सांवला सा रास्ता था

रास्ते तुम्हें ढूँढने को बहुत दूर तलक, बहुत देर तक भटके थे. आज उन्हें थकान से नींद आने लगी है. उन्होंने टेलीग्राम भेजा है कि वे अब कुछ रोज़ सुस्ताना चाहते हैं. एक शाम सिगरेट सुलगाने को ऑफिस से बाहर निकली तो देखा कि रास्ता कहीं चला गया है और सामने दूर तलक सिर्फ और सिर्फ अमलतास के पेड़ उग आये हैं. खिले हुए पीले फूलों को देखा तो भूल गयी कि रास्ता कहीं चला गया है और मुझे उसकी तलाश में जाना चाहिए. ऑफिस से घर तक का रास्ता नन्हा, नटखट बच्चे जैसा था...उसे दुनियादारी की कोम्प्लिकेशन नहीं समझ आती थी. मैंने बस जिक्र किया था कि तुम जाने किस शहर में रहते होगे. रस्ते को मेरी उदासी नहीं देखी गयी. यूँ सोचा तो उसने होगा कि जल्दी लौट आएगा, मगर सफ़र कुछ लम्बा हो गया.

एक छोटे से पोखर में बहुत सारी नीली कुमुदिनी खिली हुयी है, मैं सोचती हूँ कि रास्ते को मेरी कितनी फ़िक्र थी. मैं उसे मिस न करूँ इसलिए कितना खूबसूरत जंगल यहाँ भेज दिया है उसने. अमलतास के पेड़ों के ख़त्म होते ही पलाश की कतारें थीं. वसंत में पलाश के टहकते हुए लाल फूल थे और मिटटी के ऊपर अनगिन सूखे पत्ते बिखरे पड़े थे. चूँकि यहाँ आने का रास्ता नहीं था तो बीबीएमपी के लोग कचरा साफ़ करने नहीं आ सकते थे, वरना वे हर सुबह पत्तों का ढेर इकट्टा करके आग लगा देते और उनमें छुपा हुआ रास्ता दिखने लगता.

ये मौसम आम के मंजर का है और उनकी गंध से अच्छा ख़ासा नार्मल इंसान बौराने लगता है. मैं पोखर के किनारे के सारे पत्थर फ़ेंक चुकी थी और अब अगली बारी शायद मेरे मोबाइल की होती...खतरा बड़ा था तो मैंने सोचा आगे चल कर देखूं किस शहर तक के रस्ते गायब हो गए हैं. ऐसा तो हो नहीं सकता न कि बैंगलोर के सारे रास्तों को बाँध कर ले गया हो मेरे ऑफिस के सामने का नन्हा रास्ता. पर कभी कभी छोटे बच्चे ऐसा बड़ा काम कर जाते हैं कि हम करने की सोच भी नहीं सकते.

मुझे मालूम था कि थोड़ी देर में बारिश होने वाली है...मौसम ऐसा दिलफरेब और ख्वाबों सा ऐसा नज़ारा हमेशा नहीं होता. किसी ने ख़ास मेरे लिए मेरे पसंद के फूलों का जंगल उगाया था. इसके पहले कि सारी सिगरेटें गीली हों जाएँ एक सिगरेट पी लेनी जरूरी थी. मुझे याद आ रहा था कि तुम अक्सरहां सिगरेट को कलम की तरह पकड़ लेते थे. जिंदगी अजीब हादसों से घिरी रही है और मेरी पसंद के लोग अक्सर बिछड़ते रहते हैं. जिस आखिरी शहर में तुम्हें चिट्ठी लिखी थी वहां के रास्तों ने ही पैगाम भेजा था कि तुम किसी और शहर को निकल गए हो.

जिंदगी को तुमसे इर्ष्या होने लगी थी...मैं तुम्हें अपनी जिंदगी से ज्यादा प्यार जो करने लगी थी. ऑफिस के इस रास्ते पर टहलते हुए कितनी ही बार तुमसे बात की, सिगरेट के टूटे छल्ले बनाते हुए अक्सर सोचा कि तुम जिस भी शहर में होगे वहां आँधियों ने तुम्हारा जीना मुहाल कर रखा होगा. तुम्हें याद है तुमने आखिरी धुएं का छल्ला कब बनाया था? ये जो छोटा सा रास्ता था, उसे अक्सर लगता था कि हम एक दूसरे के लिए बने हैं और एक दिन तुम उससे होते हुए मुझे तक पहुँच जाओगे. ये तब की बात है जब तुम्हारे घर का रास्ता मुझे मालूम था...मुझे तुम्हारी आँखों का रंग भी याद था और तुम्हारे पसंदीदा ब्रांड की सिगरेट भी पसंद थी.

