27 January, 2019

इश्तियाक़

दिल्ली एक किरदार है मेरे क़िस्से का। इक लड़की है जो दिल्ली जाते ही मुझसे बाहर निकल आती है। दीवानों की तरह घूमती है। चाय सिगरेट पीती है। व्हिस्की ऑन द रॉक्स। कानों  में झुमके। माथे पर छोटी सी बिंदी। आँखों में इतनी मुहब्बत कि पूरे पूरे उपन्यास सिर्फ़ उस रौशनी में लिखा जाएँ। वो लड़की जो दिल्ली देखती है और जीती है वो सच के शहर से बहुत अलग होती है। उस शहर के लोग ऐसी दिलफ़रेब होते हैं कि उनपर जान देने का नहीं, जान निसार देने को जी चाहता है। ख़ूबसूरत उफ़ ऐसे कि बस। क़िस्सों में ही होता है कोई इतना ख़ूबसूरत।

***

तो उसने मेरा उसे देखना देखा है। देर तक देखना। उसने वाक़ई मेरे चेहरे को ग़ौर से देखा होगा। कभी कभी सोचती हूँ मैं भी, कितने लोग होते होंगे उसे प्रेम में यूँ आकंठ डूबे हुए। मैं तुलना नहीं करना चाहती। उसके प्रेम में कम ज़्यादा नहीं होता। उसके प्रेम में सब एक जैसे ही दिखते हैं। मुझे वे सब स्त्रियाँ याद आती हैं जो उससे प्रेम करती हैं, जिन्हें मैंने देखा है। शायद जो एक ही अंतर मुझे दिखा, वो ये, कि वे प्रेम पर एक झीना पर्दा डालने की कोशिश करती हैं। एक घूँघट कि जिसके पीछे से उनका प्रेम और उनकी सुंदरता और ज़्यादा ही निखर जाती है। मुझे प्रेम यूँ भी हर ओर दिखता है। मैं प्रेम को उसके हर रूप में पहचान सकती हूँ। 

मुझे प्रेम में कृष्ण और राधा और मीरा और रूक्मिनी और गोपियाँ ही क्यूँ याद आती हैं? उनके एक मित्र ने पूछा, ‘आपको जलन नहीं होती? बुरा नहीं लगता’। मैंने हँस कर यही कहा था, वे कृष्ण हैं, सबका अधिकार है उन पर। मेरा प्रेम कोई अधिकार ना माँगता है न देता है। प्रेम सहज हो सकता है, अगर हम घड़ी घड़ी उसे सवालों के दायरे में ना बाँधें तो। 

उस रोज़ मैंने हल्दी पीले रंग की शॉल ओढ़ी थी। काले रंग का कुर्ता और काली चूड़ीदार। सर्दी ज़्यादा नहीं थी। दोस्तों ने हमेशा की तरह घुमा रखा था मुझे चकरघिरनी की तरह। कभी कहीं कभी कहीं। मैं दिल्ली में थी। मैं ख़ुश थी। जैसा कि मैं दिल्ली में हमेशा होती हूँ। किसी कहानी के किरदार जैसी। थोड़ी सच्ची, थोड़ी सपने में जीती हुयी। मेरी आँखों में जाने कितनी कितनी रौशनी थी। 

मैंने एक दिन पहले गुज़ारिश की थी, ‘कल शाम कहीं बाहर चलेंगे। मेरे हिस्से एक शाम लिखा सकती है क्या? डिनर या ड्रिंक्स कुछ।’ लेकिन इस दुनिया में ऐसा कुछ कहना फ़रमाईश की श्रेणी में आता है… अनाधिकार ज़िद की भी… और ज़िद तो हम कभी कर नहीं सकते। सो पूछा था और बात भूलने की कोशिश की थी। लेकिन दिल धड़क रहा था सुबह से। कभी कभी कोई ख़्वाहिश दुआ जैसी भी तो होती है। ईश्वर के पास जाती है…ईश्वर अच्छे मूड में होते हैं, बोलते हैं, तथास्तु। 

उस रेस्तराँ में पीली रोशनियाँ थीं… वोदका और व्हिस्की … थोड़ी थोड़ी आइस। मुझे याद है कितनी क्यूब्ज़, पर लिखूँगी नहीं। मेरा रेकर्ड नौ टकीला पी के भी होश में रहने का है। लोग कहते हैं मुझे पिलाना पैसों की बर्बादी है। मुझे कभी चढ़ती नहीं। कभी भी नहीं। एक थर्टी एमएल से हम टिप्सी हो जाएँ तो इसमें विस्की का कोई दोष नहीं हो सकता। हल्का हल्का सा लग रहा था सब। काँच के ग्लास के हल्की क्लिंक, ‘लव यू’। ब्रेख़्त याद आए। ‘When it is fun with you. Sometimes I think then. If I could die now. I’d have been happy. Right to the end.’ 

