14 March, 2009

मेरा पुराना बचपन :)


याद आते हैं वो फोकट में मुस्कुराने के दिन
दिन भर बाहर खेलने वाले बहाने के दिन

याद आती है वो राखी पर मिली टाफियां
और उसे सबको दिखा कर चिढ़ाने के दिन

वो तितिलियों से दोस्ती वो चिड़ियों सा गाना
पिल्लों और बिल्लियों से याराने के दिन

बारिशों में दिन भर सड़कों पे खेलना वो
वो शाम को मम्मी से डांट खाने के दिन

कित कित की गोटियाँ थी सबसे बड़ा खजाना
जमीं में गाड़ कर भाइयों से छुपाने के दिन

चिनियाबदाम में खुश हो जाने वाले लम्हे
कुल्फी के लिए रोज मचल जाने के दिन

तस्वीरों सा धुंधला है बचपन का वो मौसम
उफ़ वो बेफिकर उठने और सो जाने के दिन

नोट: फोटो में मैं अपने छोटे भाइयों के साथ हूँ। clockwise मैं चंदन, जिमी और कुंदन हैं। (कुणाल कहता है की मैं सबमें सबसे ज्यादा बदमाश लगती हूँ)

13 March, 2009

और भी गम हैं ज़माने में ब्लॉग्गिंग के सिवा...

पिछली पोस्ट में हम दुखी थे, फ़िर शिव कुमार जी ने समझाया की देश बेगाना नहीं है बहुत से लोग हमारी पोस्ट का समर्थन कर रहे हैं...और उन्होंने पुलिस को एक एक गिलास ठंढई भेजने की भी जरूरत बताई...अब उसके बाद अनूप जी आए, और उन्होंने कहा की शिवजी ठंढई भेज रहे हैं उसे पियो और पोस्ट लिखो...वैसे तो शिव जी पुलिस वालों के लिए ठंढई भेज रहे थे पर हम अनूप जी की बात कैसे टाल सकते हैं...तो हम आज पहली बार ठंढई पी कर पोस्ट लिख रहे हैं। तो आज पहले बता देते हैं की इस पोस्ट में लिखी चीज़ों के लिए हमें नहीं अनूप जी को दोषी ठहराया जाए। वैसे आप पूछ सकते हैं की आज पहली बार क्या हुआ है, पहली बार ठंढई पी है या पहली बार ठंढई पी कर पोस्ट लिख रहे हैं। तो ये बात हम साफ़ नहीं करेंगे....ये राज़ है :) (राज ठाकरे वाला नहीं)

मिजाज प्रसन्न है तो हमने सोचा क्यों न ये ही लिख दिया जाए की ब्लॉग पोस्ट लिखी कैसे जाती है...तो भैय्या मैं नोर्मल ब्लॉग पोस्ट की बात कर रही हूँ, मेरी इस वाली जैसे पोस्ट की नहीं की भांग चढ़े और कुर्सी टेबल सेट करके लैपटॉप पर सेट हो गए...कि जो लिखाये सो लिखाये डिस्क्लेमर तो पहले ही लगा दिए हैं। क्या चिंता क्या फिकर...

आजकल ब्लॉग पर भी बड़ा सोच समझ के लिखना पड़ता है...क्या पता पुलिस पकड़ के ले जाए, वैसे भी आजकल पुलिस को ऐसे निठल्ले कामों में ही मन लगता है...मैं तो सोच रही हूँ पुलिस वालो को ब्लॉग्गिंग का चस्का लगवा दिया जाए, एक ही बार में मुसीबत से छुटकारा मिल जायेगा। तो आजकल डर के मारे ब्लोग्स के ज्यादा आचार संहिता पढ़ती हूँ, सोचा तो था की लॉ कर लूँ पर शायद कोई फरमान आया है की २५ साल से कम वाले ही admission ले पायेंगे(इस ख़बर की मैंने पुष्टि नहीं की है) "शायद" लिखने से या फ़िर "मैं ऐसा सोचती हूँ" लिखने से आप कई मुसीबतों से बच जाते हैं इसलिए मैं इनका धड़ल्ले से इस्तेमाल करती हूँ। वैसे तो मेरी सारी मुसीबत इस मुए ब्लॉग की वजह से है और इस बीमारी का कोई इलाज मिल नहीं पाया है अब तक तो खुन्नस में सारी पोस्ट्स ब्लॉग पर ही लिखे जा रही हूँ।

