25 May, 2012

बोली बनाम भाषा ऐंड माथापच्ची इन बिहारी

इन्सोम्निया...कितना रसिक सा शब्द है न? सुन कर ही लगता है कि इससे आशिकों का रिश्ता होगा...जन्मों पुराना. ट्रांसलेशन की अपनी हज़ार खूबियां हैं मगर मुझे हमेशा ट्रांसलेशन एक बेईमानी सा लगता है...अच्छा ट्रांसलेशन ऐसे होना चाहिए जैसे आत्मा एक शरीर के मर जाने के बाद दूसरे शरीर में चली जाती है. मैं अधिकतर अनुवादित चीज़ें नहीं पढ़ती हूँ...जानती हूँ कि ऐसे पागलपन का हासिल कुछ नहीं है...और कैसी विडंबना है कि मेरी सबसे पसंदीदा फिल्म कैन्तोनीज (Cantonese)में बनी है...इन द मूड फॉर लव. ऐसा एक भी बार नहीं होता है कि इस फिल्म को देखते हुए मेरे मन में ये ख्याल न आये कि ट्रांसलेशन में कितना कुछ छूट गया होगा...बचते बचते भी इतनी खूबसूरती बरकरार रही है तो ओरिजिनल कितना ज्यादा खूबसूरत होगा.

मेरे अनुवाद को लेकर इस पूर्वाग्रह का एक कारण मेरी अपनी विचार प्रक्रिया है. मैं दो भाषाओं में सोचती हूँ...अंग्रेजी और हिंदी...ऐसा लगभग कभी नहीं होता कि एक भाषा में सोचे हुए को मेंटली दूसरे भाषा में कन्वर्ट कर रही हूँ. अभी तक का अनुभव है कि कहानियां, कविताएं और मन की उथल पुथल होती है तो शब्द हमेशा हिंदी के होते हैं और टेक्नीकल चीज़ें, विज्ञापन और सिनेमा से जुड़ी चीज़ों के बारे में सोचना अक्सर अंग्रेजी में होता है. इसके पीछे कारण ये है कि पूरी पढ़ाई अंग्रेजी माध्यम में हुयी है और फिर ऑफिस भी वैसे ही रहे जिनमें अधिकतर काम और कलीग्स के बीच बातें अंग्रेजी में होती रहीं. वैसे तो सभ्य भाषा का इस्तेमाल करती हूँ लेकिन अगर गुस्सा आया तो गालियाँ हमेशा हिंदी में देना पसंद करती हूँ.

मुसीबत तब खड़ी होती है जब कुछ उलट करना पड़े...जैसे किसी कारणवश कुछ मन की बात अंग्रेजी में लिखना हो...कई बार तब अनुवाद करना होता है और हालाँकि ये प्रक्रिया बहुत तेज़ी से घटती है फिर भी मन में कुछ न कुछ टूटा हुआ चूरा रह ही जाता है जो कहीं फिट नहीं होता. ये बचे खुचे शब्द फिर मेरा जीना हराम कर देते हैं. फिल्मों या विज्ञापन पर हिंदी में लिखने पर ऐसी ही समस्या का सामना करना होता है...पूरे पूरे वाक्यांश अंग्रेजी में बनते हैं...फिर उनके बराबर का कुछ हिंदी में सोचना पड़ता है...और कितना भी खूबसूरत सोच लूं ऐसा बहुत कम होता है कि किसी फ्रेज(Phrase) के हिंदी अनुवाद से तसल्ली मिल सके. अच्छा होता न दिमाग में एक स्विच होता जिसे अंग्रेजी और हिंदी की ओर मोड़ा जा सकता जरूरत के हिसाब से.

मुझे ये भी लगता है कि लेखन में, खास तौर से मौलिक लेखन में परिवेश एक बेहद जरूरी किरदार होता है...कांटेक्स्ट के बाहर आप चीज़ों को समझ नहीं सकते और कुछ चीज़ों का वाकई अनुवाद हो ही नहीं सकता है. अनुवाद की सीमा से परे जो शब्द लगते हैं वो अक्सर 'बोलियों/dialects' का हिस्सा होते हैं, इसका कारण होता है कि कई शब्दों के पीछे कहानी होती है कि जिसके बिना उनका वजूद ही नहीं होता...कुछ शब्दचित्र होते हैं जिन्हें समझने के लिए आपको अपनी आँखों से उन दृश्यों को देखना जरूरी होता है वरना शब्द तो होंगे मगर निर्वात में...परिवेश से अलग उनका कोई वजूद नहीं होता. आप भाषा का अनुवाद कर सकते हैं पर बोली का नहीं...ये कुछ वैसे ही है जैसे भाव कई बार कविता में व्यक्त हो सकता है लेकिन गद्य में नहीं.

बिहार के बारे में एक फेवरिट डायलोग है...यू कैन ओनली बी बोर्न अ बिहारी...यू कैननोट इन एनी वे बिकम अ बिहारी...यानि कि आप जन्म से ही बिहारी हो सकते हैं...और कौनो तरीका नै है बाबू...बिहार में पैदा होने के कारण बचपन से अनगिनत बोलियां सुनती आई हूँ...हमारे यहाँ कहावत है...कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बानी...अर्थात...हर कोस पर पानी का स्वाद बदल जाता है और चार कोस की दूरी पर बोली बदल जाती है. गाँव में ऐसे लोग होते थे जो अनजान आदमी से पाँच मिनट बात करके उसका घर बता देते थे. बोली पहचान का उतना ही अभिन्न हिस्सा थी जितना कि किसी का नाम. ऐसे लोग रिश्ता तय करने, बर्तुहार आने के समय में खास तौर से बहुत काम के माने जाते थे. यही नहीं गाँव में कोई नया आदमी आया नहीं कि उसे टोहने के लिए इन्हें बुला लिया जाता था.

बातचीत का एक बहुत जरूरी हिस्सा होती हैं कहावतें...पापा जितने मुहावरे इस्तेमाल करते हैं मैं उनमें से शायद ४० प्रतिशत ही इस्तेमाल करती हूँ, वो भी बहुत कम. हर मुहावरे के पीछे कहानी होती है...अब उदहारण लीजिए...अदरी बहुरिया कटहर न खाय, मोचा ले पिछवाड़े जाए. ये तब इस्तेमाल किया जाता है जब कोई बहुत भाव खा रहा होता है...कहावत के पीछे की कहानी  ये है कि घर में नयी बहू आई है और सास उसको बहुत मानती है तो कहती है कि बहू कटहल खा लो, लेकिन बहू को तो कटहल से ज्यादा भाव खाने का मन है तो वो नहीं खाती है...कुछ भी बहाना बना के...लेकिन मन तो कटहल के लिए ललचा रहा है...तो जब सब लोग कटहल का कोआ खा चुके होते हैं तो जो बचे खुचे हिस्से होते हैं जिन्हें मोचा कहा जाता है और जिनमें बहुत ही फीका सा स्वाद होता है और जिसे अक्सर फ़ेंक दिया जाता है, बहू कटहल का वही बचा खुचा टुकड़ा घर के पिछवाड़े में जा के खाती है.

