05 September, 2015

फेयरवेल डियर फाबिया, यू वेयर द बेस्ट कार एवर



"दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं." पहली बार लोगों को दो खांचों में बाँटना शायद इसी डायलॉग से शुरू किया था. लोग जिन्हें बाइक चलानी पसंद है...और लोग जिन्हें कार चलानी पसंद है. ऐसा भी कोई हो सकता है जिसे ये दोनों पसंद हों...या जिसे ये दोनों नापसंद हों ये नहीं सोचते थे. अब लगता है कि ऐसे भी लोग हैं जो पैदल चलना चाहते हैं...या पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करते हैं...या साइकिल चलाते हैं. उन दिनों नहीं लगता था. राजदूत चलाने के बाद हम अपने आप को बहुत बड़े तुर्रम खां समझते थे.(बहुत हद तक अब भी समझते हैं). पटना में जब स्कूल आने जाने के लिए कुछ दोस्तों को स्कूटी मिली तो मम्मी बोली कि तुमको भी दिला देते हैं. हम जिद्दी...स्प्लेंडर दिला दो. स्कूटी नहीं चलाएंगे, लड़कियों की सवारी है. उन दिनों खुद को बेहतर जान भी तो रहे थे...लड़की होने का मतलब कमजोर होना...बाइक नहीं चलाना...सभ्य बनना...जबकि बाइक चलाना यानी आवारागर्दी करना...बिंदास होना...और जाने क्या क्या. तो इस चक्कर में स्कूल बस से ही स्कूल आते जाते रहे. बाइक के प्रति जितना प्यार था, कार के प्रति उतनी ही नाराज़गी भी थी. कार बोले तो डब्बा. छी. कौन चलाएगा. तुर्रा ये कि मैंने कार चलानी सीखी तक नहीं. के हम जिंदगी भर में कभी कार नहीं चलाएंगे. 

दिल्ली में अपनी दूसरी नौकरी में थी...२००७ में इन हैण्ड सत्ताईस हज़ार रुपये आते थे. होस्टल का किराया ढाई हज़ार था. मैं मारुती के शोरूम में जा कर अपने लिए वैगन आर देख आई थी. डाउनपेमेंट चालीस हज़ार रुपये और हर महीने कोई सात हज़ार की ईएमआई. शौक़ था कि अपनी खुद की नयी कार खरीद कर मम्मी को उसमें घुमाएंगे. शौक़ भी ऐसा कि कार सीखेंगे तो अपनी गाड़ी में ही...उधार की गाड़ी में नहीं. मगर कहीं बैठे किसी की नज़र लगनी थी. माँ के नहीं रहने के बाद न बाइक न कार का कोई शौक़ रहा. बैंगलोर आई तो जाने पहले के तेवर कहाँ गुम थे. अपने लिए काइनेटिक फ्लाईट खरीदी. के जिसमें जान बसने लगी. किसी को चलाने नहीं देती हूँ. सॉलिड पजेसिव. 

कुणाल बाइक के प्रति वैसे ही बेजार है जैसे मैं कार के प्रति. बैंगलोर के बारिश वाले मौसम में कार खरीदना जरूरी हो गया था. हमने सोचा कि वैगन आर लेंगे. के मैं चलाना सीखूंगी तो जाहिर है बहुत जगह ठोकुंगी ही गाड़ी को. अपनी पसंद की गाड़ी खोजते खोजते हम स्कोडा शोरूम में पहुंचे. वहां रेड कलर की फाबिया लगी हुयी थी. मालूम नहीं धूप का असर था कि क्या...हम दोनों को उससे पहली नज़र का प्यार हो गया. कुछ दिन तो बहुत चैन से कटे. मगर जब सासु माँ बैंगलोर आई तो हम दोनों कहीं भी जाने के लिए कुणाल पर डिपेंडेंट थे...कुणाल को ऑफिस में काम हुआ करता था बहुत बहुत सा. समझ आया कि बिना कार सीखे तो जिंदगी नहीं चलने वाली. मारुती ड्राइविंग स्कूल में कार सीखी. धीरे धीरे एक्सपर्ट हो गए. गाड़ी बहुत जगह ठुकी भी. हमने उन डेन्ट्स को वैसे ही रहने दिया. यहाँ कार अधिकतर मैंने ही चलायी. कुणाल हमेशा से उसे कहता भी पूजा की कार था. कार मेरे घर और मेरी तरह बेतरतीब रहती थी. रोड ट्रिप पर गए तो चिप्स के पैकेट, जूस के कार्टन, टोल की रसीदें...सब कार में. हम कितनी सारी लॉन्ग ड्राइव्स पर गए. 

ऑफिस की मीटिंग्स में मैं अपनी कार लेकर जाती थी. टाइटन की कितनी सारी मीटिंग्स में हम अपनी गाड़ी में गए थे...कि क्लाइंट सर्विसिंग वालों के साथ नहीं जायेंगे, वो कभी भी आपको डिच करके दूसरी मीटिंग के लिए चले जाते हैं. ऑफिस की आउटिंग में सब मेरी कार में क्यूंकि उस समय तक टीम में किसी के पास कार नहीं थी. देर रात की पार्टी के बाद लोगों को उनके घर छोड़ने जाना भी मेरा काम था. मैं हर पार्टी में designated ड्राईवर हुआ करती थी. सबने हमेशा कहा भी है कि लड़की होने के बावजूद मैं बहुत अच्छी गाड़ी चलाती हूँ. मुझे बैंगलोर की अधिकतर जगहों की कार पार्किंग पता थी. कुणाल से कहीं ज्यादा. मैं परफेक्ट पैरलल पार्क करती हूँ. इन फैक्ट कुणाल वैसी पार्किंग नहीं कर पाता जैसे कि मैं करती हूँ. एकदम स्मूथ. उसे आश्चर्य भी होता है.

हाँ लॉन्ग डिस्टेंस ड्राइविंग मैंने कभी नहीं की थी. हाइवे पर मुझे डर लगता था. हमारे रोड ट्रिप्स में सबसे ज्यादा साकिब और कभी कभी मोहित भी रहा है. बाकी की ड्राइविंग कुणाल की. मैं आगे की पैसेंजर सीट में गूगल मैप्स लिए सारथी का काम करती थी. जिन दिनों पेपर मैप्स हुआ करते थे, मेरे पास साउथ इंडिया का एक असल मैप था, जो कि हमेशा गाड़ी में पड़ा रहता था. इसी तरह बैंगलोर का एक मैप हमेशा गाड़ी में रहता था. मेरा स्पेस का सेन्स बहुत सही है...दिशायें...सड़कें...मुझे नींद में भी ध्यान रहता है कि हम किस दिशा में जा रहे हैं. पोंडिचेरी हम कितने बार गए. कूर्ग. महाबलीपुरम. चेन्नई. जाने कितने शहर. जाने कितनी रोड ट्रिप्स.