तुम्हें जानते हुए कितने साल हो गए? मैंने तो कभी नहीं सोचा कि ऐसा कोई रास्ता भी होगा जिसपर बारिशों के मौसम में हम हाथों में हाथ लिए घूमेंगे. रास्ते से उठ रही होगी भाप और धुंआ धुंआ हो जाएगा सब आँखों के सामने. तो ये जो मेरी आँखों के ख्वाब नहीं थे, उस रास्ते के लिए इतने जरूरी क्यूँ थे कि वो तुम्हें ढूँढने चला गया. मुझसे ज्यादा तुम्हारी याद आती थी रास्ते को. उसे तुम्हारी आवाज़ की आदत पड़ गयी थी. पर एक रास्ता ही तो था जो जानता था कि तुमसे बात करते हुए मैं सबसे ज्यादा हंसती हूँ...एक तुम्हारा अलावा सिर्फ वही एक रास्ता था जो जानता था कि मैं हँसते हुए हमेशा आसमान की ओर देखती हूँ.

तुम कहाँ चले गए हो? कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम्हारे घर के आगे का रास्ता भी मुझे ढूँढ़ने निकला है इसलिए तुम मुझ तक नहीं पहुँच सकते. कि कोई एक खोया हुआ होता तो मुमकिन था कि हम कहीं मिल जाते...मगर चूँकि मेरे रस्ते को तुमसे प्यार था और तुम्हारे रास्ते को मुझसे...वे दोनों हमें मिलाने को निकल गए और हम दोनों खो गए. पर सोचो...आसमान तो एक ही रहेगा...चाँद...तारे...रात हो रही है, ऐसा करो न कि तारों में तुम्हारे शहर का नक्शा बना दो. मैं रात नदी का किनारा पकड़ कर तुम्हारे शहर पहुँच जाउंगी.

तब तक...हम दोनों के कुछ दोस्त मेरे और तुम्हारे शहर के बीच कहीं रहते हैं...उनसे कहो जरा रास्तों का ध्यान रखें...कभी कभी सफ़र में सुनाया करें रास्तों को मेरी तुम्हारी कहानियां. चलो एक 'मिसिंग' का पोस्टर बनवाते हैं. कभी वापस आ जायेंगे रस्ते तो एक दूसरे के पास ही रहने देंगे उन्हें. तुम भी मेरे शहर चले आना उनकी ऊँगली पकड़े. मेरे रास्ते को कहीं देखोगे तो पहचान तो लोगे? सांवला सा है, उसके बांयें गाल पर डिम्पल है और उसके दोनों तरफ गुलमोहर के फूल लगे हैं. चुप्पा है बहुत, बारिश की भाषा में बात करता है...जो तुमसे भीगने को कहे तो मान जाना.

सी यु सून!

31 March, 2013

ऑफिस डायरीज- हाई ऑन लाइफ

कल ऑफिस की ऑफसाईट थी. पिछले कुछ दिनों से इसमें बहुत सारा काम था और चूँकि ये सबसे सीक्रेट रखना था तो हमारी टीम का काम और भी मुश्किल हो गया था. देर रात तक काम करना, सन्डे को काम करना...परेशान रहना...प्रेशर में रहना. झगड़ा करना. घर पर कुछ भी ध्यान नहीं दे पाना. जाने कितनी रातों से डिनर किया ही नहीं था. 
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सुबह साढ़े सात बजे रिजोर्ट के लिए निकलना था. घर से तीस किलोमीटर दूर था. मुझे लॉन्ग ड्राइव्स अच्छी लगती हैं. नेहा को भी बुला लिए थे...यूँ तो अकेले जाना भी अच्छा लगता है...लेकिन ऐसे ही...लगा थोड़ी कंपनी अच्छी रहेगी. ऑफिस से लोगों को ले जाने के लिए बस का इन्तेजाम था लेकिन मुझे अपनी गाड़ी से जाना आना अच्छा लगता है. वापसी के लिए किसी का इंतज़ार नहीं करना पड़ता है. 