जिंदगी जो अफ़सोस का पिटारा बना के रखी हूँ उसमें अपने घर की भाषा(भागलपुरी/अंगिका) नहीं बोल पाना सबसे ज्यादा सालता है. पटना में रहते हुए पड़ोसी भोजपुरी बोलते थे...दिल्ली में एक करीबी दोस्त भी भोजपुरी बोलता था...तो काफी दिन तक ठीक-ठाक भोजपुरी बोलने लगे थे पर अब फिर से एकदम हिंदी पर आ गए हैं. अधिकतर दोस्तों से बात हिंदी में होती है. लेकिन बिहारी को बिहारी में गरियाने का जो मज़ा है ना कि आह! फिर से कुछ उदाहरणों पर आते हैं...एक शब्द है 'चोट्टा'...बेहद प्रेमभरी गाली है...सन्दर्भ सहित व्याख्या ऐसे होती है...

'शाम ऐसे लगती है जैसे किसी छोटी लड़की के गालों पर किसी बदमाश लड़के ने चुट्टी काटी हो...और उसके सफ़ेद रुई के फाहे जैसे गाल गुलाबी हो गए हों...गुस्से से भींचे होठ लाल...और वो शुद्ध बिहारी गाली देते हुए उसके पीछे दौडी हो.
चोट्टा!'

एक दोस्त है मेरा...उसे बात करते हुए हर कुछ देर में ऐसा कुछ कहना ही पड़ता है...लात खाओगे...मार के ठीक कर देंगे...डीलिंग दोगे बेसी हमको...अपनी तरह बोक्का समझे हो...देंगे दू थाप...ढेर होसियार बूझते हो...तुमरा कुच्छो नहीं हो सकता...कुछ बुझाईबो करता है तुमको...और एक ठो सबसे ज्यादा मिस्युज्ड शब्द है...थेत्थर(verb-थेथरई, study of थेथर एंड इट्स कांटेक्स्ट: थेथरोलोजी). अब इसका अनुवाद करने में जान चले जाए आदमी का. वैसे ही एक शब्द है...चांय...अब  चांय  आदमी जब तक आपको दिखा नहीं दिया जाए आप समझ ही नहीं सकते है कि किस  अर्थ में प्रयुक्त होता है. इसमें इनटोनेशन/उच्चारण बेहद जरूरी हिस्सा है...भाषा में चूँकि शब्दों के अर्थ तय होते हैं पर बोली में शब्द के कहने के माध्यम से आधा अर्थ उजागर होता है.

बचपन से हिंदी में बात करने के कारण कितना कुछ खो चुकी हूँ अब महसूस होता है लेकिन उसे वापस पाने का कोई उपाय नहीं है...अब जब नन्हें बच्चों को अंग्रेजी में बात करते देखती हूँ तो अक्सर सोचती हूँ...पराये देश की भाषा सीखते ये बच्चे कितने बिम्बों से अनभिज्ञ  रह जायेंगे...इन्हें petrichor तो मालूम होगा पर सोंधा नहीं मालूम होगा...सोंधे के साथ गाँव की गंध की याद नहीं आएगी. कितना कुछ खो रहा है...कितना कुछ कहाँ, कैसे समेटूं समझ नहीं आता. स्कूल में सिर्फ युनिफोर्म से नहीं दिमागी तरीके से भी क्लोन बनके निकल रहे हैं बच्चे...मेरी जेनेरेशन में ही कितनों ने सालों से हिंदी का कुछ नहीं पढ़ा...बहुतों को देवनागरी लिपि में पढ़ने में दिक्कत होती है. 

चौकी पर रखा हँसुआ.
इन सब ख्यालों के बीच एक दिन का धूप में बैठ कर अचानक रो देना याद आता है कि जब अचानक से ख्याल आया था कि मेरे बेटी अगर होगी तो उसको कभी कटहल बनाना नहीं सिखा पाउंगी क्योंकि कटहल काटने के लिए जिस हंसुए का इस्तेमाल जरूरी होता है वो उसके बड़े होने तक गायब हो जाएगा. ऐसे ही गायब हो जायेंगे कितने शब्द...कितनी दोस्ती...कितना अपनापन. कि जो इस मिट्टी में पैदा हुए हैं वही जानते हैं कि माथा दुखा रहा है में जो रस है वो सर दर्द कर रहा है में कहाँ.

सागर को सगरवा कहने का सुख...बचपन की याद से लहरों की तरह लौटता...गूंजता...नितुआ गे... बड़ी दिदिया...छोटकी फुआ...कुंदनमा... रे जिमिया...और आखिर में मंच पे पर्दा गिरने के पहले लौटता वो नाम जो बहुत सालों से गुम हो गया है...रे पमियाsssss 

पुनःश्च - कहाँ से कहाँ पहुँच गए...शायद इतना सारा कुछ धीरे धीरे मन में उमड़ घुमड़ रहा था...एक दिन राहुल सिंह जी के ब्लॉग पर छत्तीसगढ़ी पर ये आलेख पढ़ा था तब से.

बिहारी में एक लाजवाब सीरीज अभिषेक के ब्लॉग पर भी चल रही है...पटना की अद्भुत झलकी और कमाल के रंगीन लोग...जरा हुलक के आइये. 

