15 December, 2008

किस्सा ऐ शूटिंग

एक पूरा हफ्ता...और करने को कुछ नहीं
एडिटिंग शनिवार को होनी है।

इस बार फ़िल्म बाने के मैंने बहुत कुछ सीखा...और सबसे जरूरी था एक टीम की तरह काम करते हुए एक दूसरे पर भरोसा करना। जब किसी को कोई बात समझ नहीं आ रही तो उसकी मदद करना, उसे समझाना की वो काम को कैसे बेहतर कर सकती है...न की ख़ुद ही करने लग जाना की तुमसे नहीं हो पायेगा।

ये पहली बार हुआ है कि मैंने कैमरा फेस किया है...मुझे बहुत मज़ा आया मगर फ़िर भी हर शॉट में लगता था कि पता नहीं कोम्पोसिशन कैसी है, लाइट angles सही हैं या नहीं। काफ़ी टेंशन होती रही की फ़िल्म actually स्क्रीन पर लगेगी कैसी??!!!

रात को शूट करना बहुत मुश्किल होता है, इसलिए अधिकतर फिल्में दिन में शूट होती हैं और फिल्टर लगाये जाते हैं कैमरा पर। मुझे थोड़ा बहुत अंदाजा तो था कि दिक्कत होगी मगर इतनी होगी नहीं सोच पायी थी। हर शॉट के लिए लाइट को हटाना पड़ता था, कैमरा अलग जगह रखना पड़ता था, और इस सब के साथ ये भी ध्यान रखना पड़ता था कि ऐसा तो नहीं हो रहा कि परछाई दूसरी तरफ़ आ रही है।

सबसे मुश्किल तो ये था कि कैमरा में अच्छी इमेज आए इसके लिए लाइट कैमरा के पीछे और हमारी बिल्कुल आंखों पर पड़ रही थी...पर उसमें भी बिल्कुल आराम से dialog बोलना...हँसना गप्पें करना। एक अलग तरह का अनुभव था।

खैर शूटिंग ख़त्म हुयी...अब रिजल्ट का इंतज़ार है.

13 December, 2008

दिल्ली तेरी गलियों का...

तारीखें वही रहती हैं

साल दर साल

वही हम और तुम भी...

बदल जाती है तो बस

जिंदगी की रफ़्तार...

खो जाती है वो फुर्सत वाली शामें

और वो अलसाई दिल्ली की सड़कें

सर्द रातों में हाथ पकड़ कर घूमना...

खो जाते हैं हम और तुम

अनजाने शहर में

अजनबी लोगों के बीच...

रह जाती है बस

एक याद वाली पगडण्डी

एक आधा बांटा हुआ चाँद

और अलाव के इर्द गिर्द

गाये हुए गीतों के कतरे...

छः मंजिल सीढियों पर रेस लगाना

रात के teen बजे पराठे खाना

और चिल्लड़ गिन कर झगड़ना

कॉफी या सिगरेट खरीदने के बारे में...

कोहरे से तुम्हें आते हुए देखना

और फ़िर गुम हो जाना उसी कोहरे में

हम दोनों का...

आज उन्ही तारीखों में

मैं हूँ, तुम भी हो...जिंदगी भी है

अगर कुछ खो गया है तो बस

वो शहर ...जहाँ हमें मुहब्बत हुयी थी

दिल्ली, तेरी गलियों का

वो इश्क याद आता है...

जिंदगी...यादें...और कोरे पन्ने

इतवार...वैसे तो बहुत से कारण होते हैं इंतज़ार करने के...पर ये इतवार थोड़ा अलग है।

मैंने डॉक्युमेंटरी पहले भी बनाई है, पर फिल्मों का पहला अनुभव है...भले ही अतिलघु फ़िल्म कह लें। पिछली पोस्ट पर जो कहानी थी, उसे ही शूट करने वाले हैं। और जैसा की छोटे प्रोजेक्ट्स में होता है...लीड रोल भी मुझे ही करना है...हालाँकि मुझे डायरेक्शन और लिखने में ज्यादा मज़ा आता है। पर सोचा एक बार भूत बन के भी देख लिया जाए। मज़ा तो आएगा ही।

अगले सन्डे एडिट करके तैयार हो जायेगी तो अपलोड भी कर दूंगी...आज बस सोच के अच्छा लगा रहा है और डर भी। उम्मीद है सब अच्छा ही होगा।

क्या जरूरी है

जिंदगी की किताब के

हर पन्ने पर कुछ लिखा हो

कुछ पन्ने तो कोरे रहने दो...