अब इस सोच समझ के लिखने वाली पहली शर्त के कारण हम जैसे लोगों का जो हाल होता है वो क्या बताएं...कविता लिखने से बड़ी प्रॉब्लम कुछ है ही नहीं...अब मैं लिखूंगी कि आजकल धूप कम निकलती है मेरे आँगन में और सोलर पैनल वाले आ जाएँ झगड़ा करने कि मैडम आपलोगो को सोलर एनर्जी इस्तेमाल करने से रोक रही हो। अब लो, अर्थ का अनर्थ, बात का बतंगड़। या फ़िर मैं लिखूं कि आजकल रोज आसमान गहरा लाल हो जाता है और बीजेपी वाले चढ़ जाएँ त्रिशूल लेकर कि आप गहरा लाल कैसे लिख रही हैं आसमान तो केसरिया होता है, आप ऐसे कवितायेँ करके कम्युनिस्टोंको खुल्लेआम सपोर्ट नहीं कर सकती। कविता में से तो कुछ भी अर्थ निकले जा सकते हैं, अब आप चाहे कुछ भी समझाने कि कोशिश कर लो...मुसीबत आपके सर ही आएगी। और हम ठहरे छोटे से ब्लॉगर कम से कम जर्नलिस्ट भी होते तो कुछ तो धमकी दे सकते थे।

अब इतना सोच समझ के कविता किए तब तो हो गया लिखना...भाई कविता लिखने का तरीका है कि बस धुंआधार कीबोर्ड पर उँगलियाँ पटके जाओ, थोड़ी थोड़ी देर में इंटर मार दो...बस हो गई कविता। अब सोचे लगे तो थीसिस न कर लें जो कविता लिख के मगजमारी कर रहे हैं। हमारा तो कविता लिखने का स्टाइल चौकस है, हम तो बस चाँद, बादल, प्यार, बारिश या फ़िर दिल्ली पर लिखेंगे इससे ज्यादा हमसे मेहनत मत करवाओ जी...कभी कभी बड़े बुजुर्गों का आदेश हो तो कुछ और पर भी लिख लेते हैं, जैसे देखिये शिव जी के गुझिया सम्मलेन में हमने गुझिया पर कविता लिखी।

कवियों को कहीं भी ज्यादा भाव नहीं दिया जाता, उसपर कोई भी टांग खींच लेता है, लंगडी मार देता है...कवि का जीवन बड़ा दुखभरा होता है उसपर ऐसा कवि जो ब्लॉगर हो...उसे तो जीतेजी नरक झेलना पड़ता है जी, अपनी आपबीती है, कितना दुखड़ा रोयें, वैसे भी और भी गम है ज़माने में ब्लोग्गिन के सिवा।

समाज के बारे में पता नहीं लोग कैसे इतना लिख लेते हैं, हमारे तो कुछ खास पल्ले नहीं पड़ता...अब पिछली पोस्ट लिखी थी कि भैय्या हमें अपना देश बिराना लग रहा है...कोई योगेश गुलाटी जी आकर कह गए कि एक बार फ़िर विचार कीजिये, देश पराया हो गया है कि आपकी सोच विदेशी हो गई है? डायन, आधुनिक लड़कियां, छोटे कपड़े, जाने क्या क्या कह गए जिनका पोस्ट से कोई सम्बन्ध नहीं था...कहना ही था तो शिष्टाचार तो बरता ही जा सकता था चिल्लाने की क्या जरूरत थी...इन्टरनेट पर रोमन में कैपिटल लेटर्स में लिखना चिल्लाना माना जाता है. इतना लम्बा कमेन्ट वो भी मूल मुद्दे से इतर, भई इससे अच्छा आप पोस्ट ही लिख देते अपने ब्लॉग पर...मेरे कमेन्ट स्पेस को पब्लिक प्रोपर्टी समझ कर इस्तेमाल करने की क्या जरूरत थी. मेरे होली पर जो विचार थे मैंने लिखे आप असहमत थे आप लिखते, बाकी चीज़ें क्यों लपेट दी?

तो समाज के प्रति लिखने का ठेका कुछ लोगो ने ले रखा है, जिनका अपने ब्लॉग पर लिखने से मन नहीं भरता तो दूसरो के कमेन्ट स्पेस भरते चलते हैं...वैसे मेरा पाला इन लोगो से कम ही पड़ा है. कह तो देती की इनसे भगवान बचाए पर भगवान ने इनसे बचने का सॉफ्टवेर अभी तक इजाद नहीं किया है, शायद कुछ दिन बाद ऐसी अर्जियां वहां एक्सेप्ट होने लगें. तब तक इनको झेलना तो हमारी मजबूरी है.


हम वापस आ कर कविता पर ही टिक जाते हैं...इसपर हमें गरियाया जाए तो क्या कर सकते हैं.

ये वाली पोस्ट हमारी रिसर्च का hypothesis है आगे आगे देखें क्या नतीजा निकलता है।

12 March, 2009

रहना नहीं देश बिराना रे...