24 May, 2012

धूप-छाँव जिंदगी सलीब पे चढ़ी हुयी

आखिर कोई तो बात होगी कि जो लड़की दारू पी के गाड़ी न चलने के पागलपन की हद तक खिलाफ थी उसने एक पूरी बोतल नीट खत्म की और कार उठा कर वहाँ तक के लिए निकल गयी जहाँ से आगे सडकें खत्म हो जाती थीं. क्या हुआ था...क्या कोई झगड़ा हुआ था, किसी अजनबी ने फिकरे कसे थे कि किसी अपने ने कुछ कहा था या कि बस ऐसे ही दिल को एक दिन टूटना था तो दिल टूट गया था. आखिर दिल भी सलामत रहते रहते ऊब गया था...दिल भी लड़की के अंदर ही धड़कता था न...जो लोग अक्सर नशा करते हैं वो बेहतर कंट्रोल में रहते हैं. लड़की ज्यादा पीती नहीं थी इसलिए आज जब जाने पाँच, छः कितने जाम उसके अंदर उतर चुके थे तो उसे मालूम नहीं चल रहा था कि क्या करना चाहिए. बस इतनी इच्छा थी कि सडकें खत्म हो जाएँ. कमबख्त सडकें. कहीं भी नहीं पहुँचती हुयी सडकें. बेमकसद. आवारा.
---
भोर का पहला पहर था...रात की जरा भी नहीं उतरी थी...चाँद आसमान से गायब था...सूरज उगना बाकी था...कह सकते हैं कि शहर का सबसे शांत वक्त था. ऐसे में एक लड़की बालकनी में खड़ी सिसक रही भी होती तो न कोई सुनने वाला था न कोई देखने वाला. हाँ अगली या ऐसे किसी बाद की सुबह जब अखबार में गाड़ी के एक्सीडेंट की खबर आती तो मोहल्ले में शायद थोड़ी हलचल जरूर होती कि उसकी मुस्कुराहटें सूरज की धूप की तरह थीं...उसके बालकनी में उगती थीं मगर रोशन कितने दिलों का कोना करती थी.
---
ये क्या पत्थर उठा लायी हो, तुम्हें भी ना...मजदूरों वाला काम करने में मन लगता है...लड़का उसकी लायी छेनी, हथोड़ी और बाकी टूल्स देखते हुए हँसा था उसपर. लड़की पर पत्थर को मूरत कर देने का जुनून सवार था. दिन रात एक किये हुए थी...पड़ोसी परेशान हो गए कि सुबह, शाम, रात, भोर...किसी भी पहर हथोड़ी की महीन ठक-ठक रूकती नहीं थी. लड़की को जाने क्या तराशना था...जाने किस छटपटाहट को मूर्त रूप देना था. पत्थर पर काम करना उसे सुकून देता. उसे अपनी सारी उर्जा कहीं प्रवाहित होती महसूस होती. उसे नृत्य करते हुए शिव की मूरत बनानी थी. पत्थर की विशालता इंटिमिडेटिंग थी...घर के मुख्य हॉल के बीचोबीच वो प्रतिमा उसके अथक प्रयासों से उभरती आ रही थी. उस छः बाय आठ के पत्थर को हॉल में पहुंचाना भी एक बेहद मुश्किल का काम था जिसके लिए उसे अपने सारे तर्क कुतर्क लगा देने पड़े थे.

संगतराश. शब्द में ही मर्दानापन था...जितनी भी कल्पना उभरती थी, कभी भी किसी औरत के हाथ में छेनी हथोड़ी सही नहीं लगती थी...उसके हाथ में कलम, कॉपी, पेंट ब्रश और बहुत हुआ तो कलछी बेलन दिख भी जायें पर डायमंड कटर जैसी तेज और खतरनाक चीज़ उसके नाज़ुक हाथों में एकदम आउट ऑफ प्लेस ही लगती थी मगर मजाल है जो एक इंच भी इधर से उधर हो जाए. मूरत को आकार देते हुए बहुत वक्त हो गया था...लड़का अब भी कभी कभार उससे मिलने चला आता था...हर बार चकित होने के लिए कि उसने अभी तक उस पत्थर पर काम करना नहीं छोड़ा है. एक दिन ऐसे ही अचानक के उसके आने से लड़की का ध्यान बंटा और मूरत की नाज़ुक छोटी ऊँगली कटर के आकस्मिक आघात से टूट कर गिर गयी.

उस छोटी घटना के बहुत दिन बाद तक काम चलता रहा...आखिरकार एक वो दिन भी आ गया जब पत्थर का वो विशाल टुकड़ा जीवंत हो उठा. लड़की प्रलय को उसकी आखिरी रेखा तक ईमानदारी से पत्थर में अमूर्त कर चुकी थी. उसका मन फिर उद्विग्न होने लगा...उसकी तलाश कहीं खत्म नहीं होती. उसे पत्थर में जीवन नहीं महसूस होता...फिर उसे लगा कि उसने प्राण प्रतिष्ठा तो की ही नहीं है...इसलिए शिव का चेहरा निष्प्राण था...मंत्रोच्चारण के लिए उसने अंजुली में जल भरा ही था कि उसका ध्यान रूद्र तांडव करते शिव के बाएं हाथ की ओर गया जहाँ छोटी अंगुली नहीं थी. गाँव के किसी पंचायत में सुनाये अंतिम फैसले सा कुछ याद में कौंध गया...खंडित मूर्तियों की पूजा नहीं होती.
---
उद्दाम. उन्मुक्त. किनारों पर सर पटकता समंदर. अजीब आत्मतुष्टि से भर देता है. कोई प्रणय याचना कर रहा हो पांवों में गिर कर जैसे. लड़की ने घुटनों तक की स्कर्ट पहनी थी और एक शोट में साढ़े तीन सौ किलोमीटर गाड़ी चला कर समंदर किनारे पहुंची थी. पागलपन या नशा जो कह लो. उसने ड्राइव की नहीं थी...समंदर उसे खींच लाया था...पांवों में दिल रख देना क्षणिक था...उसके बाद तो लहरों ने उसके पुर्जे पुर्जे खोल डाले...समंदर ने उसे बांहों में भर भर तोड़ा...लड़की स्विमिंग चैम्पियन थी और समंदर में तैरना आसान भी होता है...कुछ वैसे ही कि जैसे दूसरी बार प्यार हो तो पहले प्यार में रो चुके आंसुओं से ऐसा समंदर बना होता है कि दुबारा दिल टूटने पर भी तैर कर निकलना उतना मुश्किल नहीं होता.
---
लड़की में कुछ तो था. खास. कि उसे कितना भी तोड़ दो...उसके कण कण से पारिजात की खुशबू आती थी. कि उसके पांवों के निशान में खुदा का सिग्नेचर दिखता था...कि उसकी उँगलियों के पोरों में बिरवे फूटते थे...कि उसकी आँखों की रौशनी में दुआएँ पनाह पाती थीं...कि उसके जैसी बस वो एक ही थी. बस एक. 

22 May, 2012

उसमें इतनी गिरहें थीं कि खोलने वाला खुद उलझ जाता था

अजीब लड़की थी कि उसे चिट्ठियां लिखने की बीमारी थी...हर कुछ दिन में ऐसे छटपटाने लगती थी जैसे हवा में ओक्सिजेन खत्म हो गयी हो. कितना भी बातें कर ले...लिखे बिना उसका दिन नहीं मानता था. ऐसे में लगता था कि कोई उसका हाथ पकड़ के मरोड़ दे...कुछ ऐसे कि उँगलियाँ चिटक जायें...नील पड़ जाएँ और वह कलम न उठा सके. उसे सादा कागज़ यूँ खींचता था जैसे मरने वाले को मौत अपनी ओर...जैसे पहाड़ों का निर्वात अपनी ओर...घाटियों की गहराई छलांग लगा देने को पुकारती हो जैसे.

फिरोजी सियाही...गुलाबी...नारंगी...हरा...उसे नीले और काले रंग से लिखना नापसंद था. उसने एक दिन आखिर परेशान होकर घर की सारी कापियों में आग लगा दी...लिखा हुआ उसे और लिखने के लिए उकसाता था और सादा कागज़ उसे भीगी चादर की तरह दोनों किनारे पकड़ मरोड़ डालता था कि लड़की का पूरा सार तत्व किसी के नाम चिट्ठी में उतर आये...पर मन का सारा गीलापन निकल जाने पर भी थोड़ी सी नमी बाकी रह जाती थी और वो बालकनी में अधभीगी चादर की तरह पसरी रहती. कभी कॉफी में खुद को डुबाती तो थोड़ा नशा चढ़ता फिर सिगरेट और बची हुयी व्हिस्की से खुद में पानी की कमी को पूरा करती.