कभी यादों को अपने रंग में रंगने का मन किया तो?

12 December, 2008

वो सिगरेट

कल सुबह १० बजे के पहले मुझे अपने एडिटर को एक आर्टिकल मेल करनी है...रात के ९ बजे रहे हैं और दिमाग कोरा कागज बना हुआ है...सारे शब्द जाने कहाँ चले गए हैं, भला ये भी कोई तफरीह करने का वक्त है। रोज आफिस में डरावने मेल आते हैं, ५० लोगो की कटौती होने वाली है, प्रोफिट नहीं हो रहा कंपनी को, बोनस तो छोड़ो इस मुश्किल वक्त में नौकरी बच जाए यही गनीमत होगी। और इस नौकरी के लिए जरूरी था कि मैं एक तडकता भड़कता सा आर्टिकल लिख के मेल करूँ, कि एडिटर देखते ही खुश हो जाए कि भाई मैगजीन मेरे ही कारण बिकती है। पर क्या लिखूं...

इतने में दरवाजे पर दस्तक होती है, अब इतनी रात को कौन आ गया दिमाग खाने, मैं मन ही मन भुनभुनाता हुआ उठा। दरवाजा खोला तो सामने तन्वी खड़ी थी, मेरी स्कूल की दोस्त...मुझे लगा ज्यादा काम के कारण मेरे दिमाग में शोर्ट शर्किट हो गया है...८ साल बाद ये तन्वी कहाँ से टपक पड़ी। "अबे...मैं कोई दरबान नज़र आती हूँ जो तेरे घर के गेट पर पहरा दूंगी...रास्ता दे ढक्कन।" और वो मुझे लगभग धकेलती हुयी घर में चली आई...अगर कोई शक था भी तो उसकी आवाज और टोन से दूर हो गया। मुझे इस तरह से बिना किसी संबोधन के तन्वी के सिवा कोई बात नहीं कर सकता था।

"तन्वी, ये आसमान किधर से फटा और तू किधर से टपकी...मोटी!! मेरा पता कहाँ से मिला !!??", मैं चकित था, उसके ऐसे बिना बताये आने पर। "इंटरपोल, एफ्बीअई...हर जगह तो तू है न, मोस्ट वांटेड लिस्ट पर...तो बस ढूंढ लिया, यार तू भी हद्द करता है, इत्ते से बैंगलोर में तेरा पता ढूंढ़ना कोई मुश्किल बात है क्या। इतने सालों बाद आई हूँ तुझसे मिलने और तू खुश होने की बजाई जिरह कर रहा है, पुलिसवाला हो गया है क्या?" दन्न से गोली की तरह जवाब आया...बाप रे वो बचपन से ऐसे ही बोलती थी, बिना कौमा फुलस्टॉप के हमने तो उसका नाम ही टेप रिकॉर्डर रख दिया था। " नहीं, मेरी माँ मैं तो ऐसे ही पूछ रहा था, तेरे जैसी महान आत्मा के लिए कुछ भी पता करना बड़ी बात थोड़े है."

और अब पूछताछ करने की बारी उसकी थी, इसके पहले की मैं रोकता वो पूरे घर का मुआयना करने चल पड़ी थी..."यार ये इतना साफ़ सुथरा घर तेरा तो नहीं हो सकता, गर्लफ्रेंड है क्या?"।"हाँ, है...५० साल की अम्मा है, सारी सफाई उन्ही की देन है, खाना भी बना के खिलाती है...वैसे उम्र थोडी ज्यादा है पर तू कहेगी तो मैं शादी कर लूँगा उससे. तेरे लिए कुछ भी यार".वो जहाँ थी उसके हाथ में जो पकड़ आया खींच के मारा था उसने, वो तो गनीमत है कि रबड़ बॉल था, वरना तो मेरा सर गया था.