सुबह सुबह उठ जाऊं तो सुबह सुबह भूख लग जाती है मुझे. वहां पहुँच के सैंडविच खाए...तब जा के चैन आया. लोगों को इस साल का सब इन्तेजाम बहुत पसंद आया था और हमारी टीम को सब लोगों से खूब तारीफ़ मिल रही थी. मूड मस्त था. परसों की रात भी काम के चक्कर में वापस आते हुए बारह बज गए थे और फिर भोरे भोर निकल गए थे. कुणाल से मिले दो दिन हो गए...एक घर में रहते हुए...उसपर ये दोनों उसकी छुट्टी का दिन था. बहुत गिल्टी फील हो रहा था. इतना अच्छा लॉन्ग वीकेंड बर्बाद हो रहा था. प्रेसेंटेशन चल रही थी कि उसका मेसेज आया 'रोमिंग अराउंड बैंगलोर इन योर बाईक'. पढ़ के बहुत बहुत बहुत अच्छा लगा. मेसेज से उसका उत्साह दिख रहा था...उसे बाईक चलाना पसंद नहीं है तो कभी नहीं चलाता है, आसपास भी जाना होता है तो पैदल चला जायगा, साइकिल ले लेगा लेकिन बाईक नहीं. टी ब्रेक में फोन किया तो सुना रहा था कि एमजी रोड में घूम रहा था. 

कुछ नया करने में हमेशा मज़ा आता है. हम तो खैर हमेशा ही कोई न कोई खुराफात करते रहते हैं इसलिए जिम्मेदार बनने का जिम्मेदारी कुणाल ले लिया. सब सीरियस सीरियस चीज़ करना इत्यादि...कल लेकिन वो भी खुराफात कर रहा था तो हमको बहुत अच्छा लगा. लैंडमार्क गया, किताब खरीदा...हमको मेसेज किया कि किताब ख़रीदे हैं. दिन बहुत अच्छा बीत रहा था. 

मैं जिस कंपनी में काम करती हूँ, वहां की एक चीज़ मुझे बेहद पसंद है...यहाँ लोग अपने काम को लेकर खुश हैं. हर हेड ऑफ़ डिपार्टमेंट जब बात करता है तो उनका उत्साह जैसे इन्फेक्शस लगता है. अच्छा लगता है. कुछ बड़ा करने का दिल करने लगता है. हमारी बोरिंग पकाऊ सी नौकरी नहीं है, हम ऑफिस जाते हैं तो इसलिए कि अच्छा लगता है. 

शाम को गेम्स वगैरह का इंतज़ाम था और ट्रैम्पोलीन का भी इन्तेजाम था. लड़के सारे क्रिकेट खेलने में व्यस्त हो गए. कुछ और भी गेम्स थे. सब तरफ बहुत सा हल्ला हो रहा था, कोई फोटोग्राफर को बुला रहा था. सब बहुत सारी चीज़ों में बिजी थे. ऐसा कभी कभी लम्हा आता है कि सब कुछ ठहर जाता है, धीमा हो जाता है और आप अचानक से एकदम अकेले हो जाते हैं. वैसा ही लगा. कुणाल की बड़ी याद आई. यूँ तो ऑफिस में अपनी टीम है, सबसे बहुत अच्छे रिलेशंस हैं. बहुत मस्ती भी करते हैं हम लोग. पर होता है, कभी कभी, अचानक से लगता है कि एक उसके बिना हम अधूरे हैं. कि वो मेरा सबसे जरूरी हिस्सा है. उसे फोन करते हुए लगभग रोना आ गया. बहुत मिस कर रही थी उसे. 

अवार्ड्स नाईट शुरू हुयी...खूब हल्ला, सीटियाँ वगैरह बजीं...मज़ा आया. फिर आया मजेदार अवार्ड्स का वक़्त. इसमें कुछ कुछ शैतान टाईप के टाइटिल दिए जाते हैं...जैसे कोई बहुत दुबला पतला है तो साइज जीरो अवार्ड. पब्लिक से नाम लेकर पूछा जाता था कि क्या अवार्ड दिया जा सकता है...इसमें जब मेरा नाम आया तो सब तरफ से एक ही हल्ला हो रहा था 'दबंग' :) तो हमको कल लेडी दबंग अवार्ड दिया गया. हमको थोड़ा आश्चर्य हुआ कि ऑफिस में सब हमसे इतना डरते हैं. हम तो काफी सीधे साधे भले हार्मलेस टाईप प्राणी हैं ;) जोर्ज भी हमको 'गुंडी' बोलता है. 