फिलहाल पूरे घर में जले हुए कागज़ के कतरे उड़ रहे हैं और दीवारों पर लटके जाले थोड़े सियाह हो गए हैं...पंखों पर उन चिट्ठियों के बेताल चमगादड़ों की तरह लटक गए हैं. कितनी बातें...ओह कितनी बातें लिखी थी उसने...थोड़ी तकलीफ होती है उसे जब भी वो ऐसे कागजों की होली जलाती है पर ये इतना नहीं होता कि फूट फूट कर रो पड़े...उसे लिखा हुआ जलने का अफ़सोस नहीं होता...रोज रोज इतना लिखती रहती है कि जो खो गया उसके लिए रोने का वक्त नहीं मिलता उसे. हाँ सादे कागजों के लिए उसकी आँखें भर भर आती हैं. ऐसा तो नहीं होगा कि सादा कागज़ नहीं होगा तो वो चिट्ठियां ही नहीं लिखेगी फिर भी हर कुछ दिन में उसे कागजों में आग लगा देने में अच्छा लगता है.

वो सोचती है कि उसे भूलना क्यूँ नहीं आता...लिखना ही भूल जाए...या कि उसे भूल जाए जिसे चिट्ठियां लिखना चाहती है...या यही भूल जाए कमसे कम कि घर में कलम कहाँ छुपा के रखी है. पर वो तो ऐसी है कि पार्क में बैठी होगी तो धूल में उसके नाम चिट्ठी लिख आएगी, नए शहर जायेगी तो आँखों में उस शहर की सारी इमारतों की यादों में उसका नाम चस्पां कर देगी. और ये शहर...जितना पुराना हुआ है कि लगता है पूरा शहर एक विशाल लाल डब्बे में कन्वर्ट हो गया है जिसमें कि उसके नाम की अनगिनत चिट्ठियां गिरी हुयी हैं. वनीला एन्वेलोप में...सादी सी हैंडराइटिंग में खुद को कतरा कतरा समेटती गयी है लड़की.

बिना जवाब के चिट्ठियां लिखना एक अनंत काल की यातना है...ये कुछ वैसा ही है जैसे किसी से प्यार करने के एवज में ये माँगना/चाहना कि वो भी आपसे प्यार करे. लड़की चिट्ठियां लिख कर निश्चिन्त हो जाती थी...बार बार कहती थी कि जवाब ना भी दो तो कोई बात नहीं...पर न चाहते हुए भी एक जवाब की उम्मीद के नन्हे टेंड्रिल्स उसके दिल के इर्द गिर्द लिपटने लगते थे...बेहद कमज़ोर...खुद के दम पर खड़े भी नहीं हो सकते पर धीरे धीरे मजबूत होने लगते थे...फिर लड़की का दिल तो इतनी संभावनाओं और प्यार से भरा था कि उम्मीदें मरती ही नहीं थी...अमरबेल की तरह दिल से पोषित होती रहती थीं.

उसने कई बार कलम से अपनी कलाई पर निशान बनाये जहाँ कि उसे ब्लेड चलानी थी...पर उसे टैटू पसंद नहीं थे और उसे मालूम था कि धमनी काटने के बावजूद वो मरेगी नहीं...उसे कहीं न कहीं मालूम था कि उसकी चिट्ठियां दुआएँ बन जाती हैं और ऊपर खुदा के दरबार तक पहुँच जाती हैं. वो सारी चिट्ठियां जो उसने लिखी थीं उसकी जिजीविषा से पोषित थीं...उनमें उसकी आत्मा का एक अंश होता था...उसे मालूम था कि उसकी सांसें बुझने लगेंगी तो उसकी सारी चिट्ठियों से स्याही निकल कर उसकी धमनियों में बहने लगेगी...जितना उसके बदन में खून नहीं है उससे कहीं ज्यादा सियाही उसकी चिट्ठियों में भरी है...जीती-जागती सियाही...ऐसी सियाही जो संजीवनी बन सकती है...खून बन के रगों में दौड़ सकती है.

घर के सारे सादे कागजों में आग लगा देने के बावजूद भी उसका मन करता है कि वो चिट्ठियां लिखे...उसे जीने के लिए खाना-पानी-नींद नहीं चाहिए...इनके बिना उसका काम चल जाता है. उसे चिट्ठियां लिखने के लिए कागज़ चाहिए होता है...कलम चाहिए होती है...कोई भी एक शख्स चाहिए होता है जिसे वो चिट्ठियां लिख सके. उसने अनजान लोगों को चिट्ठियां लिखी हैं...उसने अनजान पतों पर चिट्ठियां लिखी हैं...उसने अनजान भाषाओँ में चिट्ठियां लिखी हैं...उसने समंदर में बोतल में बंद कर चिट्ठियां फेंकी है. उसे चिट्ठियां लिखने की बीमारी है. वो हाथ बाँध कर बैठी है...कि डाकिये का इंतज़ार उससे सांसें छीन लेता है.


ये झूठ है कि वो कविता लिखती है, कहानी लिखती है, गद्य लिखती है...वो सिर्फ, सिर्फ और सिर्फ चिट्ठियां लिखती है.


तुम्हें समझ में आती है वो लड़की? तुम्हें समझ में आती है वो चिट्ठी?

मुझे दोनों समझ में नहीं आती. 

20 May, 2012

ताला लगाने के पहले खड़े होकर सोचना...कुछ देर. फिर जाना.

यूँ तो ख्वाहिशें अक्सर अमूर्त होती हैं...उनका ठीक ठीक आकार नहीं नहीं होता...अक्सर धुंध में ही कुछ तलाशती रहती हूँ कि मुझे चाहिए क्या...मगर एक ख्वाहिश है जिसकी सीमाएं निर्धारित हैं...जिसका होना अपनेआप में सम्पूर्ण है...तुम्हें किसी दिन वाकई 'तुम' कह कर बुलाना. ये ख्वाहिश कुछ वैसी ही है जैसे डूबते सूरज की रौशनी को कुछ देर मुट्ठी में भर लेने की ख्वाहिश.

शाम के इस गहराते अन्धकार में चाहती हूँ कभी इतना सा हक हो बस कि आपको 'तुम' कह सकूं...कि ये जो मीलों की दूरी है, शायद इस छोटे से शब्द में कम हो जाए. आज आपकी एक नयी तस्वीर देखी...आपकी आँखें इतनी करीब लगीं जैसे कई सारे सवाल पूछ गयी हों...शायद आपको इतना सोचती रहती हूँ कि लगता है आपका कोई थ्री डी प्रोजेक्शन मेरे साथ ही रहता है हमेशा. इसी घर में चलता, फिरता, कॉफी की चुस्कियां लेता...कई बार तो लगता भी है कि मेरे कप में से किसी ने थोड़ी सी कॉफी पी ली हो...अचानक देखती हूँ कि कप में लेवल थोड़ा नीचे उतर गया है...सच बताओ, आप यहीं कहीं रहने लगे हो क्या?