बैंगलोर एयरपोर्ट मेरे घर से पचास किलोमीटर दूर है. आउटर रिंग रोड के बाद हाईवे शुरू हो जाता है. उस रास्ते पर मैंने खूब कार चलाई है. लोगों को एअरपोर्ट रिसीव करना और ड्राप करना मेरा फेवरिट काम था. कुणाल कभी शहर से बाहर गया था तो रात के डेढ़ दो बजे सुनसान सड़कों पर अकेले गाड़ी चलाने में भी बहुत मज़ा आता था. फुल वोल्यूम में म्यूजिक लगा कर. उड़ाते जाते थे बस. मैं एसी ऑन नहीं कर सकती थी. एक तो पिक-अप ख़राब होता था, बाहर का साउंड फीडबैक नहीं मिलता था और मुझे सांस लेने में तकलीफ भी होती थी. लास्ट ट्रिप में हम कूर्ग जा रहे थे. मैंने पहली बार हाईवे पर कार चलाई. पूरे तीन सौ किलोमीटर खुद चला के ले गयी. बहुत अच्छा लगा. कुणाल भी बोला कि हम बहुत अच्छा चलाते हैं हाईवे पर भी. हम आगे की रोड ट्रिप्स प्लान कर रहे थे. कि कुणाल आराम से पीछे सोयेगा...हम गाड़ी चलाएंगे...कहाँ कहाँ जायेंगे वगैरह वगैरह. मैसूर भी जाना है इस बीच बहुत दिन हमको. तो हम पूरी तरह कॉंफिडेंट थे कि खुद से आयेंगे जायेंगे.

वापसी में हम ही चलाने वाले थे, लेकिन कुणाल का मन कर गया...वैसे भी ८ लेन हाइवे था...उसमें कार चलाने में बहुत मज़ा आता है. चार के आसपास का वक़्त था...भूख लगी थी. कुछ दूर पर कॉफ़ी डे था. हम जाने का सोच रहे थे. एक स्पीडब्रेकर था...कुणाल ने कार धीमी की और एकदम अचानक से पीछे किसी गाड़ी ने फुल स्पीड में गाड़ी ठोक दी हमारी. कमसे कम 140 पर चली रही होगी. वो शॉक इतना तेज़ था कि कुछ देर तो समझ ही नहीं आया कि हुआ क्या है. चूँकि सीट बेल्ट लगाए हुए थे तो कोई मेजर चोट नहीं आई. एक्सीडेंट इतनी जोर का था कि गाड़ी आगे चलाने लायक नहीं थी. हमने एक टो करने वाले को बुलाया और टैक्सी कर के बैंगलोर वापस आ गए. 

वापसी में हम ही चलाने वाले थे, लेकिन कुणाल का मन कर गया...वैसे भी ८ लेन हाइवे था...उसमें कार चलाने में बहुत मज़ा आता है. चार के आसपास का वक़्त था...भूख लगी थी. कुछ दूर पर कॉफ़ी डे था. हम जाने का सोच रहे थे. एक स्पीडब्रेकर था...कुणाल ने कार धीमी की और एकदम अचानक से पीछे किसी गाड़ी ने फुल स्पीड में गाड़ी ठोक दी हमारी. कमसे कम 140 पर चली रही होगी. वो शॉक इतना तेज़ था कि कुछ देर तो समझ ही नहीं आया कि हुआ क्या है. चूँकि सीट बेल्ट लगाए हुए थे तो कोई मेजर चोट नहीं आई. एक्सीडेंट इतनी जोर का था कि गाड़ी आगे चलाने लायक नहीं थी. हमने एक टो करने वाले को बुलाया और टैक्सी कर के बैंगलोर वापस आ गए. 

उस वक़्त ये कहाँ सोचे थे कि कार अब कभी वापस आएगी ही नहीं. वरना शायद एक नज़र प्यार से देख कर अलविदा तो कहती उससे. अचानक ही छिन गया हो कोई. मगर एक्सीडेंट इसे ही कहते हैं. इन्स्युरेंस वालों ने जब हमारी फाबिया को टोटल लॉस डिक्लेयर कर दिया तो रो दी मैं. कितना सारा कुछ था...हमने तो कितने लम्बे सफ़र के सपने देखे थे. पापा कहते हैं चीज़ों से इस तरह जुड़ाव नहीं होना चाहिए. दोस्त भी कहते हैं, 'इट वाज जस्ट अ कार'...और मैं...जो कि दिल टूटने पर सम्हाल ले जाती हूँ खुद को...अजीब से खालीपन से भरी हुयी हूँ पिछले कई दिनों से. बात मैं उन्हें कभी समझा नहीं सकती. मैंने फिर से किसी को टेकेन फॉर ग्रांटेड लिया था. कुणाल ने पूछा...तुम चलोगी...मगर मुझसे नहीं होता. मैं नहीं गयी. यहाँ हूँ. अनगिन तस्वीरों में घिरी हुयी. आज कार के पेपर्स साइन हो गए. किसी और के नाम हो गयी गाड़ी...अब शायद वे उसके स्पेयर पार्ट्स करके बेच देंगे...बॉडी कोई कबाड़ी उठा लिए जाएगा. 

बच जाती हूँ मैं. गहरी उदास. डियर फाबिया. आई एम सॉरी कि मैंने तुमसे कभी कहा नहीं.
आई लव यू. तुम मेरी पहली कार थी...और मेरा पहला पहला प्यार रहोगी.
हमेशा. हमेशा. हमेशा.

04 September, 2015

राइटर्स डायरी: मिडनाइट मैडनेस

जिन्हें आता है लिखना. और जो जानते हैं मेरा पता. जिन्होंने कभी मेरे शब्दों को पढ़ कर सोचा कि मैंने उनके मन की बात लिखी है. जिनके पास है कलमें. सस्तीं. महँगी. टूटी हुयी या कि साबुत. जिन्हें बचपन में माँ ने ऊँगली पकड़ के लिखना सिखाया हिंदी का ककहरा और जिन्होंने स्कूल में सीखी होगी अंग्रेजी. जो कि बात कर सकते हैं दो भाषाओं में या कि किसी एक में भी.

जिनका इतना बनता है हक कि मुझसे पूछ सकें...अपना पता दो, तुम्हें ख़त लिखना है. जिन्होंने कभी नहीं किया मुझसे प्यार. वे कि जो मेरे साथ घूम कर आये हैं दुनिया के बहुत से उदास शहर. जो कि मेरी सिसकी सुनते हैं जब मैं पोलैंड के यातना शिविर से लिखती हूँ शब्दों को अनवरत. 