बार ओपन हो चुका था. हमने नीट पानी पीना शुरू किया. पानी नीट पीना बहुत खतरनाक होता है, ख़ास तौर से तब जब फुल में म्यूजिक बज रहा हो और डिस्को लाइट्स चालू हों. मैंने दो ग्लास ऑन द रोक्स पानी पिया. सारे लोग डांस करना शुरू कर चुके थे. कहीं तमिल का स्पेशल डांस हो रहा था तो कहीं नागिन डांस. कल हमको बहुत अच्छे दो कोम्प्लिमेंट्स(?!) भी मिले. अनुषा बोली कि वो मेरे जैसा टपोरी बनना चाहती है. मैंने सर पीट लिया. दुनिया भर की माएं ऐसे भी बोलती हैं कि मैं उनकी भोली भाली मासूम बेटियों को बिगाड़ देती हूँ. लाईन में एक और शामिल. मैंने उसे धमकाया, ख़बरदार जो मेरे जैसे बनी, बहुत पीटेंगे तुमको. फिर उसको मेरे जैसा डांस करना सीखना था. अब हमको तो मालूम नहीं था कि हमको डांस करना भी आता है. हम तो म्यूजिक सुनकर पगला जाते हैं बस. 

डीजे मस्त था. जैसे ही हम बैठने को सोचते थे कोई ऐसा गाना आ जाता था कि फिर सब भाग के डांस करना शुरू कर देते थे. केओस था. धूल उड़ रही थी. जूते गंदे हो रहे थे. मस्ती चढ़ रही थी. बूंदा बांदी शुरू हो गयी. म्यूजिक बंद हुआ और डिनर ब्रेक हुआ. हमारा सब काम आलरेडी फिनिश हो गया था. खाने में किसी को इंटरेस्ट था नहीं. मेरी कार में और तीन लोग आ सकते थे. जोर्ज ने पूछा कि हम कब निकल रहे हैं, हम बोले कि अभी. फिर अनीशा को भी उसके घर छोड़ना था. प्रकाश भी मेरे घर के बगल में ही रहता है. तो पूरी टीम कार में घर की ओर निकल लिए. सारे टाइम नौटंकी कमेंट्री होती रही. अनिषा को बैंगलोर में आये बहुत कम टाईम हुआ है. वो अपने घर के रस्ते हमें पांच किलोमीटर घुमा के ले गयी. 

भटकते अटकते घर पहुंचे. गैस ख़राब हो रखी है तो माइक्रोवेव में मैगी बनाये. इस तरह एक महान कार्य संपन्न हुआ. ये पूरा ड्रामा यहाँ चिपकाया जा रहा है कि हमको भी ध्यान रहे कि हम कितना एन्जॉय करते हैं लाइफ को. इन फैक्ट राहिल एक इंसिडेंट बता रहा था 'पूजा बोल रही है...फुल, एकदम मार के तोड़ के आयेंगे' क्लाइंट मीटिंग के पहले. 'God knows, she is high on what, tell me also...I also want to be on a high like that'.
वगैरह....वगैरह...वगैरह. 

25 March, 2013

यादों का जंकयार्ड

वो जो याद के गुलमोहर थे...
पटना...
सब उधार की यादें हैं...
कुछ नया लिखने को जगह ही नहीं है. महसूस हुआ कि यादें भी एक उम्र के बाद कहीं सहेज के रख देनी होती हैं कि वर्तमान के पल के लिए जगह बन सके.

मैं बहुत साल बाद गयी थी. पाटलिपुत्रा कोलनी. जहाँ घर हुआ करता था. मोड़ पर, सड़क पर, गुलमोहर के पेड़ों पर. याद की अनगिन कतरनें थीं. धूल का अंधड़ था कि सांस लेने को जगह बाकी नहीं थी.

इतने साल बाद भी सारे रस्ते वैसे ही याद थे...किस मोड़ पर रुकी थी...कहाँ पहली बारिश का स्वाद चखा था...कोलेज के आगे का चाट का ठेला...गोसाईं टोला की वो दूकान जहाँ एक रुपये में कैसेट पर गाना रिकोर्ड करवाते थे. नेलपॉलिश खरीदने वाली दुकान. बोरिंग रोड का वो हनुमान जी का मंदिर. आर्चीज की दुकान की जगह लीवाईज का शोरूम खुल गया है.

कितने सालों में ये शहर परत दर परत मेरे अन्दर बसता रहा है. बचपन की यादें नानीघर से. जब भी जाते थे दिदिमा अक्सर बाहर ही दिखती थी. उसमें कोई फ़िल्मी चीज़ नहीं दिखती थी. कोने खोपचे के किराने की दुकान, आइसक्रीम फैक्ट्री, दूर तक जाती रेल की पटरियां. हर चीज़ के साथ जुड़े कितने लोग दिखते रहे...मम्मी, नानाजी...बचपन और कोलेज के कुछ दोस्त जिनका अब नाम भी याद नहीं.

