Do you know women feel like a live time bomb, most of their life? Something is always ticking inside their heart. But it’s been such a long time living with the bomb that they have forgotten if they are a part of the bomb diffuser squad or the bomb detonating one.
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I’ve often raced like mad to catch a fleeting glimpse of one such woman. Sometimes, she does appear in the rear-view mirror of my Mini Cooper Convertible. They don’t write, “Objects in the mirror are closer that what they might appear”, on these mirrors anymore. Someone believes, all of us already know this fact. Though, we could all do with a reminder, some days, I guess. I might just cause an accident in order to touch her…one of these days. My palpitating heart calms down when it sees her. I should be scared though, the way most people are scared of ghosts. But I can’t ascertain the time to which she belongs…future or the past, definitely not the present…timeless in a way I can’t fully comprehend. We are born fearless and slowly learn to be afraid, a mix of causality and probability we pretend to understand.
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3:00 a.m., January the 6th, 2026.
मुझे मैकबुक पर लिखने के पहले काग़ज़ पर लिखना ज़रूरी होता है। जब तक इंक पेन से काग़ज़ पर न लिखूँ, सतरें नहीं लगतीं। साँस ज़्यादा रैंडम चलती है। लिखने के लिए साँस का एक लय में आना जरूरी होता है। इतनी देर रात सब कुछ एकदम शांत है। सिर्फ़ कीबोर्ड की आवाज़ आ रही है। निब का काग़ज़ पर चलना, टाइपिंग की आवाज़, सिगरेट का कश खींचते हुए जलते तंबाकू के पत्तों की मद्धम आवाज़…ये मेरी बेहद पसंद की आवाज़ें हैं। रात इसलिए भी अच्छी लगती है कि ये आवाज़ें दिन में इस रिदम के साथ सुनायी नहीं देती। जब से मुझे लिखने का होश रहा है, मेरे सोचने की भाषा हिंदी रही है। लेकिन मेरे बच्चे दिन भर अंग्रेजी में ही मुझसे भी बतियाते रहते हैं इसलिए मैं देखती हूँ कि आजकल पर्सनल भी कुछ लिखना होता है तो शुरुआत हमेशा अंग्रेजी से होती है। हाँ एक दो पैराग्राफ के बाद मन थक जाता है और अपनी आसान मातृभाषा की ओर लौटता है।
2025 कमाल का साल था, कुछ अर्थों में। जिसमें सबसे मजेदार चीज़ रही कि मैंने यह साल हांगकांग में शुरू किया। हम 31 January को हांगकांग पहुँचे थे। तो इस साल मुझे एक्स्ट्रा डेढ़ घंटे मिले। कि मेरा साल 2025, भारत के डेढ़ घंटा पहले आ गया था। साल की शुरुआत में एक बेहद सुंदर घर था, जिसमें बड़ा सा लॉन था। गहरी गुलाबी बोगनविला थी, गराज में झूलती हुई। जब भी मिनी कूपर बाहर निकालती, पहले गुलाबी झालर आती फिर नीला आसमान। गराज से गाड़ी निकालना अपने आप में बेहद सुंदर था। इस साल मैंने अपनेआप को ठहरने की इजाज़त दी। मेरे जुड़वाँ बच्चे हैं, मुझे अपने बच्चों का बचपन एक ही बार मिलना था। जैसे अधिकतर दो बच्चों की मम्मी को होता है, कि बचपन दो बार मिलता है…मेरे साथ नहीं था। लगभग पूरे समय घर पर रहने और एक भी सोलो ट्रिप नहीं करने के बाद भी मैंने महसूस किया, कि वक्त कभी पूरा नहीं पड़ता। हमेशा कम लगता है। बच्चों को भी लगता है कि मैं उनके साथ समय नहीं बिताती, मुझे भी लगता है, मैं उनके साथ ज़्यादा समय नहीं बिता पा रही। मैंने कुछ लिख नहीं रही, पढ़ नहीं रही…तो फिर ये समय जा कहाँ रहा था!