किचन में बियर कैन का अम्बार लगा हुआ था, " छि छि बुबाई तू दारू पीने लगा है, सोच आंटी को पता चला तो क्या होगा?". वो आफत की पुड़िया अब कमरे में आ चुकी थी वापस इंस्पेक्शन ख़त्म हो गया था. " ऐ तन्वी तुझे कितनी बार कहा मुझे ये बुबाई बाबी मत बुलाया कर , तू सुधरेगी नहीं...और मम्मी को बोलने कि सोचना मत..वरना..."
"ओहो धमकी...क्या कर लेगा रे, जा मैं बोल दूंगी...अभी फ़ोन लगाउँ क्या?"
"ना रे मेरे पिछले जनम की दुश्मन, मैंने तेरा क्या बिगाड़ा है. पूरे हफ्ते मेहनत करके थोड़े बहुत पैसे कमाता हूँ, अगर बियर में डाल के पी जाऊ तो तेरे पेट में क्यों दर्द हो रहा है. जिस दिन तेरे बैंक अकाउंट से पैसे गायब करूँ उस दिन मम्मी को बोल देना, मैं भी कुछ नहीं करूँगा.२५ साल का हो गया हूँ, मेरे देश का संविधान मुझे यह अधिकार देता है कि मैं जिस ब्रांड की अफोर्ड कर सकता हूँ, दारू पियूं, और तू क्या प्राइम मिनिस्टर है। मम्मी न हुयी विपक्ष की नेता हो गई. और तू मेरे साइड में है कि उसकी?"

"नील, एक सीरियस प्रॉब्लम है"...मुझे लगता है उसने शायद जिंदगी में पहली बार मेरा नाम लिया था...उसके पहले तो मैं हमेशा ढक्कन और गधा और उल्लू और जाने क्या क्या था उसके लिए...नहीं तो मेरे घर ने नाम बुबाई से हमेशा चिढ़ाते रहती थी. थोड़ा परेशां हो गया...तन्वी ऐसे लड़की नहीं है जिसे कोई परेशानी हो और वो इस तरह गम होकर बोले."क्या प्रॉब्लम है यार, तू बोल, मैं हूँ ना""यार तू घिसे हुए डायलॉग बहुत मारता है, मेरी जिंदगी में तुझसे बड़ी प्रॉब्लम भी भला आई है कभी...बड़ा आया मैं हूँ न, हुंह. खैर, प्रॉब्लम ये है कि मुझे भूख लगी है."
"ओफ्फो भुक्खड़..रात के बारह बजे भूख लगी है, जब ९ बजे मेरे घर आ रही थी तो खा के नहीं आ सकती थी...किचन में मैगी है, ख़ुद बनाएगी कि मैं बनाऊं?"
"बाप रे कंजूस मक्खीचूस...मैं नहीं जा रही मैगी खाने...मुझे पिज्जा खाना है. और पैसे भी तू ही दे, आख़िर तू लड़का है और मैं तेरी बचपन की दोस्त हूँ, और उम्र से तुझसे तीन महीने छोटी भी हूँ...और हाँ मैं अपने हिस्से के पैसे भी नहीं दूंगी".
"नहीं मांगूंगा, अम्मा...मेरी मजाल मैं तेरे से पैसे मांगूं...बोल कौन सा पिज्जा खायेगी..."
और इसके बाद हम आराम से पिज्जा खा रहे थे। भला हो होम डिलिवरी वालों का, बेचारे २४ घंटे हम जैसे लोगो की जान बचाते फिरते हैं।
उसने पॉकेट से सिगरेट का एक पैकेट निकला...मार्लबोरो माइल्ड्स. "सुट्टा?"मैं जैसे आसमान से गिरा..."तन्वी, तू lung कैंसर से मारेगी, पागल हो गई है क्या, ये सिगरेट कब से शुरू कर दी, मुझे बताया तक नहीं...""लेक्चर मत झाड़...सुट्टा मरना है...नहीं मारना है? और तुझे कैसे पता मैं कैसे मरूंगी...तेरे सपने में आके यमराज ने भविष्यवाणी की है...मैं सुट्टा मारना छोड़ दूँ तो नहीं मरूंगी...साला फट्टू."
अब इसपर कोई क्या कह सकता है, तो मैंने भी कुछ नहीं कहा, चुप चाप हाथ बढ़ा के सिगरेट ली, और बेद के नीचे से ऐशट्रे निकाल के आगे कर दी.
उसने एक गहरा कश ले कर कहा "और तू क्या जानता है मरना क्या होता है...एक फ्लैश और ख़त्म, पता भी नहीं चलता कि मर गए हैं."
"हाँ हाँ मरने पर भी तुने Ph. D की है, भटकती आत्मा, यमराज का इंटरव्यू लिया है तुने, जानता नहीं हूँ तेरे को. फ़िर से कविता का भूत चढ़ने वाला है तुझपर, और मेरे पास भागने की कोई जगह भी नहीं है. मुझे बख्श दे मेरी माँ. एक राउंड नहीं हो पायेगा आज."
"तथास्तु...और कुछ मांग ले बच्चा, हम तेरी प्रार्थना से प्रसन्न हुए।" उसका अंदाज़ वाकई सबसे जुदा था।आज शायद इतने सालों में मैं उसे पहली बार ध्यान से देखा था, शायद इसलिए क्योंकि बहुत दिन हो भी गए थे। वो काफ़ी खूबसूरत लग रही थी।"क्या हुआ?""तू हमेशा से इतनी सुंदर थी क्या?""नहीं, मैंने फेस इम्प्लांट कराया है...ऐश्वर्या कि आँखें, प्रीती के डिम्पल...माधुरी की स्माइल...ओफ्फ्फो लाइन मार रहा है मुझपर, अभी एक कराटे चॉप पड़ेगा न, तीन जनम तक याद रहेगा""तू सीधी तरह से किसी बात का जवाब नहीं देती क्या...दो बात प्यार कि बोल लेगी तो क्या पैसे लगेंगे। मैं गुस्सा हो रहा था उसपर" और वो ठठा के हंस पड़ी..."सीधी बात, तुझसे...तू मुझे प्रभु चावला समझता है क्या...यार इतना नहीं हो पायेगा।"