कैसी कैसी यादें सेलोफेन पेपर खरीदने से लेकर बोरिंग रोड के सैंडविच में पेस्ट्री खाने की यादें. कितने चेहरे...टुनटुन भैय्या, लब्बो, काजल दीदी, नन्ही दीदी, बॉबी दीदी, राजू भैय्या...अपना ३०२ वाला घर, घर के आगे जामुन के पेड़...बाउंड्री पर लगे पीले कनेल की कतार. वो बगल वाले घर में रहने वाला कोई जो ऐनडीए में पढ़ता था और छुट्टियों पर आता था तो मिलिट्री कट बाल होते थे उसके. घर की छत से सूरज डूबते देखना.

रवि भारती जाना...फ्रैंक सर की भोजपुरी...होप अपार्टमेंट...हिमा से की गयी अनगिन बातें. पूरे शहर भटकते हुए लगता रहा कि लौट कर घर जायेंगे...मम्मी इंतज़ार कर रही होगी. यकीन नहीं होता, दुनिया के किसी भी शहर में कि घर जाने पर मम्मी नहीं होगी...पटना में तो जैसे हर जगह बस एक वही है. कहीं उसके साथ कपड़े खरीदने की यादें हैं, कही उसके साथ झगड़ा कर रहे हैं...पिस्ता वाला आइसक्रीम खिला रहे हैं उसको. कहाँ नहीं है वो. मन कैसी रेतघड़ी है एक तरफ से भरती एक तरफ से रीतती. मैं अतीत से उबरूं तब तो कहीं वर्तमान में रह सकूं. कहीं भी घूमते हुए लगता रहा कि लौट कर अपने पाटलिपुत्रा वाले घर जायेंगे, कोई जादू होता होगा दुनिया में कहीं कि सब सही हो जाएगा.

यादों ने जीने नहीं दिया...अतीत के साथ सुलह करनी जरूरी है. इतना कुछ पीछे सोचूंगी तो कैसे जीना होगा? राजीव नगर से गुजरी...कहीं  मंदिर, कहीं साइबर कैफे, कहीं दूर तक जाती रेल की पटरी...साथ थोड़ी दूर पर चलती गंगा. इस बार बड़ी इच्छा थी कि एक बार गंगा को देख आऊँ मगर लोग कहते हैं कि गंगा रूठ गयी है. दिखती नहीं है. वक़्त याद आता है कि कुर्जी में कैसे ठाठें मारती दिखती थी गंगा. याद आया उसका बरसातों में ललमटिया सा हो जाना. हहराती गंगा में विसर्जित करना टूटी हुयी मूर्तियाँ, दीवाली के दिए, यादों से निकाल कर नाम कोई.

I am jigsaw puzzle of collective memories, the key piece of which has been lost with mummy, forever. For all they try, no one can assemble me with all the pieces in their right place. And so I remain, a confused jumble of faces, tears, smiles, people, lost and found, roads, rain, school, college, teachers, friends...

इस बार होली में गैरजरूरी सामान के याद कुछ यादों को भी बुहार कर बाहर कर दूँगी...बहुत सा डेड स्पेस खाती हैं यादें और वहां कुछ नया, कुछ अच्छा उगाने की उम्मीद नहीं बचती. अतीत एक कालकोठरी क्यूँ बने...उसमें गाँव की खुली पगडण्डी पर दौड़ती हूँ मैं...वहां मम्मी के हाथों के खाने की खुशबू है. वहां माथे पर रखा मम्मी का आशीर्वाद है. इन सबसे नयी रोपनी करनी होगी...मिट्टी को जोतना होगा. रोपने होंगे खुशियों के बिरवे...उम्मीदों  के फसल उगानी होगी.

एक दिन...किसी एक दिन...मैं चीज़ों को वैसा का वैसा एक्सेप्ट कर लूंगी...नए दिन में नया जी सकूंगी. चंद रोज और मेरी जान, बस चंद रोज...

20 March, 2013

मुस्कराहट का परजीवी आंसुओं से सिंचता है


मुस्कराहट का परजीवी आंसुओं से सिंचता है.
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और वो खो गया. ऐसे जैसे कभी था ही नहीं. ऐसे जैसे नदी के तट से गुम हुआ हो कोहरा, ऐसे जैसे राम ने ली थी जल समाधि.

मुझे देर तक दिखती रही उसकी आँखें, चेहरा बदल बदल कर. सलेटी कपड़े पहने वो कौन था जिसने पूरे धैर्य से मेरी पूरी जिंदगी सुनी और अंत में श्राप देने की जगह सर पर हाथ रखते हुए आशीर्वाद में अभयदान दे गया.