जो कि रहते हैं मेरे शहर में. सांस लेते हैं इसी मौसम में कि जो सर्द हो कर भरता जाता है मेरे लंग्स में उदासियाँ. वो भी जिन्होंने चखी है ब्लैक कॉफ़ी शौक़ में मेरे साथ...और इस वाहियात आदत को भूल आये हैं किसी बिसरी हुयी गली.

जिनके पास जिद की है कभी कि लिखो कि तुम्हारे लिखने से ज़िंदा हो उठती हूँ मैं...तुम्हारे शब्दों से आती है संजीवनी की गंध. जिन्होंने भेजी है मेरे नाम किताबें बगैर चिट्ठियों के.

जो कि मुस्कुराते हैं जब मेरी उंगलियों से झरते हैं ठहाके और मेरी किताब में मिलते हैं उन्हें छुपाये हुए मोरपंख...चौक का चूरा और आधी खायी हुयी पेंसिलें. वे जिन्हें मालूम है मेरी पसंद की फिल्में...मेरे पसंद का संगीत...और मेरे पसंद के लोग. कि जो जानते हैं कि डाइनिंग टेबल पर रखे पौधे का इक नाम है. और कि बोगनविला में पानी देते हुए मैं कौन सा गीत गुनगुनाती हूँ. 

मेरी आँखों का रंग. मेरी आवाज़ का डेसीबेल. मेरी चुप्पी की चाबी. मेरी पसंदीदा कलर की शर्ट और मेरे फेवरिट झुमके. 

अगर कभी मैंने वाकई जान दे दी तो तुम क्या कह कर खुद को समझाओगे?
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सोचती है लड़की और फिर मुल्तवी करती है डायरी लिखना. पूछती है खुद से कि इतनी तकलीफ क्यों होती है उसे छोटी छोटी बातों पर. दोस्तों से बात करना पसंद क्यों नहीं है उसे. और ये भी पूछना चाहती है खुद से कि उसने हरी स्याही से लिखना क्यूँ शुरू किया है. उसे मालूम है इस रंग का जहर जिंदगी को सियाह करता जाता है.

उसकी पसंद के सारे आर्टिस्ट्स जल्द रुखसत हो गए हैं दुनिया से. उसे उनसे मिलने का मन करता है. दोस्तियाँ. विस्कियाँ. सिगरेटें. सारी बुरी आदतें छोड़ देना चाहती है वो. पढ़ती है नीत्ज़े को. "Be careful, lest in casting out your demon you exorcise the best thing in you." इक अँधेरी कालकोठरी में धकेल देती है पिंजरा. उसकी परछाई कैद थी उसमें. मोहल्ले की आंटियों का दिया हुआ 'बुरी लड़की' का तमगा. कॉलेज में साथियों के लिखे नोट्स...'यू आर वेरी डोमिनेटिंग', सर के साथ की गयी जिद...मुझे नहीं करना किसी के साथ कोई ग्रुप प्रोजेक्ट. मैं अकेले कर लूंगी. पिछले कई सालों के मेंटल सुसाइड लेटर्स. सोचना कि किसी का नाम भी लिखना है आखिरी ख़त में या नहीं.

फेसबुक आप्शन देता है कि आप किसी को नोमिनेट कर दें कि आपकी मृत्यु के बाद वो आपके अकाउंट को हैंडल कर सके. फेसबुक की पहुँच को देखते हुए लगता है कि वो मीडियम्स से जल्दी ही कोई कॉन्ट्रैक्ट कर लेंगे. मरने के बाद भी आप इन सर्टिफाइड मीडियम्स के थ्रू अपने फेसबुक फ्रेंड्स से कांटेक्ट में रहेंगे. जहन्नुम या स्वर्ग, जहाँ भी आप गए वहाँ से पोस्ट्स भेज सकेंगे. मैं बस यही सोच कर परेशान होती हूँ कि स्वर्ग में हमेशा अप्सराएं नाच रही होती हैं...मेरे देखने को वहाँ क्या है? जिंदगी तो जिंदगी, मरने के बाद भी भेदभाव होगा...आपने कभी किसी पुरुष अप्सरा के बारे में सुना है? हाँ एक आध गन्धर्व होंगे, मगर कोई रम्भा, मेनका, उर्वशी टाइप फेमस हो, ऐसा भी नहीं है. क्या मुसीबत है. इससे अच्छा तो जी ही लें. या फिर जो सबसे खूबसूरत और सही ऑप्शन है...जहन्नुम के दरवाजे खुले ही हैं हमारे लिए. यूँ भी इतने काण्ड मचा डाले हैं...बहुत हुआ तो एक आध पैरवी लगेगी और क्या. 

मेरे पागलपन का लिखने के अलावा कोई इलाज़ भी नहीं है. ब्लॉग पर पिछले दस साल से लिखते हुए ऐसी आदत लग गयी है कि कहीं और लिखने का मन भी नहीं करता. कुछ दिन ऐसे ही मौसम चलेंगे इधर. मूड के हिसाब से. आपको अच्छी चीज़ें पढ़ने का शौक़ है तो किताबें पढ़ा कीजिए. मैंने इधर हाल में हरुकी मुराकामी की नॉर्वेजियन वुड और काशी का अस्सी पढ़ी हैं. मुराकामी मेरे पसंदीदा लेखक हैं...ये किताब शायद बहुत दिनों तक मेरी फेवरिट रहेगी. काशी का अस्सी उतनी अच्छी नहीं लगी...बीच में बोरियत भी हुयी...पर कुछ टुकड़ों में अच्छी किताब है. मैंने फिल्म मोहल्ला अस्सी का ट्रेलर देखा था और सोच रही थी कि किताब ऐसी ही है या डायरेक्टर ने सिनेमेटिक लिबर्टीज ली हैं. फिल्म देखे बिना ठीक ठीक कहना मुश्किल है.

मेरा हाथ इक्कीस जुलाई को टूटा था. पिछले कुछ दिनों में बहुत सी फिल्में देखीं. किताबें पढ़ीं. सोचा बहुत कुछ. दिन दिन भर इंस्ट्रुमेंटल म्यूजिक सुना. कल से एक्सरसाइज करना है. धीरे धीरे हाथ में भी मूवमेंट आ जायेगी. बाइक चलाने में जाने कितने दिन लगेंगे. कार एक्सीडेंट के बाद टोटल लॉस डिक्लेयर कर दी गयी है. लौट कर घर नहीं आएगी. अब कोई नयी कार खरीदनी होगी. उदास हूँ. बहुत ज्यादा. पापा कहते हैं चीज़ों से इतना जुड़ाव नहीं होना चाहिए. मैं सोचती हूँ. लोगों से जुड़ाव कोई कम तकलीफ देता हो ऐसा भी तो नहीं है.