आज अखबार देख कर मन कसैला हो गया, मालपुओं की सारी मिठास ख़त्म हो गई। क्या हम एक ही भारत में रहते हैं? बंगलोर में भगवान महावीर कॉलेज के छात्रों की पुलिस ने डंडो से खूब पिटाई की और फ़िर थाने भी लेकर गए...उनका जुर्म(?), वो होली खेल रहे थे। वहीँ आरवी इंजीनियरिंग कॉलेज में वार्डेन ने होली खेलने वाले छात्रों को हॉस्टल से बाहर निकाल दिया और फ़िर कॉलेज के गेट भी बंद कर दिए गए।छात्रों का कहना है कि पुलिस उन्हें रंग खेलने से मना कर रही थी और उनके घर भेजना चाह रही थी, पुलिस ने उनके साथ बदतमीजी भी की...हालाँकि छात्रों को कुछ देर पुलिस थाने में रखने के बाद छोड़ दिया गया।

समझ नहीं आता कि ये पढ़ कर गुस्सा होऊं, दुखी होऊं या फ़िर मैं भी कुछ महसूस करना बंद कर दूँ...

एक वक्त होता था जब स्कूल में जम कर होली खेली जाती थी और होली के हुडदंग में ये बिल्कुल नहीं देखा जाता था कि जिसपर रंग डाल रहे हैं वो किस धर्म का है, या किस जगह का रहने वाला है। हमें याद है कि हम होली खेलते थे तो हमारा यही मानना होता था कि होली सबके लिए है। देवघर में पापा के दोस्त थे, मुकीम अंकल वो तो हर बार होली पर हमारे घर भी आते थे, और हम भी उनके घर जाते थे...उनके बच्चे मुहल्ले के बाकी बच्चों के साथ मिलकर लाल हरे पीले हुए रहते थे। मुझे याद है मुकीम अंकल कहते थे कि बच्चे जब पूछेंगे कि हम होली क्यों नहीं खेल सकते तो क्या जवाब देंगे? कि तुम अलग हो, कि तुम मुसलमान हो...ऐसा तो नहीं कर सकते न सर। हमारे टीचर्स साउथ इंडियन थे पर वो भी हमारे साथ होली खेलने में शरीक होते थे।

होली के दिन किसी को भी रंग लगाने की इजाजत होती थी, चाहे वो पड़ोसी हों, राह चलते लोग हों, दूधवाले भैय्या हो, या उनकी भैंस हो ;) हालाँकि भैंस कि काली कमरिया पर दूजा रंग नहीं चढ़ता था। होली के दिन रंग भरी बाल्टी और पिचकारी लेकर हम रोड पर खड़े रहते थे और हर आने जाने वाले को रंगते थे। दस बजते बजते मम्मी लोग का किचेन में खाना बनाना बंद और टोली निकल पड़ती थी, कितना हल्ला होता था। लोगो को जबरदस्ती घर से निकाल निकाल के रंगा जाता था।

एक वो दिन था और एक आज का दिन है...कल होली आई और चली गई, पता भी नहीं चला...कोई भी नहीं आया रंग खेलने, कई जगह तो ऑफिस में छुट्टी भी नहीं थी...और मुझे लगता था कि होली पूरे भारत में खेलने वाला पर्व है। पर क्या पूरा भारत जैसी कोई जगह है भी? क्या हम सब अपने अपने प्रान्त में नहीं सिमट गए हैं?

कभी मुंबई में हल्ला होता है कि बिहारी लोग छठ मनाते हैं, और आज बंगलोर में हल्ला हो रहा है होली मनाने पर। और हल्ला क्या बाकायदा पुलिस ने होली खेलने नहीं दिया...शक्ति का ग़लत प्रयोग इसी को कहते हैं। और किसी भी बड़े अखबार में इसकी ख़बर तक नहीं छपी है...हम किस मुंह से एकता और भाईचारे की बात करते हैं

असहिष्णुता इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि हम अपने से अलग कुछ भी बर्दाश्त ही नहीं कर पाते...चाहे वो धर्म हो, मान्यताएं हो, त्यौहार हों, या फ़िर जीने का ढंग हो। ये क्यों भूल जाते हैं हम कि हम एक स्वतंत्र देश के नागरिक हैं और ये चुनने की आजादी हर एक का मौलिक अधिकार है।

होली तो सारे भेद भाव मिटाने का त्यौहार है, जिसमें सब रंग जाते हैं, कोई छोटा बड़ा नहीं, कोई जात पांत नहीं...कम से कम इस त्यौहार को तो प्यार से खेलने दिया जाए। वैलेंटाइन डे अच्छे से मनाया जा सके इसलिए ये पुलिस तैनात रहती है ताकि कोई भी परेशान न करने पाए, और हमारा अपना त्यौहार होली जो प्यार और मेलजोल का प्रतीक है, उसी में रंग में भंग डालने पुलिस पहुँच जाती है...ये कौन सा भेद भाव है?

मुझे बंगलोर बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता...अपने ही देश में पराये हो गए लगते हैं, कहाँ तो लोग विदेशों में रह कर होली मना लेते हैं...और कहाँ अपने ही देश में लोगो की पिटाई के बारे में अखबार में पढ़ रही हूँ...
रहना नहीं देश बिराना रे...

