06 July, 2017

एक ख़त पाठकों के नाम

प्रिय (और अप्रिय) पाठकों।

जब आप मुझसे कुछ बेहतर लेखक होने की चाह रखते हैं, तो ये समझिए कि मैं भी आपसे बेहतर पाठक होने की चाह रखती हूँ। अच्छे लेखक विरले हैं अगर तो अच्छे पाठक और भी विरले हैं।

आप मुझसे किताबों पर बात कीजिए। आप इन दिनों क्या पढ़ रहे हैं। उसमें क्या अच्छा लगा। किरदारों की बुनावट में कौन सी चीज़ें अच्छी लगती हैं। क्या कोई बहुत सुंदर और नया बिम्ब दिखा किसी लेखन में।

कला के कई आयाम होते हैं। गीत और संगीत बहुत हद तक आसान होता है। कोई गीत एकदम अलग सा हो। कोई संगीतकार कि जो बहुत पॉप्युलर ना हो। मैंने गाने बहुत कम सुने हैं और वाक़ई जो सुने हैं दोस्तों के बताए, सुनाए या लिखाए गए ही हैं। आपको कोई संगीतकार बहुत अच्छा लगता है, कोई बैंड बहुत पसंद है। आप कह सकते हैं उस बारे में। मेरा इन्बाक्स खुला है।

पेंटिंग थोड़ी मुश्किल भाषा है। इसके कूटशब्द सब जगह नहीं मिलते। मैं सिर्फ़ इतना ही कहूँगी कि किसी पेंटिंग को उसका प्रिंट देख कर समझ पाना मुश्किल है। उसके लिए सच की पेंटिंग देखनी होती है। यहाँ शब्दों की जगह नहीं होती। आपको जो पेंटिंग पसंद है, आप ख़ुद ही उसकी कहानी सुन सकेंगे। चुपचाप। आप वो रंग होते जाएँगे कि जो कैनवास का हिस्सा हैं।

मैंने इस पेज को कुछ साल पहले बनाया था। मैं इसे रफ़ कॉपी की तरह इस्तेमाल करती हूँ। बिना सोचे समझे, बिना ज़्यादा सेंसर किए चीज़ें रखती हूँ। कि ये कच्चा माल है। अच्छा लिखने का एक ही तरीक़ा मुझे समझ में आता है। लिखते जाना। सिर्फ़ सोच कर मैं अच्छा नहीं लिख सकती।

लिखते हुए शब्दों पर ध्यान दें। रैंडम चीज़ें ना लिखें। सिर्फ़ अच्छा और बुरे से आगे बढ़ कर अपनी बातों को ज़्यादा स्पष्ट तरीक़े से कहें।

आख़िरी बात। मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने लिए लिखती हूँ। ये बात बदलने वाली नहीं है। लिखने पर बिन माँगी सलाह से मेरा दिमाग़ ख़राब होता है। मुझे वाक़ई ग़ुस्सा आता है। कोई भी लेखक अपने पाठकों के हिसाब से नहीं लिखता। वो लिखता है कि उसके अंदर कोई कहानी होती है जो कहा जाना माँगती है।

पाठक होने की विनम्रता होनी चाहिए। मैं ये इसलिए कह रही हूँ कि मैं लेखक होने के कई साल पहले और अभी भी, सबसे पहले एक पाठक हूँ। अपने पसंद के लेखकों के प्रति एक सम्मान और कृतज्ञता से भरी रही हूँ। लिखना मुश्किल होता है। हर लेखक के लिए। आप किसी भी लेखक या कलाकार की जीवनी उठा कर पढ़ लीजिए। भयानक उथल पुथल से भरी मिलेगी। आंतरिक और बाह्य, दोनों। सारी मेहनत उस कलाकार की है। आप सिर्फ़ ग्रहण कर रहे हैं। याचक भाव से। हथेली फैलाइए।

मैं लेखक पाठक दोनों हूँ। पाठक होते हुए मैं भी याचक की मुद्रा में होती हूँ। बात मेरे पसंद के मंटो की हो, रेणु की हो, JK रोलिंग की हो, मुराकामी की हो, लोर्का की हो, सिंबोर्सका की हो, स्वदेश दीपक की हो। मैं इनके सामने ज़मीन पर होती हूँ। ये आसमान में चमक रहे होते हैं।

लेकिन जब मैं लेखक होती हूँ तो एक पाठक से बढ़ कर होती हूँ कि मेरा होना आपके होने से स्वतंत्र है। लेखक ना हों तो पाठक का अस्तित्व नहीं होता। लेकिन पाठक ना हों तो भी लेखक लिखता है।