अब कुछ दिन एकतरफा बातें होंगी. बातों का मीडियम तलाश रही हूँ. ब्लॉग. पोडकास्ट. डायरी. कुछ ऐसा ही. पिछले दस सालों में जिन लोगों के साथ ब्लॉग्गिंग शुरू की थी, उनमें से बहुत कम लोग आज भी लिखते हैं. रेगुलर तो कोई भी नहीं लिखता. पहले ब्लॉग और उसपर कमेंट्स की कड़ी हुआ करती थी. वो दिन लौट कर तो क्या ही आयेंगे अब. स्पैम के कमेंट्स के कारण मैंने मोडरेशन लगा दिया है ब्लॉग पर. फिर भी कभी कभी दिल करता है कि कुछ न सुनूं...जैसे कि आज. अभी.

बहरहाल...
थे बहुत बेदर्द लम्हें ख़त्म-ए-दर्द-ए-इश्क़ के
थीं बहुत बेमहर सुबहें मेहरबाँ रातों के बाद

उन से जो कहने गये थे "फ़ैज़" जाँ सदक़ा किये
अनकही ही रह गई वो बत सब बातों के बाद

03 September, 2015

इकतरफे ख़त और इकतरफे इश्क़ में कितना अंतर होता है?

भरी दोपहर का दुःख, दुःख नहीं अवसाद की गीली परछाई है. सूरज को रोके गए बादल से लड़ झगड़ कर आती कुचली हुयी धूप है...पड़ोसी की घर की छत पर भटकता कोई बौराया बच्चा है...भरी दोपहर का दुःख बचपन में काटी पतंग है...बिजली के तारों में उलझी हुयी.

भरी दोपहर का दुःख दिल में उगता शीशम का पेड़ नहीं, दीवारों पर लगी गहरी हरी काई है. पसंदीदा कलम से लिखते हुए देखना है कि स्याही का रंग फिरोजी से बदल कर गहरा हरा हुआ जा रहा है. किसी की सफ़ेद उँगलियों में पहनी हुयी फिरोज़े की अंगूठी है. परायेपन को बसने देना है अपने दिल के भीतर...गहरी काई लगी दीवारों के सींखचों में फिसलते हुए तोड़ लेना है हाथ की हड्डी और देखना है खरोंचों को अपनी बाइक की बॉडी पर. 

टचस्क्रीन फोन बन जाता है इक ग्लास की पेट्रिडिश जिसमें सतह तक कंसन्ट्रेटेड सल्फ्युरिक एसिड भरा हुआ है. मैं कैसे डायल करूँ कोई सा भी नंबर. तुम्हारी आवाज़ से रिश्ता बुनने के पहले बनाना होगा अपनी उँगलियों को कांच का...खुली खिड़की से दिखता है आसमान...रिफ्लेक्ट होता है तो हार्मलेस दिखता है, तुम्हारी तरह...तुम्हें मालूम है कंसन्ट्रेटेड सल्फ्युरिक एसिड कितना गाढ़ा होता है? मैंने छुआ है स्क्रीन को...धीमे धीमे मैं पूरी घुल गयी हूँ...सिर्फ प्लेटिनम की अंगूठी रह गयी है...प्लैटिनम इज रेसिस्टेंट टू एसिड. इतना तो तुमने पढ़ा होगा. हाँ याद तुम्हें है या नहीं मालूम नहीं. प्लैटिनम. या कि मैं ही.

खानाबदोशी चुनने वाले भी उदास हो सकते हैं. उनके पास कोई पता नहीं होता जहाँ लिखे जा सकें ख़त और उन्हें बुला लिया जा सके वापस...किसी ऐसी ज़मीन पर जिस पर घर बनाया जा सकता हो. जिन्हें लौट कर कहीं जाना नहीं होता है वे ही किसी गुफा में गहरे उतरते जा सकते हैं...किसी दूसरे मुहाने की खोज में...उन्हें डर नहीं होता कि अगर दूसरा मुहाना न हुआ तो? मगर क्या वाकई? Aren't we all waiting to be rescued? कोई हमें यहाँ से लौटा ले जाए...जबरन...फिर हम ज़िन्दगी भर खुद को बचा लिए जाने का मातम मनाते रहें. 

नहीं लिखना जिद है. खुद को मार डालने की साजिश है. धीमा जहर है. नहीं लिखना डिनायल का आखिरी छोर है. दुनिया को नकार देने का पहला पॉइंट है. क्यूंकि लिखना हमें बचा ले जाता है...मौत से एक सांस की दूरी से भी.

मैं कब्रिस्तान गयी थी. अकेले. बस बताना चाहती थी तुम्हें. 

मुझे खतों के जवाब लिखने नहीं आते. क्यूंकि कभी किसी ने मुझे ख़त लिखे ही नहीं. कभी भी नहीं. मुझे याद नहीं कि मैंने कभी भी भूरे लिफ़ाफ़े में ख़त भेजें हों. तुम्हें याद हो तो बताना. इकतरफे ख़त और इकतरफे इश्क़ में कितना अंतर होता है? 

हम दोनों के बीच इक इंस्ट्रुमेंटल पीस था. रात के क़त्ल की तैय्यारी में वायलिन की स्ट्रिंग्स कसता हुआ. मैं इक मासूम सी शाम इस टुकड़े को सुन रही थी...बेख्याली में. ड्रम बीट्स का प्रील्यूड 'इन द मूड फॉर लव' का था...दो बीट्स सुन कर ही आँखों में वो अँधेरी सुरंग जैसी सीढ़ियाँ कौंध गयी थीं...लैम्प की रोशनी पर सिगरेट के धुएं के घने बादल और तुम्हारी उँगलियों की याद एक साथ आई थी...बीट्स के ठीक बाद वायलिन शुरू होता था...इस टुकड़े में भी हुआ...मगर ये वो धुन नहीं थी जिसने कई रातों में मेरा क़त्ल किया था...ये कोई दूसरी धुन थी...वायलिन था...मगर धुन दूसरी थी. इसे सुनना इक लॉन्ग शॉट में महबूब को देखना था...और क्लोज अप आते ही वो मेरे पास आने की जगह दायीं ओर मुड़ गया. ये टुकड़ा बेवफाई के स्वाद जैसा था. ड्रम बीट्स सेम मगर वायलिन ठीक वहीं से कोई और राह चली जाती थी. ये चोट बहुत गहरी थी. तीखी. और बेरहम. पहली धुन के क़त्ल का अंदाज़ बहुत नरमाहट लिए हुए था. नींद की गोलियां खा के मरने जैसा. यह दुनाली की गोली की तरह थी...सीने में धांय. बहुत बहुत तेज़ आवाज़. क्या तुम महसूस पा रहे हो कि मुझे कैसा लगा था?