ये 'आप' की दीवार बहुत बड़ी होती है...इसे पार करना मेरे लिए नामुमकिन है...हमेशा मेरे आपके बीच एक फासला सा लगता है. जाने कैसे बर्लिन की दीवार याद आती है...जबकि मैंने देखी नहीं है...हाँ एक डॉक्यूमेंट्री याद आती है जिसमें लोग उस दीवार के पार जाने के लिए तिकड़म कर रहे हैं...गिरते पड़ते उस पार चले भी जाते हैं...कुछ को दीवार के रखवाले संतरी गोलियों से मार गिराते हैं फिर भी लोगों का दीवार को पार करना नहीं रुकता है. अजीब अहसास हुआ था, जैसे सरहदें वाकई दिलों में बनें तभी कोई  बात है वरना कोई भी दीवार लोगों को रोक नहीं सकती है. मैंने एकलौती सरहद भारत-पाकिस्तान की वाघा बोर्डर पर देखी है...उस वक्त सरसों के फूलों का मौसम था...और बोर्डर के बीच के नो मैंस लैंड पर भी कुछ सरसों के खेत दिख रहे थे. बोर्डर को देखना अजीब लगा था...यकीन ही नहीं हुआ था कि वाकई सिर्फ कांटे लगी बाड़ के उस पार पकिस्तान है...ऐसा देश जहाँ जाना नामुमकिन सा है. बोर्डर की सेरिमनी के वक्त गला भर आया था और आँखें एकदम रो पड़ी थीं...सिर्फ मेरी ही नहीं...बोर्डर के उस पार के लोगों की भी...हालाँकि मुझे उनकी आँखें दिख नहीं रहीं थी जबकि उस वक्त मुझे चश्मा नहीं लगा था. पर मुझे मालूम था...हवा ही ऐसी भीगी सी हो गयी थी.

आपको याद करते हुए कुछ गानों का कोलाज सा बन रहा है जिसमें पहला गाना है जॉन लेनन का 'इमैजिन'. इसमें एक ऐसी दुनिया की कल्पना है जिसमें कोई सरहदें नहीं हैं और दुनिया भर के लोग प्यार मुहब्बत से एक दूसरे के साथ रहते हैं...'You may say I'm a dreamer, but I am not the only one'...कैसी हसीन चीज़ होती है न मुहब्बत कि यादों में भी सब अच्छा और खूबसूरत ही उगता है...दर्द की अनगिन शामें नहीं होतीं...तड़पती दुपहरें नहीं होतीं. आपने 'strawberry fields forever' सुना है? एक रंग बिरंगी दुनिया...सपनीली...जहाँ कुछ भी सच नहीं है...नथिंग इज रियल. मेरी पसंदीदा इन द मूड फॉर लव का बैकग्राउंड स्कोर भी साथ ही बज रहा है पीछे. बाकियों का कुछ अब याद नहीं आ रहा...सब आपस में मिल सा गया है जैसे अचानक से पेंट का डब्बा गिरा हो और सारे रंग की शीशियाँ टूट गयीं.

कल सपने में देखा कि जंग छिड़ी हुयी है और चारों तरफ से गोलियाँ चल रही हैं...पर हमारे पास बचने के अलावा कोई उपाय नहीं है...सामने से दुश्मन आता है पर मेरे हाथ में एक रिवोल्वर तक नहीं है...मैं बस बचने की कोशिश करती हूँ. एक इक्केनुमा गाड़ी है जिसमें मेरे साथ कुछ और लोग बैठे हैं...ऊपर से प्लेन जाते हैं पर वो भी गोलियाँ चलाते हैं...कुछ लोग मुस्कुराते हुए आते हैं पर उनके हाथ में हथगोला होता है...हम चीखते हुए भागते हैं वहां से. छर्रों से थोड़ा सा ही बचा है पैर ज़ख़्मी होने से...कुछ गोलियाँ कंधे को छू कर निकली हैं और वहाँ से खून बहने लगा है. सब तरफ से गोलियाँ चल रही हैं...कोई सुरक्षित जगह ही नहीं है...मुझे समझ नहीं आता कि कहाँ जाऊं. फिर एक मार्केट में एक दूकान है जहाँ एक औरत से बात कर रही हूँ...उनके पास कोई तो बहुत मोटा सा कपड़ा है जिससे जिरहबख्तर जैसा कुछ बनाया जा सकता है लेकिन औरत बहुत घबरायी हुई है, उसके साथ उसकी छोटी बेटी भी है...बेटी बेहद खुश है. सपने में किसी ने सर पर गोली मारी है...मुझे याद नहीं कि मैं मरी हूँ कि नहीं लेकिन सब काला, सियाह होते गया है.

मुझे मालूम नहीं ऐसा सपना क्यूँ आया...कल ये ड्राफ्ट आधा छोड़ कर सोयी थी...

कुछ बेहद व्यस्त दिन सामने दिख रहे हैं...तब मुझे ऐसे फुर्सत से याद करके गीतों का कोलाज बनाने की फुर्सत नहीं मिलेगी...याद से भूल जायेंगे सारी फिल्मों के बैकग्राउंड स्कोर्स...कविताएं नहीं रहेंगी...लिखने का वक्त नहीं रहेगा...फिर मेरे सारे दोस्त खो जायेंगे बहुत समय के लिए. कल नील ने फोन कर के झगड़ा किया कि तू मुझे क्या नहीं बता रही है...तू है कहाँ और तुझे क्या हुआ है. बहुत दिन बाद किसी ने इतना झगड़ा किया था...मुझे बहुत अच्छा लगा. मैंने उसे झूठे मूठे कुछ समझा कर शांत किया...फिर कहा मिलते हैं किसी दिन...बहुत दिन हुए. मैं बस ऐसे ही वादे करती हूँ मिलने के. मिलती किसी से नहीं हूँ. आजकल किसी किसी दिन बेसुध हो जाने का मन करता है...मगर मेरे ऊपर पेनकिलर असर नहीं करते और मुझे किसी तरह का नशा नहीं चढ़ता. मैं हमेशा होश में रहती हूँ.

एक सरहद खींच दी है अपने इर्द गिर्द...इससे सुरक्षित होने का अहसास होता है...इससे अकेले होने का अहसास भी होता है.

16 May, 2012

मुस्कुरा कर मिलो जिंदगी...

परसों एक एचआर का फोन आया एक जॉब ओपनिंग के बारे में...मैं आजकल फुल टाइम जॉब करने के मूड में थी नहीं तो अधिकतर सॉरी बोल कर फोन रख दिया करती थी. इस बार पता नहीं...शायद हिंदी का कोई शब्द था या दिल्ली के नंबर से फोन आया था या कि जिस ऑफिस में पोजीशन खाली थी वो घर के एकदम पास था...मैंने इंटरव्यू के लिए हाँ कर दी.