"चल छोड़, क्या चल रहा है लाइफ में?""बस यार ताज में फैशन शो है, ब्राइड्स ऑफ़ इंडिया पर, तो थोड़ा बिजी हूँ. वरना तो वही..महीनों बस प्लान चलता रहता है. थोड़ा बहुत लिख लेती हूँ कभी कभी. बस, तू बता?""मेरा भी कुछ खास नहीं, रोज़ की एडिटर से खिच खिच, पिछले महीने एक लम्बा फीचर लिखा था, काफ़ी तारीफ़ आई थी...आजकल कोस्ट कटिंग में बोनस मार लिया सालों ने. अगले हफ्ते घर जा रहा हूँ. बहुत दिन हो गए."

थोडी देर की खामोशी...जिंदगी के बारे में बात करो तो अक्सर ऐसा हो जाता है. एक पर एक सिगरेट जलती रही बस आखिरी सिगरेट बची थी."जानता है आखिरी सिगरेट किसी से बाँट रहे हैं तो वो कोई बहुत करीबी होता है..."और बस जैसे आई थी एक झटके में उठ खड़ी हुयी...हम चलने लगे. एक खामोशी, जिसमें शब्द नहीं होते बस, बाकी बातें होती रहती हैं.

लिफ्ट का दरवाजा जैसे ही बंद हो रहा था, उसने रोका...और मेरी आंखों में कहीं गहरे देखते हुए कहा"जानते हो नील...जिंदगी भर मैं तुमसे एक बात नहीं कह पायी...i love you".

वापस आ के कमरे में बैठा ही था कि फ़ोन बज गया, उधर से मम्मी बोल रही थी..."बुबाई, तन्वी...तन्वी नहीं रही बेटा। अभी अभी उसकी मम्मी का फ़ोन आया था. आज शाम मुंबई में उसका सीरियस एक्सीडेंट हो गया ...स्पौट डेथ। तुम जल्दी फ्लाईट का टिकट कटा के वहां पहुँचो."

ऐशट्रे में अभी भी सिगरेट जल रही थी...जिसपर लिपस्टिक के निशान थे.