मेरी कहानियों के शहर में सितम के मौसम आये हैं...सितम-बर...तुम्हारी ही तरह हैं कुछ कुछ. लिली की पहली पंखुड़ी चिटक रही है. जल्द ही खुशबुओं से सारा शहर भर जाएगा. मैं चाहे जिस भी स्याही से लिखूँ मुझे धूप बुनना नहीं आता. भरी दोपहर का दुःख इक सिगरेट की तलब है जिसके तीन कश मार कर मैं तुम्हारी ओर बढ़ा सकूं. तुम्हारी उँगलियों में उलझ जाए मेरी कलम. कोई बादल हटे और मैं देखूँ फिरोजी धूप में तुम्हारी आँखों का रंग. हिज्र. कुफ्र. मौत. 

Abel Korzeniowski- Satin Birds- 01:48

01 September, 2015

द ड्रीम व्हिस्परर


वो सपनों में भी चैन से नहीं रहने देता मुझे. ये पूरी दुनिया इक बड़ा सा डाकखाना हो जाती और मुझे हर ओर से उसके ख़त मिलते. शाम के रंग में. सुबह की धूप में. किसी अजनबी की आँखों के रंग में. सब फुसफुसाते मेरे कानों में...हौले से...उसे तुम्हारी याद आ रही है. 

याद का तिलिस्म उसकी स्पेशियलिटी था. उसे वर्तमान में होना नहीं आता था. मगर चंद लम्हों से वो कमाल का याद का तिलिस्म बुनता था. उस तिलिस्म में सब कुछ मायावी होता था. मैंने उसे कभी छुआ नहीं था मगर याद के तिलिस्म में उसकी उँगलियों की महक वाले फूल खिला करते थे...उसकी छुअन वाली तितलियाँ होती थीं...मैं जब कहानियां लिखती तो वे तितलियाँ मेरी कलम पर हौले से बैठ जातीं...उनके पैरों से पराग गिरता और मेरी कहानी में गहरे नीले रंग की रेत भर जाती. कोई बंजारन गाती उसकी लिखी कवितायें और मेरी कहानी के किरदार किसी रेत के धोरे पर बैठ कर चाँद के स्वाद वाली विस्की पिया करते...बर्फ की जगह हर्फ़ होते...उसकी अनदेखी नज़र से ठंढे...उसके बिछोह से उदास.

उससे मिलने वाली शामों में सूरज नारंगी रंग का हुआ करता था. शहर के बीचो बीच इक गोल्ड स्पॉट का ठेला था. हिचकियों में नारंगी रंग घुलता था. याद में नारंगी का खटमिट्ठा स्वाद. लड़की कभी नागपुर नहीं गयी थी लेकिन उसे नागपुर की सड़कों के नाम पता थे. उसे ये भी पता था कि गोल्डस्पॉट की फैक्ट्री के सामने वाली चाय की दूकान पर शर्ट के हत्थे मोड़े जो शख्स चाय में बिस्कुट डुबा कर खा रहा है उसका खानाबदोश काफिले से कोई रिश्ता नहीं है. वो तो ये भी नहीं जानती थी कि जब गोल्डस्पॉट में सब कुछ आर्टिफिसियल होता है तो उसकी फैक्ट्री नागपुर में क्यों है. किसी ड्रिंक में ओरेंज का स्वाद उसे अलविदा की याद दिलाता था. जबकि वो उससे कभी मिली नहीं थी. याद का तिलिस्म ऐसा ही था. उसमें कुछ सच नहीं होता. मगर सब यूँ उलझता जाता कि लड़की को समझ नहीं आता कि उसके कस्बे की सीमारेखा कहाँ है. लड़की सिर्फ इतना चाहती कि कभी उस ठेले पर लड़के के साथ जाए. दोनों पैसे जोड़ कर इक बोतल गोल्ड स्पॉट की खरीदें...लड़का पहले आधी बोतल पिए और लड़की जिद करके सिर्फ एक घूँट पर अपना हक मांगे. आखिरी सिप मेरे लिए रहने देना. बस. मगर फिर लड़की को ओरेंज कलर की लिपस्टिक पसंद आने लगती हमेशा. उसके गोरे चेहरे पर नारंगी होठ चमकते. शोहदों का उसे चूम लेने को जी चाहता. मगर उसके होठ जहरीले थे. जिसने भी उसके होठों को ऊँगली से भी छुआ, उन उँगलियों में फिर कभी शब्द नहीं उगे. जिन्होंने उसके होठ चूमे वे ताउम्र गूंगे हो गए. कोई नहीं जानता उस लड़की के होठों का स्वाद कैसा था.

याद के तिलिस्म में इक भूलने की नदी थी...जिसने भी इस नदी का पानी पिया था उसे ताउम्र इश्क़ से इम्युनिटी मिल जाती थी. उसका दिल फिर कभी किसी के बिछोह में दुखता नहीं था. ये मौसमी बरसाती नदी थी. अक्सर सूखी रहती. लड़की की आँखों की तरह. चारों तरफ रेत ही रेत होती. नीली रेत. इस नदी की तलाश में कोई तब ही जाता जब कि इश्क़ में दिल यूँ टूट चुका होता कि जिंदगी के पाँव में कदम कदम पर चुभता. बारिश इस तिलिस्म में साल में इक बार ही होती. कि जब लड़की दिल्ली जाती. उन दिनों में नदी में ठाठें मारता पानी हुआ करता. मगर जब लड़की दिल्ली में होती तो कोई भी इस नदी का पानी पीना नहीं चाहता. सब लड़की के इर्द गिर्द रहना चाहते. वो गुनगुनाती जाती और नदी में पानी भरता जाता...उस वक़्त याद के तिलिस्म की जरूरत नहीं होती. लड़की खुद तिलिस्म होती.

मगर न दिल्ली हमेशा के लिए होता न नदी का पानी...और न लड़की ही. दिल्ली से लौटने के बाद लड़की की उँगलियाँ दुखतीं और वो हज़ारों शहर भटकती मगर याद का तिलिस्म उसका पीछा नहीं छोड़ता. उसे दूर देशों में भी चिट्ठियां मिल जातीं. अजनबी लोग कि जिन्हें हिंदी समझ में नहीं आती थी उसकी किताब लिए घूमते और लड़की से इसरार करते के उसे एक कविता का मतलब समझा दे कम से कम. किताब का रंग लड़की की आँखों जैसा होता. किताब से लड़की के गीले बालों की महक आती...शैम्पू...बोगनविला...बारिश...और तूफानों की मिलीजुली. लड़की किसी स्क्वायर में लोगों को सुनाती कहानियां और वे सब याद के तिलिस्म में रास्ता भूल जाते. उस शहर के आशिकों की कब्रगाह में मीठे पानी का झरना होता. लड़की उस झरने के किनारे बैठ कर दोस्तों को पोस्टकार्ड लिखती. उसे लगता अगर दोस्तों तक ख़त सही सलामत पहुँच गए तो वे उसे तलाशने पहुँच जायेंगे और इस शहर से वापस ले जायेंगे. 