09 March, 2009

काश मेरे पास रिवोल्वर होता

मुझे एक छोटी सी रिवोल्वर खरीदने का मन था...और बाहर जाते वक्त अपने पैर में नीचे की तरफ़ उसे बाँध के रखने का, एक दिन मैंने मम्मी से कहा था कि मेरे पास बहुत पैसे हो जायेंगे न तो मैं एक छोटी सी रिवोल्वर खरीदूंगी जिसे मैं हमेशा अपने पास रखूंगी। मुझे याद है उस दिन मम्मी से बहुत डांट पड़ी थी ये सब उलूल जलूल ख्याल तुम्हारे दिमाग में कहाँ से आता है।

ये वो वक्त था जब मैंने कॉलेज जाना शुरू किया था, और हमारे कॉलेज में चूँकि ड्रेस कोड था तो सिर्फ़ सलवार कुरता पहन कर ही जा सकती थी...उस वक्त कई बार हुआ था कि किसी लड़के ने दूर तक पीछा किया हो, और डर ये लगता था कि अगर किसी ने देखा तो मुझे डांट पड़ेगी। दुपट्टे को बिल्कुल ठीक से लेती थी अपने आप को पूरी तरह ढक के चलती थी, और उस वक्त बिल्कुल सिंपल कपड़े पहनती थी वो भी हलके रंगों में...फ़िर भी ऐसा कई बार होता था। पटना में ऑटो रिजर्व करके नहीं चलते, एक ऑटो में तीन या चार लोग बैठते हैं। कई बार लगता था कि बगल में बैठा लड़का जान कर कुहनी मार रहा है, मगर सड़कें ख़राब होती थीं तो कुछ कह भी नहीं सकते थे।

घर से कॉलेज कोई तीन किलोमीटर था और लगभग १० मिनट लगता था जाने में, पर वो दस मिनट इतनी जुगुप्सा में बीतते थे...वाकई घिन आती थी और लगता था कि काश मैं स्टील के या ऐसे ही कुछ कपड़े पहनती या बीच में एक पार्टीशन रहता। ऑटो में हमेशा देख कर बैठते, ये हम सब लड़कियों को अपने अनुभव और seniors में मिले नसीहतों के कारण पता था कि अधेड़ उम्र के पुरुषों के साथ बिल्कुल नहीं जाना है ऑटो में। उनका लिजलिजा स्पर्श ऐसी वितृष्णा भर देता था कि पहले period ठीक से पढ़ाई नहीं हो पाती थी। मम्मी ने कहा था कि जब भी असहज हो उतर जाऊं...और मैं ऐसा ही करती थी। लेकिन कई बार होता था कि लगता था कि कहीं हमें ही शक तो नहीं हो रहा...या फ़िर लेट हो रहा रहता था...कोई भी लड़का ये सोच भी नहीं सकता है कि ऐसी स्थिति में लड़की की क्या हालत होती है, मेरी तो साँस रुकी रहती थी, जितना हो सके अपनेआप में सिमट के बैठती थी।

वापस घर लौटते वक्त वही बेधती निगाहें, चौराहे पर खड़े लफंगे जाने आपस में क्या कहते हुए, बस सर झुका कर नज़र नीचे रखते हुए जितने तेजी से हो सके गुजर जाती थी वहां से...फ़िर भी लगता था वो नजरें पीछा कर रही हैं। और ऐसा एक दो दिन नहीं पूरे तीन साल झेला मैंने...और मैंने ही नहीं हर लड़की ने झेला था...हम सब का गुस्सा एक था और इस गुस्से को बाहर करने कि कोई राह नहीं।
मैं एक बार ऐसे ही बोरिंग रोड के पास अपने प्रोजेक्ट के लिए कुछ सामान ले रही थी, एक दुकान से दूसरी जाते हुए एक आदमी साइकिल से मेरे पीछे से कुछ बोलते हुए गुजरा, मैंने नजरअंदाज कर दिया सामान लेकर वापस आई तो वही आदमी फ़िर कुछ बोलते हुए निकला...मैं आगे बढ़ी थी वो फ़िर आगे से आता दिखा...उस दिन शायद मेरा गुस्सा मेरे बस में नहीं रहा, मेरे हाथ में एक पोलीथिन बैग था जिसमे छाता और बहुत सा सामान था जो मैंने ख़रीदा था॥मैंने पोलीथिन से खीच कर मारा था उसे बहुत जोर से, सीधे मुंह पर...उसका साइकिल का करियर पकड़ लिया और जितनी गालियाँ आती थी बकनी शुरू कर दी, सोच लिया था की आज इसका मार मार के वो हाल करुँगी की किसी लड़की को छेड़ने में इसकी रूह कांपेगी...चाहे मुझे पुलिस के पास जाना पड़े, परवाह नहीं। मैंने उसे तीन चार बार मारा होगा उसी पोलीथिन से और जोरो से गुस्से में चिल्लाये जा रही थी पर आश्चर्य जनक रूप से कहीं से कोई भी कुछ कहने नहीं आया...वो आदमी आखिर साइकिल छुड़ा के भाग गया।

मैंने ऑटो लिया और सीधे घर आ गयी, घर पर किसी को कुछ नहीं बताया, अगले दिन कॉलेज में दोस्तों को बताया...बात पर सब खुश भी हुए और डरे भी...की मान लो वो आदमी फिर आ गया और खूब सारे लोगो के साथ आया तो तुम अकेली क्या कर लोगी। बात डरने की थी भी, पर खैर वो आदमी फिर नहीं दिखा मुझे, पर बोरिंग रोड मैं अगले कुछेक हफ्तों तक अकेले नहीं गयी.

