15 November, 2017

प्यारे बॉलीवुड, हम लड़कियों के लिए भी कुछ गाने लिख दो, हम भी तो इश्क़ करते हैं

आज शाम एक अजीब समस्या की तरफ़ ध्यान गया। “हिंदी फ़िल्मों में लड़कों के ऊपर गाने बहुत ही कम बने हैं”। ये आर्टिकल किसी बहुत ज़्यादा रीसर्च पर बेस कर के नहीं लिख रही हूँ, अपनी समझ और एक पूरी शाम और रात भर गाने याद से और गूगल से और यूट्यूब से तलाशने के बाद लिख रही हूँ। हिंदी गाने बचपन से सुनती आयी हूँ, उसमें भी ऐसा नहीं कि सिर्फ़ अपनी जेनरेशन के, पापा को गानों का इतना शौक़ था कि घर में दो टेप रिकॉर्डर रहते थे। उसमें से एक में एक ब्लैंक कैसेट हमेशा cue कर के रखा रहता था कि कहीं भी अच्छा गाना आए, चाहे वो कोई टीवी सीरियल हो, रेडीओ का कोई प्रोग्राम हो या ऐसे ही टीवी पर आता कुछ भी हो। ये गूगल और Shazam से बहुत पहले की बात है। उन दिनों कोई गाना अगर खो गया तो बस एक अधूरी धुन ही गुनगुनाहट में रह पाएगी, बस। वो धुन कभी ज़िंदगी में दुबारा मिलेगी, इसमें भी शक था। मेरी बचपन की सबसे ख़ुशनुमा यादों में वो इतवार के दिन हैं जब पापा टेप रिकॉर्डर निकालते थे और कोई पुराना कैसेट बजाते थे। कोई रेकर्ड किया हुआ कैसेट होता था तो उसमें रेकर्ड हुए गानों की लिस्ट उस कैसेट के ऊपर के कवर पर लिखते थे। ज़ाहिर सी बात है, बचपन से बड़े होने तक बहुत बहुत सारे गाने सुनते रहे। सिर्फ़ अपने जेनरेशन के ही नहीं, पापा के और मम्मी के जेनरेशन के भी। देवानंद दोनों के फ़ेवरिट थे, शम्मी कपूर हम सबके फ़ेवरिट थे, विश्वजीत माँ को बहुत अच्छा लगता था। इसके अलावा ग़ज़ल वग़ैरह जो सुनते आए सो तो थे ही थे। अंत्याक्षरी में हम अकेले कई कई लोगों की टीम को हमेशा हरा दे सकने लायक गानों का शब्दकोश हुआ करते थे। घर छूटा। आगे पढ़ाई के लिए दिल्ली। यहीं आ कर पहली बार नोकिया के फ़ोन और fm रेडीओ से रिश्ता जुड़ा। फिर तो सारे लेटेस्ट गाने हमेशा ही सुनते रहते थे। पुराने गानों के सिवा। हम इतना बैक्ग्राउंड इसलिए दे रहे हैं कि हम बिलकुल बॉलीवुड और हिंदी फ़िल्मों में डूबे हुए पले बढ़े हैं।