10 December, 2008

तीन मिनट की एक कहानी

वो बड़ी मुस्तैदी से तैयार हो रहा है, शरीर के हर अंग पर एक एक करके पिस्तौल बंधे जा रहा है। नौजवान है, यही कोई २० साल का होगा। चेहरे पर एक सख्ती...भावशून्यता...पर अगर आप करीब से देखेंगे तो उसकी आंखों में एक चमक है। एक जिजीविषा जो किसी भी २० साल के लड़के में होनी चाहिए, एक आग...उसकी आंखों में भी नज़र आती है।
पर वो मशीन की तरह तैयार होते जाता है, अपने बैग में एक एक करके ग्रेनेड रख रहा है...साधारण सा दिखने वाला ये बैग, मौत का फरमान बन सकता है किसी भी वक्त। ऐसे ही बैग में हमारे देश के लाखों २० साल के लड़के किताबें और उन किताबों में जाने किसके किसके सपने लेकर घूमते हैं। खिड़की से तिरछी धूप आ रही है कमरे में, गुनगुनी , नर्म जाड़े की धूप।

वो कोई गीत गुनगुना रहा है, बहुत दर्द है उसकी आवाज में, शायद कोई विरह का गीत है। किससे इतनी दूर चला आया है ये लड़का जो इससे इतनी दूर होकर भी इसकी रूह से गीत बन कर उभर रहा है। क्या माँ बाप, क्या कोई सांवली, बड़ी बड़ी आंखों वाली लड़की है...मालूम नहीं। बालों में जेल लगता है, और बड़ी अदा से कंघी करता है, चेहरे पर फेयर एंड हैन्ड्सम लगता है। एक्स का deodrant, बिल्कुल जैसे दूल्हा बनने जा रहा हो।

फ़ोन बजता है...माँ दा लाडला बिगड़ गया...रिन्गटोन जैसे एक पल के लिए खामोशी को छिन्न भिन्न कर देता है। "तैयार हो?" उधर से पुछा जाता है, "हाँ", एक छोटा सा जवाब।

अपने पॉकेट से एक बटुआ निकलता है...उसमें एक पुराणी तस्वीर है, जर्द और पीली पड़ी हुयी। माँ, पिता और छोटी बहन के साथ वो। उसकी आंखों के आगे एक दहकता मंज़र आ जाता है, चरों तरफ़ आग कि लपटें...चीख पुकार। और फ़िर एक सन्नाटा...जिस सन्नाटे से उसे असद चाचा उठा कर ले आए थे। उस दिन से वही उसके रहनुमा है, माँ पिता से ज्यादा प्यार दिया उन्होंने, उसे तालीम दिलाई, अपने साथ के लोगों से मिलवाया। और आज वो उनके बेटे से भी बढ़कर है। इसलिए तो आज उसे ये शहादत का मौका मिला है, काफिरों पर कहर ढाएगा वो आज। वही काफिर जिन्होंने उसे उसके परिवार से अलग किया। आज उसके बदले का दिन है।

मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर अंधाधुंध गोलियां चलता है वो...और तेज़ी से ग्रेनेड फेकते हुए वहां से भागता है...पर पुलिस की गाड़ी पीछा करने लगती है...सायरन कि आवाज बड़ी तेज़ी से उसका पीछा कर रही है...वह भागता है, इतनी तेज़ जितना कि कभी नहीं bhaaga था। संकरी गलियों में, घरों के सारे दरवाजे बंद हैं, सारे दरवाजे खटखटाता है...कोई सुनवाई नहीं।

एक दरवाजे पर जैसे ही हाथ लगता है कि खुल जाता है, सांझ के गहराते अंधेरे में वो हर दिशा में गोली चलता है...बिना देखे हुए...बिना सोचे हुए...एक ही क्षण में उसके चारों तरफ़ लाशें गिर जाती हैं। वो चैन की साँस लेता है, दरवाजा बंद करता है और गले में पड़े ताबीज को चूमता है। घर के अन्दर बढ़ता है कि तभी अजान की आवाज आती है। वजू करके वह कमरे में नमाज पढने बैठा है...

कमरे में एक ही दिया जल रहा है...वह जैसे ही अपने दायीं तरफ़ देखता है....एक चीख उसके गले में ही घुट जाती है ...
पूजाघर में बाकी देवताओं के साथ एक और तस्वीर लगी थी जिसमें उसके माता पिता और वो ख़ुद था...उसपर भी फूलों की एक माला टंगी हुयी थी, तस्वीर के नीचे कई राखियाँ सजी हुयी थी.