हम बाहर आए तो ठंडी हवा चल रही थी। मैं थोड़ी नशे में थी। सिर्फ़ इतना कि चलते हुए ज़रा सी उनकी बाँह पकड़ के चलने की दरकार हो। ऐसा नहीं कि गिर जाती, लेकिन ज़रा सा हाथ पकड़ के चलती, तो अच्छा लगता। ईमानदारी में लेकिन हमने जाने कहाँ की कौन सी घुट्टी घोल के पी रखी थी। जितने की ज़रूरत है उससे एक ज़रा कुछ नहीं माँगती। ये भी तो था कि ज़िंदगी ऑल्रेडी मेहरबान थी, उसपर ज़्यादा ज़ोर नहीं देना चाहिए। मैं ज़मीन से ज़रा ऊपर ही थी। थोड़ा सा ऊपर। हवा में। जिसे होवर करना कहते हैं। वैसी। 

मुझे ज़िंदगी में कई बार प्यार हुआ है। कई कई बार। लेकिन पहले प्यार होता था तो इस तरह उसमें डूबी होती थी कि कुछ होश ही नहीं रहता था, मैं क्या कर रही हूँ, किसके साथ हूँ… ख़ुमार में दिन बीतते थे। अब लेकिन प्यार इतने छोटे लम्हे के लिए होता है कि जब होता है तो अपनी पूरी धमक के साथ महसूस होता है। चेहरे पर चमक होती है, चाल में एक उछाल, बातों में थोड़ी सी लय… चुप्पी में थोड़ा सा सुख। अब मैं ख़ुद को देख भी पाती हूँ, बदलाव को महसूस कर पाती हूँ, उन्हें लिख पाती हूँ। 

हमने सिगरेट जलाई। मैं टिप्सी थी। थोड़ी। कनाट प्लेस में ऊँचे सफ़ेद खम्बे हैं। पीली रोशनी होती है। मेरे बाल खुले थे। मैं एक खम्बे से पीठ टिका कर खड़ी थी। थोड़ी थोड़ी उसी ऐक्सिस पर दाएँ बाएँ झूल रही थी। पाँच डिग्री। सिगरेट का कश छोड़ते हुए धुआँ मेरे और उनके बीच ठहरना चाहता लेकिन हवा थी… इसलिए उड़ जाता। उतने छोटे लम्हे में भी धुएँ के पार उनका होना एकदम किसी जादू जैसा था। मैं उन्हें छूना चाहती थी, देखने के लिए कि ये सपना तो नहीं है। लेकिन मैंने ऐसा किया नहीं। सिगरेट के गहरे कश खींचती और धुएँ के पार उन्हें देखती। सोचती। कोई कितना प्यार कर सकता है किसी से। मैं जितना प्यार कर सकती हूँ किसी से… उतना प्यार करती हूँ मैं उनसे।  
सिगरेट उन्हें देते हुए उँगलियाँ छू जातीं। सीने में कोई तड़प उठती। मैं उसे ठीक ठीक लिख नहीं सकती कि क्यूँ। किसी बेहद बेहद ख़ूबसूरत लम्हे को जीते हुए जब लगता है कि ये लम्हा गुज़र जाएगा। ये सिगरेट ख़त्म हो जाएगी। ये शहर हमें भूल जाएगा इक रोज़। उन्हें देखने को चेहरा पूरी तरह ऊपर उठा हुआ था। जैसे मैं आसमान में चाँद देखती हूँ। 

हम दोनों चुप थे। कि जाने दिल किस चीज़ का नाम है। कभी सिर्फ़ इतने पर जान दे रहा था कि जीवन में कभी एक बार उन्हें देख सकूँ। यहाँ एक पूरी शाम नशे में बीती थी। जाती शाम की आख़िरी और पहली सिगरेट जला चुके थे। लेकिन यहाँ से कहीं जाने को जी नहीं कर रहा था। मुझे याद नहीं मैंने आख़िरी बार कब किसी एक लम्हे को रोक लेना चाहा था। लेकिन ये एक वैसा लम्हा था। एक सिगरेट भर का लम्हा। कभी ना भूलने वाला लम्हा। शहर। और एक वही, जिसे जानां कहना चाहती थी। 

सुख की परिभाषा इतनी सी है कि हम जहाँ हैं और जिसके पास हैं, वहीं और उसी के पास होना चाहें उस लम्हे। सुख उतना ही था। मैं दिल्ली की किसी शाम थोड़े नशे में टिप्सी, ज़रा सी झूमती हुयी उस एक शख़्स के साथ सिगरेट पी रही थी जो कहानियों जैसा था। शहज़ादा। सरकार। कि जिसकी हुकूमत मेरे दिल पर चलती है, मेरे किरदारों पर, मेरे सपनों और पागलपन पर भी। दुनिया की किसी भी कहानी का प्लॉट इतना सुंदर नहीं हो सकता था जितना ज़िंदगी का था। 

उससे मेरा कहानियों का रिश्ता है। मैं लिखती हूँ और वो सच होता जाता है। मैं लिखती हूँ सफ़ेद शर्ट और उसके बदन पर कपास के धागे बुनते जाते हैं ताना बाना। मैं लिखती हूँ नीला कोट और देखती हूँ कि उसके कफलिंक्स पेन की निब वाले हैं। मैं लिखती हूँ वोदका और नशे में चलती हूँ थोड़ा बहकती हुयी। सिगरेट लिखती हूँ तो मेरी उँगलियों में उसकी छुअन महसूस होती है। मैं लिखना चाहती हूँ उसकी आँखें लेकिन स्याही नहीं होती मेरे पास। 

मैं उसे विदा नहीं कह सकी। वो मेरी रूह में घुल गया है। मेरे आसमान में, चमकते चाँद में। स्याही में। ख़ुशी में। इंतज़ार में। 

लिखे हुए क़िस्से की सबसे ख़ूबसूरत बात यही है कि अतीत में जा कर क़िस्से को बदल नहीं सकते। तो वो एक सिगरेट मुझसे कोई नहीं छीन सकता। वो शहर। चुप्पी। पीले रंग की शॉल। उसकी सफ़ेद शर्ट। उसके गले लगने की ख़्वाहिश। उसे न चूमने का दुःख। ये ख़ज़ाना है। मरूँ तो मेरे साथ चला जाए। नायाब ये इश्क़ तिलिस्म। 

मोह में रचते हैं। इश्क़ में जीते हैं। क़िस्से-कहानियों-कविताओं से लोग। 
जां निसार तुझ पे, जानां! 

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