आपका कोई अधिकार नहीं है। ना मेरे लिखे पर। ना मेरे जीवन पर।

चपलम समरपयामी

कभी कभी कमाल का मूड होता है। आज व्यंग्य लिखने का मन कर रहा है। 

ऐसा कुछ लिखने की दो वजह हो सकती है। पहली तो सिम्पल कि हम आजकल शायरी पढ़ रहे हैं। दूसरा ये कि एक दोस्त के यहाँ जाने पर उसकी चप्पल माँग के पहने। क़सम से चप्पल देखते ही पटना के हनुमान मंदिर के आगे वाला चप्पल का ढेर याद आ गया। वो चप्पल हंडरेड परसेंट वहीं से उड़ाया गया था। 

तो इन दिनों के कौंबिनेशन से दिमाग़ में अजीब अजीब ख़याल और इमेजेस उभर रहे हैं। कि जैसे एक शायरी का मंच हो। मंच के ऊपर बड़ा सा पोस्टर लिखा हो। 'मंच पर फेंके गए जूते चप्पल ज़ब्त कर लिए जाएँगे और धारक(फेंकक) को वापस नहीं मिलेंगे। समझदार लोग इसका भी जोड़ तोड़ निकाल लेंगे। वे सिर्फ़ एक पैर का जूता फेंकेंगे। इसके बाद सिंडरेला की तरह हर जूते का जोड़ा खोजा जाएगा। लोग कवि सम्मेलनों/मुशायरे के पहले whatsapp ग्रूप पर मेसेज भेज कर साथ में डिसाइड करेंगे कि इस बार लेफ़्ट पैर का जूता फेंकना है या राइट पैर का। कहीं ऐसा ना हो कि आपका दायाँ जूता और किसी और का बायाँ जूता मैच हो जाए और मुफ़्त में ही संचालकों का या कि शायर का ही फ़ायदा हो जाए। ग़लती से किसी का फ़ायदा हो जाए, इससे बड़ा धोखा क्या होगा इस जाहिल वक़्त में। इतने ख़राब दिन आ जाएँ आपके तो आप अगले मुशायरे में श्रोता बनने की जगह शायर ना हो जाएँ भला। बतलाइए! 

शहर में बड़ा मुशायरा होने के पहले मंदिर के आगे से चप्पल चोरी होने की घटनाओं में ताबड़तोड़ वृद्धि होने लगे। लोग मुशायरे में नंगे पैर जाएँ...जाने की असली वजह ये हो कि आख़िर में अपना खोया हुआ चप्पल तलाश के वापस ला सकें। मुशायरे के बाद। बेजोड़ी जूतों की सेल लगे और जैसे समझदार गृहिणी मार्केट के बचे हुयी सब्ज़ी में से छाँट के सबसे अच्छी और सस्ती सब्ज़ियाँ घर ले जाती है उसी तरह समझदार श्रोता उस चप्पलों/जूतों के महासमुद्र में जोड़ा छाँट लें। पूरी पूरी जोड़ी तो मियाँ बीबी की भी नहीं मिलती। कहीं ना कहीं कॉम्प्रॉमायज़ करना ही पड़ता है। फिर जूतों में कौन से छत्तीस गुण मिलने हैं। 

इस तरह के मुशायरों का असर हर ओर पड़ने की सम्भावना है। इससे शहर का फ़ैसन बदलेगा। अलग अलग जूते पहनना सम्मान की निशानी मानी जाएगी। सही समय पर दाद देना एक कला है। चप्पल सद्गति को प्राप्त होगी। सही समय पर, सही निशाने से, सही गति और दिशा में मारी गयी चप्पल अपने अंजाम तक पहुँचेगी। लोगों में भाईचारा बढ़ेगा। वसुधैव कुटुंबकम वाली फ़ीलिंग आएगी। जो आज मेरा है वो कल किसी और का होगा और किसी का जो है वो मेरा हो सकता है। लोग अड़ोसी पड़ोसी को अच्छी चप्पलें ख़रीदवाएँगे। 

मार्केट में नयी स्टडीज़ आएँगी। शायर लोगों का कॉन्फ़िडेन्स इस बात से डिसाइड होगा कि किसके शेर पढ़ने पर कितने लोगों ने कितना फेंका। चप्पल। जूता वग़ैरह। फेंकने शब्द को नया आयाम मिलेगा।
वग़ैरह वग़ैरह। 

***
PS: हमको मालूम नहीं है कि हम बौराए काहे हैं। लेकिन जैसा कि हम पहले भी कह चुके हैं। इस दीवाल पर जूता चप्पल फेंकने का कोई फ़ायदा नहीं है। लिखाई पढ़ाई होती रहती है। पसंद ना आए तो दूसरे पन्ने पर चले जाइए। श्रद्धा आपकी। कपूर भी आपका। ख़ैर।
हमको लगता है हम पगला गए हैं। 

PPS: मन तो कर रहा है साथ में अपने ही चप्पल का फ़ोटो साट दें, लेकिन घर में ऐसा फटेहाल कोई चप्पल है नहीं। बाद में एडिट करके चिपकाएँगे।

Related posts

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...