09 December, 2008

ख्वाब इक नया चाहता हूँ

ऐसे हालातों में भी क्या चाहता हूँ
जाने क्यों ख्वाब इक नया चाहता हूँ

खून फैला हुआ है सड़कों पर
और मैं रंग भरा आसमाँ चाहता हूँ

आजकल सड़कों पे मौत घूमती है
मैं अपने लिए भी एक दुआ चाहता हूँ

मन्दिर में है कि मस्जिद में, या कि कहीं और
सुकून लाये जमीं पर वो खुदा चाहता हूँ

बिखरे हुए जिस्मों में पहचान ढूंढता हूँ
कल से है गुमशुदा वो आशना चाहता हूँ

बस एक अमन का ही तो ख्वाब देखा मैंने
और वो खुदा कहता है मैं कितना चाहता हूँ

08 December, 2008

अँधेरी रात में दीपक जलाये कौन बैठा है

२०० पोस्ट हो गए। सोचा था कुछ अच्छा लिखूंगी...कुछ खूबसूरत, बिल्कुल अलग सा अहसास लिए हुए।

मगर अब लगता है शायद खूबसूरत अहसास ख़त्म हो गए हैं। मुझे नहीं मालूम कि मुंबई धमाकों से इतना ज्यादा परेशान क्यों हूँ, शायद तीन दिन तक एक हादसे के ख़त्म होने का इंतज़ार करना एक अलग तरह की दहशत को जन्म देता है। असुरक्षा की भावना इतने गहरे बैठ गई है कि जिंदगी पटरी पर आने का नाम ही नहीं लेती। एक मित्र से बात कर रही थी इसी मुद्दे को लेकर...आश्चर्य लगा जब उसने कहा कि तू इतनी परेशान हो रही है, for an event that has not even directly affected you। तो क्या अगर मेरा कोई अपना उस ब्लास्ट में मरता तो ही किसी घटना को मुझे अफ्फेक्ट करना चाहिए...शायद ऐसा होता है...शायद ऐसा हर बार हुआ हो। पर इस बार मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ है।

जब दिल्ली में थी तो जैसे आदत सी पड़ गई थी, यहाँ बंगलोर आई तो आने के एक हफ्ते बाद ही यहाँ भी ब्लास्ट हो गया। लगा कि अपने ही देश में हम निश्चिंत क्यों नहीं रह सकते। अब यहाँ ६ महीने के पहले वोटर id कार्ड तो बनेगा नहीं, तो इंतज़ार कर रही हूँ, जनवरी में नाम के लिए अप्लाय करुँगी। आज इलेक्शंस हुए और कहीं भाजपा तो कहीं कांग्रेस जीती, हालाँकि इससे ये नहीं कहा जा सकता कि आने वाले लोकसभा चुनावों का क्या हाल रहेगा...पर मुझे सच में आश्चर्य होता है कि लोगों ने अभी भी कांग्रेस को वोट कैसे दिया। यही तो तरीका है जताने का कि हम खुश नहीं हैं, अपने आसपास के हालातों से, हमारे जीने के तरीके से। एक बेसिक सुरक्षा का हक तो है हमें...जिन्दा रहने का हक।क्या ऐसा इसलिए हो रहा है कि वाकई परवाह नही है बन धमाकों कई, कि एक आम आदमी को चिंता नहीं है, और ये जो इतना हल्ला हो रहा है, थम जायेगा रुक जायेगा। पब्लिक की याद्दाश्त बहुत कमजोर होती है। वक़्त आने पर ये भी भूल जायेगी कि हमें वोट देने जाना है।

पिछले हफ्ते मैंने एक फ़िल्म डायरेक्शन पर वर्कशॉप में हिस्सा लिया था। अब हमें एक फ़िल्म बनानी है ३-५ मिनट की, मैं सोच रही हूँ कि कुछ ऐसा बनाउँ जिसे देखकर लोग घर से निकलने पर मजबूर हो जाएँ। देखें कैसी होती है कहानी और कितना असरदार होता है...जल्दी ही पोस्ट करुँगी।

"वो मुतमईन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता

मैं बेकरार हूँ आवाज़ में असर के लिए "

- दुष्यंत कुमार

२००वीं पोस्ट मेरे देश तुझको समर्पित

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