इसके अलावा छह साल शास्त्रीय संगीत सीखे हैं, जिसको वहाँ हिंदुस्तानी संगीत कहते थे। कहने का मतलब, गला मीठा हुआ करता था और घर पे लोग बाग़ जुटते थे या पिकनिक वग़ैरह हुआ तो हमेशा फ़रमाइशी गाने भी ख़ूब गए हैं। इसके अलावा लड़कपन और जवानी में जब प्यार मुहब्बत हुयी है तो घर में रोज़ शाम को कोई ना कोई गाना गाने की आदत हमेशा रही ही। मूड के हिसाब से। नया प्यार हुआ है तो ख़ुश वाले गाने, दिल टूटा है तो बस उदास, दर्द भरे नग़मे। ‘जब दिल ही टूट गया टाइप’। जिसको भी गाने का शौक़ रहता है, उसकी पसंद के कुछ फ़ेवरिट गाने हमेशा रहते हैं, ये गाने अक्सर उन गीतों से चुने जाते हैं कि जो उसके जेंडर का हो, जैसे मैं फ़ीमेल वोकल वाले गाने चुनती थी। ये तो हुयी ख़ुद के गाने की बात, फिर है कि ईश्वर की दया और जीन्स के सही चुनाव के कारण उम्र भर ख़ूबसूरत भी रहे हैं और इश्क़ वग़ैरह में भी कभी पीछे नहीं हटे। तो इस सिलसिले में कई मौक़ों पर बड़े ख़ूबसूरत और ज़हीन लड़कों ने हमको इम्प्रेस करने के लिए एक से एक गाने गए हैं। चाहे घर में शादी ब्याह का माहौल हो और दीदी के देवर लोग आए हों कि किसी नयी पार्टी में युगल गीत गाने की कोई बात चल जाए। हँसी ख़ुशी के माहौल में गाने अक्सर रोमांटिक ही गए जाते थे, ख़ुशी वाले। कई बार हुआ है कि गानों की कोई लाइन गाते हुए कोई किसी ख़ास तरीक़े से हमको देख कर मुस्कुराया हो, भरी महफ़िल से नज़र बचा कर। हम समझ गए हैं कि गीत के बोल भले लिखे किसी और ने हैं, इशारा सारा हमारी ओर है। हिंदी फ़िल्मों में चाँद पर गाने भी इतने हैं कि ख़ुद को कभी चाँद से कम ज़मीन पर समझे ही नहीं हम। 

आज अचानक बात बहुत छोटी सी हुयी। एक दोस्त ने Whatsapp पर अपनी एक फ़ोटो भेजी। लड़का एक तो हैंडसम है, ड्रेसिंग सेन्स अच्छी है, फिर उसपर अदा बहुत है उसमें। जाड़ों के दिन हैं तो लम्बा ओवरकोट, गले में क़रीने से डाला हुआ मफ़लर। बेख़याली में खींची हुई तस्वीर थी, नीचे पता नहीं क्या तो देख रहा था। हल्की सी मुस्कान अटकी हुयी थी होठों की कोर पर। सब कुछ ही फ़ब रहा था उसपर। पर्फ़ेक्ट फ़ोटो थी। लेकिन whatsapp जैसे मीडीयम पर किसी की तारीफ़ में इतना क्या ही भाषण लिखेंगे। तो लगा कोई अच्छा गाना हो तो एक लाइन गुनगुना दें और क़िस्सा तमाम हो जाए। कुछ देर सोचने के बाद भी जब कोई गाने की लाइन नहीं याद आयी तो तस्वीर को दुबारा देखा…कि बौरा तो नहीं गए हैं कि कुछ सूझ ही नहीं रहा। दुबारा देखने पर ऐसा कुछ नहीं लगा, हम ईमानदारी से किसी की ख़ूबसूरती को देख कर एक अच्छा सा गाना गा देना चाहते थे। बस। थोड़ा शो-ऑफ़ भी करने को, कि देखो हम कितना अच्छा गाते हैं टाइप। बस इतना। हमारे इरादे एकदम नेक थे। ऐसी ख़ुशकिस्मती मेरी कई बार रही है कि ज़रा सा भी अच्छे तैयार होने पर कॉम्प्लिमेंट में कोई ना कोई गाना मिला ही है।

