16 July, 2008

एक गीत और एक कहानी

Ajnabi Shahar.mp3




जिंदगी...अजनबी क्या तेरा नाम है?
अजीब है ये जिंदगी ये जिंदगी अजीब है
ये मिलती है बिछड़ती है बिछड़ के फ़िर से मिलती है...


एक वो शहर होता है जिसमें हम बसते हैं
और एक शहर होता है जो हमारे अन्दर बसता है

अपने शहर को छोड़ कर आने से वो शहर तो शायद हमें भूल जाता है
पर जाने कैसे हमारे अन्दर जो शहर है उसकी मिट्टी से सोंधी खुशबु आने लगती है, चाहे कहीं भी बारिशो में फँसें हो हम। जाने कैसे गीत गुनगुनाने लगता है वो शहर, दर्द के, टूटने के, बिखरने के, एक बार अलग होकर कभी न मिलने के। जाने कैसी हवाएं बहती हैं इस शहर में की हमेशा टीस ही लगती है और जाने कैसी मिट्टी है इस शहर की कि जिसमें यादों की बेल कभी सूखती नहीं। मुस्कुराहटों का अमलतास हमेशा खिला रहता है और गुलमोहर के पेड़ छाया देते रहते हैं।

शहर बदलना एक अजीब सा अहसास होता है, मुझे कभी रास नहीं आता, जो अपनेआप में अजीब है, क्योंकि मैं ठहरी भटकती आत्मा, पर जाने कैसे जहाँ रुक जाती हूँ जैसे पैरों से जड़ें उग आती हैं, और शहर छोड़ते हुए उन्हें काट के आना पड़ता है।

दिल्ली शायद हमेशा मेरे दिल के सबसे करीब रहेगा, इस शहर में मैंने बहुत कुछ खोया...कुछ पाया और कुछ पीछे छोड़ आई। इस पाने खोने के दरमियाँ मैंने जाने कब अपने आप को उस मिट्टी में रोप दिया, या जाने दफ़न हो गई, कुछ तो हुआ जिससे मैं वाकिफ नहीं, लगता है कहीं वही मैं भी रह गई हूँ।

शायद जिस लम्हा, माँ को खोया मैं भी कहीं घूमने निकल गई अपने शरीर से बाहर, अब भी हूँ तो सही, पर पहले जैसी नहीं। बदल गई हूँ और इस बदलाव को बर्दाश्त नहीं कर पा रही।

लिखना चाहती भी हूँ और नहीं भी, डर भी लगता है ऐसे ख़ुद को एक्स्पोज़ करने में, कई बार दुःख हुआ है इसके कारण. पर शायद लिखे बिना रह भी नहीं सकती।

जिंदगी में सिर्फ़ एक चीज़ से सबसे ज्यादा प्यार किया है...अपनी कविता से...शायद इसके बिना भी जीने की आदत डालनी पड़े।

कभी किसी को मुक्कमल जहाँ नहीं मिलता
कभी ज़मीं तो कभी आसमाँ नहीं मिलता


पर सोचती हूँ
मैंने कौन सा आसमाँ माँगा था

अलविदा दिल्ली...

बड़ी तेज़ी से भागता रहता है वो शहर मेरा
जाने कैसे मेरी यादों से छूटा ही नहीं

अब भी कुछ बदला नहीं आह मेरी दिल्ली में
उसे क्या फर्क हम रहे वहां या नहीं

पूछूंगी तो कह देगी की जाओ बंजारन
दो दिन को रुके और दिल्लगी की बातें
भटकने वालो का ऐसा दिल हुआ नहीं करता...बस जाओ कहीं

अब उम्र हो गई तुम्हारी भी...हमारी भी

11 July, 2008

कविता की मौत

मेरे अन्दर रहती थी एक कविता
मुझ जैसी थी
किसी अपने ने उसपर इल्जाम लगाया
बेवफाई का

वो कविता थी, सीता नहीं
कि अग्नि परीक्षा दे सकती

पन्ने तो जल जायेंगे ही आग में
चाहे उसपर जज्बात किसी के भी लिखे हों

इसलिए
कल रात
मेरे अन्दर की कविता ने
खुदखुशी कर ली

06 July, 2008

रिश्ता...

एक पल को तो लगा
तुम कहोगे
तुम मेरे साथ कुछ वक्त बिताना चाहते हो...

सिर्फ़ इस चाहने से ही
दर्द सा कुछ टीस उठा मेरे अन्दर

ऐसा क्यों होता है
कि सिर्फ़ मैं चाहती हूँ
गुज़रे दिनों जैसे कुछ लम्हे
अब भी...

रिश्तों के नाम बदलने के साथ ही
बदल जाते हैं हमारे तुम्हारे समीकरण भी

और हर गुजरते दिन के साथ
मैं और तनहा होती जाती हूँ

मुझे अच्छे लगते हैं वो दिन
जब हमारे रिश्ते का नाम नहीं था

क्योंकि तब बहुत कुछ चाहती नहीं थी तुमसे
अब चाहने लगी हूँ

तुमसे कुछ उम्मीदें जुड़ गई हैं
और इनका टूटना
मुझे तोड़ने लगता है

तुम तब कहीं ज्यादा अपने थे
जब तुम मेरे कोई नहीं थे

वो रिश्ता कहीं ज्यादा मजबूत था
जो बना ही नहीं था

अरसा पहले...

वो बातें और हुआ करती थी
वो ज़माने और हुआ करते थे

ठोकरों में रखते थे दुनिया को
वो हौसले और हुआ करते थे

हम ख़ुद ही अपने खुदा होते थे
वो ज़ज्बे और हुआ करते थे

रौंद देते थे हालातों की नागफनियाँ
वो काफिले और हुआ करते थे

जिनमें देने में खुशी मिलती थी
वो रिश्ते और हुआ करते थे

अब तो लगता है पुराने हो गए हम
वो नए और हुआ करते थे

30 June, 2008

फ़िर से एक सवाल

कुछ अनकहा रह गया था न
हम दोनों के बीच
खामोशी याद दिलाती है तुम्हारी...

वो अनकहा अहसास
जो महसूस करती हूँ आज भी
ठहरी हुयी हवा में...

वो अनकहा सच
जो तुम्हारी आँखें बोलती थीं
तनहाइयों के दरम्यान...

वो अनकहा झूठ
जो मैं हमेशा ख़ुद से कहती आई थी
हमेशा, अपने दिल से भी...

वो अनकहा दर्द
जो तुम्हारी मुस्कान में घुल गया था
जब तुमने मुझसे विदा ली थी...

बहुत अपनी सी लगती है तुम्हारी याद
तुम मेरे थे क्या?

27 June, 2008

एक नज़्म...

तू छिपा ले अपना दर्द मुस्कान के पीछे
पर मेरी आंखों में बादल बन बरसता तो है

तू चाहे तो कर मुझसे बेईन्तहा नफरत
यूँ ही सही तू मुझे सोचता तो है

मुझसे दूर जाने की खातिर ही घर बदला होगा तूने
पर गुजरता था जहाँ से तू वो रास्ता तो है

तू अपने आसमाँ को देखता है मैं अपने आसमाँ को देखती हूँ
पर जिस चाँद को तूने देखा वो कुछ मेरा भी तो है

अपने दोस्तों से तो तू लड़ नहीं सकता
मेरे बिना तेरा गुस्सा तनहा तो है

तुम्हारी जिंदगी की किताब में धुंधला सा ही सही
पर मेरी यादों का एक पन्ना तो है


२१/२/०१

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