मेरे इंटरव्यू नोर्मली काफी लंबे चलते हैं...कमसे कम दो घंटे और कई बार तो चार घंटे तक चला है...अनगिनत बातें हो जाती हैं. मुझे खुद भी महसूस होता है इंटरव्यू देते वक्त कि मैं काफी इंटरेस्टिंग सी कैरेक्टर हूँ और मेरे जैसे लोग वाकई इंटरव्यू के लिए कम ही आते होंगे. कभी कभी होता भी है कि इंटरव्यू के लिए गयी हूँ तो लाउंज में बैठे बाकी कैंडिडेट्स को देखती हूँ और सोचती हूँ कि कैसे लोग होंगे. उनमें से अधिकतर मुझे काफी सजग और एक आवरण में ढके हुए लगते हैं...मैं इंटरव्यू में भी फ्री स्पिरिट जैसी रहती हूँ. कितना भी  कोई बोल ले...कभी फोर्मल कपड़े पहन कर नहीं गयी...वही पहन कर जाती हूँ जो मूड करता है. जैसे आज का इंटरव्यू ले लो...प्लेन वाईट कुरता पहना था फिर दिल नहीं माना तो बस...चेक शर्ट, जींस, थोड़ी हील के सैंडिल, प्लेन सा बैग और पोर्टफोलियो. हाँ दो चीज़ें मैं कभी नहीं भूलती...हाथ में घड़ी और पसंद का परफ्यूम. 

आज भी बारह बजे दोपहर का इंटरव्यू था...मैं बाइक से पहुंची...हेलमेट उतारा...बालों को उँगलियों से हल्का काम्ब किया और पोनीटेल बना ली...रिसेप्शन डेस्क पर जो लड़की थी उसने एक मिनट वेट करने को कहा...तब तक जार्ज...जिसके साथ इंटरव्यू था सामने था. जो कि नोर्मल आदत है...एक स्कैन में पसंद आया कि बंदे ने पूरे फोर्मल्स नहीं पहने थे...डार्क ब्लू जींस, ब्लैक शर्ट और स्पोर्ट्स शूज. लगा कि ठीक है...क्रिएटिव का बन्दा है, क्रिएटिव जैसा है. उसने पूछा...चाय या कॉफी...मैंने कहा...नहीं, कुछ नहीं...बहुत दिन बाद किसी ने हिंदी में पूछा था...दिल एकदम हैप्पी हो गया...फिर जब वो मेरा पोर्टफोलियो देख रहा था तो मैंने देखा कि वो वही इंक पेन यूज कर रहा है जिसपर आजकल मेरा दिल आया हुआ है...LAMI का ब्लैक कलर में. एक पहचान सी बनती लगी...और इंस्टिंक्ट ने कहा कि इसके साथ काम करने में अच्छा लगेगा...अगेन...मुझे नोर्मली लोग पसंद नहीं आते. आजकल तो बिलकुल ही महाचूजी हो गयी हूँ.

इंटरव्यू कितना अच्छा होता है अगर इस बात का प्रेशर नहीं है कि जॉब चाहिए ही चाहिए...कितना अच्छा लगता है कोई आपसे कहे...टेल मे अबाउट योरसेल्फ...और आप फुर्सत और इत्मीनान से उसे अपने बारे में बताते जाइए. कई बार तो इगो बूस्ट सा होता है जब सोचती हूँ कि हाँ...कितना सारा तो तीर मार के बैठे हुए हैं...खामखा लोड लेते हैं, हमको भी न...उदास रहना अच्छा लगता है शायद मोस्टली. (प्लीज नोट द विरोधाभास हियर). मैं एकदम मस्त मूड में चहक चहक कर बात कर रही थी. 

इंटरव्यू लेने वाले लोग दो तरह के होते हैं...पहले थकेले टाइप...जो आपसे इतने गिल्ट के साथ बात करेंगे जैसे वो उस जगह काम नहीं करते किसी पिछले जन्म के पाप का फल भुगत रहे हैं और आप भी उस कंपनी में आयेंगे तो उनपर अहसान करेंगे टाइप...वे बेचारे दुखी आत्मा होते हैं, अपने काम से परेशान. मुझे ऐसे लोग एक नज़र में पसंद नहीं आते...अगर आप खुद खुश नहीं हो जॉब में तो नज़र आ जाता है...मेरे जैसे किसी को तो एकदम एक बार में. दूसरी तरह के वो लोग होते हैं जिन्हें अपने काम से प्यार होता है...जब वो आपको कंपनी के बारे में बता रहे होते हैं तो गर्व मिश्रित खुशी से बताते हैं...ये खुशी उनसे फूट फूट पड़ती है...ऐसे लोगों से बात करना भी बेहद अच्छा लगता है...उनके चेहरे पर चमक होती है और सबसे बढ़कर आँखों में चमक होती है. ऐसे लोगों के साथ किसी का भी काम करने का मन करता है और इंटरव्यू का रिजल्ट जो भी आये...मैं वहां ज्वाइन करूँ या न करूं पर इंटरव्यू में मज़ा आ जाता है. आज के इंटरव्यू में ये दूसरे टाइप का बन्दा बहुत दिन बाद देखने को मिला था...एकदम दिल खुश हो गया टाइप. 

मुझे एक और चीज़ भा गयी...मेरा नाम अधिकतर लोग Pooja लिख देते हैं...नाम के स्पेलिंग को लेकर बहुत टची हूँ...सेंटी हो जाती हूँ. मेरे ख्याल से ये दूसरी या तीसरी बार होगा लाइफ में कि किसी ने खुद से मेरे नाम की स्पेलिंग सही लिखी हो. मुझे नहीं मालूम कि फाइनली मैं वहां जॉब करूंगी कि नहीं...पर आज का इंटरव्यू लाइफ के कुछ बेस्ट इंटरव्यू में से एक रहेगा. 

कुछ दो ढाई बजे वापस आई तो कुणाल का फोन आया उसके इनकम टैक्स के पेपर की जरूरत थी ऑफिस में. मौसम एकदम कातिलाना हो रखा था...ड्राइव करते हुए मस्त गाने सुने और उसके ऑफिस पहुंची. वहां बगल में फोरम मॉल है जहाँ उसे कुछ काम था. हम वहां गए ही थे कि भयानक तेज बारिश शुरू हो गयी...आसमान जैसे टूट कर बरस रहा था. काफी देर सब वेट किये उधर फिर ऑफिस में डिले हो रहा था तो बारिश में भी भीगते भागते सब लोग गए. मैं उस झमाझम बरसती बारिश में एक प्यारे दोस्त से बात कर रही थी...हवा बारिश से भीगी हुयी थी...मॉल में मेरी पसंद के गाने बज रहे थे...इंटरव्यू अच्छा गया था. ओफ्फ क्या मस्त माहौल था. 