ऐसी एक और घटना ऑटो में हुयी, एक लड़का बगल में बैठा था, कुछ १६-१७ साल का होगा...सारे रास्ते कुहनी मार रहा था और जब उसे डांटा की क्या कर रहे हो, तमीज से बैठो तो उसने ऑटो रुकवाया और कुछ तो कहा, बस मैं भी उतरी और उसका कॉलर पकड़ के एक झापड़ मारा, बस वो हड़बड़ाया और भागने के लिए हुआ, पर कॉलर तो मेरे हाथ में था और मैं छोड़ नहीं रही थी उसका कॉलर पूरी तरह फट गया और वो भाग गया.

ये दो दुस्साहस के काम मैंने किये थे...पर मुझे बहुत डर लगता था, डर उनसे नहीं अपनेआप और अपने इस न डरने से लगता था कि किसी दिन इसके कारण मुसीबत में न फंस जाऊं। पटना में उस वक़्त पुलिस और कानून नाम की कोई चीज़ नहीं थी, पूरा गुंडाराज चलता था...ऐसे में अगर कोई मुझे उठा के ले जाता तो कहीं से कोई चूँ नहीं करता.

आज जब लोगो को बोलते हुए सुनती हूँ कि लड़की ने छोटे या तंग कपड़े पहने थे इसलिए उसके साथ ऐसा हादसा हुआ तो मन करता है एक थप्पड उन्हें भी रसीद कर दूँ...क्योंकि मैंने बहुत साल फिकरे सुने हैं और ये वो साल थे जब मैं सबसे संस्कारी कपड़े पहनती थी जिनमें न तो कोई अश्लीलता थी और न मेरे घर से निकलने का वक़्त ऐसा होता था कि मेरे साथ ऐसा हो। जब भी ऐसी कोई बहस उठती है मेरे अन्दर का गुस्सा फिर उबलने लगता है और इन समाज के तथाकथित ठेकेदारों और झूठे संस्कारों कि दुहाई देने वालो को सच में गोली मार देने का मन करता है.

दिल्ली में बस पर चलती थी तो हमेशा हाथ में एक आलपिन रहता था कि अगर किसी ने कुहनी मारी तो चुभा दूंगी...नाखून हमेशा बड़े रखे इसलिए नहीं कि खूबसूरत लगते हैं, इसलिए कि अगर किसी ने मुझे कुछ करने की कोशिश की तो कमसे कम अँधा तो कर ही सकती हूँ...और यही नहीं कई दिन बालों में जूड़ा पिन लगाती थी सिर्फ इसलिए कि ये एक सशक्त हथियार बन सकता है.

कहने को हम आजाद हैं, लड़कियों और लड़कों को बराबरी का दर्जा मिला है...मगर क्या ऐसी किसी भी मानसिक प्रताड़ना किसी लड़के ने कभी भी झेली है जिंदगी में? क्या ये कभी भी समझेंगे कि एक लड़की को कैसा महसूस होता है...नहीं...क्योंकि ये नहीं समझेंगे कि ऐसा होने पर हमारा क्या करने का मन करता है...ये कहेंगे अवोइड करो, ध्यान मत दो...अगर एक बार भी किसी लड़के को ऐसा लगा न तो वो बर्दाश्त नहीं करेगा लड़ने पर उतर आएगा...क्यों? क्योंकि वो सशक्त है? eve teasing जैसा नाम दिया जाता है और इसकी शिकायतों पर कोई ध्यान नहीं देता.

आज मैं उस वक़्त सी छोटी नहीं रही...लड़के मुझे अब भी घूरते हैं...बाईक चलाती हूँ तो पीछा करते हैं...मैं अनदेखा कर देती हूँ...मगर हर उस वक़्त मैं परेशान होती हूँ और हालांकि उन शुरूआती दिनों में जब मेरी सोच खुली नहीं थी और आज जब मैंने इतनी दुनिया देख रखी है...इतने अनुभवों से गुजर चुकी हूँ. आज भी सिर्फ इसलिए कि मैं लड़की हूँ मुझे इस मानसिक कष्ट को झेलना पड़ता है.

मेरा आज भी मन करता है कि मेरे पास एक रिवोल्वर होता...इन लड़कों को कम से कम एक झापड़ मारने में डर तो नहीं लगता.

06 March, 2009

ब्लॉगर कैसे बना?