लड़की नहीं जानती थी कि याद के तिलिस्म से दोस्तों को भी डर लगता है. वे उसके पोस्टकार्ड किसी जंग लगे पोस्टबॉक्स में छोड़ देते के जिसकी चाभी कहीं गुम हुयी होती. कुछ भी हमेशा के लिए नहीं रहता. लड़की की कलम में ख़त्म हो जाती फिरोजी स्याही तो वो बंद देती लिखना पोस्टकार्ड. एक एक करके सारे भटके हुए लोगों को उस तिलिस्म के दरवाज़े तक पहुंचा आती. फिर हौले से बंद करती तिलिस्म का दरवाज़ा. 

उसके जवाबी ख़त उसे मिलते...एक एक करके. कब्र के पत्थरों पर लिखी इबारतों में. साइक्लोन की प्रेडिक्शन में. अचानक आ जाते भूकंप में. अचानक से छोटी हो गयी हार्ट लाइन में. आखिर में लड़की अपनी जिद छोड़ कर मैथ के इक्वेशन लिखना शुरू करती. दुनिया में होती हर चीज़ इक ख़त हुआ करती. महबूब का. आख़िरकार उसकी चिट्ठियों के जवाब आये थे. याद का तिलिस्म इक वन वे टिकट था. जहन्नुम एक्सप्रेस में एक ही सीट बची थी. लड़की ने ठीक से गिनीं नींद की गोलियां. नारंगी रंग की गोल्ड स्पॉट में उन्हें घोल रही थी तो उसने देखा कमरा तितलियों से भर गया है. देर हो रही थी. तितिलियाँ उसे उठा कर उड़ चलीं. खिड़की से पीछे छूटते नज़ारे हज़ार रंग के थे. दोस्तों की आँखों का रंग धुंधला रहा था. टीटी ने टिकट मांगी...लड़की ने अपनी उलझी हुयी हार्ट लाइन दिखाई. टीटी ने उसका ख़त रखा हाथ पर. कागज़ के पुर्जे पर गहरी हरी स्याही में लिखा था...'जानां, वेलकम होम'.

20 August, 2015

उसकी आँखों की पगडंडियाँ दिल में नहीं जहन्नुम में खुलती थीं

'तुम्हें जिरहबख्तर उतारना आता है?' लड़की ने पूछा था. 
लड़का हँसा था, 'सिल्क, सैटिन और लेस के ज़माने में जिरहबख्तर कौन पहनता है?'.
उसकी हँसी पर तीखा घाव लगा था...लड़की के ऑफ शोल्डर ड्रेस की महीन किनारी में तलवार की धार सा तेज स्टील का धागा बुना हुआ था. उसका जिस्म महीन, धारदार जालियों में बंधा हुआ था. उसकी कमर पर हाथ रखते हुए हथेलियों में बारीक धारियां बनती गयीं थीं...उसकी उम्र की रेखा को कई जगह से काटती हुयीं. 

शायद अँधेरा था. लड़के ने गौर से नहीं देखा होगा. लड़की की आँखों में कंटीले तारों की सीमारेखा बंधी हुयी थी. जिसके पार नो-मैन्स-लैंड था. उसने सिर्फ उस ज़मीन पर खिलते हुए गुलाबी फूल देखे थे...घास के कालीन की हरी मुलायमत देखी थी. बारूद के बिखरे रूपहले कणों पर उसका ध्यान नहीं गया था. ये विवादित क्षेत्र था. मौत अपने शिकार की तलाश में तितलियों की शक्ल में भटका करती थी. किसी की गंध तलाशती हुयी.

उसकी आँखों की पगडंडियाँ दिल में नहीं जहन्नुम में खुलती थीं...
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अँधेरा एक खूबसूरत चित्रकार है. रात घिरते कई तसवीरें बनाया करता. लड़की जिसकी आँखों में देख लेती, उसकी रूह कैद कर लेती. शाम घिरते वो बालकनी में बुलबुले उड़ाया करती. उसकी पलकें झपकतीं तो रूहें उन काले रंग के बुलबुलों में कैद हो जाया करतीं. लम्हा लम्हा बुलबुले फूट जाते और रात की काली नदी में शहर डूब जाता. रूहें कई बार रास्ता भटक जातीं और सियाही की बोतल में रहने लगतीं. लड़का ऐसी ही किसी सियाही से लिख रहा था...लिखते लिखते उसके हाथों से उस लड़की की तस्वीर बन गयी. वो देर रात तक पियानो बजाती रही थी. जब तक कि सारे काले कीय्स उसकी उँगलियों में न चुभ गए. तस्वीर में गिरने लगे पियानो के काले बटन...ग्लास में रखी काली ऐब्सिंथ...और लड़के के गहरे राज़. 

लड़के ने अपनी कलाई काट कर जान देने की कोशिश की. उसकी कलाई से इतना कोलतार बहा कि उसके घर से महबूबा के घर तक की कच्ची पगडंडी रात भर में पक्की सड़क में तब्दील हो गयी. सुबह उसे कब्रगाह ले जाने वालों का काफ़िला अचानक लड़की के घर की तरफ मुड़ गया वर्ना उसे बहुत दिनों तक मालूम नहीं चलता कि उसकी खिड़की पर काले गुलाब रखने किसने बंद कर दिए हैं.
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उसने आखिरी सिगरेट बचा बचा कर पी. तीन कश मार कर बुझा देती. सोचती कि इसी तरह कुछ देर रोक लेगी अलविदा का ये बिटर हैंगोवर. हर बार जब उसने अपने बदन पर रगड़ कर सिगरेट बुझाई तो बैंगलोर की सारी बारिशें उस जगह की जलन को कम करने को दौड़ पड़ीं. 
लड़की को दर्द की आदत लग चुकी थी. इश्क़ से भी बुरी आदत.
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जाते हुए उसने मेरी खारी आँखें चूमीं.
'तुम्हें ब्लैक कॉफ़ी पीने की आदत छोड़नी नहीं चाहिए थी, तुम में मुझे सिर्फ वही एक चीज़ अच्छी लगती थी'.
'मेरा ब्लैक कॉफ़ी पीना?'
'नहीं. आफ्टरटेस्ट'
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घर में न सिगरेट है, न विस्की है, न तुम हो. हम तलब से मर क्यूं नहीं जाते? 