लेकिन कोई गाना याद नहीं आया। गूगल पर सर्च किए, ‘बेस्ट फ़ीमेल हिंदी सोंग्स औफ़ ऑल टाइम’। इसमें बहुत से नए गाने थे, और कोई भी अच्छे नहीं थे। अपनी याद के हिसाब से आशा भोंसले के गाए हुए गीतों को दिमाग़ में छान मारा। फिर गूगल पर देखा। अब तक दिमाग़ ख़राब हो चुका था कि फ़ीमेल सोलो आख़िर किन विषयों पर गए जाते हैं। फिर दूसरा ख़याल ये भी आया कि बॉलीवुड में गीतकार सारे पुरुष रहे हैं। कोई एक नाम भी नहीं है कि किसी स्त्री ने बहुत से अच्छे गाने लिखे हों। फिर लगा कि शायद मेरी जानकारी सही नहीं हो, मुझे वैसे भी बहुत ज़्यादा नाम याद नहीं रहते। गूगल ने लेकिन मेरे शक की पुष्टि की। फ़ीमेल आवाज़ में गाए गए कुछ बहुत अच्छे गाने तो हमेशा से याद भी थे कि बचपन से ख़ूब गाया है उन्हें। याद करके गानों की लिस्ट निकाली तो देखा कि ना केवल पुरुष औरतों की ख़ूबसूरती के बारे में गाना गाते हैं, बल्कि औरतें भी औरतों की ख़ूबसूरती के बारे में ही गा रही हैं। उदाहरण स्वरूप - ‘इन आँखों की मस्ती के परवाने हज़ारों हैं’, ‘बिजली गिराने मैं हूँ आयी, कहते हैं मुझको, हवा हवाई’, ‘मेरा नाम चिन चिन चू’। इसके अलावा जो दूसरा भाव फ़ीमेल वोकल में सुनने को मिलता है वो औरत के ख़यालों या अरमानों के बारे में होता है। एक स्टेटमेण्ट जैसे कि, 'ऐ ज़िंदगी गले लगा ले’, ‘आजकल पाँव ज़मीं पर नहीं पड़ते मेरे’, ‘कई बार यूँ भी देखा है’, ‘चली रे, चली रे, जुनूँ को जिए’, ‘लव यू ज़िंदगी’, ‘धुनकी लागे' इत्यादि। ऐसा इसलिए कि ये सारे गाने पुरुषों ने लिखे हैं, उन्हें लगता है कि औरत या तो अपनी ख़ूबसूरती के बारे में सोच रही है, ‘सजना है मुझे, सजना के लिए’ जैसे गीतों में या कि ज़िंदगी के बारे में और अपनी भावनाओं के बारे में सोच रही है। उन्हें ये शायद समझ नहीं आता है कि कोई लड़की लड़के के बारे में भी सोचती है। जितने गीत मैंने अपनी याद में खंगाले और फिर जितने इंटर्नेट पर देखे, इस तरह किसी लड़की का लड़के के बारे में सोचना और लिखना/गाना सबसे ख़ूबसूरती से गुरुदत्त की फ़िल्म, साहब बीबी और ग़ुलाम के गाने, ‘भँवरा बड़ा नादान है’ में दिखाया गया है। मगर ऐसी सिचुएशन फ़िल्मों में बहुत कम दिखायी गयी हैं। जहाँ एक ओर लड़की बालकनी में खड़े हो कर बाल भी कंघी कर रही है, ‘घर से निकलते ही, कुछ दूर चलते ही’ गुनगुना सकता है लड़का, लड़कियों के पास ऐसी कोई वोकैब्युलेरी ही नहीं है। 

चूँकि समाज में अच्छी, पढ़ी लिखी, ख़ूबसूरत और इंटेलिजेंट लड़कियों की बेहद कमी है क्यूँकि अभी भी बहुत लड़कियों को वो माहौल नहीं मिला है जिसमें वे अपने बारे में सोच सकें, अपने फ़ैसले ख़ुद ले सकें, सपने देख सकें। स्कूल, कॉलेज, कोचिंग… कहीं भी जाइए लड़के ज़्यादा होंगे, लड़कियाँ कम। मैं अब बहुत ज़्यादा सामान्यीकरण कर रही हूँ, लेकिन अधिकतर ऐसा होता है कि लड़कियों को लड़कों से बात करने में कोई ज़्यादा मेहनत नहीं करनी होती है। तो जिसको एकदम साधारण तरीक़े से कहें तो लड़की को लड़के को पटाने के लिए कुछ नहीं करना होता है। उसका थोड़ा सा ख़ूबसूरत होना और ज़रा सा हँस के बात करना काफ़ी होता है। लेकिन अगर कोई लड़की इससे ज़्यादा कुछ करना चाहे तो? मान लीजिए कि लड़की किसी दिन बहुत सुंदर सी साड़ी में आयी हो और लड़के ने उसे देख कर गाना गाया हो, ‘चाँद सी महबूबा हो मेरी…’, लड़की शर्माए और खिल खिल जाए। ज़िंदगी की ख़ूबसूरत यादों में एक ऐसी शाम जमा हो जाए। अब इसी सीन को उलट दीजिए, लड़के ने एकदम ही क़ातिल क़िस्म की ब्लैक शर्ट और जीन्स पहनी है, बाल बेपरवाही से बिखरे हैं, चेहरे पर हद दर्जे की मासूमियत है। लड़की भी चाहती है कि उसे कहे ये सब, लेकिन हर लड़की मेरी तरह लेखक तो होती नहीं है कि सधे, सुंदर शब्दों में लिख सके इतना। वो भी तो चाहेगी कि कोई गीत हो जो गुनगुना सके एक पंक्ति अपने महबूब को देख कर। लेकिन हिंदी फ़िल्मों ने हमारे देश की आधी से ज़्यादा आबादी को वो शब्दकोश, वो वोकैब्युलेरी दी ही नहीं है। वो कहता है, लड़की हो, तुम्हें शब्दों से माथा पच्ची करने की ज़रूरत नहीं। तुम बस ख़ूबसूरत दिखो, उतना ही काफ़ी है तुम्हारे लिए। कोई ज़रूरत नहीं रिश्ते में अपनी ओर से दिमाग़ लगने की, ये सब लड़कों का काम है, वे गाएँगे तुम्हारे लिए गीत, तुम उनपर फ़िदा होना, बस। इससे ज़्यादा करना है तो उनके लिए खाने का कुछ बना के ले जाओ, उनके लिए रूमाल काढ़ दो। बस। 