आज मैं आपके साथ एक गूढ़ प्रश्न की खोज में चलती हूँ...ये वो प्रश्न है जो हम सबके मन में कभी न कभी कीड़ा करता रहता है...सवाल ये है कि "ब्लॉगर कैसे बना?"

बचपन में नानाजी खूब कहानी सुनाये थे हमको उसी में सुने थे कि ब्रह्मा जी कितना मेहनत से दुनिया बनाये, अकेले उनसे नहीं हो रहा था तो सरस्वाजी जी का हेल्प लेना पड़ा(और हम एक्साम या पोस्ट लिखें के लिए उनका हेल्प मांगते हैं तो क्या गलत करते हैं, हम ठहरे साधारण इंसान). ब्रह्मा जी ने जिस तरह से दुनिया बनाई उसमें बड़े लफड़े जान पड़े मुझे, हर बार कहानी सुनते थे तो एक version बदला हुआ हो जाता था, गोया विन्डोज़ का नया version रहा हो इसी तरह नानाजी भी बहुत सारी थ्योरी सुनाये थे हम लोग को.

स्कूल में आये तो पढ़ा कि प्रभु ने कहा "लेट देयर बी लाईट" और प्रकाश हो गया, इसी प्रकार विश्व की रचना हुयी, वो नाम लेते गए और चीज़ें पैदा होती गई...आज सोचती हूँ की प्रभु ने कहा "ब्लॉगर" और ब्लॉगर बन गया...ऐसा तो नहीं हुआ था?!...फिर लगा की ब्लॉगर जैसी महान और काम्प्लेक्स चीज़ इतनी आसानी से पैदा नहीं हो सकती...तो इसके लिए हमें रिसर्च करना पड़ा...वैसे तो माइथोलोजी में जाइए तो कोई मुश्किल ही नहीं है, क्योंकि वहां सबूत नहीं ढूंढें जाते, विश्वास से काम चल जाता है। तो मैं आराम से कह देती कि एक ब्लॉग्गिंग पुराण भी है जो लुप्त हो गया था...कुछ दिन पहले सुब्रमनियम जी ने एक खुदाई के बारे में बताया था, वहां के पाताल कुएं में गोता लगा कर मैंने ख़ुद से ये पुराण ढूंढ निकाला है(मानवमात्र की भलाई के लिए मैं क्या कुछ करने को तैयार नहीं हूँ). मगर मैं जानती हूँ आप लोग इस बात को ऐसे ही नहीं मांगेंगे...आपको सुबूत चाहिए।

ब्लॉगर के बनने की बात को समझने के लिए हमें इवोलूशन(evolution) की प्रक्रिया का गहन अध्ययन करना पड़ा...हमारी खोज से कुछ महत्वपूर्ण बातें सामने आयीं. ब्लॉगर होना आपके डीएनए में छुपा होता है, इसके लिए जेनेटिक फैक्टर जिम्मेदार होते हैं, बहुत सारी कैटेगरी में से हम ये छाँट के लाये हैं इसको समझने के लिए थोडा मैथ समझाते हैं हम आपको...
  1. सारे कवि ब्लॉगर हो सकते हैं मगर सारे ब्लॉगर कवि नहीं होते(कुछ तो कवियों के घोर विरोधी भी होते हैं, उनके हिसाब से सारे कवियों को उठा कर हिंद महासागर में फेंक देना चाहिए)
  2. सारे इंसान ब्लॉगर हो सकते हैं मगर सारे ब्लॉगर इंसान नहीं होते(आप ताऊ की रामप्यारी को ले लीजिये या फिर सैम या बीनू फिरंगी)
  3. ऐसे ब्लॉगर जो इंसान होते हैं और कवि नहीं होते गधा लेखक होते हैं(रेफर करें समीरलाल जी की पोस्ट)
ऊपर की बातों में अगर घाल मेल लगे तो आप उसका सही equation और reaction ख़ुद निकालिए हमने काफ़ी पहले से कह रखा है की हम मैथ में कमजोर हैं...एक तो ब्लॉगजगत की भलाई के लिए इतना जोड़ घटाव करना पड़ रहा है।

खैर, मैथ से बायोलोजी पर आते हैं...चूँकि जीव विज्ञान में सब शामिल होते हैं इसलिए इसी सिर्फ़ इंसानों के लिए वाली पोस्ट नहीं मानी जाए...वैसे भी हमारे प्रसिद्ध वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस ने बहुत पहले साबित कर दिया था की पेड़ पौधे संगीत के माहौल में तेजी से बढ़ते हैं, कल को कौन जाने ये साबित हो जाए कि पेड़ पौधे ब्लॉग्गिंग करने से जल्दी बढ़ते हैं तो कोई पेड़ भी अपना ब्लॉग बना लेगा। हम उस परिस्थिति से अभी से निपट लेते हैं...