15 August, 2015

इश्क़ की दस्तक में बारूद की गंध घुली थी. बारूद का ख़तरा भी.

लड़का चाँद की रौशनी वाली टॉर्च बनाना चाहता. लड़की उसकी आँखों की रंग वाली कैंडिल. 
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वे बंद पड़े पोस्ट ऑफिसों में सेंधमारी कर कर पढ़ते खुशबूदार लिफाफों वाली चिट्ठियां. वे इत्रदानों में घोलते सियाही और लड़का दवातों में टपका देने को ही होता बारिश की गंध का इत्र कि जो लड़की ख़ास कन्नौज से लायी होती...तभी लड़की उसकी कलाइयाँ पकड़ लेती हंसती हुयी...के उसके साथ होती तो लड़की को हँसने में डर नहीं लगता...वो मूसलाधार बारिशों सी भिगोने वाली हँसी हँसती थी. कलमें ठीक से नहीं चलेंगी...तुम्हें मालूम है न इत्र की कैफियत पानी से अलग होती है...अक्षर ठीक नहीं लिखे जायेंगे...मान लो उसे ख़त लिखने चली और नाम के बाकी अक्षर गायब हो गए तो. खुशबू ज्यादा जरूरी या के ख़त. लड़के कहता एकदम घिसा पिटा डायलौग, मुहब्बत और जंग में सब जायज़ है.
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इश्क़ की दस्तक में बारूद की गंध घुली थी. बारूद का ख़तरा भी.
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फिरोजी रंग की आँखें तलाशते लड़के को लेकिन सिर्फ सुबह का इंतज़ार है. लड़की की आँखें रात रंग की थी. लड़के की हँसी कोहरे की पदचाप जैसी. लड़की उसकी उँगलियों को याद किताबों के पेज नंबर मिटा कर अपना फोन नंबर लिखना चाहती. रबड़ से जरा सा भी रगड़ने की कोशिश करने पर लड़के की रेशमी उँगलियाँ उसके हाथों से फिसल जातीं. लड़के की त्वचा को बारीक मलमल तैयार करने वाले किसी बुनकर ने बुना था. उसके हाथों में यूँ तो कोई भी चीज़ खूबसूरत लगती मगर जो सबसे खूबसूरत होता वो उस लड़की का हाथ होता. लड़की कभी उसका हाथ नहीं पकड़ सकती क्यूंकि उसके हाथ हमेशा फिसल जाते. लड़का ही इसलिए लड़की का हाथ अपने हाथ में लिए चलता. लड़के की उँगलियों को दुनिया की सारी लाइब्रेजीज में रखी सारी किताबों के पेज नंबर याद थे. लड़के के लिए अलग अलग शहरों से बुलावा आता. कभी कभी कोई पुरानी पाण्डुलिपि खो गयी होती तो लड़के की उँगलियों से उसका पता तलाश लिया जाता. लड़की को इस सब से बहुत कोफ़्त होने लगी थी. उसे लगता था कि वे हाथ सिर्फ उसके लिए बने हैं. वह उसकी उँगलियों पर अपने नाम का गोदना गुदवा देना चाहती.
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वे सुकून बेचने आये गाँव के भोले भाले किसान से मोलभाव करते और आखिर आधे रूमाल भर सुकून खरीद पाते. उस आधे रूमाल का आधा आधा टुकड़ा दोनों बाँटना चाहते लेकिन रुमाल के बराबर हिस्से नहीं हो पाते. लड़का सुकून का बड़ा हिस्सा लड़की को देना चाहता लेकिन लड़की सुकून का छोटा हिस्सा लेना चाहती. दोनों बहुत देर तक भी एकमत नहीं हो पाते तो फिर झख मार कर सुकून बेचने वाले के पास फिर जाते. वो इनकी झिकझिक से इतना घबराया हुआ होता कि इन्हें देखते ही अपना माल असबाब लेकर कहीं भाग जाना चाहता. जब तक दोनों उसके पास पहुँचते, दोनों की साँस फूली हुयी होती. लड़की अपना पसंदीदा कंगन उसे देती और लड़का अपनी पसंदीदा घड़ी. इतने में एक चादर सुकून की आ जाती. दोस्त बाद में उनपर हँसते कि गाँव वाले ने अपना बदला ले लिया है. ये सुकून की चादर नहीं. कफ़न है. इसे ओढ़ कर सुकून सिर्फ मरने के बाद ही आएगा. लड़की मगर उस चादर पर काढ़ देती अपने पुराने प्रेमियों के नाम और लड़का उसपर परमानेंट मार्कर से लिख आता उन सारे शहरों का नाम जिनमें उसे इश्क़ हुआ था. दोनों एक दूसरे से वायदा करते कि वे एक साथ ही मरेंगे ताकि बिना किसी बेईमानी के...इसी सुकून के कफ़न में दोनों को एक साथ जलाया जा सके.
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लड़की उसके लिए कोई नया मौसम तलाशना चाहती और मौसम को पुकारती 'गुदगुदी'. वो जब भी उसके साथ होती तो इसी मौसम की सिफारिश करती. वे अपने साथ नन्ही शीशियाँ लिए घूमते थे. इन शीशियों में मौसमों का इत्र होता था.
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उसे इबारतों में यकीन नहीं था. इशारों में था. चुप्पियों में था.

यूँ भी वो सिर्फ चुप्पियों वाले जवाब मांगती थी. जब आँखों से पूछती थी लड़के से कि शाम का रंग कैसा है तो लड़का कुछ नहीं कहता. धूप से भीगे भीगे कमरे में फिरोजी आँखों वाली लड़की की पेंटिंग बनाता रहता.
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लड़की अपनी स्किन को रफ कॉपी की तरह इस्तेमाल करती. किसी का नाम. कोई भूली ग़ज़ल का मिसरा. पसंदीदा फिल्मों के कोट्स...सब लिखती रहती. इक दिन ऐसी ही बेख्याली में लिख दिया...Love is all a matter of time...इश्क़ को सिर्फ मोहलत चाहिए होती है...बहुत बाद में उसका ध्यान गया कि ये गलत लिख दिया है उसने...मगर फिर शायद जिंदगी के इस मोड़ पर उसे इसी फलसफे को सुनने की जरूरत थी. यूँ भी जिंदगी में अकस्मात् तो कुछ नहीं होता. इक वक़्त के बाद सब कुछ इश्क़ ही हो जाता है. महबूब भी. रकीब भी.
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अपनी कल्पनाओं के अँधेरे में लड़की उसकी गंध में भीगती. रूह तक. घर के सबसे ऊंचे ताखे पर रखती शिकायतों की गुल्लक, उससे मांगी गयी पेंसिलें और फिरोजी रंग के कॉन्टैक्ट लेन्सेस.
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मगर सच सिर्फ ये होता कि ये दुनिया अगर इश्वर की जगह उस लड़की ने बनायी होती तो भी सब कुछ ऐसा ही होता जैसा कि अभी है.
अबोला. अनछुआ. अनजिया.

