13 November, 2022

Imaginary Diary Of _A_ Writer

मैं लिखते हुए अपनी पहचान भूल जाती हूँ। मुझे इस बात से डर लगता है। किसी और दुनिया को रचने की ज़रा सी भी कोशिश एक अजीब क़िस्म का नशा होता है। A sort of power play. जब कि आख़िरकार हम अपने किरदार के हाथों उतने ही मजबूर हो जाते हैं जितना कि शायद हमारा ईश्वर। ज़िंदगी बहुत हद तक बाइनरी है। मुझे ग्रे नहीं समझ आता। स्याह और सफ़ेद सिर्फ़। आर या पार सिर्फ़। 


मैंने सालों से नहीं लिखा है। मैं लिखने के बारे में नहीं सोचना चाहती। क्यूँकि उसके बाद एक प्रॉसेस है जो रुकती नहीं। मुझे उस लड़की से डर लगता है जो मैं हो जाती हूँ। एक बेतरह ख़ुश लड़की। सिगरेट फूँकती, बाल खोले, दुपट्टा उड़ाते शहर की सड़कों पर दीवानों की तरह रात बेरात चलती। जिसके ध्यान में होता है कि घर के बेसमेंट में कहीं पर उसकी रॉयल एनफ़ील्ड पार्क्ड है। रूद्र। उसे होश नहीं रहता। उसे लगता है वो ख़ुद को रोक नहीं पाएगी। उसके लिए consequences नहीं होते। मुहब्बत होती है। आज़ादी होती है। पागलपन होता है। और सब सहज होता है। अपने भीतर इतना स्याह लेकर जीना नहीं पड़ता है जब मैं वो सब लिख पाती हूँ जो मेरे भीतर चल रहा होता है।  


If you are crazy enough. Smoking a cigarette feels like French kiss. The smoke can be rolled inside the mouth. It lulls around and if you want you can inhale it and let the hit go to your brain. Or you can just let the smoke in and out and feel like you have just gently, fleetingly, kissed someone on the lips. In hurry, in goodbye, in heartbreak. 


लिखना मेरी ज़रूरत है। मुझे लिखे बिना साँस लेना नहीं आता। लिखे बिना मैं बौरायी फिरती हूँ, मुझे होश नहीं रहता। सब कुछ कंट्रोल में रहता है। कोई पागलपन नहीं। लेकिन मेरा संभला हुआ भी बाक़ी लोगों के हिसाब से पागलपन के ज़्यादा क़रीब होता है। 


अफ़सोस के चिल्लर मुझे किसी काम के नहीं लगते थे कभी। मैं गुनाहों के हज़ार के नोट का छुट्टा माँगने वाली लड़की रही हमेशा। लेकिन ऐसा होता गया है कि पिछले कई सालों से एक के बाद एक सिर्फ़ गुल्लक में अफ़सोस के सिक्के गिर रहे हैं। अब गुल्लक पूरी भर गयी है। इसे तोड़ कर कोई बड़ा गुनाह कर लूँ। भाग जाऊँ कहीं। कहाँ। 


जब कभी रॉयल एनफ़ील्ड के ऐड्ज़ देखे हैं, एक हूक उठती है। जैसे ये कोई ज़िंदगी है, जो मुझे जीनी थी, मैंने जी नहीं। कभी कुछ शहरों की बात होती है, तो लगता है, मुझे वहाँ जाना था। गयी नहीं। और ये शहर कोई बहुत फ़ैन्सी शहर नहीं हैं। ये वो शहर हैं जिनसे हमारा क़िस्सा जुड़ा हुआ है। कन्नौज, फ़िरोज़ाबाद, lansdowne, बनारस, गंगटोक, गुलमर्ग, जैसलमेर, जोधपुर, रायपुर। अपने इस देश में एक कार लेकर रोड ट्रिप कर सकना। यहाँ बैंगलोर से दिल्ली। रास्ते में पड़ने वाले शहर में कहानी सुनाते आएँ। कुछ कहानी उठाते हैं। ये कैसी ऑल्टर्नट रीऐलिटी है, ये कौन सी लड़की है जो मैं हूँ नहीं, लेकिन उसके जैसा होने की ऐसी अदम्य लालसा मुझे उम्र भर परेशान करती रही है। I am my muse for an eternity. क्या वाक़ई कोई दूसरी दुनिया है जिसमें मैं कोई और ज़िंदगी जी रही हूँ? क्या उस लड़की की ख़ुशी की आँच मेरी टेबल पर रखे काग़ज़ को आग लगा देती है