ब्लॉग्गिंग का जीन जो होता है डीएनए में छुपा होता है...एक ख़ास तरह कि कोडिंग होती है इसकी, इसको अभी तक दुनिया का सबसे बड़ा supercomputer भी अनलाईज नहीं कर पाया है...इसलिए हमने चाचा चौधरी की मदद ली, आप तो जानते ही हैं कि चाचा चौधरी का दिमाग सुपर कंप्यूटर से भी तेज चलता है। हम दोनों ने काफ़ी दिनों तक एक एक करके डीएनए की कतरनें निकाली...एक बात बताना तो भूल ही गई कि हमारे पास इतने ब्लोग्गेर्स के डीएनए आए कहाँ से? तो ये बता दूँ कि जिस तरह आप ब्लॉग पर डाली पोस्ट चोरी होने से नहीं रोक सकते वैसे ही डीएनए चोरी होने से रोकना लगभग नामुमकिन है, और उसपर भी तब जब हमारे गठबंधन को दुनियाभर के मच्छरों का विश्वास मत मिल रखा हो...ये मच्छर दुनिया के कोने कोने से हमें खून के नमूने ला कर देते थे, वक्त के साथ इनमे ऐसे गुण डेवेलोप हो गए थे की सूंघ कर ही पता लगा लेते थे की सामने वाला ब्लॉगर है या नहीं...इन्हें फ़िर किसी नाम पते की जरूरत नहीं पड़ती थी।

ये ब्लोगजीन जो होता है...वक्त और मौके की तलाश में रहता है, आप इसे एक छुपे हुए संक्रमण की तरह समझ सकते हैं(इच्छा तो बहुत है की इसे इसके वास्तविक रूप में समझाउं पर आपको समझाते हुए कहीं मेरे फंडे न बिगड़ जाएँ इसका बहुत जोर से चांस है)। इसके पनपने और अपना लक्षण दिखाने में कुछ परिस्थितियों का अभूतपूर्व योगदान होता है जैसे की अकेलापन, मित्रों का कविता के प्रति उदासीन हो जाना, ऑफिस में स्थिरता का प्राप्त होना, पत्नी या प्रेमिका द्वारा प्रताड़ित होना, सफल कलाकार होना इत्यादि(आप इस लिस्ट में और भी बहुत कुछ जोड़ सकते हैं)। वैसे तो और भी बहुत सी परिस्थितियां होती हैं पर हम उनपर धीरे धीरे बात करेंगे(ताकि कोई सुन न ले)। ऐसी परिस्थितियां मिलते ही ये जीन जोर से अटैक करता है(आप इस जीन की अल्लादीन के जिन्न के साथ तुलना न करें ये आपके ही हित में होगा) और व्यक्ति में ब्लॉगर के लक्षण उभरने लगते हैं।

ये लक्षण हैं हमेशा कंप्यूटर पर बैठने की इच्छा होना, दूसरों के ब्लॉग पढ़ना, ब्लॉग्गिंग के बारे में जानकारी प्राप्त करने की कोशिश करना...ये लगभग २४ घंटे का फेज होता है, अगर इस समय व्यक्ति को ब्लॉग्गिंग के खतरों के बारे में चेता दिया जाए तो वह बच सकता है...वरना कोई उम्मीद नहीं...संक्रमण होने के २४ घंटे के अन्दर व्यक्ति अपना ब्लॉग बना लेता है...और पहली पोस्ट कर देता है।

इस तरह एक आम इंसान ब्लॉगर बन जाता है...इस समस्या से बचना नामुमकिन है, अभी तक इसकी न कोई दवाई है न वैक्सीन और कई लोग तो ये मानने से भी इनकार कर देते हैं कि उन के साथ कोई समस्या है। बाकी लोगो का फर्ज बनता है कि ब्लोग्गरों के प्रति संवेदनशील हों...पर अपनी संवेदनशीलता ह्रदय में ही रखें...यह एक संक्रामक बीमारी है और बहुत तेज़ी से फैलती है.

अगर जल्द ही इसे रोकने का उपाय न किया गया तो ये महामारी की शक्ल अख्तियार कर सकता है। डॉक्टर अनुराग आप कहाँ है?

05 March, 2009

राजदूत पर एक सफर...गाँव की ओर

होली आने ही वाली है, सब तरह माहौल होलिया रहा है...हँसी ठट्ठा हो रहा है, छेड़ छाड़ जारी है लोग नए नए रंगों की पोस्ट लिख रहे हैं तो कुछ पुराना माल भी ठेल रहे हैं...क्यों न हो होली ऐसे ही तो सदाबहार होती है।


हमारे यहाँ त्योहारों का बटवारा था, आधे ननिहाल में आधे ददिहाल में...शायद किसी समय शान्ति कायम करने के लिए ये अलिखित नियम बन गया होगा सो इसका आरम्भ हमें याद नहीं। हम हर साल होली मनाने अपने गाँव जाते थे...देवघर से। मेरा गाँव सुल्तानगंज के पास है, देवघर से गाँव की दूरी लगभग १०० किलोमीटर है। हमारे पास उस वक्त शान की सवारी राजदूत हुआ करता था जिसकी टंकी पर हम शान से विराजमान रहते थे और छोटा भाई माँ की गोद में ज्यादातर समय सोया ही रहता था।