संत, महात्मा, दुनिया से विरक्त कोई? मेरे मन को समझने वाला. रात का तीसरा पहर था. अलाव के आखिरी अंगारे बचे थे. प्रेम अपनी ऊष्मा बचाए रखने के लिए कोई नहीं दुनिया नहीं बसाना चाहता था.

मैं थी की मिटटी के घरोंदों को ही घर मान बैठी थी. कहाँ मैं बंजारन और कैसा वो धरती से सोना उगाने वाला किसान, हमारा क्या मेल था.

-किसी तारीख का लिखा हुआ, जो तारीख लिखी नहीं गयी.
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Absence of death is not life. Absence of life is death.
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मैं कहीं गुम हो जाना चाहती हूँ. 

14 March, 2013

घड़ी तुम्हारे लौट आने का वक़्त नहीं बताती है

डेज ऑफ़ बीईंग वाइल्ड...एक उदास खालीपन से पूरी भरी हुयी फिल्म है. इसके किरदार कितने रंगों का इंतज़ार जीते हैं...टेलीफोन की घंटी की गूँज को अपने अन्दर बसाए...उदासी का एक वृत्त होता है जिसके रंग बरसात के बाद भी फीके दीखते हैं. कैसा अकेलापन होता है कि अपने सबसे गहरे दर्द को एक नितांत अजनबी के साथ बांटने के लिए मजबूर हो जाता है कोई...

इसका टाइटल प्लेट बहुत बहुत दिनों तक मेरा डेस्कटॉप इमेज रहा है. इस शुरुआत में एक अंत की गाथा है...एक कहानी जो आपको सबसे अलग कर देती है...मृत्यु को ज़ूम इन करके देखती डिरेक्टर की आँखें वो एक चीज़ ढूंढ लाती हैं जिसे मैं कहीं सहेजना चाहती हूँ...वो आखिरी लम्हे में याद आता नाम किसका है.

फिल्म जहाँ ख़त्म होती है...वहीँ शुरू हो जाती है...यू आर आलवेज इन माय हार्ट...
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मौत के पहले के आखिरी लम्हे में वो एक अजनबी से गुज़ारिश करता है कि उस लड़की को हरगिज़ न बताये कि वो वाकई उसे इस आखिरी लम्हे में याद कर रहा है. कि यही उसके लिए बेहतर होगा...कि वो कभी नहीं जाने.

कसम से आज तुम्हारी बहुत याद आई...तुम्हारे साथ और भी कितने लोगों की याद आई जिनकी जिंदगी में कहीं कोई एक हर्फ़ भी नहीं हूँ...मेरे साथ ऐसा क्यूँ होता है...मैं क्यूँ नहीं भूल पाती लोगों को...कभी भी नहीं क्यों? एक छोटी जिंदगी, उफ़ एक छोटी जिंदगी. दिल कैसा उजाड़ मकान है...इसमें कितने पुराने लोग रहते हैं. वो होते हैं न, घर पर अवैध कब्ज़ा कर के बैठ जाने वाले लोग. वे इतने गरीब होते हैं कि उनके पास जाने का कोई ठिकाना नहीं होता है. मकान मालिक इतना गरीब कि उसका किराये के अलावा और कोई आमदनी नहीं. हालात से मजबूर आदमी. 

ऐसी मजबूरी में कैसा प्यार पनाह पाता है...तकलीफ में खिलने वाला ये कैसा पौधा है कि जब इस पर फूल आता है तो उस खुशबू में पूरी दुनिया गुलाबी हो जाती है. एक किरदार है, काफी आम सा...लेकिन जब एक खास एंगल से रौशनी उसपर गिरती है तो बेहद खूबसूरत लगता है. फिल्म देखते हुए गौर करती हूँ तो पाती हूँ कि आखिरी सीन में छत इतनी नीची है कि वो हल्का सा झुक कर खड़ा होता है सारे वक़्त. बहुत कोशिश करके भी उस चेहरे में मैं वो शख्स नहीं ढूंढ पाती जिससे मुझे जल्दी ही प्यार होने वाला है. एक एक करके वो जाने क्या क्या चीज़ें अपनी जेब में रख रहा है. उन चीज़ों में मेरा कुछ भी है...क्या किसी भी चीज़ को कभी मेरे हाथों ने छुआ होगा? एक बार उसने कहा था मेरे हाथ का लिखा एक नोट उसके वालेट में हमेशा रहता है. फिल्म ऐसे कुछ झूठों की नींव पर चलती है. 