आज कुणाल ने ऑफिस थोड़ा बंक किया कि आठ साढ़े आठ टाइप छुट्टी...फिर घर पहुंचे. इधर एक App बनाने के मूड में हैं हम लोग तो उसी का रिसर्च चल रहा है. अभी तीन बजे तक साकिब के साथ डिस्कस किये हैं...अब सोने का टाइम आया...पर जैसा कि होता है, जाग गए हैं तो नींद नदारद. सोचा कुछ लिख लूं...अच्छे मूड में लिखने का कम ही मन करता है. बस ऐसे ही...यहाँ सकेरने का मन किया. इतनी अनप्रेडिक्टेबल लाइफ में कभी पुराने पन्ने पलटा कर देखूं तो यकीन हो तो सही कि खिलखिला के हँसने वाले दिन भी होते हैं. भोर होने को आई...अब हम सोने को जाते हैं. आप मेरी पसंद का गाना सुनिए जो मॉल में बज रहा था...बीटल्स का है. मेरा फेवरिट बैंड है. 

ग्लास फ्लूट के इन्स्ट्रुमेन्टल में ये गीत...ओह...जानलेवा था...कुछ गीतों पर ऐसे ही यादें स्टैम्प हो जाती हैं...मैं इस गीत को अब कभी भी सुनूंगी..उधर फोरम मॉल की रेलिंग से नज़र आती बारिश, एक दिलफरेब आवाज़ और अनंत खुशियों को महसूस करूंगी.

Sometimes...really...all you need is a tight hug... the wonderful thing about life and friendship and love is...sometimes...a friend sitting in some forlorn corner of the world says those simple words...and you really feel like you have been hugged...tightly. Imagine...underestimating the power of words! It simply is about the intensity behind those words...when you say those words as you feel them...even if you are kilometers apart...a friend's embrace melts all your sadness away. Words heal. Words hug. Words hold your hand.

Thank you...so much...I am glad I have you in my life. I love you.

PS: It just started raining again...my friends in Delhi...I am thinking of you...and for those in the parched corner of the country...for you too. Hugs.

14 May, 2012

निब तोड़ देनी है आज...

क्यूँ लिखा जाए कि एक एक शब्द बायस होता है एक बनते हुए ज़ख्म का...शब्दबीज होते हैं...खून में घुल जाने के लिए...आंसुओं में चुभ जाने के लिए...हर शब्द एक बड़े से ज़ख्म के पेड़ का नन्हा सा बीज होता है. हर शब्द जो मैं लिखती हूँ हर शब्द जो तुम पढ़ते हो.

मैं वाकई बैरागी सी हो गई हूँ...एकदम विरक्त...मन किसी शब्द पर नहीं ठहरता...मन किसी चेहरे पर नहीं ठहरता...मन कहीं नहीं ठहरता. मुझे विदा कहना नहीं आता वरना कब की चली जाती...किसी ऐसी जगह पर जहाँ से वाकई कहीं और जाने की जरूरत न पड़े.

लिखना कम कर दिया है...बेहद कम और मन में जो हाहाकार मचा रहता था वो भी कम हो गया है...अब एक निर्वात बन रहा है...जहाँ कुछ नहीं होता...जहाँ मैं नहीं होती जहाँ तुम नहीं होते...जहाँ कोई भी नहीं होता. मैंने सुबह से दो किताबें पढ़ने की कोशिश कीं...नहीं पढ़ पायी, दोनों किताबें बकवास लगीं, हो ये सकता है कि किताबें सच में वाहियात हों.

फिलहाल हर तरफ बहुत सा सन्नाटा है...आसपास के मकानों में काम करते मजदूर शायद दोपहर के खाने की छुट्टी पर गए हैं...बच्चे स्कूल से वापस नहीं लौटे...शिकारी पक्षी घात लगाए खामोश होंगे...और बादल अभी ऊंघ रहे हैं...पंखा भी बेआवाज़ चल रहा है...आज अचानक उससे आती नित्य की खटर खटर बंद है. मैं कपड़े बदल कर बाहर जाने के मूड में हूँ कि कभी कभी घर ऐसा हो जाता है जैसे दीवारें टूट गिरेंगी मुझ पर. लंबा घूमने का मन है तो जूते के तस्मे भी बाँध लिए हैं.

किसी को एक आखिरी चिट्ठी लिखने का मन है...सामने पसंद के तीनों पेन रखे हैं...समझ नहीं आ रहा किस रंग की सियाही से लिखूं. मेरे कवि, मुझे हमेशा से मालूम था मुझे तुम्हारा जाना तोड़ देगा मगर लगता था कि टूटे टुकड़ों से भी कविता रची जाती है...आज महसूस करती हूँ कि ऐसा नहीं होता. तुम्हारे साथ आसमान की सियाही भी फीकी पड़ गयी है. तुमसे अनगिन बातें की विगत कुछ सालों में पर आज विदा कहने को सारे लफ्ज़ बेमानी हैं.

मूड है...जानती हूँ जल्दी ठीक हो जाएगा...पर ये वक्त वक्त पर जो उदासी की तहें लग रही हैं मन पर, इन्हें काटने को गर्म धीपा हुआ चाकू ही चाहिए कि ये परतें सख्त होती जाती हैं...जैसे सख्तजान मैं हूँ वैसी ही कुछ. जिंदगी में ऐसा फेज कभी नहीं आया था कि इतने दिन तक इतना कुछ लिखने को छटपटाहट हो...और अब जैसे एकदम शून्य...और ये शून्य खुद नहीं आया...मैंने ही मन के दरवाजे बंद कर लिए हैं कि रचने के लिए जितना दर्द सहना होता है उतने में लगता है सांसों का तारतम्य टूट जाएगा.

उसमें भी जो लिखती हूँ एक जरा पसंद नहीं आता तो फिर मन पूछेगा ही न...कि इतना दर्द, इतना दर्द किसलिए? कौन सी मजबूरी है जो तुमसे कलम चलवाए जाती है? आज मन कर रहा है सारी कोपियाँ उठा कर जला दूं और ब्लॉग को आग लगा दूं...या कि कुछ दिन इन्टरनेट का मोडेम बंद कर दूं और लालबाग में लंबी वाक पर निकल जाया करूं.

कैसी हूँ मैं...जिसे छूती हूँ...वो कहता है 'सोना हो जाता है' मुझे कहना था मिट्टी हो जाता है...मगर सोना हो जाना...ओह...मैं उसे मिडास की कहानी सुनाती हूँ...उसे पूरी कहानी नहीं पता है...कि कैसे मिडास को वरदान मिला था कि वो जिसे छू देगा सोना हो जाएगा...मिडास तब तक बहुत खुश था जब तक कि भूख लगने पर उसका खाना भी सोने में परिवर्तित हो गया...पानी भी...और वो घबरा ही रहा था कि फूल सी नाज़ुक उसकी बेटी दौड़ती हुयी आई उसकी गोद में और एक पल में सोने की गुडिया में तब्दील हो गयी...कीमती मगर निर्जीव.

एक था पारस पत्थर...लोग उसकी पूजा करते थे कि उससे जो भी छू जाये सोना हो जाता था...पारस पत्थर का मन होता है क्या? उससे कोई पूछे कि वो जो रंग बिरंगी चिड़िया तुम पर आकार बैठी थी और सोने की मूरत हो गयी थी...तुम्हें रोना आया था क्या?