देवघर से सुल्तानगंज का रास्ता मुझे अपनी जिंदगी के सारे रास्तों में सबसे खूबसूरत लगता है...इनारावरण से पलाश का जंगल शुरू होता था जो कई किलोमीटर तक साथ चलता था...सड़क के दोनों और दहकते हुए पलाश बहुत ही खूबसूरत लगते थे। पलाश से मेरा fascination उसी बचपन का है...रस्ते में एक सड़क जगह रुकते थे और सड़क किनारे बनी दुकानों में चाय वगैरह पीते थे मम्मी पापा, और मुझे मिलता था चिनियाबदम या मोटे मोटे बिस्कुट जो मुझे बहुत पसंद होते थे.

रास्ते में हनमना डैम आता था, और हम हमेशा वहां एक दो घंटे का आराम लेते थे, वहां एक बड़ा सा गेस्टहाउस होता था.
झींगुर और भौरों की आवाजें मुझे बड़ी अच्छी लगती थी...वहीँ पर पहली बार किसी घर में संगमरमर का फर्श और पिलर देखे थे...महलों के अलावा, इसलिए मुझे वो जगह बड़ी अद्भुत और रहस्यमयी लगती थी. वहां बहुत खूबसूरत गार्डन था, और वहां कैक्टस में भी फूल खिले होते थे.

रास्ते में जलेबिया मोड़ आता था, एक पहाड़ी जिसे सुईया पहाड़ कहते थे उसके बड़े घुमावदार रास्ते थे फिर कटोरिया आता था, उसके थोड़े देर बाद बेलहर जहाँ कमाल की रसमलाई मिलती थी पलाश के पत्तों के दोनों में. मुझे आज भी पलाश के पत्ते देख कर रसमलाई याद आती है.

हमारे तरफ होली के एक दिन पहले धुरखेल होता है, यानि धूल, मिटटी, गोबर, कीचड़ सब चलता है तो हम कोशिश करते थे की धुरखेल वाले दिन नहीं निकलें पर होली भी अक्सर दो दिन मनाई जाती है, तो अक्सर कहीं न कहीं धुरखेल में फंस ही जाते थे. बड़ी मुश्किल से पापा उन्हें मनाते थे की भाई जाने दो, बहुत दूर जाना है बच्चे हैं साथ में...तो ऐसे में बस रंग लगा कर छोड़ देते थे लोग.

मोटर साइकिल चलने का चस्का उसी उम्र से लगा, पापा के साथ हैंडिल पकड़े पकड़े कई बार लगता था की मैं ही चला रही हूँ, पापा तो बस ऐसे ही हाथ रखे हैं. फिर जब भाई थोडा बड़ा हो गया तो वो आगे बैठने लगा और मैं बीच में सैंडविच हो जाती थी, और रास्ता भी बस एक और का दिखता था. तब बार बार लगता था की बेकार बड़े हो गए...और फिर ये लगता था कि जल्दी से बहुत बड़े हो जायेंगे तो हम भी मोटर साइकिल चलाएंगे.


सबसे अच्छा लगता था कि गाँव पहुँचते ही शिवाले के पास दादी खड़ी होती थी इंतज़ार में...ये फ़ोन के बहुत पहले का जमाना था, बस दादी को पता होता था कि होली है तो हम लोग आयेंगे, वो एक हफ्ते से रोज शिवाले वाले रास्ते पर इंतज़ार करती थी. वहां से हम लोग पैदल ही दौड़ते हुए गाँव के बाकी बच्चो के साथ घर जाते थे. मेरा घर गाँव के आखिरी छोर पर है, घर पहुँचते पहुँचते सारे गाँव के बच्चे शामिल हो जाते थे और इतना हल्ला होता था कि सुनकर ही घर पर सबको पता चल जाता था कि हम लोग आ गए हैं.

फिर फटाफट निम्बू का शरबत मिलता था पीने को कुएं पर ले जा कर दीदी लोग हाथ पैर धुलवाती थी, थकान तो क्या दूर होनी थी उस उम्र में थकान भी कोई चीज़ होती है जानते ही नहीं थे, कुएं पर मज़ा बड़ा आता था. और फिर गरमा गरम दाल भात कोई सब्जी और चोखा मिलता था. आहा वो स्वाद!

इस तरह हम देवघर से गाँव पहुँच जाते थे...फिर गाँव में करते क्या थे ये किसी और दिन बताउंगी. :)

04 March, 2009

प्यार के रंग...

ये तसवीरें मुझे कुछ दिन पहले मेल में मिली थी...प्यार और जिंदगी को खूबसूरती से बयां करती इन तस्वीरों ने बरबस मन मोह लिया...आप भी एक नज़र डालिए।









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