19 July, 2015

जिंदगी ख़त्म हो जाती है. पूरी नहीं होती. अधूरी ही रहती है हमेशा.

लड़की बैठी है भगवान के पास. सर झुकाए. 'यू नो, यू आर सो ब्लडी यूजलेस, आई डोंट लाइक यू एनीमोर, तुम मेरी जिंदगी से चले क्यूँ नहीं जाते?' भगवान ही शायद इक ऐसा है जो लड़की से ज्यादा जिद्दी है.

तुम उसका नाम भूल गयी हो न. बस इक रंग रह गया है वो तुम्हारी आँखों में. हरा. दुनिया के सारे हरे रंग के शेड्स हैं उसके. सारे. सब समंदर. सारे पौधे. सब. आसमान भी कभी कभी ले आता है कोई रंग का हरा.

सुनो. मेरा क़त्ल कर सकोगे? बहुत हिम्मत की बात करते हो. मेरे दोस्तों में ऐसा कोई नहीं है जिसके हाथ न कांपें. मगर मुझे तुमसे बहुत उम्मीद है. तुम क्या सोचते हो यूथेनेसिया के बारे में? किसी की तकलीफ से किसी को मुक्त कर देना तो सही है न? फिर कहाँ है पैमाना कि शारीरिक दर्द बर्दाश्त न करने पर ऐसा करना चाहिए. ये जो मेंटल पेन है. व्हाट मेक्स इट लेस रियल? मेरी तकलीफ का कोई इलाज भी नहीं है. हाँ मुझे खुद में सुधार करने चाहिए. मुझे योग करना चाहिए. मुझे खुद को काम में बहुत व्यस्त रखना चाहिए. मगर नहीं होता दोस्त. एकदम नहीं होता. तकलीफ इतनी है कि कोई ट्रांक्विलाईजर काम नहीं करता. सुनो. तुम्हें रिवोल्वर चलाना आता है? अच्छा देसी कट्टा? हाँ. मैं इंतज़ाम कर दूँगी. तुम चिंता न करो. मेरे बहुत कॉन्टेक्ट्स हैं. तुम बस वादा करो कि तुम्हारे हाथ नहीं काँपेंगे. बस. 

मालूम. तुमसे बहुत सी बातें करनी थीं. मौत की. जिंदगी की. पहाड़ों की. जिस दिन मेरा व्हीली सीखने का मन किया तुमसे उस दिन बात करने का मन था. बताने का मन था. के तुम समझते. मेरे इस पागलपन को शायद. जानते हो दोस्त. मुझे पूरा पूरा कोई समझ नहीं पाता इसलिए अपने पागलपन के छोटे छोटे हिस्से करके लोगों से बांटते चलती हूँ. जरा जरा हिस्सों में समझते हैं सब मुझे. पूरा पूरा कोई समझ नहीं सकता. समझना भी नहीं चाहिए. शायद इश्वर नाराज़ हो जायेगा. उसकी फेवरिट में हूँ तब तो इतना सारा दुःख लिखा हुआ है किस्मत में. भड़क गया तो जाने क्या करेगा. शायद सारे रकीबों को मेरे शहर में ट्रांसफर दे देगा. 

मगर जान, तुम समझते हो न. मेरी मुसीबत इश्क़ नहीं है. मेरी मुसीबत मैं हूँ. ये जो मन है. जिस पर किसी का बस नहीं चलता. वो मन है. कोई कब तक अपनेआप से लड़ाइयाँ लड़े. थकान हो जाती है. पोर पोर दुखता है. फिजिकली यु नो. तुमने कितना पेन बर्दाश्त किया होगा? थक जाने की हद तक थक जाने के बाद भी शायद चलने का हौसला है तुम में. डिसिप्लिन भी. और तुम तो अच्छे भी हो कितने न. तुम्हारी आत्मा एकदम साफ़ है. सोचती हूँ कैसा होता होगा. हैविंग अन unbroken soul. unblemished. एकदम पाकरूह होना. जिसपर किसी के खून के छींटे न हों. किसी की तकलीफ के आँसू न हों. जिसने कभी किसी का बुरा न चाहा हो. किसी गिल्ट का खंजर जिसके जिस्म में न चुभा हो.

तुमने हाथ देखे हैं मेरे. दीज आर ब्लड लाइंस. मैकबेथ में था 'Will all the water in the ocean wash this blood from my hands? No, instead my hands will stain the seas scarlet, turning the green waters red.' रंग. रंग रंग. गहरा लाल. सुनो. तुम्हारे हाथ कांपते तो नहीं न? क्यूंकि अगर आखिरी लम्हे में तुम घबरा गए तो मौत बहुत तकलीफदेह हो जायेगी. मुझे और तकलीफ नहीं चाहिए. मैं ख़त लिख जाउंगी तुम्हारे नाम. जिसमें लिखा होगा कि तुम्हारा इसमें कोई दोष नहीं था. मैंने तुम्हारा माइंडवाश कर दिया है. मैं उसमें टोना टोटका की बातें भी लिख जाउंगी. मुझे डायन ही करार देना. फिर कोई जानना नहीं चाहेगा मेरी आत्मा से रिसते इस काले. गहरे. गाढे. अपराधबोध के बारे में. क्रिस्चियन लोग कहते हैं कि वी आर आल सिनर्स. हम भी तो कहते हैं एक दूसरे को पापी. मगर ये कलयुग है. यहाँ तो ऐसा ही होगा न.

मुझे आजकल बारिशें दिखती हैं बेतहाशा. मेरी आँखों पर बादल छाए रहते हैं. सब कुछ उदास और परेशान कर देने वाला है. इसमें मेरे लिए इतना ख्याल काफी है कि एक दिन इस सबसे मुक्त हो जाना है. जिंदगी में आई डोंट हैव ऐनी अनफिनिश्ड बिजनेस. कुछ अधूरा नहीं रखा है मैंने. यूं एक तरह से तो जिंदगी ख़त्म हो जाती है पूरी नहीं होती. अधूरी ही रहती है हमेशा.

इश्वर तुम्हारे हाथों को महफूज़ रखे.
आमीन. 

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