फिल्म कहाँ ख़त्म होती है, जिंदगी कहाँ शुरू...तुम क्या लिखते हो और मैं क्या पढ़ती हूँ इन बातों में क्या रखा है. बात इतनी सी है बस कि आज भी रात के आठ बजे अचानक घड़ी पर नज़र चली गयी...एक ये वक़्त है, एक तीन बजने में दस मिनट का वक़्त है. कभी कभार मैं इन वक्तों में घड़ी देख लेती हूँ तो बहुत रोती हूँ. मालूम है, मुझे कभी भी टाइम पर कुछ भी करने की आदत नहीं है...मैं मीटिंग में लेट जाती हूँ, ऑफिस में लेट जाती हूँ, ट्रेन, एयरपोर्ट, सब जगह लेट जाती हूँ. फिल्म में एक मिनट है...लड़की कहती है...मालूम है...मुझे लगता था एक मिनट बहुत जल्दी बीत जाता है...एक मिनट बहुत छोटा वक़्त होता है. हम सब अपनी अपनी जिंदगी में ऐसी कितनी सारी छोटी छोटी चीज़ें सहेज कर रखते हैं. 

घर आई हूँ...२०४६ लगा दी है...इसलिए नहीं कि फिल्म देखनी है...पर इस फिल्म का कोई एक लम्हा है जिसमें बहुत सारी ख़ुशी है. मैं उस ख़ुशी से अपनी फिल्म की रील को ओवरराईट करना चाहती हूँ. फिल्म में वो सायोनारा कहता है...मैं पहली बार नोटिस करती हूँ कि उस पूरी फिल्म में सिर्फ एक शब्द मुझे समझ आया है. मैं भाषाएँ सीखना चाहती हूँ. मैं बहुत बहुत सारा रोना चाहती हूँ पर अचानक से आंसू आने बंद हो गए हैं. मैं सिगरेट का एक लम्बा कश लगाना चाहती हूँ. मैं बहुत सारी वोदका पी जाना चाहती हूँ आज. गहरी लाल चेरी वोदका. बेहद मीठी. बेहद नशीली. 
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मुझे मालूम है कि क्या हुआ है...बेहद खुश होने वाला कोई दिन है...और उसे याद कर रही हूँ...जो फोन पर मेरी आँखों के आंसू देख लेती थी. मैं जाने किस किस चीज़ से उसके नहीं होने को भरना चाहती हूँ. पहले कोपी में डूडल बनाती थी तो उनमें आसमान, बादल, चिड़िया, बारिश होती थीं. मैं आजकल सिर्फ दीवारें बनाती हूँ. जाने कैसी कैसी लकीरें...कैसे रस्ते जो कहीं नहीं खुलते. मैं बहुत उलझ गयी हूँ. पिछली बार जब बहुत पी थी तो होश नहीं था...मैं बहुत रोई थी इतना याद है. मैं बहुत उदास थी कि मैं देखती हूँ कि लोग चढ़ने के बाद बहुत खुश होते हैं, दोस्तों को फोन करते हैं...मैं सिर्फ रोती हूँ. तो क्या बाकी जिंदगी सिर्फ किरदार निभाती हूँ? खुश रहना आदत सी है...नॉर्मली किसी चीज़ को लेकर पोजिटिव रहती हूँ. फिर. फिर क्या?

कहाँ से बहती है दर्द की नदी...कैसी उम्रकैद है...तुम कहाँ हो...मर जाउंगी तो दिखोगी कहीं? पता है माँ, घर गए थे तो याद करने की कोशिश किये...सच्ची में...हमको वाकई याद नहीं हम आखिरी बार खुश कब हुए थे. 
बहुत साल हो गए. 
आई स्टिल मिस यु वेरी मच माँ. 

12 March, 2013

कि दिल का रंग होता है...गुलाबी

वो एक गुलाबी फूलों वाला पेड़ है. उसके पार से नीला आसमान दिखता है...सड़क पर करीने से गिरे हुए गुलाबी फूल हैं. दिल अगर कोई फूल होता तो इसी रंग का होता...ऐसा ही नर्म और नाज़ुक कि तोड़ते हुए आप खुद टूट जाओ. हलकी हवा चलती है तो बहुत से गुलाबी फूल हौले हौले गिरते हैं. रंग इतना हल्का है कि कैमरा में कैद नहीं हो पाता. कुछ हलकी भूरी आँखें याद आती हैं...उनका रंग जैसा मेरी यादों में है, किसी तस्वीर में नहीं है.