अलिशा चिनॉय की मेड इन इंडिया से मुझे कुछ उम्मीद थी, लेकिन गीत सुना तो देखा उन्हें भी बस ‘दिल चाहिए मेड इन इंडिया’, बदन कहीं का भी हो। ये और बात है कि मिलिंद सोमन को देख कर थोड़ी देर तक लिरिक्स की सारी शिकायतें रफ़ा दफ़ा हो जाती हैं। लेकिन आप ही कहिए, ये ट्रैजडी नहीं है कि मिलिंद के लिए गीत लिखा जाए और उसमें उसके मेड इन इंडिया दिल की बात हो बस? ये उसके हॉट्नेस की तौहीन है। 

जब इश्क़ बराबरी से होता है तो फिर गानों पर लड़कों का ऐसा एकाधिकार क्यूँ? लड़कियों के पास होने चाहिए उनके क़िस्म के गीत। लड़कों को भी तो मालूम होना चाहिए किसी लय में डूबा हुआ स्त्री कंठ जब गुनगुनाता है प्रेम में होते हुए तो कैसे आत्मा तक पहुँचता है सुकून। या कि दिल टूटे में कोई औरत कैसे फुफकारती है तो दुनिया को जहन्नुम में झोंक देना चाहती है। कोई लड़की क्यूँ नहीं गाए कि जब लड़का उसको इम्प्रेस करने के लिए तेज़ मोटरसाइकिल चलाते आ रहा था और मोड़ पर गिरा था तो उसे तकलीफ़ हुयी थी, लेकिन वो हँसी थी ठठा कर उसके भोलेपन और बेवक़ूफ़ी पर। या कि लड़के की ब्लैक शर्ट कैसे उसे काला जादू लगती है। कि लड़के का डिम्पल ऐसा है कि उसे हँसते देख इश्क़ में गिर जाते हैं सब। या कि चूमना चाहती है उसे। या कि बारिश में भीगना चाहती है उसके साथ। या कि किसी रोड ट्रिप पर भाग जाना चाहती है दुनिया छोड़ कर उसके साथ। ये सब कुछ गुनगुना कर कहना चाहती है लड़की लेकिन वो गीत किसी ने लिखे नहीं हैं। अब जैसे देखिए, ‘जब हैरी मेट सेजल’ का गाना है, ‘ख़ाली है जो तेरे बिना, मैं वो घर हूँ तेरा’। यहाँ पर बिछोह में भी लड़की गा रही है लेकिन ये सोचते हुए कि लड़के को घर ख़ाली लग रहा है…और मैं वो घर हूँ। लेकिन इसी फ़िल्म का दूसरा गाना है, ‘यादों में’ कि जो लड़की की आवाज़ से शुरू होता है और लड़के की आवाज़ में दूसरा हिस्सा है…वहाँ वो गा रहा है कि उसे उसकी याद कैसे आ रही है। लेकिन लड़की क्यूँ नहीं गाती है कि उसकी याद में हैं कौन से शहर। कौन सी सड़कें। कौन से समंदर हैं जो उसकी साझा याददाश्त में हैं। वो क्या है जिसे वो भूलने से डरती है। अलविदा कहना कितना दुखता है।