मैंने बच्चों को समझाया। आप किसी से प्यार करते हैं तो ये ज़रूरी नहीं है कि वो हर वैसी चीज़ करे, जिसमें आपको ख़ुशी मिले। Part of loving someone is letting them do things you don’t want them to do…this is called freedom…and this is a very important part of loving someone. वे धीरे-धीरे समझेंगे, मुझे मालूम है। बच्चे समझदार होते हैं। पर उसके पहले उन्हें बिल्कुल नासमझ होने का और बहुत सारा प्यार और समय मांगने का पूरा हक है। मुझसे जहाँ तक हो पाता है, मैं अपने हिस्से का वक्त उनके नाम करती हूँ। There are no rules of motherhood. We are doing the best we can. Really. The full time mothers, the part-time workers, the work from home mothers, the ones that are on a break. All of us. While being mothers, we are slowly being erased from everywhere…we do notice this…and yet choose silence and peace over protest on most days. I’ve realised, I have got my superpower back…making friends…and this time not over writing, because I hardly write anymore…but over motherhood. I’m friends with class-mates of my kids…as casually as I became friends with people who felt too deeply and wrote about the world with an urgency as if not noticing the mood would actually cause it to disappear. Theoretically, It will, but also, no one ever looking at the moon is actually impossible.
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| Diary by khwaab tanha collective |
अभी चार तारीख को घर शिफ्ट किया है। कितने भी अच्छे पैकर्स एंड मूवर्स बुलवा लो। कितना भी कहो कि किताबें प्यार से, अच्छे से पैक करना…वे किताबों का सत्यानाश करने के लिए पूरी तरह सक्षम होते हैं। सामान सिर्फ़ लोड कर कर दूसरे घर पर रखने में रात के साढ़े नौ बज गए। बॉक्स को लेबल करने के बावजूद इन्होंने मेरी किताबों के बक्से उन कई सारे बक्सों में कहीं मिला कर रख दिया कि खोजते खोजते नहीं मिला। आख़िर को रात दस बजे के आसपास निकलने के ठीक पहले उन्होंने मेरी किताबों के बक्से ला कर रख दिए। बुकरैक अभी दीवार में फ़िक्स नहीं हुआ था इसलिए किताबें वहाँ रखना ख़तरनाक हो जाता, बच्चों का घर है। नौ बजे मैं बच्चों को सुलाने चली गई थी। दिन भर की भयंकर थकान थी। फिर भी रात के डेढ़ बजे नींद खुल गई। किताबों को कार्टन से निकाले बिना सो नहीं सकती थी। मालूम था नींद नहीं आएगी। मुझे पहले बार समझ में आया कि कैसे कुछ औरतें रात को किचन का काउंटर तब तक पूरी तरह साफ़ नहीं कर लेतीं, उन्हें नींद नहीं आती। रात को कम आवाज़ के साथ कार्टन पर लगा टेप निकालना अपनेआप में मुश्किल था। लेकिन धीरे-धीरे उसे काटा। चार कार्टन किताबें निकालीं। किसी तरह टेबल पर ऊँची ऊँची मीनारें बनाईं, ढेर सारी किताबें टीवी रैक पर रखीं। फिर चैन से जा कर सो गई।
घर सिर्फ़ लौटने की जगह ही तो है।
इस घर में पूरब को खुलने वाली खिड़की तो है, पर उसमें पल्ले नहीं हैं, तो खुलती नहीं है। लेकिन ठीक है। सब कुछ तो कहाँ मिलता है किसी को। धूप खा के सूरज देख के संतोष करेंगे और क्या। बड़े शहर में खुला आसमान ही बड़ी बात है। यहाँ तो पूरब की खिड़की भी है। और पश्चिम वाली खिड़की तो खुलती भी है। इस साल ज़्यादा सोचेंगे नहीं। जितना जर्नलिज्म में सीखा था, सो जितना देखा-जिया है। उसको लिखेंगे बस। घर आ कर टेबल पर सामान जमाये तो देखते हैं Utopia का I गिर गया है। सोचे ठीक ही तो है, मेरे बिना थोड़े ना हो जाएगा, सब कुछ...परफेक्ट और impossible to exist.
आपका नया साल सुंदर हो। रंगभरा हो। आपकी जादूगरी आपके भीतर के दरवाज़े खोले। आप अपने तिलिस्म की दीवारों पर रंग-रोगन करें। नारे-वारे लिखें।
शुभम अस्तु।