मैं रोज बाईक से आती हुयी उस पेड़ को देखती हूँ...हफ्ते भर का मौसम है...गुलाबी. रोज सोचती हूँ कि कैमरा ले आउंगी...इस खूबसूरती को कैद करने की कोशिश करूंगी मगर उनकी खूबसूरती आँखों में खिलती है...मूड का मौसम है उस पेड़ पर. कुछ बैलाड बजाती हूँ. कुछ आवाजें हैं कि वापस दुनिया में लौटा लाती हैं.

बहुत सी देखे हुए दृश्यों के रंग नहीं होते...बचपन में घुटने पर चोट लगी तो खून बह रहा था मगर खून का रंग सियाह याद आता है. एक बार तुम्हारी दवात गिर गयी थी, किस रंग से लिखते थे तुम? इतना दर्द लिखते हो अब तक, उस समय तो शायद गहरी नीली सियाही इस्तेमाल करते होगे या कि उम्र थी कच्ची...हरे रंग का था क्या? फिर मेरे खतों में तुम्हारा सिग्नेचर सिर्फ काले रंग में क्यूँ मिलता है? यादों का कौन सा फ़िल्टर है कि सारे रंग एक बार में ही खो जाते हैं.

मैंने तुम्हारे कमरे पर जो फूल लगाए थे गुलदान में, वो कैसे हो सकते हैं काले...कम से कम रजनीगंधा का कोई तो रंग होगा...हल्का गुलाबी...नर्म पीला...खामोश नीला...कोई तो रंग होगा...ऐसा कैसे हो सकता है कि कमरे की दीवारें काले रंग की हों...ऐसा तो सिर्फ इतना था न कि मेरी आँखों में लगा काजल था काले रंग का. साल में कितने दिन थे...दिन में कितने लम्हे...कितने लम्हों में तुम थे मेरी जान? बाकी लम्हों का रंग क्या था? उस साल क्या मैंने सारे दुपट्टे काले रंग के ख़रीदे थे...कहाँ थे रंग मेरी जिंदगी के.

सिर्फ सड़कें याद आती हैं मुझे...मगर कच्ची पगडंडियाँ तो भूरे रंग की होनी चाहिए थीं...काली मिट्टी तो उस जगह नहीं होती...वरना उस मिट्टी में लोग खेती करते. काली मिट्टी बहुत उर्वर होती है. डार्क चोकलेट उन दिनों भी काले रंग की नहीं हो सकती...कत्थई रंग की होती है. तुमने जब हाथ पकड़ा था तो निशान पड़ गए थे...मुझे याद है कि वे निशान काले रंग के थे. मैंने कहा था कि मैं लौट कर नहीं आउंगी...मेरे जाने का रंग क्या था मुझे मालूम नहीं...मगर उस दिन के बाद शायद कमरे में बत्ती नहीं जली कभी. दिन को सूरज का भी रंग होता था न...तुम्हें रंग और रोशनियों में फर्क मालूम है? रोशनियाँ मिल कर सफ़ेद रंग की रौशनी बनती हैं मगर रंग मिला दोगे तो काला रंग बनता है. उस रंग से फिर कोई रौशनी वापस नहीं जाती.

मेरे मूड स्विंग्स थोड़े तमीजदार हो रहे हैं. बता कर आते हैं. कई बार कोशिश करती हूँ तो उदास मौसम को कुछ लम्हों के लिए टाल भी देती हूँ. मेरे पसंद की चोकलेट मिलनी बंद हो गयी है शहर में. मैं ठहरना चाहती हूँ मगर ठहर नहीं पाती...बाईक पर कोई जिन्न खींचता है...इतनी तेज़ इतनी तेज़ कि जैसे जिंदगी से रेस कर रही हूँ...फिर से कोलाज का मौसम है. दुपट्टे को रंगती हूँ सात रंगों में. घर में बजाती हूँ वाल्ट्ज...पढ़ती हूँ पुरानी किताबें. तलाशती हूँ खोयी हुयी किताबों के पीछे लिखी हुयी तारीखें. सोचती हूँ कहीं से लौट आने का मौसम किसी कैलेंडर में दिखेगा.

सांस रोकती हूँ पानी के अन्दर...सब धुंधला लिखता है. याद आता है आज फिर रोते रोते सो गयी हूँ. सुबह बदन में दर्द होता है बहुत. समंदर में डूब रही हूँ...पैरों में जंजीरें हैं...पत्थर है भारी सा कोई...सीने में दर्द है...कोशिश भी नहीं की है एक सांस लेने की...आँखें खोलूंगी तो जाने कैसा दृश्य होगा. किस रंग है जिंदगी? कौन बताये...कौन समझाए!

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