21 December, 2022

Random Portraits

Portrait of a tea drinker. 

इतनी सुंदर औरत ऐसे देर रात अकेले चाय पीने काहे आती है

तस्सर सिल्क की साड़ी। आइवरी पर हल्दी पीले रंग का बॉर्डर। माथे पर एकदम छोटी सी काली बिंदी। ख़ुश थी, लेकिन ऐसे नहीं जैसे लोग ख़ुश होते हैं जिनको जीवन में सब कुछ मिल गया हो। ऐसे ख़ुश जैसे पागलखाने से भाग के सीधे चाय के दुकान पर पहुँच गयी हो। कि उसे मालूम है कि डॉक्टर सबसे पहले उसे घर में ढूँढेंगे और फिर स्टारबक्स में। दोनों जगह पर नहीं मिली तो उसे गुमशुदा मान लेंगे। शायद FIR भी दर्ज कर लें।



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तुमको अब क्या चाय पीने का शौक़ चढ़ा है इस उमर में?

मतलब, उमर को क्या हर चीज़ में जोड़ना ज़रूरी है। मेरे पास हर चीज़ का कारण नहीं है। मन किया चाय पीने का, पिएँगे। ज़िंदगी भर किसको किसको सफ़ाई देते रहें। क्यूँ देते रहें। जो जो चाय पीने का मन करेगा, पिएँगे। जाओ ठेंगा।

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वो बुड़बक जैसा चाय का कुल्हड़ पकड़ती थी। समझ नहीं आता था कि चालीस की उमर होने को आया, अभी तक उसको चाय का कुल्हड़ पकड़ने का लूर कैसे नै है। बीड़ी तो ऐसे पिएगी जैसे जीवन भर दिहाड़ी मज़दूरी की हो। लेकिन हाथ में कुल्हड़ दे दो तो ऐसे अकबकाएगी जैसे स्टारबक्स में पैदा हुई हो। जन्मते ही माय का दूध नहीं, बोतल में लाते विथ कैरमल ऑर्डर की हो और एक ही सिप में मुँह बनायी हो कि कॉफ़ी बींस ठीक से रोस्ट नहीं हुए थे। 


कैसे दोस्त थे उसके, जिन्होंने कभी उसे किसी चाय के ठीहे पर ज़बर्दस्ती चाय नहीं पिलायी हो। जो दोस्त चाय के लिए मना करने पर मान जाएँ, वे दोस्त थोड़े होते हैं। पूछो उससे, कहाँ हैं वे सारे कॉलेज के दोस्तएक से भी टच में रहे तो मेरा नाम बदल के कुल्हड़ कुमार रख देना। अकेले चाय पी लेने वाले बेग़ैरत दोस्त इसको क्यूँ मिले, इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा

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इतना सुंदर साड़ी पहन के कहीं कोई नीचे ज़मीन पर बैठता भी है! कौन सी कहानी से भागी है लड़की? उसको वापस किताब में बंद कर देते हैं, चलो! चश्मा उतार के चाय पीना है उसको। कान में हेड्फ़ोन। क्या सुन रही है? क्यूँ सुन रही है। हमसे बात क्यूँ नहीं करती। किसी से बात क्यूँ नहीं करती? बैंगलोर में ऐसी लड़कियाँ होती भी हैं? होती हैं तो हमको क्यूँ नहीं मिलतीं?

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It’s important to be in love. Because that’s what colours everything. There is no muse, but the self. The one that smiles from the mirror, like I’ve lost my mind. 

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मुझे वेल्वेट की बिंदियाँ बहुत अच्छी लगती हैं। उसमें भी पिछले कुछ साल से शिल्पा बिंदी पर अटक गए हैं। साइज़ भी लगभग दो पर फ़िक्स है। अगर शादी-ब्याह जैसा कोई फ़ंक्शन है तो बड़ी बिंदी, अक्सर लाल रंग की। और अगर स्टारबक्स गए तो काली बिंदी। छोटी, लेकिन बहुत छोटी नहीं। पिछली बार लेकिन पता नहीं कैसे थोड़ी ज़्यादा छोटी बिंदी ख़रीद लिए। वैसे चश्मे का बड़ा सा, काला फ़्रेम है तो छोटी बिंदी बेहतर लगती है। फिर से बड़ी वाली बिंदी ख़रीदेंगे। इस वाली में दिक़्क़त ये है कि एक लड़की थोड़ी ज़्यादा याद आने लगती है। फिर शाम भी इतनी ठंढी है इन दिनों। दिल्ली बुक फ़ेयर भी तो फ़रवरी में होगा। जैसे पहली बार गए थे, तब हुआ था। 


आजकल एक कहानी मन में घूम रही है। लेकिन उस कहानी की लड़की को बहुत अच्छे से नहीं पहचानते। थोड़ा थोड़ा दिखती है कभी कभी। जिन दिनों अच्छे लगते हैं। ये मेरे किरदारों की क्या बदमाशी है कि सिर्फ़ साड़ी पहनेंगे तो मिलने आते हैं। इतना नख़रा तो कोई महबूब भी करे जितना ड्रामा ये किरदार करते हैं। आज जाफ़रानी चाय पी रहे थे। सड़क किनारे से ख़रीद कर। थोड़ा थोड़ा दिखी, एक पागल लड़की। जिसे बांध कर कहानी में रख देने का मन करे। 