कहाँ से आती है वो हिम्मत, कि हम जो ज़िंदगी जीना चाहें, जी सकें? कि किसी दोस्त के साथ वैन गो म्यूज़ीयम देखें, किसी के साथ Pollock को देखते हुए पूछें, कि तुम्हें क्या दिखता है, क्या पसंद  आता है यहाँ, मेरी और तुम्हारी कहानी कितनी अलग है? कि शिकागो गए थे तो याद है कि Monet को देखते हुए दीवाने हो गए थे। कि पेरिस अकेले पहुँची थी और सबसे पहले Monet म्यूज़ीयम चली गयी। वहाँ वाटर लिलीज देखते हुए लगा कि मैं फूल हूँ, इसी तरह, नीलापानी पर खिला हुआ। 


कि हमें जो करना है, वो हमेशा ग़लत क्यूँ होता है। या ग़लत कि कैटेगरी सब पर एक जैसी कैसे लागू होती है। कि N, मुझे तुम्हारी इतनी याद अब भी क्यूँ आती है, जब कि तुम्हें मुझे भूलना इतना आसान रहा। कि महबूबों को हक़ था, कि वो मेरा दिल तोड़ दें, तुम तो दोस्त थी ना?


अपने अतीत को बार बार जीते हुए और अपने भविष्य को बार बार सोचते हुए मैं पागल हो जाऊँगी। इस शहर में जानलेवा तन्हाई है। या कि मेरी मिट्टी में मिला हुआ है ऐसा अकेलापन। मैं बाक़ी औरतों की तरह अपने बाल-बच्चों में व्यस्त होकर उन किरदारों को भूल क्यूँ नहीं जाती जिन्हें मैं लिख नहीं पायी?

उस घर का नाम Utopia है, या शायद क़िस्सा-घर या शायद मेट्रिक्स। 

कल मैं बहुत देर तक थी वहाँ। इक्कीसवें फ़्लोर का घर है। वहाँ से दूर क्षितिज दिखता है। एक बड़ा सा गहरा काला बादल गुजर रहा था। मैंने


इस ऊँचाई से कभी ऐसा बादल नहीं देखा था। कि जैसे मेरे इर्द-गिर्द बारिश थीकि मैं भी बारिश ही थी। आइफ़ोन १३ है अभी, लेकिन इसके बस का नहीं था वो कैप्चर कर पाना कि जो आँखों को दिख रहा था। कि मन के भीतर तो कैमरा लगा भी नहीं सकते। मुझे लगा सिर्फ़ ऐसी कुछ शामों को इस तरह से आँख भर के देख पाने के लिए मैं इस शहर में ताउम्र रह सकती हूँ। बिना किसी शिकायत के। घर जा कर लोगों को बताया तो किसी को समझ नहीं आया कि एक बादल में ऐसी क्या ख़ास बात थी। कि मेरे लिए ये थोड़ा सा बादल, थोड़ा सा पानी और एक कहानी भर था। लेकिन काफ़ी था। 


कि मेरे लिए तो काफ़ी कभी काफ़ी नहीं था। कि मुझे तो हमेशा पूरा आसमान चाहिए था ना। कि अब जब मिल गया है पूरा आसमान तो मैं किसके लिए इस आसमान के टुकड़े कर के भेज देना चाहती हूँ? कि किसे कहूँ, आओ, देखो मेरे हिस्से का आसमान, लाओ मेरे लिए अपने शहर कि मिट्टी, सुनाओ मुझे अपने हृदय का संगीतकि ज़िंदा रहने के लिए मुझे आज भी आसमान चाहिए और किसी ईश्वर ने मन्नत पूरी कर दी है। 


कि ये पूरा आसमान मेरा है। सिर्फ़ मेरा। 



#ImaginaryDiaryOf_A_Writer


2 comments:

  1. "लिखना मेरी ज़रूरत है। मुझे लिखे बिना साँस लेना नहीं आता। लिखे बिना मैं बौरायी फिरती हूँ, मुझे होश नहीं रहता। सब कुछ कंट्रोल में रहता है।
    ----------
    नीत्शे जैसा लगता है - I write, therefore I am!

    ReplyDelete
  2. सुंदर अभिव्यक्ति

    ReplyDelete

Related posts

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...