क्या तोड़ देना चाहती हूँ? क्या खुद को? विध्वंस का गीत बज रहा है...अट्टालिकाएं गिरती जा रही हैं...मेरे घर में अनपढ़ी पुस्तकों की मीनारें नेस्तनाबूद हो रही हैं...मैं कहीं जा रही हूँ...कहाँ...मन पूछता है...मुझे मालूम नहीं कहाँ.

सामने असीमित जलराशि है, उन्मुक्त, अगाध, सियाही जैसी नीली...मन पूछता है, लौट आने को सागर भी न हो तो लहरें कहाँ जायेंगी?

12 May, 2012

अकेलेपन को एन्जॉय करना इज लाइक डेवलपिंग अ टेस्ट फॉर गुड स्कॉच...इट कम्स विद टाइम.

स्कॉच के सुनहले गिलास के पीछे मोमबत्ती जल रही थी...लाईट कटी हुयी थी और गहरे अंधकार में सिर्फ उतनी सी रौशनी थी...वो भी पूरी की पूरी स्कॉच में घुल रही थी...बहुत से आइस क्यूब थे. आसमान में घने बादल छाये थे और कहीं से एक सितारे भर की रौशनी भी नहीं थी. रात के कोई दो से चार बजे तक का वक्त था...लड़की बालकनी में अकेले व्हिस्की का ग्लास लिए कुर्सी पर हलकी खुमारी में थी...जितने में दुनिया अच्छी लगने लगे. कोई गीत चल रहा था फोन पर...बालकनी की रेलिंग पर कतार से एक पुरानी ऐश ट्रे, पानी की बोतल, लाइटर और कोने में ट्राइपोड रखा हुआ था. बालकनी से लगे ही स्टडी टेबल थी जिसपर कैमरा रखा हुआ था. आज लड़की खास मूड में थी और उसने शाम को ऐलान किया था कि वो आज दो पैग पिएगी. 
---
बहुत खास दिनों में उसका पीने का मूड होता...उसमें भी पूरी शाम और देर रात एक ही पैग में हमेशा निकल जाती...तो बाज़ार से उसके लिए आता भी सिर्फ एक पैग भर का सामान...मगर आज लड़की ने डिक्लेयर कर दिया था कि वो दो पैग पिएगी. उसे इस बात पर काफी अफ़सोस हुआ कि किसी ने भी नहीं पूछा कि ऐसी क्या खास बात हुयी है...तुम तो कभी भी एक पैग से ऊपर गयी ही नहीं हो. लड़की को आदत थी चढ़ जाने के बाद लोगों की प्यार मुहब्बत और इसरार से भरी बातें सुनने की...पर आज उसे दुनिया फानी लग रही थी...उससे वहां बैठा नहीं गया...लगा जैसे थोड़ी खुली हवा चाहिए. वो बालकनी में अपनी कुर्सी, पानी की बोतल और कैमरा लेकर सेटल हो गयी. 

व्हिस्की का ग्लास उसे बेहद खूबसूरत लगता है...पानी की बूँदें ठहरी हुयीं...सुनहले आइस क्यूब...रौशनी परावर्तित होती हुयी...कल उसने अनगिन तसवीरें खींची. पहला पैग खत्म होने तक वो कुछ लोगों के बारे में ऐसे ही सोच रही थी...मगर दूसरे पैग में बर्फ थोड़ी ज्यादा थी और उसे आराम से पीने की फुर्सत भी. हलके खुमार में उसे कुछ खास लोग याद आये...उसकी बड़ी इच्छा हुयी कि उन्हें फोन करे...जैसे कि अक्सर लड़के करते हैं...थोड़ी चढ़ी नहीं कि सारे पुराने दोस्तों को फोन करना शुरू. उसका दिल किया कि एक सिंपल सा मेसेज ही कर दे...व्हिस्की पी रही हूँ...आपकी याद आ रही है. मगर उसकी दुनिया में ये बहुत सिंपल सी चीज़ थी पर जो उसकी दुनिया के बाहर दुनिया है वहां चीज़ें बहुत कोम्प्लेक्स हो जाती हैं ये सोच कर उसने जब्त कर लिया. 

किसी को बेहद शिद्दत से याद करो तो उसे पता चल जाता है ऐसा उसका मानना था. एक वक्त था जब उसे बहुत हिचकियाँ आती थी...वो एक पुराने दोस्त को अक्सर तब उलाहना दिया करती थी कि मुझे इतना याद मत किया करो...दिल में गहरे उसे मालूम होता था कि वो उसे याद कर रहा है. आजकल बहुत साल हुए लड़की को हिचकियाँ आनी एकदम ही बंद हो गयी हैं. उसे लगता है कि अब उसे कोई याद नहीं करता. 

कल जब बिजली चली गयी तो लड़की ने पहला वाक्य कहा था...बर्फ कैसे जमेगी...वो बेहद उदास हो गयी थी...मगर फिर सिर्फ एक कैंडिल की रौशनी में जब बहुत सी अच्छी अच्छी तसवीरें आयीं तो उसका अफ़सोस कम हो गया. फिर बर्फ न होने को नीट पीने का बहाना भी मान लिया गया. उसे अपना पैग खुद बनाना पसंद था...ग्लास में पूरे ऊपर तक भर के आइस क्यूब्स और लगभग आधी ग्लास तक में व्हिस्की. ग्लास भी एक ही...हमेशा...स्क्वायर कट. वो ग्लासेस को लेकर बहुत पर्टिकुलर थी...दूसरे ग्लास में पी ही नहीं सकती...न दूसरे शेप के ग्लास में...न दूसरे लोगों के साथ जो उसे पसंद न हों. उसे लगता है वो बहुत जिद्दी होती जा रही है...उसे आजकल अधिकतर लोग पसंद नहीं आते. उसने कभी सोचा नहीं था कि बालकनी में अकेले व्हिस्की पीते हुए उसे इतना सुकून महसूस होगा...शी वाज एट पीस...विद हरसेल्फ एंड द वर्ल्ड. 
---
अकेलेपन को एन्जॉय करना इज लाइक डेवलपिंग अ टेस्ट फॉर गुड  स्कॉच...इट कम्स विद टाइम. तन्हाई का लुत्फ़ आते आते वक्त लगता है...अच्छी व्हिस्की की पहचान होने में भी...एक कनेक्शन होता है. लाइक मैजिक. स्कॉच ऑन द रोक्स...एवरग्रीन...क्लास्सिक...तुम्हारी तरह...ईश्क की तरह...मेरी तरह भी तो. बहुत दिन हुए...लड़की परेशान है...अच्छा लगेगा क्या इतनी जान पहचान है पर साथ में पीने बैठोगे तो उसे पूछना पड़ेगा कि आइस कितनी...जैसे कोई भली लड़की चाय में चीनी कितनी पियोगे पूछ रही हो...

इस बार बता ही दो...कितनी आइस क्यूब्स डालते हो अपनी स्कॉच में?

Related posts

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...