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कुछ दिन पहले फ़िल्म देखी, ‘दोबारा अनुराग कश्यप ने डिरेक्ट की है। Mirage नाम की फ़िल्म की रीमेक है। मुझे फ़िल्म अच्छी लगी। ऑल्टर्नट रीऐलिटी की एक दुनिया है, जिसकी सारी बातें वो औरत भूल चुकी है, लेकिन उसे अपनी वाली रीऐलिटी में उसकी बेटी है, वो याद है। उस बेटी तक लौटने के लिए उसने पूरी दुनिया उलट-पलट कर दी है। कोई भी माँ करेगी। कि दुनिया की सबसे खूबसूरत बात हैं बेटियाँ। ड्रामेबाज। शरारती। शैतान। लेकिन इतनी छोटी सी मुहब्बत की पुड़िया। इतनी प्यारी कि उनके बारे में लिखने में डर लगे। नज़रबट्टू बन जाएँ हम। भूत की तरह काले-कलूटे, बड़ी बड़ी आँखें सफ़ेद और लाल-हरे-नीले से रंगे हुए। 

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कुछ दिन पहले प्रतीक कुहाड़ के कॉन्सर्ट में गए थे। कितना प्यार हो सकता है किसी आर्टिस्ट से। वो कोई छह फ़ीट आगे गा रहा है, स्टेज भी काफ़ी ऊँचा है। लेकिन ऐसा लगता है, कई बार, वो मेरी रूह के भीतर गुनगुना रहा है। एक गिटार थामे हुए। एक पियानो पर झूमते हुए। हमें बाहर गए कितना वक़्त हो गया है, सिंपल सी चीज़ जैसे कि कन्फ़ेटी ब्लास्ट जादू जैसा लगता है। अपनी जेब में कितनी सारी कन्फ़ेटी भर लाए, वो सारे सफ़ेद-लाल टुकड़े जो मेरे ऊपर गिरे, जो मेरे बालों में उलझे सब जेबों में भरे हुए जैसे कि सबसे बड़ा ख़ज़ाना हो। आसमान में रिबन गोल गोल घूमते हुए गए हम ख़ुश आँखों से अपने इर्द-गिर्द इतने लोगों को झूमते देखते रहे। उसके गाने कितने प्यारे हैं। कितने उदास हैं। ये चुप्पी उदासी हमारे इर्द-गिर्द मौसम की तरह लिपटती रही। हम गर्म शॉल की तरह उसे कसते रहे। सोचते रहे, कितने ख़ूबसूरत रंग हैं। कैसे जादुई। खिले हुए। 

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मुहब्बत में डूबी लड़की का पोर्ट्रेट। 


वो कहीं चुपचाप बैठी मुस्कुराती रहती। लेकिन वो एक चुगलख़ोर मुस्कान होती। शोरगर। देखो देखो, इस लड़की को किस बेतहाशा मुहब्बत हो रखी है। दुनिया की मुहब्बत के स्टॉक पर देखो, डकैती डाली है इसने। कहीं इतनी मुहब्बत होना अलाउड भी है किसी को? ये गुनाह है। इतने शॉर्ट टर्म में इतनी तेज़ी से। ये क्या थ्रिल है। ये क्या पागलपन है। उसकी मिनी कूपर के ख़तरनाक पिक-अप की तरह होती मुहब्बत उसे। ज़रा से उसके कदम थिरकते और एक लम्हे में जमीं से इक्कीस फ़्लोर पास जगमग करते पूरनमासी के चाँद को छू आती, इतनी मुहब्बत। 

जादूगर लड़की तिलिस्म रचती थी। किसी के इश्क़ में होती तो उसे क़िस्से में छुपा कर रख देती। वहाँ तक कोई नहीं पहुँच सकता, इक उस लड़की के सिवा। 

Gloaming. Dusk. इसी शहर, लेकिन इक खुली कार। खुली आँखों का ख़्वाब नहीं था। एक बहुत अच्छी फ़िल्म की स्क्रिप्ट थी। किसी फ़िल्म में ऐसी शाम थोड़ी होती भी है? ऐसा धुँधलाता हुआ धुआँ। निर्मल की धुंध से उठती धुन। हमारे बीच के कुछ ख़त। ज़रा से साझे शहर। थोड़े से उलझे क़िस्से। फीकी कॉफ़ी। पेंटिंग के रंग जो उतर चुके थे एक हफ़्ता पहले। तुम देर से आए थे। 

चिट्ठी लिखते हुए हड़बड़ी भी रहती और इंक पेन के सिवा बॉल पेन से लिखने का मन भी नहीं करता। उस आधी-पागल लड़की की आधी मिटी चिट्ठियों का कोई भी क्या ही करता। 

हज़ार बार कहोगे, इतनी उलझी हुयी हूँ मैं और यूँ जाते हुए मेरे बालों में अपनी उँगलियाँ उलझा के चले गए हो। दोस्त हो कि दुश्मन कि महबूब?

तुम्हारा होना। तुम्हारी आवाज़। तुम्हारी हँसी। तुम्हारी हँसी के शहर। तुम्हारे होने का मौसम। तुम्हारे साथ की धुंध। आसमान। चाँद। विस्की। आइस। जिन-टॉनिक। फीकी कॉफ़ी। चमकीली धूप। बिना चीनी की चोक्लेट। 

सब कुछ क़िस्सा कहानी था, बस किरदार का नाम सच था। 

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