नयी शुरुआतें हो रही हैं लेकिन अभी और भी लड़कियों को आगे आना पड़ेगा। लिरिक्स लिखने पड़ेंगे ताकि कई और लड़कियों को आवाज़ मिले। जब स्नेहा खानवलकर जैसी म्यूज़िक डिरेक्टर वोमनिया लिखती है और धुन में रचती है तो अनायास ही कई लड़कियों को एक आवाज़ मिलती है। एक उलाहना देने का तरीक़ा मिलता है। ‘माँगे मुझौंसा जब हाथ सेकनिया’, जैसी चीज़ महसूसने के बावजूद ऐसा तीखा मीठा उलाहना रचना हर औरत को नहीं आएगा। पीयूष मिश्रा का लिखा हुआ ‘तार बिजली से पतले हमारे पिया’, भी एक तरह से लड़कों/आदमियों के लिए लिखा हुआ गीत ही है।

लड़कियों को वो गीत चाहिए जो उनके माडर्न महबूब के जैसा हो। जो उनका ख्याल रखे। जो उनका संबल बने। जो उनके गुनाहों का बराबर का पार्ट्नर हो। जो फ़ेस्बुक पर कभी कभी प्यार का इज़हार कर सके। बॉलीवुड। प्लीज़। कुछ बेहद अच्छे गाने दो ना हमें, अपने बेहद ख़ूबसूरत महबूबों के इश्क़ में डूब कर गाने के लिए। उड़े जब जब ज़ुल्फ़े तेरी अब बहुत ओल्ड फ़ैशंड हो गया है। बहुत घिस भी गया है। कब तक हम मजबूरी में अंग्रेज़ी वाला लाना डेल रे का ब्लू जीन्स वाइट शर्ट गाते रहेंगे। हमें ज़रा ब्लू जीन्स और झक सफ़ेद कुर्ता वाला कोई गाना रच दो। तब तक हम ख़ुद को मधुबाला समझ के ज़रा उसके लिए 1958 में बनी फ़िल्म, हावड़ा ब्रिज का गाना गा देते हैं, ‘ये क्या कर डाला तूने, दिल तेरा हो गया, हँसी हँसी में ज़ालिम, दिल मेरा खो गया’।


3 comments:

  1. एकदमे मौलिक विचार है, चिरकालिक समस्या जो अबतक किसी को दिखी ही नहीं! या, किसी ने जरूरत ही नहीं समझी! (या समझा).
    मैंने रेखा से एकाध गीत का पूछा तो वो भी मुंह ताकने लगी :)
    मजेदार.

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  2. सही विषय पकड़ा है तुमने। श्रंगार रस में तो नहीं पर वीर रस में नोक झोंक वाले अंदाज़ में नए पुराने गीत है जिसमें लड़कों की दीवानगी, अकड़ और उतावलेपन का जिक्र बारहा हुआ है। पर उनमें वो गहराई व काव्यत्मकता कतई नहीं हैं जैसा नायिकाओं के लिखे गीतों में होती हैं।

    आज फिल्मों में महिला गीतकार नहीं हैं ऍसी बात नहीं। कौसर मुनीर, अन्विता दत्त, प्रिया सरैया, सीमा सैनी जैसे कुछ नाम हैं जो विगत कुछ सालों में उभरे हैं। पर गीतकार वहीं रचते हैं जो परिस्थिति उन्हें निर्देशक देता है। महिला गीतकारों को कोई ऐसी सिचुएशन मिलती तो ऐसे गीत जरूर नज़र आते। पर कहीं ना कहीं पुरुष प्रधान फिल्म उद्योग होने का सिला है ये। आशा है तुम्हारे जैसी लड़कियों का दर्द फिल्म उद्योग तक जल्द पहुँचेगा और वाट्सएप पर गाना चस्पा करने में सोचना नहीं पड़ेगा। :)

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  3. This comment has been removed by the author.

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